अध्याय 2 · 6 मिनट का पठन
हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है
परन्तु सबसे बढ़कर वह प्रार्थना में उत्कृष्ट था। उसकी आत्मा की आंतरिकता और गम्भीरता, उसके संबोधन और आचरण की श्रद्धा और गम्भीरता, और उसके शब्दों की अल्पता और परिपूर्णता ने अक्सर अजनबियों को भी विस्मय से भर दिया, जैसे वे दूसरों तक सांत्वना पहुँचाते थे। सबसे विस्मयकारी, जीवंत, श्रद्धेय अवस्था जो मैंने कभी अनुभव की या देखी, मुझे कहना ही होगा, वह उसकी प्रार्थना थी। और सचमुच वह एक गवाही थी। वह प्रभु को औरों से अधिक जानता था और उसके निकट रहता था, क्योंकि जो उसे सबसे अधिक जानते हैं वे उसके पास श्रद्धा और भय के साथ आने का सबसे अधिक कारण देखेंगे।—जॉर्ज फॉक्स के विषय में विलियम पेन
सबसे मधुर अनुग्रह भी थोड़े से विकार से सबसे कड़वा फल ला सकते हैं। सूर्य जीवन देता है, परन्तु लू लगना मृत्यु है। प्रचार जीवन देने के लिए है; वह मार भी सकता है। प्रचारक के हाथ में कुंजियाँ हैं; वह खोल भी सकता है और बंद भी कर सकता है। प्रचार आत्मिक जीवन को बोने और परिपक्व करने के लिए परमेश्वर की महान संस्था है। जब इसे उचित रीति से किया जाए, तो इसके लाभ अनगिनत हैं; जब इसे गलत रीति से किया जाए, तो कोई भी बुराई इसके हानिकारक परिणामों से बढ़कर नहीं। यदि चरवाहा असावधान हो या चरागाह उजाड़ दी जाए तो झुंड को नष्ट करना सहज है, यदि पहरुए सो रहे हों या भोजन और पानी में विष मिला दिया जाए तो गढ़ को अधिकार में लेना सहज है। ऐसे अनुग्रहमय विशेषाधिकारों से सुसज्जित, इतनी बड़ी बुराइयों के सामने उजागर, इतनी सारी गम्भीर जिम्मेदारियों से जुड़ी हुई इस सेवा को देखते हुए, यह शैतान की धूर्तता का उपहास और उसके चरित्र और प्रतिष्ठा पर कलंक होता यदि वह प्रचारक और प्रचार को भ्रष्ट करने के लिए अपने प्रमुख प्रभावों को न लगाता। इस सब के सामने, पौलुस का विस्मयपूर्ण प्रश्न, “इन बातों के योग्य कौन है?” कभी अनुचित नहीं है।
पौलुस कहता है: “हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है। जिसने हमें नई वाचा के सेवक होने के योग्य भी किया, शब्द के सेवक नहीं वरन् आत्मा के; क्योंकि शब्द मारता है, पर आत्मा जिलाता है।” सच्ची सेवकाई परमेश्वर के स्पर्श से, परमेश्वर के सामर्थ्य से, और परमेश्वर के हाथों गढ़ी हुई है। परमेश्वर का आत्मा अभिषेक के सामर्थ्य में प्रचारक पर है, आत्मा का फल उसके हृदय में है, परमेश्वर के आत्मा ने उस मनुष्य को और वचन को सजीव किया है; उसका प्रचार जीवन देता है, जीवन ऐसे देता है जैसे बसंत जीवन देता है; जीवन ऐसे देता है जैसे पुनरुत्थान जीवन देता है; उत्कट जीवन ऐसे देता है जैसे ग्रीष्म ऋतु उत्कट जीवन देती है; फलदायी जीवन ऐसे देता है जैसे शरद ऋतु फलदायी जीवन देती है। जीवन देने वाला प्रचारक परमेश्वर का जन है, जिसका हृदय सदा परमेश्वर के लिए प्यासा रहता है, जिसकी आत्मा सदा परमेश्वर के पीछे तन-मन से लगी रहती है, जिसकी आँख केवल परमेश्वर पर टिकी है, और जिसमें परमेश्वर के आत्मा के सामर्थ्य से शरीर और संसार क्रूस पर चढ़ाए जा चुके हैं और जिसकी सेवकाई जीवनदायी नदी की उदार बाढ़ के समान है।
जो प्रचार मारता है वह अनात्मिक प्रचार है। प्रचार की सामर्थ्य परमेश्वर से नहीं है। परमेश्वर से निम्न स्रोतों ने इसे ऊर्जा और उत्तेजना दी है। न प्रचारक में और न उसके प्रचार में आत्मा प्रकट है। जो प्रचार मारता है उसके द्वारा अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्रक्षेपित और उत्तेजित की जा सकती हैं, परन्तु वे आत्मिक शक्तियाँ नहीं हैं। वे आत्मिक शक्तियों के समान दिख सकती हैं, परन्तु वे केवल छाया हैं, नकली हैं; ऐसा लग सकता है कि उनमें जीवन है, परन्तु वह जीवन चुम्बकित किया हुआ है। जो प्रचार मारता है वह अक्षर है; भले ही वह सुडौल और व्यवस्थित हो, फिर भी वह अक्षर ही है, वह सूखा, भूसी जैसा अक्षर, वह खाली, नंगा छिलका। अक्षर में जीवन का अंकुर हो सकता है, परन्तु उसे जगाने के लिए उसमें बसंत की कोई साँस नहीं; वे शीतकाल के बीज हैं, शीतकाल की मिट्टी के समान कठोर, शीतकाल की हवा के समान बर्फीले, न उनसे कुछ पिघलता है न अंकुरित होता है। इस अक्षर-प्रचार में सत्य है। परन्तु दैवीय सत्य में भी अकेले जीवनदायी ऊर्जा नहीं होती; उसे आत्मा के द्वारा सशक्त किया जाना चाहिए, जिसके पीछे परमेश्वर की समस्त शक्तियाँ हों। जो सत्य परमेश्वर के आत्मा से जिलाया नहीं गया, वह भूल जितना, या उससे भी अधिक, मृत कर देता है। भले ही वह बिना मिलावट का सत्य हो; परन्तु आत्मा के बिना उसकी छाया और स्पर्श घातक हैं, उसका सत्य भूल है, उसका प्रकाश अंधकार है। अक्षर-प्रचार अभिषेकहीन है, न आत्मा से कोमल किया गया, न सींचा गया। आँसू हो सकते हैं, परन्तु आँसू परमेश्वर की मशीनरी नहीं चला सकते; आँसू तो बर्फ से ढके हिमशैल पर ग्रीष्म की साँस मात्र हो सकते हैं, सतह की कीचड़युक्त बर्फ के सिवा कुछ नहीं। भावनाएँ और गम्भीरता हो सकती हैं, परन्तु वह अभिनेता की भावना और वकील की गम्भीरता है। प्रचारक अपनी ही चिंगारियों के सुलगने से अनुभव कर सकता है, अपनी ही व्याख्या पर वाक्पटु हो सकता है, अपने ही मस्तिष्क की उपज को प्रस्तुत करने में गम्भीर हो सकता है; प्राध्यापक प्रेरित के स्थान को हड़प सकता है और उसकी आग की नकल कर सकता है; मस्तिष्क और नसें उस स्थान की पूर्ति कर सकते हैं और परमेश्वर के आत्मा के काम का ढोंग कर सकते हैं, और इन शक्तियों से अक्षर किसी प्रकाशित पाठ के समान दमक और चमक सकता है, परन्तु वह दमक और चमक जीवन से उतनी ही वंचित होगी जितना मोतियों से बोया गया खेत। मृत्यु देने वाला तत्व शब्दों के पीछे, उपदेश के पीछे, अवसर के पीछे, ढंग के पीछे, क्रिया के पीछे छिपा रहता है। सबसे बड़ी बाधा स्वयं प्रचारक में है। उसके भीतर जीवन उत्पन्न करने वाली सामर्थी शक्तियाँ नहीं हैं। उसकी सुधर्मिता, ईमानदारी, स्वच्छता, या गम्भीरता में कोई कमी न हो; परन्तु किसी न किसी रीति से वह मनुष्य, भीतरी मनुष्य, अपने गुप्त स्थानों में कभी टूटा और परमेश्वर के सामने समर्पित नहीं हुआ, उसका भीतरी जीवन परमेश्वर के संदेश, परमेश्वर के सामर्थ्य के संचार के लिए एक महान राजमार्ग नहीं है। किसी न किसी रीति से परम पवित्र स्थान में परमेश्वर नहीं, वरन् स्वयं राज्य करता है। कहीं न कहीं, स्वयं उसे बिना जाने, किसी आत्मिक कुचालक ने उसके भीतरी अस्तित्व को छू लिया है, और दैवीय धारा रुक गई है। उसके भीतरी अस्तित्व ने अपनी पूर्ण आत्मिक दिवालियेपन, अपनी नितांत असामर्थ्य को कभी अनुभव नहीं किया; उसने कभी आत्म-निराशा और आत्म-असहायता की अवर्णनीय पुकार के साथ पुकारना नहीं सीखा, जब तक कि परमेश्वर की सामर्थ्य और परमेश्वर की आग भीतर आकर भर न दे, शुद्ध न कर दे, सशक्त न कर दे। आत्म-सम्मान, आत्म-सामर्थ्य ने किसी न किसी हानिकारक रूप में उस मंदिर को कलंकित और अपवित्र कर दिया है जिसे परमेश्वर के लिए पवित्र रखा जाना चाहिए। जीवन देने वाला प्रचार प्रचारक को बहुत महँगा पड़ता है—स्वयं के लिए मृत्यु, संसार के लिए क्रूस, उसकी अपनी आत्मा की पीड़ा। केवल क्रूस पर चढ़ा हुआ प्रचार ही जीवन दे सकता है। क्रूस पर चढ़ा हुआ प्रचार केवल क्रूस पर चढ़े हुए मनुष्य से ही आ सकता है।
अध्याय 2 पूरा हुआ
हमारी योग्यता परमेश्वर की ओर से है