प्रार्थना के द्वारा सामर्थ्य
प्रार्थना करनेवाले पुरुषों के उदाहरण

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प्रार्थना करनेवाले पुरुषों के उदाहरण

प्रार्थना करने का कार्य वह सर्वोच्च ऊर्जा है जिसका मानव मन सामर्थ्य रखता है; अर्थात् ऐसी प्रार्थना जो समस्त मानसिक शक्तियों की पूर्ण एकाग्रता के साथ की जाए। सांसारिक पुरुषों और विद्वान पुरुषों की विशाल भीड़ प्रार्थना करने में पूर्णतः असमर्थ है।—सैमुएल टेलर कोलरिज

बिशप विल्सन कहते हैं: “एच. मार्टिन की डायरी में प्रार्थना की आत्मा, जितना समय उन्होंने इस कर्तव्य को समर्पित किया, और उसमें उनकी उत्कटता—ये ही पहली बातें हैं जो मुझे प्रभावित करती हैं।”

पेसन ने कठोर लकड़ी के तख्तों को वहाँ घिसकर खाँचे बना दिए जहाँ उनके घुटने इतनी बार और इतनी देर तक दबे रहते थे। उनके जीवनी-लेखक कहते हैं: “उनका प्रार्थना में निरन्तर लगे रहना, उनकी परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी रही हों, उनके इतिहास का सबसे उल्लेखनीय तथ्य है, और उन सब के कर्तव्य की ओर संकेत करता है जो उनकी श्रेष्ठता की बराबरी करना चाहें। उनकी उत्कट और अविरत प्रार्थनाओं को ही निःसन्देह बहुत बड़ी मात्रा में उनकी असाधारण और लगभग अटूट सफलता का श्रेय दिया जाना चाहिए।”

मार्की डीरेंटी, जिनके लिए मसीह अत्यन्त बहुमूल्य थे, ने अपने सेवक को आज्ञा दी कि आधे घंटे के अंत में उन्हें उनकी भक्ति से बुला ले। उस समय सेवक ने एक छेद में से उनका मुख देखा। वह ऐसी पवित्रता से चिह्नित था कि उसे उन्हें जगाना अच्छा नहीं लगा। उनके होंठ हिल रहे थे, परन्तु वे पूर्णतः मौन थे। वह तब तक प्रतीक्षा करता रहा जब तक तीन बार आधे-आधे घंटे बीत न गए; तब उसने उन्हें पुकारा, और वे अपने घुटनों से उठे, यह कहते हुए कि जब वे मसीह के साथ संगति कर रहे थे तब आधा घंटा बहुत ही छोटा था।

ब्रेनर्ड ने कहा: “मुझे अपनी कुटिया में अकेले रहना अच्छा लगता है, जहाँ मैं बहुत समय प्रार्थना में बिता सकता हूँ।”

विलियम ब्रैमवेल मेथोडिस्ट इतिहास में व्यक्तिगत पवित्रता के लिए, प्रचार में अपनी अद्भुत सफलता के लिए, और अपनी प्रार्थनाओं के अचम्भित करनेवाले उत्तरों के लिए प्रसिद्ध हैं। वे एक-एक बार में घंटों तक प्रार्थना करते थे। वे लगभग अपने घुटनों पर ही जीते थे। वे अपने प्रचार-क्षेत्रों में आग की लौ के समान फिरते थे। वह आग उस समय से सुलगती थी जो वे प्रार्थना में बिताते थे। वे प्रायः एकांत में प्रार्थना के एक ही सत्र में चार घंटे तक बिता देते थे।

बिशप एंड्रयूज प्रतिदिन पाँच घंटों का अधिकांश भाग प्रार्थना और भक्ति में बिताते थे।

सर हेनरी हैवलॉक सदैव प्रत्येक दिन के पहले दो घंटे परमेश्वर के साथ अकेले बिताते थे। यदि छावनी 6 बजे प्रातः उठाई जाती, तो वे चार बजे जाग जाते।

अर्ल केयर्न्स प्रतिदिन छह बजे उठते थे ताकि बाइबल के अध्ययन और प्रार्थना के लिए डेढ़ घंटा निकाल सकें, इससे पहले कि वे पौने आठ बजे पारिवारिक उपासना का संचालन करें।

डॉ. जडसन की प्रार्थना में सफलता का श्रेय इस तथ्य को दिया जा सकता है कि उन्होंने प्रार्थना को बहुत समय दिया। इस विषय में वे कहते हैं: “यदि सम्भव हो तो अपने कार्यों को इस प्रकार व्यवस्थित करो कि तुम प्रतिदिन दो या तीन घंटे फुरसत से केवल भक्ति के अभ्यासों को ही नहीं, वरन् गुप्त प्रार्थना और परमेश्वर के साथ संगति के वास्तविक कार्य को समर्पित कर सको। दिन में सात बार प्रयास करो कि तुम कामकाज और संगति से हटकर एकांत में परमेश्वर के सामने अपने मन को ऊपर उठाओ। दिन का आरम्भ आधी रात के बाद उठकर करो और रात के सन्नाटे और अंधकार के बीच कुछ समय इस पवित्र कार्य को समर्पित करो। भोर के खुलने का समय तुम्हें उसी कार्य में लगा हुआ पाए। नौ, बारह, तीन, छह, और रात के नौ बजे भी यही देखें। उसके कार्य में दृढ़ रहो। इसे बनाए रखने के लिए सब सम्भव बलिदान करो। यह विचार करो कि तुम्हारा समय थोड़ा है, और कामकाज तथा संगति को यह न करने दिया जाए कि वे तुम्हें तुम्हारे परमेश्वर से वंचित कर दें।” असम्भव, हम कहते हैं, कट्टरपंथी निर्देश! डॉ. जडसन ने मसीह के लिए एक साम्राज्य पर छाप छोड़ी और बर्मा के हृदय में अविनाशी ग्रेनाइट से परमेश्वर के राज्य की नींव रखी। वे सफल हुए, उन थोड़े से पुरुषों में से एक जिन्होंने मसीह के लिए संसार पर सामर्थ्य से छाप छोड़ी। उनसे कहीं अधिक वरदानों, प्रतिभा और विद्वत्ता के अनेक पुरुषों ने ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ी; उनका धार्मिक कार्य रेत पर पड़े पदचिह्नों के समान है, परन्तु उन्होंने अपना कार्य कठोर चट्टान पर उकेर दिया है। इसकी गहराई और स्थायित्व का रहस्य इसी तथ्य में पाया जाता है कि उन्होंने प्रार्थना को समय दिया। उन्होंने लोहे को प्रार्थना से तपाकर लाल-गर्म बनाए रखा, और परमेश्वर के कौशल ने उसे स्थायी सामर्थ्य के साथ गढ़ा। कोई भी मनुष्य परमेश्वर के लिए कोई महान और स्थायी कार्य नहीं कर सकता जो प्रार्थना का मनुष्य नहीं है, और कोई भी मनुष्य प्रार्थना का मनुष्य नहीं हो सकता जो प्रार्थना में बहुत समय नहीं देता।

क्या यह सत्य है कि प्रार्थना मात्र आदत का पालन है, नीरस और यांत्रिक? एक तुच्छ अनुष्ठान जिसमें हमें तब तक प्रशिक्षित किया जाता है जब तक फीकापन, संक्षिप्तता और उथलापन इसके मुख्य तत्व न बन जाएँ? “क्या यह सत्य है कि प्रार्थना, जैसा मान लिया जाता है, उस अर्ध-निष्क्रिय भावुकता के खेल से बढ़कर और कुछ नहीं जो सहज स्वप्नचिन्तन के मिनटों या घंटों में शिथिल रूप से बहती रहती है?” कैनन लिडन आगे कहते हैं: “जिन्होंने सचमुच प्रार्थना की है, वे इसका उत्तर दें। वे कभी-कभी प्रार्थना का वर्णन कुलपिता याकूब के समान एक अनदेखी शक्ति के साथ मल्लयुद्ध के रूप में करते हैं, जो एक गम्भीर जीवन में अकसर रात के देर के पहरों तक, या भोर के फूटने तक भी चलता रह सकता है। कभी-कभी वे प्रेरित पौलुस के समान सर्वसाधारण मध्यस्थता को एक सम्मिलित संघर्ष कहते हैं। प्रार्थना करते समय उनकी दृष्टि गतसमनी में उस महान मध्यस्थ पर लगी रहती है, समर्पण और बलिदान की उस वेदना में भूमि पर गिरनेवाली लहू की उन बूँदों पर। आग्रह ही सफल प्रार्थना का सार है। आग्रह का अर्थ स्वप्नमयता नहीं वरन् निरन्तर परिश्रम है। यह विशेष रूप से प्रार्थना के द्वारा ही है कि स्वर्ग के राज्य में बलपूर्वक प्रवेश होता रहा है, और बलवान उसे छीन लेते हैं। स्वर्गीय बिशप हैमिल्टन का यह कहना था कि “कोई भी मनुष्य प्रार्थना में तब तक बहुत भला करने योग्य नहीं जब तक वह इसे एक ऐसे कार्य के रूप में देखना आरम्भ न करे जिसके लिए तैयारी की जाए और जिसमें उसी सम्पूर्ण उत्कटता के साथ लगे रहा जाए जो हम उन विषयों पर लगाते हैं जो हमारी दृष्टि में एक ही साथ सर्वाधिक रोचक और सर्वाधिक आवश्यक हैं।”

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