वह मेरा कल थामे हुए है
नूह

अध्याय 9 · 5 मिनट का पठन · 6 मिनट का श्रवण

नूह

“विश्वास ही से नूह ने उन बातों के विषय में जो उस समय दिखाई न पड़ती थीं, चेतावनी पाकर भक्ति के साथ अपने घराने के बचाव के लिये जहाज बनाया, और उसके द्वारा उसने संसार को दोषी ठहराया; और उस धार्मिकता का वारिस हुआ, जो विश्वास से होता है” (इब्रानियों 11:7)।

नूह और जहाज की कथा उत्पत्ति 6:5-7:24 में पाई जाती है यहाँ हमारे सामने ऐसे मनुष्य का उदाहरण है जिस पर यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि बनी रही। वह धर्मी पुरुष था, अपने समय के लोगों में खरा, और परमेश्वर ही के साथ-साथ चलता रहा (उत्पत्ति 6:9)।

उत्पत्ति 6:13 में परमेश्वर ने नूह से बात की। जब प्रभु आपसे बात करता है, तब यह जानना कठिन नहीं कि वह आपसे क्या चाहता है।

परमेश्वर की बात मान लेना कठिन न था, परन्तु नूह ने केवल मान लेने से कहीं अधिक किया; उसने आज्ञा मानी, और परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार सब कुछ किया। यही विश्वास है! आज्ञाकारी कर्म में प्रगट हुआ मानना।

नूह को दी गई आज्ञाएँ बहुत ही विचित्र थीं, तौभी उसने उन सब को माना। उसने न कभी जल-प्रलय देखा था, न कोई नाव, परन्तु परमेश्वर की आज्ञा पाकर उसने काम आरम्भ किया और तब तक विश्राम न लिया जब तक वह काम पूरा न हो गया। हम यह नहीं पढ़ते कि इस विशाल कार्य में किसी ने भी नूह की सहायता की — उसके पुत्रों ने भी नहीं — परन्तु वे और उनकी पत्नियाँ नूह की आज्ञाकारिता से लाभ पानेवाले थे। कुल मिलाकर आठ जन अपने प्राणों के लिये परमेश्वर के अनुग्रह और नूह की आज्ञाकारिता के ऋणी होते।

विश्वास के इस उदाहरण से हम बाइबल का कौन-सा सिद्धान्त सीख सकते हैं?

एक स्पष्ट उत्तर स्वयं यीशु ने मत्ती 24:37-39 में दिया है, जहाँ वह यहूदियों को अपने मसीही राज्य की स्थापना के लिये अपने लौट आने के विषय में सिखाता है।

जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा। जल-प्रलय से पहले के उन दिनों में, उस दिन तक जब नूह जहाज पर चढ़ा, लोग खाते-पीते थे, और उनमें विवाह-शादी होती थी। उन्हें कुछ भी मालूम न पड़ा, जब तक जल-प्रलय आकर उन सब को बहा न ले गया; वैसे ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा।

लोग परमेश्वर की बातों से बेपरवाह रहेंगे, इसलिए उन पर बड़ा न्यायदण्ड आ पड़ेगा। केवल थोड़े ही — एक बचा हुआ भाग — बचाए जाएँगे।

यहाँ इस संसार पर आनेवाले न्यायदण्ड की निश्चितता का सिद्धान्त है; तथापि एक और सत्य उस प्रबन्ध में दिखाई देता है जो परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु के द्वारा हमारे लिये किया है। उसने वह उपाय तैयार किया है जिसके द्वारा हम उस न्यायदण्ड से बच सकें जो उन सब पर आ रहा है जो उसके साथ-साथ चलने से इनकार करते हैं।

यीशु में एक जहाज तैयार किया गया है, और जो कोई भीतर आना चाहे उसे निमन्त्रण दिया गया है! हम प्रभु का धन्यवाद करते हैं कि वह पिता की इच्छा का आज्ञाकारी रहा, यद्यपि इसका अर्थ गतसमनी की पीड़ा और गुलगुता की पहाड़ी पर का क्रूस था। पिता के अनुग्रह और पुत्र की आज्ञाकारिता के कारण, जो सब भीतर आते हैं उन्हें उद्धार मिलता है।

जैसे परमेश्वर ने नूह के जहाज का द्वार बन्द कर दिया जब आठों भीतर थे (उत्पत्ति 7:16), वैसे ही उसने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने पुत्र में हम पर ‘छाप लगा दी है’ (इफिसियों 1:13)। हमारे जहाज यीशु में केवल सुरक्षा ही नहीं है, परन्तु वहाँ हमें सब प्रकार की आत्मिक आशीष मिली है (इफिसियों 1:3)। सचमुच, इफिसियों 1 का सारा अध्याय ऐसी ही आशीषों की चर्चा करता है।

उसमें: ● हम पवित्र और निर्दोष ठहराए गए हैं (आयत 4)।

● हम परमेश्वर के लेपालक पुत्र बनाए गए हैं (आयत 5)।

● हमें परमेश्वर का बहुतायत का अनुग्रह मिलता है। (आयत 6)।

● हमें छुटकारा मिला है (दासत्व से मोल लेकर छुड़ाया जाना) और हमें अपने अपराधों की क्षमा मिली है (आयत 7)।

● परमेश्वर हमें अपनी इच्छा का भेद बताता है (आयत 9)।

● परमेश्वर सारी सृष्टि को एकत्र करेगा (आयत 10)।

● हम ठहराए गए हैं कि उसकी महिमा की स्तुति के लिये जीएँ (आयत 11)।

● हम पर उसके पवित्र आत्मा की छाप लगी है (आयत 13)।

फिर इफिसियों 2:6 में पौलुस लिखता है कि हम उसके साथ उठाए गए हैं, कि मसीह यीशु में स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाए जाएँ, ताकि परमेश्वर अपनी उस दया से जो मसीह यीशु में हम पर है, अपने अनुग्रह का असीम धन दिखाए।

हमारी सुरक्षा न तो अपना जहाज बनाने की हमारी सामर्थ्य में है, न हमारे भले कामों में। हमारी अपनी धार्मिकता काम न आएगी। हम अपनी युक्तियों अथवा चतुराइयों से बच नहीं सकते; वरन् यह सब विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से है। परमेश्वर ने उद्धार का एक मार्ग ठाना और तैयार किया है। वह हमें भीतर आने का निमन्त्रण देता है। हम मान तो सकते हैं, परन्तु यदि हम उसके निमन्त्रण के आज्ञाकारी नहीं, तो हमारा उद्धार न होगा। उद्धार देनेवाला विश्वास आज्ञाकारी उत्तर की माँग करता है।

और फिर, जो कोई नूह के पास रहता था, वह उस अद्भुत जहाज को अवश्य जानता होगा जिसे वह बना रहा था। सब जानते होंगे कि वह क्या प्रचार करता है, परन्तु कोई भी उसके निमन्त्रण का उत्तर देने को तैयार न था।

जो बात उनकी आँखों के सामने प्रत्यक्ष थी, उसे ग्रहण करने से इनकार करने के कारण वे लोग दोषी ठहरे। उसी प्रकार, यीशु में उद्धार का सुसमाचार आज संसार से छिपा हुआ नहीं है, परन्तु मनुष्य उस निमन्त्रण का उत्तर न देने को चुन लेते हैं; इसलिए कलीसिया की उपस्थिति आज भी संसार को दोषी ठहरानेवाली है।

सारांश विश्वास के उदाहरण के रूप में नूह की कथा हमें ये सिद्धान्त सिखाती है: 1. संसार पर एक न्यायदण्ड आ रहा है।

2. परमेश्वर ने अनुग्रह में होकर अपने पुत्र यीशु में बच निकलने का एक मार्ग बनाया है, और उद्धार किसी और में नहीं मिलता।

3. अनुग्रह परमेश्वर का एक मूलभूत गुण है।

4. उद्धार परमेश्वर के निमन्त्रण के प्रति आज्ञाकारी उत्तर की माँग करता है।

यही, उद्धार देनेवाला विश्वास है।

मनन के लिए प्रश्न

नूह ने ऐसा क्या किया जिससे उसका मानना विश्वास सिद्ध हुआ?

उसने परमेश्वर की बात केवल मान लेने से कहीं अधिक किया; उसने आज्ञा मानी, और परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सब कुछ किया, यद्यपि उसने न कभी जल-प्रलय देखा था, न कोई नाव; और जब तक जहाज पूरा न हुआ, उसने विश्राम न लिया। इवांस इसे “आज्ञाकारी कर्म में प्रगट हुआ मानना” कहते हैं।

इवांस जहाज को यीशु में उद्धार के चित्र के रूप में कैसे देखते हैं?

यीशु में एक जहाज तैयार किया गया है और जो कोई भीतर आना चाहे उसे निमंत्रण दिया गया है; जैसे परमेश्वर ने नूह के जहाज का द्वार बन्द कर दिया, वैसे ही उसने पवित्र आत्मा के द्वारा अपने पुत्र में हम पर छाप लगा दी है, जहाँ हमें सब प्रकार की आत्मिक आशीष मिली है। हमारी सुरक्षा न अपना जहाज बनाने में है, न भले कामों में; यह सब अनुग्रह से, विश्वास के द्वारा है।

नूह के विश्वास के उदाहरण से इवांस कौन से चार सिद्धान्त निकालते हैं?

संसार पर एक न्यायदण्ड आ रहा है; परमेश्वर ने अनुग्रह में होकर अपने पुत्र यीशु में बच निकलने का एक मार्ग बनाया है, और उद्धार किसी और में नहीं मिलता; अनुग्रह परमेश्वर का एक मूलभूत गुण है; और उद्धार परमेश्वर के निमन्त्रण के प्रति आज्ञाकारी उत्तर की माँग करता है। वे कहते हैं, यही उद्धार देनेवाला विश्वास है।

अध्याय 9 पूरा हुआ

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