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धन्य विपत्ति

चित्र: Hudson Taylor Hudson Taylor

पाठ

भजन संहिता 23:6

संक्षेप में

यदि भलाई और करुणा विश्वासी के जीवन भर उसके साथ बनी रहती हैं, तो विपत्ति के दिन भी आशीष के दिन हैं। टेलर अय्यूब की विपत्तियों को शैतान का नहीं, वरन् स्वयं परमेश्वर का काम मानते हैं—शत्रु सेवक है, स्वामी कभी नहीं—और पाठक को उभारते हैं कि वह हर दुःख को पिता के हाथ से ग्रहण करे, चाहे उसे कोई भी लाया हो।

पहले भजन पर अपने मनन में हमने "धन्य समृद्धि" पर विचार किया था। परन्तु परमेश्वर के सब व्यवहार आशीष से भरे हुए हैं: वह भला है, और भलाई ही करता है, केवल भलाई, और निरन्तर करता है। जिस विश्वासी ने प्रभु को अपना चरवाहा माना है, वह तेईसवें भजन के शब्दों में निश्चय ही कह सकता है, "निश्चय भलाई और करुणा जीवन भर मेरे साथ-साथ बनी रहेंगी; और मैं यहोवा के धाम में सर्वदा वास करूँगा;" अथवा, रिवाइज्ड वर्शन के हाशिये का पाठ लेकर, "केवल भलाई और करुणा मेरे साथ-साथ बनी रहेंगी।" इसलिए हम निश्चय जान सकते हैं कि विपत्ति के दिन भी समृद्धि के ही दिन हैं, और आशीष से भरे हुए हैं।

विश्वासी को सन्तुष्ट होने के लिये तब तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं कि वह परमेश्वर के अपने साथ किए गए कष्टदायक व्यवहारों का कारण देख ले; वह तो यह जानता है कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; कि परमेश्वर के सब व्यवहार एक प्रेमी पिता के व्यवहार हैं, जो केवल उसी बात को होने देता है जो कुछ समय के लिये दुखदायी होती है, ताकि ऐसे परिणाम प्राप्त हों जो किसी और कम पीड़ादायक रीति से प्राप्त नहीं हो सकते। परमेश्वर की बुद्धिमान और भरोसेमन्द सन्तान क्लेश में आनन्दित होती है, "यही जानकर कि क्लेश से धीरज," और धीरज से अनुभव, और अनुभव से आशा उत्पन्न होती है—ऐसी आशा जिससे "लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है उसके द्वारा परमेश्वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है।"

अय्यूब का वृत्तान्त शिक्षा से भरा हुआ है, और उसे हमें गहरी रुचि और बड़े लाभ की अनेक शिक्षाएँ देनी चाहिए। अनदेखे संसार पर से परदा हटा दिया जाता है, और हम अपने महान् विरोधी के सामर्थ्य के विषय में बहुत कुछ सीखते हैं; परन्तु साथ ही हमारे पिता परमेश्वर की अनुमति के बिना उसकी असमर्थता के विषय में भी।

पहले अध्याय के आठवें पद में परमेश्वर स्वयं अपने दास के विषय में यह साक्षी देता है: "उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है; और दूसरे अध्याय के तीसरे पद में वह वही साक्षी दोहराता है, और यह जोड़ता है: "यद्यपि तूने मुझे उसको बिना कारण सत्यानाश करने को उभारा, तो भी वह अब तक अपनी खराई पर बना है।" जिस जीवन को जीने के योग्य परमेश्वर के अनुग्रह ने अय्यूब को बनाया, उसकी इससे बलवती साक्षी की कल्पना कठिन ही है। जो ताड़ना उस पर आ पड़ी, उसके विषय में कहा गया है कि वह उसके जीवन और आत्मा के सम्बन्ध में बिना कारण थी। हम परमेश्वर का धन्यवाद करें कि वही अनुग्रह, जिसने इतने समय पूर्व अय्यूब को ऐसा जीवन जीने के योग्य बनाया जो परमेश्वर को भाता और उसकी बारम्बार प्रशंसा पाता रहा, अब भी अपरिवर्तित है; और यह कि उसी के द्वारा हम भी ऐसा जीवन जी सकते हैं जो उसको भाएगा जिससे हमारा व्यवहार है।

शैतान प्रायः शोक और परीक्षा के समयों में विश्वासी को यह सोचने की ओर ले जाकर सताता है कि परमेश्वर उससे अप्रसन्न है—कि यह किसी अज्ञात अपराध का दण्ड है, और इस प्रकार वे बहुत से सुख और सान्त्वनाएँ, जिनका अन्यथा आनन्द लिया जा सकता, धुँधली पड़ जाती हैं। क्या हम परमेश्वर के वचन से यह नहीं देखते कि वह एक हर्षित पिता के समान है, जो एक बलवान् स्वस्थ पुत्र को किसी ऐसे व्यायाम-कौशल को करने के लिये उत्साहित करने में प्रसन्न होता है जिसमें कठोर परिश्रम और सावधान प्रशिक्षण लगेगा, अथवा उसे किसी कठिन साहित्यिक परीक्षा की तैयारी के लिये दीर्घ और श्रमसाध्य अध्ययन द्वारा प्रेरित करने में, यह जानते हुए कि वह अपनी उपलब्धियों से सम्मान और स्थायी लाभ प्राप्त करेगा? इसी प्रकार, हमारा स्वर्गीय पिता एक भरोसेमन्द सन्तान को किसी परीक्षा का भार सौंपने में प्रसन्न होता है जिसमें वह परमेश्वर की बड़ी महिमा कर सके, और जिसके द्वारा उसे हृदय का स्थायी विस्तार, और अपने तथा औरों के लिये आशीष प्राप्त हो।

अब्राहम का उदाहरण लीजिए: परमेश्वर ने उस पर इतना पूर्ण भरोसा किया कि वह अपने दास से यह कहने में नहीं झिझका कि वह अपने परमप्रिय पुत्र को बलिदान चढ़ा दे। और यहाँ, अय्यूब के विषय में, यह शैतान नहीं था जिसने अय्यूब के विषय में परमेश्वर को ललकारा, वरन् परमेश्वर ही था जिसने उस महान् शत्रु, भाइयों पर दोष लगानेवाले को ललकारा कि वह उसके चरित्र में कोई दोष, अथवा उसके जीवन में कोई त्रुटि ढूँढ़ निकाले। दोनों ही अवसरों पर अनुग्रह की जय हुई, और दोनों ही अवसरों पर धीरज और सत्यनिष्ठा को भरपूर प्रतिफल मिला; परन्तु इस विषय में आगे कहेंगे।

शैतान का उत्तर ध्यान देने योग्य है। उसे यह पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती, "कौन-सा अय्यूब?" अथवा, "वह कहाँ रहता है?" उसने परमेश्वर के दास पर ध्यान दिया था, और स्पष्ट है कि वह उसके विषय में सब कुछ जानता था। ऐसा कैसे हुआ कि वह परमेश्वर के इस विश्वासयोग्य जन से इतना भली भाँति परिचित था? सम्भवतः यह इस प्रकार हुआ हो: दुष्टता की वे अधीनस्थ आत्माएँ, जो स्पष्टतः शैतान के वश में हैं, उस कुलपिता के साथ परीक्षा के साधारण उपायों को व्यर्थ ही आज़मा चुकी थीं। सम्भवतः अपनी असफलता का समाचार दुष्टता की किन्हीं प्रधानताओं और शक्तियों को देने पर, इन्होंने भी अपनी शैतानी कलाएँ आज़माईं, परन्तु अय्यूब को उसकी खराई से डिगाने में सफल न हो सकीं। सबसे अन्त में, स्वयं उस महान् शत्रु ने भी अपने सब प्रयत्नों को परमेश्वर के प्रिय दास को सताने और भटकाने में निष्फल पाया। उसने उसके, और उसके सेवकों के, और उसके घर के, और चारों ओर से उसके सब कुछ के चतुर्दिक् एक बाड़ा पाया—ऐसा सुदृढ़ मोर्चा कि वह उसे तोड़ न सका, इतना ऊँचा कि गर्जनेवाले सिंह की नाईं इधर-उधर घूमते हुए भी वह उसे फाँद न सका, और न परमेश्वर द्वारा रक्षित उस घेरे के भीतर कोई विपत्ति ला सका।

ऐसे सुरक्षित होकर रहना कितना धन्य रहा होगा! अय्यूब के हाथों का काम सफल हुआ—देश में उसकी सम्पत्ति बढ़ती गई, और वह पूर्व के सब लोगों में जितना उत्तम था उतना ही सबसे बड़ा भी हो गया, क्योंकि उन दिनों परमेश्वर बहुधा, यद्यपि केवल इसी रीति से नहीं, सांसारिक आशीषों के दान द्वारा अपनी प्रसन्नता प्रकट करता था।

क्या आजकल कोई ऐसी ही आत्मिक आशीष नहीं है जिसका आनन्द लिया जा सके? परमेश्वर का धन्यवाद हो, है। हर एक विश्वासी उतनी ही सुरक्षा में रखा जा सकता और उतनी ही भरपूरी से आशीषित हो सकता है, यद्यपि सम्भवतः उसी रीति से नहीं, जैसे अय्यूब—शत्रु के सामर्थ्य से छुड़ाया जा सकता, और परिपूर्ण शान्ति के एक सुरक्षित घेरे में बचाया रखा जा सकता है। शर्तें सरल हैं, और प्रेरित पौलुस ने फिलिप्पियों के चौथे अध्याय के पद 4-7 में हमें दी हैं, "प्रभु में सदा आनन्दित रहो ... तुम्हारी कोमलता [तुम्हारी नम्रता, अथवा तुम्हारा झुकनेवाला स्वभाव] सब मनुष्यों पर प्रगट हो। प्रभु निकट है।" तुम्हारी बुराई का सामना करने और "अपने ही अधिकारों को बनाए रखने;" की शक्ति नहीं, वरन् तुम्हारा झुकने का स्वभाव, यह विश्वास करते हुए कि प्रभु तुम्हारे लिये वह सब बनाए रखेगा जो सचमुच तुम्हारे भले के लिये है; और यह कि किसी भी दशा में, वह निकट है, और शीघ्र ही अपनी आज्ञा के प्रति सत्यनिष्ठा को भरपूर प्रतिफल देगा। और अन्त में, "किसी भी बात की चिन्ता मत करो; परन्तु हर एक बात में तुम्हारे निवेदन, प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख उपस्थित किए जाएँ। तब परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से बिलकुल परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी।"

ऐसा क्यों होता है कि विश्वासी प्रायः इस प्रतिज्ञात आशीष का आनन्द नहीं ले पाते? क्या इसका कारण यह नहीं कि हम किसी भी बात की चिन्ता न करने में, और हर एक बात को प्रार्थना और विनती के द्वारा धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख लाने में चूक जाते हैं? हम दस में से नौ कठिनाइयाँ उसके पास ले आते हैं, और दसवीं को स्वयं सँभालने का यत्न करते हैं, और वह एक छोटी-सी कठिनाई, उस छोटे-से छेद के समान जो जहाज़ को सुखा देता है, समस्त के लिये घातक होती है; नगर की शहरपनाह में एक छोटी-सी दरार के समान, वह शत्रु के सामर्थ्य को भीतर आने का मार्ग देती है। परन्तु यदि हम शर्तों को पूरा करें, तो वह निश्चय ही विश्वासयोग्य है, और अपने हृदय और मन—अपने स्नेह और विचारों—को हमें स्वयं बनाए रखना नहीं पड़ेगा, वरन् हम उन्हें अपने लिये सुरक्षित रखा हुआ पाएँगे। वह शान्ति, जिसे हम न तो उत्पन्न कर सकते और न बनाए रख सकते, स्वयं ही, एक पहरे की चौकी के समान, हमें बचाए और सुरक्षित रखेगी, और चिन्ताएँ तथा फ़िक्रें भीतर घुसने का व्यर्थ यत्न करती रहेंगी।

अय्यूब के वृत्तान्त पर लौटते हैं: वह महान् दोष लगानेवाला, उसके चरित्र अथवा जीवन में कोई दोष न पाकर, यह लांछन लगाता है कि यह सब स्वार्थ का परिणाम है। "क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?" सचमुच, वह ऐसा नहीं मानता था, जैसा शैतान भली भाँति जानता था! और न किसी ने, न पहले न बाद में, कभी बिना लाभ के परमेश्वर का भय माना है। ऐसी कोई सेवा नहीं जो हमारे स्वर्गीय स्वामी की सेवा के समान इतना अच्छा प्रतिफल देती हो; ऐसी कोई नहीं जिसका इतने राजसी ढंग से प्रतिफल मिलता हो। शैतान एक सच्ची बात कह रहा था, परन्तु उसके साथ जो लांछन उसने जोड़ा, कि अय्यूब इसी प्रतिफल के निमित्त परमेश्वर की सेवा करता था, वह सच नहीं था।

परमेश्वर के दूतों के, और साथ ही दुष्ट आत्माओं के सामने अय्यूब के अपने चरित्र को निर्दोष सिद्ध करने के लिये, शैतान को अनुमति दी जाती है कि वह अय्यूब की परीक्षा ले, और वे सब सम्पत्तियाँ छीन ले जिनके ही निमित्त शैतान ने कल्पना की, अथवा कल्पना करने का बहाना किया, कि अय्यूब परमेश्वर की सेवा कर रहा था। "जो कुछ उसका है," परमेश्वर ने कहा, "वह सब तेरे हाथ में है; केवल उसके शरीर पर हाथ न लगाना।"

और शीघ्र ही शैतान ने उस भक्त पुरुष पर एक के बाद एक विपत्ति लाकर अपने चरित्र की दुष्टता प्रकट की। अपने दूतों के द्वारा उसने शेबियों को उकसाया, और उन्होंने उन बैलों और गदहियों पर धावा बोला जो उनके पास चर रहे थे, और सेवकों को तलवार की धार से मार डाला, और केवल एक ही को बचकर भागने दिया—और यह किसी दया या सहानुभूति के कारण नहीं, वरन् इसलिये कि वह अपने अभागे स्वामी के पास यह समाचार पहुँचाए, और उसकी सम्पत्ति और सेवकों के नाश की सूचना दे। ऐसा प्रतीत होता है कि उस दुष्ट को यह सामर्थ्य भी था कि वह आकाश से बिजली गिरा सके—जिससे भेड़ें, और उनकी चौकसी करनेवाले सेवक नष्ट हो गए। यहाँ भी, केवल एक ही सेवक बचा रहा, कि वह अपने समाचार से परमेश्वर के उस पीड़ित जन का दुःख और बढ़ाए।

दूसरी दिशा में काम करते हुए, कसदियों को उभारा गया कि वे तीन दलों में आकर अय्यूब के ऊँटों को हाँक ले जाएँ, और सब सेवकों को तलवार की धार से मार डालें, केवल उसको छोड़कर जो बुरा समाचार सुनाने के लिये बचा रहा। और, मानो यह पर्याप्त न हो, अय्यूब की सन्तान तक—उसके सात बेटे और तीन बेटियाँ, इतनी प्रार्थनाओं की सन्तान—एक ही आघात में उड़ा दी गई, जंगल की ओर से आई एक भयानक आँधी के द्वारा, जिसने घर के चारों कोनों को ऐसा झकझोरा कि वह उन पर गिर पड़ा, और केवल एक ही सेवक इस विपत्ति की साक्षी देने के लिये बचा रहा। उसके सारे परिवार में से केवल एक ही—उसकी पत्नी—अय्यूब के लिये बची रह गई प्रतीत होती है। परन्तु शोक और परीक्षा की इस घड़ी में उसकी आत्मिक सहायता होने के बजाय, उसने परमेश्वर पर से विश्वास खो दिया; और जब उस पर और विपत्ति आई, और वह घोर शारीरिक पीड़ा और क्लेश में था, तब उसकी परीक्षा में उसकी निराश पत्नी के इन शब्दों का बोझ और जुड़ गया: "परमेश्वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा।" इससे हम देखते हैं कि वह भी अय्यूब के लिये उस महान् शत्रु की ओर से किसी दया के कारण नहीं, वरन् केवल इसलिये बची रह गई कि उसकी चरम घड़ी में क्लेश का प्याला पूरा भर जाए।

परन्तु जिसने परीक्षा भेजी उसी ने आवश्यक अनुग्रह भी दिया, और जिन शब्दों को हम पहले ही उद्धृत कर चुके हैं, उन में अय्यूब ने उत्तर दिया: "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य है।"

क्या अय्यूब भूल में था? क्या उसे यह न कहना चाहिए था: "यहोवा ने दिया, और शैतान ने ले लिया?" नहीं, कोई भूल न थी। जिस अनुग्रह ने उसे बिना हानि के परमेश्वर के हाथ से आशीष ग्रहण करने के योग्य बनाया था, उसी ने उसे यह भी योग्य बनाया कि जो विपत्तियाँ उस पर आ पड़ी थीं उनमें भी वह परमेश्वर का हाथ पहचान सके। स्वयं शैतान ने भी परमेश्वर से यह माँगने का साहस नहीं किया कि उसे अय्यूब को स्वयं पीड़ित करने की अनुमति दी जाए। पहले अध्याय के ग्यारहवें पद में वह कहता है: "अब अपना हाथ बढ़ाकर जो कुछ उसका है, उसे छू; तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा;" और दूसरे अध्याय के पाँचवें पद में: "अपना हाथ बढ़ाकर उसकी हड्डियाँ और माँस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" शैतान जानता था कि परमेश्वर के अतिरिक्त और कोई अय्यूब को छू नहीं सकता; और जब शैतान को उसे पीड़ित करने की अनुमति मिली, तब अय्यूब यह पहचानने में बिलकुल सही था कि इन बातों का करनेवाला, जिन्हें होने की अनुमति परमेश्वर ने दी, स्वयं प्रभु ही था।

यदि हम यह बात मन में रखें तो अनेक बार हमें सहायता और आशीष मिलेगी—कि शैतान सेवक है, और स्वामी नहीं, और यह कि वह, और उसके उकसाए हुए दुष्ट मनुष्य केवल वही करने की अनुमति पाते हैं जिसे परमेश्वर ने अपनी नियत मन्त्रणा और पूर्वज्ञान के द्वारा पहले से ठहरा दिया है कि होगा। सुख आए, या दुःख आए, हम उसे सदा परमेश्वर के हाथ से ग्रहण कर सकते हैं।

यहूदा ने अपने स्वामी को एक चुम्बन से पकड़वाया। हमारा प्रभु न तो यहूदा पर रुक गया, और न उस महान् शत्रु पर भी रुका जिसने यह काम करने के लिये यहूदा का मन भर दिया था; वरन् उसने कहा: "जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे न पीऊँ?" यदि हम किसी चोट को उस माध्यम की ओर मुख्यतः देखने के बजाय, जिसके द्वारा वह हम तक आती है, एक प्रेमी पिता के हाथ से ग्रहण कर सकें, तो क्रोध और बुरी भावना की प्रवृत्ति कैसी दूर हो जाएगी! इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि डाकिया कौन है—हमारा सरोकार तो पत्र के लिखनेवाले से है: इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता कि सन्देशवाहक कौन है—परमेश्वर की सन्तान का व्यवहार तो परमेश्वर से है।

इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि अय्यूब भूल में नहीं था, और यह कि हम भी भूल में न होंगे यदि हम उसके उदाहरण का अनुसरण करते हुए परमेश्वर के सब दैवी प्रबन्धों को उसी की ओर से आया हुआ मानकर ग्रहण करें। हम निश्चय जान सकते हैं कि उनका परिणाम अन्ततः आशीष में होगा; क्योंकि परमेश्वर परमेश्वर है, और, इसलिए, जो लोग उससे प्रेम रखते हैं उनके लिये "सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं"।

तथापि, जैसा हमने देखा, अय्यूब की परीक्षा तब पूरी नहीं हुई जब उसकी सम्पत्ति ले ली गई। जब प्रभु ने दूसरी बार शैतान को ललकारा: "क्या तूने मेरे दास अय्यूब पर ध्यान दिया है ... ?" तब शैतान के पास कोई प्रशंसा का शब्द नहीं, वरन् एक और लांछन है: "खाल के बदले खाल, परन्तु प्राण के बदले मनुष्य अपना सब कुछ दे देता है ... उसकी हड्डियाँ और माँस छू, तब वह तेरे मुँह पर तेरी निन्दा करेगा।" उसे शारीरिक रूप से पीड़ित करने की और अनुमति पाकर, परन्तु साथ ही उसका प्राण बचाए रखने की आज्ञा के साथ, शैतान प्रभु के सम्मुख से निकल गया, और अय्यूब को पाँव के तलवे से लेकर सिर की चोटी तक बड़े-बड़े फोड़ों से पीड़ित किया।

उसके रोग की पीड़ा, उसके रूप की घिनौनी दशा, अत्यन्त भयंकर रही होगी; जब उसके मित्र उसे देखने आए तो वे उसे पहचान न सके। उसका चमड़ा फट गया था और घिनौना हो गया था; उसकी देह कीड़ों और मिट्टी के ढेलों से ढकी हुई थी। व्यर्थता के दिन और क्लेश से भरी रातें दुखदायी क्रम में एक के बाद एक आती गईं; रात को उसका विश्राम स्वप्नों से भयभीत और दर्शनों से आतंकित रहता था; यहाँ तक कि, किसी चैन या विश्राम के बिना, गला घोंटा जाना उसके लिये राहत होती, और जीवन के बदले मृत्यु ही चुनी जाती। परन्तु मृत्यु का कोई भय न था, क्योंकि शैतान को आज्ञा दी गई थी कि वह उसके प्राण को न छुए।

उसके कुटुम्बी उससे विमुख हो गए, और उसके घनिष्ठ मित्र उसे भूल गए प्रतीत होते हैं। जो उसके घर में रहते थे उन्होंने उसे पराया समझा, और जब उसने अपने सेवक से सहायता की विनती की तो उसने उसकी पुकार का कोई उत्तर न दिया। नहीं, सबसे बुरा तो यह कि उसकी अपनी पत्नी उससे फिर गई, और अपने शोक में उसने पुकारकर कहा: "मेरी साँस मेरी स्त्री को घिनौनी लगती है, यद्यपि मैंने अपने ही शरीर की सन्तान के निमित्त विनती की।" कोई आश्चर्य नहीं कि जो देखते थे उन्होंने सोचा कि स्वयं परमेश्वर उसका शत्रु बन गया है।

तौभी ऐसा न था। एक कोमल पिता के प्रेम से परमेश्वर सारे समय देख रहा था; और जब परीक्षा इतनी देर तक चली कि परमेश्वर के अनुग्रह का सामर्थ्य सिद्ध हो जाए, और स्वयं अय्यूब को पूर्णतर आशीष के लिये तैयार कर दे, तब वे क्लेश हटा लिए गए; और उस अस्थायी परीक्षा के स्थान में उसे छुटकारे के गीत प्रदान किए गए।

और न ही परमेश्वर ने अपने दास को जो आशीष दी वह कोई छोटी थी। क्लेश के इस समय में, जो सम्भवतः बहुत लम्बा नहीं था, अय्यूब ने ऐसी शिक्षाएँ सीखीं जो उसका समृद्धि का सारा जीवन उसे न सिखा सका था। अपनी आत्मा की उतावली में उसने जो भूलें की थीं वे सुधारी गईं; परमेश्वर का उसका ज्ञान गहरा और अधिक हो गया; उसने उसे जानना ऐसे सीखा जैसा वह किसी और रीति से न सीख पाता। उसने पुकारकर कहा कि पहले उसने कानों से उसका समाचार सुना था, और परमेश्वर को केवल सुनी-सुनाई बात से जानता था; परन्तु अब उसकी आँखें उसे देखती हैं, और परमेश्वर से उसका परिचय वह बन गया जो व्यक्तिगत ज्ञान का परिणाम था, न कि केवल सुनी बात का। उसकी सारी आत्म-धार्मिकता जाती रही: उसे धूलि और राख में अपने ऊपर घृणा आई।

तब, जब उसने अपने मित्रों के लिये प्रार्थना की, तो प्रभु ने शोक दूर किया, और जो पहले कुछ समय के लिये विमुख हो गए थे उनका प्रेम और मित्रता उसे लौटा दी, और अय्यूब के पिछले दिनों को उसके पहले दिनों से अधिक आशीषित किया। उसकी भेड़ें, उसके ऊँट, उसके बैल, और उसकी गदहियाँ दुगुनी हो गईं। फिर से सात बेटे और तीन बेटियाँ उसे दी गईं, और इस प्रकार उसकी सन्तान की संख्या भी दुगुनी हो गई; क्योंकि जो मर गए थे वे खो नहीं गए थे, वे केवल आगे चले गए थे। और इस सब के बाद, अय्यूब 140 वर्ष जीवित रहा, और उसने अपने बच्चों, और नाती-पोतों को चौथी पीढ़ी तक देखा; और अन्त में बूढ़ा और पूरी आयु का होकर मर गया।

क्या हम भली भाँति यह न कह सकें कि यदि अय्यूब की समृद्धि धन्य समृद्धि थी, तो उसकी विपत्ति भी वैसे ही धन्य विपत्ति थी? "कदाचित् रात को रोना पड़े, परन्तु सवेरे आनन्द पहुँचेगा;" और रोने की वह रात ऐसा फल लाएगी जो आनन्द के किसी भी दिन की उपज से अधिक समृद्ध और स्थायी होगा। "साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।" अन्धकार में से उजियाला—यही परमेश्वर की रीति है, और यदि कभी हमारा स्वर्गीय पिता हमें किसी परीक्षा का भार सौंप सके, तो यह एक निश्चित पूर्वसंकेत है कि, यदि अनुग्रह से वह परीक्षा ग्रहण की जाए, तो वह शीघ्र ही हमें एक आशीष का भार सौंपेगा।

इस युग में, जब भौतिक कारणों पर इतना अधिक ध्यान दिया जाता है कि अनदेखी शक्तियों को भूल जाने का भय है, हम अपने अनदेखे आत्मिक शत्रुओं के अस्तित्व और वास्तविकता को दृष्टि से ओझल न होने दें। परमेश्वर की बहुत सी सन्तान जानती है कि लहू और माँस से घोर संघर्ष करना क्या होता है; तौभी, जैसा प्रेरित कहता है, "हमारा यह मल्लयुद्ध, लहू और माँस से नहीं, परन्तु ... उस दुष्टता की आत्मिक सेनाओं से है जो आकाश में हैं" (हाशिया)। अपने दृश्य शत्रुओं से निपटना अपेक्षाकृत सरल होता, यदि अदृश्य शत्रु उनके पीछे न होते। ऐसे बलवान्, और परमेश्वर की रक्षक देखभाल के बिना, ऐसे सर्वथा अजेय शत्रुओं के सामने, यदि हम असुरक्षित और निःशस्त्र हों तो सचमुच असहाय ही होंगे।

हमें परमेश्वर के सारे हथियार बाँध लेने की आवश्यकता है, और शैतान की युक्तियों से अनजान न रहने की। दूसरी ओर, हम इस अनमोल सत्य को दृष्टि से ओझल न होने दें कि केवल परमेश्वर ही सर्वशक्तिमान् है; कि परमेश्वर हमारा सहायक, हमारा रक्षक, और हमारी ढाल है, और साथ ही हमारा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल भी। "यदि परमेश्वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?" हम सदा उसी की ओर रहें, उसके प्रयोजनों को पूरा करने का यत्न करते हुए; तब परमेश्वर का सामर्थ्य सदा हमारे साथ रहेगा, और हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया है, विजेता से भी बढ़कर बनाए जाएँगे।

इस उपदेश में पवित्रशास्त्र भजन संहिता 23:6

सार्वजनिक डोमेन। मूल पाठ का स्रोत: मूल संस्करण.