पाठ
उत्पत्ति 5:24
संक्षेप में
“हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था।” इन थोड़े से शब्दों से व्हाइटफ़ील्ड मसीही जीवन का पूरा चित्र खींचते हैं: परमेश्वर के साथ चलने का क्या अर्थ है, उसके साथ कदम मिलाकर चलने के साधन — प्रार्थना, वचन, उसके लोगों की संगति — और ऐसी चाल का अन्त, जब परमेश्वर अपने मित्र को घर ले जाता है।
“हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया।”
भ्रष्ट मन वाले लोग परमेश्वर की न्यायपूर्ण और पवित्र आज्ञाओं का पालन करने के विरुद्ध प्रायः अनेक प्रकार के बहाने और तर्क प्रस्तुत करते हैं। परन्तु कदाचित् उनकी सबसे आम आपत्तियों में से एक यह है, कि हमारे प्रभु की आज्ञाओं का पालन हो ही नहीं सकता, क्योंकि वे मांस और लहू के विपरीत हैं; और इसलिए वह ‘कठोर मनुष्य है: तू जहाँ कहीं नहीं बोता वहाँ काटता है, और जहाँ नहीं छींटता वहाँ से बटोरता है’। जैसा हम पाते हैं, यही विचार उस दुष्ट और आलसी दास के थे जिसका उल्लेख संत मत्ती के 25वें अध्याय में है; और निस्सन्देह आज की इस दुष्ट और व्यभिचारी पीढ़ी में भी बहुत से लोग ऐसे ही विचार रखते हैं। पवित्र आत्मा ने इसे पहले से देखकर, प्राचीनकाल के पवित्र जनों को प्रेरित करने का ध्यान रखा, कि वे बहुत से पवित्र पुरुषों और स्त्रियों के उदाहरण लिख रखें; जो पुराने नियम के युग में भी, आनन्द से मसीह का जूआ अपने ऊपर उठाने के योग्य किए गए, और उसकी सेवा को पूर्ण स्वतंत्रता समझते थे। इब्रानियों के 11वें अध्याय में संतों, अंगीकार करनेवालों और शहीदों की जो लम्बी सूची दी गई है, वह इस बात की सच्चाई को भरपूर रीति से प्रमाणित करती है। वहाँ हमारी आँखों के सामने गवाहों का कैसा बड़ा बादल रखा गया है? सब अपने विश्वास के लिए प्रसिद्ध हैं, परन्तु कुछ दूसरों से अधिक तेज के साथ चमकते हैं। प्रथम शहीद हाबिल सबसे आगे चलता है। और उसके बाद हम हनोक का उल्लेख पाते हैं, केवल इसलिए नहीं कि समय के क्रम में वह उसके बाद आता है, परन्तु उसकी ऊँची भक्ति के कारण भी; पाठ के शब्दों में उसके विषय में बड़ी असाधारण रीति से कहा गया है। यहाँ हमें उसका एक संक्षिप्त परन्तु अत्यन्त पूर्ण और महिमामय वृत्तान्त मिलता है, इस संसार में उसके चालचलन का भी, और अगले संसार में उसके विजयी प्रवेश की रीति का भी। पहला इन शब्दों में है, ‘हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था’। दूसरा इनमें, ‘फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया’। वह लोप हो गया; अर्थात्, उसका पता नहीं मिला, वह सामान्य रीति से इस संसार से नहीं गया, उसने मृत्यु नहीं देखी; क्योंकि परमेश्वर ने उसे सदेह उठा लिया था। (इब्रानियों 11:5।) यह हनोक कौन था, यह इतना स्पष्ट नहीं दिखाई देता। मुझे तो ऐसा लगता है कि वह कोई सार्वजनिक पद का व्यक्ति था; मेरा अनुमान है, नूह के समान, धार्मिकता का प्रचारक। और यदि हम प्रेरित यहूदा की बात पर विश्वास करें, तो वह एक ज्वलन्त प्रचारक था। क्योंकि वह उसकी एक भविष्यद्वाणी उद्धृत करता है, जिसमें वह कहता है, ‘देखो, प्रभु अपने लाखों पवित्रों के साथ आया। कि सब का न्याय करे, और सब भक्तिहीनों को उनके अभक्ति के सब कामों के विषय में जो उन्होंने भक्तिहीन होकर किए हैं, और उन सब कठोर बातों के विषय में जो भक्तिहीन पापियों ने उसके विरोध में कही हैं, दोषी ठहराए।’ परन्तु चाहे वह सार्वजनिक व्यक्ति रहा हो या निजी, जीवित वचनों में उसे एक उत्तम गवाही दी गई है। इब्रानियों की पत्री का लेखक कहता है, कि उठाए जाने से पहले उसकी यह गवाही दी गई थी, ‘कि उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया है’; और उसका उठा लिया जाना सब सन्देह से परे इसका प्रमाण था। और मैं यह ध्यान दिलाना चाहूँगा, कि पुराने नियम के युग में हनोक और एलिय्याह को उठा लेना परमेश्वर की अद्भुत बुद्धि थी, ताकि आगे चलकर, जब यह घोषणा की जाए कि प्रभु यीशु स्वर्ग पर उठा लिया गया, तो यहूदियों को यह बात बिलकुल अविश्वसनीय न लगे; क्योंकि वे स्वयं मानते थे कि उनके अपने दो भविष्यद्वक्ता कई सौ वर्ष पहले उठा लिए गए थे। परन्तु हनोक के इस संक्षिप्त परन्तु व्यापक चरित्र का विस्तार करके, या उस पर टिप्पणियाँ करके, आपको और अधिक रोके रखना मेरा उद्देश्य नहीं है: मेरे मन में तो यह है कि, जैसे प्रभु सामर्थ्य दे, एक भारी और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय पर प्रवचन दूँ; मेरा अभिप्राय है, परमेश्वर के साथ चलना। ‘हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था।’ यदि मृत्यु के बाद आपके और मेरे विषय में सचमुच इतना भी कहा जा सके, तो हमें यह शिकायत करने का कोई कारण न होगा कि हमने व्यर्थ ही जीवन बिताया।
अपने इस विषय पर विचार करते हुए, मैं,
पहला, यह दिखाने का प्रयत्न करूँगा कि इन शब्दों, परमेश्वर के साथ-साथ चलता था, में क्या निहित है।
दूसरा, मैं कुछ साधन बताऊँगा, जिनका उचित रीति से पालन करने पर विश्वासी परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए रख सकते हैं और उसे स्थिर रख सकते हैं। और,
तीसरा, कुछ प्रेरक कारण प्रस्तुत करूँगा, जो हमें उभारें, कि यदि हम पहले कभी परमेश्वर के साथ नहीं चले, तो अब आकर परमेश्वर के साथ चलें। अन्त में पूरी बात को व्यावहारिक प्रयोग की एक-दो बातों के साथ समाप्त किया जाएगा।
पहला, मुझे यह दिखाना है कि इन शब्दों, ‘परमेश्वर के साथ-साथ चलता था’, में क्या निहित है; या, दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के साथ चलने से हमें क्या समझना चाहिए।
और पहला, परमेश्वर के साथ चलने का अर्थ है, कि मनुष्य के हृदय की शत्रुता की प्रबल शक्ति परमेश्वर के धन्य आत्मा द्वारा दूर कर दी जाए। कदाचित् कुछ लोगों को यह कठोर बात लगे, परन्तु हमारा अपना अनुभव प्रतिदिन वही प्रमाणित करता है जो पवित्रशास्त्र अनेक स्थानों में कहता है, कि शरीर पर मन लगाना, अर्थात् बिना मन फिराए स्वाभाविक मनुष्य का मन, वरन् नया जन्म पाए हुए का मन भी, जहाँ तक उसका कोई भाग अब तक नया नहीं हुआ है, परमेश्वर से बैर रखना है, केवल बैरी होना नहीं, परन्तु स्वयं बैर; इसलिए वह न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है। सचमुच, कोई भी भली-भाँति आश्चर्य कर सकता है कि कोई भी प्राणी, विशेषकर मनुष्य जैसा मनोहर प्राणी, जो अपने सृष्टिकर्ता के ही स्वरूप में बनाया गया, उसी परमेश्वर के विरुद्ध, जिसमें वह जीवित रहता, और चलता फिरता, और स्थिर रहता है, कभी कोई शत्रुता रखे, प्रबल शत्रुता तो दूर की बात। परन्तु हाय! ऐसा ही है। हमारे आदि माता-पिता ने यह शत्रुता तब ग्रहण की जब वे वर्जित फल खाकर परमेश्वर से गिर गए, और इसका कड़वा और घातक संक्रमण उनकी सारी सन्तान में उतर आया है और उस पर पूरी तरह छा गया है। यह शत्रुता आदम के वाटिका के वृक्षों के बीच छिपने के प्रयत्न में प्रकट हुई। जब उसने यहोवा परमेश्वर का शब्द सुना, तो खुले मन से दौड़कर यह कहने के बदले कि मैं यहाँ हूँ; हाय! अब उसे परमेश्वर के साथ कोई संगति नहीं चाहिए थी; और उसने परमप्रधान के सामने जो बहाना बनाया, उससे अपनी हाल ही में उत्पन्न हुई शत्रुता को और भी प्रकट किया: ‘जिस स्त्री को (या, इस स्त्री को) तूने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया’। ऐसा कहकर, वह वास्तव में सारा दोष परमेश्वर पर डाल देता है; मानो उसने कहा हो, यदि तूने मुझे यह स्त्री न दी होती, तो मैं तेरे विरुद्ध पाप न करता, इसलिए मेरे अपराध के लिए तू अपने आप को ही धन्यवाद दे। इसी प्रकार यह शत्रुता आदम की सन्तान के हृदयों में काम करती है। वे बार-बार अपने भीतर कुछ ऐसा पाते हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध उठता है, और परमेश्वर से भी कहता है, तू यह क्या करता है? ‘यह (विद्वान डॉ. ओवेन भीतर बसे पाप पर लिखे अपने उत्तम ग्रन्थ में कहते हैं) स्वयं परमेश्वर से कम किसी प्रतिद्वन्द्वी को तुच्छ समझती है।’ इसकी आज्ञा अहाब के विषय में अरामियों की आज्ञा के समान है — केवल राजा पर ही तीर चलाओ। और यह हर उस बात पर प्रहार करती है जिसमें सच्ची भक्ति का रूप दिखाई देता है, जैसे अरामियों ने राजसी वस्त्र पहने यहोशापात पर तीर चलाए। परन्तु जब यह पाती है कि वह केवल रूप ही है, तो विरोध थम जाता है, जैसे अरामियों ने यहोशापात पर तीर चलाना छोड़ दिया, जब उन्होंने देखा कि जिस पर वे तीर चला रहे थे वह अहाब नहीं था। यह शत्रुता शापित कैन में प्रकट हुई; उसने अपने भाई हाबिल से बैर किया और उसे मार डाला, क्योंकि हाबिल अपने परमेश्वर से प्रेम करता था, और उस पर उसके परमेश्वर की विशेष कृपा थी। और यही शत्रुता हर उस मनुष्य में राज्य करती और प्रबल रहती है जो स्वाभाविक रीति से आदम के वंश से उत्पन्न होता है। इसी कारण बालकों में, और बहुधा उन बड़े लोगों में भी जिन्हें धार्मिक शिक्षा की आशीष मिली है, प्रार्थना और पवित्र कर्तव्यों के प्रति वह अरुचि पाई जाती है। और वह सारा खुला पाप और दुष्टता, जो जल-प्रलय के समान संसार पर उमड़ पड़ी है, इसी भयानक संक्रामक सोते से बहनेवाली इतनी सारी धाराएँ ही हैं; मेरा अभिप्राय है, मनुष्य के अत्यन्त दुष्ट और छली हृदय की शत्रुता। जो इस पर अपनी मुहर नहीं लगा सकता, वह अब तक उद्धार देनेवाली रीति से न तो पवित्रशास्त्र के विषय में कुछ जानता है, न परमेश्वर की सामर्थ्य के विषय में। और जो सब इसे जानते हैं, वे सहज ही मान लेंगे, कि इससे पहले कि किसी व्यक्ति के विषय में कहा जा सके कि वह परमेश्वर के साथ चलता है, हृदय की इस शत्रुता की प्रबल शक्ति का नाश होना आवश्यक है: क्योंकि जो लोग एक-दूसरे के प्रति न मिटनेवाली शत्रुता और घृणा रखते हैं, वे साथ-साथ चलने और संगति रखने के आदी नहीं होते। मेरी बात पर ध्यान दीजिए, मैं कहता हूँ, इस शत्रुता की प्रबल शक्ति दूर की जानी चाहिए; क्योंकि इसका भीतर बना रहना तब तक पूरी तरह कभी दूर न होगा, जब तक हम अपना सिर न झुका दें, और प्राण न छोड़ दें। प्रेरित पौलुस, निस्सन्देह, अपने ही विषय में बोलता है, और वह भी तब का नहीं जब वह फरीसी था, परन्तु तब का जब वह सच्चा मसीही था; जब वह शिकायत करता है, ‘जब भलाई करने की इच्छा करता हूँ, तो बुराई मेरे पास आती है’; उस पर प्रभुता करती हुई नहीं, परन्तु उसकी भली इच्छाओं और कामों का विरोध और सामना करती हुई, यहाँ तक कि वह उन कामों को, जिन्हें वह करना चाहता था, उस सिद्धता से नहीं कर पाता था जिसकी लालसा नया मनुष्य करता था। इसी को वह अपने में बसा हुआ पाप कहता है। ‘और यही वह φρόνημα σαρκός है’, जिसे (हमारी कलीसिया के नौवें धर्मसूत्र के शब्दों का प्रयोग करें तो,) कुछ लोग शरीर की बुद्धि, कुछ कामुकता, कुछ अनुराग, कुछ अभिलाषा कहकर समझाते हैं, जो बनी रहती है, हाँ, उनमें भी जो नया जन्म पा चुके हैं।' परन्तु जहाँ तक इसकी प्रबल शक्ति की बात है, वह हर उस प्राण में नष्ट हो जाती है जो सचमुच परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, और जैसे-जैसे विश्वासी अनुग्रह में बढ़ता है, और परमेश्वर का आत्मा हृदय में अधिकाधिक प्रभुता पाता है, वैसे-वैसे वह धीरे-धीरे और भी निर्बल होती जाती है।
परन्तु दूसरी बात, परमेश्वर के साथ चलने का अर्थ केवल यह नहीं कि मनुष्य के हृदय की शत्रुता की प्रबल शक्ति दूर कर दी जाए, वरन् यह भी कि वह व्यक्ति परमेश्वर पिता के साथ, उसके प्रिय पुत्र की सर्वपर्याप्त धार्मिकता और प्रायश्चित में होकर और उसी के द्वारा, सचमुच मेल मिलाप कर ले। ‘यदि दो मनुष्य परस्पर सहमत न हों, (सुलैमान कहता है, [वास्तव में आमोस 3:3]) तो क्या वे एक संग चल सकेंगे?’ यीशु हमारा मेल भी है और हमारा मेल कराने वाला भी। जब हम मसीह पर विश्वास के द्वारा धर्मी ठहरते हैं, तब, परन्तु उससे पहले कदापि नहीं, परमेश्वर के साथ हमारा मेल होता है; और इसलिए उससे पहले यह नहीं कहा जा सकता कि हम उसके साथ चलते हैं, क्योंकि किसी व्यक्ति के साथ चलना इस बात का चिह्न और प्रमाण है कि हम उस व्यक्ति के मित्र हैं, या कम से कम यह कि यद्यपि हम में अनबन रही है, तौभी अब हमारा मेल हो गया है और हम फिर से मित्र बन गए हैं। यही वह महान काम है जिसके लिए सुसमाचार के सेवक भेजे जाते हैं। मेल मिलाप की सेवा हमें सौंप दी गई है; परमेश्वर के राजदूत होकर हमें मसीह की ओर से पापियों से विनती करनी है कि वे परमेश्वर के साथ मेल मिलाप कर लें; और जब वे इस अनुग्रहपूर्ण निमंत्रण को मान लेते हैं, और विश्वास के द्वारा सचमुच परमेश्वर के साथ मेल मिलाप की दशा में लाए जाते हैं, तब, और उससे पहले कदापि नहीं, उनके विषय में यह कहा जा सकता है कि उन्होंने परमेश्वर के साथ चलना आरम्भ भर किया है।
फिर, तीसरी बात, परमेश्वर के साथ चलने का अर्थ है परमेश्वर के साथ स्थिर और स्थायी संगति और सहभागिता, अर्थात् वह जिसे पवित्रशास्त्र में ‘पवित्र आत्मा का हम में बसना’ कहा गया है। यही वह बात है जिसकी प्रतिज्ञा हमारे प्रभु ने तब की जब उसने अपने चेलों से कहा कि ‘पवित्र आत्मा उनमें और उनके साथ रहेगा’; किसी बटोही के समान नहीं जो केवल एक रात ठहरता है, वरन् उनके हृदयों में निवास करने और अपना डेरा बनाने के लिए। मेरा मानना है कि प्रेरित यूहन्ना भी हमें यही समझाना चाहता है, जब वह किसी व्यक्ति के ‘उसमें, अर्थात् मसीह में, बने रहने और वैसे ही चलने की जैसे वह स्वयं चलता था’ बात करता है। और हमारे पाठ के शब्दों का भी विशेष रूप से यही अर्थ है। ‘हनोक परमेश्वर के साथ-साथ चलता था’, अर्थात् उसने मसीह यीशु में होकर और उसी के द्वारा परमेश्वर के साथ एक पवित्र, स्थिर, अभ्यस्त संगति और सहभागिता बनाए रखी, यद्यपि निःसन्देह वह पूरी तरह निर्बाध न थी। अतः पहले मुख्य विषय के इस भाग पर जो कहा गया है उसका सार यह है कि परमेश्वर के साथ चलना विशेष रूप से इन बातों में है: इच्छा का परमेश्वर की ओर स्थिर और अभ्यस्त झुकाव, उसकी सामर्थ्य और प्रतिज्ञा पर अभ्यस्त निर्भरता, अपना सब कुछ उसकी महिमा के लिए स्वेच्छा से और अभ्यस्त रूप से अर्पित करना, जो कुछ हम करते हैं उस सब में उसकी आज्ञा पर अभ्यस्त दृष्टि रखना, और जो कुछ हम सहते हैं उस सब में उसकी इच्छा में अभ्यस्त सन्तोष पाना।
चौथी बात, परमेश्वर के साथ चलने का अर्थ है ईश्वरीय जीवन में हमारी प्रगति या उन्नति। चलना, शब्द के पहले ही अर्थ में, आगे की ओर गति को मान कर चलता जान पड़ता है। जो व्यक्ति चलता है, चाहे वह धीरे ही क्यों न चले, तौभी आगे बढ़ता है, और एक ही स्थान पर नहीं टिका रहता। और ऐसा ही उनके साथ है जो परमेश्वर के साथ चलते हैं। वे, जैसा भजनकार कहता है, ‘बल पर बल पाते जाते हैं’; या, प्रेरित पौलुस की भाषा में, वे प्रभु के आत्मा के द्वारा ‘उसी तेजस्वी रूप में अंश-अंश करके बदलते जाते हैं’। सच है कि एक अर्थ में ईश्वरीय जीवन में न बढ़ती होती है न घटती। जब कोई प्राणी परमेश्वर से जन्म लेता है, तो वह हर प्रकार से और हर अर्थ में परमेश्वर की सन्तान है; और यदि वह मतूशेलह की आयु तक भी जीवित रहे, तौभी अन्त में वह परमेश्वर की सन्तान ही होगा, इससे बढ़कर कुछ नहीं। परन्तु दूसरे अर्थ में ईश्वरीय जीवन में घटना और बढ़ना दोनों होते हैं। इसी कारण हम पाते हैं कि परमेश्वर के लोगों पर भटक जाने और अपना पहला प्रेम छोड़ देने का दोष लगाया गया है। और इसी कारण हम मसीह में बालकों, जवानों और पिताओं के विषय में सुनते हैं। और इसी कारण प्रेरित तीमुथियुस को उपदेश देता है कि उसकी ‘उन्नति सब पर प्रगट हो’। और जो बात यहाँ विशेष रूप से तीमुथियुस से माँगी गई है, वही संत पतरस सामान्य रूप से सब मसीहियों को आज्ञा देता है। ‘पर हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह (वह कहता है) और पहचान में बढ़ते जाओ’। क्योंकि नई सृष्टि आत्मिक डील-डौल में बढ़ती है; और यद्यपि कोई व्यक्ति नई सृष्टि होने से अधिक कुछ नहीं हो सकता, तौभी कुछ लोग दूसरों से अधिक ईश्वरीय स्वरूप के अनुरूप होते हैं, और मृत्यु के बाद वे आनन्द की अधिक मात्रा में प्रवेश पाएँगे। इस भेद पर ध्यान न देने के कारण, कुछ अनुग्रह पाए हुए प्राणी भी, जिनके हृदय उनकी बुद्धि से अच्छे हैं, (वैसे ही वे भी जिनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है और वे विश्वास के विषय में निकम्मे हैं) अनजाने में खुले व्यवस्था-विरोधी (एन्टीनोमियन) सिद्धान्तों में जा पड़े हैं, और विश्वासी में अनुग्रह की किसी भी बढ़ती का, या सत्य के पवित्रशास्त्र में अनुग्रह के किसी भी चिह्न के ठहराए जाने का इन्कार करते हैं। ऐसे सिद्धान्तों से, और विशेष करके उन आचरणों से जो ऐसे सिद्धान्तों से स्वाभाविक रूप से निकलते हैं, प्रभुओं का प्रभु हमें छुड़ाए!
तो जो कुछ कहा गया है उससे अब हम जान सकते हैं कि ‘परमेश्वर के साथ-साथ चलता था’ इन शब्दों में क्या निहित है, अर्थात्: परमेश्वर के आत्मा की सामर्थ्य से हमारे हृदयों की प्रबल शत्रुता का दूर किया जाना; यीशु मसीह पर विश्वास के द्वारा उसके साथ हमारा सचमुच मेल मिलाप होना और उससे जुड़ जाना; उसके साथ स्थिर संगति और सहभागिता पाना और उसे बनाए रखना; और इस सहभागिता में प्रतिदिन ऐसी प्रगति करना कि हम अधिकाधिक ईश्वरीय स्वरूप के अनुरूप होते जाएँ।
यह कैसे होता है, या दूसरे शब्दों में, विश्वासी किन साधनों से परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए और स्थिर रखते हैं, इस पर हम अपने दूसरे मुख्य विषय के अन्तर्गत विचार करेंगे।
और, पहली बात, विश्वासी परमेश्वर के पवित्र वचन को पढ़ने के द्वारा उसके साथ अपना चलना बनाए और स्थिर रखते हैं। ‘पवित्रशास्त्र’ में ढूँढ़ो, हमारा धन्य प्रभु कहता है, ‘यह वही है, जो मेरी गवाही देता है’। और राजकीय भजनकार हमें बताता है कि परमेश्वर का वचन उसके लिए क्या था: ‘तेरा वचन मेरे पाँव के लिये दीपक, और मेरे मार्ग के लिये उजियाला है’; और वह भले मनुष्य का एक लक्षण यह ठहराता है कि ‘वह तो यहोवा की व्यवस्था से प्रसन्न रहता; और उसकी व्यवस्था पर रात-दिन ध्यान करता रहता है’। ‘पढ़ने और उपदेश देने और सिखाने में लौलीन रह’, (पौलुस तीमुथियुस से कहता है); ‘व्यवस्था की यह पुस्तक, (परमेश्वर यहोशू से कहता है) तेरे चित्त से कभी न उतरने पाए’। क्योंकि जितनी बातें पहले से लिखी गईं, वे हमारी ही शिक्षा के लिये लिखी गईं हैं। और परमेश्वर का वचन समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है, और परमेश्वर की हर एक सच्ची सन्तान को हर एक भले काम के लिये पूरी रीति से तत्पर करने में हर प्रकार से पर्याप्त है। यदि हम एक बार अपनी बाइबल से ऊपर उठ बैठें, और परमेश्वर के लिखित वचन को विश्वास और आचरण दोनों में अपना एकमात्र नियम मानना छोड़ दें, तो हम शीघ्र ही हर प्रकार के भ्रम के लिए खुले पड़ जाएँगे, और विश्वास तथा अच्छे विवेक रूपी जहाज के डूब जाने के बड़े संकट में होंगे। हमारे धन्य प्रभु के पास यद्यपि परमेश्वर का आत्मा बिना नाप के था, तौभी वह सदा ‘लिखा है’ से चलता रहा, और इसी से उसने शैतान से युद्ध किया। प्रेरित इसे ‘आत्मा की तलवार’ कहता है। हम इसके विषय में वही कह सकते हैं जो दाऊद ने गोलियत की तलवार के विषय में कहा था, ‘उसके तुल्य कोई नहीं’। पवित्रशास्त्र परमेश्वर के जीवित वचन कहलाते हैं: केवल इसलिए नहीं कि सामान्यतः वे हम में नया जीवन उत्पन्न करने के काम आते हैं, वरन् इसलिए भी कि वे प्राण में उस जीवन को बनाए रखें और बढ़ाएँ। प्रेरित पतरस, अपनी दूसरी पत्री में, इसे मसीह को पहाड़ पर रूपान्तरित होते देखने से भी बढ़कर ठहराता है। क्योंकि अध्याय 1:18 में यह कहने के बाद कि ‘जब हम उसके साथ पवित्र पहाड़ पर थे, तो स्वर्ग से यही वाणी आते सुनी’; वह आगे कहता है, ‘हमारे पास जो भविष्यद्वक्ताओं का वचन है, वह इस घटना से दृढ़ ठहरा है और तुम यह अच्छा करते हो, कि जो यह समझकर उस पर ध्यान करते हो, कि वह एक दीया है, जो अंधियारे स्थान में उस समय तक प्रकाश देता रहता है जब तक कि पौ न फटे, और भोर का तारा तुम्हारे हृदयों में न चमक उठे’: अर्थात्, जब तक हम इन देहों को उतार न दें, और यीशु को आमने-सामने न देखें। तब तक हमें उसके वचन के दर्पण में से ही उसे देखना और उससे बातचीत करनी है। हमें उसकी चितौनियों को अपना मंत्री बनाना है, और प्रतिदिन मरियम के साथ यीशु के पाँवों के पास बैठकर, विश्वास से उसका वचन सुनना है। तब हम आनन्दमय अनुभव से जानेंगे कि वे आत्मा हैं, और जीवन भी हैं, और हमारे प्राणों के लिए वास्तव में खाने और वास्तव में पीने की वस्तु हैं।
दूसरी बात, विश्वासी गुप्त प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए और स्थिर रखते हैं। अनुग्रह के आत्मा के साथ सदा विनती का आत्मा भी रहता है। यह नई सृष्टि की साँस ही है, ईश्वरीय जीवन की धौंकनी, जिसके द्वारा पवित्र आग की वह चिंगारी, जिसे परमेश्वर ने प्राण में सुलगाया है, न केवल बुझने से बची रहती है, वरन् धधककर ज्वाला बन जाती है। गुप्त प्रार्थना की उपेक्षा प्रायः बहुत सी आत्मिक बीमारियों का द्वार बनी है, और उसके घातक परिणाम हुए हैं। ओरिजेन ने कहा था, '‘कि जिस दिन उसने एक मूरत के आगे धूप जलाई, उस दिन वह गुप्त प्रार्थना किए बिना अपनी कोठरी से बाहर निकला था’'। यह विश्वासियों के आत्मिक हथियारों का एक सबसे उत्तम भाग है। ‘हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना’, प्रेरित कहता है, ‘और विनती करते रहो’। ‘जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो’, हमारा प्रभु कहता है, ‘कि तुम परीक्षा में न पड़ो’! और उसने यह दृष्टान्त कहा, कि उसके चेलों को नित्य प्रार्थना करना और साहस नहीं छोड़ना चाहिए। इसका यह अर्थ नहीं कि हमारा प्रभु चाहता है कि हम अपने दूसरे सम्बन्धित कर्तव्यों की उपेक्षा करके सदा घुटनों पर, या अपनी कोठरियों में ही रहें। परन्तु उसका अर्थ यह है कि हमारे प्राण प्रार्थना की दशा में बने रहें, ताकि हम भी वैसा ही कह सकें जैसा स्कॉटलैंड के एक भले मनुष्य ने अपनी मृत्यु-शय्या पर अपने मित्रों से कहा था, ‘यदि ये परदे, या ये दीवारें बोल पातीं, तो वे तुम्हें बतातीं कि मैंने यहाँ अपने परमेश्वर के साथ कैसी मधुर संगति की है’। हे प्रार्थना! प्रार्थना! यह परमेश्वर और मनुष्य को एक साथ लाती है और एक साथ बनाए रखती है। यह मनुष्य को परमेश्वर तक ऊपर उठाती है, और परमेश्वर को मनुष्य तक नीचे ले आती है। इसलिए, हे विश्वासियो, यदि आप परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए रखना चाहते हैं; तो प्रार्थना कीजिए, निरन्तर प्रार्थना में लगे रहिए। गुप्त और नियमित प्रार्थना में बहुत समय बिताइए। और जब आप जीवन के सामान्य कामकाज में लगे हों, तब भी छोटी-छोटी पुकारों की प्रार्थना में लगे रहिए, और समय-समय पर विश्वास के पंखों पर छोटी-छोटी चिट्ठियाँ तुरन्त डाक से स्वर्ग भेजते रहिए। वे परमेश्वर के हृदय तक पहुँचेंगी, और आत्मिक आशीषों से लदी हुई आपके पास लौट आएँगी।
तीसरा, पवित्र और बार-बार किया जानेवाला ध्यान एक और धन्य साधन है, जिसके द्वारा विश्वासी परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए रखता है। ‘प्रार्थना, पढ़ना, परीक्षा और ध्यान’, लूथर कहता है, एक सेवक को बनाते हैं। और यही एक मसीही को भी बनाते और सिद्ध करते हैं। प्राण के लिए ध्यान वैसा ही है जैसा शरीर के लिए पाचन। पवित्र दाऊद ने इसे ऐसा ही पाया, और इसी कारण वह बार-बार ध्यान में लगा रहता था, रात के समय भी। हम यह भी पढ़ते हैं कि इसहाक साँझ के समय ध्यान करने के लिए मैदान में निकला; या जैसा हाशिये में लिखा है, प्रार्थना करने के लिए। क्योंकि ध्यान एक प्रकार की मौन प्रार्थना है, जिसके द्वारा प्राण बहुधा मानो अपने आप से बाहर निकलकर परमेश्वर तक उठा लिया जाता है, और कुछ मात्रा में उन धन्य आत्माओं के समान बना दिया जाता है, जो एक प्रकार के प्रत्यक्ष दर्शन के द्वारा सदा हमारे स्वर्गीय पिता का मुख देखती रहती हैं। केवल वे सुखी प्राण, जो इस दिव्य काम के अभ्यस्त हो चुके हैं, बता सकते हैं कि ध्यान आत्मिक जीवन को बढ़ानेवाला कितना धन्य साधन है। दाऊद कहता है, ‘सोचते-सोचते’, ‘आग भड़क उठी।’ और जब विश्वासी परमेश्वर के कामों और वचन पर, विशेषकर उस कामों के काम, उस आश्चर्यों के आश्चर्य, उस भक्ति के भेद पर सोचता रहता है कि परमेश्वर ‘शरीर में प्रगट हुआ’, कि परमेश्वर का मेम्ना जगत के पापों के लिए बलि हुआ, तब वह बहुधा अपने भीतर दिव्य प्रेम की आग भड़कती हुई अनुभव करता है, यहाँ तक कि वह अपनी जीभ से बोल उठने और अपने प्राण पर प्रभु की करुणा का वर्णन करने को विवश हो जाता है। इसलिए, आप सब जो परमप्रधान परमेश्वर के साथ घनिष्ठ और स्थिर चाल बनाए रखना और उसे थामे रहना चाहते हैं, बार-बार ध्यान किया करें।
चौथा, विश्वासी परमेश्वर के साथ अपना चलना इस रीति से बनाए रखते हैं कि वे उनके साथ उसके विधान के व्यवहारों को ध्यान से देखते और उन पर मन लगाते हैं। यदि हम पवित्र शास्त्र पर विश्वास करते हैं, तो हमें उस बात पर भी विश्वास करना होगा जो हमारे प्रभु ने उसमें घोषित की है, कि उसके चेलों के ‘सिर के बाल भी सब गिने हुए हैं’, और यह कि कोई गौरैया (चाहे दाना चुगने के लिए उतरे, चाहे बहेलिए की गोली से गिरे) हमारे स्वर्गीय पिता के जाने बिना भूमि पर नहीं गिरती। हर क्रूस में एक बुलाहट छिपी होती है, और ईश्वरीय विधान के हर विशेष व्यवहार का, जिनके पास वह भेजा जाता है उनमें, कोई विशेष उद्देश्य पूरा करना होता है। यदि वह दुःख देनेवाला हो, तो परमेश्वर उसके द्वारा कहता है, हे मेरे पुत्र, ‘अपने आपको मूरतों से बचाए रखो’: यदि वह समृद्धि देनेवाला हो, तो वह मानो एक धीमे, कोमल शब्द से कहता है, ‘हे मेरे पुत्र, अपना मन मेरी ओर लगा’। इसलिए यदि विश्वासी परमेश्वर के साथ अपना चलना बनाए रखना चाहते हैं, तो उन्हें समय-समय पर सुनना चाहिए कि प्रभु अपने विधान की वाणी में उनके विषय में क्या कहता है। इसी प्रकार हम पाते हैं कि अब्राहम का सेवक, जब वह अपने स्वामी इसहाक के लिए पत्नी लाने गया, तब उसने परमेश्वर के विधान पर दृष्टि लगाए रखी और उसे ध्यान से देखता रहा, और इसी के द्वारा उसने उस स्त्री को पा लिया जो उसके स्वामी की पत्नी होने के लिए ठहराई गई थी। ‘क्योंकि विधान का एक छोटा-सा संकेत भी’, भक्त बिशप हॉल कहते हैं, ‘विश्वास के लिए भोजन बनने को पर्याप्त है।’ और जैसे मैं विश्वास करता हूँ कि स्वर्ग में हमारे आनन्द का एक भाग यह होगा कि हम उस सुनहरी जंजीर की विभिन्न कड़ियों को देखें और उन पर पीछे दृष्टि डालें जो हमें वहाँ तक खींच लाईं; वैसे ही मैं विश्वास करता हूँ कि जो लोग यहाँ नीचे स्वर्ग का सबसे अधिक आनन्द उठाते हैं, वे ही यहाँ पृथ्वी पर परमेश्वर के विधान के व्यवहारों के सम्बन्ध में, अपने साथ उसके विभिन्न व्यवहारों पर सबसे बारीकी से ध्यान देंगे।
पाँचवाँ, परमेश्वर के साथ घनिष्ठता से चलने के लिए उसकी सन्तानों को न केवल अपने बाहर परमेश्वर के विधान की गतियों को, वरन् अपने हृदयों में उसके धन्य आत्मा की गतियों को भी ध्यान से देखना चाहिए। ‘जितने लोग परमेश्वर के आत्मा के चलाए चलते हैं, वे ही परमेश्वर के पुत्र हैं’, और वे अपने आपको पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसे सौंप देते हैं, जैसे एक छोटा बालक धाय या माता-पिता के हाथ में अपना हाथ दे देता है कि वे उसे ले चलें। निःसन्देह इसी अर्थ में हमें फिरना और छोटे बालकों के समान बनना है। और यद्यपि लिखित वचन के बिना आत्मा के द्वारा चलाए जाने का दावा करना धर्मोन्माद का सार है; तौभी हर मसीही का परम कर्तव्य है कि वह परमेश्वर के लिखित वचन के साथ-साथ आत्मा के द्वारा चलाया जाए। इसलिए, हे विश्वासियो, मैं आपसे विनती करता हूँ, अपने प्राणों में परमेश्वर के धन्य आत्मा की गतियों को ध्यान से देखिए, और जो सुझाव या प्रभाव आप किसी भी समय अनुभव करें, उन्हें सदा परमेश्वर के परम पवित्र वचन के अचूक नियम से परखिए: और यदि वे उसके अनुकूल न पाए जाएँ, तो उन्हें शैतानी और भरमानेवाले जानकर त्याग दीजिए। इस सावधानी का पालन करने से आप उन दो खतरनाक अतियों के बीच का मार्ग पकड़ेंगे, जिनमें इस पीढ़ी के बहुत से लोगों के जा पड़ने का खतरा है; मेरा अर्थ है, एक ओर धर्मोन्माद, और दूसरी ओर देववाद, और निरा अविश्वास।
छठा, जो परमेश्वर के साथ पवित्र चाल बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसके साथ उसके विधानों में ही नहीं, उसकी विधियों में भी चलना चाहिए, इत्यादि। इसी कारण जकर्याह और एलीशिबा के विषय में लिखा है कि वे ‘प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलनेवाले थे’। और सब ठीक-ठीक शिक्षा पाए हुए मसीही विधियों को निकम्मी आदि शिक्षा की बातें नहीं, वरन् इतनी सारी नालियाँ समझेंगे, जिनके द्वारा असीम दीनता से झुकनेवाला यहोवा अपना अनुग्रह उनके प्राणों तक पहुँचाता है। वे उन्हें बच्चों की रोटी, और अपने सबसे ऊँचे विशेषाधिकार समझेंगे। फलस्वरूप जब वे दूसरों को यह कहते सुनेंगे, ‘आओ, हम यहोवा के भवन को चलें’, तब वे आनन्दित होंगे। वे उस स्थान में जाने से प्रसन्न होंगे जहाँ परमेश्वर की महिमा वास करती है, और जब तक वह न आए, प्रभु मसीह की मृत्यु का प्रचार करने के हर अवसर को थाम लेने के लिए बड़े उत्सुक रहेंगे।
सातवाँ और अन्तिम, यदि आप परमेश्वर के साथ चलना चाहते हैं, तो आप उन लोगों से मेल-जोल और संगति रखेंगे जो सचमुच उसके साथ चलते हैं। पवित्र दाऊद कहता है, ‘उन्हीं से मैं प्रसन्न हूँ’, जो सद्गुण में श्रेष्ठ होकर ‘आदर के योग्य हैं’। उसकी दृष्टि में वे पृथ्वी के श्रेष्ठ जन थे। और आरम्भिक मसीहियों ने, निःसन्देह, एक दूसरे के साथ संगति में बने रहकर अपना उत्साह और अपना पहला प्रेम बनाए रखा। प्रेरित पौलुस यह भली-भाँति जानता था, और इसलिए वह मसीहियों को उपदेश देता है कि वे ध्यान रखें कि एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें। क्योंकि कोई अकेला कैसे गर्म हो सकता है? और क्या मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान ने हमसे नहीं कहा कि ‘जैसे लोहा लोहे को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है’? इसलिए यदि हम कलीसिया के इतिहास में झाँकें, या अपने ही समय को ठीक-ठीक परखें, तो मैं विश्वास करता हूँ कि हम पाएँगे कि जैसे-जैसे परमेश्वर की सामर्थ्य प्रबल होती है, वैसे-वैसे मसीही समाज और संगति की सभाएँ भी उसी अनुपात में बढ़ती हैं। और जैसे-जैसे एक घटता है, वैसे-वैसे दूसरा भी उसी समय चुपचाप घटता और मिटता गया है। अतः जो परमेश्वर के साथ चलना और धर्म के जीवन को बनाए रखना चाहते हैं, उनके लिए यह कितना आवश्यक है कि जब-जब अवसर मिले, वे एक साथ इकट्ठे हों, ताकि एक दूसरे को प्रेम, और भले कामों में उकसाएँ।
अब हम प्रस्तावित तीसरी मुख्य बात की ओर बढ़ें: कुछ ऐसे कारण प्रस्तुत करना जो सबको आकर परमेश्वर के साथ चलने के लिए उभारें।
और, पहला, परमेश्वर के साथ चलना बड़े आदर की बात है। हर पद के लोगों को किसी भी महत्वपूर्ण काम के लिए उभारने में यह प्रायः एक प्रबल कारण होता है। काश, जो विषय अब हमारे सामने है, उसके सम्बन्ध में इसका आप पर उचित भार और प्रभाव पड़े! मैं समझता हूँ कि आप सब इसे बहुत बड़ा आदर समझेंगे कि आपको किसी पृथ्वी के राजा की निजी सभा में प्रवेश मिले, उसके भेद आपको सौंपे जाएँ, और हर समय और हर अवसर पर उसके कान आपकी ओर लगे रहें। ऐसा जान पड़ता है कि हामान भी ऐसा ही समझता था, जब उसने घमण्ड करते हुए, एस्तेर 5:11 में, यह बताया कि राजा ने उसे सब हाकिमों और अपने सब कर्मचारियों से ऊँचा पद दिया था; और इतना ही नहीं, ‘एस्तेर रानी ने भी मुझे छोड़ और किसी को राजा के संग, अपने किए हुए भोज में आने न दिया; और कल के लिये भी राजा के संग उसने मुझी को नेवता दिया है’। और जब बाद में इसी हामान से, अध्याय 6:6 में, यह प्रश्न पूछा गया, ‘जिस मनुष्य की प्रतिष्ठा राजा करना चाहता हो तो उसके लिये क्या करना उचित होगा?’ तब उसने, पद 8 में, उत्तर दिया, ‘उसके लिये राजकीय वस्त्र लाया जाए, जो राजा पहनता है, और एक घोड़ा भी, जिस पर राजा सवार होता है, और उसके सिर पर जो राजकीय मुकुट धरा जाता है वह भी लाया जाए। फिर वह वस्त्र, और वह घोड़ा राजा के किसी बड़े हाकिम को सौंपा जाए, और जिसकी प्रतिष्ठा राजा करना चाहता हो, उसको वह वस्त्र पहनाया जाए, और उस घोड़े पर सवार करके, नगर के चौक में उसे फिराया जाए; और उसके आगे-आगे यह प्रचार किया जाए, जिसकी प्रतिष्ठा राजा करना चाहता है, उसके साथ ऐसा ही किया जाएगा।’ तो ऐसा जान पड़ता है कि एक महत्वाकांक्षी हामान बस इतना ही माँग सकता था, और उसकी समझ में पृथ्वी का सबसे बड़ा सम्राट क्षयर्ष इससे बढ़कर मूल्यवान कुछ नहीं दे सकता था। परन्तु हाय, यह आदर उस आदर की तुलना में क्या है, जिसका आनन्द परमेश्वर के साथ चलनेवालों में से सबसे छोटा भी उठाता है! हे सज्जनो, क्या आप इसे छोटी बात समझते हैं कि प्रभुओं के प्रभु का भेद आपके पास हो, और आप परमेश्वर के मित्र कहलाएँ? और यही आदर परमेश्वर के सब पवित्र लोगों को प्राप्त है। यहोवा के भेद को वही जानते हैं जो उससे डरते हैं: और ‘अब से (धन्य यीशु कहता है) मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता, कि उसका स्वामी क्या करता है: परन्तु मैंने तुम्हें मित्र कहा है’। आप इसके विषय में जो भी सोचें, पवित्र दाऊद परमेश्वर के साथ चलने के आदर को ऐसा समझता था कि वह घोषणा करता है कि उसे ‘दुष्टों के डेरों में वास करने से अपने परमेश्वर के भवन की डेवढ़ी पर खड़ा रहना ही’ अधिक भाता था। काश, सब उसके समान मन के होते!
परन्तु, दूसरी बात, जैसे परमेश्वर के साथ चलना आदर की बात है, वैसे ही यह आनन्द की बात भी है। मनुष्यों में सबसे बुद्धिमान ने हमें बताया है कि बुद्धि के ‘मार्ग आनन्ददायक हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं’। और मुझे स्मरण है कि भक्त श्री हेनरी ने, जब वे प्राण त्यागने पर थे, अपने एक मित्र से कहा, ‘आपने बहुत से मनुष्यों के अन्तिम शब्द सुने हैं, और मेरे अन्तिम शब्द ये हैं: परमेश्वर के साथ सहभागिता में बिताया गया जीवन संसार का सबसे आनन्दमय जीवन है’। मैं निश्चय ही इस पर अपनी मुहर लगा सकता हूँ कि यह सच है। सच तो यह है कि मुझे यीशु के झण्डे तले भर्ती हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए हैं; परन्तु अपने परमेश्वर के साथ एक क्षण की सहभागिता में मैंने उससे कहीं अधिक ठोस आनन्द पाया है, जितना मैं पाप के मार्गों में पाता या पा सकता था, चाहे मैं हज़ारों वर्ष तक उन पर चलता ही क्यों न रहता। और क्या मैं आप सब से, जो परमेश्वर का भय मानते और उसके साथ चलते हैं, इस बात की सच्चाई की गवाही नहीं माँग सकता? क्या प्रभु के आँगनों में एक दिन आपके लिए और कहीं के हज़ार दिन से उत्तम नहीं रहा? क्या परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में आपको अभी इसी समय एक बहुत बड़ा प्रतिफल नहीं मिला? क्या उसका वचन आपको मधु से और छत्ते से टपकनेवाले मधु से भी बढ़कर मधुर नहीं लगा? ओह, जब आपने याकूब के समान अपने परमेश्वर से मल्लयुद्ध किया, तब आपने क्या कुछ अनुभव किया! क्या खेतों में ध्यान करते समय यीशु प्रायः आपसे नहीं मिला, और रोटी तोड़ते समय बार-बार आप पर प्रकट नहीं हुआ? क्या पवित्र आत्मा ने बार-बार आपके हृदयों में ईश्वरीय प्रेम भरपूरी से नहीं उंडेला, और आपको ऐसे आनन्द से नहीं भर दिया जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा हुआ है? मैं जानता हूँ कि आप इन सब प्रश्नों का उत्तर हाँ में देंगे, और खुले मन से मान लेंगे कि मसीह का जूआ सहज और उसका बोझ हलका है; या (हमारी आराधना-विधि की एक प्रार्थना के शब्दों में), ‘उसकी सेवा पूर्ण स्वतंत्रता है’। तो फिर परमेश्वर के साथ चलने को उभारने के लिए हमें और किस प्रेरणा की आवश्यकता है?
परन्तु मुझे लगता है कि मैं आप में से कुछ को यह कहते सुनता हूँ, ‘ये बातें कैसे हो सकती हैं? क्योंकि यदि, जैसा आप कहते हैं, परमेश्वर के साथ चलना ऐसी आदर और आनन्द की बात है, तो ऐसा क्यों है कि इस मार्ग के लोगों का नाम बुरा जानकर काट दिया जाता है, और हर जगह उनके विरोध में बातें की जाती हैं? ऐसा कैसे होता है कि वे प्रायः क्लेश उठाते, परखे जाते, कंगाल रहते और दुःख भोगते हैं? क्या यही वह आदर, यही वह आनन्द है, जिसकी आप बात करते हैं?’ मैं उत्तर देता हूँ, हाँ। थोड़ा ठहरिए; उतावली मत कीजिए। मुँह देखकर न्याय न कीजिए, परन्तु ठीक-ठीक न्याय कीजिए, तो सब भला ही होगा। यह सच है, हम मानते हैं कि ‘इस पंथ के लोग’, जैसा आपने, और आपसे पहले पौलुस ने, जब वह सतानेवाला था, उन्हें कहा, उनका नाम बुरा जानकर काट दिया जाता है, और वे ऐसा पंथ हैं जिसके विरोध में हर जगह बातें की जाती हैं। परन्तु किसके द्वारा? परमप्रधान परमेश्वर के शत्रुओं के ही द्वारा। और क्या आप समझते हैं कि उनके द्वारा बुरा कहा जाना कोई अपमान की बात है? परमेश्वर धन्य है, हमने मसीह को इस रीति से नहीं सीखा। हमारे राजसी स्वामी ने उन्हें ‘धन्य’ ठहराया है, जो सताए जाते हैं और जिनके विरोध में लोग झूठ बोल बोलकर सब प्रकार की बुरी बात कहते हैं। उसने उन्हें आज्ञा दी है कि वे ‘आनन्दित और मगन’ हों, क्योंकि यह उनके चेले होने का विशेषाधिकार है, और स्वर्ग में उनका प्रतिफल बड़ा होगा। उसके साथ स्वयं भी ऐसा ही व्यवहार किया गया था। और क्या किसी प्राणी को इससे बड़ा आदर दिया जा सकता है कि वह परमेश्वर के सदा-धन्य पुत्र के स्वरूप में ढल जाए? और फिर, यह भी उतना ही सच है कि इस पंथ के लोग प्रायः क्लेश उठाते, परखे जाते, कंगाल रहते और दुःख भोगते हैं। परन्तु इन सब से क्या? क्या इससे परमेश्वर के साथ चलने का आनन्द नष्ट हो जाता है? नहीं, कदापि नहीं; क्योंकि जो परमेश्वर के साथ चलते हैं, वे सामर्थ्य देनेवाले मसीह के द्वारा क्लेश में भी आनन्द करने, और नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ने पर भी मगन होने के योग्य किए जाते हैं। और मैं समझता हूँ कि मैं परमेश्वर के साथ सच्चाई से और निकटता से चलनेवाले सब लोगों के अनुभव से पूछ सकता हूँ कि क्या उनके दुःख के समय प्रायः उनके सबसे मधुर समय नहीं रहे, और क्या उन्होंने परमेश्वर का सबसे अधिक आनन्द तभी नहीं पाया जब वे मनुष्यों द्वारा सबसे अधिक निकाले और तुच्छ जाने गए? हम पाते हैं कि मसीह के आरम्भिक सेवकों के साथ भी ऐसा ही हुआ, जब यहूदी महासभा ने उन्हें धमकाया, और आज्ञा दी कि यीशु के नाम से फिर प्रचार न करना; वे आनन्दित हुए कि वे यीशु के लिए निरादर होने के योग्य ठहरे। पौलुस और सीलास ने कालकोठरी में भी परमेश्वर के भजन गाए; और मसीही कलीसिया के उस महिमामय प्रथम शहीद स्तिफनुस का मुख स्वर्गदूत के मुख के समान चमक उठा। और यीशु अब भी वैसा ही है जैसा तब था, और वह अपने प्रेम से दुःखों और क्लेशों को ऐसा मधुर बना देता है कि उसके चेले सुखद अनुभव से जान लेते हैं कि जैसे-जैसे क्लेश बढ़ते हैं, वैसे-वैसे शान्ति उससे भी कहीं अधिक बढ़ती है। इसलिए ये आपत्तियाँ, ऊपर दी गई प्रेरणाओं को नष्ट करने के बदले, उन्हें और भी दृढ़ करती हैं, कि आप परमेश्वर के साथ चलने को उभारे जाएँ।
परन्तु मान लीजिए कि ये आपत्तियाँ उचित होतीं, और परमेश्वर के साथ चलनेवाले उतने ही तुच्छ और अभागे होते जितना आप उन्हें दिखाना चाहते हैं; तौभी मेरे पास देने को एक तीसरी प्रेरणा है, जो यदि पवित्रस्थान के तराज़ू में तौली जाए, तो सब आपत्तियों से भारी ठहरेगी, अर्थात् यह कि इस चाल के अन्त में स्वर्ग है। क्योंकि, भक्त बिशप बेवरिज के शब्दों में, ‘चाहे मार्ग सकरा हो, तौभी वह लम्बा नहीं है: और चाहे फाटक सकेत हो, तौभी वह अनन्त जीवन में खुलता है’। हनोक ने इसे ऐसा ही पाया। वह पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ चला, और परमेश्वर ने उसे उठा लिया कि वह स्वर्ग के राज्य में सदा के लिए उसके साथ बैठे। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें भी उसी के समान उठा लिए जाने की आशा रखनी चाहिए: नहीं, मैं समझता हूँ कि हम सब उसी साधारण मृत्यु से मरेंगे जिससे सब मनुष्य मरते हैं। परन्तु मृत्यु के बाद, जो परमेश्वर के साथ चले हैं उनकी आत्माएँ परमेश्वर के पास, जिसने उन्हें दिया, लौट जाएँगी; और पुनरुत्थान की भोर को प्राण और देह सदा प्रभु के साथ रहेंगे; उनकी देह मसीह की महिमा की देह के अनुकूल बना दी जाएगी, और उनके प्राण परमेश्वर की सारी भरपूरी से परिपूर्ण किए जाएँगे। वे सिंहासनों पर बैठेंगे; वे स्वर्गदूतों का न्याय करेंगे। वे महिमा के अत्यन्त भारी और अनन्त बोझ को सहने के योग्य किए जाएँगे, अर्थात् उस महिमा को जो जगत की सृष्टि से पहले यीशु मसीह की पिता के साथ थी। ‘O gloriam quantam et qualem’, विद्वान और भक्त आर्न्ट ने कहा, ठीक उससे पहले कि उन्होंने अपना सिर झुकाया और प्राण त्याग दिए। इसका विचार मात्र हमें, जैसा भले डॉ. वॉट्स कहते हैं, ‘अपने सत्तर वर्ष लाँघ जाने की इच्छा’ से भर देने के लिए, और राजसी भजनकार की उत्कट वाणी में पुकार उठने के लिए पर्याप्त है, ‘जीविते परमेश्वर, हाँ परमेश्वर, का मैं प्यासा हूँ, मैं कब जाकर परमेश्वर को अपना मुँह दिखाऊँगा?’ मुझे इस पर आश्चर्य नहीं होता कि इसका बोध, जब ईश्वरीय जीवन और प्रेम का असाधारण प्रकाश और प्रवाह मन पर उतरता है, कुछ लोगों को मूर्छित कर देता है, और कुछ समय के लिए उनकी इन्द्रियों की शक्ति भी छीन लेता है। इससे छोटे दृश्य ने, अर्थात् सुलैमान के वैभव के दृश्य ने, शीबा की रानी को चकित कर दिया; और उससे भी छोटे दृश्य ने, अर्थात् यूसुफ की गाड़ियों के दृश्य ने, पवित्र याकूब को मूर्छित कर दिया, और कुछ समय के लिए वह मानो मर-सा गया। दानिय्येल को जब इस उत्तम महिमा की दूर से एक झलक दी गई, तो वह स्वर्गदूत के पाँवों पर मृतक के समान गिर पड़ा। और यदि इस महिमा की दूर की झलक इतनी उत्तम है, तो उसका सचमुच अधिकारी होना कैसा होगा? यदि पहले फल इतने महिमामय हैं, तो कटनी महिमा में कितनी असीम रूप से बढ़कर होगी?
और अब, मैं और क्या कहूँ, या सच पूछिए तो और क्या भली-भाँति कह सकता हूँ, कि आपको, हाँ आपको भी जो अब तक मसीह से अनजान हैं, आकर परमेश्वर के साथ चलने को उभारूँ? यदि आप आदर, आनन्द और महिमा के मुकुट से प्रेम करते हैं, तो आइए, उसे वहीं खोजिए जहाँ केवल वह पाया जा सकता है। आइए, प्रभु यीशु को पहन लीजिए। आइए, शीघ्र चले आइए और परमेश्वर के साथ चलिए, और शरीर की अभिलाषाओं को पूरा करने का उपाय अब और न कीजिए। रुकिए, रुकिए, हे पापी! फिरिए, फिरिए, हे अपरिवर्तित मनुष्यो, क्योंकि जिस मार्ग पर आप अभी चल रहे हैं, वह आपकी अंधी आँखों में चाहे कितना ही ठीक जान पड़े, उसका अन्त मृत्यु होगा, अर्थात् देह और प्राण दोनों का अनन्त विनाश। अब और विलम्ब न कीजिए, मैं कहता हूँ: आपके ही जोखिम पर मैं आपको चिताता हूँ, अपनी वर्तमान चाल में एक पग भी आगे न बढ़ाइए। क्योंकि हे मनुष्य, तू क्या जानता है कि जो अगला पग तू उठाएगा, वह नरक में न पड़े? मृत्यु तुझे आ पकड़े, न्याय तुझे आ घेरे, और तब तेरे और अनन्त महिमा के बीच सदा-सर्वदा के लिए वह बड़ी खाई ठहरा दी जाएगी। ओह, इन बातों पर सोचिए, आप सब जो परमेश्वर के साथ चलना नहीं चाहते। इन्हें मन में रखिए। पुरुषार्थ दिखाइए, और यीशु की सामर्थ्य में कहिए, विदा, हे शरीर की अभिलाषा, मैं अब तेरे साथ और न चलूँगा! विदा, हे आँखों की अभिलाषा, और जीविका के घमण्ड! विदा, हे शारीरिक साथियो और क्रूस के बैरियो, मैं अब तुम्हारे साथ और न चलूँगा, न तुमसे घनिष्ठता रखूँगा! स्वागत है, यीशु, स्वागत है तेरा वचन, स्वागत हैं तेरी विधियाँ, स्वागत है तेरा आत्मा, स्वागत हैं तेरे लोग, अब से मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। ओह, कि आप में ऐसा ही मन हो! परमेश्वर उस पर अपनी सर्वशक्तिमान स्वीकृति की मुहर लगाएगा, और स्वर्ग की बड़ी मुहर से, अर्थात् अपने पवित्र आत्मा की छाप से, उसे पक्का करेगा। हाँ, वह ऐसा करेगा, चाहे आप जन्म से ही अपने अत्यन्त दुष्ट हृदयों की युक्तियों और अभिलाषाओं के साथ चलते और उनके पीछे-पीछे जाते रहे हों। ‘जो महान और उत्तम’ है, महान यहोवा कहता है, ‘और सदैव स्थिर रहता’ है, वह नम्र और खेदित मन वाले के संग, हाँ, उस मनुष्य के संग वास करेगा जो उसका वचन सुनकर थरथराता है। यीशु मसीह का लहू, हाँ उसका बहुमूल्य लहू, यदि आप उसमें और उसके द्वारा पिता के पास आएँ, तो आपको सब पापों से शुद्ध करेगा।
परन्तु यह पाठ मुझे जितना आप खुले और अपरिवर्तित पापियों से, उतना ही आप पवित्र जनों से भी बात करने को प्रेरित करता है। मुझे आपको यह बताने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर के साथ चलना केवल आदर की बात ही नहीं, वरन् आनन्ददायक और लाभदायक भी है; क्योंकि आप इसे सुखद अनुभव से जानते हैं, और दिन-प्रतिदिन इसे और भी अधिक ऐसा ही पाएँगे। केवल मुझे अनुमति दीजिए कि मैं सुधि दिलाकर आपके शुद्ध मन को उभारूँ, और मसीह यीशु में परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर आपसे विनती करूँ कि आप अपने विषय में चौकस रहें, और बीते दिनों की अपेक्षा अपने परमेश्वर के साथ और भी निकट होकर चलें: क्योंकि आप परमेश्वर के साथ जितना निकट चलेंगे, उतना ही अधिक आप उसका आनन्द पाएँगे जिसकी उपस्थिति जीवन है, और उसके दाहिने हाथ बिठाए जाने के लिए, जहाँ सुख सर्वदा बना रहता है, उतनी ही अच्छी रीति से तैयार होंगे। ओह, यीशु के पीछे दूर-दूर से मत चलिए! ओह, पवित्र विधियों में उपस्थित होते समय इतने औपचारिक, इतने मृत और जड़ मत बनिए! एक साथ इकट्ठा होना इतनी लज्जाजनक रीति से मत छोड़िए, और न परमेश्वर की बातों के विषय में इतने कंजूस या उदासीन बनिए। स्मरण कीजिए कि यीशु लौदीकिया की कलीसिया के विषय में क्या कहता है, ‘इसलिए कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह से उगलने पर हूँ’। यीशु के प्रेम पर विचार कीजिए, और उस प्रेम को आपको विवश करने दीजिए कि आप उसके निकट बने रहें; और चाहे आपको उसके लिए मरना पड़े, उसका इन्कार मत कीजिए, किसी भी रीति से उससे दूर मत रहिए।
सेवकाई में अपने उन भाइयों से, जो यहाँ उपस्थित हैं, एक बात, और फिर मैं समाप्त करता हूँ। मेरे भाइयो, आप देखते हैं, मेरा हृदय भरा हुआ है; मैं लगभग कह सकता हूँ कि वह बोलने के लिए बहुत भरा है, और फिर भी आपसे एक बात कहे बिना चुप रहने के लिए भी बहुत भरा है। क्योंकि क्या यह पाठ विशेष रीति से उनसे नहीं बोलता जिन्हें मसीह के राजदूत और परमेश्वर के भेदों के भण्डारी कहलाने का आदर प्राप्त है? मैंने इस प्रवचन के आरम्भ में कहा था कि हनोक सम्भवतः एक सार्वजनिक व्यक्ति, और एक ज्वलन्त प्रचारक था। यद्यपि वह मर चुका है, तौभी क्या वह अब तक हमसे बातें नहीं करता, कि हमारे उत्साह को जगाए, और हमें अपने महिमामय और सदा-धन्य स्वामी की सेवा में और भी अधिक सक्रिय करे? हनोक ने कैसा प्रचार किया! हनोक परमेश्वर के साथ कैसा चला, यद्यपि वह एक दुष्ट और व्यभिचारी पीढ़ी में रहता था! तो आइए, हम उसके पीछे चलें, जैसे वह यीशु मसीह के पीछे चला, और शीघ्र ही, जहाँ वह है वहाँ हम भी होंगे। वह अब अपने विश्राम में प्रवेश कर चुका है: थोड़ी ही देर में हम भी अपने विश्राम में प्रवेश करेंगे, और वह भी उससे कहीं अधिक शीघ्र। वह यहाँ नीचे तीन सौ वर्ष तक परदेशी होकर रहा; परन्तु परमेश्वर धन्य है, अब मनुष्य के दिन घटा दिए गए हैं, और कुछ ही दिनों में हमारी चाल पूरी हो जाएगी। न्यायाधीश द्वार पर खड़ा है: जो आनेवाला है वह आएगा, और देर न करेगा: उसका प्रतिफल उसके पास है। और हम सब (यदि हम सेनाओं के यहोवा के लिए उत्साही हैं) शीघ्र ही अपने स्वर्गीय पिता के राज्य में आकाशमण्डल के तारों के समान सदा-सर्वदा चमकेंगे। उसी को, और धन्य यीशु को, और अनन्त आत्मा को, सारा आदर और महिमा, अब, और अनन्तकाल तक मिलती रहे। आमीन, और आमीन।
सार्वजनिक डोमेन। मूल पाठ का स्रोत: मूल संस्करण.
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- Whitefield, George. “परमेश्वर के साथ चलना.” Sermon. Ochorus. https://ochorus.com/hi/sermons/walking-with-god/.
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- George Whitefield, “परमेश्वर के साथ चलना,” sermon, Ochorus, https://ochorus.com/hi/sermons/walking-with-god/.
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