वह मेरा कल थामे हुए है
यूसुफ

अध्याय 15 · 8 मिनट का पठन · 11 मिनट का श्रवण

यूसुफ

“विश्वास ही से यूसुफ ने, जब वह मरने पर था, तो इस्राएल की सन्तान के निकल जाने की चर्चा की, और अपनी हड्डियों के विषय में आज्ञा दी” (इब्रानियों 11:22)।

यूसुफ ने अपने उन भाइयों को, जिन्होंने उसके साथ इतना बुरा व्यवहार किया था, किस रीति से क्षमा किया, इसका संक्षिप्त वर्णन उत्पत्ति 50 के अन्त में मिलता है। वहाँ हमें यह अद्भुत वचन मिलता है, “यद्यपि तुम लोगों ने मेरे लिये बुराई का विचार किया था; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिससे वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगों के प्राण बचे हैं” (उत्पत्ति 50:20)। यद्यपि शत्रु बारम्बार परमेश्वर के लोगों पर आक्रमण ले आता है, तौभी हमारा पिता उन्हें भलाई में बदल सकता है — हमारे लिये भी, और अपने नाम के आदर के लिये भी।

यह आश्चर्य की बात जान पड़ती है कि विश्वास के विषय में लिखते समय इब्रानियों के लेखक ने उन घाटियों और पहाड़ों की चर्चा नहीं की जिनमें से और जिनके ऊपर से यहोवा ने यूसुफ की अगुवाई की थी, वरन् इसके बदले उसने वह उल्लेख चुना जो बाइबल की पहली पुस्तक के अन्त में एक तुच्छ-सी बात जान पड़ता है।

“मैं तो मरने पर हूँ; परन्तु परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुँचा देगा, जिसके देने की उसने अब्राहम, इसहाक, और याकूब से शपथ खाई थी” (उत्पत्ति 50:24)। फिर उसने अपने भाइयों से यह शपथ ली कि जब परमेश्वर उनकी सुधि ले, तब वे उसकी हड्डियाँ अपने साथ उस देश में ले जाएँ जिसकी प्रतिज्ञा की गई थी।

यूसुफ की यह भविष्यद्वाणी मूसा की अगुवाई में पूरी होने में और 400 वर्ष लगनेवाले थे। उसकी विनती के पूरे होने के लिये निर्गमन 13:19 और यहोशू 24:32 देखिए।

यूसुफ को परमेश्वर की ओर से एक भीतरी प्रकाशन मिला था, जिसे उसने अपने मुँह से अंगीकार किया, ठीक वैसे ही जैसे प्रेरित पतरस ने पर्वत

हेर्मोन पर 2000 वर्ष से भी अधिक समय के बाद किया। उसी में उसका विश्वास है।

इस आयत से हम क्या सीख सकते हैं?

पहली बात, हम उसकी दशा और उसके पिता तथा दादा की दशा में समानता देखते हैं। इसहाक और याकूब के समान वह भी एक परदेशी था, पराए देश में एक प्रवासी। ये तीनों पुरुष उस प्रतिज्ञा में प्रवेश किए बिना ही मर गए जो परमेश्वर ने की थी — उस प्रतिज्ञा किए हुए देश की प्रतिज्ञा, और इस्राएल जाति की महानता की प्रतिज्ञा। इसहाक खानाबदोश और भटकनेवाला ही रहा, याकूब अब भी मिस्र देश में परदेश काट रहा था, और यूसुफ प्रतिष्ठा की चकाचौंध भरी ऊँचाइयों तक पहुँच गया था, परन्तु वह तौभी पराए देश में एक परदेशी की ही महानता थी। फिर भी परमेश्वर ने तीनों को यह गवाही दी कि उसकी प्रतिज्ञा विफल न होगी। वे निराशा में नहीं, वरन् आशा में मरे।

जीवन में हमारी दशा जो भी हो, हम इन्हीं कुलपिताओं के मार्ग पर चलने को बुलाए गए हैं: विश्वास की चाल। हो सकता है कि हम भी इस संसार में प्रतिष्ठा तक उठें, परन्तु हमें कभी न भूलना चाहिए कि हम एक दूसरे, ऊँचे राज्य के नागरिक हैं। हम में से अधिकांश परमेश्वर की उन बड़ी प्रतिज्ञाओं का अनुभव कभी न करेंगे, परन्तु हम में से हर एक को ऐसा जीवन जीना है कि वह दिन निकट आ जाए जब दूसरे उनमें आनन्दित हो सकें। यीशु ने यह अद्भुत प्रतिज्ञा की कि सुसमाचार सारे जगत में सब जातियों को प्रचार किया जाना अवश्य है, “तब अन्त आ जाएगा” (मत्ती 24:14)। वह अन्त में पाप का अन्त करेगा और अपना धार्मिकता का राज्य ले आएगा।

आज संसार में रहते हुए आप यह मान सकते हैं कि उसका आना अभी बहुत दूर है। तौभी यूसुफ का उदाहरण हमें यह सिखाने के लिये दिया गया है कि हमें निरन्तर उस प्रतिज्ञा के पूरे होने के निश्चय की ओर ताकते रहना है, और ऐसी ही प्रतीक्षा का जीवन जीना है। हमें हर दिन अनन्तकाल के प्रकाश में जीना है।

वर्षों के बीतते-बीतते यूसुफ परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को जान गया, और उसकी भाषा बदल गई। वह अब उन स्वप्नों की चर्चा नहीं करता था जिनमें वह अपने घराने पर प्रभुता करता। उसने यह नहीं कहा, “जाकर मेरे पिता को मिस्र में मेरी सारी महिमा का समाचार दो।”

इब्रानियों के लेखक ने हमें कुछ सिखाने के लिये उसके मरते दिनों का उदाहरण चुना है। यूसुफ अपनी सांसारिक महिमा के अन्त के निकट है, और उसने जान लिया है कि इस संसार की सारी महिमा और आदर मरनेवाले मनुष्य के लिये कुछ भी नहीं। वे कुछ समय के लिये सन्तुष्ट रह सकते हैं, परन्तु, अन्त में वे फूटते हुए बुलबुले के समान हैं।

जीवन एक क्षणभंगुर वस्तु है।

“तुम्हारा जीवन है ही क्या?” याकूब कहता है, “तुम तो मानो धुंध के समान हो, जो थोड़ी देर दिखाई देती है, फिर लोप हो जाती है” (याकूब 4:14)।

परमेश्वर उस वृद्ध पुरुष में विश्वास जगाता है, कि वह अब देख सके कि उसकी सच्ची मीरास कहाँ है। वह एक भावी देश में है, और एक भावी छुड़ानेवाले के आने में। कोई यह सोचेगा कि वह चाहेगा कि उसके वंशज मिस्र के इसी देश में बने रहें, जो उसके लिये इतना भला रहा है। फिर वह क्यों नहीं चाहता कि उसकी देह वहीं रहे? हो सकता है कि यदि वह मिस्र में गाड़ा न जाता तो वे उसके लिये एक बड़ा स्मारक बनवाते, किसी प्रतिष्ठित स्थान में एक बड़ी कब्र, या सम्भव है किसी बड़े भवन का नाम उसी के नाम पर रखते; उसका नाम सदा के लिये जाना जाता। सचमुच, वह यहोवा के लिये एक मन्दिर बनवा सकता था और उसका नाम रख सकता था, “प्रथम यूसुफ बेन-याकूब स्मारक कलीसिया।” इस रीति से वह अपनी महिमा में से कुछ भी खोए बिना परमेश्वर का आदर कर सकता था!

परन्तु परमेश्वर अपनी महिमा न मनुष्य के साथ बाँटेगा, न अपनी किसी सृष्टि के साथ। निस्सन्देह मैं व्यंग्य कर रहा हूँ, परन्तु क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि हमारे दिनों के कितने ही नामी ‘परमेश्वर के जन’, जब खराई और परमेश्वर के काम के प्रति विश्वासयोग्यता की लड़ाई में उनका आदर या नाम दाँव पर लगा, तब हठ करके अपने पद से चिपके रहे हैं। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि विश्वासियों को कितनी सहजता से इस बात के लिये बहकाया जा सकता है कि वे ‘यह काम करें’ या ‘उस उद्देश्य के लिये दें,’ जब उसके साथ प्रतिफल या प्रतिष्ठा जुड़ी हो? इसके बदले हम मरे हुए मनुष्यों के समान होने को बुलाए गए हैं, जो अपना कोई अधिकार नहीं जताते और इस संसार में कोई प्रतिष्ठा नहीं ढूँढ़ते। परमेश्वर ने हमें प्रसिद्ध या सफल होने के लिये नहीं बुलाया; उसने हमें विश्वासयोग्य होने के लिये बुलाया है।

यूसुफ के समान हमारा विषय भी हमारे छुड़ानेवाले का आना और उसके पास हमारा इकट्ठा किया जाना होना चाहिए। यीशु हमारा छुड़ानेवाला है, और वह शीघ्र आ रहा है। उसने हमें पाप के दण्ड से पहले ही छुड़ा लिया है — धर्मी ठहराया जाना, हमारी आत्माओं के लिये पूर्णता। वह इस समय हमें पाप की सामर्थ्य से छुड़ा रहा है — पवित्रीकरण, हमारे प्राणों के लिये पूर्णता, और वह शीघ्र ही आकर हमें पाप की उपस्थिति से छुड़ाएगा — महिमान्वित किया जाना, हमारी देहों के लिये पूर्णता!

मुझे निश्चय है कि यूसुफ के विपरीत हमें 400 वर्ष से अधिक बाट नहीं जोहनी पड़ेगी, वरन् यह कि “शीघ्र, बहुत ही शीघ्र, हम राजा को देखने जा रहे हैं” (आन्द्रे क्राउच, सून एण्ड वैरी सून)। जब मैं इस संसार को उसकी बढ़ती हुई समस्याओं — जनसंख्या की अधिकता, अकाल, प्राकृतिक विपत्तियाँ, और परिवारों तथा सामाजिक ढाँचों के टूटने — के साथ देखता हूँ। जब मैं कलीसिया को संसार के अधिकांश भागों में उसके बड़े विस्तार और मिशन-कार्यक्रमों के साथ देखता हूँ, तो मुझे निश्चय हो जाता है कि वह शीघ्र आ रहा है। जब मैं कलीसिया के भीतर उन लोगों के, जो उसके वचन के प्रति विश्वासयोग्य हैं, और उसके अधिक उदारवादी सदस्यों के बीच के विभाजन पर विचार करता हूँ, तो मैं निराश नहीं होता, वरन् पहचान लेता हूँ कि वह अब अपनी दुल्हन को तैयार और शुद्ध कर रहा है। यदि उसके आने के समय हम जीवित होंगे, तो हम उस मीरास में जाएँगे, और यदि हम सो जाएँ, तो भी हम पीछे न छोड़े जाएँगे। सो, विश्वास से कहे गए यूसुफ के शब्दों में हम जीवितों और मरे हुओं को दासत्व के स्थान से एक साथ निकलते हुए देखते हैं।

“जो मसीह में मरे हैं, वे पहले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उनके साथ बादलों पर उठा लिए जाएँगे, कि हवा में प्रभु से मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे” (1 थिस्सलुनीकियों 4:16-17)।

निश्चय ही इस संसार की महिमा और चमक-दमक फीकी पड़ जाती है, जब हम उस आनन्द के दिन की ओर ताकते हैं, जो इतनी शीघ्र होनेवाला है। क्या हम इसे अपना प्रतिदिन का विषय बना रहे हैं? हो सकता है कि हमें क्रूस के तले अपनी ‘मृत्यु-शय्या’ पर फिर आना पड़े, जहाँ हमारी दृष्टि बदल जाएगी, क्योंकि मरे हुए मनुष्य इस संसार की वस्तुओं की चिन्ता नहीं करते।

सारांश अपनी मृत्यु-शय्या पर यूसुफ को वह विश्वास दिया गया कि वह भविष्य में दृष्टि डालकर उस छुड़ानेवाले मूसा को देखे, जो परमेश्वर के लोगों को मिस्र से निकाल ले जाने और उन्हें उनकी मीरास तक पहुँचाने को आनेवाला था।

यद्यपि वह मिस्र में एक सफल पुरुष था, तौभी विश्वास ने प्रगट किया कि इस्राएल की सन्तान के लिये एक उत्तम देश और एक उत्तम भविष्य है।

1. एक छुड़ानेवाला, यीशु, हमें हमारे दासत्व से निकालने और अपने प्रतिज्ञा किए हुए राज्य में ले जाने को आया है।

2. विश्वास हमें उन मनुष्यों की आँखों से आगे की ओर ताकने के योग्य बनाता है जो इस संसार के लिये मर चुके हैं।

3. हमारा भविष्य हमारी सम्पत्ति या पद में नहीं पाया जाता — वह उसकी प्रतिज्ञा में पाया जाता है।

4. हमें हर दिन उसके दूसरे आगमन के प्रकाश में जीना आवश्यक है।

5. यह जीवन एक क्षणभंगुर पल ही है।

मनन के लिए प्रश्न

इब्रानियों ने जो आयत चुनी है, उसमें इवांस यूसुफ के विश्वास को कहाँ पाते हैं?

अपनी मृत्यु-शय्या पर यूसुफ ने घोषणा की कि परमेश्वर निश्चय अपने लोगों की सुधि लेगा और उन्हें मिस्र से निकाल ले जाएगा, और उसने अपने भाइयों से यह शपथ ली कि वे उसकी हड्डियाँ प्रतिज्ञा के देश में ले जाएँ। उसे परमेश्वर की ओर से एक भीतरी प्रकाशन मिला था, जिसे उसने अपने मुँह से अंगीकार किया, जैसे आगे चलकर पतरस ने किया; इवांस कहते हैं, यही उसका विश्वास है।

अपनी मृत्यु के समय इसहाक, याकूब और यूसुफ में क्या समानता थी?

तीनों परदेशी और प्रवासी थे, जो देश की और इस्राएल की महानता की प्रतिज्ञा में प्रवेश किए बिना मर गए — यूसुफ भी, मिस्र में अपनी सारी प्रतिष्ठा के होते हुए। तौभी परमेश्वर ने उनमें से हर एक को यह गवाही दी कि उसकी प्रतिज्ञा विफल न होगी, इसलिए वे निराशा में नहीं, वरन् आशा में मरे।

इवांस के विचार में यूसुफ यह क्यों नहीं चाहता था कि उसकी देह मिस्र में रहे?

मृत्यु के निकट पहुँचकर उसने जान लिया था कि इस संसार की सारी महिमा और आदर फूटते हुए बुलबुले के समान हैं, और परमेश्वर ने उसमें विश्वास जगाया कि वह देखे कि उसकी सच्ची मीरास एक भावी देश में और एक आनेवाले छुड़ानेवाले में है। इवांस इसकी तुलना कोई बड़ा स्मारक ढूँढ़ने से करते हैं, और हमें स्मरण दिलाते हैं कि परमेश्वर ने हमें प्रसिद्ध या सफल होने के लिये नहीं, वरन् विश्वासयोग्य होने के लिये बुलाया है।

इवांस के अनुसार हमारा छुड़ानेवाला यीशु कौन से तीन छुटकारे देता है?

उसने हमें पाप के दण्ड से पहले ही छुड़ा लिया है (धर्मी ठहराया जाना, हमारी आत्माओं के लिये पूर्णता), वह इस समय हमें पाप की सामर्थ्य से छुड़ा रहा है (पवित्रीकरण, हमारे प्राणों के लिये पूर्णता), और वह शीघ्र ही हमें पाप की उपस्थिति से छुड़ाएगा (महिमान्वित किया जाना, हमारी देहों के लिये पूर्णता)।

इवांस के सुझाव के अनुसार हम इस संसार की महिमा को अपने ऊपर हावी होने से कैसे रोक सकते हैं?

यूसुफ के समान अपने छुड़ानेवाले के आने की बाट जोहते हुए, और हर दिन अनन्तकाल के तथा उसके दूसरे आगमन के प्रकाश में जीते हुए। वे सुझाव देते हैं कि हमें क्रूस के तले अपनी ‘मृत्यु-शय्या’ पर फिर आना पड़ सकता है, “क्योंकि मरे हुए मनुष्य इस संसार की वस्तुओं की चिन्ता नहीं करते।”

अध्याय 15 पूरा हुआ

यूसुफ

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