परमेश्वर की निःस्वार्थता ·क्वेकर विवेक-बाधाएँ

अध्याय 13 · 7 मिनट का पठन

एआई अनुवाद — मातृभाषी समीक्षा बाकी

क्वेकर विवेक-बाधाएँ

क्वेकर साक्षियों से जन्मी व्यक्तिगत “विवेक-बाधाएँ” अन्तहीन जान पड़ती थीं, क्योंकि हर एक उन्हें अपने ही कर्तव्य-बोध के अनुसार समझता था। जिनका विवेक विशेष रूप से कोमल था, वे प्रायः बन्धन पर बन्धन बढ़ाते जाते, यहाँ तक कि जीवन ही यातना बन जाता। ऐसे ही विवेक के बोझ से दबी एक सहेली ने आगे चलकर मुझसे स्वीकार किया कि जवानी में उसकी सुबहें लगभग असह्य होती थीं। पहनावे की हर वस्तु पर सन्देह उसे आ घेरते, और वह मुश्किल से ही कपड़े पहन पाती। कभी-कभी नए-नए बलिदान माँगते उस भीतरी शब्द को चुप कराने का उसके पास एक ही उपाय रहता — वह कानों में रुई ठूँस लेती और जितनी तेज़ी से हो सकता, कविता दोहराने लगती, ताकि उन बेरहम फटकारों को दबा दे।

मेरी परदादी ने 1760 और 1762 के बीच जो पुरानी डायरी रखी, वह उनके दिनों की विवेक-बाधाओं की जीती-जागती झलक देती है। उन्होंने गम्भीर निश्चय से लिखा कि हँसी पागलपन है और आमोद व्यर्थ, और यह कि उनकी लालसा है कि वे ऐसी दृढ़ हो जाएँ कि फिर कभी मुस्कुराएँ ही नहीं। कहीं और उन्होंने मित्रों के बीच चुपके-चुपके घुस आते फ़ैशनों पर विलाप किया — जवान पुरुष अपने बाल फ़ीतों से बाँधते, और लड़कियाँ अपने गले काली पट्टियों से सजातीं। उनके लिए ये शोक के दृश्य थे, इस बात के प्रमाण कि प्राचीन अपने कर्तव्य में चूक गए हैं। उन्होंने तम्बाकू, चाय और छींट के चस्के पर शोक किया, और घोषित किया कि ये सब बराबर ही बिगाड़नेवाले हैं, “नीग्रो लोगों जितने ही बुरे,” उन्होंने लिखा, और सांसारिक आदतों को एक ही घृणित वस्तु मानकर एक साथ रख दिया। उनके शब्द बताते हैं कि हर पीढ़ी ने विवेक के नए-नए बिन्दु खोज निकाले, तौभी सदा उसी आत्म-त्याग की भावना से।

अपने ही समय के अधिक निकट, एक और दादी ने नकली दाँत पहनने से इनकार कर दिया। दाँत न होने से खाने में उन्हें कठिनाई होती थी, तौभी उन्होंने अपनी आत्मा में एक “रोक” अनुभव की, क्योंकि वे उन्हें व्यर्थ फ़ैशन मानती थीं। वे उनकी सबसे अच्छी रेशमी शॉल के पास एक दराज़ में धर दिए गए, कि कभी पहने न जाएँ। हम बच्चे उनकी साधुता पर मुग्ध थे, यद्यपि उन्हें भोजन से जूझते देखते रहते थे। हमारी एक प्रचारिका मित्र ने, नई कालीन बिछाने के बाद, यह डर खाया कि कहीं वे घमण्ड के वश तो नहीं हो गईं। अपने को दीन करने के लिए उन्होंने उस पर ठेलागाड़ियों भर खुरदुरे पत्थर उँडेलवा दिए, जिससे उसकी सारी ताज़गी जाती रही। हम बच्चों ने यह कथा विस्मय से सुनी, और उसके बाद उनका प्रचार हमें स्वर्गदूत के शब्द जैसा जान पड़ता था।

वर्षों बाद, एक नई ब्रसेल्स कालीन को लेकर, जिस पर कोमल फूलों की बेल-बूटी बनी थी, मेरी अपनी परीक्षा आ पड़ी। मेरे पति ने प्रबन्ध किया कि हर रविवार बाइबल-कक्षा के लिए खुरदुरे मज़दूर उसी कमरे में इकट्ठे हों। अपनी उस प्रिय कालीन पर उनके भारी बूटों का मुझे बुरा लगता था, यद्यपि मैं जानती थी कि मुझे ऐसा नहीं लगना चाहिए।

इस विषय में प्रार्थना करते हुए एक वचन मेरे मन में आया: “अपनी सम्पत्ति आनन्द से लुटने दो ।” मैंने उसे आत्मा के हथियार के समान थाम लिया, और उसी क्षण से मैंने उन जनों का अपनी कालीन पर स्वागत किया। अचरज की बात है कि वह कभी घिसती ही न जान पड़ी, और तब तक बनी रही जब तक मैं उसे देखते-देखते ही न थक गई। मैं यह सोचे बिना नहीं रह सकती कि मेरा मार्ग मेरी उस प्यारी बूढ़ी मित्र के खुरदुरे पत्थरों से अच्छा था।

जब मैं विश्वास का मार्ग पा चुकी थी, तब एक सहेली ने, जो बहुत समय तक क्वेकर “विवेक-बाधाओं” के नीचे दुःख उठा चुकी थी, मुझे मसीही जीवन जीने की भिन्न-भिन्न रीतियों का एक अनोखा चित्र दिया। उसने कहा, “मैंने किसी आत्मिक पहाड़ के उस पार पहुँचने के तीन ढंग देखे हैं। कुछ लोग अपने माथे के पसीने से उसमें सुरंग खोदते हैं — यही क्वेकर ढंग है, और बहुत समय तक यही मेरा भी था। दूसरे लोग उसके नीचे-नीचे घूमते हैं, इधर-उधर टेढ़े-मेढ़े चलते हुए, परन्तु क्योंकि वे अपने मुँह लक्ष्य की ओर ही किए रहते हैं, इसलिए धीरे-धीरे निकट आते जाते हैं। जब मैं सुरंग खोदते-खोदते थक गई, तब यही मेरा ढंग हुआ। परन्तु अब तू मुझसे कहती है कि एक तीसरा ढंग भी है — विश्वास का मार्ग। तू कहती है कि कुछ मसीहियों ने विश्वास के पंख फड़फड़ाकर सीधे पहाड़ के ऊपर से उड़ जाना सीख लिया है। मुझे मानना पड़ेगा कि जो तेरा मार्ग लेते हैं, वे सुरंग खोदनेवालों या घूमनेवालों से कहीं अधिक शीघ्रता और सहजता से उस पार पहुँचते जान पड़ते हैं। मैंने ठान लिया है कि सुरंग खोदना और घूमना छोड़ दूँ, और मैं भी अपने पंख फड़फड़ाऊँ।”

तौभी मेरे बचपन और जवानी के वे प्यारे सन्त उड़ना नहीं जानते थे। अधिकतर उन्होंने अपना जीवन अटल और थका देनेवाली सुरंग-खुदाई में बिताया। उनकी विश्वासयोग्यता और आत्म-बलिदान, चाहे कभी-कभी ग़लत दिशा में ही क्यों न लगे हों, मुझे तब भी — और अब भी — सारे आदर के योग्य जान पड़ते हैं। मेरे युवा हृदय पर जो एक ही छाप सबसे गहरी पड़ी, वह बस यही थी: जैसे भी हो, मुझे भली बनना ही है। क्वेकर शिक्षा में और चाहे जिस बात की कमी रही हो, भलाई पर बल देने की कमी न थी। पूरी तरह, ईमानदारी से, सचमुच भला होने की आवश्यकता उसी हवा में थी जिसमें हम साँस लेते थे।

कभी-कभी इस वातावरण के नीचे मैं कसमसा उठती थी। मेरा रोमांच-प्रिय स्वभाव तरसता था कि कभी शरारत करने और सबकी आशाओं को ठुकराने का अवसर मिले, परन्तु मेरे जीवन की सीमाएँ सबसे निर्दोष नटखटपन से आगे कुछ होने न देती थीं। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो भलाई की उस अनोखी ढाल की सराहना किए बिना नहीं रह सकती, जिसने मुझे घेरकर उन परीक्षाओं से बचाए रखा जो नहीं तो मेरे स्वच्छन्द मन को लुभा लेतीं।

क्योंकि यदि कोई प्राण कभी स्वतन्त्र जन्मा हो, तो वह मेरा ही था। मेरे हृदय की पुकार सदा स्वतन्त्रता ही के लिए रही है।

जो नियम और रूढ़ियाँ दास बनाती या बेड़ियाँ डालती हैं, वे जीवन भर मुझे घृणित रही हैं। मेरे माता-पिता ने बहुत नियम बनाए होते तो मैं विद्रोह कर बैठती। परन्तु जिस भलाई के वातावरण में वे जीते थे, वह मुझे ऐसी अनजानी शक्ति से बाँधे रखता था कि मुझे पता ही मुश्किल से चलता कि मेरी अगुवाई हो रही है। मैं आनन्द से यह अनुभव करती मानो लगभग सदा मेरी ही चलती हो।

जिसने उसमें जीवन न बिताया हो, वह कल्पना भी नहीं कर सकता कि अठारह वर्ष की आयु तक मैं जीवन के कितने सँकरे घेरे को जानती थी। जिसे “भड़कीला संसार” कहा जाता था, उसका कोई भी व्यक्ति मुझे कभी नहीं मिला। मेरे संगी केवल हमारी मण्डली के गम्भीर मित्र थे, और उनके बड़ी सावधानी से रखे हुए बच्चे। उपन्यास मना थे, और हमारे क्वेकर बाड़े के बाहर जीवन का अर्थ क्या है, यह जानने का मुझे कोई अवसर न मिला। रही संसार के पापों की बात, तो उनकी मुझे रत्ती भर भी भनक न थी। पाठशाला में भी किसी बात का संकेत मिलता तो मैं इतनी भोली थी कि समझ ही न पाती। मैं कह सकती हूँ कि आज अठारह वर्ष की किसी लड़की के लिए अज्ञान के ऐसे अवास्तविक संसार में जीना, या जीवन के उत्तरदायित्वों में इतनी बिना तैयारी के उतरना, असम्भव ही होगा।

सोलह वर्ष की आयु तक मेरा भीतरी जीवन सीधा-सादा था। जो थोड़ा-बहुत मुझे बताया जाता, मैं उस पर विश्वास कर लेती, और सृष्टि के रहस्यों की तनिक भी चिन्ता न करती। मेरे एकमात्र धार्मिक विचार नरक की आग के वे कभी-कभी उठनेवाले डर थे, जो महामारी या संकट के समयों में भड़क उठते। यह डर मुझमें कहाँ से आया, स्मरण नहीं, क्योंकि क्वेकर स्वर्ग या नरक की चर्चा कम ही करते थे। उनकी चिन्ता यह थी कि परमेश्वर का जीवन अभी प्राण में हो, और भविष्य वे ईश्वरीय देखभाल पर छोड़ देते थे। तौभी कभी-कभी अचानक भय मुझे धर लेता, और मैं “भली बनने” की बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ करती, और कुछ घण्टों तक अपने दोष सुधारने का यत्न करती — और फिर पुरानी चाल पर लौट आती। तौभी चारों ओर की भलाई के वातावरण के कारण बुराई का विचार तक करना कठिन था, उस पर चलना तो दूर। कुल मिलाकर, एक जीवन्त, स्वस्थ प्राणी जितना भला हो सकता है, उतनी ही मैं भली थी। परन्तु सोलह वर्ष तक मैं बस एक भला पशु ही थी। मेरा आत्मिक स्वभाव जागा ही न था; मैंने कभी सचेत रूप से अपने प्राण को पहचाना ही न था।

एक परिवर्तन निकट था, यद्यपि मैं उसे जानती न थी। मेरा प्राण अपनी जड़ता से हिलने लगा था, और तितली के समान अपने खोल में उन बन्धनों को तोड़ने के लिए छटपटा रहा था जो उसे थामे हुए थे। परमेश्वर के पीछे मेरी लम्बी खोज आरम्भ होने ही को थी।

विषय-सूची

परमेश्वर की निःस्वार्थता Hannah Whitall Smith

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