पाठ
अय्यूब 23:3,4
संक्षेप में
अय्यूब की पुकार राहत के लिए नहीं वरन् एक सुनवाई के लिए है: ‘भला होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है!’ स्पर्जन इसे प्रार्थना के शिल्प के एक पाठ के रूप में लेते हैं—अपने मुकद्दमे को वैसे ही क्रम से रखो जैसे याजक अपनी बलि सजाता था, और साफ-साफ माँगो, यदि इश्माएल का अभिप्राय है तो इश्माएल ही कहो—और फिर उन दुहाइयों की सूची देते हैं जो सफल रही हैं: परमेश्वर के गुण, उसकी प्रतिज्ञाएँ, उसका महान् नाम, बीती दयाएँ, यहाँ तक कि हमारी अपनी अयोग्यता तक।
“भला होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है! कि मैं उसके सिंहासन तक भी पहुँच पाता! तब मैं उसके सम्मुख अपना मुकद्दमा क्रम से रखता, और अपना मुँह तर्कों से भर लेता।”—अय्यूब 23:3,4
अय्यूब ने अपनी घोर विपत्ति में प्रभु को पुकारा। परमेश्वर की एक दुखियारी सन्तान की तड़पती अभिलाषा यही होती है कि वह एक बार फिर अपने पिता का मुख देख पाए। उसकी पहली प्रार्थना यह नहीं है, “भला होता कि जो रोग अब मेरे शरीर के अंग-अंग में सड़ रहा है, उससे मैं चंगा हो जाता!” और न ही यह, “भला होता कि मैं अपने बच्चों को कब्र के जबड़े से लौटा हुआ, और अपनी सम्पत्ति को लुटेरे के हाथ से फिर से छुड़ाई हुई देख पाता!” परन्तु उसकी पहली और सबसे ऊँची पुकार यह है, “भला होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है—वही जो मेरा परमेश्वर है! कि मैं उसके सिंहासन तक भी पहुँच पाता!” जब आँधी आती है तो परमेश्वर की सन्तान घर की ओर दौड़ती है। सब बुराइयों से यहोवा के पंखों तले शरण ढूँढ़ना एक अनुग्रह पाई हुई आत्मा की स्वर्ग से जन्मी प्रवृत्ति है। “जिसने परमेश्वर को अपना शरणस्थान बना लिया है”—यह एक सच्चे विश्वासी की उपाधि हो सकती है। एक कपटी, जब वह अनुभव करता है कि परमेश्वर ने उसे दुख दिया है, तो उस चोट का बुरा मानता है, और दास के समान उस स्वामी से भागना चाहता है जिसने उसे कोड़े लगाए हैं; परन्तु स्वर्ग का सच्चा वारिस ऐसा नहीं करता, वह उसी हाथ को चूमता है जिसने उस पर प्रहार किया, और उसी परमेश्वर की गोद में छड़ी से शरण ढूँढ़ता है जिसने उस पर भ्रूभंग किया था। तुम देखोगे कि परमेश्वर से संगति करने की अभिलाषा तब और भी प्रबल हो जाती है जब सान्त्वना के अन्य सब स्रोत विफल हो जाते हैं। जब अय्यूब ने अपने मित्रों को पहली बार दूर से देखा, तो उसने शायद यह आशा बाँधी होगी कि उनकी दयालु सम्मति और करुणामय कोमलता उसके शोक की धार को कुन्द कर देगी; परन्तु वे अधिक देर बोल भी न पाए थे कि वह कड़वाहट में चिल्ला उठा, “तुम सब के सब निकम्मे शान्तिदाता हो।” उन्होंने उसके घावों पर नमक छिड़का, उसके शोक की ज्वाला में ईंधन डाला, और उसके दुखों के नागदौने में अपने उलाहनों का पित्त मिला दिया। कभी वे उसकी मुस्कान की धूप में तपने को तरसते थे, और अब वे उसकी प्रतिष्ठा पर छाया डालने का साहस करते हैं—अत्यन्त निर्दयी और अनुचित रीति से। हाय उस मनुष्य पर जब उसका दाखमधु का कटोरा उसे सिरके से चिढ़ाए, और उसका तकिया उसे काँटों से चुभे! उस कुलपिता ने अपने दुखदायी मित्रों से मुँह मोड़ लिया और स्वर्गीय सिंहासन की ओर दृष्टि उठाई, जैसे कोई यात्री अपनी खाली चमड़े की कुप्पी से मुँह फेरकर पूरी तेजी से कुएँ की ओर बढ़ता है। वह पृथ्वी पर जन्मी आशाओं को विदा कहता है, और पुकारता है, “भला होता कि मैं जानता कि मेरा परमेश्वर मुझे कहाँ मिल सकता है!” हे मेरे भाइयो, कोई भी बात हमें सृष्टिकर्ता के मोल की इतनी शिक्षा नहीं देती जितनी तब मिलती है जब हम और सब वस्तुओं का खोखलापन जान लेते हैं। जब तुम इस वचन से आर-पार बेधे जाओगे, “श्रापित है वह पुरुष जो मनुष्य पर भरोसा रखता है, और शरीर को अपना सहारा बनाता है,” तब तुम इस दिव्य आश्वासन से अकथनीय मिठास चूसोगे, “धन्य है वह पुरुष जो यहोवा पर भरोसा रखता है, और जिसकी आशा यहोवा है।” पृथ्वी के उन छत्तों से, जहाँ तुम्हें मधु न मिला परन्तु बहुत से तीखे डंक मिले, कड़वे तिरस्कार के साथ मुँह मोड़कर तुम उसमें आनन्दित होगे जिसका विश्वासयोग्य वचन मधु वा मधु के छत्ते से भी मीठा है।
आगे यह भी देखने योग्य है कि यद्यपि एक भला मनुष्य अपनी विपत्ति में परमेश्वर के पास शीघ्रता करता है, और अपने संगी मनुष्यों की निर्दयता के कारण और भी अधिक वेग से दौड़ता है, तौभी कभी-कभी अनुग्रह पाई हुई आत्मा परमेश्वर की सुखदायक उपस्थिति से वंचित रह जाती है। यह सब दुखों में सबसे बुरा दुख है; यह वचन अय्यूब की गहरी कराहों में से एक है, उन सब से कहीं अधिक गहरी जो उसके मुँह से अपने बच्चों और सम्पत्ति के नाश पर निकलीं: “भला होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है!” सब हानियों में सबसे बुरी हानि यह है कि मैं अपने परमेश्वर की मुस्कान खो दूँ। अब उसे अपने छुड़ानेवाले की उस पुकार की कड़वाहट का पूर्वास्वाद मिल रहा था, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” एक अर्थ में परमेश्वर की उपस्थिति सदा अपने लोगों के संग रहती है, जहाँ तक उन्हें गुप्त रीति से थामे रखने की बात है; परन्तु उसकी प्रकट उपस्थिति का आनन्द वे सदा नहीं भोगते। गीत की उस दुल्हन के समान, वे रात को अपने बिछौने पर अपने प्रीतम को ढूँढ़ते हैं, वे उसे ढूँढ़ते तो हैं परन्तु पाते नहीं; और यद्यपि वे जागकर नगर में घूमते फिरें तौभी उसे न पाएँ, और यह प्रश्न बार-बार उदासी से पूछा जाए, “क्या तुमने उसको देखा है जो मेरे प्राण का प्रीतम है?” तुम परमेश्वर के प्रिय हो सकते हो, और फिर भी अपनी आत्मा में उस प्रेम का कुछ बोध न रखते हो। तुम उसके हृदय को उतने ही प्रिय हो सकते हो जितना स्वयं यीशु मसीह, और फिर भी एक क्षण भर के लिए वह तुम्हें त्याग दे, और थोड़े से क्रोध में अपने को तुमसे छिपा ले। परन्तु, हे प्रिय भाइयो, ऐसे समयों में विश्वास करनेवाली आत्मा की अभिलाषा इसी बात से और भी अधिक प्रबल हो जाती है कि परमेश्वर का प्रकाश रोक लिया गया है। घमण्डी होंठों से यह कहने के बदले, “अच्छा, यदि वह मुझे छोड़ देता है तो मुझे उसके बिना काम चलाना पड़ेगा; यदि मुझे उसकी सुखदायक उपस्थिति नहीं मिल सकती तो जितना बन पड़े उतना लड़ता रहूँगा,” वह आत्मा कहती है, “नहीं, यही तो मेरा प्राण है; मुझे अपना परमेश्वर अवश्य चाहिए। मैं नष्ट हो रहा हूँ, मैं गहरे कीचड़ में धँसता जा रहा हूँ जहाँ खड़े रहने का ठौर नहीं, और परमेश्वर के भुजबल के सिवा कोई मुझे छुड़ा नहीं सकता।” अनुग्रह पाई हुई आत्मा दुगुने उत्साह से परमेश्वर को ढूँढ़ निकालने में लग जाती है, और अपनी कराहें, अपनी बिनती, अपनी सिसकियाँ और आहें स्वर्ग की ओर और भी बारंबार और उत्कटता से भेजती है। “भला होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है!” दूरी वा परिश्रम कुछ भी नहीं; यदि आत्मा को केवल यह मालूम हो जाए कि कहाँ जाना है तो वह उस दूरी को शीघ्र लाँघ जाए। वह पहाड़ों वा नदियों के विषय में कोई शर्त नहीं रखती, परन्तु प्रतिज्ञा करती है कि यदि उसे मालूम हो कि कहाँ, तो वह उसके सिंहासन तक भी आ पहुँचे। मेरा प्राण अपनी भूख में पत्थर की दीवारें तोड़ डाले, वा अपने परमेश्वर तक पहुँचने के लिए स्वर्ग की प्राचीरों पर चढ़ जाए, और यद्यपि मेरे और उसके बीच सात नरक हों, तौभी मैं उस ज्वाला का सामना करूँ यदि मैं उस तक पहुँच सकूँ, तनिक भी न घबराऊँ यदि केवल यह आशा हो कि अन्त में मैं उसकी उपस्थिति में खड़ा होकर उसके प्रेम का आनन्द अनुभव करूँगा। मुझे जान पड़ता है कि यही वह मनोदशा थी जिसमें अय्यूब ने ये वचन कहे जो हमारे सामने हैं।
परन्तु हम इस बात पर रुक नहीं सकते, क्योंकि आज के इस प्रवचन का विषय हमें आगे बुला रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर की उपस्थिति चाहने में अय्यूब का उद्देश्य यह था कि वह उससे प्रार्थना कर सके। वह प्रार्थना तो कर चुका था, परन्तु वह परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करना चाहता था। वह उसके सामने बिनती करना चाहता था जिसके विषय में वह जानता था कि वह उसकी सुनेगा और उसकी सहायता करेगा। वह अपना मुकद्दमा उस निष्पक्ष न्यायी के आसन के सामने, उसी सर्वज्ञानी परमेश्वर के मुख के सम्मुख रखने को तरसता था; वह उन निचली अदालतों से, जहाँ उसके मित्रों ने अन्यायपूर्ण न्याय किया था, राजा की उच्च अदालत—स्वर्ग की सर्वोच्च अदालत—में अपील करना चाहता था; वहाँ, वह कहता है, “मैं उसके सम्मुख अपना मुकद्दमा क्रम से रखता, और अपना मुँह तर्कों से भर लेता।”
इस पिछले पद में अय्यूब हमें सिखाता है कि उसने परमेश्वर के साथ किस रीति से बिनती और मध्यस्थता करने की ठानी थी। वह मानो अपनी प्रार्थना-कोठरी के भेद प्रकट करता है, और प्रार्थना की कला का परदा उठाता है। यहाँ हमें बिनती करनेवालों की मण्डली में प्रवेश दिया गया है; हमें बिनती करने की कला और भेद दिखाया गया है; यहाँ हमें प्रार्थना का धन्य शिल्प और विज्ञान सिखाया गया है, और यदि आज इस प्रात:काल, अगले एक घण्टे के लिए, हम अय्यूब के शिष्य बन सकें, और अय्यूब के स्वामी से एक पाठ ले सकें, तो हम परमेश्वर से मध्यस्थता करने में कुछ थोड़ी नहीं वरन् बहुत निपुणता पा सकते हैं।
यहाँ प्रार्थना में दो बातें आवश्यक बताई गई हैं—अपने मुकद्दमे को क्रम से रखना, और अपने मुँह को तर्कों से भरना। हम इन दोनों बातों की चर्चा करेंगे, और फिर यदि हमने इस पाठ को ठीक रीति से सीख लिया, तो एक धन्य परिणाम निकलेगा।
I. पहली बात, यह आवश्यक है कि हमारी अरज परमेश्वर के सम्मुख क्रम से रखी जाए।
एक ओछी धारणा है कि प्रार्थना बहुत सहज वस्तु है, एक प्रकार का साधारण काम जो बिना किसी सावधानी वा प्रयास के जैसे-तैसे कर लिया जाए। कुछ लोग सोचते हैं कि तुम्हें बस एक पुस्तक उतारनी है और कुछ गिने-चुने बहुत उत्तम शब्द पढ़ लेने हैं, और तुमने प्रार्थना कर ली और पुस्तक को फिर रख सकते हो; औरों की धारणा है कि पुस्तक का उपयोग करना अन्धविश्वास है, और तुम्हें तो बिना तैयारी के वाक्य दोहराने चाहिए, ऐसे वाक्य जो सूअरों के झुण्ड वा कुत्तों के गोल के समान वेग से मन में आ धमकते हैं, और जब तुमने जो कहा उस पर थोड़ा-बहुत ध्यान देकर उन्हें उच्चारित कर लिया, तो तुमने प्रार्थना कर ली। पर प्राचीन सन्तों ने इनमें से किसी भी रीति की प्रार्थना नहीं अपनाई। जान पड़ता है कि उन्होंने प्रार्थना के विषय में आजकल के बहुतेरे लोगों से कहीं अधिक गम्भीरता से सोचा। यह उनके लिए एक महान् काम रहा जान पड़ता है, एक लम्बे अभ्यास वाली साधना, जिसमें उनमें से कुछ ने बड़ी श्रेष्ठता पाई, और इसी से वे विलक्षण रीति से धन्य हुए। उन्होंने प्रार्थना के खेत में बड़ी-बड़ी फसलें काटीं, और दयासन को अनगिनत खजानों की खान पाया।
प्राचीन सन्त, अय्यूब के समान, परमेश्वर के सम्मुख अपना मुकद्दमा क्रम से रखने के आदी थे; अर्थात्, जैसे कोई फरियादी अदालत में आकर बिना सोचे-विचारे अपना मुकद्दमा एकाएक नहीं बयान करता, वरन् अपनी अरज भली-भाँति तैयार करके पेशी के कमरे में प्रवेश करता है, और इसके अतिरिक्त यह भी सीख चुका होता है कि जिस महान् व्यक्ति के सम्मुख वह अपील कर रहा है उसकी उपस्थिति में उसे कैसा आचरण करना चाहिए। भला यही है कि राजाओं के राजा के सिंहासन के निकट यथासम्भव पूर्व-विचार और तैयारी के साथ पहुँचा जाए, यह जानते हुए कि हम क्या कर रहे हैं, कहाँ खड़े हैं, और जो हम पाना चाहते हैं वह क्या है। संकट और विपत्ति के समयों में हम जैसे हैं वैसे ही परमेश्वर के पास उड़ चलें, जैसे कबूतरी अपने पंख बिखरे होने पर भी चट्टान की दरार में घुस जाती है; परन्तु साधारण समयों में हमें अनमने मन से नहीं आना चाहिए, जैसे बालक अपने पिता के पास प्रात:काल तब तक नहीं आता जब तक अपना मुँह न धो ले। उस याजक को देखो; उसके पास चढ़ाने को एक बलि है, परन्तु वह याजकों के आँगन में लपककर जो पहला फरसा उसके हाथ लगे उसी से बैल को नहीं काटने लगता, वरन् उठकर वह पीतल के हौद में अपने पाँव धोता है, अपने वस्त्र पहनता है, और अपने याजकीय पहिरावों से अपने को सजाता है; तब वह अपने पशु को व्यवस्था के अनुसार ठीक से टुकड़े-टुकड़े करके वेदी के पास आता है, और आज्ञा के अनुसार करने में सावधान रहता है, यहाँ तक कि चरबी, कलेजी और गुर्दों को रखने जैसी छोटी बात में भी; और वह लहू को एक कटोरे में लेकर वेदी के पाँयते ठीक उचित स्थान पर उंडेलता है, जैसे-तैसे नहीं फेंक देता, और आग भी साधारण ज्वाला से नहीं वरन् वेदी पर की पवित्र आग से सुलगाता है। अब यह सारा विधि-विधान समाप्त हो चुका है, परन्तु जो सत्य इसने सिखाया वह ज्यों का त्यों बना है; हमारे आत्मिक बलिदान पवित्र सावधानी से चढ़ाए जाने चाहिए। परमेश्वर न करे कि हमारी प्रार्थना केवल बिछौने से उछलकर घुटने टेक देना और जो पहला वाक्य मुँह में आए वही कह देना हो; वरन् इसके विपरीत, हम पवित्र भय और पावन श्रद्धा के साथ प्रभु की बाट जोहें। देखो कि जब परमेश्वर ने दाऊद को आशीष दी तो उसने कैसे प्रार्थना की—वह प्रभु के सम्मुख भीतर गया। इसे समझो; वह दूर बाहर खड़ा नहीं रहा, वरन् प्रभु के सम्मुख भीतर गया और बैठ गया—क्योंकि बैठना प्रार्थना के लिए बुरी मुद्रा नहीं है, चाहे इसके विरुद्ध जो कोई कुछ कहे—और प्रभु के सम्मुख शान्ति और स्थिरता से बैठकर तब उसने प्रार्थना आरम्भ की, परन्तु तब तक नहीं जब तक उसने पहले दिव्य भलाई पर मनन न कर लिया, और यों प्रार्थना की आत्मा को न पा लिया। तब पवित्र आत्मा की सहायता से उसने अपना मुँह खोला। भला होता कि हम अधिक बार इसी रीति से प्रभु को ढूँढ़ते! अब्राहम हमारे लिए एक आदर्श ठहरे; वह बड़े तड़के उठा—यह उसकी तत्परता थी; वह तीन दिन की यात्रा पर गया—यह उसका उत्साह था; उसने अपने सेवकों को पहाड़ के नीचे छोड़ दिया—यह उसका एकान्त था; वह लकड़ी और आग अपने साथ ले गया—यह उसकी तैयारी थी; और अन्त में, उसने वेदी बनाई और लकड़ी क्रम से चुनी, और तब छुरी उठाई—यह उसकी आराधना की भक्तिमय सावधानी थी। दाऊद इसे यों कहता है, “हे यहोवा, भोर को मैं अपनी प्रार्थना तेरे सम्मुख सजाऊँगा, और तेरी बाट जोहता रहूँगा”; जिसका अर्थ मैंने तुम्हें बार-बार यह समझाया है कि उसने अपने विचारों को योद्धाओं के समान पंक्तिबद्ध किया, वा अपनी प्रार्थनाओं को तीरों के समान साधा। वह तीर लेकर उसे प्रत्यंचा पर चढ़ाकर जहाँ-तहाँ बार-बार नहीं चला देता; वरन् चुना हुआ बाण निकालकर उसे डोरी पर जोड़कर, उसने सोच-समझकर निशाना साधा। उसने देखा—भली-भाँति देखा—लक्ष्य के सफेद केन्द्र को; अपनी दृष्टि उस पर गड़ाए रखी, अपनी प्रार्थना को साधे रखा, और तब पूरे बल से अपना धनुष खींचकर तीर छोड़ दिया; और फिर, जब बाण उसके हाथ से निकल गया, तो वह क्या कहता है? “मैं ताकता रहूँगा।” वह ताकता रहा कि तीर कहाँ गया, कि उसका क्या प्रभाव हुआ; क्योंकि वह अपनी प्रार्थनाओं के उत्तर की आशा रखता था, और उन बहुतों के समान नहीं था जो अपनी प्रार्थनाएँ उच्चारण कर लेने के बाद उनके विषय में शायद ही कुछ सोचते हैं। दाऊद जानता था कि उसके सामने एक ऐसा काम है जिसके लिए उसकी सारी मानसिक शक्तियाँ अपेक्षित हैं; उसने अपनी शक्तियों को पंक्तिबद्ध किया और उस काम को एक निपुण कारीगर की भाँति किया, उस मनुष्य के समान जो उस पर विश्वास करता था और सफल होने की ठान चुका था। हमें सावधानी से हल जोतना और सावधानी से प्रार्थना करनी चाहिए। काम जितना अच्छा हो उतना ही अधिक ध्यान का पात्र है। दुकान में चिन्तित रहना और प्रार्थना-कोठरी में विचारशून्य—यह निन्दा से कुछ ही कम है, क्योंकि यह इस बात का संकेत है कि परमेश्वर के लिए तो कुछ भी चल जाएगा, पर संसार को हमारा सर्वोत्तम ही चाहिए।
यदि कोई पूछे कि प्रार्थना में कौन सा क्रम रखा जाए, तो मैं तुम्हें वैसी कोई रूपरेखा देने नहीं जा रहा जैसी बहुतों ने बनाई है, जिसमें आराधना, अंगीकार, बिनती, मध्यस्थता और स्तुति एक के बाद एक क्रम में सजाई गई हों। मुझे यह विश्वास नहीं कि ऐसा कोई क्रम दिव्य अधिकार का है। मैं जिस क्रम की चर्चा कर रहा हूँ वह कोई मात्र यान्त्रिक क्रम नहीं है, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ किसी भी रूप में समान रूप से ग्राह्य, और सम्भवतः समान रूप से उचित होंगी; क्योंकि पुराने और नए नियम में हर प्रकार की प्रार्थनाओं के नमूने मिलते हैं। मुझे तो प्रार्थना का सच्चा आत्मिक क्रम केवल व्यवस्थाक्रम से बढ़कर किसी वस्तु में जान पड़ता है। हमारे लिए सबसे उपयुक्त यही है कि हम पहले यह अनुभव करें कि अब हम कुछ ऐसा कर रहे हैं जो वास्तविक है; कि हम अपने आप को परमेश्वर की ओर मुख करने जा रहे हैं, जिसे हम देख नहीं सकते, परन्तु जो सचमुच उपस्थित है; जिसे हम न छू सकते हैं, न सुन सकते हैं, और न अपनी इन्द्रियों से समझ सकते हैं, तौभी जो हमारे संग उतनी ही सचमुच है मानो हम अपने ही समान हाड़-माँस के किसी मित्र से बातें कर रहे हों। परमेश्वर की उपस्थिति की वास्तविकता को अनुभव करके, हमारा मन दिव्य अनुग्रह से एक दीन दशा में ले जाया जाएगा; हम अब्राहम के समान अनुभव करेंगे, जब उसने कहा, “मैं जो मिट्टी और राख मात्र हूँ, तौभी मैंने परमेश्वर से बातें करने का साहस किया है।” परिणामस्वरूप हम अपनी प्रार्थना को उन लड़कों के समान नहीं उगल देंगे जो अपने पाठ रटकर दोहराते हैं, मानो कोई घिसी-पिटी बात हो; और इससे भी बढ़कर हम ऐसे नहीं बोलेंगे मानो हम रब्बी हों जो अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे हों, वा जैसा मैंने कुछ लोगों को करते सुना है, किसी बटमार की रुखाई से जो किसी को राह में रोककर उसकी थैली माँगता है; वरन् हम दीन तौभी निर्भीक बिनती करनेवाले होंगे, जो उद्धारकर्ता के लहू के द्वारा दीनता से दया की गिड़गिड़ाहट करते हैं। हममें दास का संकोच नहीं वरन् बालक का प्रेममय आदर होगा, तौभी कोई ढीठ, अशिष्ट बालक नहीं, वरन् एक सिखाने योग्य आज्ञाकारी बालक, जो अपने पिता का आदर करता है, और इसलिए उत्कटता से माँगता है, परन्तु अपने पिता की इच्छा के प्रति नम्र समर्पण के साथ। जब मैं अनुभव करता हूँ कि मैं परमेश्वर की उपस्थिति में हूँ, और उस उपस्थिति में अपना उचित स्थान ग्रहण करता हूँ, तो अगली बात जो मैं मानना चाहूँगा वह यह होगी कि जो मैं ढूँढ़ रहा हूँ उस पर मेरा कोई अधिकार नहीं, और मैं उसे अनुग्रह के दान के रूप में ही पाने की आशा कर सकता हूँ, और मुझे स्मरण रखना होगा कि परमेश्वर उस मार्ग को सीमित करता है जिसके द्वारा वह मुझे दया देगा—वह उसे अपने प्रिय पुत्र के द्वारा मुझे देगा। तब मैं अपने आप को उस महान् छुड़ानेवाले के संरक्षण में रख दूँ। मैं अनुभव करूँ कि अब बोलनेवाला मैं नहीं वरन् मसीह है जो मेरे संग बोलता है, और जब मैं बिनती करता हूँ, तो मैं उसके घावों की, उसके जीवन की, उसकी मृत्यु की, उसके लहू की, स्वयं उसी की दुहाई देता हूँ। सचमुच क्रम में आ जाना यही है।
अगली बात यह विचारना है कि मैं क्या माँगूँ? प्रार्थना में बिनती की बड़ी स्पष्टता का लक्ष्य रखना सबसे उचित है। कुछ सार्वजनिक प्रार्थनाओं के विषय में शिकायत का बहुत कारण है, कि जो उन्हें चढ़ाते हैं वे परमेश्वर से सचमुच कुछ नहीं माँगते। मुझे मानना पड़ता है कि मुझे डर है कि मैंने स्वयं भी ऐसी ही प्रार्थना की है, और निश्चय ही इस प्रकार की अनेक प्रार्थनाएँ सुनी हैं, जिनमें मुझे यह अनुभव नहीं हुआ कि परमेश्वर से कुछ माँगा जा रहा है—बहुत सी उत्तम सैद्धान्तिक और अनुभवजन्य बातें कही गईं, परन्तु सच्ची बिनती थोड़ी ही, और वह थोड़ी भी एक धुँधली सी दशा में, अस्तव्यस्त और अनगढ़। पर मुझे जान पड़ता है कि प्रार्थना स्पष्ट होनी चाहिए, किसी वस्तु को निश्चित और स्पष्ट रीति से माँगना, इसलिए कि मन ने उस वस्तु की अपनी निश्चित आवश्यकता को समझ लिया है, और इसीलिए उसके लिए बिनती करनी ही पड़ती है। प्रार्थना में घुमा-फिराकर बात करना नहीं वरन् सीधे मुद्दे पर आना भला है। मुझे अब्राहम की वह प्रार्थना अच्छी लगती है, “भला होता कि इश्माएल ही तेरे सम्मुख जीवित रहता!” यहाँ नाम है, और वह व्यक्ति जिसके लिए प्रार्थना की जा रही है, और वांछित आशीष, सब थोड़े से शब्दों में रख दिए गए,—“इश्माएल ही तेरे सम्मुख जीवित रहता!” बहुत से लोग इस प्रकार का घुमावदार वाक्य काम में लाते, “भला होता कि हमारी प्रिय सन्तान उस अनुग्रह की दृष्टि से देखी जाती जो तू उन पर रखता है जो,” इत्यादि। यदि तुम्हारा अभिप्राय “इश्माएल” से है तो “इश्माएल” ही कहो; उसे साफ शब्दों में प्रभु के सम्मुख रखो। कुछ लोग तो प्रचारक के लिए भी ऐसे चक्करदार वर्णनों का प्रयोग किए बिना प्रार्थना नहीं कर सकते कि तुम समझोगे कि यह तो गाँव का चौकीदार है, वा कोई ऐसा जिसका नाम विशेष रूप से लेना उचित न हो। स्पष्ट क्यों न हों, और जो कहते हैं वही क्यों न मानें और जो मानते हैं वही क्यों न कहें? अपने मुकद्दमे को क्रम से रखने से हम मन की अधिक स्पष्टता तक पहुँचेंगे। हे मेरे प्रिय भाइयो, प्रार्थना-कोठरी में हर कल्पनीय भली वस्तु के लिए माँगना आवश्यक नहीं है; उन हर आवश्यकता की सूची दोहराना आवश्यक नहीं जो तुम्हें हो सकती है, रही हो, हो सकती हो, वा होगी। जो तुम्हें अब चाहिए वही माँगो, और नियम के तौर पर, वर्तमान आवश्यकता तक ही सीमित रहो; अपनी दिन भर की रोटी माँगो—जो तुम्हें अभी चाहिए—वही माँगो। उसे साफ-साफ माँगो, परमेश्वर के सम्मुख के समान, जो तुम्हारे सुन्दर वाक्यों की परवाह नहीं करता, और जिसके सामने तुम्हारी वाक्पटुता और वक्तृता तुच्छता और व्यर्थता से भी कम है। तू प्रभु के सम्मुख है; तेरे शब्द थोड़े हों, परन्तु तेरा हृदय उत्कट हो।
जब तुमने यीशु मसीह के द्वारा वह माँग लिया जो तुम्हें चाहिए, तब भी तुमने क्रम से रखना पूरा नहीं किया। जिस आशीष की तुम अभिलाषा करते हो उसके चारों ओर एक दृष्टि दौड़ानी चाहिए, यह देखने को कि क्या वह सचमुच माँगने योग्य उचित वस्तु है; क्योंकि कुछ प्रार्थनाएँ कभी न चढ़ाई जातीं यदि मनुष्य केवल सोच लेते। थोड़ा सा मनन हमें दिखा देता कि जिन कुछ वस्तुओं की हम अभिलाषा करते हैं उन्हें छोड़ देना ही भला था। इसके अतिरिक्त, हमारी अभिलाषा के मूल में कोई ऐसा हेतु हो सकता है जो मसीह के समान नहीं, एक स्वार्थी हेतु, जो परमेश्वर की महिमा को भूलकर केवल अपने ही आराम और सुख का प्रबन्ध करता है। अब यद्यपि हम उन वस्तुओं के लिए माँग सकते हैं जो हमारे लाभ की हैं, तौभी हमें अपने लाभ को कभी किसी रीति से परमेश्वर की महिमा में बाधक न बनने देना चाहिए। ग्राह्य प्रार्थना में दिव्य इच्छा के प्रति समर्पण का पवित्र नमक अवश्य मिला होना चाहिए। मुझे लूथर का यह कथन अच्छा लगता है, “हे प्रभु, इस बार मैं तुझसे अपनी इच्छा अवश्य पूरी कराऊँगा।” “क्या!” तुम कहोगे, “ऐसा वाक्य तुम्हें भला लगता है?” हाँ लगता है, अगले अंश के कारण, जो यह था, “मैं अपनी इच्छा पूरी कराऊँगा, क्योंकि मैं जानता हूँ कि मेरी इच्छा ही तेरी इच्छा है।” यह भली बात कही, लूथर; परन्तु अन्तिम शब्दों के बिना यह दुष्ट धृष्टता होती। जब हमें निश्चय हो कि जो हम माँगते हैं वह परमेश्वर की महिमा के लिए है, तब, यदि हममें प्रार्थना में सामर्थ्य हो, तो हम कह सकते हैं, “जब तक तू मुझे आशीष न दे तब तक मैं तुझे जाने न दूँगा”; हम परमेश्वर से घनिष्ठ व्यवहार में आ सकते हैं, और याकूब के उस दूत के साथ के समान हम कुश्ती तक लड़ सकते हैं और आशीर्वाद के बिना विदा किए जाने के बदले उस दूत को पछाड़ने का यत्न कर सकते हैं। परन्तु ऐसी शर्तों तक आने से पहले हमें भली-भाँति स्पष्ट होना चाहिए कि जो हम ढूँढ़ रहे हैं वह सचमुच स्वामी के आदर के लिए है।
इन तीनों बातों को एक साथ रखो—वह गहरी आत्मिकता जो प्रार्थना को अदृश्य परमेश्वर के साथ वास्तविक बातचीत मानती है—वह अधिक स्पष्टता जो प्रार्थना की वास्तविकता है, वह माँगना जिसे हम जानते हैं कि हमें चाहिए—और इनके साथ बहुत उत्कटता, इस बात का विश्वास करते हुए कि वह वस्तु आवश्यक है, और इसलिए यह ठान लेते हुए कि यदि वह प्रार्थना से मिल सकती है तो उसे पाकर ही रहेंगे, और इन सब से बढ़कर पूर्ण समर्पण, इसे फिर भी स्वामी की इच्छा पर छोड़ते हुए;—इन सबको मिला दो, और तुम्हें एक स्पष्ट बोध हो जाएगा कि प्रभु के सम्मुख अपना मुकद्दमा क्रम से रखना क्या है।
फिर भी प्रार्थना अपने आप में एक ऐसी कला है जिसे केवल पवित्र आत्मा ही हमें सिखा सकता है। वही सारी प्रार्थना का दाता है। प्रार्थना के लिए प्रार्थना करो—तब तक प्रार्थना करो जब तक तुम प्रार्थना कर न सको; प्रार्थना करने में सहायता पाने के लिए प्रार्थना करो, और प्रार्थना करना इसलिए मत छोड़ो कि तुम प्रार्थना नहीं कर सकते, क्योंकि जब तू सोचता है कि तू प्रार्थना नहीं कर सकता तभी तू सबसे अधिक प्रार्थना कर रहा होता है; और कभी-कभी जब तेरी बिनतियों में तुझे किसी प्रकार की सान्त्वना नहीं मिलती, तभी तेरा हृदय, जो पूरी तरह टूटा और गिरा हुआ है, सचमुच कुश्ती लड़ रहा होता है और परमप्रधान के साथ सचमुच जय पा रहा होता है।
II. प्रार्थना का दूसरा भाग है मुँह को तर्कों से भरना—मुँह को शब्दों वा अच्छे मुहावरों वा सुन्दर अभिव्यक्तियों से भरना नहीं, वरन् मुँह को तर्कों से भरना; तर्क ही वे थपकियाँ हैं जिनसे फाटक खुलता है।
तर्कों का उपयोग किया ही क्यों जाए? यह पहली जिज्ञासा है; और उत्तर यह है, निश्चय ही इसलिए नहीं कि परमेश्वर देने में धीमा है, न इसलिए कि हम दिव्य अभिप्राय को बदल सकते हैं, न इसलिए कि परमेश्वर को अपने विषय की वा माँगी गई दया से सम्बन्धित किसी बात की जानकारी देने की आवश्यकता है: जो तर्क काम में लाए जाते हैं वे हमारे ही लाभ के लिए हैं, उसके लिए नहीं। वह चाहता है कि हम उससे बिनती करें, और अपने प्रबल कारण प्रस्तुत करें, जैसा यशायाह कहता है, क्योंकि इससे प्रकट होगा कि हम उस दया का मोल अनुभव करते हैं। जब कोई मनुष्य किसी वस्तु के लिए तर्क ढूँढ़ता है तो इसलिए कि जिसे वह ढूँढ़ रहा है उसे वह महत्त्व देता है। फिर, तर्कों का हमारा उपयोग हमें वह आधार सिखाता है जिस पर हम आशीष पाते हैं। यदि कोई मनुष्य अपनी योग्यता के तर्क के साथ आए, तो वह कभी सफल न होगा; सफल तर्क सदा अनुग्रह पर आधारित होता है, और इसी से वह आत्मा जो यों बिनती करती है इस बात को गहराई से समझ लेती है कि पापी प्रभु से जो कुछ पाता है वह अनुग्रह से, और केवल अनुग्रह ही से पाता है। इसके अतिरिक्त, तर्कों का उपयोग इसलिए है कि हमारी उत्कटता जगाई जाए। जो मनुष्य परमेश्वर के साथ एक तर्क का प्रयोग करता है उसे अगले के प्रयोग में और अधिक बल मिलेगा, और वह अगले को और भी अधिक सामर्थ्य से काम में लाएगा, और उससे अगले को और भी अधिक बल से। हमारी प्रार्थना-सभाओं में जो सबसे उत्तम प्रार्थनाएँ मैंने कभी सुनी हैं वे वे रही हैं जो तर्कों से सबसे अधिक भरी थीं। कभी-कभी जब मैंने उन भाइयों को सुना जो इस दया को सचमुच आवश्यक अनुभव करते हुए परमेश्वर के सम्मुख आए, और इसे पाकर ही रहने को ठाने हुए थे, तो मेरी आत्मा एकदम पिघल सी गई, क्योंकि उन्होंने पहले एक कारण से इसे देने की बिनती की, फिर दूसरे से, फिर तीसरे से, और फिर चौथे और पाँचवें से, यहाँ तक कि उन्होंने सारी मण्डली की उत्कटता जगा दी। हे मेरे भाइयो, जहाँ तक परमेश्वर का सम्बन्ध है, प्रार्थना की कोई आवश्यकता ही नहीं, परन्तु हमारे अपने कारण इसकी कितनी बड़ी आवश्यकता है! यदि हम प्रार्थना करने को विवश न किए जाते, तो मुझे सन्देह है कि हम मसीही होकर जी भी पाते वा नहीं। यदि परमेश्वर की दया हमें बिना माँगे मिल जाती, तो वह आधी भी उतनी लाभदायक न होती जितनी अब है, जब उसे ढूँढ़ना पड़ता है; क्योंकि अब हमें दुगुनी आशीष मिलती है, एक आशीष पाने में, और एक आशीष ढूँढ़ने में। प्रार्थना का कार्य ही अपने आप में एक आशीष है। प्रार्थना करना मानो अपने आप को एक ठण्डी कलकल बहती धारा में नहलाना है, और यों पृथ्वी की गर्मी के सूर्य के ताप से बच निकलना है। प्रार्थना करना मानो उकाब के पंखों पर बादलों के ऊपर चढ़ जाना है और उस निर्मल स्वर्ग में पहुँच जाना है जहाँ परमेश्वर वास करता है। प्रार्थना करना मानो परमेश्वर के खजाने में प्रवेश करना है और एक अक्षय भण्डार में से अपने आप को धनवान करना है। प्रार्थना करना मानो स्वर्ग को अपनी बाँहों में भर लेना है, ईश्वरत्व को अपनी आत्मा के भीतर आलिंगन में लेना है, और अपनी देह को पवित्र आत्मा का मन्दिर बना हुआ अनुभव करना है। उत्तर से अलग भी प्रार्थना अपने आप में एक आशीर्वाद है। हे मेरे भाइयो, प्रार्थना करना मानो अपने बोझ उतार फेंकना है, अपने चिथड़े नोच डालना है, अपने रोगों को झाड़ फेंकना है, आत्मिक स्फूर्ति से भर जाना है, मसीही स्वास्थ्य के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच जाना है। परमेश्वर हमें यह दे कि हम प्रार्थना में परमेश्वर से तर्क करने की पवित्र कला में बहुत लगे रहें।
हमारे विषय का सबसे रोचक भाग अभी शेष है; यह उन कुछ तर्कों का एक अति संक्षिप्त सारांश और सूची है जो परमेश्वर के साथ बड़ी सफलता से काम में लाए गए हैं। मैं तुम्हें पूरी सूची नहीं दे सकता; उसके लिए तो वैसा एक ग्रन्थ चाहिए जैसा गुरु जॉन ओवेन रच सकते थे। प्रार्थना में यहोवा से उसके गुणों की दुहाई देना भला है। अब्राहम ने ऐसा ही किया जब उसने परमेश्वर के न्याय को पकड़ा। सदोम के लिए बिनती करनी थी, और अब्राहम आरम्भ करता है, “कदाचित् उस नगर में पचास धर्मी हों: क्या तू सचमुच उसका नाश करेगा और उन पचास धर्मियों के निमित्त जो उसमें हों उस स्थान को न छोड़ेगा? ऐसा करना तुझ से दूर रहे, कि धर्मी को दुष्ट के साथ मार डाले, और धर्मी की दशा दुष्ट के समान हो: ऐसा तुझ से दूर रहे: क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करेगा?” यहाँ से कुश्ती आरम्भ होती है। यह एक सामर्थी तर्क था जिससे उस कुलपिता ने प्रभु के बाएँ हाथ को थाम लिया, और उसे ठीक उसी घड़ी रोक लिया जब गाज गिरने ही को थी। परन्तु उसका एक उत्तर आया। उसे संकेत दिया गया कि इससे नगर न बचेगा, और तुम देखते हो कि वह भला मनुष्य, जब बुरी तरह दबाया गया, तो कैसे इंच-इंच करके पीछे हटा; और अन्त में, जब वह न्याय को और न पकड़ सका, तो उसने परमेश्वर की दया के दाहिने हाथ को थाम लिया, और इसने उसे एक अद्भुत पकड़ दी जब उसने माँगा कि यदि वहाँ केवल दस धर्मी भी हों तो वह नगर बचा लिया जाए। इसी प्रकार तुम और मैं किसी भी समय परमेश्वर के न्याय, दया, विश्वासयोग्यता, बुद्धि, सहनशीलता, और कोमलता को थाम सकते हैं, और हम परमप्रधान के हर गुण को मानो एक विशाल फाटक तोड़नेवाला यन्त्र पाएँगे, जिससे हम स्वर्ग के फाटक खोल सकते हैं।
प्रार्थना के युद्ध में एक और सामर्थी अस्त्र है परमेश्वर की प्रतिज्ञा। जब याकूब यब्बोक नाले के उस पार था, और उसका भाई एसाव हथियारबन्द जनों को लिए चला आ रहा था, तो उसने परमेश्वर से बिनती की कि एसाव को माता और बालकों का नाश करने न दे, और एक प्रधान कारण के रूप में उसने यह दुहाई दी, “तू ही ने तो कहा था, निश्चय मैं तेरा भला ही करूँगा।” ओह उस दुहाई का बल! वह परमेश्वर को उसके वचन पर पकड़े हुए था: “तू ही ने कहा।” गुण तो वेदी का एक शानदार सींग है जिसे पकड़ा जाए; परन्तु प्रतिज्ञा, जिसमें गुण और उससे कुछ अधिक भी है, इससे भी बढ़कर मजबूत पकड़ है। “तू ही ने कहा।” स्मरण करो दाऊद ने इसे कैसे रखा। नातान के प्रतिज्ञा कह चुकने के बाद, दाऊद ने अपनी प्रार्थना के अन्त में कहा, “जैसा तू ने कहा है वैसा ही कर।” यह हर ईमानदार मनुष्य के साथ एक उचित तर्क है, और क्या उस ने कहा है, और क्या वह उसे न करेगा? “परमेश्वर सच्चा ठहरे, और हर एक मनुष्य झूठा।” क्या वह सच्चा न ठहरेगा? क्या वह अपना वचन न निभाएगा? क्या उसके होंठों से निकला हर वचन स्थिर होकर पूरा न होगा? सुलैमान ने भी मन्दिर के उद्घाटन पर यही सामर्थी दुहाई काम में लाई। वह परमेश्वर से बिनती करता है कि जो वचन उसने उसके पिता दाऊद से कहा था उसे स्मरण रखे, और उस स्थान को आशीष दे। जब कोई मनुष्य कोई हुण्डी देता है तो उसका मान दाँव पर लग जाता है। वह अपने हाथ से हस्ताक्षर करता है, और समय आने पर उसे चुकाना ही पड़ता है, नहीं तो उसका साख जाता रहता है। ऐसा कभी न कहा जाएगा कि परमेश्वर अपनी हुण्डियों का अनादर करता है। परमप्रधान के साख पर कभी दोष नहीं लगा, और न कभी लगेगा। वह क्षण भर का पाबन्द है; वह न कभी अपने समय से पहले होता है, न कभी उससे पीछे। तुम इस पुस्तक को आदि से अन्त तक खोज डालो, और उसे परमेश्वर के लोगों के अनुभव से मिलाकर देखो, और दोनों आदि से अन्त तक ठीक बैठते हैं; और अनेक श्वेतकेशी कुलपिताओं ने अपने बुढ़ापे में यहोशू के समान कहा है, “जितनी भली-भली बातें तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने कही थीं उनमें से एक भी न छूटी: सब की सब पूरी हुईं।” हे मेरे भाई, यदि तेरे पास कोई दिव्य प्रतिज्ञा है, तो तुझे उसमें “यदि” लगाकर दुहाई देने की आवश्यकता नहीं; तू निश्चय के साथ दुहाई दे सकता है। जिस दया के लिए तू अभी माँग रहा है, यदि उसके लिए तेरे पास परमेश्वर का गम्भीरता से बंधा हुआ वचन है, तो उसकी इच्छा के प्रति समर्पण की सावधानी के लिए शायद ही कोई गुंजाइश रहेगी। तू उसकी इच्छा जानता है: वह इच्छा उस प्रतिज्ञा में है; उसकी दुहाई दे। जब तक वह उसे पूरा न करे तब तक उसे चैन न लेने दे। उसने उसे पूरा करने ही की ठानी थी, नहीं तो वह उसे देता ही क्यों। परमेश्वर अपने वचन केवल इसलिए नहीं देता कि हमारा कोलाहल शान्त कर दे, और कुछ समय के लिए हमें आशा में बनाए रखे, इस इरादे से कि अन्त में हमें टाल दे; वरन् जब वह बोलता है, तो इसलिए बोलता है कि उसका अभिप्राय काम करने का है।
काम में लाया जानेवाला तीसरा तर्क वही है जिसे मूसा ने प्रयोग किया, अर्थात् परमेश्वर का महान् नाम। एक अवसर पर उसने इसी आधार पर परमेश्वर से कैसे सामर्थ के साथ तर्क किया! “तू अपने महान् नाम के लिए क्या करेगा? मिस्री कहेंगे, इसलिए कि यहोवा उन्हें उस देश में पहुँचा न सका, उसने उन्हें जंगल में मार डाला।” कुछ ऐसे अवसर होते हैं जब परमेश्वर का नाम उसके लोगों के इतिहास से बहुत निकटता से बँधा होता है। कभी किसी दिव्य प्रतिज्ञा पर भरोसा रखकर एक विश्वासी किसी निश्चित कार्यक्रम को अपनाने को प्रेरित होगा। अब यदि प्रभु अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार भला न ठहरे, तो न केवल वह विश्वासी धोखे में पड़ता है, वरन् देखनेवाला दुष्ट संसार कहेगा, “आहा! आहा! कहाँ है तेरा परमेश्वर?” ब्रिस्टल के हमारे सम्मानित भाई श्रीमान् म्यूलर का उदाहरण लो। इन बहुत वर्षों से वह कहता आया है कि परमेश्वर प्रार्थना सुनता है, और इसी विश्वास में दृढ़ रहकर, वह अनाथों के पालन-पोषण के लिए एक के बाद एक घर बनाता चला गया है। अब मैं भली-भाँति कल्पना कर सकता हूँ कि यदि वह उन एक-दो हजार बालकों के पालन के साधनों की कमी की स्थिति में आ पड़े, तो वह भली-भाँति यह दुहाई काम में ला सकता है, “तू अपने महान् नाम के लिए क्या करेगा?” और तुम, किसी घोर संकट में, जब तुमने भली-भाँति प्रतिज्ञा पा ली हो, कह सकते हो, “हे प्रभु, तू ही ने कहा है, ‘छह विपत्तियों में मैं तेरे संग रहूँगा, और सातवीं में भी मैं तुझे न त्यागूँगा।’ मैंने अपने मित्रों और पड़ोसियों से कहा है कि मैं तुझ पर भरोसा रखता हूँ, और यदि तू अब मुझे न छुड़ाए, तो कहाँ है तेरा नाम? हे परमेश्वर, उठ, और यह काम कर, कहीं ऐसा न हो कि तेरा आदर धूल में मिल जाए।” इसके साथ हम एक और तर्क भी काम में ला सकते हैं, अर्थात् निन्दकों की कही कठोर बातों का। हिजकिय्याह ने भला ही किया, जब उसने रबशाके की चिट्ठी लेकर प्रभु के सम्मुख फैला दी। क्या इससे उसे सहायता मिलेगी? वह तो निन्दा से भरी है, क्या इससे उसे सहायता मिलेगी? “अर्पाद और सपर्वैम के देवता कहाँ हैं? उन नगरों के देवता कहाँ हैं जिन्हें मैंने उलट दिया? हिजकिय्याह तुम्हें यह कहकर धोखा न देने पाए कि यहोवा तुम्हें छुड़ाएगा।” क्या इसका कोई प्रभाव पड़ता है? ओह! हाँ, यह एक धन्य बात थी कि रबशाके ने वह चिट्ठी लिखी, क्योंकि इसने प्रभु को अपने लोगों की सहायता करने के लिए उकसाया। कभी-कभी परमेश्वर की सन्तान आनन्दित हो सकती है जब वह अपने शत्रुओं को पूरी तरह क्रोध में आकर निन्दा करने पर उतरा हुआ देखती है। “अब,” वह कहती है, “उन्होंने स्वयं प्रभु की निन्दा की है; केवल मुझ पर ही नहीं, वरन् स्वयं परमप्रधान पर उन्होंने आक्रमण किया है। अब यह बेचारा तुच्छ हिजकिय्याह अपने सिपाहियों के छोटे से दल के साथ नहीं रहा, वरन् यहोवा, स्वर्गदूतों का राजा है, जो रबशाके के विरुद्ध लड़ने को आया है। अब तू क्या करेगा, हे घमण्डी सन्हेरीब के डींगमार सिपाही? क्या तू पूरी तरह नष्ट न होगा, जब कि स्वयं यहोवा इस युद्ध में उतर आया है? पोप-मत की सारी प्रगति, कल्पनावादी नास्तिकों की सब कही बुरी बातें, इत्यादि, मसीहियों को परमेश्वर के साथ एक तर्क के रूप में काम में लानी चाहिए, कि वह सुसमाचार की सहायता क्यों करे। हे प्रभु, देख वे यीशु के सुसमाचार की कैसी निन्दा करते हैं! अपना दाहिना हाथ अपनी छाती से बाहर निकाल! हे परमेश्वर, वे तुझे ललकारते हैं! मसीह-विरोधी उस स्थान में घुस बैठा है जहाँ तेरा पुत्र कभी आदर पाता था, और उन्हीं मंचों से जहाँ कभी सुसमाचार का प्रचार होता था अब पोप-मत की घोषणा होती है। हे परमेश्वर, उठ, अपनी जलन जगा, तेरी पावन धधक भड़क उठे! तेरा प्राचीन शत्रु फिर प्रबल हो रहा है। देख, बाबुल की वेश्या फिर से अपने लाल रंग के पशु पर सवार होकर विजय में निकल पड़ी है! आ, यहोवा, आ, यहोवा, और एक बार फिर दिखा कि तेरा नंगा भुजबल क्या कर सकता है! अपने महान् नाम के निमित्त परमेश्वर से बिनती करने की यह एक उचित रीति है।
इसी प्रकार हम अपने लोगों के दुखों की भी दुहाई दे सकते हैं। यह बहुधा किया जाता है। यिर्मयाह इस कला का महान् गुरु है। वह कहता है, “उसके रईस हिम से भी निर्मल और दूध से भी उजले थे, वे प्रवाल से भी अधिक लाल और उनकी चमक नीलमणि सी थी: अब उनका रूप कालिख से भी काला हो गया है।” “सिय्योन के अनमोल पुत्र, जो चोखे सोने के तुल्य थे, वे कैसे मिट्टी के घड़ों के समान गिने जाने लगे, जो कुम्हार के हाथ की कारीगरी हैं!” वह घेराबन्दी के समय के उनके सब शोकों और कष्टों की चर्चा करता है। वह प्रभु से बिनती करता है कि अपने दुख उठाते सिय्योन पर दृष्टि करे; और कुछ ही देर में उसकी करुण पुकारें सुनी जाती हैं। पिता के लिए उसके बालक की पुकार से बढ़कर कुछ भी वाक्पटु नहीं; हाँ, एक बात इससे भी अधिक सामर्थी है, और वह है एक कराह,—जब बालक इतना रुग्ण हो कि रोने की दशा से भी आगे निकल जाए, और उस प्रकार की कराह के साथ कराहता रहे जो घोर पीड़ा और अत्यन्त दुर्बलता को प्रकट करती है। उस कराह का सामना कौन कर सकता है? आह! और जब परमेश्वर का इस्राएल इतना दबा दिया जाएगा कि वह मुश्किल से पुकार भी सके परन्तु केवल उसकी कराहें ही सुनाई दें, तब प्रभु के छुटकारे का समय आता है, और वह निश्चय ही यह दिखा देता है कि वह अपने लोगों से प्रेम रखता है। हे प्रिय भाइयो, जब कभी तुम भी उसी दशा में ले आए जाओ, तो तुम अपनी कराहों की दुहाई दे सकते हो, और जब तुम किसी कलीसिया को बहुत दबी हुई देखो, तो तुम उसके शोकों को एक तर्क के रूप में काम में ला सकते हो कि परमेश्वर क्यों लौटकर अपने लोगों के बचे हुओं को बचाए।
हे भाइयो, परमेश्वर से बीते हुए दिनों की दुहाई देना भला है। आह, तुम परमेश्वर के अनुभवी लोगो, तुम यह करना जानते हो। यहाँ दाऊद का इसका नमूना है: “तू ही मेरा सहायक रहा है। मुझे न छोड़, न मुझे त्याग।” वह अपनी जवानी से लेकर परमेश्वर की उस पर की दया की दुहाई देता है। वह अपने जन्म ही से अपने परमेश्वर पर डाल दिए जाने की चर्चा करता है, और तब वह दुहाई देता है, “अब जबकि मैं बूढ़ा हो चला हूँ और मेरे बाल पक गए हैं, हे परमेश्वर, तब भी मुझे न त्याग।” मूसा भी, परमेश्वर से बातें करते हुए कहता है, “तू ही इन लोगों को मिस्र से निकाल लाया।” मानो वह कहना चाहता हो, “अपना काम अधूरा न छोड़; तूने बनाना आरम्भ किया है, उसे पूरा कर। तूने पहला युद्ध लड़ा है; हे प्रभु, अभियान समाप्त कर! तब तक आगे बढ़ता जा जब तक पूरी जय न पा ले।” कितनी बार हम अपनी विपत्ति में यों पुकार उठे हैं, “हे प्रभु, तूने अमुक-अमुक कठोर परीक्षा में मुझे छुड़ाया था, जब जान पड़ता था कि कोई सहायता निकट नहीं; तूने अब तक मुझे कभी नहीं त्यागा। मैंने तेरे नाम से अपना एबेनेजेर खड़ा किया है। यदि तेरा इरादा मुझे छोड़ देने का था तो तूने मुझे ऐसी-ऐसी बातें क्यों दिखाईं? क्या तू अपने दास को इस स्थान तक इसलिए लाया कि उसे लज्जित करे?” हे भाइयो, हमें एक अपरिवर्तनीय परमेश्वर से काम है, जो भविष्य में वही करेगा जो उसने अतीत में किया है, क्योंकि वह अपने अभिप्राय से कभी नहीं मुड़ता, और अपनी योजना में विफल नहीं किया जा सकता; इस प्रकार अतीत उससे आशीषें पाने का एक बहुत सामर्थी साधन बन जाता है।
हम परमेश्वर के साथ अपनी ही अयोग्यता तक को एक तर्क के रूप में काम में ला सकते हैं। “खानेवाले में से खाना, और बलवन्त में से मिठास निकली।” दाऊद एक स्थान में यों दुहाई देता है: “हे प्रभु, मेरे अधर्म को क्षमा कर, क्योंकि वह बड़ा है।” यह तर्क करने की बड़ी विलक्षण रीति है; परन्तु इसका अर्थ यह है, “हे प्रभु, तू छोटे-छोटे काम करने में क्यों लगे? तू एक महान् परमेश्वर है, और यहाँ एक महान् पापी है। मुझमें तेरे अनुग्रह के प्रदर्शन के लिए एक उपयुक्तता है। मेरे पाप की महानता मुझे तेरी दया की महानता के लिए एक मंच बना देती है। तेरे प्रेम की महानता मुझमें देखी जाए।” मूसा के मन में भी यही बात जान पड़ती है जब वह परमेश्वर से बिनती करता है कि अपने पापी लोगों को छोड़ देने में अपना महान् सामर्थ दिखाए। जिस सामर्थ से परमेश्वर अपने आप को रोके रखता है वह सचमुच महान् है। हे भाइयो और बहनो, सिंहासन के पाँयते रेंगकर आ जाना, नीचे झुककर दुबक जाना और यों पुकारना, ऐसी भी एक बात है, “हे परमेश्वर, मुझे न तोड़—मैं एक कुचला हुआ सरकंडा हूँ। ओह! मेरे इस छोटे से जीवन को न रौंद, यह तो अब केवल धुँआती हुई बत्ती के समान है। क्या तू मेरा अहेर करेगा? क्या तू, जैसा दाऊद ने कहा, ‘एक मरे हुए कुत्ते के पीछे, एक पिस्सू के पीछे’ निकलेगा? क्या तू मुझे उस पत्ते के समान खदेड़ेगा जो आँधी में उड़ता है? क्या तू मेरी ऐसी घात में रहेगा, जैसा अय्यूब कहता है, मानो मैं कोई विशाल समुद्र वा कोई बड़ा मगरमच्छ होऊँ? नहीं, वरन् इसलिए कि मैं इतना छोटा हूँ, और इसलिए कि तेरी दया की महानता मुझ जैसे तुच्छ और फिर भी नीच जन में दिखाई जा सकती है, इसी कारण, हे परमेश्वर, मुझ पर दया कर।”
एक बार ऐसा अवसर आया जब स्वयं यहोवा के ईश्वरत्व ने भविष्यद्वक्ता एलिय्याह के लिए एक विजयी दुहाई बना दी। उस भव्य अवसर पर, जब उसने अपने विरोधियों को यह देखने को कहा कि क्या उनका देवता उन्हें आग से उत्तर दे सकता है, तुम शायद ही कल्पना कर सको कि उस दिन उस भविष्यद्वक्ता के मन में कैसी उत्तेजना रही होगी। कैसे कठोर व्यंग्य के साथ उसने कहा, “ऊँचे शब्द से पुकारो: क्योंकि वह तो देवता है; या तो वह बातें कर रहा होगा, या पीछा कर रहा होगा, या यात्रा में होगा, या कदाचित् सो रहा होगा और उसे जगाना पड़ेगा।” और जब वे अपने आप को छुरियों से चीरते और वेदी पर उछलते रहे, तो ओह उस तिरस्कार को सोचो जिससे परमेश्वर के उस जन ने उनके निष्फल श्रम और उनकी उत्कट परन्तु व्यर्थ पुकारों को नीचे देखा होगा! परन्तु यह सोचो कि उसका हृदय कैसा धड़का होगा, यदि उसके विश्वास का बल न होता, जब उसने परमेश्वर की उस वेदी को जो गिरा दी गई थी फिर से बनाया, और लकड़ी क्रम से चुनी, और बैल को मार डाला। उसे पुकारते सुनो, “इस पर जल उंडेलो। तुम मुझ पर आग छिपाने का सन्देह न करने पाओ; बलि पर जल उंडेलो।” जब वे ऐसा कर चुके, तो वह उनसे कहता है, “दूसरी बार करो”; और उन्होंने दूसरी बार किया; और तब वह कहता है, “तीसरी बार करो।” और जब वह सब जल से ढँक गई, भीगकर तर हो गई, तब वह खड़ा होकर परमेश्वर को पुकारता है, “हे परमेश्वर, यह जाना जाए कि केवल तू ही परमेश्वर है।” यहाँ सब कुछ परीक्षा में डाल दिया गया। इस निर्भीक भविष्यद्वक्ता के द्वारा मनुष्यों की आँखों के सामने स्वयं यहोवा का अस्तित्व मानो दाँव पर लगा दिया गया। परन्तु उस भविष्यद्वक्ता की कैसी भली सुनी गई! आग उतर आई और उसने न केवल बलि को, वरन् लकड़ी, और पत्थरों, और उस जल तक को जो खाइयों में था भस्म कर दिया, क्योंकि यहोवा परमेश्वर ने अपने दास की प्रार्थना का उत्तर दिया था। हम भी कभी-कभी वैसा ही कर सकते हैं, और उससे कह सकते हैं, “ओह, तेरे ईश्वरत्व की दुहाई, तेरे अस्तित्व की दुहाई, यदि तू सचमुच परमेश्वर है, तो अब अपने लोगों की सहायता के लिए अपने आप को प्रकट कर!”
अन्त में, महान् मसीही तर्क है मसीह यीशु के दुख, उसकी मृत्यु, उसकी योग्यता, उसकी मध्यस्थता। हे भाइयो, मुझे डर है कि हम यह नहीं समझते कि जब हमें मसीह के निमित्त परमेश्वर से बिनती करने की अनुमति दी जाती है तो हमारे हाथ में क्या है। कुछ दिन पहले मुझे यह विचार मिला: यह मेरे लिए कुछ नया सा था, परन्तु मेरा विश्वास है कि इसे नया नहीं होना चाहिए था। जब हम परमेश्वर से मसीह के नाम की दुहाई देकर अपनी सुनने को कहते हैं, तो हमारा साधारणतया यही अभिप्राय होता है, “हे प्रभु, तेरा प्रिय पुत्र तुझ से इसका पात्र है; जो कुछ उसकी योग्यता है उसके कारण यह मुझ से कर।” परन्तु यदि हम जानते, तो हम नगर में जाकर कह सकते, “श्रीमान्, मेरे दफ्तर में आइए, और मेरा नाम काम में लाइए, और कहिए कि वे आपको अमुक वस्तु दे दें।” मैं भीतर जाकर तुम्हारा नाम काम में लाता, और मैं अपनी माँग एक अधिकार की बात और एक आवश्यकता की बात के रूप में पा लेता। यीशु मसीह हमसे वस्तुतः यही कहता है। “यदि तुम्हें परमेश्वर से कुछ चाहिए, तो जो कुछ पिता का है वह सब मेरा है; जाओ और मेरा नाम काम में लाओ।” मान लो तुम किसी मनुष्य को अपनी हस्ताक्षर की हुई और खाली छोड़ी हुई चेक-बही दे दो, कि वह जैसे चाहे भर ले; तो यह लगभग वही होगा जो यीशु ने इन शब्दों में किया है, “यदि तुम मेरे नाम से कुछ माँगोगे, तो मैं उसे तुम्हें दूँगा।” यदि चेक के नीचे मेरा कोई अच्छा नाम होता, तो मुझे निश्चय होता कि जब मैं उसे लेकर साहूकार के पास जाऊँगा तो वह भुना दिया जाएगा; इसी प्रकार जब तुम्हारे पास मसीह का नाम है, जिसका स्वयं परमेश्वर का न्याय तक ऋणी बन गया है, और जिसकी योग्यताओं का परमप्रधान के साथ दावा है, जब तुम्हारे पास मसीह का नाम है तो भय और कँपकँपी और रुँधे स्वर से बोलने की कोई आवश्यकता नहीं। ओह, डगमगाओ मत और विश्वास को लड़खड़ाने न दो! जब तू मसीह के नाम की दुहाई देता है तो तू उसकी दुहाई देता है जो नरक के फाटकों को हिला देती है, और जिसकी स्वर्ग की सेनाएँ आज्ञा मानती हैं, और स्वयं परमेश्वर उस दिव्य दुहाई की पावन सामर्थ का अनुभव करता है।
हे भाइयो, यदि तुम अपनी प्रार्थनाओं में कभी-कभी मसीह के शोकों और कराहों पर अधिक विचार करो तो अच्छा करोगे। प्रभु के सम्मुख उसके घावों को ले आओ, प्रभु को उसकी पुकारें सुनाओ, गतसमनी से यीशु की कराहों को फिर से पुकरवाओ, और उस बर्फीले कलवरी से उसके लहू को फिर से बुलवाओ। खुलकर बोलो और प्रभु से कहो कि ऐसे शोकों, और पुकारों, और कराहों की दुहाई देते हुए, तू इनकार नहीं सह सकता: ऐसे-ऐसे तर्क तुझे शीघ्रता से आगे बढ़ाएँगे।
III. यदि पवित्र आत्मा हमें सिखाए कि हम अपना मुकद्दमा किस रीति से क्रम से रखें, और अपना मुँह किस रीति से तर्कों से भरें, तो परिणाम यह होगा कि हमारा मुँह स्तुतियों से भर जाएगा। जिस मनुष्य का मुँह प्रार्थना में तर्कों से भरा है उसका मुँह प्रार्थना के उत्तर में शीघ्र ही आशीषों से भर जाएगा। हे प्रिय मित्र, आज तेरा मुँह भरा हुआ है, क्या ऐसा है? किससे? कुड़कुड़ाहट से भरा? प्रभु से बिनती कर कि तेरा मुँह उस काले माल से धो-पोंछ डाले, क्योंकि वह तेरे किसी काम का न होगा, और किसी दिन तेरी अँतड़ियों में कड़वा हो उठेगा। ओह, अपना मुँह प्रार्थना से भरा रख, उससे भरा हुआ, तर्कों से इतना भरा कि किसी और वस्तु के लिए स्थान ही न रहे। तब इस धन्य भरे मुँह के साथ आओ, और तुम शीघ्र ही जो कुछ तुमने परमेश्वर से माँगा है उसे लेकर लौटोगे। बस तू उसी में मगन रह, और वह तेरे मन की अभिलाषा तुझे पूरी करेगा।
कहा जाता है—मुझे नहीं मालूम कि कितना सच—कि इस वचन का स्पष्टीकरण, “अपना मुँह खूब खोल और मैं उसे भर दूँगा,” एक बड़ी विलक्षण पूर्वी प्रथा में मिल सकता है। कहते हैं कि बहुत वर्ष नहीं हुए—मुझे यह घटना समाचार में आई हुई याद है—कि फारस के राजा ने अपने प्रधान अमीर को, जिसने कुछ ऐसा किया था जिससे वह बहुत प्रसन्न हुआ था, आज्ञा दी कि अपना मुँह खोले, और जब उसने ऐसा किया तो राजा उसके मुँह में मोती, हीरे, माणिक, और पन्ने रखने लगा, यहाँ तक कि उसने उसे जितना भर सकता था उतना भर दिया, और तब उससे कहा कि जा। कहते हैं कि पूर्वी दरबारों में बड़े कृपापात्रों के प्रति कभी-कभी ऐसा किया जाता था। अब निश्चय ही चाहे यह उस वचन का स्पष्टीकरण हो वा न हो, यह उसका एक दृष्टान्त तो है। परमेश्वर कहता है, “अपना मुँह तर्कों से खोल,” और तब वह उसे अनमोल दयाओं से, अकथनीय मूल्यवान रत्नों से भर देगा। क्या कोई मनुष्य अपना मुँह खूब न खोलेगा जब उसे ऐसी रीति से भरा जाना हो? निश्चय ही तुममें से सबसे भोला-भाला जन भी इतना बुद्धिमान तो होगा। ओह! तो जब हमें परमेश्वर से बिनती करनी हो तो आओ हम अपना मुँह खूब खोलें। हमारी आवश्यकताएँ बड़ी हैं, हमारी माँगें भी बड़ी हों, और आपूर्ति भी बड़ी होगी। तुम उसमें सँकरे नहीं किए गए; तुम अपनी ही अँतड़ियों में सँकरे किए गए हो। प्रभु तुम्हें प्रार्थना में बड़े मुँह दे, बड़ी सामर्थ, भाषा के प्रयोग में नहीं, वरन् तर्कों को काम में लाने में।
जो मैं मसीही से कह रहा हूँ वह बहुत हद तक उस अपरिवर्तित मनुष्य पर भी लागू होता है। परमेश्वर तुझे यह दे कि तू इसका बल देख सके, और दीनता से प्रार्थना करता हुआ प्रभु यीशु मसीह की ओर उड़ चले और उसमें अनन्त जीवन पाए।
प्रचार से पहले पढ़ा गया पवित्रशास्त्र का भाग—गिनती 14:1-21।
सार्वजनिक डोमेन। मूल पाठ का स्रोत: मूल संस्करण.
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