पुस्तक · 17 अध्याय · 6 घंटे 1 मिनट का पठन
सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
Hannah Whitall Smith · 1832–1911
मुफ़्त में पढ़ें·किसी खाते की ज़रूरत नहीं
यह पुस्तक क्यों लिखी गई है
इस पुस्तक के बारे में
इतने सारे मसीही अपने विश्वास को विश्राम के स्रोत के बदले एक भारी बोझ की तरह क्यों ढोते हैं? इस कालजयी पुस्तक में हन्ना व्हिटॉल स्मिथ धार्मिक परिश्रम की थका देनेवाली परतों को हटाकर परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को प्रगट करती हैं। वे तुम्हें “ऊपर-नीचे झूलते” आत्मिक जीवन से आगे बढ़कर उस शान्त, स्थिर भरोसे में बस जाने का निमन्त्रण देती हैं, जो केवल परमेश्वर की बात को सच मान लेने से आता है। वह शान्ति खोजो जो डगमगाती नहीं।
“मूसा ने परमेश्वर से कहा, ‘जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे यह कहूँ, “तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,” तब यदि वे मुझसे पूछें, “उसका क्या नाम है?” तब मैं उनको क्या बताऊँ?’” निर्गमन 3:13 युगों-युगों का और हर मनुष्य के हृदय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यहाँ व्यक्त हुआ है: “उसका क्या नाम है?”
विषय-सूची
- 1 यह पुस्तक क्यों लिखी गई है 17 मिनट
- 2 उसका नाम क्या है? 21 मिनट
- 3 सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर 18 मिनट
- 4 यहोवा हमारा चरवाहा 22 मिनट
- 5 उसने उनसे पिता के विषय में बातें कीं 20 मिनट
- 6 यहोवा 24 मिनट
- 7 यहोवा भला है 22 मिनट
- 8 प्रभु हमारा धाम 23 मिनट
- 9 बहुत अधिक, न कि बहुत कम 18 मिनट
- 10 आत्म-परीक्षा 28 मिनट
- 11 वे बातें जो हिलाई नहीं जातीं 19 मिनट
- 12 डगमगानेवालों से एक बात 20 मिनट
- 13 निराशा 17 मिनट
- 14 विश्वास का जयजयकार 15 मिनट
- 15 धन्यवाद, न कि कुड़कुड़ाना 21 मिनट
- 16 मसीह के स्वरूप में ढलना 32 मिनट
- 17 परमेश्वर ही पर्याप्त है 24 मिनट
प्रश्न और उत्तर
“सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर” किस विषय में है?
यह एक खोजनेवाले प्रश्न का हन्ना व्हिटॉल स्मिथ का स्नेह भरा उत्तर है: इतने सारे मसीही अपने विश्वास को विश्राम के स्रोत के बदले एक भारी बोझ की तरह क्यों ढोते हैं? धार्मिक परिश्रम की थका देनेवाली परतों को हटाकर वे परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को भला, प्रेमी और पूरी तरह भरोसे के योग्य दिखाती हैं, और व्याकुल विश्वासी को उस शान्ति और विश्राम में बुलाती हैं जो उसे वैसा ही जानने से बहती है जैसा वह सचमुच है।
हन्ना व्हिटॉल स्मिथ कौन थीं?
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के आरम्भ की एक अमेरिकी लेखिका और वक्ता, जो क्वेकर परिवार में पली-बढ़ीं और उच्चतर मसीही जीवन की सबसे प्रभावशाली आवाज़ों में से एक बनीं। “मसीही के सुखी जीवन का भेद” के लिये सबसे अधिक जानी जानेवाली, उन्होंने 1906 में प्रकाशित यह बाद की पुस्तक उस शान्ति और विश्राम पर लिखी जो उस विश्वासी को मिलता है जो परमेश्वर की भलाई पर सचमुच भरोसा करता है।
पुस्तक का केन्द्रीय सन्देश क्या है?
यह कि परमेश्वर का अपना स्वभाव — उसकी भलाई, प्रेम और सच्चाई — हर सच्ची शान्ति की नींव है, और बहुत से मसीही केवल इसलिए बोझ से दबे हैं कि वे उसे वैसा नहीं जानते जैसा वह है। स्मिथ पाठक पर ज़ोर देती हैं कि वह अपनी भावनाओं या अपने प्रदर्शन में नहीं, बल्कि परमेश्वर कौन है इस स्थिर सत्य में विश्राम करे, और इस प्रकार व्याकुल धार्मिकता को शान्ति से बदल ले।
स्मिथ की दृष्टि में इतने सारे मसीहियों को विश्राम क्यों नहीं मिलता?
क्योंकि वे परमेश्वर को गलत समझते हैं, उसे कठोर या कठिनाई से प्रसन्न होनेवाला मानते हैं, और इसलिए अपने विश्वास को उसे सन्तुष्ट करने का एक थका देनेवाला प्रयास बना लेते हैं। स्मिथ तर्क देती हैं कि यही झूठा चित्र मसीही चिन्ता की बहुत बड़ी जड़ है, और परमेश्वर की सच्ची, कभी न चूकनेवाली भलाई को देखना उस बोझ को घोल देता है और विश्वासी को उसकी देखभाल में विश्राम करने देता है।
यह पुस्तक “मसीही के सुखी जीवन का भेद” से कैसे जुड़ी है?
यह उस प्रसिद्ध पुस्तक की साथी है और उसी मूल सत्य को दूसरे कोण से सामने रखती है। जहाँ “मसीही के सुखी जीवन का भेद” भरोसे और समर्पण का जीवन खोलकर बताती है, वहाँ “सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर” उस परमेश्वर के स्वभाव पर ठहरती है जिस पर हमें भरोसा करना है — और विश्राम के जीवन को उसी की भलाई पर टिकाती है जिसमें हम विश्राम करते हैं।
क्या यह पुस्तक केवल शान्ति की भावनाओं के विषय में है?
नहीं — स्मिथ जिस शान्ति का वर्णन करती हैं वह मन की दशा पर नहीं, सत्य पर टिकी है। वह परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को जानने से आती है, इसलिए वह तब भी दृढ़ रहती है जब भावनाएँ चूक जाती हैं या परिस्थितियाँ अन्धकारमय हो जाती हैं। उनकी चिन्ता यह है कि पाठक को बदलती भावनाओं से हटाकर इस ठोस भूमि पर खड़ा करें कि परमेश्वर कौन है, ताकि उसकी शान्ति की ऐसी नींव हो जो हिलती नहीं।
यह पुस्तक किसके लिये है?
हर उस मसीही के लिये जो अपने विश्वास को विश्राम नहीं, बल्कि बोझ पाता है; जो व्याकुल, थका हुआ, या परमेश्वर के डरावने चित्र से परेशान है। स्मिथ ऐसे पाठकों के लिये असाधारण स्नेह और सीधेपन से लिखती हैं, और इस पुस्तक ने बहुतों की आँखें उनके अपने प्रयास से हटाकर सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर की भलाई की ओर फेरकर उन्हें राहत दी है।
पाठक को कहाँ से आरम्भ करना चाहिए?
आरम्भ से — स्मिथ को पहले उस बोझिल, आनन्दहीन धार्मिकता की बात करने दो जिसे बहुत से लोग ढोते हैं, फिर वे परमेश्वर का वह सच्चा स्वभाव खोलती हैं जो उसका उत्तर है। पुस्तक अपनी बात स्नेह से और क्रम से आगे बढ़ाती है, और इसे धीरे-धीरे पढ़कर जीवन में उतारना सबसे अच्छा है, क्योंकि इसकी शान्ति केवल समझने के लिये नहीं, उसमें प्रवेश करने और विश्राम करने के लिये है।