सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
परमेश्वर ही पर्याप्त है

अध्याय 17 · 24 मिनट का पठन

परमेश्वर ही पर्याप्त है

“हे मेरे मन, परमेश्वर के सामने चुपचाप रह, क्योंकि मेरी आशा उसी से है। सचमुच वही मेरी चट्टान, और मेरा उद्धार है, वह मेरा गढ़ है; इसलिए मैं न डिगूँगा। मेरे उद्धार और मेरी महिमा का आधार परमेश्वर है; मेरी दृढ़ चट्टान, और मेरा शरणस्थान परमेश्वर है” (भजन संहिता 62:5-7)।

प्राण को जो अन्तिम और सबसे बड़ा पाठ सीखना है, वह यह सच्चाई है कि परमेश्वर, और केवल परमेश्वर ही, उसकी सारी आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त है। उसके वे सारे व्यवहार जो वह हमारे साथ करता है, यही पाठ सिखाने के लिये हैं; और यही हमारे सम्पूर्ण मसीही जीवन की सबसे बड़ी, मुकुट-रूपी खोज है। परमेश्वर ही पर्याप्त है!

इस पुस्तक में हम परमेश्वर के चरित्र और उसके मार्गों के कुछ पहलुओं पर विचार करते आए हैं, जैसे वे प्रभु यीशु मसीह में हम पर प्रगट हुए हैं; और उन कुछ भूलों पर भी, जो हमें उस परिपूर्णता को अपना लेने से रोकती हैं जो उसमें हमारी है। और अब अन्त में, मैं जितनी अच्छी तरह कह सकूँ, यह बताना चाहती हूँ कि मुझे इस सारी बात का निचोड़ क्या जान पड़ता है।

यदि परमेश्वर वैसा ही है जैसा वह उन प्रकाशनों से जान पड़ता है जिन पर हम विचार करते आए हैं; यदि वह सचमुच “सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर” है, जैसा हमने देखा है; यदि वह हमारा चरवाहा है; यदि वह वास्तव में और सचमुच हमारा पिता है; संक्षेप में, यदि उसके चरित्र और उसके मार्गों के वे सब पहलू, जिनका हम अध्ययन करते आए हैं, सचमुच सत्य हैं, तो मुझे लगता है कि हमें इस पक्के निश्चय पर पहुँचना ही होगा कि वह, केवल अपने आप में, हमारी हर सम्भव आवश्यकता के लिये पर्याप्त है, और हम पूरी तरह और सदा के लिये निश्चिन्त होकर उसमें विश्राम कर सकते हैं।

मैं समझती हूँ कि अधिकांश मसीहियों ने हमारे सबसे जाने-पहचाने भजनों में से एक के ये शब्द इतनी बार गाए होंगे कि गिन भी न सकें: “हे मसीह, तू ही मेरी सारी चाह, तुझमें पाऊँ सब से बढ़कर।”

परन्तु मुझे सन्देह है कि क्या हम सब ईमानदारी से कह सकते हैं कि ये शब्द हमारे अपने अनुभव में किसी वास्तविकता को प्रगट करते आए हैं। मसीह हमारी सारी चाह नहीं रहा है। हमने उसके अतिरिक्त और बहुत सी वस्तुएँ चाही हैं। हमने उसके विषय में तीव्र भावनाएँ चाहीं, या अपने साथ उसकी उपस्थिति का अनुभव, या उसके प्रेम का कोई भीतरी प्रकाशन; या फिर हमने सन्तोषजनक सैद्धान्तिक व्यवस्थाएँ माँगीं, या सफल मसीही सेवा, या किसी न किसी प्रकार की कोई और वस्तु, स्वयं उसके अतिरिक्त, जो हमें उस पर कोई व्यक्तिगत अधिकार दिला सके।

केवल स्वयं मसीह, अकेला मसीह, उसके विषय में हमारे किसी भी अनुभव को जोड़े बिना, हमारे सारे गाने के बावजूद हमारे लिये पर्याप्त नहीं रहा है; और हम यह भी नहीं देख पाते कि यह कैसे सम्भव है कि वह पर्याप्त हो सके।

भजनकार ने उन पुराने दिनों में कहा था, “हे मेरे मन, परमेश्वर के सामने चुपचाप रह, क्योंकि मेरी आशा उसी से है” (भजन संहिता 62:5)। परन्तु अब मसीही कहता है, “हे मेरे मन, मेरे खरे सिद्धान्तों के सामने चुपचाप रह, क्योंकि मेरी आशा उन्हीं से है;” या, “हे मेरे मन, मेरी अच्छी दशाओं और भावनाओं के सामने, या मेरे धर्म के कामों, या मेरी उत्साह भरी प्रार्थनाओं, या मेरे गम्भीर प्रयत्नों के सामने चुपचाप रह, क्योंकि मेरी आशा इन्हीं से है।” केवल परमेश्वर के सामने चुपचाप रहकर उसकी बाट जोहना उन्हें सबसे असुरक्षित कामों में से एक लगता है, और केवल उसी से आशा रखना ऐसा लगता है मानो रेत पर घर बनाना हो। वे हर ओर हाथ बढ़ाकर किसी ऐसी वस्तु को खोजते हैं जिस पर वे निर्भर रह सकें, और जब तक बाकी सब कुछ विफल न हो जाए, वे केवल परमेश्वर पर भरोसा नहीं रखते। जॉर्ज मैकडोनल्ड कहते हैं: “हम परमेश्वर को अपना अन्तिम और सबसे दुर्बल सहारा समझते हैं। हम उसके पास तभी जाते हैं जब हमारे पास जाने को और कोई स्थान नहीं रहता। और तब हम सीखते हैं कि जीवन के तूफ़ानों ने हमें चट्टानों पर नहीं, परन्तु मनचाहे बन्दरगाह में ला पहुँचाया है।”

कोई भी प्राण तब तक सचमुच विश्राम में नहीं हो सकता जब तक वह बाकी हर वस्तु पर से अपनी निर्भरता छोड़ न दे और केवल प्रभु पर निर्भर रहने को विवश न हो जाए। जब तक हमारी आशा दूसरी वस्तुओं से है, तब तक निराशा के सिवा और कुछ हमारी प्रतीक्षा नहीं करता। भावनात्मक दशाएँ और अनुभूतियाँ बदल सकती हैं, और हमारी बदलती परिस्थितियों के साथ बदलेंगी ही; सिद्धान्त और मत उलट सकते हैं; मसीही सेवा निष्फल हो सकती है; प्रार्थनाओं का उत्साह जाता हुआ दिख सकता है; प्रतिज्ञाएँ विफल होती दिख सकती हैं; जिस किसी बात पर हमने विश्वास किया या भरोसा रखा, वह सब बह जाता हुआ दिख सकता है, और केवल परमेश्वर शेष रह जाता है—बस परमेश्वर, यदि मुझे ऐसा कहने दिया जाए तो निरा परमेश्वर; सीधे-सीधे और केवल परमेश्वर।

हम कभी-कभी कहते हैं, “यदि मुझे कोई ऐसी प्रतिज्ञा मिल जाए जो मेरी दशा पर ठीक बैठे, तो मैं विश्राम पा सकूँगा।” परन्तु प्रतिज्ञाओं को गलत समझा जा सकता है या उन्हें गलत ढंग से लागू किया जा सकता है, और ठीक उसी घड़ी जब हम अपना सारा बोझ उन पर डाल रहे होते हैं, वे हमें पूरी तरह विफल करती हुई दिख सकती हैं। परन्तु प्रतिज्ञा करनेवाला, जो अपनी प्रतिज्ञाओं के पीछे है और अपनी प्रतिज्ञाओं से असीम रूप से बढ़कर है, न कभी विफल हो सकता है, न बदल सकता है। छोटे बच्चे को सन्तुष्ट रहने के लिये अपनी माँ से कोई प्रतिज्ञा लेने की आवश्यकता नहीं होती; उसके पास स्वयं उसकी माँ है, और वह पर्याप्त है। उसकी माँ हज़ार प्रतिज्ञाओं से बढ़कर है। प्रेम या मित्रता के हमारे सबसे ऊँचे आदर्श में प्रतिज्ञाओं का कोई स्थान नहीं होता। हो सकता है कि एक व्यक्ति को प्रतिज्ञाएँ करना अच्छा लगे, जैसे हमारे प्रभु को लगता है, परन्तु दूसरे व्यक्ति को उनकी आवश्यकता नहीं होती; प्रेमी या मित्र का अपना व्यक्तित्व उसकी सारी प्रतिज्ञाओं से बढ़कर होता है। और यदि बाइबल में से हर प्रतिज्ञा मिटा भी दी जाए, तब भी परमेश्वर तो हमारे पास रहेगा, और परमेश्वर पर्याप्त होगा। मैं फिर दोहराती हूँ: केवल परमेश्वर, स्वयं वही, जैसा वह है, हमारी ओर से किसी भी वस्तु को जोड़े बिना—चाहे वह भावनात्मक दशाएँ या अनुभूतियाँ हों, या अनुभव, या भले काम, या खरे सिद्धान्त, या कोई भी और बात, बाहरी या भीतरी: “सचमुच वही मेरी चट्टान, और मेरा उद्धार है, वह मेरा गढ़ है; इसलिए मैं न डिगूँगा” (भजन संहिता 62:6)।

मेरा यह अर्थ नहीं कि हमें भावनाएँ, या अनुभव, या प्रकाशन, या भले काम, या खरे सिद्धान्त नहीं रखने चाहिए। ये सब हमारे पास हो सकते हैं, परन्तु ये उद्धार का परिणाम होने चाहिए, उसका कारण कभी नहीं; और इन पर कभी भी हमारी आत्मिक दशा के किसी संकेत के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता। ये सब आने-जानेवाली बातें हैं, और प्रायः हमारे स्वास्थ्य की दशा, या हमारे आस-पास की परिस्थितियों पर, या कभी-कभी तो हवा की दिशा पर भी निर्भर होती हैं। उदाहरण के लिये, कुछ लोग पुरवाई चलते समय कभी विश्वास ही नहीं कर पाते कि परमेश्वर उनसे प्रेम करता है। और यदि हम अपने भरोसे या अपने आनन्द के आधार के रूप में इनमें से किसी भी बात पर तनिक भी निर्भर रहें, तो हमारा ठोकर खाना निश्चित है। मेरा अर्थ यह है कि हमें अपने आप को इन सबसे पूरी तरह स्वतन्त्र रखना है, और केवल इस महान और भव्य सच्चाई में विश्राम करना है कि परमेश्वर है और वह हमारा उद्धारकर्ता है; ऐसे भीतरी जीवन के साथ जो इन व्यक्तिगत अनुभवों या व्यक्तिगत कामों के बिना भी उतना ही फलता-फूलता और उतना ही विजयी रहता है जितना उनके साथ। हमें परमेश्वर को—परमेश्वर की सच्चाई को—अपनी सारी आत्मिक आवश्यकताओं के लिये पर्याप्त पाना है, चाहे हम अपने आप को किसी जंगल में पाएँ या किसी उपजाऊ घाटी में। हमें भविष्यद्वक्ता के साथ कहना है: “चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जैतून के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, भेड़शालाओं में भेड़-बकरियाँ न रहें, और न थानों में गाय बैल हों, तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा, और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा” (हबक्कूक 3:17-18)।

प्राण इसी के लिये बनाया गया है और इससे कम में कभी विश्राम नहीं पा सकता। इसलिए परमेश्वर के हमारे साथ सारे व्यवहार इसी उद्देश्य से ढाले जाते हैं; और प्रायः उसे विवश होकर हमसे बाकी हर वस्तु का आनन्द छीन लेना पड़ता है, ताकि वह हमें केवल और पूरी तरह अपने में ही आनन्द पाने को विवश करे। उसकी प्रतिज्ञाओं में आनन्दित होना, या उन प्रकाशनों में जो उसने शायद हमें दिए हों, या उन अनुभवों में जो हमने शायद पाए हों, यह सब कदाचित् ठीक है; परन्तु स्वयं प्रतिज्ञा करनेवाले में आनन्दित होना—केवल उसी में—प्रतिज्ञाओं, या अनुभवों, या प्रकाशनों के बिना, यही मसीही जीवन का शिखर है। यही एकमात्र स्थान है जहाँ हम वह शान्ति जान सकते हैं जो सारी समझ से बिलकुल परे है और जिसे कोई भी बात भंग नहीं कर सकती।

ठीक-ठीक समझाना कठिन है कि मेरा अर्थ क्या है। हमने आत्मिक जीवन के साथ चलनेवाली इन सब बातों को ही आत्मिक जीवन समझने का अपने आप को इतना अभ्यस्त बना लिया है कि इनसे अपने आप को अलग करना कठिन लगता है। हम सोच ही नहीं पाते कि प्रभु हमारे लिये कुछ हो सकता है, जब तक हम अपने भीतर कोई ऐसी बात न पाएँ जो हमें उसके प्रेम और उसकी देखभाल का निश्चय दिलाए। और जब हम उसी में अपना सब कुछ पाने की बात करते हैं, तो प्रायः हमारा अर्थ यह होता है कि हम उसे उसके विषय में अपनी भावनाओं या अपने विचारों में पाते हैं। उदाहरण के लिये, यदि हम उसके प्रति प्रेम की गर्माहट अनुभव करते हैं, तो हम मन से कह सकते हैं कि वह पर्याप्त है; परन्तु जब यह गर्माहट जाती रहती है, जैसा कि देर-सबेर होना लगभग निश्चित है, तब हमें यह नहीं लगता कि हमने उसमें अपना सब कुछ पा लिया है। सच्चाई यह है कि जो हमें सन्तुष्ट करता है वह प्रभु नहीं, परन्तु प्रभु के विषय में हमारी अपनी भावनाएँ हैं। परन्तु हमें इसका बोध नहीं होता; और इसलिए जब हमारी भावनाएँ विफल होती हैं, तो हम सोचते हैं कि प्रभु विफल हो गया है, और हम अन्धकार में डूब जाते हैं।

निःसन्देह यह सब बहुत मूर्खता की बात है, परन्तु यह इतना सामान्य अनुभव है कि बहुत कम लोग देख पाते हैं कि यह कितनी मूर्खता है। शायद एक उदाहरण हमें अधिक स्पष्टता से देखने में सहायता करे। आइए, एक ऐसे मनुष्य की कल्पना करें जिस पर किसी अपराध का आरोप है और जो न्यायी के सामने खड़ा है। उस मनुष्य के लिये महत्त्वपूर्ण बात कौन सी होगी: न्यायी के प्रति उसकी अपनी भावनाएँ, या उसके प्रति न्यायी की भावनाएँ? क्या वह अपना समय अपनी ही भावनाओं को देखने में बिताएगा, यह जाँचने का प्रयत्न करते हुए कि क्या उसे ऐसा लगता है कि न्यायी उसके पक्ष में है, या वह न्यायी को देखेगा और उसके चेहरे या उसके शब्दों से यह जानने का प्रयत्न करेगा कि उसे अपने पक्ष में निर्णय की आशा रखनी चाहिए या नहीं? निःसन्देह हम तुरन्त कहेंगे कि इस विषय में उस मनुष्य की अपनी भावनाओं का तनिक भी मूल्य नहीं, और केवल न्यायी के विचार और भावनाएँ ही एक क्षण के विचार के योग्य हैं।

उस मनुष्य में चाहे कल्पना में आनेवाली सारी “गर्माहटें” और सारे “अनुभव” हों, परन्तु उनसे कुछ भी लाभ न होगा। सब कुछ केवल न्यायी पर निर्भर होगा। इसे हम स्वयंसिद्ध सच्चाई कहेंगे। इसी प्रकार, यदि हम इस विषय पर अपनी सामान्य समझ लगाएँ, तो हम यह देखे बिना नहीं रह सकते कि प्रभु के साथ हमारे सम्बन्ध में एकमात्र सचमुच महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि उसके प्रति हमारी भावनाएँ क्या हैं, परन्तु यह है कि हमारे प्रति उसकी भावनाएँ क्या हैं। जिस मनुष्य का मुक़दमा चल रहा है, उसे जो कुछ चाहिए वह न्यायी में ही पाना होगा, यदि उसे वह कहीं मिलना है। उसकी पर्याप्तता किसी भी प्रकार उसकी अपनी ओर से नहीं हो सकती, परन्तु उसी की ओर से होनी चाहिए जिस पर उसका भाग्य निर्भर है। और प्रेरित कहता है कि हमारी योग्यता भी हमारी अपनी ओर से नहीं, परन्तु परमेश्वर की ओर से है।

“यह नहीं, कि हम अपने आप से इस योग्य हैं, कि अपनी ओर से किसी बात का विचार कर सकें; पर हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है।” (2 कुरिन्थियों 3:5) तो परमेश्वर के पर्याप्त होने से मेरा यही अर्थ है। यह, कि हम उसमें, उसके अस्तित्व की सच्चाई में और उसके चरित्र में, वह सब कुछ पाते हैं जो हमें हर बात के लिये कभी भी चाहिए हो सकता है। परमेश्वर ही हमारे हर प्रश्न और आवश्यकता की हर पुकार का उत्तर है, और होना ही चाहिए। यदि उसमें, जिसने हमारा उद्धार करने का बीड़ा उठाया है, कोई कमी है, तो उसकी पूर्ति के लिये हम जो कुछ भी जोड़ें, उससे कोई लाभ न होगा; और यदि उसमें कोई कमी नहीं, तो वह, अपने आप से और अपने आप में, पर्याप्त है।

काश, मैं अपना अर्थ स्पष्ट कर पाती, क्योंकि मैं विश्वास करती हूँ कि हर मसीही जीवन की सारी अशान्ति और बेचैनी से स्थायी छुटकारे का भेद यही है। तुम्हारी अशान्ति और बेचैनी तुम्हारे उन कठोर परन्तु व्यर्थ प्रयत्नों से उत्पन्न होती है जो तुम अपने भीतर भरोसे का कोई सन्तोषजनक आधार स्थापित करने के लिये करते हो; जैसे, उदाहरण के लिये, वे बातें जिन्हें तुम उचित भावनाएँ समझते हो, या उत्साह या लगन की सही मात्रा, या कम से कम, यदि और कुछ नहीं तो, आत्मिक बातों में पर्याप्त रुचि। और क्योंकि इनमें से कोई भी बात कभी सन्तोषजनक नहीं होती (और, मैं तुमसे कह दूँ, कभी होगी भी नहीं), इसलिए तुम्हारे धार्मिक जीवन का अशान्त रहने के सिवा और कुछ होना असम्भव है।

परन्तु यदि हम देख लें कि हमारा सारा उद्धार, आरम्भ से अन्त तक, केवल प्रभु पर निर्भर है; और यदि हमने सीख लिया है कि वह हमारे लिये “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक” करने में समर्थ भी है और इच्छुक भी (इफिसियों 3:20), तो चैन और शान्ति का राज्य अवश्य ही सर्वोपरि होगा। सब कुछ इस पर निर्भर है कि क्या प्रभु, अपने आप में और अपने आप से, हमारे उद्धार के लिये पर्याप्त है, या क्या उसे पर्याप्त बनाने के लिये हमारी ओर से दूसरी बातें जोड़नी पड़ेंगी।

जिस बात ने व्यक्तिगत रूप से मुझे, और किसी भी बात से बढ़कर, इस निश्चय तक पहुँचने में सहायता दी कि परमेश्वर मेरे लिये सचमुच पर्याप्त है, वह कुछ वर्ष पहले का मेरा एक अनुभव था। यह मेरे धार्मिक जीवन का वह समय था जब मैं बहुत से प्रश्नों और उलझनों से होकर गुज़र रही थी, और मुझे लगता था कि किसी भी मसीही के सामने मेरी जैसी विचित्र कठिनाइयाँ पहले कभी नहीं आई थीं। उन्हीं दिनों संयोग से कुछ सप्ताहों के लिये मेरे पास ही एक महिला ठहरी हुई थीं, जो एक गहरी आत्मिक मसीही मानी जाती थीं, और जिनसे आत्मिक सहायता लेने की सलाह मुझे दी गई थी। इसलिए एक दोपहर मैंने साहस जुटाया, और उनसे मिलने गई, और अपनी सारी परेशानियाँ उनके सामने उँडेल दीं; इस आशा में कि निःसन्देह वे मुझमें गहरी रुचि लेंगी, और मेरी सहायता के लिये जो कुछ कर सकती हैं वह सब करने का भरपूर कष्ट उठाएँगी।

उन्होंने काफ़ी धीरज से सुना, और मुझे बीच में नहीं टोका; परन्तु जब मैं अपनी कहानी समाप्त करके रुकी, और सहानुभूति और ध्यान की आशा कर रही थी, तो उन्होंने बस इतना कहा, “हाँ, जो कुछ तुम कहती हो वह सब बहुत सच हो सकता है, परन्तु फिर भी, इस सबके होते हुए भी, परमेश्वर तो है।” मैं कुछ मिनट और कुछ सुनने की प्रतीक्षा करती रही, परन्तु कुछ नहीं आया, और मेरी मित्र और शिक्षिका के भाव से ऐसा लगता था मानो जो कुछ आवश्यक था वह सब वे कह चुकी हैं।

“परन्तु,” मैंने आगे कहा, “निश्चय ही आप यह नहीं समझीं कि मेरी कठिनाइयाँ कितनी गम्भीर और उलझानेवाली हैं।” “अरे, समझी तो थी,” मेरी मित्र ने उत्तर दिया, “परन्तु फिर, जैसा मैं तुमसे कहती हूँ, परमेश्वर तो है।” और मैं उन्हें कोई और उत्तर देने के लिये किसी प्रकार तैयार न कर सकी। यह मुझे अत्यन्त निराशाजनक और असन्तोषजनक लगा। मुझे लगा कि मेरे विचित्र और सचमुच हृदय-विदारक अनुभवों का उत्तर केवल इस कथन जैसी सीधी-सादी बात से नहीं दिया जा सकता, “हाँ, परन्तु परमेश्वर तो है।” मैं जानती थी कि परमेश्वर तो है ही, परन्तु मुझे लगता था कि मुझे केवल परमेश्वर से बढ़कर कुछ चाहिए; और मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची कि मेरी मित्र, आत्मिक शिक्षिका के रूप में अपनी सारी बड़ी ख्याति के बावजूद, कम से कम मेरे जैसी विचित्र दशा से निपटने में समर्थ नहीं थीं।

फिर भी, मेरी आवश्यकता इतनी बड़ी थी कि मैंने पहले प्रयास के बाद हार नहीं मानी, परन्तु बार-बार उनके पास गई, सदा इस आशा के साथ कि किसी न किसी दिन वे मेरी कठिनाइयों का महत्त्व समझने लगेंगी, और मुझे उचित सहायता देंगी। इसका कोई लाभ न हुआ। मैं उनसे कभी कोई और उत्तर न निकलवा सकी। हर बात पर सदा वही सीधा-सा उत्तर आता, इस भाव के साथ मानो विषय को पूरी तरह समाप्त किया जा रहा हो, “हाँ, मैं जानती हूँ; परन्तु परमेश्वर तो है।” और अन्त में, उनके लगातार दोहराने के कारण, मुझे निश्चय हो गया कि मेरी मित्र सचमुच और वास्तव में यह विश्वास करती थीं कि मानवजाति के सृजनहार और छुड़ानेवाले के रूप में परमेश्वर के अस्तित्व की सच्चाई मात्र—और इस जाति के एक सदस्य के रूप में मेरे अस्तित्व की—उसके प्राणियों की हर सम्भव आवश्यकता का पूरी तरह पर्याप्त उत्तर थी। और अन्त में, क्योंकि वे इसे इतनी बार कहती थीं और इतनी निश्चित जान पड़ती थीं, मैं धुँधले रूप से सोचने लगी कि कहीं ऐसा तो नहीं कि परमेश्वर आखिरकार पर्याप्त हो, मेरी आवश्यकता के लिये भी, चाहे मुझे वह कितनी ही भारी और विचित्र क्यों न लगती हो। सोचते-सोचते मैं धीरे-धीरे विश्वास करने लगी कि मेरा सृजनहार और छुड़ानेवाला होने के नाते वह अवश्य पर्याप्त होगा; और अन्त में मुझ पर यह निश्चय कौंध उठा कि वह सचमुच पर्याप्त है, और मेरी आँखें परमेश्वर की पूर्ण और सम्पूर्ण सर्वपर्याप्तता की सच्चाई की ओर खुल गईं।

मेरी परेशानियाँ जादू की तरह गायब हो गईं, और मैं बस इसी पर आश्चर्य करती रही कि मैं कभी इतनी मूर्ख कैसे हो सकी कि उनसे परेशान होती, जबकि पूरे समय परमेश्वर था—सर्वशक्तिमान और सब कुछ देखनेवाला परमेश्वर, वह परमेश्वर जिसने मुझे रचा था, और इसलिए मेरे पक्ष में था, और मेरी देखभाल करने और मेरी सहायता करने को उत्सुक था। मैंने जान लिया था कि परमेश्वर पर्याप्त है, और मेरे प्राण को विश्राम मिल गया।

परमेश्वर की सर्वपर्याप्तता परमेश्वर की सन्तान के लिये उतनी ही पूर्ण होनी चाहिए जितनी एक अच्छी माँ की सर्वपर्याप्तता उसके बच्चे के लिये होती है। हम सब माँ की उपस्थिति और माँ के प्रेम में छोटे बच्चे के पूर्ण विश्राम को जानते हैं। उसकी माँ वहाँ है, इतना ही सारे भय और सारी परेशानियाँ मिटा देने के लिये पर्याप्त है। उसे आवश्यकता नहीं कि माँ कोई प्रतिज्ञा करे; वह स्वयं, जैसी वह है, बिना प्रतिज्ञाओं और बिना व्याख्याओं के, वह सब कुछ है जिसकी बच्चे को आवश्यकता है। बचपन के मेरे अपने अनुभव ने मुझे यह हर प्रकार के सन्देह से परे सिखाया। मेरी माँ मेरी अपनी सारी समस्याओं का उपाय थीं, और मैं पूरी तरह विश्वास करती थी कि वे सारे संसार की समस्याओं का भी उपाय थीं, यदि वे समस्याएँ केवल उनके पास लाई जा सकें। जब कोई हर बात को ठीक कर देने की उनकी क्षमता पर सन्देह प्रगट करता, तो मुझे याद है कि मैं कैसी तीखी घृणा के साथ यह कहकर उसे चुप करा देती थी, “आह! परन्तु तुम मेरी माँ को नहीं जानते।”

और अब, जब कोई संघर्ष करता हुआ व्यक्ति यह नहीं देख पाता कि परमेश्वर पर्याप्त है, तो मेरा मन कहने को करता है, घृणा से नहीं, परन्तु असीम तरस के साथ, “आह, प्रिय मित्र, तुम परमेश्वर को नहीं जानते! यदि तुम उसे जानते, तो तुम यह देखे बिना न रह सकते कि वह तुम्हारे प्राण की हर आवश्यकता का उपाय है, और वह एक सर्वपर्याप्त उपाय है।” परमेश्वर पर्याप्त है, चाहे कोई भी प्रतिज्ञा तुम्हारी दशा पर ठीक बैठती न दिखे, और कोई भी भीतरी भावना तुम्हें भरोसा न दे। प्रतिज्ञा करनेवाला अपनी प्रतिज्ञाओं से बड़ा है; उसका अस्तित्व सबसे तीव्र भीतरी भावनाओं से कहीं अधिक निश्चित भरोसे का आधार है।

“ओह, केवल परमेश्वर का नाम लो अपने मन की गहराई में, और देखो कैसे प्राण से तुरन्त भाग जाता है हर चिन्ता भरा डर।”

परन्तु कोई कह सकता है, “यह सब निःसन्देह सच है, और यदि मुझे केवल निश्चय हो सके कि यह मुझ पर लागू होता है, तो मैं सहज ही इस पर विश्वास कर सकता हूँ। परन्तु मैं इतना निकम्मा और पाप से इतना भरा हूँ कि मुझे नहीं लगता कि अनुग्रह के धन पर मेरा कोई अधिकार है।”

यदि तुम निकम्मे और पाप से भरे हो, तो परमेश्वर की सर्वपर्याप्तता पर तुम्हारा अधिकार और भी अधिक है।

तुम्हारी अयोग्यता और तुम्हारी पापमयता ही तुम्हारा सबसे प्रबल दावा है। जैसा किसी ने कहा है, उद्धारकर्ता के मार्ग में केवल वही खड़ा होता है जो उद्धार चाहनेवाला पापी है। बाइबल घोषणा करती है: “यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है कि मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।” (1 तीमुथियुस 1:15) वह धर्मियों, या उत्साही लोगों, या लगन से काम करनेवालों का उद्धार करने नहीं आया, परन्तु सीधे और केवल पापियों का उद्धार करने आया। तो फिर हम कोई दावा गढ़ने के प्रयत्न में अपना समय और शक्ति क्यों लगाएँ, जो आखिरकार कोई दावा नहीं, बल्कि केवल एक बाधा है?

जब तक हमारा ध्यान अपनी ओर और अपने अनुभवों की ओर लगा रहता है, तब तक वह प्रभु से हटा रहता है। यह सीधी-सी सामान्य समझ की बात है। जैसा मैंने कहीं और कहा है, हम केवल वही वस्तु देख सकते हैं जिसकी ओर हम देखते हैं, और जब तक हम अपने आप को देख रहे हैं, तब तक हम “परमेश्वर को निहार” ही नहीं सकते। ऐसा नहीं कि वह अपने आप को छिपाता है; वह तो सदा वहीं है, उन सबकी पूरी दृष्टि के सामने जो उसकी ओर देखते हैं। परन्तु यदि हम किसी और दिशा में देख रहे हैं, तो हम उसे देखने की आशा नहीं कर सकते।

बीते समय में, हो सकता है कि हमारी आँखें इतनी पूरी तरह अपने ही ऊपर टिकी रही हों कि हमारे सारे भीतरी प्रश्न केवल हमारी अपनी दशा के विषय में रहे हों: क्या परमेश्वर के प्रति मेरा प्रेम पर्याप्त गर्म है? क्या मैं पर्याप्त लगनशील हूँ? क्या उसके प्रति मेरी भावनाएँ वैसी हैं जैसी होनी चाहिए? क्या मुझमें पर्याप्त जोश है? क्या मैं अपनी आवश्यकता को वैसे अनुभव करता हूँ जैसे करना चाहिए? हम दुःखी रहे हैं क्योंकि हम कभी इन प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे पाए। यद्यपि हम इसे नहीं जानते, फिर भी यह एक दया ही रही है कि हम कभी उनका सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सके; क्योंकि यदि दे पाते, तो हमारा “अहं” फूल उठता, और हम आत्म-प्रशंसा और घमण्ड से भर जाते।

यदि हम परमेश्वर को देखना चाहते हैं, तो हमारे भीतरी प्रश्न उसके विषय में होने चाहिए, अपने विषय में नहीं। परमेश्वर मेरे प्रति कैसा अनुभव करता है? क्या मेरे प्रति उसका प्रेम पर्याप्त गर्म है? क्या उसमें पर्याप्त जोश है? क्या वह मेरी आवश्यकता को पर्याप्त गहराई से अनुभव करता है? क्या वह पर्याप्त लगनशील है? यद्यपि ये प्रश्न कुछ लोगों को अनादरपूर्ण लग सकते हैं, फिर भी ये बहुत से हिचकिचाते हृदयों के सन्देहों और भयों को ही प्रगट करते हैं। इन्हें केवल पूछ लेना ही यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि असली अनादर तो ये सन्देह और भय हैं। हम सब जानते हैं कि ऐसे प्रश्नों के विजयी उत्तर क्या होंगे। कोई भी सन्देह उनकी गवाही के सामने टिक नहीं सकता, और जो प्राण उन्हें ईमानदारी से पूछता और उनका उत्तर देता है, वह इस गहरे और पूर्ण निश्चय तक पहुँचाया जाएगा कि परमेश्वर पर्याप्त है, और होना ही चाहिए।

“सब कुछ तुम्हारा है,” प्रेरित घोषणा करता है: “क्या पौलुस, क्या अपुल्लोस, क्या कैफा, क्या जगत, क्या जीवन, क्या मरण, क्या वर्तमान, क्या भविष्य, सब कुछ तुम्हारा है, और तुम मसीह के हो, और मसीह परमेश्वर का है।” (1 कुरिन्थियों 3:21-23) इससे अधिक सर्वव्यापी कोई कथन हो ही नहीं सकता। सब कुछ तुम्हारा है क्योंकि तुम मसीह के हो—इसलिए नहीं कि तुम बहुत भले या योग्य हो, परन्तु सीधे और केवल इसलिए कि तुम मसीह के हो। जिन वस्तुओं की हमें आवश्यकता है, वे सब उसमें हमारी मीरास का भाग हैं, और वे बस इसी प्रतीक्षा में हैं कि हम उन पर अपना अधिकार जताएँ। हमारी आवश्यकताएँ और कठिनाइयाँ चाहे कितनी ही बड़ी हों, इन “सब कुछ” में ऐसी भरपूरी है जो “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक” है (इफिसियों 3:20)।

क्योंकि वह है, इसलिए हमारे लिये सब कुछ ठीक ही होना है। क्योंकि एक माँ है, इसलिए उसके बच्चों के लिये, जहाँ तक उसका बस चले, सब कुछ ठीक ही होना है; और प्रभु के विषय में यह असीम रूप से और भी अधिक सत्य होना चाहिए।

बच्चे के लिये, जो कुछ बदलता है उस सबके पीछे, माँ के अस्तित्व की एक न बदलनेवाली सच्चाई है। जब तक माँ जीवित है, बच्चे की देखभाल होनी ही है; और जब तक परमेश्वर जीवित है, उसकी सन्तानों की देखभाल भी होनी ही है। वह जैसा है, वैसा होते हुए वह और कर ही क्या सकता है? उपेक्षा, उदासीनता, भूल जाना और अनजानापन, ये सब उसके लिये असम्भव हैं। वह सब कुछ जानता है, वह हर बात की चिन्ता करता है, वह हर बात सँभाल सकता है, और वह हमसे प्रेम करता है। हम इससे अधिक और क्या माँग सकते हैं?

हर युग में परमेश्वर के पवित्र लोगों ने यह जाना है और अनुभव किया है कि परमेश्वर उनके लिये पर्याप्त था। अय्यूब ने ऐसे दुःखों और परीक्षाओं की गहराई से, जिनकी बराबरी बहुत कम लोग कर सकते हैं, कहा: “चाहे वह मुझे घात करे, तो भी मैं उस पर आशा रखूँगा।” (अय्यूब 13:15) दाऊद अपनी सबसे तीखी पीड़ा की घड़ी में कह सकता था: “चाहे मैं घोर अंधकार से भरी हुई तराई में होकर चलूँ, तो भी हानि से न डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।” (भजन संहिता 23:4) और फिर वह कह सकता था: “परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक। इस कारण हमको कोई भय नहीं चाहे पृथ्वी उलट जाए, और पहाड़ समुद्र के बीच में डाल दिए जाएँ; चाहे समुद्र गरजें और फेन उठाए, और पहाड़ उसकी बाढ़ से काँप उठे... परमेश्वर उस नगर के बीच में है, वह कभी टलने का नहीं; पौ फटते ही परमेश्वर उसकी सहायता करता है।” (भजन संहिता 46:1-3, 5) पौलुस अनेक भारी परीक्षाओं के बीच विजय के साथ कह सकता था: “क्योंकि मैं निश्चय जानता हूँ, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।” (रोमियों 8:38-39) इसलिए, हे सन्देह करनेवाले और शोकित मसीही हृदयो, हमने जो कुछ सीखा है कि वह सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है, उसके प्रकाश में क्या तुम अय्यूब, दाऊद, पौलुस और सब युगों के पवित्र लोगों के साथ यह अनुभव नहीं कर सकते कि तुम्हारे सारे भयों को शान्त करने के लिये इसके सिवा और किसी बात की आवश्यकता नहीं: कि परमेश्वर है। उसका केवल होना ही तुम्हारी आवश्यकता के निश्चित निवारण की पूरी जमानत है। कोई भी वस्तु तुम्हें उसके प्रेम से अलग नहीं कर सकती—बिलकुल कोई भी नहीं। यहाँ हर सम्भव परिस्थिति का प्रबन्ध किया गया है, और उनमें से एक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग नहीं कर सकती।

ऐसी घोषणा के बाद, हममें से कोई परमेश्वर के प्रेम पर प्रश्न या सन्देह करने का साहस कैसे कर सकता है? और क्योंकि वह हमसे प्रेम करता है, इसलिए यह हो ही नहीं सकता कि वह रहे और हमारी सहायता न करे। क्या हम अपने ही अनुभव से नहीं जानते कि प्रेम किस प्रकार अपने प्रियजनों को आशीष देने में अपने आप को उँडेल ही देता है? क्या हम नहीं समझ सकते कि परमेश्वर, जो प्रेम है—जो, यों कहें तो, प्रेम से ही बना है—हमें आशीष दिए बिना रह ही नहीं सकता? हमें उससे आशीष के लिये गिड़गिड़ाने की आवश्यकता नहीं; वह ऐसा किए बिना रह ही नहीं सकता।

इसलिए परमेश्वर पर्याप्त है; परमेश्वर इस जीवन के लिये पर्याप्त है, और परमेश्वर अनन्तकाल के लिये पर्याप्त है। परमेश्वर ही पर्याप्त है!

“केवल बैठकर परमेश्वर का ध्यान करना, आह, कैसा आनन्द है यह!

वह विचार सोचना, वह नाम श्वास में लेना, पृथ्वी पर इससे ऊँचा सुख नहीं।”

समाप्त

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