सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
बहुत अधिक, न कि बहुत कम

अध्याय 9 · 18 मिनट का पठन

बहुत अधिक, न कि बहुत कम

“परन्तु जहाँ पाप बहुत हुआ, वहाँ अनुग्रह उससे भी कहीं अधिक हुआ” (रोमियों 5:20)।

हमारे आत्मिक जीवन की बहुत-सी शान्ति इस बात पर निर्भर करती है कि हम बातों को किस दृष्टि से देखते हैं। हमारी दृष्टि वास्तविकता को नहीं बदलती, परन्तु वह इस बात को अवश्य बदल देती है कि हम उस वास्तविकता का अनुभव कैसे करते हैं। हमारी सुरक्षा उस पर टिकी है जो सचमुच सत्य है, परन्तु हमारी शान्ति उस पर टिकी है जिसे हम सत्य मानते हैं।

बाइबल में यीशु मसीह के उद्धार का वर्णन करने के लिये एक अभिव्यक्ति बार-बार आती है: “बहुत अधिक।” यह हमें बताती है कि मनुष्य की ऐसी कोई आवश्यकता नहीं जो उसके उद्धार से पूरी ही नहीं, वरन् “बहुत अधिक” पूरी न हो सके। फिर भी हम अक्सर यह सोचने की परीक्षा में पड़ जाते हैं कि “बहुत कम” कहना अधिक सच होगा—कि वास्तविक अनुभव में उद्धार हमारी आवश्यकताओं से बहुत कम पड़ता है। “बहुत कम” की यही दृष्टि हमारे आत्मिक जीवन को दुखी बना देती है।

यदि परमेश्वर के उद्धार की परिपूर्णता के विषय में हमने जो सीखा है वह सत्य है, तो “बहुत अधिक” ही वह एकमात्र भाषा होनी चाहिए जिसे हम बोलें। क्योंकि कुछ मसीही ऐसे चलते हैं मानो “बहुत कम” ही अधिक यथार्थ हो, इसलिए आओ, हम देखें कि बाइबल वास्तव में क्या कहती है। यदि परमेश्वर कहता है कि उसका उद्धार आवश्यकता से कहीं बढ़कर है, और हम हठ करते हैं कि वह कम है, तो हम उसे अविश्वसनीय ठहराते हैं और अपने ही लिये दुख गढ़ लेते हैं।

“बहुत कम” उन बातों की भाषा है जो दिखाई देती हैं; “बहुत अधिक” अनदेखी बातों की भाषा है।

“बहुत कम” अधिक तर्कसंगत लगता है, क्योंकि हमारी निर्बलता दिखाई देती है, जबकि परमेश्वर का सामर्थ्य अदृश्य है। हमारी आवश्यकताएँ ठीक हमारी आँखों के सामने हैं, जबकि परमेश्वर का प्रबन्ध छिपा हुआ है और उसे विश्वास के द्वारा ही पहचाना जा सकता है।

अनदेखी बातों को देखने के लिये हमें अपनी “भीतरी आँख” खुलवाने की आवश्यकता है—अर्थात् ऊपरी सतह के नीचे देखने की क्षमता।

यह आँख देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखती है, क्योंकि देखी हुई वस्तुएँ थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएँ सदा बनी रहती हैं। अब जीवन-मरण का प्रश्न यह है: क्या तुम में वह आँख खुल गई है?

2 इतिहास 32:1-15 की कहानी पर विचार करो। एक शत्रु ने यहूदा को कुचल डालने की धमकी दी थी। यह शत्रु हर दूसरी जगह सफल हुआ था, और उसे पूरा निश्चय था कि वह इस्राएल को भी जीत लेगा। परन्तु राजा हिजकिय्याह ने अनदेखे परमेश्वर की ओर देखा और पहचाना कि वह अधिक बलवन्त है। उसने प्रजा से कहा: “हियाव बाँधो और दृढ़ हो तुम न तो अश्शूर के राजा से डरो और न उसके संग की सारी भीड़ से, और न तुम्हारा मन कच्चा हो; क्योंकि जो हमारे साथ है, वह उसके संगियों से बड़ा है। उसका सहारा तो मनुष्य ही है परन्तु हमारे साथ, हमारी सहायता और हमारी ओर से युद्ध करने को हमारा परमेश्वर यहोवा है” (2 इतिहास 32:7-8)। एक ओर मनुष्य का बल था; दूसरी ओर, हमारा परमेश्वर यहोवा! कोई आश्चर्य नहीं कि प्रजा के लोगों का ढाढ़स बँध गया।

जब शत्रु राजा सन्हेरीब ने उनका विश्वास देखा, तो उसने उनका उपहास किया। उसने पूछा, “तब तुम्हारा देवता तुम को मेरे हाथ से बचा सके, इसकी सम्भावना तो और भी कितनी कम है?” क्योंकि किसी और देवता ने किसी और जाति को नहीं बचाया था।

“कितना कम”—सन्देह करने की कैसी परीक्षा थी! बात असम्भव दिखाई देती थी। परन्तु हिजकिय्याह ने प्रजा की आँखें अनदेखे पर लगाए रखीं, और यहोवा ने बड़ा छुटकारा दिया। शत्रु का “बहुत कम” एक “बहुत अधिक” विजय बन गया।

क्या हमें कभी ऐसा लगता है कि परमेश्वर हमें छुड़ाने में, अपनी प्रतिज्ञा की तुलना में, “बहुत कम” समर्थ है? क्या केवल प्रभु पर भरोसा रखना हमें किसी हताश अन्तिम उपाय जैसा लगता है? मैंने एक बार बड़े संकट में पड़े एक मसीही को निराश होकर यह कहते सुना, “अब मेरे पास प्रभु पर भरोसा रखने के सिवा और कुछ नहीं बचा।” उसके मित्र ने चौंककर उत्तर दिया, “क्या बात यहाँ तक आ पहुँची है?”

हो सकता है यह सुनकर हम सहम जाएँ, परन्तु सच कहें तो हम भी अक्सर ऐसा ही अनुभव करते हैं। फिर भी परमेश्वर के अनुग्रह के “बहुत अधिक” हर संकट के लिये पर्याप्त हैं। प्रेरित हमें बताता है कि परमेश्वर “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता है” (इफिसियों 3:20)। “बहुत अधिक” का अर्थ यही है। हम अद्भुत आशीषों की कल्पना कर सकते हैं, परन्तु परमेश्वर उनसे भी कहीं अधिक कर सकता है।

हमें बताया गया है कि “जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुनी, और जो बातें मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ी वे ही हैं, जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं” (1 कुरिन्थियों 2:9)। यदि उसने उससे भी अधिक तैयार किया है जिसकी हम कल्पना तक कर सकते हैं, तो निश्चय ही जिन बातों की हम कल्पना कर सकते हैं उनके लिये, और उनसे बहुत अधिक के लिये भी, हम उस पर भरोसा रख सकते हैं।

आओ, हम ठान लें कि हमारी भाषा विश्वास का “बहुत अधिक” होगी। “क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध से बहुत लोग मरे, तो परमेश्वर का अनुग्रह और उसका जो दान एक मनुष्य के, अर्थात् यीशु मसीह के अनुग्रह से हुआ बहुत से लोगों पर अवश्य ही अधिकाई से हुआ” (रोमियों 5:15)। यह मनुष्य की आवश्यकता की गहराइयों तक पहुँचता है।

हम निश्चित रूप से जानते हैं कि मृत्यु वास्तविक है; क्या हम उतने ही निश्चित हैं कि अनुग्रह उससे भी बहुत अधिक हुआ है? क्या हम विश्वास करते हैं कि उपाय रोग से बड़ा है?

हमारी सबसे गहरी आवश्यकताओं में से एक है उद्धार पाना। क्या इसके लिये कोई “बहुत अधिक” है? “परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा। तो जबकि हम, अब उसके लहू के कारण धर्मी ठहरे, तो उसके द्वारा परमेश्वर के क्रोध से क्यों न बचेंगे? क्योंकि बैरी होने की दशा में उसके पुत्र की मृत्यु के द्वारा हमारा मेल परमेश्वर के साथ हुआ, फिर मेल हो जाने पर उसके जीवन के कारण हम उद्धार क्यों न पाएँगे?” (रोमियों 5:8-10)।

उद्धार का प्रश्न इन्हीं “बहुत अधिक” वचनों से तय हो जाता है। जब मसीह ने कठिन भाग पूरा कर दिया—हमारे लिये तब मरा जब हम बैरी थे—तो अब, जब हम उसके मित्र हैं, हमें सम्भाले रखने का “छोटा” भाग वह निश्चय ही पूरा करेगा। जब उसने बड़ा काम कर दिया है, तो शेष काम वह और भी बहुत अधिक करेगा।

अब इन सब बातों में हमारे लिये व्यावहारिक बात यह है: क्या हम सचमुच इस पर विश्वास करते हैं? क्या हमने अपने उद्धार के विषय में सारे सन्देहों से छुटकारा पा लिया है? क्या हम क्षमा और अनन्त जीवन के विषय में निश्चय के साथ बोल सकते हैं? क्या हम अविश्वास की झिझक के साथ कहते हैं, “मुझे आशा है कि मैं परमेश्वर की सन्तान हूँ”; या हम अपने पिता परमेश्वर पर आनन्द-भरे भरोसे के साथ अपना सिर ऊँचा करके यूहन्ना के संग कहते हैं, “देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ, और हम हैं भी”? क्या इस विषय में हमारे साथ “बहुत अधिक” है, या “बहुत कम”?

हम पवित्र आत्मा के वरदान के लिये लालसा रखते और प्रार्थना करते हैं, परन्तु सब व्यर्थ-सा लगता है। हमें लगता है कि हमारी प्रार्थनाओं का उत्तर नहीं मिलता। परन्तु हमारे प्रभु ने इसके लिये विश्वास को थामे रहने के लिये एक अद्भुत “बहुत अधिक” दिया है: “अतः जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!” हम में से ऐसा कोई नहीं जो न जानता हो कि भले माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देने के लिये कितने उत्सुक और आनन्दित रहते हैं—कैसे वे अक्सर बच्चे के उन्हें लेने को तैयार होने से पहले ही, या यह जानने से भी पहले कि उसे उनकी आवश्यकता है, वे वस्तुएँ उस पर लाद देते हैं। और फिर भी हम में से कौन सचमुच विश्वास करता है कि परमेश्वर अपने माँगनेवालों को पवित्र आत्मा देने के लिये वास्तव में इससे “बहुत अधिक” उत्सुक है? क्या ऐसा नहीं है कि बहुत से लोग मन ही मन यह अनुभव करते हैं कि वह “बहुत कम” इच्छुक है, और इस अत्यन्त आवश्यक वरदान के लिये हमें गिड़गिड़ाना, विनती करना, संघर्ष करना और बाट जोहना पड़ेगा? यदि हम केवल इस “बहुत अधिक” पर विश्वास कर पाते, तो हमारा माँगना कितना विश्वास से भरा होता! तब हम सचमुच विश्वास कर पाते कि जो हमने माँगा था वह हमें सचमुच मिल गया, और पाते कि पवित्र आत्मा हमारे वर्तमान और व्यक्तिगत सहायक और मार्गदर्शक के रूप में वास्तव में हमारे पास है; और इस प्रतिज्ञा किए हुए वरदान के लिये हमारे सारे थका देनेवाले संघर्ष और तड़पती प्रार्थनाएँ समाप्त हो जातीं।

शायद किसी भी और आवश्यकता से अधिक पीड़ादायक हमारी यह आवश्यकता है कि हम पाप पर और परिस्थितियों पर जय पाएँ। न रुकनेवाले वाहनों के समान वे अदम्य शक्ति से हम पर चढ़ आते हैं और हमें धूल में कुचल देते हैं। और “बहुत कम” की भाषा ही वह एकमात्र भाषा जान पड़ती है जिसे हमारे प्राण बोलने का साहस करते हैं। परन्तु परमेश्वर ने इसके लिये हमें एक अत्यन्त विजयी “बहुत अधिक” दिया है: “क्योंकि जब एक मनुष्य के अपराध के कारण मृत्यु ने उस एक ही के द्वारा राज्य किया, तो जो लोग अनुग्रह और धर्मरूपी वरदान बहुतायत से पाते हैं वे एक मनुष्य के, अर्थात् यीशु मसीह के द्वारा अवश्य ही अनन्त जीवन में राज्य करेंगे।”

हमने पाप के द्वारा आनेवाली उस आत्मिक मृत्यु के राज्य को जाना है, और उसके अधिकार के नीचे कराहे हैं। परन्तु यीशु मसीह के द्वारा जीवन में उस “बहुत अधिक” राज्य करने को, जिसकी चर्चा प्रेरित करता है, हम कितना जानते हैं? अर्थात्, क्या अब हमारी जयें उन पराजयों से बढ़कर हैं जो पहले हमारी होती थीं? क्या हम बातों पर उससे “बहुत अधिक” राज्य करते हैं जितना वे कभी हम पर राज्य करती थीं?

मेरा आशय यह है: सुसमाचार में प्रतिज्ञा की गई है कि हम उन्हीं बातों पर “विजेता से भी बढ़कर हैं।” होंगे जिन्होंने कभी हमें जीत लिया था, और प्रश्न यह है कि क्या हम सचमुच ऐसे हैं। हजारों बातों ने हम पर राज्य किया है: मनुष्य के भय ने, हमारे अपने विचित्र स्वभाव ने, हमारी बाहरी परिस्थितियों ने, हमारे चिड़चिड़े मिज़ाज ने, यहाँ तक कि खराब मौसम ने भी, और हर प्रकार के वातावरण ने। जहाँ हमें राजा होना चाहिए था, वहाँ हम दास बने रहे। हमने अपने राज्य करने को “बहुत अधिक” के बदले “बहुत कम” पाया है। ऐसा क्यों है? केवल इसलिए कि मसीह में जो अनुग्रह की बहुतायत हमारी है, उसमें से हमने पर्याप्त “पाया” नहीं। हमने अविश्वास को अपने उचित अधिकार की वस्तुएँ हमसे छल से छीन लेने दिया है।

हम राजा होने के लिये बुलाए गए हैं और प्रभुता करने के लिये सृजे गए हैं, परन्तु यहाँ परमेश्वर घोषित करता है कि यह प्रभुता उस दासत्व से “बहुत अधिक” होगी जो पहले था; क्या हमने इसे ऐसा ही पाया है? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? कमी परमेश्वर की ओर से कदापि नहीं हो सकती। उसने विजय का “बहुत अधिक” प्रबन्ध करने में कोई चूक नहीं की। अवश्य है कि हम ही किसी न किसी रीति से उसका उपयोग करने में चूक गए हैं। और मैं यह विश्वास किए बिना नहीं रह सकती कि हमारी असफलता इस बात से उत्पन्न होती है कि हमने परमेश्वर के “बहुत अधिक” के स्थान पर अपना “बहुत कम” रख दिया है; और अपने अन्तरतम मन में यह विश्वास नहीं किया कि मसीह में धर्मरूपी वरदान में सचमुच इतनी पर्याप्तता है कि वह हमें राज्य करने के योग्य बना दे। हम अपने अविश्वास के कारण वह “अनुग्रह बहुतायत से” पाने में चूक गए हैं जो राज्य करने के लिये आवश्यक है।

तो फिर हमारा उपाय क्या है? केवल यही—अविश्वास के अपने “बहुत कम” को सदा के लिये त्याग देना, परमेश्वर की “बहुत अधिक” की घोषणा को सत्य मान लेना, और प्रतिज्ञा की हुई विजय पर तुरन्त अपना अधिकार जताना। और हमारे विश्वास के अनुसार हमारे लिये अवश्य होगा, और होकर ही रहेगा।

परन्तु परमेश्वर के उद्धार के “बहुत अधिक” के ये आश्वासन केवल हमारी आत्मिक आवश्यकताओं के लिये ही नहीं, वरन् हमारी सांसारिक आवश्यकताओं के लिये भी हैं। वह कहता है, पृथ्वी की बातों के विषय में चिन्ता न करो, क्योंकि “जब परमेश्वर मैदान की घास को, जो आज है, और कल भाड़ में झोंकी जाएगी, ऐसा वस्त्र पहनाता है, तो हे अल्पविश्वासियों, तुम को वह क्यों न पहनाएगा?”

मैं जानती हूँ कि बहुत से मसीहियों के लिये यह वचन और इसके जैसे दूसरे वचन इतने परिचित हो गए हैं कि उनका अर्थ लगभग जाता रहा है। परन्तु उनका सचमुच कुछ अर्थ है, और ऐसा अर्थ जो विश्वास करने के लिये लगभग बहुत ही अद्भुत है। वे हमें बताते हैं कि परमेश्वर अपने चारों ओर के विश्व की अपेक्षा हम मनुष्यों की “बहुत अधिक” चिन्ता करता है, और कि वह उसकी भी अपेक्षा हमारी बहुत अधिक रखवाली और हमारे लिये बहुत अधिक प्रबन्ध करेगा।

अविश्वसनीय, फिर भी सत्य! हमने कितनी ही बार विश्व के सुव्यवस्थित संचालन पर आश्चर्य किया है, और उस महान सृजनहार सामर्थ्य की प्रशंसा की है जिसने उसे बनाया और जो अब उसे चलाता है! परन्तु मेरे विचार में हम में से किसी ने भी कभी यह आवश्यक नहीं समझा कि विश्व का बोझ अपने कन्धों पर उठाए। हमने सृजनहार पर भरोसा रखा है कि वह हमारी सहायता के बिना सब कुछ सम्भाल लेगा। यद्यपि मुझे मानना पड़ता है कि जिस प्रकार कुछ लोग सृजनहार के प्रबन्ध में दोष निकालते हैं, और जो सलाह वे अपनी प्रार्थनाओं में उसे देना आवश्यक समझते हैं, उससे तो कोई यही सोचेगा कि सारा बोझ उन्हीं पर टिका है!

परन्तु जहाँ हमने पूरी रीति से यह पहचान भी लिया है कि विश्व पूर्णतः परमेश्वर की देखभाल में है, वहाँ भी हम यह देखने से चूक गए हैं कि हम भी वहीं हैं, और हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा कि यह सच हो सकता है कि जितनी वह विश्व की चिन्ता करता है, उससे “बहुत अधिक” वह हमारी चिन्ता करेगा। हमने अपनी परिस्थितियों और अपने आस-पास की दिखाई देनेवाली बातों को, और अपनी आवश्यकता की विशालता और अपनी निस्सहायता को देखा है, और चिन्तित और भयभीत हुए हैं। हमने अपनी देखभाल का बोझ अपने ऊपर लाद लिया है, और अपने अविश्वास में यह अनुभव किया है कि आकाश के पक्षियों और मैदान के सोसनों से “बहुत अधिक” मूल्य रखने के बदले, वास्तव में हमारा मूल्य उनसे असीम रूप से “बहुत कम” है; और हमें लगता है कि जो परमेश्वर उनकी चिन्ता करता है, वह हमारी चिन्ता करेगा, इसकी सम्भावना बिल्कुल नहीं। हम भजनकार के साथ कहते हैं: “जब मैं आकाश को, जो तेरे हाथों का कार्य है, और चन्द्रमा और तरागण को जो तूने नियुक्त किए हैं, देखता हूँ; तो फिर मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखे, और आदमी क्या है कि तू उसकी सुधि ले?” महान और विशाल विश्व की तुलना में मनुष्य कितना तुच्छ, कितना नगण्य, कितना मूल्यहीन जान पड़ता है; हम पूछते हैं, वह क्या है कि परमेश्वर उसकी सुधि ले? और फिर भी परमेश्वर घोषित करता है कि वह सचमुच उसकी सुधि लेता है, और यहाँ तक कि विश्व से भी बहुत अधिक उसकी चिन्ता करता है। स्मरण रखो, बहुत अधिक, न कि बहुत कम। इसलिए अपने विषय में चिन्ता का हर विचार तुरन्त इस सीधी-सादी समझ की बात से कुचल दिया जाना चाहिए कि, जब हम विश्व के विषय में चिन्ता करने जैसे मूर्ख नहीं हैं, तो हमें अपने विषय में चिन्ता करके उससे भी कहीं बड़े मूर्ख नहीं बनना चाहिए।

पहाड़ी उपदेश में हमारा प्रभु हमें सब में सबसे श्रेष्ठ “बहुत अधिक” देता है। “तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी माँगे, तो वह उसे पत्थर दे? या मछली माँगे, तो उसे साँप दे? अतः जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा!”

इस “बहुत अधिक” में हमें हर आवश्यकता की पूर्ति की निश्चितता मिलती है। जो कुछ हमारा पिता हमारे लिये अच्छा देखता है, उसकी यहाँ बहुतायत से प्रतिज्ञा की गई है। और हमें विश्वास दिलाने के लिये जो दृष्टान्त दिया गया है, वह सब पर लागू होता है। जीवन के सब वर्गों और दशाओं में, सब जातियों में, और पक्षियों और पशुओं के हृदयों में भी, माता की सहज प्रवृत्ति अपनी सन्तान के लिये, जितना उत्तम वह कर सके, उसका प्रबन्ध करने से कभी नहीं चूकती।

जीवन की किसी भी दशा में कोई माता, जब तक वह बेहद दुष्ट न हो, रोटी माँगे जाने पर पत्थर, या मछली माँगे जाने पर साँप नहीं देगी। और क्या हमारा परमेश्वर, जिसने माता का हृदय रचा, एक माता से भी बुरा हो सकता है? नहीं, नहीं, हजार बार नहीं! वह जो करेगा वह “बहुत अधिक” है, आह, सबसे कोमल माता जो कर सकती है उससे भी कितना अधिक। और यदि माताएँ अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ “देना जानती” हैं, जैसा कि वे निश्चय ही जानती हैं, तो वह “कितना अधिक” जानता है। परन्तु क्या हम सचमुच इस “बहुत अधिक” पर विश्वास करते हैं? बिस्तर पर चिन्ता में करवटें बदलते हमारे घण्टे इसका उत्तर दें। यदि परमेश्वर सचमुच हमें अच्छी वस्तुएँ देने के लिये उससे बहुत अधिक इच्छुक और समर्थ है जितना माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देने के लिये होते हैं, तो हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर के विषय में सन्देह या चिन्ता की हर सम्भावना सदा के लिये मिट जानी चाहिए। जब हम माँगें, तो सब “अच्छी वस्तुएँ” हमें उतनी ही निश्चितता से दी जानी चाहिए जितनी निश्चितता से समर्थ माता अपने बच्चे को, जब वह उससे रोटी माँगता है, खिलाती है। क्या मैं कहूँ, उतनी ही निश्चितता से? आह, प्रिय मित्रो, उससे कहीं अधिक निश्चितता से। क्योंकि वचन यह है, “तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता कितना अधिक।”

हम में से किसने इस “कितना अधिक” के अर्थ की थाह पाई है? परन्तु कम से कम इसका अर्थ यह तो अवश्य है कि आवश्यकता की पुकार को सुनने और उसका उत्तर देने की सारी मानवीय तत्परता परमेश्वर की तत्परता का केवल एक धुँधला चित्र हो सकती है, और इसलिए हम फिर कभी सन्देह करने का साहस नहीं कर सकते। और यदि माता-पिता रोटी के बदले पत्थर नहीं देंगे, तो वह भी नहीं देगा; इसलिए जब हम माँगें, तो हमें पूरा निश्चय होना चाहिए कि जिस “अच्छी वस्तु” के लिये हमने माँगा था वह हमें मिल रही है, चाहे जो हमें मिले वह वैसी दिखाई दे या न दे।

संत ऑगस्टीन की माता ने अपने पुत्र के मन-परिवर्तन की लालसा में प्रार्थना की कि वह रोम न जाए, क्योंकि वह वहाँ की परीक्षाओं से डरती थी। परमेश्वर ने उसे उत्तर इस प्रकार दिया कि उसे रोम भेज दिया, ताकि वहीं उसका मन-परिवर्तन हो। जिन बातों को हम अच्छा कहते हैं वे अक्सर परमेश्वर की दृष्टि में बुरी होती हैं, और जो हमारी दृष्टि में बुरा है वह उसकी दृष्टि में अच्छा है। परन्तु बातें चाहे जैसी दिखाई दें, हम सदा जानते हैं कि परमेश्वर अवश्य ही सर्वोत्तम देगा, क्योंकि वह परमेश्वर है और इसके सिवा और कुछ कर ही नहीं सकता।

“जिसने अपने निज पुत्र को भी न रख छोड़ा, परन्तु उसे हम सब के लिये दे दिया, वह उसके साथ हमें और सब कुछ क्यों न देगा?” जब उसने हमें मसीह देकर सबसे बड़ा काम कर दिया है, तो उसके साथ हमें सब कुछ देकर छोटा काम वह “बहुत अधिक” करेगा। और फिर भी हम परमेश्वर की अपनी सन्तानों को लगातार अपनी आत्मिक दरिद्रता और आत्मिक भूख की दशा के विषय में शिकायत करते सुनते हैं। कभी-कभी तो ऐसा भी लगता है कि वे इसे भक्ति की बात और सच्ची दीनता का चिन्ह समझते हैं। परन्तु यह परमेश्वर के “बहुत अधिक” पर घमण्ड करने के बदले अपने अविश्वास के “बहुत कम” पर घमण्ड करने के सिवा और क्या है?

“ओह, मैं तो ऐसा दीन-हीन प्राणी हूँ,” एक बार जब परमेश्वर की एक सन्तान को विश्वास की विजय की ओर बढ़ने का आग्रह किया गया, तो मैंने उसे सचमुच आत्म-सन्तोष के साथ यह कहते सुना; “मैं ऐसा दीन-हीन प्राणी हूँ कि उन ऊँचाइयों तक पहुँचने की आशा नहीं कर सकता जहाँ तुम जैसे बड़े मसीही पहुँचते हैं।” “दीन-हीन प्राणी,” सचमुच; निस्सन्देह तुम हो, और हम सब भी हैं!

परन्तु परमेश्वर दीन-हीन नहीं है, और तुम्हारी आवश्यकताओं को पूरा करना उसका काम है, न कि उसकी आवश्यकताओं को पूरा करना तुम्हारा। अविश्वास चाहे जो कहे, परमेश्वर “सब प्रकार का अनुग्रह तुम्हें बहुतायत से दे सकता है। जिससे हर बात में और हर समय, सब कुछ, जो तुम्हें आवश्यक हो, तुम्हारे पास रहे, और हर एक भले काम के लिये तुम्हारे पास बहुत कुछ हो।” “सब,” “हर समय,” “हर एक”—ये कितने सर्वव्यापी शब्द हैं! ये हमारी आवश्यकताओं को उनकी अन्तिम सीमा तक समेट लेते हैं और किसी प्रश्न के लिये कोई स्थान नहीं छोड़ते। ऐसी घोषणाओं के सामने हम कैसे, हम किस साहस से, फिर कभी सन्देह या प्रश्न कर सकते हैं?

परमेश्वर के इन “बहुत अधिक” वचनों में छिपे अनुग्रह के आश्चर्यकर्मों को हमने केवल छुआ भर है। इस जीवन में हम उनके अर्थ को कभी समाप्त नहीं कर सकते। परन्तु आओ, कम से कम यह ठान लें कि अब से हम उद्धार के सब पहलुओं के विषय में अविश्वास के हर “बहुत कम” को उतार फेंकेंगे। अपनी घोर निर्बलता, पापमयता और आवश्यकता की गहराइयों में से, आओ, हम जयवन्त विश्वास के साथ, सदा और सर्वत्र, परमेश्वर के अनुग्रह के महान “बहुत अधिक” की घोषणा करें!

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