मार्ग के पत्थर
अध्याय 2

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मार्ग के पत्थर

पुराने क्यूबेक नगर के नोत्र दाम गिरजाघर ने अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ देखी हैं। जून 1979 की उस धूप-भरी दोपहर मैं एक और घटना का साक्षी बन रहा था। मैं मुख्य द्वार के भीतर ही खड़ा होकर गिरजे के धुँधले भीतरी भाग में देख रहा था, जहाँ एक जवान पुरुष स्कूली बच्चों की दो पंक्तियों के सामने खड़ा था, और उनके साथ एक पुरुष शिक्षक भी था। उस जवान पुरुष के हाथ में एक बाइबल थी, और गिरजे की दीवारों पर बने ‘क्रूस के पड़ाव’ में से एक-एक की ओर बारी-बारी से संकेत करते हुए वह विद्यार्थियों को यीशु के दुःखभोग के विषय में सिखा रहा था। वे तन्मय होकर सुन रहे थे। यद्यपि वे सब सोलह या सत्रह वर्ष के थे और कनाडा की संस्कृति तथा क्यूबेक के इतिहास से भली-भाँति परिचित थे, तौभी यह शिक्षा उनके लिए नई थी। पास से देखने पर दिखाई देता था कि उन सब युवकों के सिर पर किप्पा था — इस बात का चिह्न कि वे यहूदी थे।

मैं अचरज से, और एक सहभागी के विशेष रोमांच के साथ, यह सब देख रहा था, क्योंकि ये विद्यार्थी टोरंटो के हमारे ही विद्यालय से ऐतिहासिक क्यूबेक में एक शैक्षिक सप्ताहान्त बिताने आए थे। टोरंटो हिब्रू अकादमी एक प्रसिद्ध, ऑर्थोडॉक्स यहूदी विद्यालय है, और पिछले दो वर्षों से वहाँ पढ़ाना मेरा सौभाग्य रहा था। ये चालीस विद्यार्थी हमारी कक्षा 11 के थे, और मुझसे तथा मेरे सहकर्मी आरी बारकी से कहा गया था कि हम इस विशेष भ्रमण की अगुवाई करें। इनमें से किसी विद्यार्थी को यह पता न था कि मैंने कुछ ही समय पहले सूचना दे दी थी कि इस चालू सत्र के अन्त में मैं विद्यालय छोड़ रहा हूँ, और एक नई ‘बुलाहट’ को अपना रहा हूँ — पूर्णकालिक पास्टरीय सेवा की बुलाहट को। जब से वह निर्णय हुआ था, परमेश्वर मुझे कुछ उल्लेखनीय अनुभवों में से होकर ले चला था, और यह सप्ताहान्त उसी की निरन्तर आशीष सिद्ध हो रहा था।

जब मैं गिरजे की उन भव्य, प्राचीन दीवारों को देख रहा था, जिन पर बने चौदह पड़ावों के आगे भक्तजन घुटने टेककर प्रार्थना करते और उस मार्ग को स्मरण करते जो यीशु ने गतसमनी से कलवरी तक तय किया था, तब मेरा मन अपने ही जीवन के उन पड़ावों की ओर लौट गया जिनमें से होकर परमेश्वर मुझे ले चला था। मैंने बीस से अधिक वर्ष पीछे मुड़कर देखा और उस सच्चाई को पहचाना जिसे भजनकार ने घोषित किया था।

“मनुष्य की गति यहोवा की ओर से दृढ़ होती है, और उसके चलन से वह प्रसन्न रहता है; चाहे वह गिरे तो भी पड़ा न रह जाएगा, क्योंकि यहोवा उसका हाथ थामे रहता है” (भजन संहिता 37:23-24)।

अपने जीवन में मुझे ऐसे अनेक पड़ाव या ‘मार्ग के पत्थर’ दिखाई देते हैं जो प्रभु के साथ और गहरे अनुभवों तक ले गए, और जिनके बिना वह कथा ही न होती जो मैं सुनाना चाहता हूँ। हर पत्थर अगले पत्थर तक ले गया, और उनमें से हर एक मेरी योजनाओं में प्रभु का सीधा हस्तक्षेप था। केवल पीछे मुड़कर देखने से ही मैं उन उद्देश्यों की कुछ झलक पा सकता हूँ जो आरम्भ से ही उसके मन में थे। अब मैं समझ सकता हूँ कि उसने वह द्वार क्यों ‘बन्द कर दिया,’ जब मैं सोचता था कि उसे खुला रहना चाहिए। अब मैं देख सकता हूँ कि उसने दूसरे लोगों के जीवनों में, यहाँ तक कि अविश्वासियों के जीवनों में भी, मेरे लिए अपनी योजनाएँ पूरी करने के लिए कैसे काम किया। अब मैं कह सकता हूँ कि मैं जानता हूँ कि मेरी निराशाएँ प्रायः उसकी ठहराई हुई नियुक्तियाँ होती हैं। अब मैं अपने भविष्य का हर भाग उसके हाथ में सौंप सकता हूँ, क्योंकि उसने अपने आप को मेरे बीते हुए कल में प्रमाणित किया है। मैं जानता हूँ कि वे पत्थर वहाँ हैं, यद्यपि मैं उन्हें अभी देख नहीं पाता। यदि बीते हुए समय ने आनेवाले समय का ढाँचा बना दिया है, तो मैं उन्हें अनुभव करने से पहले देख न पाऊँगा।

मैं यह समझ पाया हूँ कि ‘विश्वास की चाल’ मेरे बड़े ‘विश्वास करने’ पर नहीं, वरन् मेरे समर्पण पर निर्भर करती है — तब, जब वह अपने सीधे हस्तक्षेप से मेरे जीवन की दिशा बदल देता है। ऐसे ‘विश्वास’ का सम्बन्ध विश्वास करने से कम और आज्ञाकारिता से अधिक है। आज्ञाकारिता भरोसे से जन्म लेती है। यदि मेरा विश्वास आज के कुछ ‘विश्वास के शिक्षकों’ के मापदण्ड से नापा जाता, तो मैं बुरी तरह असफल ठहरता। उनके लिए विश्वास कोई ऐसी वस्तु है जिसे मैं अपने भीतर उभार सकता हूँ, ताकि यदि मेरे पास उसकी पर्याप्त मात्रा हो तो मैं परमेश्वर को मनवा लूँ कि वह वही करे जो मैं चाहता हूँ। यदि मैं रोगी हूँ, तो इसलिए कि मेरे पास पर्याप्त ‘विश्वास’ नहीं है, और यदि मैं अभाव में हूँ, तो इसलिए कि मेरे पास पर्याप्त ‘विश्वास’ नहीं है। फिर भी, जब मैं पवित्रशास्त्र पढ़ता हूँ, तो वह मुझे यह सिखाता है कि मैं न तो विश्वास उपजा सकता हूँ और न अपने भीतर उसे बढ़ा सकता हूँ। वह प्रभु का सर्वोच्च कार्य है, और वह उसे तब करता है जब मैं उसकी अगुवाई के आगे झुकता हूँ और उसके वचन को अपने जीवन की नींव बनाता हूँ। जब मैं इब्रानियों 11 में विश्वास पर लिखा वह महान अध्याय पढ़ता हूँ, तो मुझे ऐसे असाधारण स्त्री-पुरुष दिखाई नहीं देते जिनकी वीरों के रूप में सराहना इसलिए हो रही हो कि उन्होंने विश्वास किया; वरन् मुझे साधारण लोगों के जीवनों में परमेश्वर के हस्तक्षेप और अगुवाई का वर्णन दिखाई देता है, जिसका उद्देश्य यह है कि हमें मसीही जीवन की महान सच्चाइयाँ और सिद्धान्त सिखाए जाएँ। पर अभी इतना धर्मविज्ञान बहुत है! अब कथा की ओर चलें!

मनन के लिए प्रश्न

जून 1979 में क्यूबेक नगर के नोत्र दाम गिरजाघर में गैरेथ क्या होते देख रहे थे?

वे देख रहे थे कि एक जवान पुरुष हाथ में बाइबल लिए, गिरजे की दीवारों पर बने ‘क्रूस के पड़ाव’ में से एक-एक की ओर बारी-बारी से संकेत करते हुए, टोरंटो हिब्रू अकादमी के यहूदी विद्यार्थियों की कक्षा 11 को यीशु के दुःखभोग के विषय में सिखा रहा था। सिर पर किप्पा पहने वे सब विद्यार्थी तन्मय होकर सुन रहे थे, क्योंकि यह शिक्षा उनके लिए नई थी।

गैरेथ अपने जीवन के ‘मार्ग के पत्थर’ से क्या अर्थ लेते हैं?

ये उनके जीवन के वे पड़ाव हैं जो प्रभु के साथ और गहरे अनुभवों तक ले गए, और इनमें से हर एक उनकी योजनाओं में परमेश्वर का सीधा हस्तक्षेप था। पीछे मुड़कर देखने पर वे समझ पाते हैं कि परमेश्वर ने ‘वह द्वार क्यों बन्द किया’, और उन्होंने यह सीखा है कि “मेरी निराशाएँ प्रायः उसकी ठहराई हुई नियुक्तियाँ होती हैं।”

‘विश्वास की चाल’ के विषय में गैरेथ की समझ कुछ ‘विश्वास के शिक्षकों’ की समझ से कैसे भिन्न है?

वे शिक्षक विश्वास को ऐसी वस्तु मानते हैं जिसे मनुष्य स्वयं उत्पन्न करके परमेश्वर को अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मना सके; इसलिए बीमारी या अभाव का अर्थ होता है कि ‘विश्वास’ पर्याप्त नहीं था। गैरेथ कहते हैं कि विश्वास की चाल इसके बदले इस बात पर निर्भर है कि जब परमेश्वर जीवन की दिशा बदल दे तब हम झुक जाएँ; यह भरोसे से जन्मी आज्ञाकारिता से अधिक सम्बन्ध रखती है। विश्वास प्रभु का सर्वाधिकारी कार्य है, ऐसी वस्तु नहीं जिसे वे स्वयं उत्पन्न कर सकें या बढ़ा सकें।

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