अध्याय 3 · 18 मिनट का पठन
सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
“हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर, और पिता का धन्यवाद हो, जो दया का पिता, और सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है। वह हमारे सब क्लेशों में शान्ति देता है; ताकि हम उस शान्ति के कारण जो परमेश्वर हमें देता है, उन्हें भी शान्ति दे सकें, जो किसी प्रकार के क्लेश में हों।” (2 कुरिन्थियों 1:3-4) परमेश्वर को प्रगट करनेवाले सब नामों में से यह नाम—“सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर”—मुझे सबसे सुन्दर और मन को सबसे अधिक ढाढ़स देनेवाले नामों में से एक जान पड़ता है। ये शब्द—सब प्रकार की शान्ति—न कोई सीमा मानते हैं, न कोई अपवाद; और कोई भी यही आशा करेगा कि ऐसे परमेश्वर के अनुयायियों को चाहे कितनी ही बाहरी कठिनाइयों का सामना करना पड़े, उनका भीतरी आत्मिक जीवन सदा शान्ति से भरा रहेगा।
परन्तु वास्तव में प्रायः ठीक इसका उलटा ही दिखाई देता है, और परमेश्वर के बहुत-से लोगों का आत्मिक जीवन शान्ति से नहीं, बल्कि गहरी अशान्ति से भरा रहता है। यह अशान्ति परमेश्वर के साथ उनके सम्बन्ध की चिन्ता से, और उसके प्रेम के विषय में सन्देहों से उत्पन्न होती है। वे इस विचार से अपने आप को दुःखी करते रहते हैं कि वे इतने अयोग्य हैं कि उसकी देखभाल के अधिकारी नहीं, और वे उस पर यह सन्देह करते हैं कि वह उनके संघर्षों के प्रति उदासीन है, या आवश्यकता के समय उन्हें छोड़ देता है।
वे अपने आत्मिक जीवन की हर बात को लेकर चिन्तित और व्याकुल रहते हैं—अपनी मनोवृत्तियों और भावनाओं को लेकर, बाइबल में अपनी अरुचि को लेकर, प्रार्थना में अपने उत्साह की कमी को लेकर, अपने हृदय की ठण्डक को लेकर।
वे बीते हुए समय के पछतावे से दबे रहते हैं और आनेवाले समय के भय से भरे रहते हैं। वे परमेश्वर की उपस्थिति में आने के लिये अपने आप को अयोग्य समझते हैं, और यह विश्वास नहीं कर पाते कि वे सचमुच उसके हैं। वे अपने सांसारिक मित्रों के साथ तो प्रसन्न और निश्चिन्त रह सकते हैं, परन्तु परमेश्वर के साथ निश्चिन्त नहीं रह पाते।
और यद्यपि वह स्वयं घोषणा करता है कि वह सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है, तौभी वे यही कहते रहते हैं कि उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिलती; और उनके उदास चेहरे और हताश स्वर यह दिखाते हैं कि वे सच्चे मन से, सच ही कह रहे हैं।
ऐसे मसीही, यद्यपि वे सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर के अनुयायी होने का दावा करते हैं, जहाँ कहीं जाते हैं वहाँ उदासी और बेचैनी फैलाते हैं। उनके लिये किसी को भी यह विश्वास दिलाना असम्भव है कि यह सुन्दर नाम—जिसके द्वारा परमेश्वर ने अपने आप को प्रगट किया है—वास्तविक अर्थ से रहित एक धार्मिक वाक्यांश भर नहीं, बल्कि उससे कहीं बढ़कर है। और मुझे बहुत डर है कि इतने सारे मसीहियों का प्रत्यक्ष रूप से अशान्त जीवन ही संसार के अविश्वास के एक बड़े भाग का कारण है।
प्रेरित हमें बताता है कि हमें ऐसी “पत्री… जिसे सब मनुष्य पहचानते और पढ़ते हैं” होना है। लोग हम में जो पढ़ते हैं, वह मसीह के राज्य के फैलाव के लिये उससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है जितना हम प्रायः समझते हैं। सबसे अधिक महत्त्व इस बात का नहीं कि हम क्या कहते हैं, बल्कि इस बात का है कि हम क्या हैं। परमेश्वर के सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर होने के विषय में बहुत-सी सुन्दर बातें कहना सहज है; परन्तु जब तक हम स्वयं नहीं जानते कि सचमुच शान्ति पाना क्या होता है, तब तक हमारे शब्द खोखले हैं। लोगों को हमारे जीवन में वही दिखना चाहिए जो वे हमारे शब्दों में सुनते हैं, नहीं तो हमारा सारा कहना भलाई से अधिक हानि करता है। अच्छा होगा कि हम अपने आप से पूछें कि दूसरे लोग हम में क्या पढ़ रहे हैं। हमारे प्रतिदिन के जीवन में शान्ति दिखाई देती है या अशान्ति?
परन्तु यहाँ कोई पूछ सकता है कि परमेश्वर की दी हुई शान्ति से मेरा क्या अर्थ है। क्या यह कोई ऐसी धार्मिक भावना है जो हमें स्वर्ग के लिये तो तैयार कर दे, परन्तु प्रतिदिन के जीवन की वास्तविकताओं—उसकी सारी परीक्षाओं और पीड़ाओं—के आगे टिक न सके? या यह एक वास्तविक और सच्ची शान्ति है—वैसी ही जिसे हम समझते हैं— जो जीवन की कठिनाइयों के बीच भी चैन देती है? मैं अपने पूरे मन से विश्वास करती हूँ कि दूसरी बात ही सच है।
शान्ति, चाहे मनुष्य की ओर से हो या परमेश्वर की ओर से, बस शान्ति ही है—उससे कम कुछ नहीं। हमें खोखले शब्दों की परवाह नहीं; हम कुछ वास्तविक चाहते हैं। और शान्ति पाने का वास्तविक अनुभव मुझे जीवन के सबसे बहुमूल्य अनुभवों में से एक जान पड़ता है। हम सब जानते हैं कि यह क्या है। बचपन में, जब हम चोट खाकर या डरकर दौड़ते हुए अपनी माँ के पास गए हैं और हमने अपने चारों ओर उसकी बाँहें और उसकी कोमल देखभाल अनुभव की है, तब हमने शान्ति को जाना है। बड़े होकर, दिन भर के लम्बे परिश्रम के बाद, जब हम विश्राम करते और चैन पाते हैं, तब हमने शान्ति को जाना है। जब बीमारी जाने लगती है और बल लौट आता है, तब हमने शान्ति को जाना है। जब कोई प्रियजन मृत्यु के निकट पहुँचकर फिर से स्वस्थ हो गया है, तब हमने शान्ति को जाना है।
जीवन में कितनी ही बार हमने राहत की साँस लेकर कहा है, “अब तो बड़ी शान्ति है,” और उस शब्द में विश्राम, राहत और शान्त आनन्द का ऐसा भाव है जिसे किसी और ढंग से व्यक्त करना कठिन है। इसलिए हम समझते हैं कि जब परमेश्वर को “सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर” कहा जाता है, तो इसका क्या अर्थ है।
फिर भी, दुःख की बात है कि हम इस पर विश्वास नहीं कर पाए हैं। यह इतना अच्छा लगा कि सच नहीं जान पड़ा। इसका आनन्द हमारे शंकालु हृदयों की ग्रहण-शक्ति से अधिक रहा है। हम कभी-कभी शान्ति के छोटे-छोटे क्षणों की आशा तो कर लेते हैं, परन्तु उस “सब प्रकार की शान्ति” की परिपूर्णता पर विश्वास करने से पीछे हट जाते हैं जो प्रभु यीशु मसीह के उद्धार में हमारी है।
फिर भी परमेश्वर इससे बढ़कर और क्या कह सकता था: “जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैसे ही मैं भी तुम्हें शान्ति दूँगा; तुम को शान्ति मिलेगी”? (यशायाह 66:13) तुलना पर ध्यान दो—जिस प्रकार… वैसे ही। यहाँ वास्तविक शान्ति ही अभिप्रेत है—वैसी शान्ति जो एक बालक तब अनुभव करता है जब उसकी माता उसे गोद में लेकर उसकी देखभाल करती है। फिर भी हम में से कितनों ने सचमुच यह विश्वास किया है कि परमेश्वर की शान्ति माता की शान्ति के समान वास्तविक और कोमल है, या उसके निकट भी है? अपने आप को उसके हृदय से लगा हुआ देखने के बजाय, हमने प्रायः उसे एक कठोर और दूर रहनेवाला न्यायी समझा है, जो आदर की माँग करता है और हमारी भूलों की ताक में रहता है। तो क्या आश्चर्य कि हमारे धर्म ने हमें शान्ति देने के बजाय अशान्त कर दिया है? ऐसे न्यायी के सामने कौन चैन से रह सकता है?
परन्तु मुझे यह कहते हुए आनन्द है कि ऐसा कोई न्यायी है ही नहीं। जो परमेश्वर सचमुच है, वह एक प्रेम करनेवाली माता के समान है। वह स्पष्ट कहता है, “जिस प्रकार माता अपने पुत्र को शान्ति देती है, वैसे ही मैं भी तुम्हें शान्ति दूँगा।”
वह बार-बार यही कहता है। “मैं, मैं ही तेरा शान्तिदाता हूँ,” वह अपने लोगों से कहता है। और फिर वह पूछता है कि वे अब भी क्यों डरते हैं: जब तुम्हारा कर्ता आप ही तुम्हें शान्ति देने को तैयार और इच्छुक है, तो कोई भी बात तुम्हें क्यों भयभीत करे? क्यों मनुष्यों की शक्ति से डरते हो और उस कर्ता को भूल जाते हो जिसने सब कुछ रचा है?
जो परमेश्वर सचमुच है, वह हमारे प्रभु यीशु मसीह का परमेश्वर और पिता है—वह परमेश्वर जिसने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि अपने पुत्र को भेजा, इसलिए नहीं कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिए कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। वह वही परमेश्वर है जिसने मसीह को इसलिए भेजा कि वह “खेदित मन के लोगों को शान्ति दे… सब विलाप करनेवालों को शान्ति दे।” (यशायाह 61:1-3) इस शब्द—सब—पर ध्यान दो। केवल थोड़े-से लोग नहीं, बल्कि हर एक। हर एक शोकित हृदय, हर एक संघर्ष करता हुआ प्राण इसमें सम्मिलित है। यदि एक भी छूट जाता, तो वह “सब” न होता। मैं प्रायः इस बात के लिये कृतज्ञ रही हूँ कि पवित्रशास्त्र में निर्बल और व्याकुल लोगों को भी विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है। हमसे कहा गया है कि ऐसे लोगों की आलोचना न करें, बल्कि उन्हें शान्ति दें। जिन्हें शान्ति की सबसे अधिक आवश्यकता है, वही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर सबसे अधिक शान्ति देना चाहता है—बलवानों को नहीं, बल्कि निर्बलों को।
यही प्रेम के धर्म की महिमा है। मसीह सब विलाप करनेवालों को शान्ति देने के लिये भेजा गया। सब प्रकार की शान्ति के परमेश्वर ने अपने पुत्र को दुःख से भरे जगत में शान्ति पहुँचाने के लिये भेजा। और अपने सारे जीवन में मसीह ने यह कार्य पूरा किया।
जब उसके चेले चाहते थे कि वह उसे ठुकरानेवालों पर दण्ड बुलाए, तब उसने उन्हें डाँटा और कहा कि वह लोगों के प्राणों को नाश करने नहीं वरन् बचाने के लिये आया है। उसने पापियों को ग्रहण किया। जहाँ दूसरों ने दोषी ठहराया, वहाँ उसने दया दिखाई। पाप में पकड़ी गई स्त्री से उसने कहा, “मैं भी तुझ पर दण्ड की आज्ञा नहीं देता; जा, और फिर पाप न करना।” (यूहन्ना 8:11) हर जगह वह ज़रूरतमन्दों के पक्ष में खड़ा रहा। यही उसका उद्देश्य था—पापियों का उद्धार करना।
दो छोटी लड़कियाँ एक बार परमेश्वर के विषय में बातें कर रही थीं, और एक ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि परमेश्वर मुझसे प्रेम करता है। मैं बहुत छोटी और साधारण हूँ।”
दूसरी ने उत्तर दिया, “पर परमेश्वर तो ठीक ऐसे ही लोगों की चिन्ता करता है—हम जैसे लोगों की, जो अपने बल पर सम्भल नहीं सकते।”
“क्या यह सच है?” पहली ने कहा। “तब तो मुझे अब और चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं।”
यदि इसे पढ़नेवाला कोई भी व्यक्ति डरा हुआ या व्याकुल है, तो मैं स्पष्ट कहना चाहती हूँ: प्रभु यीशु मसीह ठीक इसी के लिये है—सब विलाप करनेवालों की देखभाल करने और उन्हें शान्ति देने के लिये। सब—हर एक, तुम भी। यदि तुम छूट जाते, तो वह “सब” न होता। चाहे तुम अपने आप को पूरी तरह गिरा हुआ अनुभव करो, तौभी उसके विषय में लिखा है कि वह “दीनों को शान्ति देनेवाला” है।
कैसा सुन्दर कार्य है—दुःख से भरे जगत में शान्ति पहुँचाना। और मैं कितनी लालसा रखती हूँ कि हर एक व्याकुल हृदय परमेश्वर की ओर से मिलनेवाली इस शान्ति का अनुभव करे।
और हमारा सहायक दूर नहीं है। वह निकट है। वह हमारे साथ बना रहता है। जब मसीह इस संसार को छोड़ने पर था, तब उसने अपने चेलों से कहा कि वह उन्हें अकेला नहीं छोड़ेगा, बल्कि “एक और सहायक” भेजेगा, कि वह सर्वदा उनके साथ रहे। यही सहायक उन्हें सब बातें सिखाएगा और सारा सत्य स्मरण कराएगा।
फिर उसने कहा: “मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ… तुम्हारा मन न घबराए और न डरे।” (यूहन्ना 14:27) ऐसे वचनों के प्रकाश में हम भयभीत कैसे बने रह सकते हैं?
“सहायक”—अर्थात् शान्ति देनेवाला—कैसा अद्भुत शब्द है, काश हम इसे सचमुच समझ पाते। आओ, हम इस पर तब तक मनन करें जब तक यह हमारे लिये वास्तविक न हो जाए। और वह ऐसा सहायक नहीं जो आता है और चला जाता है, बल्कि ऐसा जो बना रहता है—सदा उपस्थित, दुःख के स्थान पर आनन्द देने को सदा तैयार।
सदा साथ बना रहनेवाला सहायक—कैसा असाधारण सत्य है। कठिनाई में किसी मानवीय मित्र का हमारे साथ रहना भी बड़ी सहायता होती है। परन्तु यहाँ एक ईश्वरीय सहायक है जो सदा हमारे साथ है और जिसकी शान्ति देने की सामर्थ्य कभी घटती नहीं। ऐसा कोई क्षण होना ही नहीं चाहिए जब हम शान्ति से रहित हों।
फिर भी बहुत-से लोग इसे नहीं समझते। यदि समझते, तो इतने व्याकुल मसीही न होते।
तुम पूछ सकते हो कि क्या यह सहायक हमें सुधारता भी है, और क्या यह सचमुच शान्तिदायक हो सकता है।
वास्तव में, यह भी उन ढंगों में से एक है जिनसे वह हमें शान्ति देता है। यदि कोई हमें हमारी भूलें दिखानेवाला और बदलने में हमारी सहायता करनेवाला न हो, तो हमारी क्या दशा होगी?
यदि मैं अपने पहनावे में किसी ऐसी त्रुटि के साथ चल रही होती जिसका मुझे पता न हो, तो किसी मित्र का उसे बता देना कृपा ही होती। उसी प्रकार यह जानना शान्तिदायक है कि आत्मा कोमलता से हमें हमारी भूलें दिखाता है, ताकि हम उनसे अनजान न रह जाएँ।
सुधार में भी शान्ति है, क्योंकि वह चंगाई की ओर ले जाता है। परमेश्वर यह दिखाकर कि किस बात को फिर से सँवारने की आवश्यकता है, और फिर उसे सँवारकर, “हमारे सब खण्डहरों को शान्ति देता है।”
तुम अपने आप को ऐसी शान्ति के अयोग्य समझ सकते हो। यह सच हो सकता है—परन्तु इसी कारण तो तुम्हें इसकी आवश्यकता है।
मसीह पापियों का उद्धार करने आया, उनका नहीं जो अपने आप को योग्य समझते हैं। तुम्हारी आवश्यकता ही तुम्हारी योग्यता है।
परमेश्वर की शान्ति पाने का मार्ग प्रायः इस बात को पहचानने से होकर जाता है कि हमें उसकी आवश्यकता है। इसी कारण परमेश्वर कभी-कभी दुःख को आने देता है। कठिन स्थानों में हम उसकी आवाज़ अधिक स्पष्ट सुन पाते हैं। प्रायः जंगल में ही हम उसकी शान्ति की बातें सुनते हैं।
परमेश्वर जानता है कि हमारे लिये यह अच्छा है कि हम उसकी शान्ति पाएँ, चाहे परीक्षाओं के द्वारा ही क्यों न हो, बजाय इसके कि हम उसका कभी अनुभव ही न करें। वह जो देता है, वह उससे कहीं बड़ा है जो हम खोते हैं। पृथ्वी की वस्तुएँ बीत सकती हैं, परन्तु जो वह देता है वह अनन्त है।
पौलुस के समान हम भी यह देखने लगते हैं कि मसीह की पहचान की उत्तमता के आगे सब बातों को हानि ही समझना चाहिए।
और फिर भी, कैसी विचित्र बात है कि जब जीवन सहज होता है, तब हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर है—परन्तु जब हमें सचमुच शान्ति की आवश्यकता होती है, तब हमें यह विश्वास करना कठिन लगता है कि शान्ति है भी। मानो हम अपने हृदयों में पवित्रशास्त्र का अर्थ ही बदल देते हैं। “धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं, क्योंकि वे शान्ति पाएँगे” पर विश्वास करने के बजाय, हम सोचने लगते हैं कि केवल वे ही शान्ति पाएँगे जो पहले से सुखी हैं।
हम “दीनों को शान्ति देनेवाले परमेश्वर” जैसे वचनों को भी तोड़-मरोड़कर कुछ बिलकुल और बना देते हैं, मानो वह संघर्ष करनेवालों को भूल जाता है या उनकी उपेक्षा करता है। और ऐसा करके हम वही शान्ति खो बैठते हैं जो हमें दी जा रही है।
परन्तु परमेश्वर कहता है कि वह हमें हर ओर से शान्ति देगा। कुछ भी छूटा नहीं है। फिर भी संकट के समय हम प्रायः यही मान लेते हैं कि ठीक वहीं कोई शान्ति नहीं जहाँ हमें उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। ऐसा इसलिए नहीं कि परमेश्वर चूक गया है, बल्कि इसलिए कि हमने सन्देह किया है।
यह प्राचीन इस्राएल के समान है। परमेश्वर ने अपनी शान्ति की घोषणा की, फिर भी उन्होंने कहा, “प्रभु मुझे भूल गया है।”
और उसका उत्तर कोमलता से भरा हुआ आया: क्या कोई माता अपने बच्चे को भूल सकती है? हाँ, वह तो भूल सकती है, तौभी परमेश्वर नहीं भूलेगा। हम सदैव उसकी दृष्टि के सामने हैं।
इसलिए शान्ति पाओ।
परन्तु तुम फिर भी पूछ सकते हो कि तुम यह शान्ति कैसे पा सकते हो? उत्तर सरल है: तुम्हें उसे ग्रहण करना होगा। परमेश्वर निरन्तर अपनी शान्ति दे रहा है—परन्तु जब तक तुम उसे ग्रहण न करो, तुम उसका अनुभव नहीं कर सकते।
ईश्वरीय शान्ति हमारे पास किसी रहस्यमय या मनमाने ढंग से नहीं आती। वह एक स्पष्ट और सरल क्रम से आती है। हमारे भीतर वास करनेवाला सहायक हमें हमारे प्रभु के विषय में शान्ति देनेवाले सत्य स्मरण कराता है, और यदि हम उन पर विश्वास करें, तो हमें शान्ति मिलती है।
पवित्रशास्त्र का कोई पद मन में आ सकता है, या किसी भजन की कोई पंक्ति, या मसीह के प्रेम और कोमल देखभाल की कोई शान्त याद। यदि हम उसे सरल विश्वास से ग्रहण करें, तो शान्ति अपने आप आ जाती है। परन्तु यदि हम सहायक की आवाज़ सुनने से इनकार करें और उसके बदले निराशा या हताशा पर ध्यान दें, तो कोई भी शान्ति हमारे प्राणों तक नहीं पहुँच सकती।
एक माता भी अपना सारा प्रेम ऐसे बच्चे पर व्यर्थ उण्डेल सकती है जो शान्त होना ही नहीं चाहता। वह बच्चा हठ करके, टस से मस हुए बिना बैठा रह सकता है, और हर एक शब्द को ठुकरा सकता है। उसी प्रकार, शान्ति के वचन हमें तभी शान्ति दे सकते हैं जब हम उन पर विश्वास करें।
परमेश्वर ने शान्ति के इतने वचन कहे हैं कि पूरे संसार को ढाढ़स मिल जाए, फिर भी बहुत-से मसीही चिन्तित, बोझ से दबे और बेचैन बने रहते हैं। क्यों? क्योंकि वे उन वचनों को अपने हृदयों में प्रवेश करने नहीं देते। कुछ तो यह भी मानते हैं कि शान्ति का अनुभव करना अनुचित है—वे अपने आप को बहुत अयोग्य समझते हैं। और जब उनके भीतर शान्ति उमड़ने लगती है, तब वे उसे परे धकेल देते हैं, उसे ठुकरा देते हैं, ठीक जैसा पवित्रशास्त्र कहता है, “वे शान्त होना न चाहते थे।” (यिर्मयाह 31:15) हमसे कहा गया है कि पवित्रशास्त्र में जो कुछ लिखा गया है, वह इसलिए दिया गया है कि हम धीरज और पवित्रशास्त्र के प्रोत्साहन—अर्थात् उससे मिलनेवाली शान्ति—के द्वारा आशा रखें। परन्तु यह शान्ति केवल विश्वास के द्वारा ही आ सकती है।
जो हृदय परमेश्वर के वचन की सच्चाई पर सन्देह करता है, उसे परमेश्वर का कोई भी वचन चैन नहीं दे सकता।
यदि जहाज़ का कप्तान हमें विश्वास दिलाए कि जहाज़ सुरक्षित है, तो निश्चिन्त होने से पहले हमें उसकी बात का विश्वास करना होगा। यदि रेलगाड़ी का परिचालक हमें बताए कि हम सही गाड़ी में हैं, तो आराम से बैठने से पहले हमें उसकी बात पर भरोसा करना होगा। प्रतिदिन के जीवन में यह स्पष्ट है—फिर भी आत्मिक बातों में हम प्रायः इसकी उपेक्षा करते हैं।
कुछ लोग तो परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने से पहले ही शान्ति का अनुभव करने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु यह तो क्रम को पूरी तरह उलट देना है। जैसे कोई यात्री अपने मार्गदर्शक पर भरोसा किए बिना अपने आप को सुरक्षित अनुभव नहीं कर सकता, वैसे ही हम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना शान्ति का अनुभव नहीं कर सकते।
परमेश्वर का क्रम सरल है: पहले विश्वास करो, फिर अनुभव करो।
हम प्रायः इसे उलट देते हैं: पहले अनुभव करो, फिर विश्वास करो।
यही उलटा क्रम हमारे बहुत-से संघर्षों की जड़ है।
इस पर विचार करो: जब हम चिन्ता से घिर जाते हैं, तब परमेश्वर हमसे कहता है कि चिन्ता मत करो, बल्कि अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है। वह हमें आकाश के पक्षियों और सोसनों के फूलों की ओर ध्यान दिलाता है, और हमें निश्चय दिलाता है कि हम उनसे कहीं अधिक मूल्य रखते हैं।
इससे बड़ी शान्ति और क्या हो सकती है—कि स्वर्ग और पृथ्वी का सृजनहार हमारी देखभाल का दायित्व अपने ऊपर लेता है?
फिर भी बहुतों को शान्ति नहीं मिलती। क्यों? क्योंकि वे इस पर विश्वास नहीं करते। वे इन वचनों की सराहना करते हैं, चाहते हैं कि ये सच हों, परन्तु इन्हें व्यक्तिगत रूप से ग्रहण करने में हिचकिचाते हैं। वे सत्य पर ही भरोसा करने के बजाय इस प्रतीक्षा में रहते हैं कि कोई भावना आकर उस सत्य की पुष्टि करे।
हम कहते हैं, “काश, मुझे अनुभव हो जाए कि यह सच है।”
परमेश्वर कहता है, “काश, तुम विश्वास कर लो कि यह सच है।”
हमारी शान्ति के अभाव की जड़ में केवल अविश्वास है।
उपाय स्पष्ट है। यदि हम शान्ति चाहते हैं, तो हमें परमेश्वर के कहे हुए शान्ति के हर एक वचन पर विश्वास करने का निश्चय करना होगा। हमें सन्देह की आवाज़ों को—चाहे वे हमारी परिस्थितियों से आएँ या हमारे अपने विचारों से—स्थान देने से इनकार करना होगा।
इसके लिये दृढ़ निश्चय चाहिए। हमें अपना मन—चकमक के समान—दृढ़ करके विश्वास करना होगा, तब भी जब हमारे चारों ओर सब कुछ इसके विपरीत जान पड़े। शान्ति पाना निष्क्रिय बात नहीं; इसमें इच्छा-शक्ति लगती है। हमें इसे चुनना होगा।
जब जीवन अनिश्चित लगे, तब हमें कहना होगा: “परमेश्वर ने यह कहा है। इसलिए यह सच है। चाहे यह कैसा भी दिखाई दे, मैं इस पर विश्वास करूँगा।”
और विश्वास करने का निश्चय कर लेने के बाद हमें फिर से सन्देह की ओर लौटने से इनकार करना होगा।
जो कोई इस प्रकार जीवन बिताएगा, वह देर-सबेर गहरी और स्थायी शान्ति में प्रवेश करेगा।
भजनकार ने कहा, “जब मेरे मन में बहुत सी चिन्ताएँ होती हैं, तब हे यहोवा, तेरी दी हुई शान्ति से मुझ को सुख होता है।”
फिर भी प्रायः हमारे मन परमेश्वर की दी हुई शान्ति से अधिक अपनी परेशानियों से भरे रहते हैं। यदि हम शान्ति पाना चाहते हैं, तो हमें जान-बूझकर उसकी प्रतिज्ञाओं पर मनन करना होगा।
अपने विचारों की जाँच करना लाभदायक हो सकता है: अपनी चिन्ताओं की तुलना में हम कितनी बार परमेश्वर की शान्ति के विषय में सोचते हैं?
उत्तर हमें चकित कर सकता है।
अन्त में, सुसमाचार का प्रचार करनेवालों के लिये एक बात।
तुम्हारा सन्देश क्या है?
यह: “मेरी प्रजा को शान्ति दो।”
उन्हें डाँटो नहीं, उन पर बोझ न लादो—बल्कि उन्हें शान्ति दो।
सच्चा सुसमाचार शुभ समाचार है—शुद्ध, बिना मिलावट का शुभ समाचार। फिर भी प्रायः उसमें शर्तें, चेतावनियाँ और मनुष्यों की जोड़ी हुई बातें मिला दी जाती हैं, जो उसकी शान्ति को छीन लेती हैं।
मसीह शान्ति देता है।
मनुष्य प्रायः उलझा देता है।
सच्चा सुसमाचार उस सन्देश के समान है जो स्वर्गदूत ने चरवाहों को दिया था: “मत डरो। मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूँ; जो सब लोगों के लिये होगा।” (लूका 2:10) यही वे वचन हैं जो सच्ची शान्ति देते हैं।
यदि हर एक प्रचारक ऐसे वचनों का स्पष्ट प्रचार करे, और हर एक सुननेवाला उन पर विश्वास करे, तो फिर कोई भी बेचैन, चिन्तित मसीही न रहेगा। उसके बदले हर जगह हृदय दृढ़ होंगे और चैन से भर जाएँगे।
और यह प्रार्थना पूरी होगी: हमारा प्रभु यीशु मसीह आप ही, और हमारा पिता परमेश्वर जिसने हम से प्रेम रखा, और अनुग्रह से अनन्त शान्ति और उत्तम आशा दी है, तुम्हारे मनों में शान्ति दे, और तुम्हें हर एक अच्छे काम, और वचन में दृढ़ करे।
अध्याय 3 पूरा हुआ
सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर