सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
मसीह के स्वरूप में ढलना

अध्याय 16 · 32 मिनट का पठन

मसीह के स्वरूप में ढलना

“क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे” (रोमियों 8:29)।

हमारी सृष्टि में परमेश्वर का अन्तिम उद्देश्य यह था कि अन्त में हम “मसीह के स्वरूप में” हों। मसीह को बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरना था, और उसके भाइयों को उसके समान होना था। हमारे जीवन का सारा अनुशासन और सारी शिक्षा इसी लक्ष्य को सामने रखकर है; और परमेश्वर ने हर एक मनुष्य के हृदय में उस सबसे उत्तम और सबसे ऊँची बात के लिये, जिसे वह जानता है, एक लालसा रख दी है, चाहे वह कितनी ही अनगढ़ और अनकही क्यों न हो।

मसीह उस बात का नमूना है जो हम में से हर एक को पूरा बन जाने पर होना है। हमें “पहले से ठहराया” गया है कि हम उसके स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहलौठा ठहरे। हमें मसीह के साथ “ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी” (2 पतरस 1:4) होना है; हमें मसीह के आत्मा से भर जाना है; हमें उसके पुनरुत्थान के जीवन में सहभागी होना है, और वैसे ही चलना है जैसे वह चलता था। हमें उसके साथ एक होना है, जैसे वह पिता के साथ एक है; और जो महिमा परमेश्वर ने उसे दी, वही वह हमें देगा। और जब यह सब पूरा हो जाएगा, तब—और उससे पहले नहीं—हमारी सृष्टि में परमेश्वर का उद्देश्य पूरी रीति से सिद्ध होगा, और हम “उसके स्वरूप के अनुसार उसकी समानता में” खड़े होंगे।

उसके स्वरूप में हमारा ढल जाना परमेश्वर के मन में तो एक पूरी हो चुकी बात है, परन्तु हम, यों कहें, अभी कारखाने ही में हैं, और वह महान कारीगर हम पर काम कर रहा है। “हे प्रियों, अब हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे! इतना जानते हैं, कि जब यीशु मसीह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि हम उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (1 यूहन्ना 3:2)।

इसी प्रकार पवित्रशास्त्र में लिखा है: “ऐसा ही लिखा भी है, प्रथम मनुष्य, अर्थात् आदम, जीवित प्राणी बना और अन्तिम आदम, जीवनदायक आत्मा बना। परन्तु पहले आत्मिक न था, पर स्वाभाविक था, इसके बाद आत्मिक हुआ। प्रथम मनुष्य धरती से अर्थात् मिट्टी का था; दूसरा मनुष्य स्वर्गीय है। जैसा वह मिट्टी का था वैसे ही वे भी हैं जो मिट्टी के हैं; और जैसा वह स्वर्गीय है, वैसे ही वे भी स्वर्गीय हैं। और जैसे हमने उसका रूप जो मिट्टी का था धारण किया वैसे ही उस स्वर्गीय का रूप भी धारण करेंगे” (1 कुरिन्थियों 15:45-49)।

यह देखना बड़ा ही रोचक है कि यह प्रक्रिया, जो उत्पत्ति में आरम्भ हुई थी, प्रकाशितवाक्य में पूरी हुई बताई गई है, जहाँ मनुष्य के पुत्र सदृश्य उस पुरुष ने प्रेरित यूहन्ना को जय पानेवालों के लिये यह अर्थपूर्ण सन्देश दिया: “जो जय पाए, उसे मैं अपने परमेश्वर के मन्दिर में एक खम्भा बनाऊँगा; और वह फिर कभी बाहर न निकलेगा; और मैं अपने परमेश्वर का नाम, और अपने परमेश्वर के नगर अर्थात् नये यरूशलेम का नाम, जो मेरे परमेश्वर के पास से स्वर्ग पर से उतरनेवाला है और अपना नया नाम उस पर लिखूँगा” (प्रकाशितवाक्य 3:12)। क्योंकि बाइबल में नाम का अर्थ सदा चरित्र होता है, इसलिए इस सन्देश का अर्थ केवल यही हो सकता है कि अन्त में परमेश्वर का उद्देश्य पूरा हो गया है, और मनुष्य का आत्मिक विकास सिद्ध हो गया है, और वह—जैसा परमेश्वर ने आरम्भ ही से चाहा था—ऐसी सच्चाई से उसकी समानता और उसके स्वरूप में बना दिया गया है कि वह इस योग्य ठहरता है कि उस पर परमेश्वर का नाम लिखा जाए!

ऐसी महिमामय नियति के आगे शब्द हार जाते हैं! परन्तु हमारा प्रभु अपनी उस अद्भुत प्रार्थना में इसकी झलक दिखाता है, जब वह अपने भाइयों के लिये माँगता है “कि वे सब एक हों; जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिए कि जगत विश्वास करे, कि तू ही ने मुझे भेजा।

और वह महिमा जो तूने मुझे दी, मैंने उन्हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे कि हम एक हैं। मैं उनमें और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएँ” (यूहन्ना 17:21-23)। क्या एकता इससे अधिक निकट या इससे अधिक पूरी हो सकती है?

पौलुस भी इस महिमामय पूर्णता की झलक दिखाता है, जब वह कहता है कि यदि हम मसीह के साथ दुःख उठाएँ, तो उसके साथ महिमा भी पाएँगे; और जब वह दृढ़ता से कहता है कि “इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के सामने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं” (रोमियों 8:18)।

सारी सृष्टि इस महिमा के प्रगट होने की बाट जोह रही है; क्योंकि पौलुस आगे कहता है कि “सृष्टि बड़ी आशा भरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की प्रतीक्षा कर रही है” (रोमियों 8:19)। और अन्त में वह यह भी जोड़ता है, “और केवल वही नहीं पर हम भी जिनके पास आत्मा का पहला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की प्रतीक्षा करते हैं” (रोमियों 8:23)।

ऐसी महिमामय नियति को देखते हुए—जिसकी ओर मैं केवल संकेत करने से अधिक का साहस नहीं कर सकती—क्या हम उन प्रक्रियाओं का आनन्द से स्वागत न करें, चाहे वे कितनी ही पीड़ादायक क्यों न हों, जिनके द्वारा हमें वहाँ पहुँचना है? और क्या हम उसे पूरा करने में “परमेश्वर के सहकर्मी” (2 कुरिन्थियों 6:1) होने के लिये उत्सुकता और लगन से यत्न न करें? वह महान राजमिस्त्री है, परन्तु हमारे चरित्र का भवन खड़ा करने में वह हमारा सहयोग चाहता है, और वह हमें समझाता है कि हम चौकस रहें कि कैसा रद्दा रखते हैं। हम सब अपने जीवन के हर क्षण इस निर्माण में लगे हुए हैं। कभी हम सोने, चाँदी और बहुमूल्य पत्थरों से बनाते हैं, और कभी काठ, घास और फूस से। और हमें गम्भीरता से चिताया गया है कि “हर एक का काम प्रगट हो जाएगा; क्योंकि वह दिन उसे बताएगा; इसलिए कि आग के साथ प्रगट होगा और वह आग हर एक का काम परखेगी कि कैसा है” (1 कुरिन्थियों 3:13)। इससे बचने का कोई उपाय नहीं। जब वह दिन आएगा, तब हम अपने काठ, घास और फूस को छिपा लेने की आशा नहीं रख सकते, चाहे उससे पहले हम उन्हें छिपाने में कितने ही सफल क्यों न रहे हों।

मेरी समझ में पूरी बाइबल में गलातियों के उस वचन से अधिक गम्भीर कोई वचन नहीं, जो कहता है: “धोखा न खाओ, परमेश्वर उपहास में नहीं उड़ाया जाता, क्योंकि मनुष्य जो कुछ बोता है, वही काटेगा। क्योंकि जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा” (गलातियों 6:7-8)। इसकी पूर्ण निश्चितता ही इसे इतना भययोग्य बनाती है। यह किसी भी मनमाने दण्ड से कहीं अधिक गम्भीर है; क्योंकि दण्ड से तो कभी-कभी बचा जा सकता है, परन्तु ऐसे स्वाभाविक नियम के काम को बदल देने की कोई सम्भावना नहीं।

हाल ही में मैंने एक प्रश्नोत्तरी में ये प्रश्न और उत्तर देखे: प्रश्न: उदारता का प्रतिफल क्या है?

उत्तर: और अधिक उदारता।

प्रश्न: कंजूसी का दण्ड क्या है?

उत्तर: और अधिक कंजूसी।

किसी भी प्रश्नोत्तरी ने इससे अधिक सच्ची बात कभी नहीं कही। हम सब इसे अपने अनुभव से जानते हैं। तोड़ों के दृष्टान्त में हमारा प्रभु इसी अटल नियम को समझाता है। उस विश्वासघाती दास पर जो दण्ड की आज्ञा हुई, वह कभी-कभी हमें अन्यायपूर्ण लगी होगी, परन्तु वह केवल उसी की कटनी थी जो उस दास ने बोया था। “इसलिए वह तोड़ा उससे ले लो, और जिसके पास दस तोड़े हैं, उसको दे दो। क्योंकि जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा; और उसके पास बहुत हो जाएगा: परन्तु जिसके पास नहीं है, उससे वह भी जो उसके पास है, ले लिया जाएगा” (मत्ती 25:28-29)। यह कोई मनमाना कथन नहीं, वरन् वस्तुओं के भीतरी स्वभाव का प्रकाशन मात्र है, जिससे हम में से कोई नहीं बच सकता।

परन्तु परमेश्वर के सहकर्मी होने के लिये हमें न केवल उसकी सामग्री से, वरन् उसकी विधियों से भी बनाना होगा, और इनके विषय में हम प्रायः बहुत अनजान होते हैं। निर्माण के विषय में हमारी धारणा कठिन, थका देनेवाले परिश्रम की है, जो माथे का पसीना बहाकर किया जाता है; परन्तु परमेश्वर की धारणा बिलकुल भिन्न है। पौलुस हमें बताता है कि वह क्या है: “परन्तु जब हम सब के उघाड़े चेहरे से प्रभु का प्रताप इस प्रकार प्रगट होता है, जिस प्रकार दर्पण में, तो प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश करके बदलते जाते हैं” (2 कुरिन्थियों 3:18)। हमारा काम “निहारना” है, और जैसे-जैसे हम निहारते हैं, प्रभु वह अद्भुत रूपान्तर पूरा करता जाता है, और “प्रभु के द्वारा जो आत्मा है, हम उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश करके बदलते जाते हैं”। निस्सन्देह इसका अर्थ है निहारना—हमारे सांसारिक अर्थ में किसी वस्तु पर केवल दृष्टि डालना नहीं, वरन् ईश्वरीय अर्थ में उसे सचमुच देखना। हमें अपनी आत्मिक आँखों से प्रभु का प्रताप निहारना है, और निरन्तर निहारते रहना है। फिर भी प्रभु के प्रताप का अर्थ कोई बड़ी चमक या प्रभामण्डल नहीं है। प्रभु का वास्तविक प्रताप उस बात का प्रताप है जो वह है और जो वह करता है—उसके चरित्र का प्रताप। और इसी को हमें निहारना है।

मैं एक उदाहरण देती हूँ। कोई मुझे ठेस पहुँचाता है, और मेरा मन करता है कि मैं क्रोधित होकर पलटवार करूँ।

परन्तु मैं मसीह की ओर देखती हूँ, और सोचती हूँ कि वह क्या करता, और उसकी कोमलता और नम्रता पर, और उस व्यक्ति के प्रति उसके प्रेम पर जिसने मुझे ठेस पहुँचाई, मन लगाती हूँ। जैसे-जैसे मैं देखती हूँ, मेरे भीतर उसके समान बनने की इच्छा जागने लगती है, और मैं विश्वास से माँगती हूँ कि मैं “ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी” (2 पतरस 1:4) बनाई जाऊँ, और क्रोध और बदले की भावना मेरे हृदय में से मिट जाती है। मैं अपने शत्रु से प्रेम करने लगती हूँ और उसकी सेवा करने को तरसती हूँ।

इसी प्रकार मसीह को निहारने के द्वारा हमें उसके स्वरूप में बदलना है; और हम उसके जितने निकट रहेंगे, यह परिवर्तन उतनी ही शीघ्रता से होगा।

मैंने विज्ञान में जाने-माने एक अद्भुत दर्पण के विषय में सुना है, जिसे परवलयिक दर्पण कहते हैं। यह एक खोखला शंकु है जिसकी पूरी भीतरी सतह पर दर्पण जड़ा होता है। इसमें प्रकाश की किरणों को भिन्न-भिन्न तीव्रता में केन्द्रित करने की शक्ति होती है, इस अनुपात में कि वे शंकु के ऊपरी सिरे के मिलन-बिन्दु के कितने निकट पहुँचती हैं; ज्यों-ज्यों सिरे का बिन्दु निकट आता है, त्यों-त्यों यह शक्ति और भी तीव्र होती जाती है। विज्ञान ने यह खोज निकाला है कि भीतरी बिन्दु की ओर इस बढ़त के एक विशेष पड़ाव पर—जहाँ दर्पण की सब भुजाएँ पूर्ण एकता में मिल जाती हैं—केन्द्र की शक्ति सूर्य की किरणों के प्रकाश देनेवाले सब गुणों को ऐसी तीव्र चमक में समेट देती है कि वह उन वस्तुओं को दृश्य बना देती है जिन्हें मनुष्य की आँख ने पहले कभी नहीं देखा था। यह माँस को भी पारदर्शी बना देती है, जिससे हम अपनी देह के बाहरी आवरण के पार उसके नीचे चल रही भीतरी क्रियाओं को देख सकते हैं।

हमारे दर्पण के भीतर थोड़ा और आगे बढ़ें, तो सूर्य की किरणों के ताप के गुण इतने केन्द्रित हो जाते हैं कि वे सोलह क्षणों में लोहे को पिघला देने योग्य ताप उत्पन्न करते हैं, और चौदह क्षणों में सोने का मैल छाँटकर केवल शुद्ध धातु का ठोस दाना छोड़ देते हैं।

और आगे बढ़ें, तो सूर्य के प्रकाश के चित्र उतारनेवाले गुण इतने केन्द्रित हो जाते हैं कि जो कोई वस्तु केवल एक क्षण के लिये भी केन्द्र में से होकर निकाली जाए, उस पर वे दर्पण की स्थायी छवि अंकित कर देते हैं।

और भी आगे, लगभग एकता के बिन्दु तक बढ़ें, तो प्रकाश की चुम्बक बनानेवाली शक्तियाँ इतनी केन्द्रित हो जाती हैं कि जो कोई वस्तु एक पल भर के लिये भी उनके सामने रखी जाए, वह एक शक्तिशाली चुम्बक बन जाती है, और उसके बाद सब वस्तुओं को अपनी ओर खींचने लगती है।

यह सब वैज्ञानिक रूप से ठीक है या नहीं, यह जानने के लिये मैं पर्याप्त वैज्ञानिक नहीं हूँ, परन्तु कम से कम यह एक रूपक का काम देगा, जिससे आत्मा की वह उन्नति दिखाई दे जिसमें वह तेज से तेज में बदलती हुई “उसके स्वरूप में” विकसित होती जाती है।

पहला, जब हम दर्पण के समान प्रभु का प्रताप निहारते हैं, तो हम प्रकाश के केन्द्र पर पहुँचते हैं, जो हमारी पापमयता और हमारी आवश्यकता को प्रगट कर देता है। “तब यीशु ने फिर लोगों से कहा, जगत की ज्योति मैं हूँ।

जो मेरे पीछे हो लेगा, वह अंधकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा” (यूहन्ना 8:12)।

दूसरा, जब हम और निकट आते हैं, तो हम ताप के केन्द्र पर पहुँचते हैं, जहाँ हमारा सारा मैल और खोटी चाँदी जलकर भस्म हो जाती है। क्योंकि वह सुनार की आग और धोबी के साबुन के समान है: “वह रूपे का तानेवाला और शुद्ध करनेवाला बनेगा, और लेवियों को शुद्ध करेगा और उनको सोने रूपे के समान निर्मल करेगा, तब वे यहोवा की भेंट धार्मिकता से चढ़ाएँगे” (मलाकी 3:2-3)।

तीसरा, जब हम और भी निकट आते हैं, तो हम चित्र उतारनेवाले केन्द्र पर पहुँचते हैं, जहाँ मसीह का स्वरूप हमारे प्राणों पर स्थायी रूप से अंकित हो जाता है, और हम उसके समान बना दिए जाते हैं, क्योंकि हम उसे वैसा ही देखते हैं जैसा वह है।

“इतना जानते हैं, कि जब यीशु मसीह प्रगट होगा तो हम भी उसके समान होंगे, क्योंकि हम उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (1 यूहन्ना 3:2)।

चौथा और अन्तिम, जब हम एकता के बिन्दु पर पहुँचते हैं, तो हम चुम्बकीय केन्द्र पर पहुँचते हैं, जहाँ हमारा चरित्र मसीह के चरित्र के ऐसा अनुरूप ढल जाता है कि लोग उसे देखकर अनायास ही खिंचकर “तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें” (मत्ती 5:16)।

तो यदि हम मसीह के स्वरूप में ढाले जाना चाहते हैं, तो हमें उसके निकट, और दिन-प्रतिदिन और भी निकट रहकर जीना होगा।

हमें उसके चरित्र और उसकी रीतियों से अधिक से अधिक परिचित होना होगा; हमें बातों को उसकी आँखों से देखना होगा और सब बातों को उसके मापदण्डों से परखना होगा। यह समानता किसी यत्न या संघर्ष के द्वारा नहीं, वरन् आत्मसात् होने के द्वारा पूरी होती है। एक स्वाभाविक नियम के अनुसार हम उन्हीं के समान बनते जाते हैं जिनके साथ हम समय बिताते हैं, और जिसका चरित्र अधिक दृढ़ होता है, उसी का प्रभाव सदा प्रबल रहता है। और क्योंकि ईश्वरीय नियम स्वाभाविक नियम से एक ही है—केवल वह एक ऊँचे क्षेत्र में और अधिक बेरोक शक्ति के साथ काम करता है—इसलिए हमें यह रहस्यमय नहीं लगना चाहिए कि मसीह के साथ आत्मिक एकता के द्वारा हम उसके समान बन जाएँ।

परन्तु मुझे फिर से दोहराना पड़ता है कि मसीह के साथ यह एकता हमारे अपने यत्नों से नहीं आ सकती, चाहे वे कितने ही कठोर क्यों न हों। मसीह के विषय में लिखा है, “विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे” (इफिसियों 3:17), और वह किसी दूसरी रीति से वहाँ बस ही नहीं सकता। पौलुस, जब हमें बताता है कि वह मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया, तो कहता है: “मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है।

और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिसने मुझसे प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आपको दे दिया” (गलातियों 2:20)।

“मसीह मुझ में जीवित है”—यही रूपान्तर का भेद है। यदि मसीह मुझ में जीवित है, तो वस्तुओं के स्वभाव ही के अनुसार उसका जीवन मेरी देह में अवश्य प्रगट होगा, और यह हो ही नहीं सकता कि मैं तेज से तेज में उसके स्वरूप में न बदलती जाऊँ। इस विषय में हमारे प्रभु की शिक्षा बहुत स्पष्ट है: “तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में।

जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। मैं दाखलता हूँ: तुम डालियाँ हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:4-5)।

यह अक्षरशः सत्य है। यदि हम उसमें बने रहें, और वह हम में, तो हम बहुत फल लाए बिना रह ही नहीं सकते, जैसे किसी स्वस्थ दाखलता की डालियाँ नहीं रह सकतीं। वस्तुओं के स्वभाव ही के अनुसार फल अवश्य आएगा।

परन्तु हम “पुराने मनुष्यत्व” को मसीह में नहीं ले जा सकते। इससे पहले कि हम इस आज्ञा को मान सकें, “प्रभु यीशु मसीह को पहन लो” (रोमियों 13:14), हमें पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डालना होगा। प्रेरित पौलुस कुलुस्सियों को लिखते समय पवित्र जीवन जीने के अपने उपदेश की नींव इसी बात पर रखता है कि वे यह पहले ही कर चुके थे: “एक दूसरे से झूठ मत बोलो क्योंकि तुम ने पुराने मनुष्यत्व को उसके कामों समेत उतार डाला है, और नये मनुष्यत्व को पहन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये नया बनता जाता है” (कुलुस्सियों 3:9-10)।

जब मसीह भीतर आता है, तब पाप को मिटना ही पड़ता है; जो प्राण उसकी इच्छा के विरुद्ध हर बात को त्याग देने के लिये तैयार नहीं, वह उसका स्वागत करने की आशा नहीं रख सकता। यदि नये मनुष्यत्व को राज्य करना है, तो “पुराने मनुष्यत्व” को अलग करना ही होगा। परन्तु उतारना और पहनना, दोनों ही विश्वास के द्वारा होने चाहिए। कोई दूसरा मार्ग नहीं है। जैसा मैंने अन्यत्र समझाने का प्रयत्न किया है, हमें अपने व्यक्तित्व, अपने अहं और अपनी इच्छा को अपने आप में से निकालकर मसीह में ले जाना होगा। हमें अपने आपको स्वयं के लिये मरा हुआ और केवल परमेश्वर के लिये जीवित समझना होगा।

“ऐसे ही तुम भी अपने आपको पाप के लिये तो मरा, परन्तु परमेश्वर के लिये मसीह यीशु में जीवित समझो। इसलिए पाप तुम्हारे नाशवान शरीर में राज्य न करे, कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो। और न अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिये पाप को सौंपो, पर अपने आपको मरे हुओं में से जी उठा हुआ जानकर परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिये परमेश्वर को सौंपो” (रोमियों 6:11-13)।

जिस प्रकार का विश्वास हमें पापों की क्षमा को थाम लेने देता है, वही विश्वास मसीह के साथ इस एकता को भी उत्पन्न करता है। जो लोग विश्वास के नियम को नहीं समझते, उनके लिये निस्सन्देह यह उतना ही बड़ा रहस्य होगा, जितने गुरुत्वाकर्षण के भेद गुरुत्वाकर्षण के नियम की खोज से पहले थे। परन्तु जो इसे समझते हैं, उनके लिये विश्वास का नियम गुरुत्वाकर्षण के नियम के समान ही अचूक और निश्चित रीति से काम करता है, और ठीक उतनी ही निश्चितता से अपने परिणाम उत्पन्न करता है। कोई भी इब्रानियों का ग्यारहवाँ अध्याय पढ़कर यह देखे बिना नहीं रह सकता कि विश्वास सब पर जय पानेवाली शक्ति है। मैं तो स्वयं विश्वास करती हूँ कि यह सारे विश्व की सृजनहार शक्ति है। यह वह ऊँचा नियम है जो अपने नीचे के सब निचले नियमों को वश में रखता है; जो बात आश्चर्यकर्म जैसी दिखाई देती है, वह केवल इसी ऊँचे, नियन्त्रण करनेवाले नियम का काम है।

जैसा मैं कहती हूँ, विश्वास सृष्टि का नियम है: “विश्वास ही से हम जान जाते हैं, कि सारी सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन के द्वारा हुई है। यह नहीं, कि जो कुछ देखने में आता है, वह देखी हुई वस्तुओं से बना हो” (इब्रानियों 11:3)। हमें बताया गया है कि जब उसने कहा, तब हो गया; जब उसने आज्ञा दी, तब वास्तव में वैसा ही हो गया। और हमारा प्रभु हमें बताता है कि यदि हम में विश्वास हो, तो हम भी ऐसा ही कर सकते हैं: “यीशु ने उसको उत्तर दिया, परमेश्वर पर विश्वास रखो। मैं तुम से सच कहता हूँ कि जो कोई इस पहाड़ से कहे, “तू उखड़ जा, और समुद्र में जा पड़,” और अपने मन में सन्देह न करे, वरन् विश्वास करे, कि जो कहता हूँ वह हो जाएगा, तो उसके लिये वही होगा। इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा” (मरकुस 11:22-24)।

हमें बताया गया है कि विश्वास “जो बातें हैं ही नहीं, उनका नाम ऐसा लेता है, कि मानो वे हैं” (रोमियों 4:17)। उनका नाम लेकर वह उन्हें अस्तित्व में ले आता है। इसलिए, यद्यपि जब हम विश्वास से पुराने मनुष्यत्व को जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है, उतार डालते हैं, और विश्वास से नये मनुष्यत्व को, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया है, पहन लेते हैं, तब हमें परिवर्तन का कोई शारीरिक चिन्ह दिखाई नहीं देता, तौभी यह सचमुच हो चुका है। विश्वास ने इसे पूरा कर दिया है। मैं इसे धर्मविज्ञान की भाषा में समझा नहीं सकती, परन्तु मैं निडर होकर कह सकती हूँ कि यह एक ठोस, व्यावहारिक सच्चाई है। जो प्राण स्वयं के जीवन को त्यागकर अपने आपको प्रभु के हाथ सौंप देते हैं कि वह उन पर पूरा अधिकार कर ले, वे पाते हैं कि वह उनके अस्तित्व के भीतरी सोतों को अपने अधिकार में ले लेता है, और “अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव” डालता है (फिलिप्पियों 2:13)।

पौलुस ने इफिसियों के लिये प्रार्थना की कि “विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे” (इफिसियों 3:17), और उसके स्वरूप में ढाले जाने का पूरा भेद यही है। यदि मसीह मेरे हृदय में बसा हुआ है, तो मुझे अवश्य ही मसीह के समान होना पड़ेगा। मैं निर्दय, चिड़चिड़ी, स्वार्थी या बेईमान नहीं हो सकती; वरन् उसकी कोमलता, मधुरता, कोमल करुणा, और अपने पिता की इच्छा के आगे उसकी प्रेम भरी अधीनता मेरी प्रतिदिन की चाल और बातचीत में अवश्य दिखाई देगी।

हम पूरी रीति से मसीह के स्वरूप में तभी बदलेंगे जब वह प्रगट होगा और हम “उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है” (1 यूहन्ना 3:2)। परन्तु इस बीच, अपनी सीमा भर, यीशु के जीवन को “हमारे मरनहार शरीर में प्रगट” (2 कुरिन्थियों 4:11) होना है। क्या वह हमारे शरीर में प्रगट हो रहा है? क्या हम मसीह के “स्वरूप में” ऐसे ढल गए हैं कि लोग हमें देखकर उसकी भी एक झलक पा लेते हैं?

एक मेथोडिस्ट पास्टर की पत्नी ने मुझे बताया कि एक बार, जब वे एक नये स्थान पर गए थे, तो उसका छोटा बेटा पहले दिन दोपहर को खेलकर भीतर आया और आनन्द से बोल उठा, “अरे माँ, मुझे यहाँ खेलने के लिये एक ऐसी प्यारी, भली छोटी लड़की मिल गई है कि मैं अब कभी यहाँ से जाना ही नहीं चाहता।” “मैं बहुत प्रसन्न हूँ, मेरे लाल,” उस प्रेमी माँ ने अपने बच्चे की प्रसन्नता में प्रसन्न होकर कहा; “उस छोटी लड़की का नाम क्या है?” “ओह,” बच्चे ने अचानक गम्भीर होकर उत्तर दिया, “मेरे विचार में उसका नाम यीशु है।” “अरे, फ्रैंक!” माँ ने घबराकर कहा, “तुम्हारा क्या मतलब है?” “देखो माँ,” उसने अपनी बात का बचाव करते हुए कहा, “वह इतनी प्यारी थी कि मेरी समझ में ही नहीं आया कि उसे यीशु के सिवा और क्या कहा जा सकता है।”

क्या हमारा जीवन ऐसा मसीह-समान है कि कोई हमारे विषय में भी ऐसा विचार कर सके? क्या हमारे आस-पास के सब लोगों पर यह प्रगट है कि हम यीशु के साथ रहे हैं? क्या दुःख की बात यह नहीं कि प्रायः ठीक इसका उलटा ही होता है? क्या हम में से कुछ अपने आचरण में ऐसे चिड़चिड़े और कठिन नहीं कि हमारे विषय में ठीक इसका उलटा ही कहना पड़े?

पौलुस कहता है कि हमें “मसीह की पत्री... स्याही से नहीं, परन्तु जीविते परमेश्वर के आत्मा से पत्थर की पटियों पर नहीं, परन्तु हृदय की माँस रूपी पटियों पर लिखी” होना है (2 कुरिन्थियों 3:3)। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि सारे संसार में परमेश्वर की हर एक सन्तान आज ही से “मसीह की पत्री,” बनने लगे, और घर में और बाहर सचमुच मसीह-समान जीवन जीने लगे, तो एक महीना भी न बीतेगा कि कलीसियाएँ ऐसे लोगों से भर जाएँगी जो और अधिक जानना चाहते हैं, जो यह देखने के लिये भीतर आएँगे कि वह कौन-सा धर्म है जो मनुष्य के स्वभाव को ऐसा बदलकर कुछ ईश्वरीय बना सकता है।

संसार ऐसे लोगों से भरा है जो मसीही धर्म की वास्तविकता पर विश्वास नहीं करते, और उन्हें ऐसे तथ्यों के सिवा और कुछ कायल नहीं करेगा जिन्हें वे झुठला न सकें। हमें बदले हुए जीवन लेकर उनके सामने जाना होगा। यदि वे देखें कि जहाँ पहले हम क्रोधी थे, अब मधुर हैं; जहाँ पहले घमण्डी थे, अब नम्र हैं; जहाँ पहले चिन्तित रहते थे, अब धीरजवन्त और शान्त हैं; और यदि हम यह गवाही दे सकें कि यह परिवर्तन मसीह के धर्म ही ने किया है, तो वे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।

एक मसीही पुरुष ने अपने कठिन परिश्रम के कारण भक्ति का बड़ा नाम कमाया था, परन्तु दुर्भाग्य से उसका नाम बुरे स्वभाव और कड़वी जीभ के लिये भी था। परन्तु अन्त में, किसी ऐसे कारण से जिसे कोई समझ न सका, उसमें एक परिवर्तन आता दिखाई दिया। उसका स्वभाव और उसकी जीभ उतने ही मधुर और कोमल हो गए जितने पहले उग्र और तीखे थे। उसके मित्र देखते और अचम्भा करते रहे, और अन्त में उनमें से एक ने उससे पूछा कि क्या उसने अपना धर्म बदल लिया है। “नहीं,” उस पुरुष ने उत्तर दिया, “मैंने अपना धर्म नहीं बदला, परन्तु अन्त में मैंने अपने धर्म को मुझे बदलने दिया है।” हमारे धर्म ने हमें कितना बदला है?

“कलीसिया का धर्म,” “प्रार्थना-सभा का धर्म,” या “मसीही-सेवा का धर्म” रखना बहुत सरल है, परन्तु प्रतिदिन का धर्म रखना बिलकुल दूसरी बात है। “अपने ही घराने में भक्ति दिखाना” मसीहियत के सबसे आवश्यक अंगों में से एक है, परन्तु यह बहुत ही दुर्लभ भी है। ऐसे मसीही मिलना कोई असाधारण बात नहीं जो बाहरवालों के सामने, मनुष्यों को दिखाने के लिये, अपने “धार्मिकता के काम” करते हैं, परन्तु घर में अपना विश्वास दिखाने में बुरी तरह चूक जाते हैं। मैं एक बार एक ऐसे पिता को जानती थी जो साप्ताहिक सभा में प्रार्थना में ऐसा सामर्थी और अपने उपदेश में ऐसा प्रभावशाली था कि सारी कलीसिया उसकी भक्ति से द्रवित हो जाती थी; परन्तु सभाओं के बाद जब वह घर जाता, तो ऐसा चिड़चिड़ा और ओछा हो जाता कि उसकी पत्नी और परिवार उसके सामने एक शब्द कहने से भी डरते थे।

“और जब तू प्रार्थना करे, तो कपटियों के समान न हो क्योंकि लोगों को दिखाने के लिये आराधनालयों में और सड़कों के चौराहों पर खड़े होकर प्रार्थना करना उनको अच्छा लगता है। मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके” (मत्ती 6:5)। ये शब्द, “वे अपना प्रतिफल पा चुके,” मुझे बाइबल के सबसे गम्भीर शब्दों में से लगते हैं। जो कुछ हम लोगों को दिखाने के लिये करते हैं, उसे लोग देख लेते हैं, और बस वहीं उसका अन्त हो जाता है। उस प्रकार की धार्मिकता में मसीह की कोई समानता नहीं।

जो धार्मिकता मसीह-समान है, वह ऐसी धार्मिकता है जो प्रतिदिन की परीक्षाओं को आनन्द से सहती है और घर में उकसाए जाने पर भी धीरज रखती है; जो बुराई के बदले भलाई करती है और प्रतिदिन के जीवन की सारी रगड़ का सामना मधुरता और कोमलता से करती है। वह “धीरजवन्त है, और कृपालु है; प्रेम डाह नहीं करता; प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं। अशोभनीय व्यवहार नहीं करता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता। कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है। वह सब बातें सह लेता है, सब बातों पर विश्वास करता है, सब बातों की आशा रखता है, सब बातों में धीरज धरता है” (1 कुरिन्थियों 13:4-7)।

मसीह के स्वरूप में ढलने का अर्थ यही है! क्या हम ऐसी धार्मिकता के विषय में कुछ जानते हैं?

हम कभी-कभी उन बातों के पालन की चर्चा करते हैं जिन्हें हम अपने “धार्मिक कर्तव्य” कहते हैं, और उनसे हमारा अर्थ होता है आराधना सभाएँ, भक्ति के ठहराए हुए समय, या मसीही सेवा। हम कभी स्वप्न में भी नहीं सोचते कि प्रतिदिन की चाल और बातचीत में मसीह-समान होना हमारा कहीं बड़ा “धार्मिक कर्तव्य” है, उन दूसरी बातों में विश्वासयोग्य रहने से भी बढ़कर—चाहे वे अपने आप में कितनी ही वांछनीय क्यों न हों। शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता शब्दों और वाक्यों की, और विधि-विधानों की धार्मिकता थी; ऐसी धार्मिकता बाहरवालों को प्रायः बहुत प्रभावशाली लगती है। परन्तु क्योंकि वह इससे बढ़कर कुछ न थी, इसलिए हमारा प्रभु उसे कठोर से कठोर शब्दों में दोषी ठहराता है: “हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवाँ अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों अर्थात् न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है।

चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते। हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हड्डियों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं” (मत्ती 23:23, 27)। और वह आगे कहता है, “इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो” (मत्ती 23:28)।

धार्मिक जीवन के विषय में सुन्दर बातें कहना बहुत सरल है, परन्तु जो हम कहते हैं वैसा सचमुच होना बिलकुल दूसरी बात है। मैं संडे स्कूल की एक शिक्षिका को जानती हूँ जो अपने विद्यार्थियों को अपनी सारी चिन्ताएँ प्रभु पर डाल देने और परीक्षा के समय उस पर भरोसा रखने के विषय में बहुत कुछ सिखाती रही थी; और वे बहुत प्रभावित हुए थे। परन्तु अन्त में उस शिक्षिका के जीवन में एक विपत्ति आई, और जब तक वह बनी रही, उसके कुछ विद्यार्थियों ने उसे उसके अपने घर में देखा। उन्होंने चकित और दुःखी होकर देखा कि वह कुढ़ रही है, व्याकुल है, चिन्ता कर रही है और शिकायत कर रही है; संक्षेप में, ऐसा व्यवहार कर रही है मानो भरोसा करने के लिये कोई परमेश्वर है ही नहीं, या मानो उसके मार्ग प्रेम और भलाई के मार्ग नहीं। उन बच्चों के लिये यह एक ऐसा “प्रत्यक्ष पाठ” था जिसने उस सारी भलाई को नष्ट कर दिया जिसे उस शिक्षिका की पिछली शिक्षा से पूरा होने की आशा दिखाई देती थी। उनमें से एक ने, जो बड़ी पैनी दृष्टि रखती थी, मुझसे विजय के स्वर में कहा, “जब मिस —— हमें बता रही थीं कि हम हर बात के लिये प्रभु पर कैसे भरोसा रख सकते हैं, तभी मुझे लगा था कि यह सच नहीं हो सकता; और अब मैं देखती हूँ कि वह केवल भलेपन की दिखावटी बातें थीं, क्योंकि वह स्वयं ऐसा नहीं करतीं।”

एक चिड़चिड़ा मसीही, या एक चिन्तित मसीही, एक निराश, उदास मसीही, एक सन्देह करनेवाला मसीही, एक कुड़कुड़ानेवाला मसीही, दूसरों से बहुत माँगनेवाला मसीही, एक स्वार्थी, क्रूर, कठोर-हृदय मसीही, अपने आप को भोग-विलास में ढील देनेवाला मसीही, तीखी जीभ या कड़वे मन का मसीही—संक्षेप में, ऐसा मसीही जो मसीह-समान नहीं—अपने परिवार या मित्रों को, जो उसे वैसा ही देखते हैं जैसा वह है, उपदेश देने के बदले हवाओं को उपदेश दे, तो भी बराबर है। वस्तुओं के इस अटल नियम से बचने का कोई उपाय नहीं, और अच्छा यही है कि हम इसे तुरन्त मान लें। यदि हम चाहते हैं कि हमारे प्रियजन प्रभु पर भरोसा रखें, तो इसके विषय में ढेरों बातें उन्हें उसका हज़ारवाँ भाग भी कायल नहीं करेंगी जितना आवश्यकता के समय हमारी ओर से थोड़ा-सा सच्चा भरोसा देखना करेगा। सबसे लम्बी प्रार्थना और सबसे ऊँचे स्वर का प्रचार किसी भी पारिवारिक दायरे में किसी काम का नहीं—चाहे वे मंच पर कितने ही अच्छे क्यों न लगें—जब तक कि प्रचार की गई बातें स्पष्ट रूप से जी कर न दिखाई जाएँ।

कुछ मसीही ऐसा सोचते प्रतीत होते हैं कि जिन फलों की माँग बाइबल करती है, वे किसी प्रकार के बाहरी धार्मिक काम हैं, जैसे सभाएँ करना, कंगालों से भेंट करने जाना, या परोपकारी संस्थाएँ चलाना।

परन्तु सच्चाई यह है कि बाइबल आत्मा के फलों के रूप में इनका उल्लेख बहुत ही कम करती है, वरन् यह घोषणा करती है कि “आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, और दया, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं” (गलातियों 5:22-23)। मसीह-समान चरित्र अवश्य ही मसीह के भीतर वास करने का फल होगा। निस्सन्देह दूसरी बातें इस चरित्र का परिणाम होंगी; परन्तु सबसे पहले और सबसे बढ़कर चरित्र आता है, नहीं तो बाकी सब केवल खोखला दिखावा है। एक हाल के लेखक ने कहा है: “मनुष्य उससे अधिक कभी नहीं हो सकता जितना उसका चरित्र उसे बनाता है। मनुष्य उससे अधिक या उससे अच्छा कभी कुछ नहीं कर सकता जो उसके चरित्र में है, उसे प्रगट करने या साकार करने के सिवा। मनुष्य में से कोई भी मूल्यवान वस्तु नहीं निकल सकती जो पहले मनुष्य के भीतर न हो। चरित्र को हर बात के पीछे खड़ा होकर उसे सहारा देना चाहिए—उपदेश, कविता, चित्र, पुस्तक। उसके बिना इनमें से कोई भी तिनके भर का मूल्य नहीं रखता।”

मसीह के स्वरूप में ढलने के लिये हमें अवश्य ही “ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी” (2 पतरस 1:4) बनाया जाना चाहिए। और जहाँ ऐसा है, वहाँ वह ईश्वरीय स्वभाव अवश्य ही अपने आपको प्रगट करेगा। हमारी रुचियाँ, हमारी इच्छाएँ और हमारे उद्देश्य मसीह के समान हो जाएँगे; हम बातों को उसकी आँखों से देखेंगे। यह अनिवार्य है; क्योंकि जहाँ ईश्वरीय स्वभाव है, वहाँ उसके फल प्रगट हुए बिना नहीं रह सकते। जहाँ वे प्रगट नहीं होते, वहाँ हमें विवश होकर यही निष्कर्ष निकालना पड़ता है कि वह व्यक्ति, चाहे उसके दावे कितने ही ऊँचे स्वर में क्यों न हों, अभी तक ईश्वरीय स्वभाव का सहभागी नहीं बनाया गया है।

मुझे ऐसा सुनाई देता है कि कोई पूछ रहा है, “परन्तु क्या तुम सचमुच यह कहना चाहती हो कि ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी बनाए जाने के लिये हमें अपने यत्न पूरी रीति से छोड़ देने चाहिए? क्या हमें केवल विश्वास से मसीह को पहन लेना है, और उसे हम में जीने देना है, और अपनी सुइच्छा के अनुसार हम में इच्छा और काम दोनों उत्पन्न करने देना है? और क्या तुम विश्वास करती हो कि तब वह सचमुच ऐसा करेगा?”

इसका उत्तर मैं पूरे बल के साथ देती हूँ: हाँ, मेरा अर्थ ठीक यही है। मेरा अर्थ यह है कि यदि हम अपने आपको पूरी रीति से उसके हाथ सौंप दें, तो वह आकर हम में वास करता है और स्वयं हमारा जीवन बन जाता है। हमें अपना सारा जीवन उसे सौंप देना होगा: अपने विचार, अपने वचन, अपनी प्रतिदिन की चाल, अपना बैठना और अपना उठना। विश्वास से हमें अपने आपको त्याग देना होगा, और मानो अपना स्थान छोड़कर मसीह में जा बसना और उसमें बने रहना होगा। विश्वास से हमें पुराने मनुष्यत्व को उतार डालना होगा, और विश्वास से नये मनुष्यत्व को पहन लेना होगा। विश्वास से हमें अपने आपको पाप के लिये मरा हुआ और परमेश्वर के लिये जीवित समझना होगा—उतना ही सचमुच मरा हुआ जितना जीवित।

विश्वास से हमें यह जान लेना होगा कि हमारा प्रतिदिन का जीवन हम में जीवित मसीह है; और अपने कामों से विश्राम पाकर हमें उसे अवसर देना होगा कि वह अपनी सुइच्छा के अनुसार हम में इच्छा और काम दोनों उत्पन्न करे। अब हमारे हृदयों को उसके विषय की सच्चाई से नहीं, वरन् स्वयं उसी से भरना है—उस जीवित, प्रेमी, महिमामय मसीह से—जो, यदि हम उसे अवसर दें, सचमुच हमें अपना निवास-स्थान बना लेगा। वह हमारे भीतर राज्य और शासन करेगा और “सब वस्तुओं को अपने वश में” कर लेगा (फिलिप्पियों 3:21)। “इसलिए यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गईं” (2 कुरिन्थियों 5:17)।

जब हमारे प्रभु ने पहाड़ी उपदेश में अपने चेलों से कहा, “इसलिए चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है” (मत्ती 5:48), तो यह केवल अलंकार की भाषा नहीं थी। निस्सन्देह उसका अर्थ था—हमारी मानवीय क्षमता के अनुसार; परन्तु उसका अर्थ उसके स्वरूप में ढलने की वही वास्तविकता था जिसके लिये हम पहले से ठहराए गए हैं। और इब्रानियों की पत्री में हमें दिखाया गया है कि यह कैसे पूरा होना है: “अब शान्तिदाता परमेश्वर जो हमारे प्रभु यीशु को जो भेड़ों का महान रखवाला है सनातन वाचा के लहू के गुण से मरे हुओं में से जिलाकर ले आया, तुम्हें हर एक भली बात में सिद्ध करे, जिससे तुम उसकी इच्छा पूरी करो, और जो कुछ उसको भाता है, उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में पूरा करे, उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन” (इब्रानियों 13:20-21)।

परमेश्वर का यह उद्देश्य, जो हमारी सृष्टि में था, हमारे अपने आप पर काम करने के द्वारा नहीं, वरन् उसके हम में काम करने के द्वारा पूरा होना है। यदि ऐसा लगे कि हम में से कुछ लोग मसीह की किसी भी समानता से इतने दूर हैं कि ऐसा रूपान्तर कभी हो ही नहीं सकता, तो हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारे बनानेवाले ने अभी हमें बनाना समाप्त नहीं किया है। यदि हम उसे न रोकें, तो वह दिन आएगा जब उत्पत्ति में आरम्भ हुआ काम प्रकाशितवाक्य में पूरा होगा, और सारी सृष्टि भी, और उसके साथ हम भी, “विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी” (रोमियों 8:21)।

“क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। और केवल वही नहीं पर हम भी जिनके पास आत्मा का पहला फल है, आप ही अपने में कराहते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की प्रतीक्षा करते हैं” (रोमियों 8:22-23)।

“क्या मुझ में तेरी इच्छा पूरी हो? या मेरी?

और क्या मैं ऐसी वस्तु बना दिया जाऊँ जो तेरे ढंग की नहीं; अपने ही ढंग की, और सबसे दयनीय दिखावे से भरी?

क्या मैं परमेश्वर से जन्म लूँ, या केवल मनुष्य से?

मसीह के समान बनूँ, या किसी और ही ढाँचे पर?

क्या हुआ यदि मुझ में तेरा काम मेरी इन्द्रियों से परे है, इतना सूक्ष्म, इतना ऊँचा कि मेरी समझ में न आए।

मेरा भरोसा पूरा है। हे प्रभु, अपना महान परिश्रम जारी रख!

मेरे पास न ज्ञान है, न बुद्धि, न अन्तर्दृष्टि, न विचार, न ऐसी समझ जो तेरे काम में तुझे खरा ठहरा सके, हे सिद्ध! तू मुझे यहाँ तक ले आया है, और देख! जो तूने किया है उसे भला कहना मेरे बस में नहीं। पर यह पुकार मेरे मुँह में है: हे शत्रु, बनानेवाले ने अभी काम पूरा नहीं किया; एक दिन तू देखेगा, और उस दृश्य से भाग खड़ा होगा।”

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