सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
यह पुस्तक क्यों लिखी गई है

अध्याय 1 · 17 मिनट का पठन

यह पुस्तक क्यों लिखी गई है

“मेरा हृदय एक सुन्दर विषय की उमंग से उमड़ रहा है, जो बात मैंने राजा के विषय रची है उसको सुनाता हूँ।” भजन संहिता 45:1 एक बार मैं एक बुद्धिमान अज्ञेयवादी से धर्म के विषय में बातें कर रही थी, जिस पर मैं बहुत प्रभाव डालना चाहती थी; और कुछ देर तक शिष्टता से मेरी बात सुनने के बाद उसने कहा, “अच्छा, महोदया, मुझे बस इतना ही कहना है। यदि आप मसीही लोग चाहते हैं कि हम अज्ञेयवादी आपके धर्म को जाँचने के लिये उत्सुक हों, तो आपको स्वयं अपने धर्म में अधिक चैन और शान्ति से रहने का प्रयत्न करना चाहिए। जिन मसीहियों से मैं मिलता हूँ, वे मुझे कहीं के भी लोगों से अधिक बेचैन लोग जान पड़ते हैं। वे अपने धर्म को ऐसे ढोते हैं जैसे कोई मनुष्य सिरदर्द को ढोता है। वह अपने सिर से छुटकारा तो नहीं चाहता, परन्तु साथ ही उसका होना उसे बहुत कष्ट देता है। और जहाँ तक मेरी बात है, मुझे इस प्रकार का धर्म नहीं चाहिए।” यह एक ऐसी सीख थी जिसे मैं कभी नहीं भूली, और यही इस पुस्तक को लिखने का मुख्य कारण है।

जब यह बातचीत हुई, तब मैं मसीही जीवन में बहुत नई थी और उसमें प्रवेश करने के पहले आनन्द में ही डूबी हुई थी, इसलिए मैं विश्वास ही नहीं कर पाती थी कि परमेश्वर की कोई भी सन्तान अपने धार्मिक जीवन में उतनी बेचैन हो सकती है जितना मेरे अज्ञेयवादी मित्र ने कहा था। परन्तु जब मेरे मन-परिवर्तन की आरम्भिक चमक बीत गई, और मैं प्रतिदिन के कर्तव्यों और जिम्मेदारियों की नीरसता में उतर आई, तब मैंने शीघ्र ही अपने अनुभव से, और अपने आस-पास के अधिकांश मसीहियों के मिलते-जुलते अनुभवों से भी, जान लिया कि उसकी बात में बहुत अधिक सच्चाई थी, और हम में से अधिकांश का धार्मिक जीवन बेचैनी और अशान्ति से भरा हुआ था। वास्तव में, जैसा मेरे एक मसीही मित्र ने एक दिन मुझसे कहा, जब हम अपने-अपने अनुभवों की तुलना कर रहे थे, ऐसा लगता था “मानो हमारे पास बस इतना ही धर्म है कि वह हमें दुःखी कर दे।”

मैं मानती हूँ कि यह बड़ी निराशा की बात थी, क्योंकि मैंने कुछ बिलकुल ही अलग की आशा की थी। मुझे यह अत्यन्त असंगत लगा कि जिस धर्म के फल बाइबल में प्रेम, आनन्द और शान्ति बताए गए हैं, वह व्यवहार में इतनी बार ठीक उल्टा निकले, और सन्देह, भय, अशान्ति, संघर्ष और हर प्रकार की बेचैनी उत्पन्न करे; और मैंने ठान लिया कि यदि सम्भव हो तो मैं पता लगाऊँगी कि गड़बड़ी कहाँ है। मैंने अपने आप से पूछा, परमेश्वर की सन्तान ऐसा पूरी तरह बेचैन धार्मिक जीवन क्यों बिताए, जबकि उसने हमें यह विश्वास करने दिया है कि उसका जूआ सहज और उसका बोझ हलका है? हम इतने आत्मिक सन्देहों और इतनी भारी आत्मिक चिन्ताओं से क्यों घिरे रहते हैं?

हमें यह निश्चय करना इतना कठिन क्यों लगता है कि परमेश्वर सचमुच हमसे प्रेम करता है, और ऐसा क्यों है कि हम उसकी कृपा और उसकी देखभाल पर कभी देर तक विश्वास नहीं कर पाते? ऐसा कैसे है कि हम अपने मन में यह सन्देह आने देते हैं कि आवश्यकता के समय वह हमें भूल जाता और त्याग देता है? हम अपने सांसारिक मित्रों पर भरोसा कर सकते हैं और उनकी संगति में निश्चिन्त रहते हैं, तो ऐसा क्यों है कि हम अपने स्वर्गीय मित्र पर भरोसा नहीं कर पाते, और उसकी सेवा में निश्चिन्त नहीं रह पाते?

मेरा विश्वास है कि मैंने इन प्रश्नों का उत्तर पा लिया है, और मैं खुलकर कहना चाहती हूँ कि इस पुस्तक को लिखने में मेरा उद्देश्य यही है कि अपने आस-पास के कुछ व्याकुल मसीही जीवनों में थोड़ी-सी सच्ची और वास्तविक शान्ति पहुँचाने का प्रयत्न करूँ। प्रभु यीशु मसीह के धर्म के विषय में मेरी अपनी समझ यह है कि वह शान्ति से भरपूर होने के लिये ही ठहराया गया था। मुझे निश्चय है कि नये नियम का कोई भी निष्पक्ष पाठक यही कहेगा, और मेरा विश्वास है कि हर नया मन फिराया हुआ व्यक्ति, अपने मन-परिवर्तन के पहले आनन्द में, पूरे मन से इसी की आशा करता है। फिर भी, जैसा मैं कह चुकी हूँ, ऐसा लगता है कि बहुत बड़ी संख्या में मसीहियों के लिये उनका धार्मिक जीवन ही उनके अस्तित्व का सबसे बेचैन भाग है। क्या इस स्थिति का दोष प्रभु का है? क्या उसने जितना दे सकता है उससे अधिक की प्रतिज्ञा की है?

एक लेखक ने कहा है, “हम जानते हैं कि बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन करना क्या होता है। यह एक आधुनिक रोग है जिससे हम सब पीड़ित हैं। हर विज्ञापन-पट पर पोस्टर लगे हैं, हर खाली दीवार पर अतिशयोक्तियाँ लिखी हैं, अनगिनत चित्रण और मिथ्या चित्रण हैं। अमुक-अमुक के बीजों से उगे असम्भव फलों और फूलों के कैसे-कैसे दृश्य हमने देखे हैं। हर वस्तु का बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन होता है। क्या परमेश्वर के राज्य के साथ भी ऐसा ही है? क्या राज्य के अच्छे बीज से जो फल हम उत्पन्न करते हैं, वे उस वर्णन से मेल खाते हैं जो उसने दिया जिससे हमें वह अच्छा बीज मिला? क्या उसने हमें भटकाया है? चारों ओर यह भावना फैली है कि मसीह ने अपने सुसमाचार में जितना उसके पास देने को है उससे अधिक की पेशकश की है। लोग सोचते हैं कि जो कुछ परमेश्वर की सन्तान के भाग के रूप में प्रतिज्ञा किया गया था, उसका उन्हें पूरा-पूरा अनुभव नहीं हुआ। परन्तु ऐसा क्यों है? क्या परमेश्वर के राज्य का बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन किया गया है, या उस पर केवल कम विश्वास किया गया है? क्या प्रभु यीशु मसीह को उसकी योग्यता से अधिक आँका गया है, या उस पर केवल कम भरोसा किया गया है?”

इस पुस्तक में मैं जो करना चाहती हूँ वह यह है कि अपनी छोटी-सी रीति से वह बात दिखाऊँ जिस पर मेरा दृढ़ विश्वास है: कि परमेश्वर के राज्य का बढ़ा-चढ़ाकर विज्ञापन किया ही नहीं जा सकता, और न प्रभु यीशु मसीह को उसकी योग्यता से अधिक आँका जा सकता है, क्योंकि “जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुनी, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ी वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं”; और सारी कठिनाई इसी बात से उत्पन्न होती है कि हमने कम विश्वास किया है और कम भरोसा रखा है।

इसलिए मैं जितनी स्पष्टता से हो सके यह दिखाना चाहती हूँ कि प्रभु यीशु मसीह के धर्म में प्राण के उस गहरे और स्थायी चैन और शान्ति के क्या-क्या कारण हैं, जिसे पृथ्वी की कोई वस्तु भंग नहीं कर सकती, और जिसे उस धर्म को अपनानेवालों का भाग कहा गया है। और मैं यह भी समझाना चाहती हूँ कि यदि यह सचमुच हमारा उचित भाग है, तो हम इसका उपयोग कैसे करें, और कौन-सी बातें इसके मार्ग में बाधा बनती हैं। इस विषय में परमेश्वर का भाग भी है, और मनुष्य का भाग भी, और हमें दोनों पर ध्यान से विचार करना चाहिए।

एक उच्छृंखल युवक, जो एक मिशन सभा में प्रभु के पास लाया गया था, और जो बाद में एक आनन्दित मसीही बना और भला जीवन बिताने लगा, उससे किसी ने पूछा कि उद्धार पाने के लिये उसने क्या किया था। “ओह,” उसने कहा, “मैंने अपना भाग किया, और प्रभु ने अपना।”

“परन्तु तुम्हारा भाग क्या था,” पूछनेवाले ने पूछा, “और प्रभु का भाग क्या था?”

“मेरा भाग,” तुरन्त उत्तर मिला, “भाग जाना था, और प्रभु का भाग मेरे पीछे तब तक दौड़ना था जब तक उसने मुझे पकड़ न लिया।”

कितना अर्थपूर्ण उत्तर है; परन्तु कितने थोड़े लोग इसे सचमुच समझ पाते हैं!

परमेश्वर का भाग सदा हमारे पीछे दौड़ना है। मसीह खोए हुओं को ढूँढ़ने और उनका उद्धार करने आया। “तुम में से कौन है जिसकी सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक खो जाए तो निन्यानवे को मैदान में छोड़कर, उस खोई हुई को जब तक मिल न जाए खोजता न रहे? और जब मिल जाती है, तब वह बड़े आनन्द से उसे काँधे पर उठा लेता है।” यही सदा ईश्वरीय भाग है; परन्तु अपनी मूर्खता में हम इसे नहीं समझते, और इसके बदले यह सोचते हैं कि खोया हुआ तो प्रभु है, और हमारा भाग उसे ढूँढ़ना और पाना है। जिन शब्दों का हम प्रयोग करते हैं, वे ही यह दिखाते हैं। हम पापियों से आग्रह करते हैं कि “यहोवा की खोज करो,” और हम उसे “पा लेने” की बात करते हैं। “क्या तुमने उद्धारकर्ता को पा लिया है?” एक अति उत्साही मिशन कार्यकर्ता ने एक प्रसन्न और भरोसा रखनेवाली छोटी लड़की से पूछा।

आश्चर्य भरी दृष्टि से उसने विस्मय भरे स्वर में उत्तर दिया, “अरे, मुझे तो पता ही नहीं था कि उद्धारकर्ता खो गया था!”

यह सब परमेश्वर के विषय में हमारी अज्ञानता के कारण होता है। क्योंकि हम उसे नहीं जानते, इसलिए स्वाभाविक है कि हम उसके विषय में हर प्रकार के गलत विचार बना लेते हैं। हम सोचते हैं कि वह एक क्रोधित न्यायी है जो हमारी छोटी से छोटी भूल की ताक में रहता है, या एक कठोर काम करानेवाला स्वामी है जो हमसे अधिक से अधिक सेवा लेने पर तुला है, या एक आत्म-केन्द्रित देवता है जो अपने पूरे आदर और महिमा की माँग करता है, या एक दूर बैठा राजा है जिसे केवल अपने ही कामों की चिन्ता है और हमारे कल्याण से कोई सरोकार नहीं। कौन आश्चर्य कर सकता है कि ऐसे परमेश्वर से न तो प्रेम किया जा सकता है और न उस पर भरोसा? और कौन यह आशा कर सकता है कि मसीही, उसके विषय में ऐसे विचार रखते हुए, बेचैनी और दुःख से भरे होने के सिवाय कुछ और हो सकते हैं?

परन्तु मैं पूरे निश्चय के साथ, और खण्डन के किसी भय के बिना, कह सकती हूँ कि जो कोई परमेश्वर को सचमुच जानता है, उसके लिये उसके विषय में ऐसे अशान्त विचार रखना असम्भव है। बाहरी बेचैनियाँ बहुत-सी हो सकती हैं, और बहुत-से सांसारिक दुःख और परीक्षाएँ भी, परन्तु उन सब के बीच परमेश्वर को जाननेवाला प्राण भीतर से पूर्ण शान्ति के स्थान में ही निवास करेगा। “जो मेरी सुनेगा, वह निडर बसा रहेगा, और विपत्ति से निश्चिन्त होकर सुख से रहेगा।” और यह एक ऐसी बात है जिस पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता। यदि हम सचमुच परमेश्वर की सुनें—जिसका अर्थ केवल उसे सुनना ही नहीं, वरन् जो हम सुनते हैं उस पर विश्वास करना भी है—तो हम यह जाने बिना नहीं रह सकते कि, क्योंकि वह परमेश्वर है, वह अपनी आँख की पुतली के समान हमारी सुधि रखने के सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकता, और कोमल प्रेम और ईश्वरीय बुद्धि हमारी भलाई के लिये जो कुछ कर सकती है, वह सब निश्चय ही किया जाएगा। परमेश्वर को जाननेवाले प्राण के लिये चिन्ता या भय का एक भी द्वार खुला नहीं रहता।

“आह, हाँ,” तुम कहते हो, “परन्तु मैं उसे कैसे जानूँ? दूसरे लोगों को तो किसी प्रकार का भीतरी प्रकाशन मिलता जान पड़ता है जिससे वे उसे जान लेते हैं, परन्तु मुझे कभी नहीं मिलता; और मैं चाहे कितनी भी प्रार्थना करूँ, मुझे सब कुछ अन्धकारमय ही दिखता है। मैं परमेश्वर को जानना चाहता हूँ, परन्तु मेरी समझ में नहीं आता कि यह कैसे हो।”

तुम्हारी कठिनाई यह है कि परमेश्वर को जानना क्या है, इस विषय में तुम्हारी धारणा गलत है, या कम से कम उस प्रकार के जानने के विषय में जिसकी मैं बात कर रही हूँ। क्योंकि मेरा अभिप्राय किसी रहस्यमय भीतरी प्रकाशन से नहीं है। ऐसे अनुभव जब होते हैं तो बड़े सुखद होते हैं, परन्तु वे सदा हमारे वश में नहीं होते, और वे अनिश्चित और अस्थिर हो सकते हैं। जिस प्रकार के जानने की मैं बात कर रही हूँ, वह परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र का वह सरल, व्यावहारिक ज्ञान है जो बाइबल में उसके विषय में प्रगट की गई बातों पर विश्वास करने से आता है।

प्रेरित यूहन्ना अपने सुसमाचार के अन्त में अपनी लिखी हुई बातों के विषय में कहता है: “यीशु ने और भी बहुत चिन्ह चेलों के सामने दिखाए, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए; परन्तु ये इसलिए लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।” (यूहन्ना 20:30)। जीवन उस पर विश्वास करने से मिलता है जो लिखा है, न कि उस पर जो भीतर प्रगट किया गया है; और जिस जानने की मैं बात कर रही हूँ, वह वही जानना है जो लिखी हुई बात पर विश्वास करने से आता है।

व्यावहारिक शब्दों में मेरा अभिप्राय यह है कि जब मैं बाइबल में पढ़ती हूँ कि परमेश्वर प्रेम है, तो मुझे उस पर केवल इसलिए विश्वास करना है कि वह लिखा है, इसलिए नहीं कि मुझे कोई ऐसा भीतरी अनुभव हुआ है जो उसे सच प्रमाणित करता हो; और जब बाइबल कहती है कि वह हमारी चिन्ता वैसे ही करता है जैसे मैदान के सोसनों और आकाश के पक्षियों की करता है, और यह कि हमारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं, तो मुझे उस पर केवल इसलिए विश्वास करना है कि वह लिखा है, चाहे मुझे उसका कोई भीतरी बोध हो या न हो।

हमारे लिये यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि बाइबल सिद्धान्तों का नहीं, वरन् वास्तविक तथ्यों का वर्णन है; और बातें इसलिए सच नहीं हैं कि वे बाइबल में हैं, वरन् वे बाइबल में इसलिए हैं कि वे सच हैं। एक छोटा लड़का, जो स्कूल में अमेरिका की खोज के विषय में पढ़ रहा था, एक दिन अपने पिता से बोला, “पिताजी, यदि मैं कोलम्बस होता, तो अमेरिका खोजने के लिये इतना सारा कष्ट न उठाता।”

“क्यों, तो तुम क्या करते?” उसके पिता ने पूछा।

“ओह,” छोटे लड़के ने उत्तर दिया, “मैं बस नक्शे के पास जाता और उसे ढूँढ़ लेता।”

यह छोटा लड़का यह नहीं समझता था कि नक्शे केवल पहले से ज्ञात स्थानों के चित्रण होते हैं, और अमेरिका इसलिए अस्तित्व में नहीं था कि वह नक्शे पर था, वरन् वह नक्शे पर केवल इसलिए हो सकता था कि वह पहले से अस्तित्व में था। और बाइबल के साथ भी ऐसा ही है। वह, नक्शे के समान, तथ्यों का एक सरल वर्णन है; इसलिए जब वह हमें बताती है कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है, तो वह हमें केवल वही बता रही है जो पहले से सच है, और जो यदि तथ्य न होता तो बाइबल में होता ही नहीं।

जब मैंने यह समझा, तो यह मेरे लिये एक बड़ी खोज थी। ऐसा लगा कि इसने प्रभु यीशु मसीह के उद्धार के विषय में बाइबल में दिए गए प्रकाशन से सारी अनिश्चितता और अटकल को हटा दिया, और उसके विषय में लिखी हर बात को निर्विवाद तथ्यों का एक सरल वर्णन बना दिया। और तथ्य ऐसी वस्तु हैं जिन पर हम विश्वास कर सकते हैं—और वास्तव में, जैसे ही हम उन्हें तथ्य के रूप में पहचानते हैं, हम उन पर विश्वास कर ही लेते हैं। भीतरी प्रकाशन हमारे वश में नहीं होते, परन्तु जो कोई सही बुद्धि रखता है, वह लिखी हुई बात पर विश्वास कर सकता है। और यद्यपि आरम्भ में यह कुछ सादा और साधारण-सा लग सकता है, फिर भी यदि दृढ़ता से इसका पालन किया जाए, तो इसका परिणाम भीतर का गहरा और धन्य निश्चय होगा, और अन्त में यह हमें परमेश्वर के ऐसे ज्ञान में ले जाएगा जो हमारे जीवन को बदल देगा।

इस प्रकार का जानना दृढ़ निश्चय उत्पन्न करता है; और मेरी दृष्टि में दृढ़ निश्चय भीतरी अनुभवों से कहीं बढ़कर है, चाहे वे कितने भी सुखद क्यों न हों। भीतरी अनुभव किसी के स्वास्थ्य से या और बहुत-सी गड़बड़ियों से प्रभावित हो सकता है, परन्तु दृढ़ निश्चय बना रहता है। एक बार जब किसी मनुष्य को यह निश्चय हो जाता है कि दो और दो चार होते हैं, तो कोई भी बीमारी, बेचैनी या बाहरी प्रभाव उस निश्चय को हिला नहीं सकता। वह इसे अस्वस्थ होने पर भी उतनी ही अच्छी तरह जानता है जितना अच्छे स्वास्थ्य में। दृढ़ निश्चय ज्ञान से आते हैं, और भावनाओं या शारीरिक दशा का कोई भी परिवर्तन ज्ञान को बदल नहीं सकता।

अपने पाठकों को परमेश्वर के इसी प्रकार के व्यावहारिक ज्ञान तक, और उससे उत्पन्न होनेवाले दृढ़ निश्चयों तक पहुँचने में सहायता देने के लिये ही यह पुस्तक लिखी गई है। पहले मैं यह दिखाने का प्रयत्न करूँगी कि परमेश्वर क्या है—किसी धर्मवैज्ञानिक या सैद्धान्तिक अर्थ में नहीं, वरन् केवल यह कि वास्तविक, प्रतिदिन के जीवन में, हम में से हर एक के परमेश्वर और पिता के रूप में वह क्या है। मैं उन कुछ बातों की ओर भी संकेत करूँगी जो मुझे उसे सचमुच जानने के मार्ग की मुख्य बाधाएँ जान पड़ती हैं।

मुझे पूरा निश्चय है कि उसे वैसा ही जान लेना जैसा वह सचमुच है, हर व्याकुल हृदय में कभी न चूकनेवाली शान्ति और चैन लाएगा, और मैं मन से लालसा रखती हूँ कि अपनी पहुँच में आनेवाले हर व्यक्ति को इस ज्ञान तक पहुँचने में सहायता दूँ। अय्यूब के एक मित्र ने अय्यूब के संकट के उत्तर में कहा, “परमेश्वर से मेल मिलाप कर तब तुझे शान्ति मिलेगी; और इससे तेरी भलाई होगी।” (अय्यूब 22:21) और हमारे प्रभु ने अपनी अन्तिम लिखी हुई प्रार्थना में कहा: “और अनन्त जीवन यह है, कि वे तुझ एकमात्र सच्चे परमेश्वर को और यीशु मसीह को, जिसे तूने भेजा है, जानें।” (यूहन्ना 17:3)। बात अपने आप को जानने की नहीं है—कि हम क्या हैं, क्या करते हैं, या क्या अनुभव करते हैं—वरन् केवल परमेश्वर से परिचित होने की, और यह जानने की है कि वह क्या है, वह क्या करता है, और वह क्या अनुभव करता है। शान्ति और चैन कभी उससे नहीं आते जो हम अपने विषय में जानते हैं, वरन् सदा उससे आते हैं जो हम उसके विषय में जानते हैं।

हम अपने दिन उन कामों में बिता सकते हैं जिन्हें हम धार्मिक कर्तव्य कहते हैं, और अपनी आराधना-उपासना को उत्साह से भर सकते हैं, और फिर भी दुःखी रह सकते हैं। परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के सिवाय और कुछ भी हमारे हृदयों को सचमुच विश्राम नहीं दे सकता; क्योंकि अन्ततः हमारे उद्धार की हर बात उसी पर निर्भर है। हमारी शान्ति पूरी तरह इस बात पर निर्भर है कि वह हमारे भरोसे के योग्य है या नहीं। यदि हम किसी जोखिम भरी समुद्री यात्रा की योजना बना रहे होते, तो हमारी पहली चिन्ता यह होती कि हमारा कप्तान कैसा होगा। साधारण समझ हमें बताती कि यदि कप्तान भरोसे के योग्य न हो, तो हमारी ओर से कितनी भी विश्वसनीयता यात्रा को सुरक्षित नहीं बना सकती। सबसे अधिक महत्व उसके चरित्र का होता, हमारे चरित्र का नहीं।

यदि मैं यह बात पर्याप्त बार, और पर्याप्त भिन्न-भिन्न रीतियों से, कह सकूँ कि कुछ व्याकुल हृदयों में दृढ़ निश्चय उत्पन्न हो जाए, और वे अपने दुःखी और बेचैन धार्मिक जीवन से उठकर प्रेम, आनन्द और शान्ति के राज्य में आ जाएँ—जो उनका उचित उत्तराधिकार है—तो मैं समझूँगी कि इस पुस्तक को लिखने का मेरा उद्देश्य पूरा हो गया। और मैं कह सकूँगी, “हे प्रभु, अब तू अपने दास को अपने वचन के अनुसार शान्ति से विदा कर दे; क्योंकि मेरी आँखों ने तेरे उद्धार को देख लिया है”; और मेरी लेखनी ने उसका वर्णन करने का प्रयत्न किया है।

परन्तु यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि यह पुस्तक धर्म के आलोचनात्मक या धर्मवैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करने का प्रयत्न नहीं करती। यह बाइबल की प्रामाणिकता से जुड़े प्रश्नों को नहीं उठाती।

दूसरे लोग, जो मुझसे कहीं अधिक योग्य हैं, ऐसे विषयों पर विचार कर सकते हैं। यह पुस्तक उन लोगों के लिये लिखी गई है जो, मेरे समान, प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करने का अंगीकार करते हैं, और जो बाइबल को सीधे-सीधे उसके प्रकाशन के रूप में स्वीकार करते हैं।

इसलिए सारे आलोचनात्मक प्रश्नों को एक ओर रखकर, मैं केवल यह समझाना चाहती हूँ कि मुझे ऐसे विश्वास का स्वाभाविक परिणाम क्या जान पड़ता है, और विश्वासी व्यक्तिगत रूप से उसका अनुभव कैसे कर सकते हैं।

इन बातों को व्यक्त करने के मेरे ढंग में भूलें हो सकती हैं, और उसके लिये मैं अपने पाठकों से सहनशीलता की विनती करती हूँ। परन्तु जो सत्य मैं पहुँचाना चाहती हूँ—और ऐसी रीति से पहुँचाना चाहती हूँ कि कोई भी उसे समझने से चूक न सके—वह कोई भूल नहीं है। और वह सत्य यह है: हमारा धार्मिक जीवन आनन्द, चैन और शान्ति से भरा होना चाहिए, और यदि हम परमेश्वर को और अच्छी तरह जान लें, तो वह ऐसा ही होगा।

अध्याय 1 पूरा हुआ

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