सब प्रकार की शान्ति का परमेश्वर
उसका नाम क्या है?

अध्याय 2 · 21 मिनट का पठन

उसका नाम क्या है?

“मूसा ने परमेश्वर से कहा, ‘जब मैं इस्राएलियों के पास जाकर उनसे यह कहूँ, “तुम्हारे पूर्वजों के परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है,” तब यदि वे मुझसे पूछें, “उसका क्या नाम है?” तब मैं उनको क्या बताऊँ?’”

निर्गमन 3:13 युगों-युगों का और हर मनुष्य के हृदय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यहाँ व्यक्त हुआ है: “उसका क्या नाम है?”

सारी मानवजाति का भाग्य इसी प्रश्न के उत्तर पर टिका है। हम जानते हैं कि किसी देश की दशा उसके शासकों के चरित्र पर निर्भर होती है। किसी सेना की स्थिति उन अधिकारियों पर निर्भर होती है जो उसकी कमान सँभालते हैं। और शासन जितना अधिक निरंकुश हो, यह बात उतनी ही अधिक सच होती है।

इसलिए हम देख सकते हैं कि किसी भी सृष्टि में सब कुछ इस बात पर निर्भर है कि उस सृष्टि को अस्तित्व में लानेवाला सृष्टिकर्ता और शासक कैसा है, और उसमें रखे गए मनुष्यों का सारा कल्याण अनिवार्य रूप से उनके सृष्टिकर्ता के चरित्र से बँधा हुआ है। यदि हमें रचनेवाला परमेश्वर भला परमेश्वर है, तो अन्ततः हमारे लिए सब कुछ ठीक ही होगा, क्योंकि भला परमेश्वर भलाई के सिवा और कुछ ठहरा ही नहीं सकता। परन्तु यदि वह बुरा परमेश्वर है, या लापरवाह परमेश्वर है, या निर्दयी परमेश्वर है, तो हम किसी भी बात के ठीक होने का निश्चय नहीं कर सकते, और हमें कहीं भी सच्चा चैन या शान्ति नहीं मिल सकती।

चैन और शान्ति की सच्ची नींव केवल इसी में मिलती है कि हमारा परमेश्वर कैसा है। इसलिए हमें पहले यह जानना होगा कि उसका नाम क्या है—अर्थात् उसका चरित्र क्या है—संक्षेप में, वह किस प्रकार का परमेश्वर है।

बाइबल की भाषा में नाम का अर्थ सदा चरित्र होता है। वहाँ नाम मनमाने ढंग से नहीं रखे जाते, जैसा हमारे बीच प्रायः होता है, बल्कि सदा उस व्यक्ति के चरित्र या कार्य के सम्बन्ध में रखे जाते हैं जिसका वह नाम है।

क्रूडन अपनी बाइबल शब्दानुक्रमणिका (कॉनकॉर्डेंस) में कहते हैं कि परमेश्वर के नाम यह दर्शाते हैं कि वह वास्तव में क्या है, और पूरी बाइबल में वे उसके गुणों, उसके उद्देश्यों, उसकी महिमा, उसके अनुग्रह, उसकी दया, उसके प्रेम, उसकी बुद्धि, उसकी सामर्थ्य और उसकी भलाई को प्रकट करने के लिए प्रयुक्त होते हैं। उसके नामों का ध्यानपूर्वक अध्ययन यह बात स्पष्ट कर देता है।

इसलिए जब इस्राएलियों ने पूछा, “उसका क्या नाम है?” तो उनका अर्थ यह था, “यह परमेश्वर कौन है और कैसा है, जिसके विषय में तू बोलता है? उसका चरित्र क्या है? उसके गुण क्या हैं? वह क्या करता है?

संक्षेप में, वह किस प्रकार का अस्तित्व है?”

भजनकार कहता है, “तेरे नाम के जाननेवाले तुझ पर भरोसा रखेंगे, क्योंकि हे यहोवा तूने अपने खोजियों को त्याग नहीं दिया।” (भजन संहिता 9:10) और फिर लिखा है, “यहोवा का नाम दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें भागकर सब दुर्घटनाओं से बचता है।” (नीतिवचन 18:10) “तेरे नाम के जाननेवाले तुझ पर भरोसा रखेंगे।” वे इसके सिवा कुछ और कर ही नहीं सकते, क्योंकि उसका नाम जानकर वे उसका चरित्र और उसका स्वभाव जान लेते हैं—कि वह ऐसा परमेश्वर है जिस पर पूरी तरह भरोसा किया जा सकता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि बहुत-से मसीही हृदयों की बेचैनी और अशान्ति का एक बड़ा भाग केवल इस बात से आता है कि वे अभी तक उसका नाम नहीं जानते। “किसी को रथों पर, और किसी को घोड़ों पर भरोसा है, परन्तु हम तो अपने परमेश्वर यहोवा ही का नाम लेंगे। वे तो झुक गए और गिर पड़े: परन्तु हम उठे और सीधे खड़े हैं।” (भजन संहिता 20:7-8) प्राचीन इस्राएल के विषय में हम जो कुछ पढ़ते हैं, उस सब में हमें यह एक स्थिर सत्य मिलता है: वे जो कुछ थे और उनके पास जो कुछ था, वह सब इस बात पर निर्भर था कि उनका परमेश्वर यहोवा था। “क्या ही धन्य है वह जाति जिसका परमेश्वर यहोवा है, और वह समाज जिसे उसने अपना निज भाग होने के लिये चुन लिया हो!” (भजन संहिता 33:12) “इस कारण, हे यहोवा परमेश्वर, तू महान है; क्योंकि जो कुछ हमने अपने कानों से सुना है, उसके अनुसार तेरे तुल्य कोई नहीं, और न तुझे छोड़ कोई और परमेश्वर है। फिर तेरी प्रजा इस्राएल के भी तुल्य कौन है? वह तो पृथ्वी भर में एक ही जाति है जिसे परमेश्वर ने जाकर अपनी निज प्रजा करने को छुड़ाया, इसलिए कि वह अपना नाम करे, (और तुम्हारे लिये बड़े-बड़े काम करे) और तू अपनी प्रजा के सामने, जिसे तूने मिस्री आदि जाति-जाति के लोगों और उनके देवताओं से छुड़ा लिया, अपने देश के लिये भयानक काम करे। और तूने अपनी प्रजा इस्राएल को अपनी सदा की प्रजा होने के लिये ठहराया; और हे यहोवा, तू आप उसका परमेश्वर है।” (2 शमूएल 7:22-24) “जिस राज्य का परमेश्वर यहोवा है, वह क्या ही धन्य है!” (भजन संहिता 144:15) धन्य है वह जाति; क्या ही धन्य हैं वे लोग जिनका परमेश्वर यहोवा है। इस्राएल की सारी आशीष और सारा आनन्द इसी बात से आया कि उनका परमेश्वर यहोवा था। उनके लाभों की गिनती करते समय और कोई बात इतनी महत्त्वपूर्ण न थी कि उसका उल्लेख किया जाए। यह तथ्य कि उनका परमेश्वर यहोवा था, उनके पास की हर अच्छी वस्तु का कारण बताने के लिए पर्याप्त था।

इसलिए हम में से हर एक के लिए सब प्रश्नों से बढ़कर प्रश्न यही है: “उसका क्या नाम है?”

इस्राएलियों को परमेश्वर ने स्वयं इस प्रश्न का उत्तर दिया। परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं जो हूँ सो हूँ।”

(निर्गमन 3:14) फिर उसने कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘जिसका नाम मैं हूँ है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।’” परमेश्वर ने मूसा से यह भी कहा, “तू इस्राएलियों से यह कहना, ‘तुम्हारे पूर्वजों का परमेश्वर, अर्थात् अब्राहम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर, यहोवा, उसी ने मुझ को तुम्हारे पास भेजा है।’ देख सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी-पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा।” (निर्गमन 3:15) यूहन्ना रचित सुसमाचार में मसीह यह नाम “मैं हूँ” अपने लिए लेता है। जब यहूदियों ने उसके अधिकार के विषय में उससे प्रश्न किया, तो उसने उनसे कहा, “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।”

(यूहन्ना 8:58) और प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में वह फिर घोषणा करता है: “मैं ही अल्फा और ओमेगा हूँ… जो है, और जो था, और जो आनेवाला है; जो सर्वशक्तिमान है।” (प्रकाशितवाक्य 1:8) ये सरल शब्द, “मैं हूँ,” अनन्तता और अस्तित्व की अपरिवर्तनशीलता को प्रकट करते हैं, जो ऐसे परमेश्वर का पहला आवश्यक गुण है जिस पर भरोसा किया जा सके। कोई भी बदलनेवाले परमेश्वर पर भरोसा नहीं रख सकता। यदि हमें कुछ भी चैन या शान्ति पानी है, तो उसे कल और आज और युगानुयुग एक-सा होना ही चाहिए। परन्तु क्या उसके नाम का अर्थ बस इतना ही है—केवल “मैं हूँ”? हम पूछते हैं, मैं हूँ—पर क्या? इस “मैं हूँ” में क्या-क्या सम्मिलित है? मेरा विश्वास है कि इसमें वह सब कुछ सम्मिलित है जिसकी मनुष्य का हृदय लालसा करता है और जिसकी उसे आवश्यकता है। परमेश्वर का यह अधूरा नाम ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी धनी मित्र का हस्ताक्षर किया हुआ कोरा चेक हो, जो हमें इसलिए दिया गया है कि हमें जितनी राशि चाहिए, हम उसमें भर लें। पूरी बाइबल हमें बताती है कि इसका क्या अर्थ है।

परमेश्वर का हर गुण, उसके चरित्र का हर प्रकाशन, उसके अटल प्रेम का हर प्रमाण, उसकी चौकस देखभाल की हर घोषणा, उसकी कोमल दया का हर आश्वासन, उसकी करुणा की हर अभिव्यक्ति—ये सब इस अधूरे “मैं हूँ” की पूर्ति हैं।

परमेश्वर अपने पूरे वचन में हमें बताता है कि वह क्या है। “मैं हूँ,” वह कहता है, “वह सब कुछ जिसकी मेरे लोगों को आवश्यकता है। मैं उनका बल हूँ। मैं उनकी बुद्धि हूँ। मैं उनकी धार्मिकता हूँ। मैं उनका चैन हूँ। मैं उनका उद्धार हूँ।

मैं उनका जीवन हूँ। मैं ही उनके लिए सब में सब कुछ हूँ।”

इसलिए यह अधूरा-सा दिखनेवाला नाम सबसे अधिक शान्ति देनेवाला नाम है जिसकी मनुष्य का हृदय कल्पना कर सकता है, क्योंकि यह हमें अनुमति देता है कि हमें जो कुछ भी चाहिए, उसे हम बिना किसी सीमा के इसमें जोड़ते जाएँ—यहाँ तक कि “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक।”

परन्तु यदि हमारे हृदय हमारे अपने दयनीय “मैं हूँ” से भरे हों, तो उसके महिमामय, प्राण को तृप्त करनेवाले “मैं हूँ” को सुनने के लिए हमारे पास कान ही न होंगे। हम कहते हैं, “मैं बहुत निर्बल हूँ,” या “मैं बहुत नासमझ हूँ,” या “मैं किसी काम का नहीं हूँ,” या “मैं बहुत असहाय हूँ,” और हम इन बेचारे “मैं हूँ” को अपने धार्मिक जीवन के दुःख और अशान्ति का कारण बताते हैं, और यहाँ तक समझते हैं कि हम सहानुभूति के पात्र हैं, क्योंकि हमारे लिए बातें इतनी कठिन हैं। इस बीच हम परमेश्वर के महान “मैं हूँ” के उस कोरे चेक को पूरी तरह अनदेखा कर देते हैं, जो हमें अनुमति देता है कि हम हर आवश्यकता के लिए उससे भरपूर आपूर्ति प्राप्त करें।

यदि तुम एक अशान्त मसीही हो, तो केवल एक ही बात तुम्हें सचमुच शान्ति से भरा धार्मिक जीवन दे सकती है—परमेश्वर को जानना। भजनकार कहता है कि जो परमेश्वर का नाम जानते हैं वे उस पर भरोसा रखेंगे, और मुझे पूरा निश्चय है कि उसे सचमुच जानना और उस पर भरोसा न रखना असम्भव है। भरोसे के योग्य व्यक्ति स्वाभाविक रूप से भरोसा जगाता है—उसकी माँग करके नहीं, बल्कि अपने चरित्र के द्वारा उसे जीतकर।

हमारा प्रभु जो घोषणा करता है, वह सदा के लिए सत्य है: “और मैं यदि पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया जाऊँगा, तो सब को अपने पास खीचूँगा।” जब तुम उसे सचमुच जान लेते हो, तो मसीह के आकर्षण को कोई रोक नहीं सकता। तुम उस पर भरोसा किए बिना वैसे ही नहीं रह सकते जैसे साँस लिए बिना नहीं रह सकते। और यदि सारा संसार उसे वैसा जान पाता जैसा वह सचमुच है, तो सारा संसार—पापी और सब—आराधना में उसके चरणों पर गिर पड़ता। वे ऐसा किए बिना रह ही न पाते। उसकी अनुपम सुन्दरता हर बात पर प्रबल हो जाती।

तो फिर हम परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं?

दो बातें आवश्यक हैं: पहली, परमेश्वर स्वयं को प्रकट करे; और दूसरी, हम उसके प्रकाशन को ग्रहण करें और जो कुछ वह प्रकट करता है उस पर विश्वास करें।

प्रेरित यूहन्ना हमें बताता है कि “परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट किया।” (यूहन्ना 1:18) इसलिए मसीह ही परमेश्वर का प्रकाशन है। हम में से किसी ने परमेश्वर को नहीं देखा, और न अपनी वर्तमान दशा में हम उसे देख सकते हैं, क्योंकि हम में ऐसा करने की क्षमता नहीं है। परन्तु उसने अपने आप को मसीह में प्रकट किया है, और हम मसीह को देख सकते हैं, क्योंकि वह हमारे समान मनुष्य बना।

यदि कोई मनुष्य चींटियों से बात करना चाहे, तो वह किसी बाँबी के पास खड़ा होकर दिन भर बोलता रह सकता है, फिर भी उसका एक भी शब्द उन तक नहीं पहुँचेगा। वे उससे बिलकुल अनजान होकर इधर-उधर चलती रहेंगी। जहाँ तक हम जानते हैं, चींटियों में मनुष्य की बोली समझने की कोई क्षमता नहीं है। परन्तु यदि कोई मनुष्य चींटी बन सके, उनके बीच रहे और उनकी भाषा बोले, तो वह तुरन्त अपनी बात उन्हें समझा सकेगा।

जब जीवन का कोई ऊँचा रूप किसी निचले रूप से संवाद करना चाहता है, तो देहधारण आवश्यक हो जाता है।

मसीह ने परमेश्वर को इसके द्वारा प्रकट किया कि वह क्या था, उसने क्या किया और उसने क्या कहा। पालने से लेकर कब्र तक उसके जीवन का हर क्षण परमेश्वर को प्रकट करता रहा। इसलिए परमेश्वर को जानने के लिए हमें उसी के पास जाना चाहिए, और परमेश्वर के विषय में ऐसी किसी भी बात पर विश्वास करने से इन्कार करना चाहिए जो हमें मसीह में नहीं दिखाई गई। बाकी सारे प्रकाशन अधूरे हैं और इसलिए पूरी तरह भरोसे योग्य नहीं। केवल मसीह में हम परमेश्वर को वैसा देखते हैं जैसा वह सचमुच है, क्योंकि मसीह “उसके तत्व की छाप” है।

किसी भी परिस्थिति में परमेश्वर जो कुछ कहता या करता, वही मसीह ने कहा और किया। “मैं अपने आप से कुछ नहीं करता… पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है” (यूहन्ना 14:10) “मैं और पिता एक हैं” (यूहन्ना 10:30) “जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है।” (यूहन्ना 14:9) नये नियम में इस सत्य से अधिक स्पष्ट रूप से और कुछ नहीं कहा गया कि हमें “परमेश्वर की महिमा की पहचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से” देखनी है, (2 कुरिन्थियों 4:6) और हम उसे पूरी तरह कहीं और नहीं देख सकते।

यदि हम उस अधूरे-से दिखनेवाले नाम “मैं हूँ” का पूरा अर्थ जानना चाहते हैं, जो परमेश्वर ने मूसा को दिया, तो हम उसे मसीह में प्रकट पाएँगे। केवल वही परमेश्वर की व्याख्या करता है। केवल वही अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है।

इसलिए यह स्पष्ट है कि हमें परमेश्वर के विषय में ऐसी किसी भी धारणा को कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए जो मसीह में दिखाई देनेवाली बात के विपरीत हो, और उसके चरित्र, उसके कामों या हमारे साथ उसके सम्बन्ध के विषय में किसी भी ऐसे दृष्टिकोण को पूरी तरह ठुकरा देना चाहिए—चाहे वह कितने ही ज़ोर से सिखाया जाता हो—जो मसीह के प्रकट किए हुए से मेल नहीं खाता।

हम सब जानते हैं कि पुराने नियम में परमेश्वर का प्रकाशन कभी-कभी मसीह में दिए गए प्रकाशन से भिन्न प्रतीत होता है, और यह प्रश्न उठता है कि हम किसे अधिक सच्चा मानें। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि परमेश्वर स्वयं हमें बताता है कि इन अन्तिम दिनों में उसने हम से अपने पुत्र के द्वारा बातें की हैं, जो “उसकी महिमा का प्रकाश, और उसके तत्व की छाप” है, हम मसीह की गवाही को ठुकरा नहीं सकते। इसके बदले, जहाँ पुराने नियम का प्रकाशन मसीह के प्रकाशन से भिन्न है, वहाँ हमें उसे आंशिक और अधूरा मानना चाहिए, और परमेश्वर का सच्चा चित्र केवल उसी को मानना चाहिए जो हमें मसीह में मिलता है।

केवल मसीह ही हमें परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक नाम बताता है। अपनी अन्तिम और अद्भुत प्रार्थना में वह कहता है: “मैंने तेरा नाम उन मनुष्यों पर प्रगट किया जिन्हें तूने जगत में से मुझे दिया… जो बातें तूने मुझे पहुँचा दीं, मैंने उन्हें उनको पहुँचा दिया और उन्होंने उनको ग्रहण किया और सच-सच जान लिया है, कि मैं तेरी ओर से आया हूँ, और यह विश्वास किया है कि तू ही ने मुझे भेजा।”

क्या हम इससे बड़े अधिकार की माँग कर सकते हैं?

मसीह के पूरे जीवन में इस तथ्य से अधिक स्पष्ट और अधिक ज़ोरदार और कुछ नहीं कि वह निरन्तर परमेश्वर का पूर्ण प्रकाशन होने का दावा करता रहा। “ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है।” (यूहन्ना 14:10) वह बार-बार घोषणा करता है कि वह केवल वही बोलता है जो पिता उसे बोलने को देता है। “जो मैंने उससे सुना है, वही जगत से कहता हूँ।” (यूहन्ना 8:26) “मैं अपने आप से कुछ नहीं करता, परन्तु जैसे मेरे पिता परमेश्वर ने मुझे सिखाया, वैसे ही ये बातें कहता हूँ।” (यूहन्ना 8:28) प्रेरित भी बहुत स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि “पिता की प्रसन्नता इसी में है कि उसमें सारी परिपूर्णता वास करे।” (कुलुस्सियों 1:19) और यद्यपि हम धर्मविज्ञान की दृष्टि से इसका पूरा अर्थ न समझ पाएँ, फिर भी हम यह देखे बिना नहीं रह सकते कि यदि हम परमेश्वर को जानना चाहते हैं, तो परमेश्वर के मार्गों और परमेश्वर के चरित्र को जानने के लिए हमें केवल मसीह के मार्गों और मसीह के चरित्र से परिचित होना है। “जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है।” और फिर वह घोषणा करता है कि “कोई पिता को नहीं जानता, केवल पुत्र और वह जिस पर पुत्र उसे प्रगट करना चाहे।”

(मत्ती 11:27) इससे बात पूरी तरह तय हो जाती है। परमेश्वर के विषय में हमारे बहुत-से विचार हो सकते हैं; हम कल्पनाएँ और अटकलें लगा सकते हैं—पर वह सब व्यर्थ है। मसीह में दिए गए प्रकाशन के बिना हम उसे जान ही नहीं सकते।

हम परमेश्वर के विषय में बहुत-सी बातें जान सकते हैं, परन्तु यह उसे उसके स्वभाव और चरित्र में वैसा जानने से बहुत भिन्न है जैसा वह सचमुच है। दूसरे गवाह हमें उसके बाहरी कामों के विषय में बता सकते हैं, परन्तु उनसे हम प्रायः उसके सच्चे चरित्र के विषय में बहुत गलत धारणाएँ बना लेते हैं। मसीह के सिवा कोई परमेश्वर के सच्चे भीतरी स्वभाव को प्रकट नहीं कर सकता, क्योंकि केवल उसी के विषय में यह कहा जा सकता है कि “एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट किया।” (यूहन्ना 1:18) हम इसे सत्य मानें या न मानें, इससे हमारे मसीही जीवन में सारा अन्तर पड़ जाता है। यदि हम इसे मानते हैं, तो वह कठोर न्यायी और सख़्त स्वामी, जिससे हम डरते रहे हैं—उसके पीछे चलने का प्रयत्न करते हुए भी—और जिसकी सेवा हमें इतनी कठिन और बोझिल लगी है, लुप्त हो जाएगा। उसके स्थान पर प्रेम का वह परमेश्वर आएगा जो हम पर “यीशु मसीह के चेहरे” में प्रकट हुआ है, वह परमेश्वर जो हमारी वैसी ही चिन्ता करता है जैसी गौरैयों और मैदान के फूलों की करता है, और जो हमें बताता है कि हमारे सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं।

ऐसे परमेश्वर से कोई नहीं डर सकता।

यदि हम अपने प्रति उसकी कृपा के विषय में किसी सन्देह के साथ परमेश्वर के पास आने के आदी रहे हैं; यदि हमारे धार्मिक जीवन को भय ने विषैला कर दिया है; यदि उसके चरित्र और उसकी इच्छा के विषय में अनुचित विचारों ने हमारे हृदयों को उसकी भलाई के प्रति शंका से भर दिया है; यदि हमने उसे एक कठोर शासक या स्वार्थी अत्याचारी के रूप में सोचा है; यदि, संक्षेप में, हमने उसके विषय में उससे भिन्न किसी भी रूप में सोचा है जो हम पर “यीशु मसीह के चेहरे” में प्रकट किया गया है, तो हमें हृदय की सरलता के साथ मनुष्यों के बीच जिए गए उस सुन्दर जीवन के वृत्तान्त की ओर लौटना चाहिए, और परमेश्वर के विषय में अपनी समझ को उसके चरित्र और मार्गों से पूरी तरह मेल में लाना चाहिए जो घोषणा करता है कि वह परमेश्वर का नाम प्रगट करने आया।

तो इस प्रश्न के उत्तर में, “उसका क्या नाम है?” मुझे केवल इतना कहना है: मसीह से पूछो। हमें बताया गया है कि वह “शरीर में प्रगट हुआ” परमेश्वर था, और जो कोई उसे देखता है वह उस परमेश्वर को देखता है जिसने उसे भेजा। इसलिए यह पूरी तरह स्पष्ट है कि यदि हम नाम जानना चाहते हैं, तो हमें उस प्रगटीकरण को देखना होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि हमें मसीह के जीवन, वचनों और कामों का अध्ययन करना चाहिए, और अपने आप से कहना चाहिए, “जिसने मसीह को देखा है उसने परमेश्वर को देखा है,” और यह कि जो मसीह पृथ्वी पर था, वही परमेश्वर स्वर्ग में है। परमेश्वर के चरित्र को घेरे हुए सारी उलझन मिट जाएगी, यदि हम उस ज्योति को ग्रहण करें जो मसीह ने दी है, और “उसके नाम के प्रगटीकरण” पर विश्वास करें जो मसीह ने हमें दिखाया है, और किसी और बात पर विश्वास करने से इन्कार करें।

जब नीकुदेमुस रात को यीशु के पास यह पूछने आया कि ये बातें कैसे सच हो सकती हैं, तो यीशु ने उससे कहा कि वह उन्हें समझे या न समझे, वे फिर भी सच हैं, और बहुत स्पष्ट रूप से कहा: “मैं तुझ से सच-सच कहता हूँ कि हम जो जानते हैं, वह कहते हैं, और जिसे हमने देखा है उसकी गवाही देते हैं।” (यूहन्ना 3:11) जो कोई मसीह पर विश्वास करता है, वह इसमें सन्देह नहीं कर सकता कि वह परमेश्वर को जानता था; और कोई यह प्रश्न नहीं उठा सकता कि हमें उसकी गवाही ग्रहण करनी चाहिए या नहीं। उसने बार-बार हमें विश्वास दिलाया कि वह जानता है कि वह किस विषय में बोल रहा है, और उसके वचनों को परम सत्य के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए, क्योंकि वह स्वर्ग से उतरा है और इसलिए स्वर्गीय बातों को जानता है।

हम में से कोई भी इस पर खुलकर प्रश्न नहीं उठाएगा; फिर भी व्यवहार में परमेश्वर के बहुत-से लोग मसीह की गवाही को अनदेखा करके अपने सन्देह करनेवाले हृदयों की सुनते हैं, जो उनसे कहते हैं कि यह सच नहीं हो सकता कि परमेश्वर उतना ही प्रेमी, उतना ही कोमल, या क्षमा करने को उतना ही तत्पर है जितना मसीह ने उसे दिखाया है। फिर भी, दोहराव का जोखिम उठाकर भी, मुझे बार-बार वह बात कहनी ही होगी जिसे बहुत कम लोग समझते प्रतीत होते हैं: यदि बाइबल में कोई एक सत्य किसी भी दूसरे से अधिक स्पष्ट रूप से सिखाया गया है, तो वह यह है कि पिता का नाम—अर्थात् उसका चरित्र—जैसा मसीह ने प्रकट किया है, वही उसका सच्चा चरित्र है। मसीह निरन्तर घोषणा करता है कि वह पिता की जीवित अभिव्यक्ति है, और जो कुछ उसने कहा और किया, उस सब में वह बस वही कह और कर रहा था जो पिता कहता और करता, यदि वह सीधे स्वर्ग से कार्य करता।

स्वयं हमारे प्रभु के ऐसे स्पष्ट कथनों के सामने, यह न केवल हमारा सौभाग्य बल्कि हमारा उत्तरदायित्व भी बन जाता है कि हम परमेश्वर के विषय में अपनी समझ में से वह सब कुछ निकाल दें जो मसीह के जीवन, चरित्र और शिक्षा से मेल नहीं खाता। यदि हम परमेश्वर का सच्चा नाम जानना चाहते हैं, तो हमें वही नाम ग्रहण करना होगा जो मसीह ने प्रकट किया है, और किसी दूसरे की न सुननी होगी।

मसीह में हम जो भी गुण देखते हैं, वे ही परमेश्वर के “मैं हूँ” का अर्थ भरते हैं। जब हम मसीह के जीवन को देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, तो हम परमेश्वर को यह कहते सुनते हैं, “थके हुओं के लिए मैं विश्राम हूँ; व्याकुलों के लिए मैं चैन हूँ; निर्बलों के लिए मैं बल हूँ; नासमझों के लिए मैं बुद्धि हूँ; पापियों के लिए मैं धार्मिकता हूँ; सबसे दीन-हीन प्राण जो कुछ भी चाह सकता है, वह सब मैं हूँ; आशीष, सहायता और देखभाल में मैं तुम्हारी विनती और समझ से कहीं अधिक हूँ।”

परन्तु यहाँ कोई कह सकता है, “हाँ, यह सब सच हो सकता है, पर मैं इसे कैसे थामूँ? मैं इतना अयोग्य व्यक्ति हूँ कि मुझे यह विश्वास करने का साहस नहीं होता कि ऐसा अनुग्रह मेरे लिए है।”

तुम इसे कैसे थाम सकते हो? तुम इसे बिलकुल नहीं थाम सकते—परन्तु तुम इसे अपने को थामने दे सकते हो। यह बाइबल में तुम्हारे लिए घोषित किया गया शुभ सन्देश है, और तुम्हें बस इसके साथ वैसा ही व्यवहार करना है जैसा तुम किसी विश्वसनीय स्रोत से मिले किसी भी भरोसेमंद समाचार के साथ करते हो। यदि बोलनेवाला भरोसे के योग्य है, तो तुम उसकी बात पर विश्वास करते हो और उसके अनुसार चलते हो। और यहाँ भी तुम्हें ऐसा ही करना है। यदि मसीह तब भरोसे के योग्य है जब वह कहता है कि वह परमेश्वर का प्रकाशन है, तो तुम्हें उस पर विश्वास करना और उसी के अनुसार चलना होगा।

तुम्हें उसकी विश्वसनीयता पर दृढ़ता से खड़ा होना होगा। तुम्हें अपने आप से, और यदि आवश्यक हो तो दूसरों से भी, कहना होगा, “मसीह परमेश्वर के विषय में जो कहता है, मैं उस पर विश्वास करूँगा। बातें चाहे कैसी भी दिखाई दें, मेरे अपने विचार या भावनाएँ चाहे कुछ भी कहें, कोई और चाहे कुछ भी कहे, मुझे निश्चय है कि मसीह जो कहता है वह अवश्य सच है, क्योंकि वह जानता है और कोई दूसरा नहीं जानता। मैं पूरी तरह उस पर विश्वास करूँगा।

वह कहता है कि वह परमेश्वर के साथ एक है; इसलिए जो कुछ वह है, वही परमेश्वर है। अब मैं परमेश्वर से और नहीं डरूँगा। मैं उसे न तो मुझ पर क्रोधित किसी कठोर व्यवस्था देनेवाले के रूप में सोचूँगा, न असम्भव बातों की माँग करनेवाले कठोर स्वामी के रूप में, और न ही किसी दूर के और पहुँच से बाहर के अस्तित्व के रूप में जो मेरे संघर्षों और भयों के प्रति उदासीन है। अब जबकि मुझे पता है कि मसीह परमेश्वर को प्रकट करता है, ऐसे सब विचार असम्भव हैं।”

यदि हम इस सत्य को दृढ़ता से थामे रहें—कि मसीह और परमेश्वर एक हैं—और परमेश्वर के विषय में ऐसी किसी भी धारणा को स्वीकार करने से इन्कार करें जो मसीह के दिखाए हुए के विपरीत हो, तो हमारा जीवन बदल जाएगा।

हमें प्रायः इस पर दृढ़ता से खड़े रहने की आवश्यकता पड़ सकती है, क्योंकि पुराने सन्देह और भय लौट आएँगे और फिर से पकड़ जमाने का प्रयत्न करेंगे। परन्तु हमें दृढ़ता से उनसे मुँह मोड़ लेना चाहिए और घोषणा करनी चाहिए कि अब हम अपने परमेश्वर का नाम—अर्थात् उसका चरित्र—जानते हैं, और ऐसी बातें उसके लिए असम्भव हैं।

इसलिए हम ऐसे किसी भी सुझाव को सुनने से इन्कार करते हैं जो उसके चरित्र या उसके मार्गों को गलत रूप में प्रस्तुत करता है।

यह सोचना असम्भव है कि जब परमेश्वर ने मूसा से कहा, “मैं हूँ,” तो उसका अर्थ था, “मैं एक कठोर व्यवस्था देनेवाला हूँ,” या “मैं एक कठोर स्वामी हूँ,” या “मैं अपने लोगों के दुःख के प्रति उदासीन हूँ।” यदि हम उसके “मैं हूँ” में ऐसे अर्थ भरने का प्रयत्न करें, तो हर जगह के मसीही स्तब्ध रह जाएँगे। फिर भी क्या बहुत-से विश्वासियों के भय और सन्देह हर दिन उनके हृदयों में चुपके से ठीक यही बातें नहीं कहते?

परमेश्वर करे कि उसके नाम पर विचार करते हुए हम जो सीखें, वह अब से ऐसे सन्देहों और भयों को हमारे लिए असम्भव बना दे।

यीशु परमेश्वर है! काश, मैं पार कर पाऊँ जल-थल सारे, यही एक सत्य सिखाऊँ, सुनाऊँ, तो कैसा आनन्द मुझे मिले!

काश, स्वर्गदूत-सा स्वर मेरा हो, तो ऊँचे स्वर से करूँ प्रचार— यीशु, जो भला है, जो सुन्दर है, वही हमारे परमेश्वर का प्रतिरूप है!

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