सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
उसने उनसे पिता के विषय में बातें कीं

अध्याय 5 · 20 मिनट का पठन

उसने उनसे पिता के विषय में बातें कीं

“वे न समझे कि हम से पिता के विषय में कहता है।” यूहन्ना 8:27 परमेश्वर के सबसे अधिक प्रकाश देनेवाले नामों में से एक वह नाम है जिसे हमारे प्रभु यीशु मसीह ने विशेष रूप से प्रकट किया—पिता का नाम। मैं कहती हूँ कि इसे विशेष रूप से मसीह ने प्रकट किया, क्योंकि यद्यपि युगों-युगों से परमेश्वर को बहुत से दूसरे नामों से पुकारा जाता रहा था, जो उसके चरित्र के दूसरे पहलुओं को प्रकट करते थे, तौभी केवल मसीह ही ने उसे हम पर पिता के उस नाम से प्रकट किया है जिसमें सब कुछ समाया हुआ है—एक ऐसा नाम जिसमें बुद्धि और सामर्थ्य के, और सबसे बढ़कर प्रेम और भलाई के, सब दूसरे नाम आ जाते हैं; एक ऐसा नाम जो हमारी सारी आवश्यकताओं को पूरी रीति से पूरा करता है। मसीह, जो पिता की उपस्थिति में रहनेवाला एकलौता पुत्र था, अकेला ही इस नाम को प्रकट कर सकता था, क्योंकि केवल वही पिता को जानता था।

“जिस तरह पिता मुझे जानता है, और मैं पिता को जानता हूँ।” (यूहन्ना 10:15) “यह नहीं, कि किसी ने पिता को देखा है परन्तु जो परमेश्वर की ओर से है, केवल उसी ने पिता को देखा है।” (यूहन्ना 6:46) पुराने नियम में परमेश्वर पिता के रूप में उतना प्रकट नहीं हुआ जितना एक महान योद्धा के रूप में, जो अपने लोगों के लिये लड़ता है, या एक पराक्रमी राजा के रूप में, जो उन पर राज्य करता और उनकी देखभाल करता है। वहाँ उसे पिता का नाम बहुत ही थोड़ी बार दिया गया है, अधिक से अधिक छः या सात बार; जबकि नये नियम में इसका प्रयोग लगभग दो या तीन सौ बार हुआ है। मसीह, जो उसे जानता था, अकेला ही उसे प्रकट कर सकता था। “पिता कौन है यह भी कोई नहीं जानता, केवल पुत्र के और वह जिस पर पुत्र उसे प्रकट करना चाहे।” (लूका 10:22) तो फिर, हम में से हर एक के सामने जो मूल प्रश्न खड़ा है, वह यह है कि क्या हम व्यक्तिगत रूप से यह समझते हैं कि मसीह हम से पिता के विषय में कहता है। हम जानते हैं कि वह पिता शब्द का निरन्तर प्रयोग करता है, परन्तु क्या हम सचमुच समझते हैं कि उस शब्द का अर्थ क्या है? क्या हमें इस बात की तनिक भी समझ है कि पिता कैसा है? मुझे पूरा निश्चय है कि परमेश्वर की इतनी सारी सन्तानों के आत्मिक जीवन में जितनी बेचैनी और अशान्ति है, वह सब इसी एक बात से आती है—कि वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर सचमुच और व्यक्तिगत रूप से उनका पिता है। वे उसे एक कठोर न्यायी, या एक निर्दयी काम करानेवाला स्वामी, या अधिक से अधिक एक ऐसे दूर के और अगम्य अधिकारी के रूप में सोचते हैं जो बहुत दूर बैठा हुआ एक डरे हुए और काँपते हुए संसार के लिये कठोर नियम जारी करता रहता है; और इस डर में कि कहीं वे उसकी माँगें पूरी करने में चूक न जाएँ, वे मुश्किल से जानते हैं कि किधर मुड़ें। परन्तु ऐसे परमेश्वर की, जो पिता है—कोमल, प्रेमी और करुणा से भरा हुआ—ऐसे परमेश्वर की, जो एक पिता के समान सारे जगत के विरुद्ध उनके पक्ष में खड़ा रहता है, उन्हें कोई सच्ची समझ नहीं है।

मैं यह कहने से नहीं डरती कि जो लोग यह जान लेते हैं कि परमेश्वर सचमुच उनका पिता है, उनके लिये बेचैनी और भीतरी अशान्ति असम्भव है।

परन्तु आगे बढ़ने से पहले मुझे यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि मैं ऐसे पिता की बात कर रही हूँ जैसा हमारी सबसे ऊँची स्वाभाविक समझ हमें बताती है कि एक भले पिता को होना चाहिए। कभी-कभी पृथ्वी के पिता निर्दयी, कठोर, स्वार्थी, यहाँ तक कि क्रूर भी होते हैं, या वे केवल उदासीन और लापरवाह होते हैं; परन्तु इनमें से किसी को भी किसी सच्चे अर्थ में भला पिता नहीं कहा जा सकता। परन्तु परमेश्वर, जो भला है, अवश्य ही भला पिता होगा, नहीं तो वह पिता है ही नहीं।

हम सबने इस संसार में भले पिताओं को देखा है, या कम से कम उनकी कल्पना कर सकते हैं। मैं एक ऐसे पिता को जानती थी, और उन्होंने अपने सुन्दर पितृत्व से मेरे बचपन को उजियाले से भर दिया। मुझे आज भी साफ़-साफ़ याद है कि मैं किस भरोसे और आनन्द के साथ हर दिन जीती थी, इस ज्ञान में पूरी तरह सुरक्षित कि मेरा एक पिता है। और मुझे निश्चय है कि उस पृथ्वी के पिता के साथ अपने अनुभव के द्वारा मैंने परमेश्वर के सिद्ध पितृत्व के विषय में कुछ समझा है।

परन्तु परमेश्वर केवल पिता ही नहीं है; उसका वर्णन ऐसे रूपों में भी किया गया है जिनमें पिता और माता दोनों के गुण झलकते हैं, और हम सबने ऐसी माताओं को देखा है जिनके प्रेम और कोमलता की कोई सीमा नहीं। यह निश्चित है कि जिस परमेश्वर ने उन दोनों को बनाया, और जिसमें माता-पिता के प्रेम की सारी परिपूर्णता समाई हुई है, वह कभी ऐसे पृथ्वी के पिता और माताएँ नहीं बना सकता था जो उससे अधिक कोमल या अधिक प्रेम करनेवाले हों। इसलिए, यदि हम समझना चाहते हैं कि वह कैसा पिता है, तो हमें उन सब पिताओं और माताओं के सबसे अच्छे गुणों को इकट्ठा करना होगा जिन्हें हमने कभी जाना है या जिनकी हम कल्पना कर सकते हैं, और यह पहचानना होगा कि यह भी स्वर्ग में रहनेवाले हमारे पिता परमेश्वर की केवल एक धुँधली-सी झलक है।

जब हमारा प्रभु अपने चेलों को प्रार्थना करना सिखा रहा था, तो जिस नाम से उसने उन्हें परमेश्वर को पुकारने की शिक्षा दी, वह यह था: “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए।” (मत्ती 6:9) इससे साफ़ प्रकट होता है कि हमें उसके विषय में इसी रीति से सोचना है। सदियों से परमेश्वर की सन्तानों ने हर जगह लाखों-करोड़ों बार यह नाम लिया है; तौभी इसे कितनी गहराई से समझा गया है? यदि वे सब, जिन्होंने यह नाम लिया, सचमुच इसका अर्थ समझते, तो यह असम्भव होता कि उसके चरित्र की वे गलत तस्वीरें और उसके प्रेम और देखभाल पर वे सन्देह, जिन्होंने इतिहास भर उसकी सन्तानों के हृदयों को व्याकुल किया है, कभी जड़ पकड़ पाते। अत्याचार, निर्दयता और उपेक्षा शायद ऐसे परमेश्वर पर थोपी जा सकती थीं जिसका नाम केवल राजा, न्यायी या व्यवस्था देनेवाला होता; परन्तु ऐसे परमेश्वर के विषय में, जो सबसे पहले और सबसे बढ़कर पिता है, और परमेश्वर होने के कारण अवश्य ही भला पिता है, ऐसे विचार उचित रूप से नहीं रखे जा सकते। इसके अतिरिक्त, क्योंकि वह “अनन्तकाल का पिता” है, इसलिए अपने स्वभाव ही से उसे सब परिस्थितियों में सदा वैसा ही करना होगा जैसा एक भले पिता को करना चाहिए, और कभी उसके विपरीत नहीं। यह सोचा भी नहीं जा सकता कि एक भला पिता अपनी सन्तानों को भूल जाए, उनकी उपेक्षा करे या उनके साथ अन्याय करे। एक दुष्ट या लापरवाह पिता ऐसा कर सकता है, परन्तु एक भला पिता कभी नहीं करेगा। और अपने परमेश्वर को पिता के धन्य नाम से पुकारते हुए हमें यह पहचानना चाहिए कि यदि वह पिता है ही, तो वह सब पिताओं में सबसे उत्तम पिता होगा, और उसका पितृत्व पितृत्व के उस सबसे ऊँचे आदर्श को प्रकट करता होगा जिसकी हम कल्पना कर सकते हैं।

यह ऐसा पितृत्व है जिसमें पिता और माता दोनों के सबसे ऊँचे आदर्श एक साथ मिले हुए हैं, और जिसमें वह सारा प्रेम, कोमलता, करुणा, लालसा और आत्म-बलिदान समाया हुआ है जिसे हम उचित रूप से माता-पिता होने से जोड़ते हैं, यद्यपि हम इन्हें पृथ्वी के माता-पिता में सदा सिद्ध रूप से प्रकट होते नहीं देखते।

परन्तु तुम पूछ सकते हो कि परमेश्वर के दूसरे नामों का क्या—क्या वे अधिक भयानक विचार नहीं जगाते? वे केवल इसलिए ऐसा करते प्रतीत होते हैं क्योंकि यह नहीं समझा जाता कि पिता का यह धन्य नाम उन सबकी नींव में है।

यही नाम उन सब दूसरे नामों की नींव होना चाहिए जिनसे वह जाना जाता है। क्या उसे न्यायी कहा गया है? हाँ, परन्तु वह पिता-न्यायी है, जो वैसे ही न्याय करता है जैसे एक प्रेमी पिता करेगा। क्या वह राजा है?

हाँ, परन्तु वह ऐसा राजा है जो अपनी प्रजा का पिता भी है, और एक पिता की कोमलता से उन पर राज्य करता है। क्या वह व्यवस्था देनेवाला है? हाँ, परन्तु वह ऐसा व्यवस्था देनेवाला है जो एक पिता के समान व्यवस्था देता है, और अपनी सन्तानों की निर्बलता और अज्ञानता को ध्यान में रखता है। “जैसे पिता अपने बालकों पर दया करता है, वैसे ही यहोवा अपने डरवैयों पर दया करता है। क्योंकि वह हमारी सृष्टि जानता है; और उसको स्मरण रहता है कि मनुष्य मिट्टी ही है।” (भजन संहिता 103:13-14) हमें कभी, कभी भी परमेश्वर के विषय में “हमारे पिता” के सिवाय किसी और रूप में नहीं सोचना चाहिए। उससे जुड़े हुए सब दूसरे गुण “हमारे पिता” के इसी सत्य पर आधारित और इसी से ढले हुए होने चाहिए। जो एक भला पिता नहीं कर सकता, उसे परमेश्वर भी, जो हमारा पिता है, नहीं कर सकता; और जो एक भले पिता को करना चाहिए, उसे परमेश्वर, जो हमारा पिता है, निश्चय ही करेगा।

यूहन्ना 17 में अपनी अन्तिम प्रार्थना में हमारा प्रभु कहता है कि उसने पिता का नाम हमें बताया है, ताकि हम यह अद्भुत सत्य जान लें कि पिता हम से वैसा ही प्रेम रखता है जैसा उसने अपने पुत्र से रखा।

अब हम में से कौन सचमुच इस पर विश्वास करता है? हमने यह अध्याय कई बार पढ़ा होगा, शायद बाइबल के लगभग किसी भी दूसरे अध्याय से अधिक बार, तौभी क्या हम सचमुच विश्वास करते हैं कि यह अक्षरशः सच है कि परमेश्वर हम से उतना ही प्रेम रखता है जितना उसने मसीह से रखा? यदि हम सचमुच इस पर विश्वास करते, तो क्या हमारे मन में फिर कभी कोई चिन्ता भरा या विद्रोही विचार आ सकता था? क्या हम हर परिस्थिति में पूरी तरह और पूर्ण रूप से निश्चिन्त न रहते कि वह ईश्वरीय पिता, जो हम से उतना ही प्रेम रखता है जितना उसने अपने एकलौते पुत्र, हमारे प्रभु यीशु मसीह से रखा, सबसे अच्छी रीति से हमारी देखभाल करेगा? और क्या यही कारण नहीं कि वह पुत्र हमें इतनी स्पष्टता से सिखाता है कि हम किसी भी बात की चिन्ता न करें और न घबराएँ, क्योंकि वह अपने पिता को जानता है और जानता है कि उस पर पूरा-पूरा भरोसा रखना बिलकुल सुरक्षित है?

यह बहुत ध्यान देने योग्य है कि उसने इतनी बार कहा, “तुम्हारा स्वर्गीय पिता,” केवल मेरा ही नहीं, परन्तु तुम्हारा भी। “तुम्हारा स्वर्गीय पिता” आकाश के पक्षियों और मैदान के सोसनों के फूलों की सुधि लेता है, और इसलिए वह निश्चय ही तुम्हारी भी सुधि लेगा, जो बहुत से पक्षियों से कहीं अधिक मूल्य रखते हो। तो फिर हमारा चिन्ता करना और घबराना कितनी मूर्खता है, जबकि मसीह ने हमें बता दिया है कि हमारा स्वर्गीय पिता जानता है कि हमें ये सब वस्तुएँ चाहिए! क्योंकि भला पिता होने के कारण, जब वह हमारी आवश्यकताएँ जानता है, तो अपने स्वभाव ही से उसे हमारे लिये प्रबन्ध करना ही होगा।

हमें क्या हो गया है कि हम यह बात नहीं समझते?

फिर, हमारा प्रभु पृथ्वी के पिताओं की तुलना हमारे स्वर्गीय पिता से करता है—यह दिखाने के लिये नहीं कि हमारा स्वर्गीय पिता उनसे कितना कम भला और कम प्रेमी है, परन्तु यह कि वह कितना अधिक है। “तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उससे रोटी माँगे, तो वह उसे पत्थर दे? या मछली माँगे, तो उसे साँप दे? ...

तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने माँगनेवालों को अच्छी वस्तुएँ क्यों न देगा?”

(मत्ती 7:9-11) क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि पृथ्वी का कोई भला पिता अपने भूखे बच्चे को रोटी या मछली के बदले पत्थर या साँप दे? ऐसे विचार से ही हमारा हृदय काँप उठेगा। तौभी परमेश्वर की सन्तानों में से बहुत से लोग यह मानते प्रतीत होते हैं कि उनका स्वर्गीय पिता उनके साथ ऐसा ही व्यवहार करता है—जब वे रोटी माँगते हैं तो उन्हें पत्थर देता है, या जब वे आशीष माँगते हैं तो उन्हें कठिनाई देता है। और इनमें से कुछ लोग ऐसी संस्थाओं के सदस्य भी हो सकते हैं जो बच्चों को क्रूरता से बचाने के लिये बनी हैं—तौभी उन्होंने इस बात की गम्भीरता पर विचार नहीं किया कि वे अपने स्वर्गीय पिता पर ठीक उन्हीं बातों का दोष लगा रहे हैं जिनके लिये वे पृथ्वी के पिताओं को दोषी ठहराते।

परन्तु हमारा स्वर्गीय पिता हमें अच्छी वस्तुएँ देने के लिये केवल राज़ी ही नहीं है—वह इससे कहीं बढ़कर उत्सुक है।

हमारा प्रभु कहता है, “हे छोटे झुण्ड, मत डर; क्योंकि तुम्हारे पिता को यह भाया है, कि तुम्हें राज्य दे।” (लूका 12:32) उसके देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है; देना उसे भाता है। उसे ऐसा करने में आनन्द मिलता है। तुम राज्य को पाने की जितनी इच्छा रखते हो, उससे कहीं अधिक इच्छा वह तुम्हें उसे देने की रखता है।

हम में से जो माता-पिता हैं, वे जानते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएँ देने के लिये कितने उत्सुक रहते हैं, अकसर उनके लेने की उत्सुकता से भी अधिक; और इससे हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि हमें राज्य देना परमेश्वर को कैसे भाता है। तो फिर हम डर और झिझक के साथ उसके पास क्यों आते हैं, और क्यों चिन्ता से अपने आप को व्याकुल करते हैं, मानो वह हमारी आवश्यकता की वस्तुएँ देने में चूक जाएगा?

इसका केवल एक ही उत्तर हो सकता है: हम सचमुच पिता को नहीं जानते।

हमें “परमेश्वर के घराने” का अंग बताया गया है। पवित्रशास्त्र सिखाता है कि यदि कोई अपने घराने की चिन्ता न करे, तो वह “विश्वास से मुकर गया है, और अविश्वासी से भी बुरा बन गया है।” (1 तीमुथियुस 5:8) क्योंकि हम परमेश्वर के घराने के हैं, इसलिए यह सिद्धान्त उस पर भी लागू होता है; और यदि वह हमारे लिये प्रबन्ध करने में चूक जाए, तो उसके अपने ही वचन उसके विरुद्ध खड़े होंगे। मैं यह बात श्रद्धा के साथ, परन्तु स्पष्टता से भी, कहती हूँ, क्योंकि बहुत ही थोड़े लोगों ने इसे समझा प्रतीत होता है।

मेरे अपने अनुभव में एक निर्णायक घड़ी आई, जब मैंने पहली बार स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता के उत्तरदायित्व के विषय में यह सत्य समझा। ऐसा लगा मानो एक ही क्षण में जीवन का बोझ मेरे कन्धों से उठाकर उसके कन्धों पर रख दिया गया हो, और मेरे सारे डर, चिन्ताएँ और अनिश्चितताएँ उसकी प्रेममय देखभाल की गहराई में सौंप दी गई हों। मैंने जाना कि मनुष्य की वह स्वाभाविक प्रवृत्ति, जो माता-पिता से अपनी सन्तान की देखभाल की अपेक्षा रखती है, केवल संस्कृति की देन नहीं, वरन् परमेश्वर की ओर से रोपी गई है। उसका उद्देश्य हमें यह सिखाना है कि सृष्टिकर्ता, जिसने मनुष्य के माता-पिता को उनकी सन्तान के लिये उत्तरदायी ठहराया है, स्वयं भी अपनी सन्तान के लिये उतना ही उत्तरदायी है। मैं आनन्द से जयजयकार कर सकती थी। उसी क्षण से मेरे बोझ विश्राम में बदल गए। क्योंकि जब यह समझ किसी व्यक्ति को मिलती है, तो उस व्यक्ति को अवश्य ही विश्राम में प्रवेश करना पड़ता है।

ऐसे परमेश्वर के साथ, जो साथ ही साथ पिता भी है, विश्राम के सिवाय किसी और बात के लिये कोई स्थान नहीं। और उस आनन्दमय खोज के बाद से जब कभी सन्देह, चिन्ता या डर की परीक्षाएँ उठी हैं, तब मैंने जो कुछ सीखा है उसके प्रकाश में उनकी बात सुनने से इनकार किया है, क्योंकि मैं पहचानती हूँ कि ऐसा करना स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता की विश्वासयोग्यता पर प्रश्न उठाना होगा।

हो सकता है कि हम यह सोचने के आदी रहे हों कि हमारे सन्देह और डर हमारी अपनी अयोग्यता से उपजते हैं और दीनता का चिह्न हैं। हमने उन्हें विशेष भक्ति का प्रमाण भी मान लिया होगा, और सोचा होगा कि किसी रीति से वे परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं। परन्तु यदि बच्चे अपने पृथ्वी के माता-पिता के साथ अपने सम्बन्ध में उनके प्रेम पर सन्देह करने लगें, और डरें कि कहीं उनकी देखभाल में चूक न हो जाए, तो क्या वे सन्देह और डर सच्चे प्रेम और आदर को प्रकट करेंगे? क्या उनसे उनके माता-पिता प्रसन्न होंगे?

यदि परमेश्वर हमारा पिता है, तो सन्देहों, डरों और चिन्ता भरे विचारों के साथ हम केवल एक ही काम कर सकते हैं: उन्हें पूरी तरह अपनी पीठ के पीछे फेंक दें और फिर कभी उन्हें स्थान न दें। हम ऐसा कर सकते हैं। हम अपने सन्देहों को वैसे ही छोड़ सकते हैं जैसे हम किसी को कोई हानिकारक आदत छोड़ने के लिये समझाते। यदि हम सचमुच देख लें कि हमारे सन्देह परमेश्वर के विरुद्ध पाप हैं और उसकी विश्वासयोग्यता पर प्रश्न उठाते हैं, तो हम उन्हें त्यागने के लिये उत्सुक होंगे।

हो सकता है कि पहले हमने अपने सन्देहों को इसलिए पकड़े रखा हो क्योंकि हम सोचते थे कि वे हमारे विश्वास का अंग हैं और अपने आप को अयोग्य समझनेवाले व्यक्ति के लिये उचित मनोभाव हैं। परन्तु यदि अब हम देखते हैं कि परमेश्वर सचमुच हमारा पिता है, तो हम हर सन्देह को घृणा के साथ ठुकरा देंगे, यह पहचानते हुए कि वह उसके प्रेम और देखभाल की निन्दा है।

किसी भी प्राण को इससे बढ़कर और क्या चाहिए कि उसका ऐसा परमेश्वर हो जिसका नाम “हमारा पिता” है, और जिसका चरित्र उस नाम के अनुरूप है? जैसा फिलिप्पुस ने कहा, “हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे: यही हमारे लिये बहुत है” (यूहन्ना 14:8)। और सचमुच, यह बहुत है—शब्दों में कहे जा सकने से कहीं बढ़कर।

मेरी एक सहेली एक बार फिलाडेल्फिया के सबसे गरीब इलाकों में से एक में रहनेवाली एक गरीब स्त्री से मिलने गई, जिसकी दशा के विषय में बताया गया था कि वह बड़ी तंगी में है। उसने वहाँ की हालत आशा से भी बुरी पाई। वह स्त्री बूढ़ी थी, गठिया से अपंग थी, और एक छोटे से कंगाल कमरे में अकेली रहती थी, जहाँ उसे केवल कभी-कभार एक दयालु पड़ोसी से सहायता मिल जाती थी। तौभी वह प्रसन्नचित्त और कृतज्ञता से भरी हुई थी।

मेरी सहेली को आश्चर्य हुआ कि ऐसी परिस्थितियों में ऐसा आनन्द हो सकता है, और उसने पूछा, “क्या आपको कभी डर नहीं लगता, जब आप सोचती हैं कि यहाँ अकेले और ऐसी दशा में रहते हुए आपके साथ क्या हो सकता है?”

उस स्त्री ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा और कहा, “डर? अरे, क्या तुम नहीं जानतीं कि मेरा एक पिता है, और क्या तुम नहीं जानतीं कि वह हर समय मेरी देखभाल करता है?” फिर मेरी सहेली की उलझन देखकर उसने कोमलता से इतना और कहा, “निश्चय ही मेरा पिता तुम्हारा भी पिता है, और तुम उसे जानती हो, और तुम जानती हो कि वह सदा अपनी सन्तानों की देखभाल करता है।” यह एक ऐसा पाठ था जिसे मेरी सहेली कभी नहीं भूली।

“देखो, पिता ने हम से कैसा प्रेम किया है, कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ, और हम हैं भी” (1 यूहन्ना 3:1)। हमें दिया गया प्रेम एक पिता का अपनी सन्तान के प्रति प्रेम है—एक कोमल, रक्षा करनेवाला प्रेम, जो हमारी निर्बलता और हमारी आवश्यकताओं को समझता है और उसी के अनुसार हमारी देखभाल करता है। वह हमसे सन्तान के समान व्यवहार करता है, और बदले में वह केवल यही चाहता है कि हम उसके साथ ऐसे पिता के समान व्यवहार करें जिस पर हम बिना किसी चिन्ता के भरोसा कर सकें।

हमें सन्तान का स्थान लेना होगा—आश्रित और भरोसा रखनेवाली सन्तान का—और उसे पिता का स्थान लेने देना होगा—देखभाल करनेवाले और उत्तरदायी पिता का। क्योंकि हम सन्तान हैं और वह पिता है, इसलिए हमें उसे पिता का काम करने देना चाहिए। अकसर हम वह भूमिका अपने ऊपर ले लेते हैं और अपनी आवश्यकताओं की चिन्ता और प्रबन्ध स्वयं करने का प्रयत्न करते हैं। परन्तु पृथ्वी का कोई भी भला पिता यह नहीं चाहेगा कि उसकी सन्तान उसके उत्तरदायित्व उठाए, और निश्चय ही हमारा स्वर्गीय पिता भी नहीं चाहेगा कि हम उसके उत्तरदायित्व उठाएँ।

कोई आश्चर्य नहीं कि हमसे कहा गया है, “अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7)। निश्चय ही उसको हमारा ध्यान है—पिता के रूप में यह उसका काम है। यदि वह ऐसा न करता, तो वह भला पिता न होता। वह केवल यही चाहता है कि हम उसे बताएँ कि हमें क्या चाहिए, और फिर प्रबन्ध का काम उसी पर छोड़ दें। वह प्रतिज्ञा करता है कि यदि हम ऐसा करें, तो “परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी” (फिलिप्पियों 4:7)।

पृथ्वी के किसी भले पिता की सन्तान इसलिए शान्ति में रहती है क्योंकि वह अपने पिता की देखभाल पर भरोसा रखती है। तौभी स्वर्गीय पिता की सन्तानों के पास अकसर कोई शान्ति नहीं होती, क्योंकि वे उस पर भरोसा रखने से डरती हैं। वे अपनी आवश्यकताएँ उसे बता तो देती हैं, परन्तु केवल एक रीति निभाने के लिये। वे सचमुच विश्वास नहीं करतीं कि वह उनकी देखभाल करेगा। और इसलिए वे अपने बोझ ऐसे उठाए फिरती हैं मानो स्वर्ग में उनका कोई पिता है ही नहीं।

यह कैसी मूर्खता है। यदि पृथ्वी का कोई पिता अपनी सन्तान के भरोसे के योग्य है, तो हमारा स्वर्गीय पिता हमारे भरोसे के कितना अधिक योग्य है। इतने थोड़े लोग उस पर भरोसा क्यों रखते हैं, इसका कारण यह है कि या तो उन्होंने यह नहीं जाना कि वह सचमुच उनका पिता है, या यद्यपि वे उसे पिता कहते हैं, तौभी उन्होंने कभी नहीं समझा कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है।

तुम्हारी बेचैनी का उत्तर यह है कि तुम पिता से सचमुच परिचित हो जाओ।

“क्योंकि तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हो परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम ‘हे अब्बा, हे पिता’ कहकर पुकारते हैं” (रोमियों 8:15)। क्या यह लेपालकपन की आत्मा तुम्हारे हृदय में राज्य कर रही है, या भय की आत्मा? तुम्हारी शान्ति पूरी तरह इसी पर निर्भर है। जब तक लेपालकपन की आत्मा नहीं है, तब तक कोई भी प्रयत्न, संघर्ष या प्रार्थना तुम्हें विश्राम नहीं दे सकती।

परन्तु तुम पूछ सकते हो कि यह आत्मा कैसे पाई जाए। यह कोई ऐसी वस्तु नहीं जो प्रयत्न से प्राप्त होती है। यह तब स्वाभाविक रूप से आती है जब तुम यह खोज लेते हो कि परमेश्वर सचमुच तुम्हारा पिता है। जब तुम यह जान लेते हो, तो तुम एक बालक के समान सोचे और व्यवहार किए बिना रह ही नहीं सकते—और लेपालकपन की आत्मा का अर्थ यही है। यह कोई रहस्यमय बात नहीं; यह केवल इस बात का स्वाभाविक परिणाम है कि जहाँ तुम पहले सोचते थे कि केवल एक न्यायी है, वहाँ तुमने एक पिता पा लिया है।

इसलिए सबसे बड़ी आवश्यकता यही खोज करने की है। इसके लिये हमें वह सुनना होगा जो मसीह पिता के विषय में कहता है, और उस पर विश्वास करना होगा।

“मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ कि हम जो जानते हैं, वह कहते हैं, और जिसे हमने देखा है उसकी गवाही देते हैं, और तुम हमारी गवाही ग्रहण नहीं करते” (यूहन्ना 3:11)।

“ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है” (यूहन्ना 14:10)।

“जिसने उसकी गवाही ग्रहण कर ली उसने इस बात पर छाप दे दी कि परमेश्वर सच्चा है” (यूहन्ना 3:33)।

यदि हम मसीह की गवाही ग्रहण करते हैं, तो हम घोषित करते हैं कि परमेश्वर सच्चा है। यदि हम उसकी गवाही ठुकराते हैं, तो परमेश्वर को झूठा ठहराते हैं।

“यदि तुम ने मुझे जाना होता, तो मेरे पिता को भी जानते, और अब उसे जानते हो, और उसे देखा भी है” (यूहन्ना 14:7)। हमें यह ठान लेना चाहिए कि अब से हम उसकी गवाही पर विश्वास करेंगे और पिता को सचमुच जानेंगे। हमारे लिये तो “एक ही परमेश्वर है: अर्थात् पिता जिसकी ओर से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसी के लिये हैं, और एक ही प्रभु है, अर्थात् यीशु मसीह जिसके द्वारा सब वस्तुएँ हुईं, और हम भी उसी के द्वारा हैं” (1 कुरिन्थियों 8:6)।

अध्याय 5 पूरा हुआ

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