अध्याय 6 · 24 मिनट का पठन
यहोवा
“जिससे ये जानें कि केवल तू जिसका नाम यहोवा है, सारी पृथ्वी के ऊपर परमप्रधान है” (भजन संहिता 83:18)।
परमेश्वर के सब नामों में शायद सबसे पूर्ण नाम यहोवा है। इस नाम का अर्थ है वह जो स्वयं में विद्यमान है, “मैं हूँ।” यह नाम प्रगट करता है कि परमेश्वर क्या है। कभी-कभी उसके स्वभाव के विशेष पहलुओं को दिखाने के लिये इसके साथ और नाम भी जोड़े गए हैं: यहोवा यिरे — यहोवा उपाय करेगा।
यहोवा निस्सी — यहोवा मेरा झण्डा है।
यहोवा शालोम — यहोवा हमारी शान्ति है।
यहोवा सिदकेनू — यहोवा हमारी धार्मिकता है।
यहोवा शाम्मा — यहोवा वहाँ है।
ये नाम आवश्यकता की घड़ियों में खोजे गए थे। जब अब्राहम अपने पुत्र को बलि चढ़ाने ही वाला था और उसे बच निकलने का कोई मार्ग नहीं दिखाई देता था, तब परमेश्वर ने एक मेम्ने का उपाय किया। तब अब्राहम ने समझा कि परमेश्वर अपने लोगों के लिये उपाय करता है।
यही सच्चाई नये नियम में भी दोहराई गई है: “तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है, कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए” (मत्ती 6:32)।
यदि परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं को देखता और जानता है, तो वह निश्चय ही उन्हें पूरा भी करेगा।
हमारा प्रभु बार-बार हमसे आग्रह करता है कि हम चिन्ता न करें, क्योंकि परमेश्वर को हमारी चिन्ता है। “तुम्हारा स्वर्गीय पिता जानता है,” वह कहता है, “कि तुम्हें ये सब वस्तुएँ चाहिए।” (मत्ती 6:32)। यदि प्रभु हमारी आवश्यकता को देखता और जानता है, तो स्वाभाविक रूप से यही निष्कर्ष निकलता है कि वह उसे पूरा भी करेगा।
हमारा पिता होने के कारण वह इसके सिवाय और कुछ कर ही नहीं सकता। जैसे ही एक भली माँ देखती है कि उसके बच्चे को किसी वस्तु की आवश्यकता है, वह तुरन्त उस आवश्यकता को पूरा करने में लग जाती है। वह बच्चे के माँगने की प्रतीक्षा भी नहीं करती; आवश्यकता का दिख जाना ही पर्याप्त है। भली माँ होने के कारण वह इससे भिन्न व्यवहार कर ही नहीं सकती। इसलिए जब परमेश्वर हमसे कहता है, “मैं वह हूँ जो तुम्हारी आवश्यकता को देखता है,” तो वास्तव में वह यह भी कह रहा होता है, “मैं वह हूँ जो उपाय करता है,” क्योंकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि वह देखे और उपाय न करे।
“तो फिर मुझे वह सब क्यों नहीं मिलता जो मैं चाहता हूँ?” तुम पूछ सकते हो। केवल इसलिए कि परमेश्वर देखता है कि जो तुम चाहते हो वह वास्तव में तुम्हारी आवश्यकता नहीं, वरन् शायद ठीक उसका उलटा है। बहुधा हमें वह देने के लिये जिसकी हमें आवश्यकता है, प्रभु को वह हमसे रोक रखना पड़ता है जो हम चाहते हैं। “तुम्हारा पिता तुम्हारे माँगने से पहले ही जानता है, कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएँ है।” (मत्ती 6:8)। तुम नहीं जानते; और यदि तुम्हारी सब इच्छाएँ पूरी कर दी जातीं, तो हो सकता है कि तुम्हारी सब सच्ची आवश्यकताएँ अधूरी ही रह जातीं। निश्चय ही हमारे लिये इतना पर्याप्त होना चाहिए कि हमारा परमेश्वर यहोवा यिरे है, अर्थात् वह यहोवा जो देखता है और इसलिए उपाय करता है।
परन्तु मुझे डर है कि आज बहुत से मसीहियों ने अब्राहम वाली यह खोज कभी नहीं की, और वे नहीं जानते कि प्रभु सचमुच यहोवा यिरे है। वे अपने प्राणों के उद्धार के लिये आनेवाले समय में तो उस पर भरोसा रख सकते हैं, परन्तु वे कल्पना भी नहीं करते कि वह यहीं और अभी उनकी चिन्ताओं का बोझ उनके लिये उठाना चाहता है। वे उस मनुष्य के समान हैं जिसके विषय में मैंने सुना है: वह अपनी पीठ पर भारी बोझ लादे जा रहा था, कि एक मित्र ने उसे अपनी गाड़ी में बैठा लेने को कहा, और उसने आनन्द से यह बात मान ली। वह गाड़ी में चढ़ तो गया, पर अपना बोझ पीठ पर ही लादे रहा, और उसके भार से झुका हुआ बैठा रहा। उसके मित्र ने पूछा, “तुम अपना बोझ गाड़ी के फर्श पर क्यों नहीं रख देते?”
“ओह,” उस मनुष्य ने उत्तर दिया, “यही बहुत बड़ी बात है कि तुम मुझे ले चल रहे हो; मैं तुमसे यह नहीं कह सकता कि मेरा बोझ भी उठाओ।” तुम्हें आश्चर्य हो सकता है कि कोई इतना मूर्ख कैसे हो सकता है, फिर भी क्या तुम ठीक यही नहीं कर रहे हो? क्या तुम अपनी देखभाल के लिये तो प्रभु पर भरोसा रखते हो, और फिर भी अपने बोझ स्वयं ही नहीं ढो रहे हो? कौन अधिक मूर्ख है—वह मनुष्य या तुम?
यहोवा निस्सी, अर्थात् “यहोवा मेरा झण्डा,” वह खोज थी जो मूसा ने तब की जब अमालेकी रपीदीम में इस्राएल से लड़ने आए, और प्रभु ने इस्राएल को बड़ी विजय दी। मूसा ने पहचान लिया कि प्रभु उनकी ओर से लड़ रहा था, और उसने एक वेदी बनाकर उसका नाम “यहोवा निस्सी” रखा (निर्गमन 17:15)। पवित्रशास्त्र इस सच्चाई को प्रगट करनेवाले वचनों से भरा पड़ा है। “यहोवा योद्धा है; उसका नाम यहोवा है।” (निर्गमन 15:3)। “तुम्हारा परमेश्वर यहोवा जो तुम्हारे आगे-आगे चलता है वह आप तुम्हारी ओर से लड़ेगा।” (व्यवस्थाविवरण 1:30)। “यहोवा आप ही तुम्हारे लिये लड़ेगा, इसलिए तुम चुपचाप रहो।” (निर्गमन 14:14)। “तुम इस बड़ी भीड़ से मत डरो और तुम्हारा मन कच्चा न हो; क्योंकि युद्ध तुम्हारा नहीं, परमेश्वर का है।” (2 इतिहास 20:15)। “हमारे संग हमारा प्रधान परमेश्वर है।”
(2 इतिहास 13:12)।
पवित्रशास्त्र में इससे अधिक स्पष्ट रूप से और कुछ नहीं दिखाया गया कि यदि हम केवल उसे करने दें, तो प्रभु हमारे लिये लड़ेगा। वह जानता है कि अपने आत्मिक शत्रुओं के विरुद्ध हममें कोई बल नहीं; और जैसे एक कोमल माँ अपने असहाय बच्चों पर आक्रमण होने पर उनके लिये लड़ती है, वैसे ही वह हमारे लिये लड़ता है। वह हमसे बस इतना चाहता है कि हम चुपचाप रहें और उसे काम करने दें। आत्मिक संघर्ष का यही एकमात्र प्रकार है जो कभी सफल होता है। परन्तु हम यह सीखने में धीमे हैं। जब परीक्षाएँ आती हैं, तो लड़ाई प्रभु को सौंपने के बदले हम अपना सारा बल बटोरकर स्वयं उनसे लड़ने लगते हैं। हम यह तो मान सकते हैं कि प्रभु पास ही है और यदि बात बहुत बिगड़ जाए तो सहायता करेगा; परन्तु अधिकतर हमें यही लगता है कि सारी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी है।
हमारे लड़ने का ढंग प्रायः यह होता है: बार-बार पश्चात्ताप करना, संकल्प और प्रतिज्ञाएँ करना, विजय के लिये कठिन संघर्ष करना, और फिर से असफल हो जाना; फिर और पश्चात्ताप, और संकल्प, और प्रतिज्ञाएँ, और नये सिरे से संघर्ष—बार-बार यही क्रम। हर बार हम अपने आप से कहते हैं कि अब की बार तो हम निश्चय ही सफल होंगे, और हर बार असफल होते हैं, बहुधा पहले से भी बुरी तरह। यह सिलसिला सप्ताहों, महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक चलता रह सकता है, और कोई सच्चा या स्थायी छुटकारा नहीं मिलता।
परन्तु तुम पूछ सकते हो, “क्या हमें लड़ना ही नहीं है?” निश्चय ही हमें लड़ना है, परन्तु इस रीति से नहीं। हमें “विश्वास की अच्छी कुश्ती” लड़नी है (1 तीमुथियुस 6:12), और विश्वास की यह कुश्ती प्रयत्न का संघर्ष नहीं, वरन् भरोसे का संघर्ष है। यह राजा यहोशापात की लड़ाई के समान है, जब वह और उसकी प्रजा अपने शत्रु के सामने खड़े हुए और उन्होंने पाया कि “जिस समय वे गाकर स्तुति करने लगे, उसी समय यहोवा ने… घातकों को बैठा दिया और वे मारे गए” (2 इतिहास 20:22)। हमारा भाग यह है कि हम लड़ाई प्रभु को सौंप दें और विजय के लिये उस पर भरोसा रखें।
इसमें प्रतिज्ञाओं या संकल्पों के विषय में कुछ नहीं; न घण्टों या दिनों तक चलनेवाले पीड़ादायक संघर्षों या कड़वे पछतावे के विषय में कुछ है। “उन सब के साथ विश्वास की ढाल लेकर स्थिर रहो जिससे तुम उस दुष्ट के सब जलते हुए तीरों को बुझा सको” (इफिसियों 6:16)। सबसे बढ़कर, विश्वास।
विश्वास ही वह एक आवश्यक बात है, जिसके बिना बाकी सब कुछ व्यर्थ है। इसका अर्थ है कि हमें लड़ाई केवल प्रभु को सौंपनी ही नहीं, वरन् उसी के हाथ में छोड़ भी देनी है, और पूरा भरोसा रखना है कि वही जीतेगा।
असली संघर्ष यहीं है। शान्त रहकर केवल प्रभु पर भरोसा रखना असुरक्षित-सा लगता है, और लड़ाई को फिर से अपने हाथों में ले लेने की परीक्षा प्रायः बहुत प्रबल होती है। आत्मिक बातों में अपने हाथ अलग रखना हमारे लिये उतना ही कठिन है जितना किसी डूबते हुए मनुष्य के लिये उस व्यक्ति से छटपटाना छोड़ देना जो उसे बचाने का यत्न कर रहा है। हम सब जानते हैं कि डूबते हुए मनुष्य को बचाना कितना असम्भव हो जाता है यदि वह अपने बचानेवाले से ही लड़ने लगे; और ठीक उसी प्रकार प्रभु के लिये भी हमारी लड़ाइयाँ लड़ना असम्भव है जब हम उन्हें स्वयं लड़ने पर अड़े रहते हैं। ऐसा नहीं कि वह इच्छुक नहीं, परन्तु वह ऐसा कर नहीं सकता। हमारा हस्तक्षेप उसके काम में बाधा डालता है। जब सांसारिक प्रयत्न हावी हो जाते हैं, तब आत्मिक शक्तियाँ काम नहीं कर सकतीं।
हमारा प्रभु हमसे कहता है, “मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते” (यूहन्ना 15:5), और हमने ये शब्द बहुत बार पढ़े और दोहराए हैं; परन्तु क्या कोई सचमुच इन पर विश्वास करता है? यदि हम अपने छिपे हुए विचारों के विषय में ईमानदार हों, तो क्या हमें उनमें कुछ ऐसा नहीं मिलेगा: “जब मसीह ने ये शब्द कहे, तो उसका अर्थ निश्चय यही रहा होगा कि हम अपने बल से बहुत कुछ नहीं कर सकते, या कम से कम कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। परन्तु कुछ भी नहीं—यह ठीक नहीं हो सकता। हम असहाय बच्चे तो नहीं हैं, और निश्चय ही हमें अपने शत्रुओं से लड़ने में अपना सारा बल लगाना है; और जब वह बल चुक जाए, तब हम प्रभु से सहायता माँग सकते हैं।”
अपनी सब असफलताओं के बावजूद हम अब भी यही सोचते हैं कि यदि हम थोड़ा और यत्न करें और अधिक धीरज से लगे रहें, तो किसी भी स्थिति में सफल हो सकते हैं। परन्तु हम इस निर्णायक सच्चाई को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं कि आत्मिक बातों में या आत्मिक शत्रुओं के विरुद्ध हमारी स्वाभाविक योग्यताएँ किसी काम की नहीं।
व्याध-पतंग का लार्वा, जो तालाब की तली में रहता है, अपने परिवेश के लिये बलवन्त और भली-भाँति विकसित हो सकता है; परन्तु जब वह व्याध-पतंग बन जाता है, तो जिन योग्यताओं से वह कीचड़ में रेंगता था, वे खुली हवा में उड़ने के लिये व्यर्थ हो जाती हैं। उसी प्रकार, जैसे यदि हमें उड़ना हो तो भूमि पर चलने की हमारी योग्यता व्यर्थ होगी, वैसे ही आत्मिक युद्ध में हमारी स्वाभाविक योग्यताएँ किसी काम की नहीं। वास्तव में, यदि हम उन पर निर्भर रहें, तो वे सच्ची बाधाएँ बन जाती हैं—ठीक वैसे ही जैसे यदि हमें तैरना या उड़ना हो तो चलने का प्रयत्न हमें रोकेगा।
तो हम देख सकते हैं कि आत्मिक शत्रुओं का सामना करते समय अपने आप पर भरोसा रखने के परिणाम गम्भीर होते हैं। यह न केवल असफलता की ओर ले जाता है, वरन् अन्त में विद्रोह की ओर भी। जिसे बहुधा “आत्मिक संघर्ष” कहा जाता है, उसका अधिकांश भाग अधिक ठीक-ठीक “आत्मिक विद्रोह” कहलाना चाहिए। परमेश्वर ने हमसे कहा है कि हम अपने प्रयत्नों पर निर्भर रहना छोड़ दें और अपनी लड़ाइयाँ उसे सौंप दें, फिर भी हम आज्ञा मानने से इन्कार करते हैं। हम लड़ते तो हैं, परन्तु वह विश्वास की लड़ाई नहीं; वह अविश्वास की लड़ाई है। जिस “मल्लयुद्ध” पर हम प्रायः गर्व करते हैं, वह परमेश्वर की ओर से उसके शत्रुओं के विरुद्ध मल्लयुद्ध नहीं, वरन् उसके शत्रुओं के साथ मिलकर उसी के विरुद्ध मल्लयुद्ध है। हम सन्देहों और भयों को बढ़ने देते हैं, और परिणाम यह होता है कि हम अन्धकार, अशान्ति और भीतरी खींचतान में पड़ जाते हैं। फिर हम इसे “आत्मिक संघर्ष” का नाम देते हैं और अपने आपको कोई विशेष या अनोखा उदाहरण समझते हैं। परन्तु इस दशा को समझानेवाला एकमात्र शब्द है अविश्वास, और इसका सीधा-सा उपचार है विश्वास।
तुम याकूब के मल्लयुद्ध के विषय में पूछ सकते हो—क्या उसने संघर्ष के द्वारा विजय नहीं पाई? वास्तव में उसने विजय इसलिए पाई कि वह इतना निर्बल हो गया कि और संघर्ष न कर सका। याकूब स्वर्गदूत से मल्लयुद्ध नहीं कर रहा था, वरन् स्वर्गदूत याकूब से मल्लयुद्ध कर रहा था। याकूब ही वह था जिसे हराए जाने की आवश्यकता थी। जब स्वर्गदूत ने देखा कि याकूब का विरोध इतना प्रबल है कि वह उस पर प्रबल नहीं हो पाता, तब उसने उसकी जाँघ की नस को छुआ, और वह चढ़ गई; और तब विजय प्राप्त हुई। जैसे ही याकूब विरोध करने के योग्य न रहा, वह परमेश्वर से प्रबल हो गया। जब उसका बल जाता रहा, तभी उसे बल मिला। जब वह और लड़ न सका, तभी वह जयवन्त हुआ।
याकूब का अनुभव हमारे अपने अनुभव का दर्पण है। प्रभु हमसे मल्लयुद्ध करता है, ताकि हमें पूरी रीति से अपने ऊपर निर्भर होने तक ले आए। जब तक हममें बल रहता है, हम विरोध करते रहते हैं, यहाँ तक कि अन्त में वह हमें असहायता की उस दशा तक ले आता है जहाँ हमें झुकना ही पड़ता है; और तब उसी समर्पण के द्वारा हम जयवन्त होते हैं। हमारी विजय सदा निर्बलता की विजय होती है। पौलुस ने यह समझ लिया था जब उसने लिखा: “और उसने मुझसे कहा, ‘मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।’ इसलिए मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूँगा, कि मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया करती रहे… क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवन्त होता हूँ” (2 कुरिन्थियों 12:9-10)।
इससे अधिक महिमामय विजय की कामना कौन कर सकता है?
और यह विजय हमारी होगी, यदि हम प्रभु को अपना झण्डा मान लें और अपनी सब लड़ाइयाँ उसे सौंप दें। यहोवा शालोम नाम, जिसका अर्थ है “यहोवा शान्ति है,” गिदोन ने तब खोजा जब प्रभु ने उसे एक ऐसे काम के लिये बुलाया जिसके लिये वह अपने आपको बिलकुल अयोग्य समझता था। उसने कहा, “हे मेरे प्रभु, विनती सुन, मैं इस्राएल को कैसे छुड़ाऊँ? देख, मेरा कुल मनश्शे में सबसे कंगाल है, फिर मैं अपने पिता के घराने में सबसे छोटा हूँ” (न्यायियों 6:15)। और प्रभु ने उससे कहा, “निश्चय मैं तेरे संग रहूँगा; सो तू मिद्यानियों को ऐसा मार लेगा जैसा एक मनुष्य को” (न्यायियों 6:16)… “तुझे शान्ति मिले; मत डर, तू न मरेगा” (न्यायियों 6:23)। तब गिदोन ने प्रभु पर विश्वास किया; और यद्यपि लड़ाई अभी लड़ी नहीं गई थी और कोई विजय अभी दिखाई नहीं दी थी, फिर भी विश्वास से उसने शान्ति को पहले से ही स्थापित देख लिया। उसने यहोवा की एक वेदी बनाकर उसका नाम “यहोवा शालोम” रखा (न्यायियों 6:24)।
मनुष्य के हृदय की सब आवश्यकताओं में शान्ति की आवश्यकता से बड़ी कोई आवश्यकता नहीं, और सुसमाचार में किसी और बात की प्रतिज्ञा इतनी भरपूरी से नहीं की गई। “मैं तुम्हें शान्ति दिए जाता हूँ, अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ… तुम्हारा मन न घबराए और न डरे” (यूहन्ना 14:27)। और फिर, “मैंने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं, कि तुम्हें मुझ में शान्ति मिले; संसार में तुम्हें क्लेश होता है, परन्तु ढाढ़स बाँधो, मैंने संसार को जीत लिया है” (यूहन्ना 16:33)।
हम प्रायः सोचते हैं कि शान्ति बाहरी स्थिरता से ही आ सकती है—कि पहले सब शत्रु मिट जाएँ और सब कष्ट समाप्त हो जाएँ। परन्तु प्रभु एक ऐसी भीतरी शान्ति की बात करता है जो उथल-पुथल के बीच भी बनी रह सकती है और उससे ऊपर उठ सकती है। इस शान्ति की नींव यह नहीं कि हमने संसार को जीत लिया है, या कभी जीत सकते हैं, वरन् यह कि मसीह ने उसे जीत लिया है। केवल विजेता ही शान्ति की घोषणा कर सकता है, और जिनके लिये वह लड़ा है, वे केवल उसमें प्रवेश कर सकते हैं। वे न उसे उत्पन्न कर सकते हैं और न नष्ट कर सकते हैं। परन्तु वे उस पर विश्वास करने से इन्कार कर सकते हैं, और इस प्रकार उसे अपने हृदयों में राज्य करने से वंचित रख सकते हैं। हो सकता है तुम यह विश्वास करने में हिचकिचाओ कि मसीह ने तुम्हारे लिये शान्ति स्थापित कर दी है, और इसलिए संघर्ष की बेचैन दशा में बने रहो; फिर भी वह यह कर चुका है, और तुम्हारा निरन्तर संघर्ष अनावश्यक है।
बाइबल हमें बताती है कि मसीह वही हमारा मेल है, अर्थात् वह आप ही हमारी शान्ति है (इफिसियों 2:14)। इसलिए चाहे मुझे शान्ति का अनुभव हो या न हो, उसमें शान्ति पहले से ही मेरी है, और मुझे विश्वास से उसे थाम लेना है। विश्वास केवल उस बात पर विश्वास करता है और उसी का अंगीकार करता है जो परमेश्वर ने कही है। यदि वह कहता है कि शान्ति है, तो विश्वास उसकी पुष्टि करता है और उसमें प्रवेश करता है। यदि उसने पवित्रशास्त्र में शान्ति की घोषणा की है, तो बाहरी रूप चाहे जो हो, मुझे भी अपने हृदय में उसकी घोषणा करनी है। “क्योंकि परमेश्वर का राज्य खाना-पीना नहीं; परन्तु धार्मिकता और मिलाप और वह आनन्द है जो पवित्र आत्मा से होता है” (रोमियों 14:17), और जिसने शान्ति में प्रवेश नहीं किया, उसने अभी तक इस राज्य में पूरी रीति से प्रवेश नहीं किया।
व्यवहार में, हम फिलिप्पियों 4:6-7 का पालन करके सदा शान्ति में प्रवेश कर सकते हैं: “किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी”। कदम बहुत स्पष्ट हैं, और वे केवल दो हैं: पहला, सारी चिन्ता छोड़ दो; दूसरा, अपनी चिन्ताएँ परमेश्वर को सौंप दो। फिर वहीं दृढ़ता से टिके रहो—शान्ति अवश्य आएगी। उसे आना ही है, क्योंकि उसका स्थान और कोई नहीं ले सकता।
यहोवा सिदकेनू नाम, जिसका अर्थ है “यहोवा हमारी धार्मिकता,” प्रभु ने यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा तब प्रगट किया जब उसने मसीह के आगमन के विषय में कहा: “यहोवा की यह भी वाणी है, देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा… और यहोवा उसका नाम ‘यहोवा हमारी धार्मिकता’ रखेगा” (यिर्मयाह 23:5-6)।
हमारी धार्मिकता की आवश्यकता किसी भी दूसरी आवश्यकता से बड़ी है। हमारे मसीही जीवन के अधिकांश संघर्ष और द्वन्द्व पाप के साथ हमारी लड़ाइयों और धर्मी बनने के हमारे प्रयत्नों से ही उत्पन्न होते हैं। और यह कहने की आवश्यकता ही नहीं कि हम कितनी बार असफल होते हैं। जब तक हम अपने ही प्रयत्नों से पाप पर जय पाने या धार्मिकता प्राप्त करने का यत्न करते रहेंगे, तब तक हमारा असफल होना निश्चित है। परन्तु यदि हम यह खोज लें कि प्रभु ही हमारी धार्मिकता है, तो हमने विजय का रहस्य पा लिया होगा।
प्रभु यीशु मसीह में हमें परमेश्वर के इस अद्भुत नाम का और भी पूर्ण प्रकाशन मिलता है। प्रेरित पौलुस, मसीह के राजदूत के रूप में बोलते हुए, घोषणा करता है कि “जो पाप से अज्ञात था, उसी को उसने हमारे लिये पाप ठहराया, कि हम उसमें होकर परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ” (2 कुरिन्थियों 5:21)। और फिर वह कहता है, “परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा अर्थात् धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा” (1 कुरिन्थियों 1:30)।
मुझे डर है कि बहुत थोड़े मसीही सचमुच समझते हैं कि इसका अर्थ क्या है। हम इन शब्दों को अपनी धार्मिक भाषा के अंग के रूप में दोहराते हैं, और धुँधले-से ढंग से उन्हें मसीह के उद्धार से जुड़ी बात मान लेते हैं; परन्तु उनका वास्तविक अर्थ क्या है, या दैनिक जीवन में वे कैसे लागू होते हैं, यह हम मुश्किल से ही समझते हैं।
मेरे लिये परमेश्वर का यह नाम—“यहोवा हमारी धार्मिकता”—इतना व्यावहारिक महत्त्व रखता है कि मैं चाहती हूँ, यदि हो सके, तो इसे स्पष्ट कर दूँ। यह सरल नहीं है, और मैं इसे धर्मविज्ञान की रीति से समझा नहीं सकती। परन्तु अनुभव में यह कुछ इस प्रकार जान पड़ता है: हमें अपने भीतर धार्मिकता का भण्डार जमा करके नहीं रखना है, मानो आवश्यकता पड़ने पर हम उसमें से निकाल सकें। इसके बदले, हमें उस धार्मिकता में से, जो हमारे लिये मसीह में भण्डार करके रखी गई है, अपनी आवश्यकता के अनुसार निरन्तर नई आपूर्ति ग्रहण करनी है।
दूसरे शब्दों में, यदि हमें किसी भी प्रकार की धार्मिकता की आवश्यकता है—धीरज, दीनता, प्रेम—तो उसे अपने भीतर इस आशा से खोजना व्यर्थ है कि वह वहाँ मिल जाएगी, क्योंकि वह हमें वहाँ कभी नहीं मिलेगी। इसके बदले, हमें उसे केवल विश्वास से ले लेना है, एक ऐसी वस्तु के रूप में जो मसीह में, जो हमारी धार्मिकता है, हमें पहले ही दी जा चुकी है। मैं शायद ठीक-ठीक समझा न सकूँ कि यह कैसे होता है, परन्तु मैं अनुभव से जानती हूँ कि ऐसा होता है, और इसके परिणाम सच्चे और सामर्थी हैं। मैंने कोमलता और दया को उन हृदयों में सूर्य के प्रकाश के समान उण्डेली जाती देखा है जो कभी कड़वे और अन्धकारमय थे, जब विश्वास ने आगे बढ़कर उन्हें मसीह में एक वर्तमान सम्पत्ति के रूप में ग्रहण किया। मैंने कठोर वचनों को कोमल बनते, व्याकुल हृदयों को शान्त होते, और बेचैन आत्माओं को स्थिर होते देखा है—विश्वास के इसी सरल कार्य के द्वारा, अर्थात् उस धार्मिकता को ग्रहण करने के द्वारा जो मसीह में हमारी है।
प्रेरित, रोमियों अध्याय 3 में यह दिखाने के बाद कि व्यवस्था के द्वारा—अर्थात् अपने ही प्रयत्नों के द्वारा—धार्मिकता प्राप्त करना हमारे लिये असम्भव है, आगे कहता है: “पर अब बिना व्यवस्था परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट हुई है… परमेश्वर की वह धार्मिकता, जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से सब विश्वास करनेवालों के लिये है। क्योंकि कुछ भेद नहीं” (रोमियों 3:21-22)।
विश्वास, और केवल विश्वास ही, उस धार्मिकता को ग्रहण करता है जो मसीह में हमारी है। जैसे हम क्षमा को विश्वास से ग्रहण करते हैं, वैसे ही हमें धीरज, कोमलता, नम्रता, सहनशीलता, या कोई भी दूसरा सद्गुण जिसकी हमें आवश्यकता हो, विश्वास ही से ग्रहण करना है। हमारे अपने प्रयत्न धार्मिकता उत्पन्न नहीं कर सकते, ठीक वैसे ही जैसे वे क्षमा उत्पन्न नहीं कर सकते। और फिर भी, कितने ही मसीही अब भी यही प्रयत्न करते हैं!
पौलुस ऐसे लोगों का वर्णन करता है जब वह कहता है: “क्योंकि मैं उनकी गवाही देता हूँ, कि उनको परमेश्वर के लिये धुन रहती है, परन्तु बुद्धिमानी के साथ नहीं। क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान होकर, अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न करके, परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन न हुए। क्योंकि हर एक विश्वास करनेवाले के लिये धार्मिकता के निमित्त मसीह व्यवस्था का अन्त है” (रोमियों 10:2-4)।
काश, ऐसे सब उत्सुक लोग परमेश्वर के इस अद्भुत नाम—“यहोवा हमारी धार्मिकता”—को खोज पाते, और अपनी धार्मिकता स्थापित करने का यत्न छोड़कर परमेश्वर की धार्मिकता के अधीन हो जाते। भविष्यद्वक्ता हमें बताता है कि हमारी सबसे अच्छी धार्मिकता भी “मैले चिथड़ों के समान” है (यशायाह 64:6)। और पौलुस अपनी यह अभिलाषा प्रगट करता है कि मैं “उसमें पाया जाऊँ; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, वरन् उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है” (फिलिप्पियों 3:9)।
क्या हम सचमुच समझते हैं कि इसका अर्थ क्या है? और क्या हम इसे अपने सारे हृदय से अपनाने को तैयार हैं? यदि हाँ, तो धर्मी बनने का हमारा संघर्ष समाप्त हो जाएगा। यहोवा सिदकेनू हर आवश्यकता को पूरा करेगा।
यहोवा शाम्मा नाम, जिसका अर्थ है “यहोवा वहाँ है,” यहेजकेल भविष्यद्वक्ता पर तब प्रगट हुआ जब बँधुआई के पच्चीसवें वर्ष में उसे एक दर्शन में दिखाया गया कि इस्राएलियों का भावी घर कैसा होगा। उसने देश का और यरूशलेम नगर का वर्णन किया, और अन्त में यह कहा: “और उस दिन से आगे को नगर का नाम यहोवा शाम्मा रहेगा” (यहेजकेल 48:35)।
मेरे लिये, इस नाम में बाकी सब नाम समा जाते हैं। जहाँ कहीं प्रभु है, वहाँ उसकी सन्तानों के लिये सब कुछ ठीक ही होगा। जहाँ एक भली माँ होती है, वहाँ उसके बच्चों का भला ही होता है, जहाँ तक उसके बस में हो।
तो परमेश्वर के विषय में यह और भी कितना अधिक सच है। उसकी उपस्थिति ही पर्याप्त है।
हम सबको याद है कि बचपन में हमारी माँ की केवल उपस्थिति ही हमारे लिये कैसे पर्याप्त होती थी। जिस शान्ति, विश्राम और सहायता की हमें आवश्यकता होती थी, वह सब उसके वहाँ होने मात्र से निश्चित लगती थी—अपनी सदा की जगह पर अपने काम या अपनी पुस्तक के साथ बैठी हुई—जब हम अपनी परेशानियाँ लेकर उसके पास आते थे। यदि हम यह समझ पाते कि परमेश्वर की उपस्थिति भी वैसा ही निश्चय देती है—केवल असीम रूप से बढ़कर—तो हमारे आत्मिक जीवन में आनन्द का एक गहरा सोता फूट निकलता, जो भय और व्याकुलता के हर चिह्न को दूर कर देता।
सारे पुराने नियम में, इस्राएल के भयों और चिन्ताओं का प्रभु का उत्तर बस यही था: “मैं तेरे संग रहूँगा” (निर्गमन 3:12)। और कुछ कहने की आवश्यकता ही न थी। उसकी उपस्थिति इस बात की पूरी गारंटी थी कि उनकी सब आवश्यकताएँ पूरी होंगी; और जब उन्हें इसका निश्चय हो जाता था, तो वे बड़े से बड़े भयंकर शत्रु का सामना करने से भी नहीं डरते थे। तुम कह सकते हो, “आह, हाँ, यदि प्रभु मुझसे भी यही बात कहता, तो मैं भी न डरता।” अच्छा, उसने यह कहा है, और ऐसे शब्दों में कहा है जिनका अर्थ समझने में कोई भूल हो ही नहीं सकती। जब “परमेश्वर के स्वर्गदूत” ने यूसुफ को मसीह के आनेवाले जन्म का समाचार दिया, तो उसने कहा: “‘देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानुएल रखा जाएगा’ (जिसका अर्थ है, परमेश्वर हमारे साथ)” (मत्ती 1:23)। इस छोटे-से वाक्य में हम पर वह सबसे महान सत्य प्रगट हुआ है जिसे संसार कभी जान सकता है—कि परमेश्वर, सर्वशक्तिमान परमेश्वर, आकाश और पृथ्वी का सृजनहार, कोई दूर का परमेश्वर नहीं जो अगम्य महिमा के स्वर्ग में वास करता हो, वरन् वह मसीह में नीचे उतर आया है, ताकि यहीं इस संसार में, हमारे दीन, अज्ञानी और असहाय जीवनों के बीच, हमारे साथ वास करे—हमारे उतना ही निकट, जितने हम स्वयं अपने निकट हैं। यदि हम मसीह पर विश्वास करते ही हैं, तो हमें यह मानना ही पड़ेगा, क्योंकि उसका नाम यही है, “परमेश्वर हमारे साथ।”
तो ये दोनों नाम, यहोवा शाम्मा और इम्मानुएल, एक ही बात का अर्थ रखते हैं। इनका अर्थ है कि परमेश्वर अपने सारे विश्व में हर जगह उपस्थित है, हर वस्तु को घेरे हुए और हर वस्तु को सम्भाले हुए है, और हम सबको अपनी सुरक्षित और धन्य रखवाली में थामे हुए है। इनका अर्थ है कि उसके सारे विश्व में हमें कोई ऐसा स्थान नहीं मिल सकता जिसके विषय में यह न कहा जा सके, “यहोवा वहाँ है।” भजनकार कहता है: “मैं तेरे आत्मा से भागकर किधर जाऊँ? या तेरे सामने से किधर भागूँ? यदि मैं आकाश पर चढ़ूँ, तो तू वहाँ है! यदि मैं अपना खाट अधोलोक में बिछाऊँ तो वहाँ भी तू है! यदि मैं भोर की किरणों पर चढ़कर समुद्र के पार जा बसूँ, तो वहाँ भी तू अपने हाथ से मेरी अगुआई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा” (भजन संहिता 139:7-10)।
हम सदा उपस्थित रहनेवाले परमेश्वर के प्रेम और देखभाल से बहकर दूर नहीं जा सकते। और जो मसीही सोचते हैं कि उसने उन्हें त्याग दिया है, और उसकी उपस्थिति के लिये पुकारते हैं, वे इस सच्चाई से अनजान होकर पुकार रहे हैं कि वह सदा और हर जगह उनके साथ उपस्थित है। सच तो यह है कि यदि वे चाहें भी, तो उसकी उपस्थिति से बाहर नहीं जा सकते। आह, काश वे परमेश्वर के इस अद्भुत और तृप्त करनेवाले नाम को जान पाते!
उससे बात करो, क्योंकि वह सुनता है; और आत्मा आत्मा से मिल सकती है; वह श्वास से भी अधिक समीप है, और हाथों और पैरों से भी अधिक निकट।
आओ, हम एक बार फिर परमेश्वर के इन पाँच नामों की शिक्षा का सार देखें। वे हमसे क्या कहते हैं?
यहोवा यिरे, अर्थात् “मैं वह हूँ जो तुम्हारी आवश्यकता को देखता है, और इसलिए उसका उपाय करता है।”
यहोवा निस्सी, अर्थात् “मैं सेनापति हूँ, और तुम्हारा झण्डा हूँ, और वह हूँ जो तुम्हारी ओर से तुम्हारी लड़ाइयाँ लड़ेगा।”
यहोवा शालोम, अर्थात् “मैं तुम्हारी शान्ति हूँ। मैंने तुम्हारे लिये शान्ति स्थापित की है, और अपनी शान्ति तुम्हें देता हूँ।”
यहोवा सिदकेनू, अर्थात् “मैं तुम्हारी धार्मिकता हूँ। मुझमें तुम्हें वह सब मिलेगा जिसकी तुम्हें आवश्यकता है—ज्ञान, और धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा।”
यहोवा शाम्मा, अर्थात् “मैं तुम्हारे संग हूँ। मैं तुम्हारा सदा उपस्थित रहनेवाला, सब कुछ घेरे रहनेवाला परमेश्वर और उद्धारकर्ता हूँ। मैं तुम्हें कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुम्हें त्यागूँगा। तुम जहाँ कहीं जाओ, मैं वहाँ हूँ, और वहाँ भी मेरा हाथ तुम्हें थामे रहेगा, और मेरा दाहिना हाथ तुम्हारी अगुआई करेगा।”
यह सब सच है, चाहे हम इसे जानें और पहचानें या नहीं। हो सकता है हमने कभी स्वप्न में भी न सोचा हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, और अब तक हमने अपना जीवन भूखे, थके और दुखी रहकर बिताया हो। परन्तु इस सारे समय हम भरपूरी के बीच भूखे मर रहे थे। परमेश्वर के उद्धार की परिपूर्णता हमारे विश्वास की बाट जोहती रही है; और “अनुग्रह और धर्मरूपी वरदान बहुतायत से” (रोमियों 5:17) हमारे ग्रहण करने की बाट जोहते रहे हैं।
काश मैं यह विश्वास कर पाती कि मेरे कुछ पाठकों के लिये यह सब अब समाप्त हो गया है, और अब से वे देखेंगे कि परमेश्वर के ये सब कुछ समेटनेवाले नाम उनकी आवश्यकता का कोई छोटा-सा कोना भी बिना पूर्ति के नहीं छोड़ते।
तब वे भविष्यद्वक्ता के साथ अपने चारों ओर के सब लोगों के सामने यह गवाही दे सकेंगे: “देखो, परमेश्वर मेरा उद्धार है, मैं भरोसा रखूँगा और न थरथराऊँगा; क्योंकि प्रभु यहोवा मेरा बल और मेरे भजन का विषय है, और वह मेरा उद्धारकर्ता हो गया है। तुम आनन्दपूर्वक उद्धार के सोतों से जल भरोगे” (यशायाह 12:2-3)।
अध्याय 6 पूरा हुआ
यहोवा