सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
यहोवा भला है

अध्याय 7 · 22 मिनट का पठन

यहोवा भला है

“चखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है! क्या ही धन्य है वह मनुष्य जो उसकी शरण लेता है!” (भजन संहिता 34:8)।

क्या तुमने कभी अपने आप से पूछा है कि अपने हृदय की गहराई में तुम परमेश्वर के विषय में सचमुच क्या सोचते हो—कि तुम उसे एक भला परमेश्वर मानते हो या एक बुरा परमेश्वर? मैं समझती हूँ कि यह प्रश्न तुम्हें चौंका देगा, और यह सुझाव सुनकर ही तुम काँप उठोगे कि तुम किसी भी रीति से परमेश्वर को एक बुरा परमेश्वर समझ सकते हो। परन्तु इस अध्याय को पूरा पढ़ने से पहले, मुझे लगता है कि तुम में से कुछ लोगों को यह मानना पड़ेगा कि, चाहे अनजाने में ही सही, पर फिर भी सचमुच, तुमने अपने सन्देहों और अपनी शिकायतों के द्वारा उस पर एक ऐसा चरित्र थोप दिया है जिसे यदि कोई तुम पर थोपे तो तुम काँप उठोगे।

मैं वह घड़ी कभी नहीं भूलूँगी जब मैंने पहली बार जाना कि परमेश्वर सचमुच भला है। निःसन्देह, मैं सदा से जानती थी कि बाइबल कहती है कि वह भला है, परन्तु मैं सोचती थी कि इसका अर्थ केवल इतना है कि वह धार्मिक अर्थ में भला है; और मेरे मन में कभी यह बात आई ही नहीं थी कि इसका अर्थ यह है कि वह वास्तव में और व्यावहारिक रूप से भला है, उसी प्रकार की भलाई के साथ जिसकी आज्ञा उसने हमें दी है। “परमेश्वर की भलाई,” यह वाक्यांश मुझे एक प्रकार के स्वर्गीय कथन से अधिक कुछ नहीं लगता था, जिसे समझने की मुझसे आशा नहीं की जा सकती थी। और फिर एक दिन बाइबल पढ़ते हुए मुझे ये शब्द मिले, “चखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है,” और अचानक उनमें मेरे लिये एक अर्थ भर गया।

यहोवा भला है, मैंने अपने आप से दोहराया। भला होने का अर्थ क्या है? इसके सिवाय और क्या: जो सबसे उत्तम और सबसे ऊँचा कोई जानता है, उसके अनुसार जीना। भला होना बुरा होने का ठीक उलटा है। बुरा होना यह है कि सही बात को जानकर भी उसे न करना, परन्तु भला होना यह है कि जो सबसे उत्तम हम जानते हैं, वही करना। और मैंने देखा कि, क्योंकि परमेश्वर सब कुछ जानता है, इसलिए वह अवश्य जानता होगा कि सबसे उत्तम और सबसे ऊँची भलाई क्या है, और इसलिए उसकी भलाई पर कोई प्रश्न उठ ही नहीं सकता। मैं कभी व्यक्त नहीं कर सकती कि इसका मेरे लिये क्या अर्थ था। मुझे परमेश्वर की वास्तविक, सच्ची भलाई का ऐसा दर्शन मिला कि मैंने देखा कि उसकी देखरेख में कुछ भी बिगड़ नहीं सकता, और मुझे ऐसा लगा कि अब कोई भी फिर कभी चिन्तित नहीं हो सकता।

और बार-बार, जब परिस्थितियाँ उसके विरुद्ध दिखाई दी हैं, और जब मैं यह प्रश्न करने की परीक्षा में पड़ी हूँ कि कहीं वह निर्दयी, या लापरवाह, या उदासीन तो नहीं रहा, तब इन शब्दों ने मुझे वहीं रोक दिया है, “यहोवा भला है”; और मैंने देखा है कि यह सोचना भी असम्भव था कि जो परमेश्वर भला है, वह वे बुरे काम कर सकता था जिनकी मैंने कल्पना की थी।

शायद तुम इस सुझाव से ही भय के मारे सिकुड़ जाते हो कि तुम किसी भी परिस्थिति में, अपने हृदय की गुप्त गहराइयों में भी, परमेश्वर पर किसी बुराई का दोष लगा सकते हो। और फिर भी तुम उस पर ऐसे काम करने का दोष लगाने से नहीं हिचकिचाते, जिन्हें यदि तुम्हारा कोई मित्र करे तो तुम उन्हें अत्यन्त अनादरपूर्ण और निर्दयी समझोगे। उदाहरण के लिये, मसीही संकट में पड़ते हैं; सब कुछ अन्धकारमय दिखता है, और उन्हें प्रभु की उपस्थिति का कोई अनुभव नहीं होता। वे यह प्रश्न करने लगते हैं कि कहीं प्रभु ने उन्हें त्याग तो नहीं दिया, और कभी-कभी तो उस पर उदासीनता और लापरवाही का दोष भी लगाते हैं। वे कभी नहीं समझते कि ये दोष लगाना यह कहने के बराबर है कि प्रभु अपनी प्रतिज्ञाएँ पूरी नहीं करता, और उनके साथ उतनी दया और आदर से व्यवहार नहीं करता जितनी दया और आदर की आशा वे अपने सब मानवीय मित्रों से रखते हैं। यदि हमारा कोई मानवीय मित्र हमें इसलिए छोड़ दे कि हम संकट में थे, तो हम ऐसे मित्र को भला होने से कोसों दूर समझेंगे। तो फिर यह कैसे है कि हम एक क्षण के लिये भी अपने प्रभु पर ऐसे कामों का दोष लगा सकते हैं? नहीं, प्रिय मित्र, यदि यहोवा भला है—केवल धर्मपरायण नहीं, परन्तु सचमुच भला—तो इसका कारण यही होगा कि वह सदा, हर परिस्थिति में, भलाई के उस सबसे ऊँचे आदर्श के अनुसार काम करता है, जिसे उसने स्वयं हमें सिखाया है। उसमें भलाई का अर्थ, ठीक वैसे ही जैसे हम में, यह होना चाहिए कि जो सबसे उत्तम और सबसे ऊँचा वह जानता है, उसके अनुसार जीना।

तो व्यावहारिक रूप से इसका अर्थ यह है कि वह हमारे प्रति अपने किसी भी कर्तव्य की उपेक्षा नहीं करेगा, और वह सदा हमारे साथ सबसे उत्तम रीति से व्यवहार करेगा। यह एक घिसी-पिटी बात लग सकती है, और शायद तुम कह उठो, “यह हमें क्यों बताती हो, जबकि यह तो हम सब मानते ही हैं?” परन्तु क्या तुम सचमुच मानते हो? यदि मानते, तो क्या तुम्हारे लिये कभी यह सोचना सम्भव होता कि वह लापरवाह, या उदासीन, या निर्दयी, या स्वार्थी, या हमारा ध्यान न रखनेवाला है?

धर्मी होने का दिखावा करके यह न कहो, “अरे, परन्तु मैं तो उस पर कभी ऐसी बातों का दोष नहीं लगाता। मैं ऐसा करने का साहस ही नहीं करूँगा।” क्या सचमुच नहीं? क्या तुमने कभी उसे उन बातों के लिये दोषी नहीं ठहराया जिन्हें करने में तुम स्वयं लज्जित होते? जब वह पिछली दर्दनाक निराशा आई थी, तब क्या हुआ था? क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगा कि प्रभु ने तुम्हारे साथ ऐसा होने देकर निर्दयता की है, जबकि तुम उसकी सेवा करने का इतना यत्न कर रहे थे? क्या तुम कभी उसकी इच्छा को एक कठोर और हुक्म चलानेवाली इच्छा नहीं समझते, जिसके आगे झुकना तो पड़ेगा ही, पर जिससे किसी भी रीति से प्रेम नहीं किया जा सकता? क्या यह कहना तुम्हें कभी कठिन नहीं लगता, “तेरी इच्छा पूरी हो”? परन्तु यदि तुम सचमुच विश्वास करते कि यहोवा भला है, और वह सदा वही करता है जो भला है, तो क्या यह कठिन लग सकता था?

प्रभु यीशु ने बड़ी सावधानी से हमें बताया कि वह अच्छा चरवाहा है, क्योंकि वह जानता था कि परिस्थितियाँ कितनी बार उसके विरुद्ध दिखाई देंगी, और हम उसकी भलाई पर प्रश्न उठाने की कितनी परीक्षा में पड़ेंगे। “अच्छा चरवाहा मैं हूँ,” वह मानो कहता है, “बुरा नहीं। बुरे चरवाहे अपनी भेड़ों की उपेक्षा करते हैं और उन्हें छोड़ देते हैं, परन्तु मैं अच्छा चरवाहा हूँ, और अपनी भेड़ों की न कभी उपेक्षा करता हूँ, न उन्हें छोड़ता हूँ। मैं भेड़ों के लिये अपना प्राण देता हूँ।” चरवाहे में भलाई का उसका आदर्श यह था कि चरवाहा उन भेड़ों की रक्षा करे जो उसकी देखरेख में सौंपी गई हैं, चाहे इसके लिये उसे अपना प्राण ही क्यों न देना पड़े; और वह अपने इस आदर्श के अनुसार जिया। अब, क्या हम यह नहीं देख सकते कि यदि हम सचमुच विश्वास करें कि वह भला है—किसी रहस्यमय, धार्मिक अर्थ में नहीं, परन्तु इस सीधे-सादे, मानवीय अर्थ में—तो हम तुरन्त बड़े चैन और शान्ति के स्थान में पहुँचा दिए जाएँगे। यदि मैं एक भेड़ हूँ, और प्रभु भले की साधारण, सीधी-सादी परिभाषा के अनुसार एक अच्छा चरवाहा है, तो मैं कितनी पूरी तरह सुरक्षित हूँ! मैं हर बात में सबसे उत्तम देखभाल के विषय में कितनी निश्चिन्त हो सकती हूँ! मैं समय और अनन्तकाल दोनों के लिये कितनी सुरक्षित हूँ!

आओ, हम अपने आप से ईमानदार रहें। क्या हमने अपने गुप्त मन में कभी प्रभु पर उन्हीं लक्षणों का दोष नहीं लगाया, जिन्हें उसने यहेजकेल में हमें एक बुरे चरवाहे के चिह्न बताया है? क्या हमने यह नहीं सोचा कि उसे हमारे सुख से अधिक अपने सुख या अपनी महिमा की चिन्ता थी? क्या हमने यह शिकायत नहीं की कि जब हम निर्बल थे तब उसने हमें बलवान नहीं किया, या हमारे टूटे हृदयों को नहीं बाँधा, या जब हम खो गए थे तब हमें नहीं खोजा?

क्या हमने अपनी रोगी, और असहाय, और खोई हुई दशा को इस बात का कारण तक नहीं समझा कि अब वह हमसे कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहेगा? यह इससे किस बात में भिन्न है कि हम साफ़-साफ़ और खुलकर कह दें कि प्रभु एक बुरा चरवाहा है, और अपनी भेड़ों के प्रति अपने कर्तव्य पूरे नहीं करता। शायद तुम अपने भीतरी कुड़कुड़ाने और शिकायतों के इस अनुवाद से भय के मारे सिकुड़ जाते हो, परन्तु मैं तुमसे पूछती हूँ, पूरी ईमानदारी से उनका और क्या अर्थ हो सकता है? यह अत्यन्त आवश्यक है कि समय-समय पर हम प्रभु के विषय में अपने गुप्त विचारों और भावनाओं को खींचकर पवित्र आत्मा के पूरे प्रकाश में लाएँ, ताकि हम देख सकें कि उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण वास्तव में क्या है। परमेश्वर के विषय में गलत विचारों की आदत में पड़ जाना घातक रूप से सहज है, ऐसे विचार जो धीरे-धीरे, बिना हमारे जाने, सन्देह और अविश्वास की एक चौड़ी खाई के द्वारा हमें उससे अलग कर देंगे।

किसी भी और बात से अधिक, पाप से भी अधिक, परमेश्वर के विषय में गलत विचार हमारे आत्मिक जीवन की नींव को खोखला कर देते हैं, और उसके प्रेमी हृदय को दुःख पहुँचाते हैं। हम इसे अपने ही अनुभव से समझ सकते हैं। हमें किसी बात से इतना दुःख नहीं होता जितना इस बात से कि हमारे मित्र हमें गलत परखें और गलत समझें, और हम पर ऐसे उद्देश्यों का आरोप लगाएँ जिनसे हम घृणा करते हैं। और मेरा विश्वास है कि प्रभु को भी किसी बात से इतना दुःख नहीं होता। वास्तव में यह मूर्तिपूजा है। क्योंकि मूर्तिपूजा इसके सिवाय और क्या है कि एक झूठे ईश्वर को गढ़ना और उसकी उपासना करना, और जब हम अपने आप को उसे गलत परखने देते हैं, और उस पर ऐसे कामों और भावनाओं का आरोप लगाते हैं जो निर्दयी और अविश्वसनीय हैं, तब हम ठीक यही काम करने के सिवाय और क्या कर रहे होते हैं।

बाइबल में इसे परमेश्वर के विरुद्ध बोलना कहा गया है। “वे परमेश्वर के विरुद्ध बोले, और कहने लगे, “क्या परमेश्वर जंगल में मेज लगा सकता है?” यह पूछने के लिये एक बहुत भोला-भाला प्रश्न लगता था। परन्तु परमेश्वर ने जंगल में उनकी सब आवश्यकताएँ पूरी करने की प्रतिज्ञा की थी; और यह प्रश्न पूछने में यह बात छिपी थी कि जैसा उसने प्रतिज्ञा की थी वैसा करने की उसकी सामर्थ्य पर उन्हें भीतर ही भीतर भरोसा नहीं था; और इसलिए, अपने भोले रूप के बावजूद, यह सचमुच उसके “विरुद्ध बोलना” था। एक भला परमेश्वर अपनी प्रजा को जंगल में ले जाकर फिर उनके लिये “मेज लगाने” से चूक नहीं सकता था; और यह प्रश्न करना कि क्या वह ऐसा कर सकता है, यह संकेत करना था कि वह भला नहीं है।

इसी प्रकार हम भी कभी-कभी ऐसा ही प्रश्न पूछने की कड़ी परीक्षा में पड़ते हैं। परिस्थितियाँ अक्सर परमेश्वर के लिये हमारी आवश्यकताएँ पूरी करना इतना असम्भव बना देती दिखाई देती हैं कि हम बार-बार यह पूछकर कि क्या वह ऐसा कर सकता है, उसके “विरुद्ध बोलने” की परीक्षा में पड़ जाते हैं। चाहे उसने पहले कितनी ही बार ऐसा किया हो, हम यह विश्वास नहीं कर पाते कि वह फिर से ऐसा कर सकता है, और अपने हृदयों में हम उसे “सीमित” कर देते हैं, क्योंकि हम उसके वचन पर विश्वास नहीं करते और न उसकी भलाई पर भरोसा रखते हैं।

यदि हमारा विश्वास वैसा होता जैसा होना चाहिए, तो कोई भी परिस्थिति, चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हो, हमसे हमारी आवश्यकताएँ पूरी करने की परमेश्वर की सामर्थ्य को “सीमित” न करवा पाती। जो परमेश्वर परिस्थितियों को बना सकता है, वह निश्चय ही परिस्थितियों को वश में भी रख सकता है, और जंगल में भी, उन सब के लिये जो उस पर भरोसा रखते हैं, “मेज लगा” सकता है।

बाइबल में ऐसे ही और बहुत से प्रश्न मिलते हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर की भलाई पर सन्देह डालता है, और मुझे डर है कि उनमें से प्रत्येक उन्हीं प्रश्नों की प्रतिलिपि है जो आज परमेश्वर की सन्तान पूछती है।

“क्या यहोवा हमारे बीच है या नहीं?”

“क्या परमेश्वर अनुग्रह करना भूल गया?”

“क्या परमेश्वर की करुणा सदा के लिये जाती रही?”

“क्या परमेश्वर ने क्रोध करके अपनी सब दया को रोक रखा है?”

“क्या परमेश्वर का वचन पीढ़ी-पीढ़ी के लिये निष्फल हो गया है?”

“हे परमेश्वर, तूने हमें क्यों सदा के लिये छोड़ दिया है?”

“तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?”

आओ, हम थोड़ी देर इन प्रश्नों पर विचार करें, और देखें कि क्या हम अपने गुप्त प्रश्नों में इनके जैसे कोई प्रश्न पा सकते हैं।

“क्या यहोवा हमारे बीच है या नहीं?”

उसने हमसे स्पष्ट शब्दों में कहा है, जैसे उसने इस्राएलियों से कहा था, कि वह सदा हमारे साथ है, और हमें कभी न त्यागेगा; और फिर भी जब संकट आता है, तो हम भी, उन्हीं के समान, उसके वचन पर सन्देह करने लगते हैं और यह प्रश्न करने लगते हैं कि क्या वह सचमुच वहाँ हो सकता है। जब इस्राएलियों ने ऐसा किया, तब मूसा ने इसे “यहोवा की परीक्षा” करना कहा, और जब हम ऐसा करते हैं, तब भी यह उसी दोष के योग्य है। कोई भी यह प्रश्न प्रभु की सच्चाई और विश्वासयोग्यता पर सन्देह डाले बिना नहीं पूछ सकता; और यह पूछना, यदि हम केवल समझें, उसका अपमान करना और उसके चरित्र पर कलंक लगाना है। मैं जानती हूँ कि हाय! यह परमेश्वर की अपनी सन्तान के बीच भी एक आम प्रश्न है, और मैं यह भी जानती हूँ कि उनमें से बहुत से यह सोचते हैं कि यह पूछना ही सच्ची दीनता है, और कि उन जैसे अयोग्य प्राणियों के लिये, जैसा वे अपने आप को समझते हैं, उसकी उपस्थिति के विषय में निश्चित होना घमण्ड की पराकाष्ठा होगी।

परन्तु इस विषय में उसके अपने वचन का क्या? उसने हर सम्भव रीति से हमसे कहा है कि वह हमारे साथ है, और हमें कभी न छोड़ेगा, और न कभी हमें त्यागेगा; तो क्या हम उसके वचन की सच्चाई पर प्रश्न उठाकर उसे “झूठा ठहराने” का साहस करेंगे? एक भला परमेश्वर झूठ बोल नहीं सकता, और हमें ऐसा प्रश्न पूछना सदा के लिये छोड़ देना चाहिए। प्रभु उतनी ही सच्चाई से हमारे साथ है जितनी सच्चाई से हम अपने साथ हैं, और हमें बस यह विश्वास करना ही है कि वह है, चाहे ऊपर से कुछ भी दिखाई दे।

“क्या परमेश्वर अनुग्रह करना भूल गया?”

यह प्रश्न पूछना उसके “विरुद्ध बोलना” है, और यह उतना ही दुःखदायी है जितना किसी भली माता से यह पूछना कि क्या वह अपने बच्चे को भूल गई है। और फिर भी प्रभु स्वयं कहता है: “क्या यह हो सकता है कि कोई माता अपने दूध पीते बच्चे को भूल जाए? हाँ, वह तो भूल सकती है, परन्तु मैं तुझे नहीं भूल सकता।” हम में से जो माताएँ हैं, वे भली-भाँति जानती हैं कि यदि कोई यह सुझाव दे कि हम अपने बच्चों को भूल सकती हैं, तो हमें कितना दुःख होगा और हम कितना अपमानित अनुभव करेंगी; और कोई दूसरा समझे या न समझे, कम से कम हम माताओं को तो यह समझ पाना चाहिए कि ऐसा प्रश्न प्रभु को कितना दुःख पहुँचाता होगा।

“क्या परमेश्वर की करुणा सदा के लिये जाती रही?” “क्या परमेश्वर ने क्रोध करके अपनी सब दया को रोक रखा है?”

एक भले परमेश्वर से ये दोनों प्रश्न पूछना उसका अपमान करना है। उसकी दया का हमारे प्रति रोक लिया जाना, या उसकी करुणा का हमसे सदा के लिये जाते रहना उतना ही असम्भव होगा, जितना किसी माता की ममता भरी दया का अन्त हो जाना। भजनकार कहता है: “यहोवा सभी के लिये भला है, और उसकी दया उसकी सारी सृष्टि पर है।” वस्तुओं के स्वभाव ही में ऐसा होना अवश्य है, क्योंकि वह एक भला परमेश्वर है, और इसके विपरीत कुछ कर ही नहीं सकता।

“क्या परमेश्वर का वचन पीढ़ी-पीढ़ी के लिये निष्फल हो गया है?”

हर मसीही के जीवन में ऐसे समय आते हैं जब हम यह प्रश्न पूछने की परीक्षा में पड़ते हैं। सब कुछ उलटा होता दिखाई देता है, और परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ विफल हुई जान पड़ती हैं। परन्तु यदि हम स्मरण रखें कि यहोवा भला है, तो हम देखेंगे कि यदि ऐसा हो सकता, तो वह भला न रहता। जो मनुष्य अपनी प्रतिज्ञाएँ तोड़ता है, उसे अनादर के योग्य और अविश्वसनीय मनुष्य समझा जाता है; और यदि कोई ऐसी कल्पना भी कर सके, तो जो परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाएँ तोड़ सकता, वह भी अनादर के योग्य और अविश्वसनीय होता। और ऐसा प्रश्न पूछना उसकी भलाई पर कलंक लगाना है, जिसे उचित ही “परमेश्वर के विरुद्ध बोलना” कहा जा सकता है। चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी दिखाई दें, हम इस बात के विषय में निश्चित रह सकते हैं कि क्योंकि परमेश्वर भला है, इसलिए उसकी कोई भी प्रतिज्ञा न कभी विफल हुई है, न कभी विफल हो सकती है।

आकाश और पृथ्वी चाहे टल जाएँ, परन्तु उसका वचन कभी न टलेगा।

“हे परमेश्वर, तूने हमें क्यों सदा के लिये छोड़ दिया है?”

एक भले परमेश्वर के लिये हमें छोड़ देना उतना ही असम्भव होगा जितना एक भली माता के लिये अपने बच्चे को छोड़ देना। हम संकट और अन्धकार में हो सकते हैं, और ऐसा अनुभव कर सकते हैं मानो हम छोड़ दिए गए और त्याग दिए गए हैं, परन्तु हमारी भावनाओं का तथ्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है, और तथ्य यह है कि परमेश्वर भला है, और ऐसा कर ही नहीं सकता। अच्छा चरवाहा खोई हुई भेड़ को छोड़कर उसकी चिन्ता करना बन्द नहीं कर देता, परन्तु वह उसे ढूँढ़ने निकलता है, और जब तक वह मिल न जाए, उसे खोजता रहता है। उस पर यह सन्देह करना कि उसने हमें सदा के लिये छोड़ दिया है, उसके विश्वासयोग्य प्रेम को घायल करना और दुःख पहुँचाना है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भली माता के हृदय को चोट पहुँचेगी यदि कोई यह सोचे कि वह अपने बच्चे को छोड़ सकती है, चाहे वह बच्चा कितनी ही दूर क्यों न भटक गया हो। दोनों में से किसी भी दशा में यह बात असम्भव है, परन्तु अब तक जीवित रही सबसे भली माता की अपेक्षा परमेश्वर के विषय में यह कहीं अधिक असम्भव है।

“तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?”

यह ऐसा प्रश्न है जिसे पूछने की ओर हम बहुत झुके रहते हैं। मैं समझती हूँ कि हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे कभी न कभी अपनी व्यक्तिगत बनावट के विषय में “परमेश्वर का सामना” करने की परीक्षा न हुई हो। हमें अपना विशेष स्वभाव या अपने विशेष गुण-लक्षण पसन्द नहीं आते, और हम किसी और के समान होने की लालसा करते हैं जिसके पास, हमारे विचार में, रूप या प्रतिभा के बड़े वरदान हैं। हम अपनी भीतरी और बाहरी, दोनों प्रकार की बनावट से असन्तुष्ट रहते हैं, और हमें पक्का लगता है कि हमारी सारी असफलताएँ हमारे अभागे स्वभाव के कारण हैं; और हम अपने सृष्टिकर्ता को इस बात का दोष देने लगते हैं कि उसने “हमें ऐसा क्यों बनाया”।

मुझे अपने जीवन का वह समय स्पष्ट रूप से स्मरण है जब मैं अपनी बनावट को लेकर बहुत विद्रोही होने की परीक्षा में पड़ी थी। मैं स्पष्टवादी, उत्साही प्रकार की स्त्री थी, एक अच्छी मसीही बनने का यत्न करती हुई, परन्तु मुझमें भक्ति का कोई विशेष रूप नहीं झलकता था। परन्तु मेरी एक बहन थी जो देखने में इतनी सन्त-सी थी, और जिसका व्यवहार इतना भक्तिपूर्ण था, कि वह भक्ति की साक्षात् मूर्ति लगती थी; और मुझे पक्का लगता था कि यदि मुझे भी उसका सन्त-सा रूप और व्यवहार मिल जाए, तो मैं कहीं अधिक अच्छी मसीही बन सकती हूँ। परन्तु उन्हें पाने के मेरे सारे संघर्ष व्यर्थ रहे।

मेरा स्वाभाविक स्वभाव किसी भी सन्त-से रूप के लिये कहीं अधिक उत्साही और मुँहफट था, और कितनी ही बार मैंने अपने मन में परमेश्वर को उलाहना देते हुए कहा, “तूने मुझे ऐसा क्यों बनाया है?” परन्तु एक दिन एक पुरानी रहस्यवादी पुस्तक में मुझे एक वाक्य मिला जिसने मानो मेरी आँखें खोल दीं। वह यह था: “तेरे परमेश्वर ने तुझे जैसा बनाया है, वैसा ही होने में सन्तुष्ट रह”; और मेरे मन में यह बात कौंध गई कि यह सचमुच एक तथ्य है कि परमेश्वर ने मुझे बनाया है, और वह अवश्य जानता होगा कि वह मुझे किस प्रकार का प्राणी बनाना चाहता था; और यदि उसने मुझे आलू की बेल बनाया है, तो मुझे आलू उगाने में सन्तुष्ट रहना चाहिए, और गुलाब की झाड़ी बनकर गुलाब उगाने की लालसा नहीं करनी चाहिए; और यदि उसने मुझे छोटे-छोटे कामों के लिये गढ़ा है, तो मुझे दूसरों को बड़े काम करने देने में सन्तुष्ट रहना चाहिए। हम “परमेश्वर की रचना” हैं, और परमेश्वर भला है, इसलिए उसकी रचना भी अवश्य भली होगी; और हम निश्चिन्त होकर भरोसा रख सकते हैं कि हमारे साथ अपना काम पूरा करने से पहले, वह हमसे कुछ ऐसा बनाएगा जो उसकी महिमा के लिये होगा, चाहे अभी हम अपने आप को इससे कितना ही भिन्न क्यों न अनुभव करें।

भजनकार को यह धन्य टेक बार-बार दोहराने में आनन्द आता था, “क्योंकि यहोवा भला है।” तुम्हारे लिये यह लाभदायक होगा कि अपनी-अपनी शब्दानुक्रमणिका लेकर देखो कि वह इसे कितनी बार कहता है। और उसने सब को उभारा कि इसे कहने में उसके साथ मिल जाएँ। “यहोवा के छुड़ाए हुए ऐसा ही कहें,” यही उसकी उत्कट पुकार थी। हमें अपना स्वर उसके स्वर के साथ मिलाना चाहिए—यहोवा भला है—यहोवा भला है। परन्तु हमें इसे केवल अपने होंठों से कहकर फिर अपने कामों से अपने शब्दों को झुठला नहीं देना चाहिए। हमें इसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से, विचार, वचन और कर्म से “कहना” चाहिए, ताकि लोग देखें कि हम सचमुच ऐसा ही मानते हैं, और उन्हें निश्चय हो जाए कि यह एक महान तथ्य है।

परमेश्वर के ईश्वरीय प्रबन्धों में बहुत सी बातें देह की आँखों को भलाई जैसी नहीं दिखतीं, और भजन संहिता पढ़ते हुए हम शायद आश्चर्य करते हैं कि भजनकार अपनी लिखी हुई कुछ बातों के बाद भी यह कैसे कह सका, “उसकी करुणा सदा की है।” परन्तु विश्वास ऐसे रहस्यों के सामने शान्त होकर बैठ जाता है, और कहता है, “यहोवा भला है, इसलिए जो कुछ वह करता है वह अवश्य भला होगा, चाहे वह कैसा भी दिखाई दे, और मैं उसके स्पष्टीकरणों की बाट जोह सकता हूँ।”

घर-गृहस्थी का एक उदाहरण यहाँ अक्सर मेरी सहायता करता है। यदि मेरी कोई सहेली है जिसे मैं जानती हूँ कि वह एक कुशल गृहिणी है, तो मुझे इस बात की चिन्ता नहीं होती कि घर की सफ़ाई के दिनों में उसके घर में चीज़ें कुछ न कुछ अस्त-व्यस्त दिखाई दें, दरियाँ उठी हुई हों, और फ़र्नीचर पर कपड़े ढके हों, और शायद रंग-रोगन और सजावट के कारण कुछ कमरे रहने योग्य भी न हों। मैं अपने आप से कहती हूँ, “मेरी सहेली एक कुशल गृहिणी है, और यद्यपि अभी सब कुछ इतना असुविधाजनक दिखता है, फिर भी यह सारी उथल-पुथल केवल इसलिए है कि अन्त में वह घर को पहले से कहीं अधिक सुखदायक बनाना चाहती है।”

यह संसार परमेश्वर का घर-प्रबन्ध है; और यद्यपि इस समय चीज़ें बुरी तरह अस्त-व्यस्त दिखती हैं, फिर भी, क्योंकि हम जानते हैं कि वह भला है, और इसलिए अवश्य ही एक अच्छा गृह-प्रबन्धक है, हम पूरी तरह निश्चित हो सकते हैं कि यह सारी वर्तमान उथल-पुथल केवल इसलिए है कि अन्त में ऐसी कहीं उत्तम दशा उत्पन्न हो, जो इसके बिना हो ही नहीं सकती थी। मैं कह सकती हूँ कि हम सब ने कभी-कभी ऐसा अनुभव किया है मानो हम परमेश्वर का घर-प्रबन्ध उससे अच्छा चला सकते थे, परन्तु जब हम समझ लेते हैं कि परमेश्वर भला है, तो हम फिर ऐसा अनुभव नहीं कर सकते। और जब संसार मुझे पूरी तरह उलटा चलता दिखाई देता है, तब अपने आप से बस इतना कहना मुझे अत्यधिक शान्ति देता है, “यह मेरा घर-प्रबन्ध नहीं, परन्तु प्रभु का है; और यहोवा भला है, इसलिए उसका घर-प्रबन्ध भी अवश्य भला होगा; और मेरा चिन्ता करना मूर्खता है।”

परमेश्वर की एक निराश सन्तान ने एक गहरी शिक्षा पाए हुए मसीही से पूछा, “क्या संसार तुम्हें टूटा-फूटा और उजड़ा हुआ नहीं दिखाई देता?

“हाँ,” प्रसन्न भरोसे के स्वर में उत्तर मिला; “हाँ, एक फूटते हुए बीज के समान टूटा-फूटा।”

हम में से जिस किसी ने किसी सड़ते हुए बलूत के बीज के भीतर से बलूत के पेड़ के पहले अंकुर फूटते देखे हैं, वह समझेगा कि इसका अर्थ क्या है। इससे पहले कि बलूत का बीज बलूत का पेड़ उत्पन्न कर सके, उसे स्वयं टूटना-फूटना पड़ता है। कोई भी पौधा कभी किसी ऐसे बीज से नहीं निकला जो टूट-फूट न गया हो।

हमारा प्रभु इसी तथ्य के द्वारा हमें सिखाता है कि हमारे साथ उसकी प्रक्रियाओं का अर्थ क्या है। “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है।” यूहन्ना 12:24।

सारे संसार की, या विशेष रूप से हमारे अपने व्यक्तिगत जीवनों की, प्रत्यक्ष टूट-फूट का पूरा स्पष्टीकरण यहाँ दिया गया है। और इस प्रकाश में देखने पर हम समझ सकते हैं कि यह कैसे है कि प्रभु भला हो सकता है, और फिर भी अपने सृजे हुए संसार में, और उन मनुष्यों के जीवनों में जिनसे वह प्रेम करता है, दुःख और अन्याय को रहने दे सकता है। उसकी भलाई ही उसे विवश करती है कि वह इसे रहने दे। क्योंकि वह जानता है कि केवल ऐसी प्रत्यक्ष टूट-फूट के द्वारा ही हमारे लिये उसके महिमामय उद्देश्य फल ला सकते हैं। और हम, जिनके हृदय भी उसी फल की लालसा रखते हैं, यदि उसके मार्गों को समझें, तो उसकी सारी भलाई के लिये उसकी स्तुति कर सकेंगे, तब भी जब बातें सबसे कठिन और सबसे रहस्यमय जान पड़ें।

प्रेरित हमें बताता है कि परमेश्वर की इच्छा “भली, और भावती, और सिद्ध” है। एक भले परमेश्वर की इच्छा “भली” हुए बिना रह ही नहीं सकती—वास्तव में, उसे सिद्ध होना ही है’; और जब हम इसे जान लेते हैं, तो हम उसे सदा “भावती” पाते हैं; अर्थात् हम उससे प्रेम करने लगते हैं। मुझे पूरा निश्चय है कि यदि एक बार हम स्पष्ट देख सकें कि उसकी इच्छा भली है, तो परमेश्वर की इच्छा के अधीन होने की सारी कठिनाई मिट जाएगी।

जिस इच्छा को हम भली नहीं मानते, उसके अधीन होने के लिये हम संघर्ष पर संघर्ष करते हैं, पर व्यर्थ; परन्तु जब हम देखते हैं कि वह सचमुच भली है, तो हम आनन्द के साथ उसके अधीन हो जाते हैं। हम चाहते हैं कि वह पूरी हो। हमारे हृदय उससे मिलने को उछल पड़ते हैं।

हे परमेश्वर की मधुर इच्छा, तुझे मेरा प्रणाम!

तेरे सब मार्गों को मैं सराहूँ; और जब तक जीऊँ, हर दिन मानो तुझसे और भी अधिक प्रेम करूँ।

तेरे अनदेखे चरणों के हर चिह्न को चूमना मुझे भाता है: हे धन्य इच्छा, तुझसे मुझे कोई भय नहीं!

तेरा राज्य इतना मधुर है।

प्रभु की असीम भलाई के विषय में जो कुछ मैं कह सकती हूँ, वह सब कहने के लिये यहाँ स्थान नहीं है। प्रत्येक को स्वयं “चखकर देखना” होगा। और यदि वह केवल ईमानदारी और विश्वासयोग्यता से ऐसा करे, तो भजनकार के ये शब्द उसके विषय में सच हो जाएँगे: “लोग तेरी बड़ी भलाई का स्मरण करके उसकी चर्चा करेंगे, और तेरे धर्म का जयजयकार करेंगे।” भजन संहिता 145:7

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