अध्याय 4 · 6 मिनट का पठन
बचने योग्य प्रवृत्तियाँ
हम बार-बार ब्रेनर्ड को अमेरिका के जंगलों में देखें, जो नाश होते अन्यजातियों के लिये परमेश्वर के सामने अपना पूरा प्राण उंडेल देता था, जिनके उद्धार के बिना कोई भी वस्तु उसे सुखी न कर सकती थी। प्रार्थना—गुप्त, उत्कट, विश्वासयुक्त प्रार्थना—समस्त व्यक्तिगत भक्ति की जड़ में है। जिस भाषा में मिशनरी रहता है उसका पर्याप्त ज्ञान, एक कोमल और मन मोह लेने वाला स्वभाव, कोठरी की भक्ति में परमेश्वर को समर्पित एक हृदय—यही, यही वे उपलब्धियाँ हैं जो, समस्त ज्ञान वा अन्य सब वरदानों से बढ़कर, हमें मानव-छुटकारे के महान कार्य में परमेश्वर के साधन बनने के योग्य बनाएँगी।—केरी की भ्रातृमण्डली, सरामपुर
सेवकाई में दो अतिवादी प्रवृत्तियाँ हैं। एक यह है कि वह अपने आप को लोगों के संग-संपर्क से बंद कर ले। साधु और वैरागी इसके उदाहरण थे; वे परमेश्वर के साथ अधिक रहने के लिये मनुष्यों से अपने आप को अलग कर लेते थे। निःसंदेह, वे असफल हुए। परमेश्वर के साथ हमारा रहना तभी काम का है जब हम उसके अनमोल लाभों को मनुष्यों पर लगाएँ। यह युग, न प्रचारक के साथ न लोगों के साथ, परमेश्वर पर अधिक मन नहीं लगाता। हमारी ललक उस ओर नहीं है। हम अपने आप को अपने अध्ययन में बंद कर लेते हैं, हम विद्यार्थी बन जाते हैं, पुस्तकों के कीड़े, बाइबल के कीड़े, उपदेश-रचयिता, साहित्य, विचार और उपदेशों के लिये प्रसिद्ध; परन्तु लोग और परमेश्वर, वे कहाँ हैं? हृदय से बाहर, मन से बाहर। जो प्रचारक बड़े विचारक, बड़े विद्यार्थी हैं उन्हें सबसे बड़ा प्रार्थी होना चाहिए, नहीं तो वे सबसे बड़े धर्मत्यागी होंगे, हृदयहीन पेशेवर, तर्कवादी, परमेश्वर की दृष्टि में प्रचारकों में सबसे छोटे से भी छोटे।
दूसरी प्रवृत्ति यह है कि सेवकाई को पूरी तरह लोकप्रिय बना दिया जाए। वह अब परमेश्वर का जन नहीं रहता, वरन कामकाज का मनुष्य, लोगों का मनुष्य बन जाता है। वह प्रार्थना नहीं करता, क्योंकि उसका ध्येय लोगों की ओर है। यदि वह लोगों को हिला सके, कोई रुचि जगा सके, धर्म के पक्ष में कोई हलचल, कलीसिया के काम में कोई रुचि उत्पन्न कर सके—तो वह संतुष्ट हो जाता है। परमेश्वर के साथ उसका व्यक्तिगत संबंध उसके काम में कोई कारक नहीं। उसकी योजनाओं में प्रार्थना का स्थान थोड़ा या बिलकुल नहीं है। ऐसी सेवकाई की विपत्ति और विनाश को सांसारिक गणित से नहीं आँका जा सकता। प्रचारक परमेश्वर के सामने प्रार्थना में अपने लिये, अपने लोगों के लिये जैसा है, वैसा ही मनुष्यों की सच्ची भलाई के लिये उसका सामर्थ्य है, वैसी ही उसकी सच्ची फलवन्तता है, परमेश्वर के प्रति, मनुष्य के प्रति, समय के लिये, अनन्तकाल के लिये उसकी सच्ची निष्ठा है।
प्रचारक के लिये यह असंभव है कि बहुत प्रार्थना के बिना वह अपनी आत्मा को अपने ऊँचे बुलावे के दिव्य स्वभाव के साथ मेल में बनाए रखे। यह गंभीर भूल है कि प्रचारक कर्तव्य के बल और सेवकाई के काम व नित्यक्रम के प्रति परिश्रमी निष्ठा से अपने आप को ठीक-ठाक और योग्य बनाए रख सकता है। यहाँ तक कि उपदेश-रचना भी, जो एक कला, एक कर्तव्य, एक काम, वा एक आनंद के रूप में निरंतर और थकाऊ है, प्रार्थना की उपेक्षा के द्वारा हृदय को घेर लेगी और कठोर कर देगी, उसे परमेश्वर से दूर कर देगी। वैज्ञानिक प्रकृति में परमेश्वर को खो देता है। प्रचारक अपने उपदेश में परमेश्वर को खो सकता है।
प्रार्थना प्रचारक के हृदय को ताज़ा करती है, उसे परमेश्वर के साथ सुर में और लोगों के साथ सहानुभूति में रखती है, उसकी सेवकाई को पेशे की ठंडी हवा से ऊपर उठाती है, नित्यक्रम को फलवन्त करती है और एक दिव्य अभिषेक की सहजता और सामर्थ्य से हर पहिये को चलाती है।
श्री स्पर्जन कहते हैं: “निःसंदेह प्रचारक सब अन्यों से बढ़कर प्रार्थना के जन के रूप में विशिष्ट होता है। वह एक साधारण मसीही के समान प्रार्थना करता है, नहीं तो वह कपटी ठहरता। वह साधारण मसीहियों से अधिक प्रार्थना करता है, नहीं तो जो पद उसने संभाला है उसके लिये वह अयोग्य ठहरता। यदि तुम प्रचारक होते हुए भी अधिक प्रार्थनाशील नहीं हो, तो तुम पर तरस खाने योग्य हो। यदि तुम पवित्र भक्ति में ढीले पड़ जाओ, तो न केवल तुम पर वरन तुम्हारे लोगों पर भी तरस खाना पड़ेगा, और वह दिन आता है जिसमें तुम लज्जित और घबरा जाओगे। हमारे सारे पुस्तकालय और अध्ययन-कक्ष हमारी कोठरियों की तुलना में केवल रीतापन हैं। टैबरनेकल में हमारे उपवास और प्रार्थना के समय सचमुच उत्तम दिन रहे हैं; कभी स्वर्ग का द्वार इससे अधिक चौड़ा नहीं खुला; कभी हमारे हृदय उस केंद्रीय महिमा के इतने निकट नहीं रहे।”
जो प्रार्थना प्रार्थनामय सेवकाई बनाती है, वह ऐसी थोड़ी-सी प्रार्थना नहीं जिसे हम स्वाद देने के लिये मिलाए गए मसाले की भाँति डाल देते हैं कि उसमें एक सुखद चटक आ जाए, वरन प्रार्थना को देह में होना चाहिए, और उसका रक्त और अस्थियाँ बनना चाहिए। प्रार्थना कोई तुच्छ कर्तव्य नहीं जिसे किसी कोने में डाल दिया जाए; न ही यह समय के उन टुकड़ों से बनी टुकड़े-टुकड़े कारगुज़ारी है जो व्यापार और जीवन के अन्य कामों से छीन लिए गए हों; वरन इसका अर्थ है कि हमारे समय का सर्वोत्तम भाग, हमारे समय और सामर्थ्य का हृदय दिया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि कोठरी अध्ययन में समा जाए वा सेवकाई के कर्तव्यों की गतिविधियों में निगल ली जाए; वरन इसका अर्थ है कोठरी पहले, अध्ययन और गतिविधियाँ दूसरे स्थान पर, और अध्ययन तथा गतिविधियाँ दोनों कोठरी के द्वारा ताज़ा और प्रभावशाली बनाई जाएँ। जो प्रार्थना किसी की सेवकाई को प्रभावित करती है उसे उसके जीवन को स्वर देना चाहिए। जो प्रार्थना चरित्र को रंग और झुकाव देती है वह कोई सुखद, जल्दबाज़ी में किया गया मनोरंजन नहीं है। उसे हृदय और जीवन में उतनी ही प्रबलता से प्रवेश करना चाहिए जितनी प्रबलता से मसीह के “ऊँचे शब्द से पुकार पुकारकर, और आँसू बहा-बहाकर” में थी; उसे प्राण को अभिलाषा की व्याकुलता में खींच लेना चाहिए, जैसा पौलुस की प्रार्थना ने किया; उसे एक अंतर्व्याप्त अग्नि और बल होना चाहिए, जैसा याकूब की “धर्मी जन की प्रार्थना के प्रभाव” में है; उसे उसी गुण की होनी चाहिए जो, जब सोने के धूपदान में रखकर परमेश्वर के सामने धूप की भाँति चढ़ाई जाती है, तो पराक्रमी आत्मिक उथल-पुथल और क्रांतियाँ उत्पन्न करती है।
प्रार्थना कोई ऐसी छोटी-सी आदत नहीं जो हमें तब लगा दी गई हो जब हम अपनी माता के आँचल से बंधे थे; न ही यह घंटे भर के भोजन पर कही गई पाव मिनट की कोई भली-सी धन्यवाद-प्रार्थना है, वरन यह हमारे सबसे गंभीर वर्षों का सबसे गंभीर कार्य है। यह हमारे सबसे लंबे भोजनों वा सबसे धनी भोजों से अधिक समय और रुचि माँगती है। जो प्रार्थना हमारे प्रचार को महत्त्व देती है उसे स्वयं भी बहुत महत्त्व दिया जाना चाहिए। हमारी प्रार्थना का चरित्र हमारे प्रचार के चरित्र को निर्धारित करेगा। हल्की प्रार्थना हल्का प्रचार बनाएगी। प्रार्थना प्रचार को सामर्थी बनाती है, उसे अभिषेक देती है, और उसे टिकाऊ बनाती है। भलाई के लिये भारी हर सेवकाई में प्रार्थना सदा एक गंभीर कार्य रही है।
प्रचारक को सबसे बढ़कर प्रार्थना का जन होना चाहिए। उसके हृदय को प्रार्थना की पाठशाला में उत्तीर्ण होना चाहिए। केवल प्रार्थना की पाठशाला में ही हृदय प्रचार करना सीख सकता है। कोई विद्या प्रार्थना की चूक की भरपाई नहीं कर सकती। न कोई उत्कटता, न कोई परिश्रम, न कोई अध्ययन, न कोई वरदान उसकी कमी को पूरा करेगा।
परमेश्वर के लिये मनुष्यों से बात करना एक महान बात है, परन्तु मनुष्यों के लिये परमेश्वर से बात करना उससे भी बड़ी बात है। जिसने मनुष्यों के लिये परमेश्वर से भली भाँति बात करना नहीं सीखा, वह परमेश्वर के लिये मनुष्यों से कभी भली भाँति और सच्ची सफलता के साथ बात न कर सकेगा। इससे बढ़कर, मंच पर और उसके बाहर प्रार्थनारहित शब्द निर्जीव करने वाले शब्द हैं।
अध्याय 4 पूरा हुआ
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