परमेश्वर की बाट जोहना ·हमारे उद्धार का परमेश्वर

अध्याय 3 · 4 मिनट का पठन

एआई अनुवाद — मातृभाषी समीक्षा बाकी

हमारे उद्धार का परमेश्वर

पहला दिन। परमेश्वर की बाट जोहना: हमारे उद्धार का परमेश्वर।

'सचमुच मैं चुपचाप होकर परमेश्वर की ओर मन लगाए हूँ [हाशिये में: परमेश्वर के सामने चुपचाप रहता है] मेरा उद्धार उसी से होता है।'—भजन संहिता 62:1(R.V.)।

यदि उद्धार सचमुच परमेश्वर की ओर से आता है, और जैसे हमारी सृष्टि सर्वथा उसी का काम थी वैसे ही यह भी सर्वथा उसी का काम है, तो स्वाभाविक रूप से यह निकलता है कि हमारा पहला और सबसे ऊँचा कर्तव्य यही है कि हम उसकी बाट जोहें, कि वह उस काम को जैसा उसे भाता है वैसा ही करे। तब बाट जोहना ही पूर्ण उद्धार के अनुभव का एकमात्र मार्ग ठहरता है, वरन् सचमुच परमेश्वर को हमारे उद्धार के परमेश्वर के रूप में जानने का एकमात्र मार्ग। जितनी कठिनाइयाँ यह कहकर सामने रखी जाती हैं कि वे हमें पूर्ण उद्धार से रोके रखती हैं, उन सब का कारण यही एक बात है: परमेश्वर की बाट जोहने का त्रुटिपूर्ण ज्ञान और अभ्यास। संसार में परमेश्वर की महासामर्थ्य के प्रगट होने के लिये कलीसिया और उसके सदस्यों को जिस बात की आवश्यकता है, वह यही है कि हम अपने सच्चे स्थान पर लौट आएँ, उस स्थान पर जो सृष्टि में और छुटकारे में, दोनों में, हमारा ही है, अर्थात् परमेश्वर पर पूर्ण और निरन्तर निर्भरता का स्थान। आओ, हम यह देखने का यत्न करें कि परमेश्वर की बाट जोहने की इस अति धन्य और अति आवश्यक बात में कौन-से तत्व हैं: इससे हमें यह जानने में सहायता मिलेगी कि यह अनुग्रह इतना कम क्यों बढ़ाया जाता है, और यह अनुभव करने में भी कि यह कितना अत्यन्त वांछनीय है कि कलीसिया, वरन् हम स्वयं, किसी भी मूल्य पर इसका धन्य भेद सीख लें।

परमेश्वर की इस बाट जोहने की गहरी आवश्यकता मनुष्य के स्वभाव में और परमेश्वर के स्वभाव में, दोनों में समान रूप से है। परमेश्वर ने सृष्टिकर्ता के रूप में मनुष्य को इसलिए रचा कि वह एक ऐसा पात्र ठहरे जिसमें वह अपनी सामर्थ्य और अपनी भलाई प्रगट कर सके। मनुष्य के भीतर जीवन का, या बल का, या आनन्द का सोता नहीं होना था: सदा जीवित और एकमात्र जीवित परमेश्वर ही हर क्षण उसे वह सब देनेवाला ठहरा जिसकी उसे आवश्यकता थी। मनुष्य की महिमा और धन्यता इसमें नहीं थी कि वह स्वतन्त्र हो, या अपने ही ऊपर निर्भर हो, परन्तु इसमें कि वह ऐसे परमेश्वर पर निर्भर हो जिसका धन और प्रेम अनन्त है। मनुष्य को यह आनन्द मिलना था कि वह हर क्षण परमेश्वर की परिपूर्णता में से पाता रहे। पतन से पहले के प्राणी के रूप में यही उसकी धन्यता थी।

जब वह परमेश्वर से गिर गया, तब वह उस पर और भी अधिक पूर्ण रूप से निर्भर हो गया। मृत्यु की उस दशा से उसके उबरने की रत्ती भर भी आशा परमेश्वर के बिना, अर्थात् उसकी सामर्थ्य और दया के बिना, कहीं न थी। छुटकारे का काम केवल परमेश्वर ने ही आरम्भ किया; और केवल परमेश्वर ही हर एक विश्वासी में हर क्षण उसे बनाए रखता और आगे बढ़ाता है। नए सिरे से जन्मे हुए मनुष्य में भी अपने आप में भलाई की कोई सामर्थ्य नहीं है: उसके पास कुछ भी नहीं है, और न हो सकता है, सिवाय उसके जो वह हर क्षण पाता है; और परमेश्वर की बाट जोहना ठीक उतना ही अनिवार्य है, और उसे ठीक उतना ही निरन्तर और अटूट होना चाहिए, जितनी वह साँस जिससे उसका स्वाभाविक जीवन बना रहता है।

तो फिर, इसी कारण कि मसीही लोग परमेश्वर के साथ अपने संबंध में अपनी पूरी कंगाली और असहायता को नहीं जानते, उन्हें न तो पूर्ण और निरन्तर निर्भरता की आवश्यकता का बोध है, और न परमेश्वर की निरन्तर बाट जोहने की उस अवर्णनीय धन्यता का। परन्तु जब एक बार विश्वासी यह देखने और मान लेने लगता है कि जो कुछ परमेश्वर हर क्षण करता है वह उसे पवित्र आत्मा के द्वारा हर क्षण पाना ही है, तब परमेश्वर की बाट जोहना उसकी सबसे उज्ज्वल आशा और उसका सबसे बड़ा आनन्द बन जाता है। ज्यों-ज्यों वह यह समझने लगता है कि परमेश्वर, परमेश्वर होने के नाते, अनन्त प्रेम होने के नाते, अपने ही स्वभाव को अपने बालक में जितना पूर्ण रूप से दे सकता है उतना देने में प्रसन्न होता है, और यह कि परमेश्वर हर क्षण उसके जीवन और बल की चिन्ता करते हुए थकता नहीं, त्यों-त्यों उसे आश्चर्य होता है कि उसने कभी परमेश्वर को ऐसे परमेश्वर से भिन्न और कुछ समझा ही क्यों जिसकी दिन भर बाट जोही जाए। परमेश्वर निरन्तर देता और काम करता हुआ; उसका बालक निरन्तर बाट जोहता और पाता हुआ: यही धन्य जीवन है।

'सचमुच मैं चुपचाप होकर परमेश्वर की ओर मन लगाए हूँ मेरा उद्धार उसी से होता है।' पहले हम उद्धार के लिये परमेश्वर की बाट जोहते हैं। फिर हम सीखते हैं कि उद्धार इसलिए है कि वह हमें परमेश्वर के पास ले आए, और हमें उसकी बाट जोहना सिखाए। फिर हम उससे भी उत्तम बात पाते हैं, कि परमेश्वर की बाट जोहना ही सबसे ऊँचा उद्धार है। यह उसे यह महिमा देना है कि वही सब कुछ है; यह इस बात का अनुभव करना है कि वह हमारे लिये सब कुछ है। परमेश्वर हमें अपनी बाट जोहने की धन्यता सिखाए।

'हे मेरे मन, परमेश्वर के सामने चुपचाप रह!'

विषय-सूची

परमेश्वर की बाट जोहना Andrew Murray

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