मध्यस्थता की सेवकाई
विनती की आत्मा

अध्याय 12 · 17 मिनट का पठन · 22 मिनट का श्रवण

विनती की आत्मा

“मैं दाऊद के घराने पर अपना अनुग्रह करनेवाली और प्रार्थना सिखानेवाली आत्मा उण्डेलूँगा।”—जकर्याह 12:10.

“इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, क्योंकि हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए; परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है। और मनों का जाँचनेवाला जानता है, कि पवित्र आत्मा की मनसा क्या है? क्योंकि वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है।”—रोमियों 8:26, 27.

“हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार विनती किया करो।”—इफिसियों 6:18.

“पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए।”—यहूदा 20.

पवित्र आत्मा परमेश्वर की हर एक सन्तान को इसलिए दिया गया है कि वह उसका जीवन हो। वह उसमें वास करता है, उसके स्वभाव के किसी एक भाग में किसी अलग व्यक्ति के समान नहीं, वरन् उसके जीवन के रूप में। वह वही ईश्वरीय सामर्थ्य या शक्ति है जिससे उसका जीवन बना रहता और दृढ़ किया जाता है। जो कुछ भी होने या करने के लिये एक विश्वासी बुलाया गया है, वह सब पवित्र आत्मा उसमें कर सकता है और करेगा। यदि वह उस पवित्र पाहुन को न जाने या उसके आगे न झुके, तो वह धन्य आत्मा कार्य नहीं कर सकता, और उसका जीवन एक रोगी जीवन होता है, असफलता और पाप से भरा हुआ। ज्यों-ज्यों वह झुकता है, और बाट जोहता है, और आत्मा की अगुवाई मानता है, त्यों-त्यों परमेश्वर उसमें वह सब कार्य करता है जो उसकी दृष्टि में भाता है।

यह पवित्र आत्मा, सबसे पहले, प्रार्थना की आत्मा है। उसकी प्रतिज्ञा “अनुग्रह करनेवाली और प्रार्थना सिखानेवाली आत्मा” के रूप में की गई थी, अर्थात् विनती के लिये अनुग्रह। वह हमारे मनों में “लेपालकपन की आत्मा, जिससे हम हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकारते हैं” के रूप में भेजा गया। वह हमें इस योग्य बनाता है कि हम सच्चे विश्वास और उसके अर्थ की बढ़ती हुई समझ के साथ कहें, हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है। “वह पवित्र लोगों के लिये परमेश्वर की इच्छा के अनुसार विनती करता है।” और जब हम आत्मा में प्रार्थना करते हैं, तब हमारी आराधना वैसी ही होती है जैसी परमेश्वर उसे चाहता है, “आत्मा और सच्चाई से।” प्रार्थना हम में आत्मा की साँस ही है; प्रार्थना में सामर्थ्य हम में आत्मा की सामर्थ्य से आती है, जब उसकी बाट जोही जाए और उस पर भरोसा रखा जाए। प्रार्थना में असफलता हम में आत्मा के कार्य की दुर्बलता से आती है। हमारी प्रार्थना हम में आत्मा के कार्य की माप का सूचक है। ठीक रीति से प्रार्थना करने के लिये आत्मा का जीवन हम में ठीक होना चाहिए। धर्मी जन की उस प्रार्थना के लिये जिसके प्रभाव से बहुत कुछ हो सकता है, सब कुछ आत्मा से परिपूर्ण होने पर निर्भर है।

तीन बहुत सरल पाठ हैं जो उस विश्वासी को जानने चाहिए जो प्रार्थना की आत्मा के द्वारा प्रार्थना करना सिखाए जाने की आशीष का आनन्द उठाना चाहता है। पहला यह है: विश्वास करो कि आत्मा तुम में वास करता है (इफिसियों 1:13)। अपने अस्तित्व के भीतरी से भीतरी कोनों में, छिपा हुआ और अनुभव में न आनेवाला, परमेश्वर की हर एक सन्तान के भीतर परमेश्वर का पवित्र, सामर्थी आत्मा वास करता है। वह इसे विश्वास से जानता है, अर्थात् उस विश्वास से जो परमेश्वर के वचन को ग्रहण करके उसे सच्चा जान लेता है जिसका अब तक उसे कोई चिह्न नहीं दिखता। “हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें, जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।” जब तक हम ठीक रीति से और लगातार प्रार्थना करने की अपनी सामर्थ्य को इससे नापते हैं कि हम क्या अनुभव करते हैं, या क्या सोचते हैं कि हम कर सकते हैं, तब तक जब हम सुनेंगे कि हमें कितनी प्रार्थना करनी चाहिए तो हम निराश हो जाएँगे। परन्तु जब हम चुपचाप यह विश्वास करते हैं कि अपनी सारी अनुभव में आनेवाली दुर्बलता के बीच में भी विनती की आत्मा के रूप में पवित्र आत्मा हमारे भीतर वास कर रहा है, इसी उद्देश्य से कि हमें ठीक उसी रीति और मात्रा में प्रार्थना करने योग्य बनाए जैसी परमेश्वर हमसे चाहता है, तब हमारे मन आशा से भर जाएँगे। हम उस निश्चय में दृढ़ किए जाएँगे जो एक आनन्दित और फलवन्त मसीही जीवन की जड़ में ही है, अर्थात् यह कि परमेश्वर ने हमारे वैसा होने के लिये भरपूर प्रबन्ध कर रखा है जैसा वह हमें चाहता है। हम कभी पर्याप्त प्रार्थना कर पाने के विषय में अपने बोझ और भय और निराशा के भाव को खोने लगेंगे, क्योंकि हम देखते हैं कि पवित्र आत्मा आप ही प्रार्थना करेगा, कर रहा है, हम में।

दूसरा पाठ यह है: सबसे बढ़कर पवित्र आत्मा को शोकित करने से चौकस रहो (इफिसियों 4:30)। यदि तुम ऐसा करो, तो वह तुम में मसीह के साथ उस मिलाप का शान्त, भरोसे से भरा और धन्य भाव कैसे उत्पन्न कर सकता है जो तुम्हारी प्रार्थनाओं को पिता के लिये ग्रहणयोग्य बनाता है? उसे पाप से, अविश्वास से, स्वार्थ से, विवेक में उसके शब्द के प्रति अविश्वासयोग्यता से शोकित करने से चौकस रहो। यह मत सोचो कि उसे शोकित करना अनिवार्य है: वह विचार तुम्हारी सामर्थ्य की नसें ही काट देता है। इस आज्ञा को मानना असम्भव मत समझो, “पवित्र आत्मा को शोकित मत करो।” वह आप ही परमेश्वर की वह सामर्थ्य है जो तुम्हें आज्ञाकारी बनाती है। जो पाप तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध तुम में उठता है, आलस्य, या घमण्ड, या हठ, या क्रोध की जो प्रवृत्ति शरीर में उठती है, उसे तुम्हारी इच्छा आत्मा की सामर्थ्य में तुरन्त ठुकरा सकती है, और मसीह और उसके लहू पर डाल सकती है, और परमेश्वर के साथ तुम्हारी संगति तुरन्त फिर बहाल हो जाती है। हर दिन पवित्र आत्मा को अपने अगुवे और जीवन और बल के रूप में ग्रहण करो; तुम उस पर भरोसा रख सकते हो कि वह तुम्हारे मन में वह सब करे जो वहाँ किया जाना चाहिए। वह, जो अनदेखा और अनुभव में न आनेवाला है, पर विश्वास से जाना जाता है, वहाँ अनदेखे और अनुभव में न आते हुए वह प्रेम और वह विश्वास और आज्ञाकारिता की वह सामर्थ्य देता है जिसकी तुम्हें आवश्यकता है, क्योंकि वह तुम्हारे भीतर अनदेखे मसीह को सचमुच तुम्हारे जीवन और बल के रूप में प्रगट करता है। पवित्र आत्मा पर अविश्वास करके उसे शोकित मत करो, केवल इसलिए कि तुम अपने में उसकी उपस्थिति अनुभव नहीं करते।

विशेष रूप से प्रार्थना की बात में उसे शोकित मत करो। जब तुम मसीह पर भरोसा रखते हो कि वह तुम्हें एक नए, स्वस्थ प्रार्थना-जीवन में ले आए, तो यह आशा मत रखो कि तुम एक ही बार में उतनी सहजता और सामर्थ्य और आनन्द से प्रार्थना कर सकोगे जितनी तुम चाहते हो। नहीं; सम्भव है यह एक ही बार में न आए। पर परमेश्वर के सामने अपनी अज्ञानता और दुर्बलता में चुपचाप झुक जाओ। यही सबसे अच्छी और सबसे सच्ची प्रार्थना है, कि तुम अपने आप को परमेश्वर के सामने ठीक वैसा ही रख दो जैसे तुम हो, और उस छिपे हुए आत्मा पर भरोसा रखो जो तुम में प्रार्थना कर रहा है। “हम नहीं जानते, कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए”; अज्ञानता, कठिनाई, संघर्ष, आरम्भ से अन्त तक हमारी प्रार्थना पर छाए रहते हैं। परन्तु, “आत्मा हमारी दुर्बलता में सहायता करता है।” कैसे? “आत्मा आप ही,” हमारे विचारों या भावनाओं से कहीं गहरे, “ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है।” जब तुम्हें शब्द न मिलें, जब तुम्हारे शब्द ठण्डे और दुर्बल लगें, तब बस विश्वास करो: पवित्र आत्मा मुझ में प्रार्थना कर रहा है। परमेश्वर के सामने शान्त रहो, और उसे समय और अवसर दो; ठीक ऋतु में तुम प्रार्थना करना सीख जाओगे। अपने भीतर उसकी मध्यस्थता के प्रति धीरजवन्त, भरोसे से भरे समर्पण में उसका आदर न करके प्रार्थना की आत्मा को शोकित करने से चौकस रहो।

तीसरा पाठ: “पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ” (इफिसियों 5:18)। मैं समझता हूँ कि हमने उस बड़े सत्य का अर्थ देख लिया है: केवल स्वस्थ आत्मिक जीवन ही ठीक रीति से प्रार्थना कर सकता है। यह आज्ञा हम में से हर एक के पास आती है: “पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ।” इसका अर्थ यह है कि जहाँ कुछ लोग आरम्भ से ही, अर्थात् आत्मा के कार्य की थोड़ी सी माप से ही सन्तुष्ट रह जाते हैं, वहाँ परमेश्वर की इच्छा यह है कि हम आत्मा से परिपूर्ण हों। इसका अर्थ, हमारी ओर से, यह है कि हमारा सारा अस्तित्व पूरी रीति से पवित्र आत्मा को सौंप दिया जाना चाहिए, कि केवल वही उसका अधिकारी हो और उसे चलाए। और, परमेश्वर की ओर से, यह कि हम भरोसा रख सकते और आशा कर सकते हैं कि पवित्र आत्मा अधिकार कर लेगा और हमें भर देगा। क्या प्रार्थना में हमारी असफलता स्पष्ट रूप से इसी कारण नहीं रही कि हमने प्रार्थना की आत्मा को अपना जीवन होने के लिये ग्रहण नहीं किया; कि हमने अपने आप को पूरी रीति से उसे नहीं सौंपा, जिसे पिता ने अपने पुत्र की आत्मा के रूप में इसलिए दिया कि वह हम में पुत्र का जीवन उत्पन्न करे? आइए हम कम से कम इतना तो करें कि उसे ग्रहण करने को तैयार हों, अपने आप को परमेश्वर को सौंप दें और इसके लिये उस पर भरोसा रखें। आइए हम फिर से जान-बूझकर पवित्र आत्मा को शोकित न करें, न उसे ठुकराकर, न उसकी उपेक्षा करके, न उसे उतनी पूरी रीति से पाने का यत्न करने में हिचकिचाकर जितनी पूरी रीति से वह अपने आप को हमें देने को तैयार है। यदि हमने कुछ भी देखा है कि प्रार्थना हमारे काम की और कलीसिया की सबसे बड़ी आवश्यकता है, यदि हमने कुछ भी अभिलाषा या निश्चय किया है कि हम अधिक प्रार्थना करें, तो आइए हम सारी सामर्थ्य और आशीष के स्रोत की ही ओर फिरें—आइए हम विश्वास करें कि प्रार्थना की आत्मा, अपनी परिपूर्णता में भी, हमारे लिये है।

हम सब मानते हैं कि हमारी प्रार्थना में पिता और पुत्र का स्थान क्या है। हम पिता से प्रार्थना करते हैं, और उसी से उत्तर की आशा रखते हैं। पुत्र के गुण, और नाम, और जीवन में, उसमें बने रहते हुए और वह हम में, हम सुने जाने का भरोसा रखते हैं। परन्तु क्या हमने यह समझा है कि पवित्र त्रिएकता में तीनों व्यक्तियों का प्रार्थना में बराबर स्थान है, और यह कि मध्यस्थता के पवित्र आत्मा पर, जो हम में प्रार्थना कर रहा है, विश्वास उतना ही अनिवार्य है जितना पिता और पुत्र पर विश्वास? यह बात हमें इन शब्दों में कितनी स्पष्टता से मिलती है, “उसी के द्वारा हम दोनों की एक आत्मा में पिता के पास पहुँच होती है।” जितना निश्चय है कि प्रार्थना पिता के पास जानी चाहिए, और पुत्र के द्वारा, उतना ही निश्चय यह भी है कि वह आत्मा में होनी चाहिए। और आत्मा हम में और किसी रीति से प्रार्थना नहीं कर सकता, केवल उसी रीति से जैसे वह हम में जीता है। केवल तब, जब हम अपने आप को उस आत्मा को सौंप देते हैं जो हम में जीता और प्रार्थना करता है, प्रार्थना सुननेवाले परमेश्वर की महिमा, और पुत्र की सदा धन्य और सबसे प्रभावशाली मध्यस्थता, हमारे द्वारा उनकी सामर्थ्य में जानी जा सकती है। (टिप्पणी D.)

हमारा अन्तिम पाठ: सब पवित्र लोगों के लिये आत्मा में प्रार्थना करो (इफिसियों 6:18)। वह आत्मा, जो “विनती की आत्मा” कहलाता है, बहुत विशेष रूप से मध्यस्थता की भी आत्मा है। उसके विषय में कहा गया है, “आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर जो बयान से बाहर है, हमारे लिये विनती करता है।” “वह पवित्र लोगों के लिये विनती करता है।” यह वही शब्द है जो मसीह के विषय में काम में लाया गया है, “जो हमारे लिये विनती भी करता है।” यह विचार मूल रूप से मध्यस्थता का ही है—एक का दूसरे के लिये विनती करना। जब मध्यस्थता की आत्मा हम पर पूरा अधिकार कर लेता है, तब सारा स्वार्थ, मानो हम उसे दूसरों के लिये उसकी मध्यस्थता से अलग करके केवल अपने ही लिये चाहते हों, दूर हो जाता है, और हम मनुष्यों के लिये विनती करने के अपने अद्भुत अधिकार से लाभ उठाने लगते हैं। हम दूसरों के लिये अपने आप को होम कर देनेवाले बलिदान का मसीह-जीवन जीने की लालसा करते हैं, जब हमारा मन बिना थके अपने आप को परमेश्वर को सौंपता रहता है कि अपने चारों ओर के लोगों के लिये उसकी आशीष पाए। तब मध्यस्थता हमारी प्रार्थनाओं का कोई प्रसंग या कभी-कभी का भाग नहीं रह जाती, वरन् उनका एक ही बड़ा उद्देश्य बन जाती है। तब अपने लिये प्रार्थना अपना सच्चा स्थान ले लेती है, केवल एक ऐसे साधन के रूप में जो हमें मध्यस्थता की अपनी सेवा को और अधिक प्रभाव से करने के योग्य बनाता है।

क्या मुझे अपने हर एक पाठक से एक बहुत ही व्यक्तिगत बात कहने की अनुमति है? मैंने दीनता से परमेश्वर से विनती की है कि वह मुझे वह दे जो मैं उन्हें दे सकूँ—ईश्वरीय ज्योति और सहायता, कि वे सचमुच प्रार्थना में असफलता के जीवन को छोड़ दें, और अभी, और तुरन्त, मध्यस्थता के उस जीवन में प्रवेश करें जिसे जीने के योग्य पवित्र आत्मा उन्हें बना सकता है। यह विश्वास के एक सरल कार्य से हो सकता है, अर्थात् आत्मा की परिपूर्णता पर दावा करने से, अर्थात् आत्मा की उस पूरी माप पर जिसे पाने के योग्य तुम परमेश्वर की दृष्टि में हो, और जिसे इसलिए वह देने को तैयार है। क्या तुम अभी भी इसे विश्वास से ग्रहण न करोगे?

मुझे तुम्हें उसकी याद दिलाने दो जो मन-फिराव के समय होता है। हम में से अधिकांश ने, और सम्भवतः तुमने भी, कुछ समय तक पाप छोड़ने और परमेश्वर को प्रसन्न करने के यत्नों और संघर्षों में शान्ति ढूँढ़ी। पर वह तुम्हें इस रीति से नहीं मिली। परमेश्वर की क्षमा की शान्ति विश्वास से आई, अर्थात् मसीह और उसके उद्धार के विषय में परमेश्वर के वचन पर भरोसा रखने से। तुमने मसीह के विषय में उसके प्रेम के वरदान के रूप में सुना था, तुम जानते थे कि वह तुम्हारे लिये भी है, तुमने उसके अनुग्रह की हलचल और खिंचाव को अनुभव किया था; परन्तु जब तक तुमने परमेश्वर के वचन पर विश्वास करके उसे परमेश्वर के वरदान के रूप में ग्रहण न किया, तब तक तुमने वह शान्ति और आनन्द न जाना जो वह दे सकता है। उस पर और उसके उद्धार करनेवाले प्रेम पर विश्वास करने से सारा अन्तर पड़ गया, और तुम्हारा सम्बन्ध ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध से जो उसे सदा शोकित करता रहा, बदलकर ऐसे व्यक्ति का सम्बन्ध हो गया जो उससे प्रेम करता और उसकी सेवा करता है। और फिर भी, कुछ समय बाद, तुमने हज़ार बार अचम्भा किया है कि तुम उससे इतनी बुरी रीति से प्रेम और सेवा क्यों करते हो।

अपने मन-फिराव के समय तुम पवित्र आत्मा के विषय में थोड़ा ही जानते थे। बाद में तुमने उसके तुम में वास करने के विषय में सुना, और यह कि वह तुम में परमेश्वर की वह सामर्थ्य है जिससे तुम वह सब हो सकते हो जो पिता तुम्हें बनाना चाहता है, और फिर भी उसका भीतर वास करना और भीतर कार्य करना कुछ धुँधला और अनिश्चित सा रहा है, और आनन्द या बल का स्रोत मुश्किल से ही रहा है। मन-फिराव के समय तुम अभी अपनी उसकी आवश्यकता को नहीं जानते थे, और यह तो और भी कम कि तुम उससे क्या आशा रख सकते हो। परन्तु तुम्हारी असफलताओं ने तुम्हें यह सिखा दिया है। और अब तुम देखने लगे हो कि तुम उसे कैसे शोकित करते रहे हो, उस पर भरोसा न रखकर और उसके पीछे न चलकर, उसे अपने में परमेश्वर की सारी इच्छा पूरी न करने देकर।

यह सब बदल सकता है। जैसे मसीह को ढूँढ़ने, और उससे प्रार्थना करने, और बिना सफलता के उसकी सेवा करने का यत्न करने के बाद तुमने उसे विश्वास से ग्रहण करने में विश्राम पाया, ठीक वैसे ही तुम अभी भी अपने आप को पवित्र आत्मा की पूरी अगुवाई को सौंप सकते हो, और उस पर दावा करके उसे ग्रहण कर सकते हो कि वह तुम में वह कार्य करे जो परमेश्वर चाहता है। क्या तुम ऐसा न करोगे? बस उसे विश्वास से मसीह के वरदान के रूप में ग्रहण करो, कि वह तुम्हारे सारे जीवन की, और तुम्हारे प्रार्थना-जीवन की भी आत्मा हो, और तुम उस पर भरोसा रख सकते हो कि वह भार सँभाल लेगा। तब तुम आरम्भ कर सकते हो, चाहे तुम अपने आप को कितना ही दुर्बल और ठीक रीति से प्रार्थना करने में असमर्थ अनुभव करो, कि परमेश्वर के सामने चुपचाप झुक जाओ, इस निश्चय के साथ कि वह तुम्हें प्रार्थना करना सिखाएगा।

मेरे प्रिय भाई, जैसे तुमने जान-बूझकर विश्वास से मसीह को क्षमा के लिये ग्रहण किया, वैसे ही तुम अब उसी विश्वास से जान-बूझकर उस मसीह को ग्रहण कर सकते हो जो पवित्र आत्मा देता है कि वह तुम में अपना कार्य करे। “मसीह ने हमें छुड़ाया, कि हम विश्वास के द्वारा उस आत्मा को प्राप्त करें, जिसकी प्रतिज्ञा हुई है।” घुटने टेको, और बस यह विश्वास करो कि प्रभु मसीह, जो पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देता है, तुम्हारे विश्वास के उत्तर में अभी तुम में भीतर वास करनेवाले आत्मा की सामर्थ्य के पूरे अनुभव का वह धन्य जीवन आरम्भ करता है। सारी भावना या अनुभव से परे, विनती और मध्यस्थता की आत्मा के रूप में उस पर पूरे भरोसे से निर्भर रहो कि वह अपना कार्य करे। विश्वास के उस कार्य को हर सवेरे नया करो, हर बार जब तुम प्रार्थना करो; सारी दिखावटों के विरुद्ध उस पर भरोसा रखो कि वह तुम में कार्य करे,—निश्चय जानो कि वह कार्य कर रहा है,—और वह तुम्हें जानने देगा कि पवित्र आत्मा का आनन्द तुम्हारे जीवन की सामर्थ्य के रूप में क्या है।

“मैं विनती की आत्मा उण्डेलूँगा।” क्या तुम देखने नहीं लगे कि प्रार्थना का भेद ईश्वरीय भीतर-वास का ही भेद है? स्वर्ग में परमेश्वर अपना आत्मा हमारे मनों में देता है कि वह वहाँ हम में प्रार्थना करनेवाली ईश्वरीय सामर्थ्य हो, और हमें ऊपर अपने परमेश्वर की ओर खींचे। परमेश्वर आत्मा है, और हमारे भीतर वैसे ही जीवन और आत्मा के सिवा और कुछ उसके साथ संगति नहीं रख सकता। मनुष्य इसी के लिये रचा गया था, कि परमेश्वर उसमें वास करे और कार्य करे, और उसके जीवन का जीवन हो। यही ईश्वरीय भीतर-वास था जिसे पाप ने खो दिया। यही था जिसे मसीह अपने जीवन में दिखाने आया, अपनी मृत्यु में हमारे लिये फिर जीत लेने आया, और फिर आत्मा में स्वर्ग से फिर आकर अपने चेलों में जीने के द्वारा हमें देने आया। यही, अर्थात् आत्मा के द्वारा परमेश्वर का भीतर वास करना, अकेला ही उन अद्भुत प्रतिज्ञाओं की व्याख्या कर सकता है जो प्रार्थना को दी गई हैं, और हमें उन्हें अपना बनाने के योग्य बना सकता है। परमेश्वर आत्मा को विनती की आत्मा के रूप में भी देता है, कि वह हमारे भीतर अपने ईश्वरीय जीवन को बनाए रखे, एक ऐसा जीवन जिसमें से प्रार्थना सदा ऊपर की ओर उठती है।

पवित्र आत्मा के बिना कोई मनुष्य यीशु को प्रभु नहीं कह सकता, न हे अब्बा, हे पिता कहकर पुकार सकता है; कोई मनुष्य आत्मा और सच्चाई से आराधना नहीं कर सकता, न बिना रुके प्रार्थना कर सकता है। पवित्र आत्मा विश्वासी को इसलिए दिया गया है कि वह उसमें वह सब हो और करे जो परमेश्वर चाहता है कि वह हो या करे। वह उसे विशेष रूप से प्रार्थना और विनती की आत्मा के रूप में दिया गया है। क्या यह स्पष्ट नहीं कि प्रार्थना में सब कुछ इस पर निर्भर है कि हम पवित्र आत्मा पर भरोसा रखें कि वह हम में अपना कार्य करे; अपने आप को उसकी अगुवाई को सौंप दें, केवल और पूरी रीति से उसी पर निर्भर रहें?

हम पढ़ते हैं, “स्तिफनुस एक ऐसा पुरुष था जो विश्वास और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण था।” ये दोनों सदा साथ-साथ चलते हैं, ठीक एक दूसरे के अनुपात में। ज्यों-ज्यों हमारा विश्वास हम में प्रार्थना करनेवाले आत्मा को देखता और उस पर भरोसा रखता है, और उसकी बाट जोहता है, त्यों-त्यों वह अपना कार्य करेगा; और पिता तरसती हुई अभिलाषा, और गम्भीर विनती, और निश्चित विश्वास को ही ढूँढ़ता है। आइए हम उसे जानें, और उस मसीह पर विश्वास में, जो बिना थके उसे देता है, इस दृढ़ भरोसे को बढ़ाएँ कि हम वैसी प्रार्थना करना सीख सकते हैं जैसी पिता हमसे चाहता है।

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