पाठ
मलाकी 3:6
एआई अनुवाद — मातृभाषी समीक्षा बाकी
संक्षेप में
मसीही का सच्चा अध्ययन स्वयं परमेश्वर है, और यहाँ स्पर्जन एक ही सिद्धता पर दृष्टि जमाते हैं: ‘मैं यहोवा बदलता नहीं।’ क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव, उसका प्रेम और उसके उद्देश्य कभी नहीं बदलते, इसी कारण याकूब की सन्तान नाश नहीं हुई — और जिस विश्वासी का संसार डोल रहा है, वह उस एक हृदय में लंगर डाल सकता है जो बदल नहीं सकता।
“क्योंकि मैं यहोवा बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।”—मलाकी 3:6
किसी ने कहा है कि “मनुष्यजाति का उचित अध्ययन मनुष्य है।” मैं इस विचार का विरोध नहीं करूँगा, परन्तु मेरा विश्वास है कि यह भी उतना ही सत्य है कि परमेश्वर के चुने हुओं का उचित अध्ययन परमेश्वर है; मसीही विश्वासी का उचित अध्ययन परमेश्वरत्व है। सबसे ऊँचा विज्ञान, सबसे उदात्त चिन्तन, सबसे प्रबल दर्शन, जो परमेश्वर की सन्तान का ध्यान कभी अपनी ओर खींच सकता है, वह उस महान परमेश्वर का नाम, स्वभाव, व्यक्तित्व, कार्य, काम और अस्तित्व है, जिसे वह अपना पिता कहता है। ईश्वरत्व के ध्यान में मन को अत्यन्त उन्नत करनेवाली कोई वस्तु है। यह विषय इतना विशाल है कि हमारे सारे विचार उसकी अपारता में खो जाते हैं; इतना गहरा कि हमारा अहंकार उसकी अनन्तता में डूब जाता है। अन्य विषयों को हम नाप सकते और उनसे जूझ सकते हैं; उनमें हमें एक प्रकार का आत्म-सन्तोष अनुभव होता है, और हम यह सोचते हुए अपने मार्ग चले जाते हैं, “देखो, मैं बुद्धिमान हूँ।” परन्तु जब हम इस सर्वोच्च विज्ञान के पास आते हैं, और पाते हैं कि हमारा साहुल उसकी गहराई नहीं नाप सकता, और हमारी उकाब-सी दृष्टि उसकी ऊँचाई नहीं देख सकती, तो हम इस विचार के साथ लौट जाते हैं कि निर्बुद्धि मनुष्य बुद्धिमान बनना चाहता है, परन्तु वह जंगली गदहे के बच्चे के समान है; और इस गम्भीर उद्गार के साथ, “मैं तो कल ही का हूँ, और कुछ नहीं जानता।” ध्यान का कोई भी विषय मन को इतना नम्र नहीं करेगा जितना परमेश्वर के विचार। हम यह अनुभव करने के लिये विवश हो जाएँगे—
“महान परमेश्वर, तू कैसा अनन्त है,
हम कैसे निकम्मे कीड़े हैं!”
परन्तु यह विषय जहाँ मन को नम्र करता है वहीं उसे विस्तीर्ण भी करता है। जो परमेश्वर का बार-बार ध्यान करता है, उसका मन उस मनुष्य से कहीं बड़ा होगा जो केवल इस संकीर्ण भूमण्डल पर घिसटता फिरता है। वह प्रकृति-विज्ञानी हो सकता है, जो भृंग की चीर-फाड़ करने, मक्खी की शरीर-रचना खोलने, या कीड़ों और पशुओं को ऐसे वर्गों में सजाने की अपनी क्षमता पर घमण्ड करता है जिनके नाम प्रायः उच्चारण से बाहर हैं; वह भू-विज्ञानी हो सकता है, जो मेगाथेरियम और प्लीसियोसॉरस तथा सब प्रकार के लुप्त पशुओं की चर्चा कर सकता है; वह कल्पना कर सकता है कि उसका विज्ञान, चाहे जो भी हो, उसके मन को श्रेष्ठ और विशाल बनाता है। मैं मानता हूँ कि ऐसा होता होगा, तौभी अन्ततः आत्मा को विस्तीर्ण करने के लिये सबसे उत्तम अध्ययन मसीह का, और उस क्रूस पर चढ़ाए हुए का विज्ञान, और महिमामय त्रिएकता में परमेश्वरत्व का ज्ञान है। कोई वस्तु बुद्धि को इतना विशाल नहीं करेगी, कोई वस्तु मनुष्य की सम्पूर्ण आत्मा को इतना महान नहीं बनाएगी, जितना ईश्वरत्व के महान विषय की भक्तिपूर्ण, उत्कट और निरन्तर खोज। और नम्र तथा विस्तीर्ण करने के साथ-साथ यह विषय विशेष रूप से शान्तिदायक भी है। ओह, मसीह के ध्यान में हर घाव के लिये मरहम है; पिता के मनन में हर शोक के लिये विश्रान्ति है; और पवित्र आत्मा के प्रभाव में हर पीड़ा के लिये औषधि है। क्या आप अपने दुःखों से छूटना चाहते हैं? क्या आप अपनी चिन्ताओं को डुबो देना चाहते हैं? तो जाइए, अपने आप को परमेश्वरत्व के गहरे से गहरे समुद्र में डुबा दीजिए; उसकी अपारता में खो जाइए; और आप मानो विश्राम की शय्या पर से ताज़े और बलवन्त होकर निकलेंगे। मैं ऐसी कोई वस्तु नहीं जानता जो आत्मा को ऐसी शान्ति दे; शोक और दुःख की उमड़ती लहरों को ऐसा स्थिर करे; परीक्षा की आँधियों से ऐसी शान्ति की बात कहे, जैसा परमेश्वरत्व के विषय पर भक्तिपूर्ण मनन। आज सवेरे मैं आपको उसी विषय की ओर आमन्त्रित करता हूँ। हम आपके सामने उसका एक ही दृश्य प्रस्तुत करेंगे,—अर्थात् महिमामय यहोवा की अपरिवर्तनीयता। “मैं,” मेरा मूलपाठ कहता है, “यहोवा हूँ,” (क्योंकि इसका अनुवाद ऐसा ही होना चाहिए) “मैं यहोवा बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।”
आज सवेरे तीन बातें हैं। पहली, एक न बदलनेवाला परमेश्वर; दूसरी, वे व्यक्ति जो इस महिमामय गुण से लाभ पाते हैं, अर्थात् “याकूब की सन्तान;” और तीसरी, वह लाभ जो वे इस प्रकार पाते हैं, कि वे “नाश नहीं हुए।’ हम इन्हीं बातों की ओर बढ़ते हैं।
I. सबसे पहले हमारे सामने परमेश्वर की अपरिवर्तनीयता का सिद्धान्त रखा गया है। “मैं परमेश्वर हूँ, मैं बदलता नहीं।” यहाँ मैं इस विचार की व्याख्या करने का, वरन् उसे विस्तार देने का यत्न करूँगा, और उसके बाद उसकी सच्चाई सिद्ध करने के लिये कुछ प्रमाण प्रस्तुत करूँगा।
1. मैं अपने मूलपाठ की कुछ व्याख्या इस पहली बात से आरम्भ करूँगा कि परमेश्वर यहोवा है, और वह अपने तत्त्व में नहीं बदलता। हम आपको नहीं बता सकते कि परमेश्वरत्व क्या है। हम नहीं जानते कि वह कौन-सा सार है जिसे हम परमेश्वर कहते हैं। वह एक अस्तित्व है, एक सत्ता है; परन्तु वह क्या है, यह हम नहीं जानते। तौभी, वह जो भी हो, हम उसे उसका तत्त्व कहते हैं, और वह तत्त्व कभी नहीं बदलता। नश्वर वस्तुओं का सार सदा बदलता रहता है। पहाड़ अपने हिम-श्वेत मुकुटों समेत ग्रीष्म ऋतु में अपने पुराने किरीट उतार देते हैं, जो नदियाँ बनकर उनके ढालों से बह जाते हैं, और आँधी का बादल उन्हें फिर नया राज्याभिषेक दे देता है; महासागर अपनी प्रचण्ड जलराशियों समेत अपना जल खो देता है, जब सूर्य की किरणें लहरों को चूमकर उन्हें कुहरे के रूप में आकाश में उठा ले जाती हैं; स्वयं सूर्य को भी अपनी सदा जलती भट्ठी को भरने के लिये अनन्त सर्वशक्तिमान के हाथ से नया ईंधन चाहिए। सारी सृष्टि बदलती रहती है। मनुष्य, विशेषकर अपनी देह के विषय में, निरन्तर परिवर्तन से होकर गुज़रता रहता है। बहुत सम्भव है कि मेरी देह में एक भी कण ऐसा नहीं जो कुछ वर्ष पहले उसमें था। यह ढाँचा परिश्रम से घिसता गया है, इसके परमाणु रगड़ से हटते गए हैं, इसी बीच पदार्थ के नए कण निरन्तर मेरी देह में जुड़ते गए हैं, और इस प्रकार वह फिर भरती गई है; परन्तु उसका सार बदल गया है। जिस ताने-बाने से यह संसार बना है वह सदा मिटता जा रहा है; जल की धारा के समान, बूँदें बहती जाती हैं और दूसरी उनके पीछे चली आती हैं, जिससे नदी तो भरी की भरी रहती है, परन्तु अपने तत्त्वों में सदा बदलती रहती है। परन्तु परमेश्वर नित्य एक-सा है। वह किसी सार या पदार्थ से बना नहीं है, परन्तु आत्मा है—शुद्ध, तात्त्विक और सूक्ष्म आत्मा—और इसी कारण वह अपरिवर्तनीय है। वह अनन्तकाल तक एक-सा बना रहता है। उसके सनातन माथे पर कोई झुर्रियाँ नहीं। किसी बुढ़ापे ने उसे शिथिल नहीं किया; वर्षों ने उस पर अपनी उड़ान के स्मृति-चिह्न नहीं छोड़े; वह युगों को बीतते देखता है, परन्तु उसके लिये सदा अभी ही है। वह महान मैं-हूँ है—महान अपरिवर्तनीय। ध्यान रखिए, जब उसका तत्त्व मनुष्यत्व के साथ एक हुआ, तब भी उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। जब बीते वर्षों में मसीह ने नश्वर मिट्टी को धारण किया, तब उसके ईश्वरत्व का तत्त्व नहीं बदला; शरीर परमेश्वर नहीं बन गया, और न परमेश्वर स्वभाव के किसी वास्तविक परिवर्तन के द्वारा शरीर बना; दोनों एक ही व्यक्तित्व की एकता में संयुक्त हुए, परन्तु परमेश्वरत्व फिर भी वही रहा। वह तब भी वही था जब वह चरनी में एक शिशु था, जैसा तब था जब उसने आकाश के परदे ताने; वही परमेश्वर था जो क्रूस पर टँगा, और जिसका लहू बैंगनी नदी बनकर बह चला, वही एक ही परमेश्वर जो जगत को अपने सनातन कन्धों पर सम्भाले हुए है, और अपने हाथों में मृत्यु और अधोलोक की कुंजियाँ लिए रहता है। अपने तत्त्व में वह कभी नहीं बदला, अपने देहधारण से भी नहीं; वह अनन्तकाल तक, सदा-सर्वदा, वही एक न बदलनेवाला परमेश्वर बना रहता है, ज्योतियों का पिता, जिसमें न तो कोई परिवर्तन हो सकता है, और न ही वह परछाई के समान बदलता है।
2. वह अपने गुणों में नहीं बदलता। परमेश्वर के गुण प्राचीनकाल में जो थे, वही अब भी हैं; और उनमें से हर एक के विषय में हम गा सकते हैं, “जैसा आदि में था, वैसा अब है, और सदा रहेगा, युगानुयुग, आमीन।” क्या वह सामर्थी था? क्या वह पराक्रमी परमेश्वर था जब उसने अपने वचन से जगत को अनस्तित्व के गर्भ से बाहर बुलाया? क्या वह सर्वशक्तिमान था जब उसने पहाड़ों के ढेर लगाए और लहराते गहरे सागर के लिये खोखले स्थान खोद निकाले? हाँ, वह तब सामर्थी था, और उसकी भुजा अब भी शिथिल नहीं हुई, वह अपने पराक्रम में वही महाबली है; उसके पोषण का रस सूखा नहीं, और उसके प्राण का बल सर्वदा वैसा ही स्थिर खड़ा है। क्या वह बुद्धिमान था जब उसने इस विशाल भूमण्डल की रचना की, जब उसने ब्रह्माण्ड की नींव डाली? क्या उसमें बुद्धि थी जब उसने हमारे उद्धार का मार्ग ठहराया, और जब अनादि काल से उसने अपनी भययोग्य योजनाएँ खींच रखीं? हाँ, और वह अब भी बुद्धिमान है; उसकी निपुणता घटी नहीं, उसका ज्ञान कम नहीं हुआ; उसकी आँख, जो सब कुछ देखती है, धुँधली नहीं पड़ी; उसका कान, जो अपने लोगों की सारी दोहाइयाँ, आहें, सिसकियाँ और कराहें सुनता है, उन वर्षों से भारी नहीं हुआ जिनमें वह उनकी प्रार्थनाएँ सुनता आया है। वह अपनी बुद्धि में नहीं बदला, वह अब भी उतना ही जानता है जितना सदा जानता था, न अधिक न कम; उसमें वही परिपूर्ण निपुणता और वही अनन्त दूरदर्शिता है। वह, धन्य हो उसका नाम, अपने न्याय में नहीं बदला। बीते समय में वह न्यायी और पवित्र था; अब भी वह न्यायी और पवित्र है। वह अपनी सच्चाई में नहीं बदला; उसने प्रतिज्ञा की है, और वह उसे पूरा करता है; उसने कहा है, और वह हो जाएगा। वह अपने स्वभाव की भलाई, उदारता और कृपालुता में घटता-बढ़ता नहीं। ऐसा नहीं हुआ कि वह पहले सर्वशक्तिमान पिता था और अब सर्वशक्तिमान निर्दयी शासक बन गया है; परन्तु उसका दृढ़ प्रेम ग्रेनाइट की चट्टान के समान अटल खड़ा है, हमारे अधर्म की आँधियों से अविचलित। और धन्य हो उसका प्रिय नाम, वह अपने प्रेम में नहीं बदला। जब उसने पहली बार वाचा लिखी, तब उसका हृदय अपने लोगों के लिये कैसे स्नेह से भरा हुआ था। वह जानता था कि उस वाचा की शर्तों पर मुहर लगाने के लिये उसके पुत्र को मरना होगा। वह भली-भाँति जानता था कि उसे अपने परम प्रिय को अपने अन्तःकरण से अलग करना होगा, और उसे लहू बहाने और मरने के लिये पृथ्वी पर भेजना होगा। उसने उस महान वाचा पर हस्ताक्षर करने में आगा-पीछा नहीं किया; और न उसके पूरा करने से मुँह मोड़ा। वह अब भी उतना ही प्रेम करता है जितना तब करता था, और जब सूर्य चमकना छोड़ देंगे, और चन्द्रमा अपना क्षीण प्रकाश दिखाना बन्द कर देंगे, तब भी वह युगानुयुग प्रेम करता ही रहेगा। परमेश्वर का कोई भी एक गुण लीजिए, और मैं उस पर semper idem लिख दूँगा (सदा वही)। ऐसी कोई भी बात लीजिए जो आप अभी परमेश्वर के विषय में कह सकते हैं, और वह न केवल अन्धकारमय अतीत में कही जा सकती थी, वरन् उज्ज्वल भविष्य में भी सदा वैसी ही बनी रहेगी: “मैं यहोवा बदलता नहीं।”
3. फिर, परमेश्वर अपनी योजनाओं में नहीं बदलता। वह मनुष्य बनाने तो लगा, पर तैयार न कर सका, और इसलिये उसने अपनी योजना बदल दी, जैसा ऐसे अवसर पर हर बुद्धिमान मनुष्य करता; उसने छोटी नींव पर बनाया और नए सिरे से आरम्भ किया। परन्तु क्या कभी यह कहा गया कि परमेश्वर बनाने तो लगा, पर तैयार न कर सका? कदापि नहीं। जब उसके वश में असीम भण्डार हैं, और जब उसका अपना दाहिना हाथ भोर की ओस की बूँदों के समान अनगिनत जगत रच सकता है, तो क्या वह कभी इस कारण रुक जाएगा कि उसमें सामर्थ्य नहीं? और अपनी योजना को इस कारण पलट देगा, बदल देगा, या अस्त-व्यस्त कर देगा कि वह उसे पूरा नहीं कर सकता? “परन्तु,” कुछ लोग कहते हैं, “सम्भव है परमेश्वर की कभी कोई योजना थी ही नहीं।” तो महोदय, क्या आप समझते हैं कि परमेश्वर आपसे भी अधिक मूर्ख है? क्या आप बिना योजना के काम में लगते हैं? “नहीं,” आप कहते हैं, “मेरे पास सदा एक रूपरेखा रहती है।” वैसे ही परमेश्वर के पास भी है। हर मनुष्य की अपनी योजना होती है, और परमेश्वर की भी एक योजना है। परमेश्वर एक महाबुद्धि है; उसने हर वस्तु को करने से बहुत पहले अपनी विराट बुद्धि में सजा रखा था; और ध्यान रखिए, एक बार ठहरा लेने पर वह उसे कभी नहीं बदलता। “यह होकर रहेगा,” वह कहता है, और नियति का लौह-हस्त उसे लिख लेता है, और वह पूरा हो जाता है। “यही मेरी मनसा है,” और वह अटल रहती है, न पृथ्वी उसे बदल सकती है न नरक। “यही मेरा विधान है,” वह कहता है, हे स्वर्गदूतो, इसका प्रचार करो; हे शैतानो, स्वर्ग के फाटक पर से इसे नोच डालो; परन्तु तुम उस विधान को बदल नहीं सकते; वह पूरा होकर रहेगा। परमेश्वर अपनी योजनाएँ नहीं बदलता; वह क्यों बदले? वह सर्वशक्तिमान है, इसलिये अपनी इच्छा पूरी कर सकता है। वह क्यों बदले? वह सर्वबुद्धिमान है, इसलिये उसकी योजना में भूल हो ही नहीं सकती। वह क्यों बदले? वह सनातन परमेश्वर है, इसलिये अपनी योजना पूरी होने से पहले मर नहीं सकता। वह क्यों बदले? हे अस्तित्व के निकम्मे कणो, एक दिन के क्षणभंगुर जीवो! हे अस्तित्व के इस तेजपत्ते पर रेंगनेवाले कीड़ो! तुम अपनी योजनाएँ बदल सकते हो, परन्तु वह अपनी योजनाएँ कभी नहीं, कभी नहीं बदलेगा। तो क्या उसने मुझसे कहा है कि उसकी योजना मुझे बचाने की है? यदि ऐसा है, तो मैं सुरक्षित हूँ।
“उसकी हथेलियों पर से मेरा नाम
अनन्तता भी मिटा न सकेगी;
उसके हृदय पर अंकित वह बना रहता है,
अमिट अनुग्रह के चिह्नों में।”
4. फिर एक और बात, परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में नहीं बदलता। आह! हमें परमेश्वर की मधुर प्रतिज्ञाओं की चर्चा करना प्रिय है; परन्तु यदि हम कभी यह मान सकें कि उनमें से एक भी बदली जा सकती है, तो हम उनके विषय में फिर कुछ न कहें। यदि मैं समझूँ कि बैंक ऑफ़ इंग्लैंड के नोट अगले सप्ताह भुनाए नहीं जा सकेंगे, तो मैं उन्हें लेने से इनकार कर दूँ; और यदि मैं समझूँ कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ कभी पूरी नहीं होंगी—यदि मैं समझूँ कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं के किसी शब्द को बदलना उचित जानेगा—तो हे पवित्रशास्त्र, विदा! मुझे अटल वस्तुएँ चाहिए: और जब मैं बाइबल की ओर फिरता हूँ तो पाता हूँ कि मेरे पास अटल प्रतिज्ञाएँ हैं: क्योंकि “दो बे-बदल बातों के द्वारा जिनके विषय में परमेश्वर का झूठा ठहरना अनहोना है,” उसने अपनी हर प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए, उसे दृढ़ किया और उस पर मुहर लगाई है। सुसमाचार “हाँ और नहीं” नहीं है, वह आज प्रतिज्ञा करके कल मुकर नहीं जाता; परन्तु सुसमाचार परमेश्वर की महिमा के लिये “हाँ ही हाँ” है। हे विश्वासी! कल आपके पास एक आनन्ददायक प्रतिज्ञा थी; और आज सवेरे जब आपने बाइबल खोली तो वह प्रतिज्ञा मीठी न लगी। क्या आप जानते हैं क्यों? क्या आप समझते हैं कि प्रतिज्ञा बदल गई थी? आह, नहीं! आप बदल गए; बात वहीं है। आपने सदोम की कुछ दाख खा ली थीं, और उससे आपके मुँह का स्वाद बिगड़ गया था, और आप उस मिठास को पहचान न सके। परन्तु वहाँ वही मधु था, निश्चय जानिए, वही बहुमूल्यता। “ओह!” परमेश्वर की एक सन्तान कहती है, “मैंने एक बार कुछ स्थिर प्रतिज्ञाओं पर अपना घर दृढ़ता से बना लिया था; एक आँधी आई, और मैंने कहा, हे प्रभु, मैं गिराया गया हूँ और नाश हो जाऊँगा।” ओह! प्रतिज्ञाएँ नहीं गिराई गईं; नींवें नहीं हटीं; वह तो आपकी “काठ, घास, फूस” की छोटी-सी झोपड़ी थी, जो आप बनाते आ रहे थे। वही गिर पड़ी। आप चट्टान के ऊपर हिलाए गए हैं, न कि चट्टान आपके नीचे हिली है। परन्तु मैं आपको बताऊँ कि संसार में जीने की सबसे उत्तम रीति क्या है। मैंने सुना है कि एक सज्जन ने एक हब्शी से कहा, “मैं समझ नहीं पाता कि तुम प्रभु में सदा इतने आनन्दित कैसे रहते हो और मैं प्रायः उदास रहता हूँ।” “अरे मालिक,” उसने कहा, “मैं तो प्रतिज्ञा पर सीधा लेट जाता हूँ—वहीं पड़ा रहता हूँ; आप प्रतिज्ञा पर खड़े होते हैं—उसमें थोड़ा आपका भी हाथ रहता है, और जब आँधी आती है तो आप गिर पड़ते हैं, और तब चिल्लाते हैं, ‘ओह! मैं गिर गया;’ परन्तु मैं तो तुरन्त प्रतिज्ञा पर लेट जाता हूँ, और इसी से मुझे गिरने का कोई भय नहीं।” तो आइए हम सदा कहें, “हे प्रभु, वह रही प्रतिज्ञा; उसे पूरा करना तेरा काम है।” मैं तो प्रतिज्ञा पर सीधा लेट जाता हूँ! मेरे लिये खड़ा रहना नहीं। आपको भी वहीं जाना चाहिए—प्रतिज्ञा पर दण्डवत्; और स्मरण रखिए, हर प्रतिज्ञा एक चट्टान है, एक न बदलनेवाली वस्तु। इसलिये अपने आप को उसके चरणों में डाल दीजिए, और सर्वदा वहीं विश्राम कीजिए।
5. परन्तु अब एक कर्कश स्वर आता है जो इस राग को बिगाड़ देता है। आप में से कुछ के लिये परमेश्वर अपनी धमकियों में नहीं बदलता। यदि हर प्रतिज्ञा अटल रहती है, और वाचा की हर शपथ पूरी होती है, तो हे पापी, सुन!—इस वचन पर ध्यान दे—अपनी सांसारिक आशाओं की मृत्यु-घण्टी सुन; अपने शारीरिक भरोसों की अन्त्येष्टि देख। परमेश्वर की हर धमकी भी, हर प्रतिज्ञा के समान, पूरी होकर रहेगी। विधानों की बात करते हैं! मैं आपको एक विधान बताता हूँ: “जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।” वह एक विधान है, और ऐसी विधि जो कभी नहीं बदल सकती। चाहे आप जितने भले बनें, जितने सदाचारी बन सकें बनें, जितने ईमानदार चाहें बनें, जितनी सीधी चाल चल सकें चलें,—वहाँ वह न बदलनेवाली धमकी खड़ी है: “जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।” हे सदाचारी, इस पर तेरा क्या कहना है? ओह, तू चाहता है कि तू इसे बदलकर कह सके, “जो पवित्र जीवन नहीं जीता वह दोषी ठहराया जाएगा।” वह भी सत्य होगा; परन्तु वहाँ ऐसा लिखा नहीं है। वहाँ लिखा है, “जो विश्वास न करेगा।” यही ठेस लगने का पत्थर और ठोकर खाने की चट्टान है; परन्तु आप उसे बदल नहीं सकते। बाइबल कहती है, विश्वास करो, नहीं तो दोषी ठहरोगे; और ध्यान रखिए, परमेश्वर की वह धमकी स्वयं परमेश्वर के समान ही अटल है। और जब नरक की यातनाओं के हज़ार वर्ष बीत चुके होंगे, तब आप ऊपर दृष्टि करेंगे, और आग के जलते अक्षरों में लिखा देखेंगे, “जो विश्वास न करेगा वह दोषी ठहराया जाएगा।” “परन्तु, हे प्रभु, मैं तो दोषी ठहराया जा चुका हूँ।” तौभी वहाँ अब भी ”ठहराया जाएगा“ ही लिखा है। और जब दस लाख युग बीत चुके होंगे, और आप अपनी पीड़ाओं और यातनाओं से चूर हो चुके होंगे, तब आप आँख उठाएँगे और अब भी पढ़ेंगे, “दोषी ठहराया जाएगा,” न बदला हुआ, न मिटाया हुआ। और जब आप सोच चुके होंगे कि अनन्तता ने अपना अन्तिम सूत कात लिया होगा—कि जिसे हम अनन्तता कहते हैं उसका हर कण चुक गया होगा, तब भी आप उसे वहाँ ऊपर लिखा देखेंगे, “दोषी ठहराया जाएगा।” हे भयानक विचार! मैं इसे कहने का साहस कैसे करूँ? परन्तु मुझे कहना ही होगा। हे सज्जनो, आपको चेतावनी दी ही जानी चाहिए, “ऐसा न हो कि तुम भी इस पीड़ा की जगह में आओ।” आपको कठोर बातें बताई ही जानी चाहिए; क्योंकि यदि परमेश्वर का सुसमाचार कठोर वस्तु नहीं है & व्यवस्था तो कठोर वस्तु है; सीनै पर्वत कठोर वस्तु है। हाय उस पहरुए पर जो भक्तिहीनों को नहीं चिताता! परमेश्वर अपनी धमकियों में नहीं बदलता। हे पापी, सावधान हो, क्योंकि “जीविते परमेश्वर के हाथों में पड़ना भयानक बात है।”
6. आगे बढ़ने से पहले हमें एक विचार का संकेत भर देना है, और वह यह है—परमेश्वर अपने प्रेम के पात्रों में नहीं बदलता—केवल अपने प्रेम में ही नहीं, वरन् उसके पात्रों में भी।
“यदि कभी ऐसा हो सके,
कि मसीह की भेड़ें गिरकर दूर हो जाएँ।
तो हाय, मेरा चंचल, निर्बल प्राण,
दिन में हज़ार बार गिर पड़े।”
यदि परमेश्वर का एक भी प्रिय पवित्र जन नाश हो गया होता, तो सब हो सकते थे; यदि वाचा के लोगों में से एक भी खो जाए, तो सब खो सकते हैं, और तब सुसमाचार की कोई प्रतिज्ञा सच्ची नहीं; वरन् बाइबल झूठ है, और उसमें कुछ भी ऐसा नहीं जो मेरे ग्रहण करने योग्य हो। जिस क्षण मैं यह विश्वास कर सकूँ कि परमेश्वर का कोई पवित्र जन कभी अन्तिम रूप से गिर सकता है, उसी क्षण मैं अविश्वासी बन जाऊँगा। यदि परमेश्वर ने मुझसे एक बार प्रेम किया है, तो वह मुझसे सर्वदा प्रेम करेगा।
“यदि यीशु एक बार मुझ पर चमका,
तो यीशु सर्वदा के लिये मेरा है।”
अनन्त प्रेम के पात्र कभी नहीं बदलते। जिन्हें परमेश्वर ने बुलाया है, उन्हें वह धर्मी ठहराएगा; जिन्हें उसने धर्मी ठहराया है, उन्हें वह पवित्र करेगा; और जिन्हें वह पवित्र करता है, उन्हें वह महिमा भी देगा।
1. इस प्रकार, सम्भवतः न बदलनेवाले परमेश्वर के विचार को केवल विस्तार देने में ही बहुत अधिक समय लगाकर, अब मैं यह सिद्ध करने का यत्न करूँगा कि वह अपरिवर्तनीय है। मैं तर्क करनेवाला उपदेशक अधिक नहीं हूँ, परन्तु एक प्रमाण जो मैं बताऊँगा वह यह है: परमेश्वर का अस्तित्व और उसकी सत्ता ही मुझे अपरिवर्तनीयता का बोध कराती प्रतीत होती है। मुझे एक क्षण सोचने दीजिए। एक परमेश्वर है; यह परमेश्वर सब वस्तुओं पर राज्य और शासन करता है; इसी परमेश्वर ने जगत को रचा: वही उसे सम्भालता और बनाए रखता है। वह कैसी सत्ता होगी? मुझे तो यही लगता है कि आप बदलनेवाले परमेश्वर की कल्पना कर ही नहीं सकते। मेरी समझ में यह विचार सहज बुद्धि के इतना विपरीत है कि यदि आप एक क्षण के लिये भी बदलनेवाले परमेश्वर की कल्पना करें, तो ये शब्द आपस में टकराते प्रतीत होते हैं, और आप कहने के लिये विवश हो जाते हैं, “तब तो वह एक प्रकार का मनुष्य ही होगा,” और परमेश्वर के विषय में मॉर्मन जैसी धारणा बना लेते हैं। मेरा अनुमान है कि बदलनेवाले परमेश्वर की कल्पना करना असम्भव है; मेरे लिये तो ऐसा ही है। दूसरे लोग शायद ऐसी धारणा रख सकें, परन्तु मैं उसे मन में स्थान नहीं दे सकता। मैं बदलनेवाले परमेश्वर की कल्पना उतनी ही नहीं कर सकता जितनी गोल चौकोर की, या किसी और असंगत बात की। यह बात इतनी विपरीत प्रतीत होती है कि जैसे ही मैं परमेश्वर कहता हूँ, वैसे ही मैं एक न बदलनेवाली सत्ता का विचार उसमें सम्मिलित करने के लिये विवश हो जाता हूँ।
2. वैसे तो मेरे विचार में वह एक प्रमाण पर्याप्त होगा, परन्तु एक और अच्छा प्रमाण परमेश्वर की सिद्धता के तथ्य में मिल सकता है। मैं परमेश्वर को सिद्ध सत्ता मानता हूँ। अब, यदि वह सिद्ध सत्ता है, तो वह बदल नहीं सकता। क्या आप यह नहीं देखते? मान लीजिए मैं आज सिद्ध हूँ; यदि मेरा बदलना सम्भव होता, तो क्या उस परिवर्तन के बाद मैं कल भी सिद्ध रहूँगा? यदि मैं बदलूँ, तो मुझे या तो अच्छी दशा से और अच्छी दशा में बदलना होगा—और तब यदि मैं और अच्छा हो सकता, तो मैं अभी सिद्ध नहीं हो सकता—या फिर अच्छी दशा से बुरी दशा में—और यदि मैं बुरा हो जाऊँ, तो मैं तब सिद्ध नहीं रहूँगा। यदि मैं सिद्ध हूँ, तो असिद्ध हुए बिना मैं बदला नहीं जा सकता। यदि मैं आज सिद्ध हूँ, तो कल भी सिद्ध रहने के लिये मुझे वैसा ही बना रहना होगा। अतः यदि परमेश्वर सिद्ध है, तो उसे वैसा ही रहना होगा; क्योंकि परिवर्तन का अर्थ होगा या तो अभी असिद्धता, या तब असिद्धता।
3. फिर, परमेश्वर की अनन्तता का तथ्य है, जो परिवर्तन को सम्भावना से ही बाहर कर देता है। परमेश्वर अनन्त सत्ता है। इससे आपका क्या अभिप्राय है? कोई मनुष्य नहीं जो आपको बता सके कि अनन्त सत्ता से उसका क्या अभिप्राय है। परन्तु दो अनन्त नहीं हो सकते। यदि एक वस्तु अनन्त है, तो किसी और वस्तु के लिये स्थान ही नहीं; क्योंकि अनन्त का अर्थ है सब कुछ। इसका अर्थ है असीम, ससीम नहीं, जिसका कोई अन्त नहीं। तो, दो अनन्त नहीं हो सकते। यदि परमेश्वर आज अनन्त है, और फिर बदल जाए और कल भी अनन्त हो, तो दो अनन्त हो जाएँगे। परन्तु ऐसा नहीं हो सकता। मान लीजिए वह अनन्त है और फिर बदलता है, तो उसे ससीम होना पड़ेगा, और वह परमेश्वर नहीं रह सकता; या तो वह आज ससीम है और कल भी ससीम, या आज अनन्त और कल ससीम, या आज ससीम और कल अनन्त—ये सारी कल्पनाएँ समान रूप से असंगत हैं। उसके अनन्त सत्ता होने का तथ्य ही उसके बदलनेवाली सत्ता होने के विचार को तुरन्त कुचल देता है। अनन्तता के माथे पर ही यह शब्द लिखा है, “अपरिवर्तनीयता।”
4. परन्तु फिर, प्रिय मित्रो, आइए हम देखें अतीत को: और वहाँ से हम परमेश्वर के अपरिवर्तनीय स्वभाव के कुछ प्रमाण बटोरेंगे। “क्या जो कुछ उसने कहा उसे न करे? क्या वह वचन देकर उसे पूरा न करे?” क्या यहोवा के विषय में यह नहीं कहा जा सकता, “उसने अपनी सारी इच्छा पूरी की है, और अपनी सारी युक्ति सिद्ध की है?” पलिश्तियों के देश की ओर फिरिए; पूछिए वह कहाँ है। परमेश्वर ने कहा, “हे अश्दोद, हाय-हाय कर, और हे गाज़ा के फाटको, तुम भी, क्योंकि तुम गिर जाओगे;” और अब वे कहाँ हैं? एदोम कहाँ है? पेत्रा और उसकी ढही हुई शहरपनाहों से पूछिए। क्या वे इस सत्य को प्रतिध्वनित न करेंगी कि परमेश्वर ने कहा है, “एदोम शिकार बनेगा, और नाश किया जाएगा?” बाबेल कहाँ है, और नीनवे कहाँ? मोआब कहाँ और अम्मोन कहाँ? वे जातियाँ कहाँ हैं जिनके विषय में परमेश्वर ने कहा था कि वह उन्हें नाश करेगा? क्या उसने उन्हें उखाड़कर उनका स्मरण तक पृथ्वी पर से मिटा नहीं दिया? और क्या परमेश्वर ने अपने लोगों को त्याग दिया है? क्या वह एक बार भी अपनी प्रतिज्ञा से असावधान हुआ? क्या उसने एक बार भी अपनी शपथ और वाचा तोड़ी, या एक बार भी अपनी योजना से हटा? आह! नहीं। इतिहास में एक भी उदाहरण दिखाइए जहाँ परमेश्वर बदला हो! महोदयो, आप नहीं दिखा सकते; क्योंकि सारे इतिहास में यह तथ्य अटल खड़ा है कि परमेश्वर अपनी मनसाओं में अपरिवर्तनीय रहा है। मुझे लगता है कि मैं किसी को यह कहते सुन रहा हूँ, “मुझे पवित्रशास्त्र का एक स्थल स्मरण है जहाँ परमेश्वर बदला!” और एक समय मैं भी ऐसा ही सोचता था। जिस घटना की बात मैं कर रहा हूँ, वह हिजकिय्याह की मृत्यु की है। यशायाह ने भीतर आकर कहा, ‘हिजकिय्याह, तू न बचेगा मर ही जाएगा, तेरा रोग असाध्य है, अपने घराने के विषय जो आज्ञा देनी हो वह दे।’ उसने दीवार की ओर मुँह फेरकर प्रार्थना आरम्भ की; और इससे पहले कि यशायाह बाहरी आँगन तक पहुँचे, उसे लौटकर यह कहने की आज्ञा हुई, “मैं तेरी आयु पन्द्रह वर्ष और बढ़ा दूँगा।” आप सोच सकते हैं कि इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर बदलता है; परन्तु सच पूछिए तो मुझे इसमें संसार भर में लेशमात्र भी प्रमाण नहीं दिखता। आप कैसे जानते हैं कि परमेश्वर यह नहीं जानता था? ओह! परमेश्वर तो यह जानता था; वह जानता था कि हिजकिय्याह जीवित रहेगा। तब तो वह बदला नहीं, क्योंकि यदि वह यह जानता था, तो वह कैसे बदल सकता था? यही तो मैं जानना चाहता हूँ। परन्तु क्या आप एक छोटी-सी बात जानते हैं?—कि हिजकिय्याह का पुत्र मनश्शे उस समय जन्मा ही नहीं था, और यदि हिजकिय्याह मर जाता, तो न मनश्शे होता, न योशिय्याह, और न मसीह, क्योंकि मसीह उसी वंश से आया। आप पाएँगे कि जब उसका पिता मरा तब मनश्शे बारह वर्ष का था; अर्थात् उसका जन्म इस घटना के तीन वर्ष बाद हुआ होगा। और क्या आप विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने मनश्शे के जन्म को ठहराया था, और उसे पहले से जानता था? निश्चय ही। तब उसने यह भी ठहराया कि यशायाह जाकर हिजकिय्याह से कहे कि उसका रोग असाध्य है, और फिर उसी साँस में यह भी कहे, “परन्तु मैं उसे चंगा करता हूँ, और तू जीवित रहेगा।” उसने यह इसलिये कहा कि हिजकिय्याह को प्रार्थना के लिये उभारे। उसने पहले एक मनुष्य की रीति से बात की। “सारी मानवीय सम्भावना के अनुसार तेरा रोग असाध्य है, और तू न बचेगा मर ही जाएगा।” फिर वह तब तक ठहरा रहा जब तक हिजकिय्याह ने प्रार्थना न की; तब वाक्य के अन्त में एक छोटा-सा “परन्तु” आया। यशायाह ने वाक्य पूरा नहीं किया था। उसने कहा, “अपने घराने के विषय जो आज्ञा देनी हो वह दे, क्योंकि कोई मानवीय उपचार नहीं; परन्तु” (और तब वह बाहर चला गया। हिजकिय्याह ने थोड़ी प्रार्थना की, और तब वह फिर भीतर आया, और बोला) ”परन्तु मैं तुझे चंगा करता हूँ।” इसमें विरोधाभास कहाँ है, सिवाय उनके मस्तिष्क में जो प्रभु से लड़ते हैं, और उसे बदलनेवाली सत्ता बनाना चाहते हैं।
II. अब दूसरी बात, मैं उन व्यक्तियों पर एक बात कहूँ जिनके लिये यह न बदलनेवाला परमेश्वर लाभ का कारण है। “मैं परमेश्वर हूँ, मैं बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।” अब, वे “याकूब की सन्तान” कौन हैं, जो अपरिवर्तनीय परमेश्वर में आनन्दित हो सकते हैं?
1. पहले, वे परमेश्वर के चुनाव की सन्तान हैं; क्योंकि लिखा है, “मैंने याकूब से प्रेम किया, परन्तु एसाव को अप्रिय जाना, जब अभी तक न तो बालक जन्मे थे, और न उन्होंने कुछ भला या बुरा किया था।” लिखा था, “जेठा छोटे का दास होगा।” “याकूब की सन्तान”—
“परमेश्वर के चुनाव की सन्तान हैं,
जो सर्वसत्ताधारी अनुग्रह के द्वारा विश्वास करते हैं;
सनातन नियुक्ति के अनुसार
वे अनुग्रह और महिमा पाते हैं।”
यहाँ “याकूब की सन्तान,” से परमेश्वर के चुने हुए लोग अभिप्रेत हैं—वे जिन्हें उसने पहले से जाना और अनन्त उद्धार के लिये पहले से ठहराया।
2. दूसरे स्थान में, “याकूब की सन्तान” से अभिप्राय है ऐसे व्यक्ति जिन्हें विशेष अधिकार और पद प्राप्त हैं। आप जानते हैं, याकूब को जन्म से कोई अधिकार प्राप्त न थे; परन्तु उसने शीघ्र ही उन्हें प्राप्त कर लिया। उसने अपने भाई एसाव के साथ एक कटोरी दाल का सौदा किया, और इस प्रकार पहिलौठे का अधिकार पा लिया। मैं इस उपाय को उचित नहीं ठहराता; परन्तु उसने आशीष भी प्राप्त की, और इस प्रकार विशेष अधिकार पा लिये। यहाँ “याकूब की सन्तान” से ऐसे व्यक्ति अभिप्रेत हैं जिनके पास विशेष अधिकार और पद हैं। जो विश्वास करते हैं, उन्हें उसने परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार और सामर्थ्य दिया है। मसीह के लहू में उनका भाग है; उन्हें अधिकार है कि वे “फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करें;” उन्हें अनन्त आदर का पद प्राप्त है; उनके पास अनन्त महिमा की प्रतिज्ञा है; उन्हें अपने आप को परमेश्वर की सन्तान कहने का अधिकार है। ओह! “याकूब की सन्तान” के लिये विशेष अधिकार और सौभाग्य ठहराए हुए हैं।
3. परन्तु इसके बाद, ये “याकूब की सन्तान” विशेष प्रकाशनों के जन थे। याकूब को अपने परमेश्वर की ओर से विशेष प्रकाशन मिले, और इस प्रकार वह अति आदर का पात्र बना। एक बार रात के समय वह लेटकर सो गया; झाड़ियाँ उसके परदे थीं, आकाश उसका चँदवा, एक पत्थर उसका तकिया, और भूमि उसका बिछौना। ओह! तब उसे एक विशेष प्रकाशन मिला। वहाँ एक सीढ़ी थी, और उसने परमेश्वर के दूतों को चढ़ते-उतरते देखा। इस प्रकार उसे मसीह यीशु का प्रकाशन मिला, उस सीढ़ी के रूप में जो पृथ्वी से स्वर्ग तक पहुँचती है, जिस पर से स्वर्गदूत हमारे लिये दया के दान लाने को चढ़ते-उतरते आए। फिर महनैम में कैसा प्रकाशन हुआ, जब परमेश्वर के दूत उससे मिले; और फिर पनीएल में, जब उसने परमेश्वर से मल्लयुद्ध किया, और उसे आमने-सामने देखा। वे विशेष प्रकाशन थे; और यह वचन उनकी ओर संकेत करता है जिन्हें याकूब के समान विशेष प्रकाशन मिले हैं।
तो अब, आप में से कितनों को व्यक्तिगत प्रकाशन मिले हैं? “ओह!” आप कहते हैं “यह तो भावावेश है; यह तो धर्मान्धता है।” अच्छा, तो यह एक धन्य भावावेश भी है, क्योंकि याकूब की सन्तान को विशेष प्रकाशन मिले हैं। उन्होंने परमेश्वर से ऐसे बातें की हैं जैसे मनुष्य अपने मित्र से बातें करता है; उन्होंने यहोवा के कान में धीमे स्वर से बातें कही हैं; मसीह उनके साथ भोजन करने को उनके संग रहा है, और वे मसीह के संग; और पवित्र आत्मा ने ऐसे प्रबल तेज से उनकी आत्माओं में प्रकाश किया है कि वे विशेष प्रकाशनों के विषय में सन्देह कर ही नहीं सकते थे। “याकूब की सन्तान” वे ही जन हैं, जिन्हें ये प्रकाशन प्राप्त होते हैं।
4. फिर, वे विशेष परीक्षाओं के जन हैं। आह! बेचारा याकूब! यदि मुझे याकूब की आशीष की आशा न होती तो मैं याकूब का भाग न चुनता; क्योंकि उसका भाग कठिन था। उसे अपने पिता के घर से भागकर लाबान के यहाँ जाना पड़ा; और फिर उस रूखे बूढ़े लाबान ने, जितने वर्ष वह वहाँ रहा, उसे छला—पत्नी के विषय में छला, मज़दूरी में छला, भेड़-बकरियों में छला, और आदि से अन्त तक छलता ही रहा। कुछ समय बाद उसे लाबान के पास से भी भागना पड़ा, जिसने उसका पीछा करके उसे जा पकड़ा। फिर एसाव चार सौ पुरुष लेकर उसे जड़-मूल से काट डालने को आया। तब प्रार्थना की एक घड़ी आई, और उसके बाद उसने मल्लयुद्ध किया, और जीवन भर उसे उखड़ी हुई जाँघ लेकर चलना पड़ा। परन्तु थोड़ा आगे चलकर, उसकी प्राणप्रिय राहेल मर गई। फिर उसकी बेटी दीना भ्रष्ट की जाती है, और बेटे शेकेम के लोगों की हत्या करते हैं। फिर प्रिय यूसुफ मिस्र में बेच दिया जाता है, और अकाल आ पड़ता है। फिर रूबेन उसके बिछौने पर चढ़कर उसे अशुद्ध करता है; यहूदा अपनी ही बहू के साथ कुकर्म करता है; और उसके सारे बेटे उसके लिये क्लेश बन जाते हैं। अन्त में बिन्यामीन ले लिया जाता है; और वह वृद्ध, टूटे-से हृदय के साथ, पुकार उठता है, “यूसुफ नहीं रहा, और शिमोन भी नहीं आया, और अब तुम बिन्यामीन को भी ले जाना चाहते हो।” याकूब से बढ़कर कोई मनुष्य कभी नहीं परखा गया, और यह सब अपने भाई को छलने के उस एक पाप के कारण। जीवन भर परमेश्वर उसे ताड़ना देता रहा। परन्तु मुझे विश्वास है कि बहुत से लोग हैं जो प्रिय बूढ़े याकूब के साथ समवेदना रख सकते हैं। उन्हें उसके जैसी ही परीक्षाओं में से होकर निकलना पड़ा है। तो हे क्रूस उठानेवालो! परमेश्वर कहता है, “मैं बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।” हे परीक्षाओं से घिरे बेचारे प्राणो! तुम अपने परमेश्वर के न बदलनेवाले स्वभाव के कारण नाश नहीं हुए। अब कुढ़ते मत रहिए, और दुःख के अभिमान में यह मत कहिए, “दुःख भोगनेवाला पुरुष मैं ही हूँ।” अरे, “दुःखी पुरुष” आपसे कहीं अधिक दुःख उठा चुका है; यीशु सचमुच शोक करनेवाला था। आप तो दुःख के वस्त्रों के छोर भर देखते हैं। आपकी परीक्षाएँ उसके जैसी कभी नहीं होतीं। आप नहीं समझते कि क्लेश क्या होता है; आपने क्लेश का कटोरा चखा भर है; आपके हिस्से में एक-दो बूँदें ही आई हैं, परन्तु यीशु ने तलछट तक पी डाली। परमेश्वर कहता है, मत डरो, “मैं यहोवा बदलता नहीं; इसी कारण, हे याकूब की सन्तान,” विशेष परीक्षाओं के जनो, “तुम नाश नहीं हुए।”
5. फिर “याकूब की सन्तान” कौन हैं, इस पर एक और विचार, क्योंकि मैं चाहूँगा कि आप स्वयं जाँच लें कि क्या आप भी “याकूब की सन्तान” हैं। वे विशेष चरित्र के जन हैं; क्योंकि यद्यपि याकूब के चरित्र में कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें हम सराह नहीं सकते, तौभी एक-दो बातें ऐसी हैं जिन्हें परमेश्वर सराहता है। याकूब का विश्वास था, जिसके द्वारा याकूब का नाम उन पराक्रमी धर्मवीरों में लिखा गया जिन्हें प्रतिज्ञा की हुई वस्तुएँ पृथ्वी पर तो न मिलीं, परन्तु स्वर्ग में मिलेंगी। हे प्रियो, क्या आप विश्वास के जन हैं? क्या आप जानते हैं कि विश्वास से चलना, विश्वास से जीना, अपना दैनिक भोजन विश्वास से पाना, आत्मिक मन्ना पर जीवित रहना—यह सब विश्वास ही से करना, क्या होता है? क्या विश्वास आपके जीवन का नियम है? यदि ऐसा है, तो आप “याकूब की सन्तान” हैं।
फिर याकूब प्रार्थना का पुरुष था—एक ऐसा पुरुष जिसने मल्लयुद्ध किया, कराहें भरीं और प्रार्थना की। वहाँ ऊपर एक मनुष्य है जिसने आज सवेरे, परमेश्वर के भवन में आने से पहले, प्रार्थना की ही नहीं। आह! अरे बेचारे विधर्मी, क्या तू प्रार्थना नहीं करता? नहीं! वह कहता है, “मैंने ऐसी बात कभी सोची ही नहीं; वर्षों से मैंने प्रार्थना नहीं की।” अच्छा, मेरी आशा है कि मरने से पहले तू कर ले। प्रार्थना के बिना जी और मर, और जब तू नरक में पहुँचेगा तब भरपूर प्रार्थना करेगा। वहाँ एक स्त्री है: उसने आज सवेरे प्रार्थना नहीं की; वह अपने बच्चों को रविवारीय पाठशाला भेजने में इतनी व्यस्त थी कि उसे प्रार्थना का समय ही न मिला। प्रार्थना का समय नहीं? क्या वस्त्र पहनने का समय था? प्रत्येक काम का, जो आकाश के नीचे होता है, एक समय है, और यदि आपने प्रार्थना करने की ठानी होती, तो आपने प्रार्थना की होती। परमेश्वर की सन्तान प्रार्थना के बिना जीवित नहीं रह सकती। वे मल्लयुद्ध करनेवाले याकूब हैं। वे ऐसे जन हैं जिनमें पवित्र आत्मा ऐसा कार्य करता है कि वे प्रार्थना के बिना वैसे ही जीवित नहीं रह सकते जैसे मैं साँस लिये बिना जीवित नहीं रह सकता। उन्हें प्रार्थना करनी ही है। महोदयो, ध्यान रखिए, यदि आप प्रार्थना के बिना जी रहे हैं, तो आप मसीह के बिना जी रहे हैं; और ऐसे ही मरने पर आपका भाग उस झील में मिलेगा, जो आग से जलती रहती है। परमेश्वर आपको छुड़ाए, परमेश्वर आपको ऐसे भाग से बचाए! परन्तु आप जो “याकूब की सन्तान” हैं, शान्ति पाइए, क्योंकि परमेश्वर अपरिवर्तनीय है।
III. तीसरी बात, दूसरे बिन्दु पर मैं केवल एक ही बात कह सकता हूँ—वह लाभ जो ये “याकूब की सन्तान” एक न बदलनेवाले परमेश्वर से पाते हैं। “इसी कारण, हे याकूब की सन्तान तुम नाश नहीं हुए।” “नाश?” कैसे? मनुष्य का नाश कैसे हो सकता है? देखिए, दो रीतियाँ हैं। हम नरक में नाश हो सकते थे। यदि परमेश्वर बदलनेवाला परमेश्वर होता, तो आज सवेरे यहाँ उपस्थित “याकूब की सन्तान” नरक में नाश हो चुकी होती; यदि परमेश्वर का न बदलनेवाला प्रेम न होता तो मैं आग में जलनेवाली एक लकड़ी होता। परन्तु नाश होने की एक रीति है इस संसार में; मरने से पहले ही दोषी ठहर चुके होने जैसी भी एक बात है—“दोषी ठहराया जा चुका;” जीवित रहते हुए भी पूरी रीति से मृतक होने जैसी एक बात है। हम अपने ही उपायों पर छोड़ दिए जा सकते थे, और तब अब हम कहाँ होते? पियक्कड़ों के साथ रंगरलियाँ मनाते, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की निन्दा करते। ओह? हे परम प्रियो, यदि उसने आपको छोड़ दिया होता, यदि वह बदलनेवाला परमेश्वर होता, तो आप अशुद्धों में सबसे अशुद्ध, और नीचों में सबसे नीच ठहरे होते। क्या आपको अपने जीवन में ऐसी घड़ियाँ स्मरण नहीं जो मेरी अनुभव की हुई घड़ियों जैसी हों? मैं पाप की धार तक चला गया हूँ; किसी प्रबल परीक्षा ने मेरी दोनों भुजाएँ ऐसी जकड़ लीं कि मैं उससे मल्लयुद्ध न कर सका। मैं अकेला धकेला गया हूँ, मानो किसी भयानक शैतानी शक्ति के द्वारा किसी डरावनी कगार की धार तक घसीटा गया हूँ। मैंने नीचे, और नीचे, और नीचे झाँककर अपना भाग देखा है; मैं विनाश की कगार पर काँप उठा। मैं भय से सिहर उठा हूँ, जब खड़े रोंगटों के साथ मैंने उस पाप का विचार किया जो मैं करने ही वाला था, उस भयानक गड्ढे का जिसमें मैं गिरने ही वाला था। एक बलवन्त भुजा ने मुझे बचा लिया। मैं चौंककर पीछे हटा और चिल्ला उठा, हे परमेश्वर! क्या मैं पाप के इतने निकट जाकर भी फिर लौट आया? क्या मैं भट्ठे के पास तक चला गया और नबूकदनेस्सर के बलवन्त पुरुषों के समान, उसकी आँच ही से भस्म होकर, गिर नहीं पड़ा? ओह! जब मैं अपने किए हुए पापों का, और उन अपराधों का विचार करता हूँ जो मेरी दुष्ट कल्पना में से होकर गुज़रे हैं, तो क्या यह सम्भव है कि मैं आज सवेरे यहाँ हूँ? हाँ, मैं यहाँ हूँ, नाश हुए बिना, क्योंकि प्रभु बदलता नहीं। ओह! यदि वह बदल गया होता, तो हम दर्जनों रीतियों से नाश हो चुके होते; यदि प्रभु बदल गया होता, तो आप और मैं अपने ही हाथों नाश हो चुके होते; क्योंकि अन्ततः अहं महाशय ही मसीही विश्वासी का सबसे बुरा शत्रु है। हम अपने ही प्राणों के घातक ठहरे होते; हमने अपनी ही आत्माओं के लिये विष का कटोरा घोल लिया होता, यदि प्रभु न बदलनेवाला परमेश्वर न होता, और जब हम उसे पीने ही वाले थे तब उसने वह कटोरा हमारे हाथों से झटककर गिरा न दिया होता। फिर, यदि वह अपरिवर्तनीय परमेश्वर न होता, तो हम स्वयं परमेश्वर के हाथ से नाश हो चुके होते। हम परमेश्वर को पिता कहते हैं; परन्तु इस संसार में ऐसा कोई पिता नहीं जिसने बहुत पहले ही अपने सारे बच्चों को मार न डाला होता, वह उनसे ऐसा ही क्रुद्ध हो उठता, यदि उसे अपने परिवार से आधा भी उतना कष्ट पहुँचा होता जितना परमेश्वर को अपने परिवार से पहुँचा है। सारे संसार में सबसे अधिक कष्ट देनेवाला परिवार उसी का है—अविश्वासी, कृतघ्न, आज्ञा न माननेवाला, भूलनेवाला, विद्रोही, भटकनेवाला, कुड़कुड़ानेवाला और हठीला। भला है कि वह विलम्ब से क्रोध करनेवाला है, नहीं तो उसने हम में से कुछ पर बहुत पहले ही केवल छड़ी नहीं, वरन् तलवार भी उठा ली होती। परन्तु आरम्भ में हम में प्रेम करने योग्य कुछ था ही नहीं, अतः अब उससे कम भी नहीं हो सकता। जॉन न्यूटन एक विलक्षण कथा सुनाया करते थे, और उस पर हँसते भी थे, एक भली स्त्री की, जिसने चुनाव के सिद्धान्त को सिद्ध करने के लिये कहा, “आह! महोदय, प्रभु ने अवश्य मेरे जन्म से पहले ही मुझसे प्रेम किया होगा, नहीं तो उसे बाद में मुझ में प्रेम करने योग्य कुछ न दिखता।” मुझे निश्चय है कि मेरे विषय में यह सत्य है, और परमेश्वर के अधिकांश लोगों के विषय में भी सत्य है; क्योंकि जन्म लेने के बाद उनमें प्रेम करने योग्य इतना थोड़ा है कि यदि उसने उससे पहले उनसे प्रेम न किया होता, तो उसे बाद में उन्हें चुनने का कोई कारण न दिखता; परन्तु जब उसने बिना कर्मों के उनसे प्रेम किया, तो वह अब भी बिना कर्मों के उनसे प्रेम करता है; जब उनके भले कर्मों ने उसका स्नेह अर्जित नहीं किया, तो बुरे कर्म उस स्नेह को काट नहीं सकते; जब उनकी धार्मिकता ने उसके प्रेम को उनसे नहीं बाँधा, तो उनकी दुष्टता उन सुनहली कड़ियों को तोड़ नहीं सकती। उसने विशुद्ध सर्वसत्ताधारी अनुग्रह से उनसे प्रेम किया, और वह आगे भी उनसे प्रेम करता रहेगा। परन्तु यदि परमेश्वर कभी बदला होता, तो हम शैतान के द्वारा और अपने शत्रुओं के द्वारा नाश हो चुके होते—संसार के द्वारा नाश, अपने पापों के द्वारा, अपनी परीक्षाओं के द्वारा, और सौ अन्य रीतियों से नाश।
अब देखिए, समय हमारा साथ छोड़ रहा है, और मैं थोड़ा ही कह सकता हूँ। मैंने मूलपाठ को सरसरी दृष्टि से छुआ भर है। अब मैं उसे आपके हाथों में सौंपता हूँ। प्रभु आप “याकूब की सन्तान” की सहायता करे कि आप भोजन का यह अंश घर ले जाएँ; उसे भली-भाँति पचाएँ, और उससे तृप्त हों। पवित्र आत्मा इन लिखी हुई महिमामय बातों को मधुरता से हृदय में बैठा दे! और आपको मिले “चिकने भोजन का भोज, और बहुत ही निथरे हुए दाखमधु का भोज!” स्मरण रखिए, चाहे कुछ भी छिन जाए, परमेश्वर वही है। आपके मित्र विमुख हो सकते हैं, आपके सेवक-प्रचारक उठा लिये जा सकते हैं, हर वस्तु बदल सकती है, परन्तु परमेश्वर नहीं बदलता। आपके भाई बदल सकते हैं और आपका नाम बुरा जानकर काट सकते हैं: परन्तु परमेश्वर तब भी आपसे प्रेम करेगा। भले ही जीवन में आपका स्थान बदल जाए, और आपकी सम्पत्ति जाती रहे; भले ही आपका सारा जीवन हिला दिया जाए, और आप निर्बल और रोगी हो जाएँ; भले ही सब कुछ भाग जाए—एक स्थान है जहाँ परिवर्तन अपनी उँगली नहीं रख सकता; एक नाम है जिस पर परिवर्तनशीलता कभी लिखी नहीं जा सकती; एक हृदय है जो कभी बदल नहीं सकता; वह हृदय परमेश्वर का है—वह नाम प्रेम है।
“उस पर भरोसा रखिए, वह आपको कभी न छलेगा।
चाहे आप उसके विषय में कम ही आँकें;
वह आपको कभी नहीं, कभी नहीं छोड़ेगा,
और न आपको अपने से पूरी रीति दूर जाने देगा।”
सार्वजनिक डोमेन। मूल पाठ का स्रोत: मूल संस्करण.