अध्याय 3 · 7 मिनट का पठन
अक्षर मारता है
इस पीड़ा के दौरान मुझे अपने जीवन को अनन्तता के संबंध में उससे कहीं अधिक गहराई से परखने की प्रेरणा मिली, जितनी मैंने स्वास्थ्य का आनन्द भोगते समय की थी। इस परख में, एक मनुष्य, एक मसीही सेवक, और कलीसिया के एक अधिकारी के रूप में अपने संगी प्राणियों के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वाह के संबंध में, मैं अपने ही विवेक के सामने स्वीकृत ठहरा; परन्तु अपने छुड़ानेवाले और उद्धारकर्ता के संबंध में परिणाम भिन्न था। मेरे कृतज्ञता और प्रेममय आज्ञाकारिता के प्रतिफल उन कर्जों के सामने कुछ भी नहीं ठहरते, जो बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक जीवन के उतार-चढ़ावों में मुझे छुड़ाने, बचाए रखने, और सँभाले रखने के लिए मुझ पर हैं। उसके प्रति मेरे प्रेम की शीतलता, जिसने पहले मुझसे प्रेम किया और मेरे लिए इतना कुछ किया, ने मुझे अभिभूत और व्याकुल कर दिया; और मेरे अयोग्य चरित्र को पूरा करने के लिए, मैंने न केवल अपने कर्तव्य और विशेषाधिकार की सीमा तक दिए गए अनुग्रह का सदुपयोग करने में उपेक्षा की थी, वरन् सदुपयोग के अभाव में, उलझनभरी चिन्ता और परिश्रम में डूबे रहते हुए, अपने पहले उत्साह और प्रेम से गिर गया था। मैं विस्मित हुआ, मैंने स्वयं को दीन किया, दया की भीख माँगी, और अपनी वाचा को नया किया कि मैं परिश्रम करूँ और स्वयं को बिना किसी आरक्षण के प्रभु को समर्पित कर दूँ।—बिशप मकेन्ड्री
जो प्रचार मार डालता है वह शुद्ध-सिद्धान्ती हो सकता है, और प्रायः होता भी है—सिद्धान्ततः, अनुल्लंघनीय रूप से शुद्ध-सिद्धान्ती। हम सिद्धान्त की शुद्धता से प्रेम करते हैं। वह अच्छी है। वह सर्वोत्तम है। वह परमेश्वर के वचन की स्वच्छ, सुस्पष्ट शिक्षा है, वह विजय-चिह्न है जो सत्य ने भ्रान्ति के साथ अपने संघर्ष में जीते हैं, वे बाँध हैं जिन्हें विश्वास ने ईमानदार या लापरवाह मिथ्या-विश्वास अथवा अविश्वास की उजाड़ करनेवाली बाढ़ों के विरुद्ध खड़ा किया है; परन्तु सिद्धान्त की शुद्धता, स्फटिक के समान स्वच्छ और कठोर, शंकालु और लड़ाकू, मात्र वह अक्षर हो सकती है जो भली-भाँति गढ़ा, भली-भाँति नामांकित, और भली-भाँति सीखा गया हो—वह अक्षर जो मार डालता है। मरी हुई सिद्धान्त-शुद्धता के समान मरा हुआ और कुछ नहीं—इतनी मरी हुई कि विचार-विमर्श न कर सके, इतनी मरी हुई कि सोच न सके, अध्ययन न कर सके, या प्रार्थना न कर सके।
जो प्रचार मार डालता है उसमें अन्तर्दृष्टि और सिद्धान्तों की पकड़ हो सकती है, वह विद्वत्तापूर्ण और आलोचनात्मक रुचि का हो सकता है, उसमें अक्षर की व्युत्पत्ति और व्याकरण की हर सूक्ष्मता हो सकती है, वह अक्षर को उसके पूर्ण साँचे में काट-छाँटकर बैठा सकता है, और उसे वैसे ही प्रकाशमान कर सकता है जैसे प्लेटो और सिसरो प्रकाशमान किए जाते हैं, वह उसका अध्ययन वैसे कर सकता है जैसे कोई वकील अपनी दलील गढ़ने या अपने मुकदमे की पैरवी करने के लिए अपनी पाठ्यपुस्तकों का अध्ययन करता है, और फिर भी पाले के समान, एक मार डालनेवाले पाले के समान हो। अक्षर-प्रचार वाक्पटु हो सकता है, कविता और अलंकार से मढ़ा हुआ, प्रार्थना से छिड़का हुआ और सनसनी से चटपटा किया हुआ, प्रतिभा से प्रकाशित—और फिर भी ये मात्र भारी या सादे, बहुमूल्य जड़ाव हों, वे दुर्लभ और सुन्दर फूल हों जो लाश के ताबूत को सजाते हैं। जो प्रचार मार डालता है वह विद्वत्ता से रहित हो सकता है, विचार या भावना की किसी ताज़गी से अछूता, नीरस सामान्य बातों या फीकी विशेषताओं में लिपटा हुआ, जिसकी शैली अनियमित और फूहड़ हो, जिसमें न तो प्रार्थना-कक्ष की सुगन्ध हो और न अध्ययन-कक्ष की, जो न विचार से, न अभिव्यक्ति से, न प्रार्थना से सुशोभित हो। ऐसे प्रचार के अधीन उजाड़ कितना व्यापक और पूर्ण होता है! आत्मिक मृत्यु कितनी गहरी!
यह अक्षर-प्रचार वस्तुओं की सतह और छाया से निपटता है, न कि स्वयं वस्तुओं से। यह भीतरी भाग में प्रवेश नहीं करता। इसमें परमेश्वर के वचन के गुप्त जीवन की न कोई गहरी अन्तर्दृष्टि है, न कोई सुदृढ़ पकड़। यह बाहरी रूप के प्रति सच्चा है, परन्तु बाहरी रूप वह छिलका है जिसे गिरी के लिए तोड़ना और भेदना अनिवार्य है। अक्षर को इस प्रकार सजाया जा सकता है कि वह आकर्षित करे और फ़ैशनेबल लगे, परन्तु वह आकर्षण परमेश्वर की ओर नहीं है और न वह ठाट-बाट स्वर्ग के लिए है। चूक प्रचारक में है। परमेश्वर ने उसे नहीं गढ़ा। वह कभी परमेश्वर के हाथों में वैसे नहीं रहा जैसे कुम्हार के हाथ में मिट्टी। वह उपदेश में व्यस्त रहा है—उसके विचार और परिष्कार में, उसके आकर्षक और प्रभावशाली बलों में; परन्तु परमेश्वर की गहरी बातों को उसने कभी न खोजा, न उनका अध्ययन किया, न उन्हें थाहा, न उन्हें अनुभव किया। वह कभी “बहुत ही ऊँचे सिंहासन” के सामने खड़ा नहीं हुआ, कभी सारापों का गीत नहीं सुना, कभी वह दर्शन नहीं देखा और न उस भयानक पवित्रता के प्रवाह को अनुभव किया, और न दुर्बलता तथा अपराध-बोध के भार तले पूर्ण आत्म-त्याग और निराशा में चिल्ला उठा, और न उसका जीवन नया किया गया, न उसका हृदय परमेश्वर की वेदी के जलते हुए अंगारे से छुआ, शुद्ध किया, और प्रज्वलित किया गया। उसकी सेवकाई लोगों को उसकी ओर, कलीसिया की ओर, रूप और कर्मकाण्ड की ओर खींच सकती है; परन्तु परमेश्वर की ओर कोई सच्चा खिंचाव नहीं, कोई मधुर, पवित्र, ईश्वरीय संगति उत्पन्न नहीं होती। कलीसिया को अलंकृत तो किया गया परन्तु उसकी उन्नति नहीं हुई, प्रसन्न तो किया गया परन्तु पवित्र नहीं किया गया। जीवन दबा दिया गया है; ग्रीष्म की वायु पर ठिठुरन छा गई है; भूमि तपकर सूख गई है। हमारे परमेश्वर की नगरी मुर्दों की नगरी बन जाती है; कलीसिया एक कब्रिस्तान बन जाती है, न कि युद्ध के लिए तैयार सेना। स्तुति और प्रार्थना का गला घोंट दिया जाता है; आराधना मर चुकी है। प्रचारक और प्रचार ने पाप की सहायता की है, पवित्रता की नहीं; नरक को बसाया है, स्वर्ग को नहीं।
जो प्रचार मार डालता है वह प्रार्थनाहीन प्रचार है। प्रार्थना के बिना प्रचारक मृत्यु उत्पन्न करता है, जीवन नहीं। जो प्रचारक प्रार्थना में निर्बल है वह जीवनदायी शक्तियों में निर्बल है। जिस प्रचारक ने प्रार्थना को अपने चरित्र के एक प्रमुख और अधिकांशतः व्याप्त तत्त्व के रूप में सेवानिवृत्त कर दिया है, उसने अपने प्रचार को उसकी विशिष्ट जीवनदायी सामर्थ्य से वंचित कर दिया है। पेशेवर प्रार्थना है और रहेगी, परन्तु पेशेवर प्रार्थना प्रचार को उसके घातक कार्य में सहायता देती है। पेशेवर प्रार्थना प्रचार और प्रार्थना दोनों को ठिठुरा देती और मार डालती है। मण्डली की प्रार्थना में जो शिथिल भक्ति और आलसी, अनादरपूर्ण मनोवृत्तियाँ पाई जाती हैं, उनमें से अधिकांश का कारण मंच पर की जानेवाली पेशेवर प्रार्थना है। बहुत से मंचों की प्रार्थनाएँ लम्बी, बिखरी हुई, नीरस, और निरर्थक होती हैं। अभिषेक या हृदय से रहित, वे आराधना के सारे अनुग्रहों पर एक मार डालनेवाले पाले के समान गिरती हैं। वे मृत्यु बाँटनेवाली प्रार्थनाएँ हैं। उनकी साँस के नीचे भक्ति का हर चिह्न नष्ट हो चुका है। वे जितनी अधिक मरी हुई होती हैं, उतनी ही लम्बी होती जाती हैं। मंच पर छोटी प्रार्थना, जीवित प्रार्थना, सच्ची हार्दिक प्रार्थना, पवित्र आत्मा के द्वारा की जानेवाली प्रार्थना—प्रत्यक्ष, निश्चित, उत्कट, सरल, अभिषेक से भरी—के लिए एक निवेदन उचित है। प्रचारकों को यह सिखाने के लिए एक पाठशाला कि प्रार्थना कैसे की जाए—जैसे परमेश्वर प्रार्थना को गिनता है—सच्ची भक्ति, सच्ची आराधना, और सच्चे प्रचार के लिए समस्त धर्मविज्ञान की पाठशालाओं से कहीं अधिक लाभदायक होगी।
रुको! ठहरो! विचार करो! हम कहाँ हैं? हम क्या कर रहे हैं? मार डालने के लिए प्रचार? मार डालने के लिए प्रार्थना? परमेश्वर से प्रार्थना! उस महान परमेश्वर से, समस्त लोकों के रचयिता, समस्त मनुष्यों के न्यायी से! कैसी श्रद्धा! कैसी सरलता! कैसी निष्कपटता! भीतरी भागों में कैसी सच्चाई की माँग की जाती है! हमें कितना वास्तविक होना चाहिए! कितना हार्दिक! परमेश्वर से प्रार्थना—सबसे श्रेष्ठ अभ्यास, मनुष्य का सबसे उदात्त प्रयास, सबसे वास्तविक वस्तु! क्या हम उस शापित प्रचार को जो मार डालता है और उस प्रार्थना को जो मार डालती है, सदा के लिए त्याग न दें, और वह वास्तविक कार्य, वह सर्वशक्तिशाली कार्य न करें—प्रार्थनामय प्रार्थना, जीवन रचनेवाला प्रचार—और स्वर्ग तथा पृथ्वी पर सबसे प्रबल बल लगाएँ और मनुष्य की आवश्यकता और कंगाली के लिए परमेश्वर के अक्षय और खुले भण्डार पर से लें?
अध्याय 3 पूरा हुआ
अक्षर मारता है