प्रार्थना के द्वारा सामर्थ्य
प्रचारकों को लोगों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता है

अध्याय 18 · 8 मिनट का पठन

प्रचारकों को लोगों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता है

यदि कुछ मसीही जो अपने सेवकों के विषय में शिकायत करते रहे हैं, मनुष्यों के सामने कम कहते और कम करते, और अपनी सारी शक्ति लगाकर अपने सेवकों के लिये परमेश्वर के सामने पुकारते—मानो उठकर, उनके लिये अपनी दीन, उत्कट और निरन्तर प्रार्थनाओं से स्वर्ग पर धावा बोल देते—तो वे सफलता के मार्ग में कहीं अधिक होते।—जोनाथन एडवर्ड्स

किसी न किसी कारण से, विशेष रूप से प्रचारक के लिये प्रार्थना करने की प्रथा लुप्त हो गई है या तुच्छ समझी जाने लगी है। कभी-कभी हमने इस प्रथा पर यह दोष लगते सुना है कि यह सेवकाई का अपमान है, मानो जो ऐसा करते हैं वे सार्वजनिक रूप से सेवकाई की निष्फलता की घोषणा कर रहे हों। सम्भवतः यह विद्या और आत्मनिर्भरता के अभिमान को ठेस पहुँचाती है; और ऐसी सेवकाई में, जो इतनी कर्तव्यहीन है कि इन्हें पनपने देती है, इनका ठेस पाना और डाँटा जाना ही उचित है।

प्रचारक के लिये प्रार्थना केवल उसके पेशे का कर्तव्य या कोई सुविधा नहीं, वरन् एक अनिवार्यता है। फेफड़ों के लिये वायु भी उतनी आवश्यक नहीं जितनी प्रचारक के लिये प्रार्थना। प्रचारक का प्रार्थना करना नितान्त आवश्यक है। और यह भी नितान्त आवश्यक है कि प्रचारक के लिये प्रार्थना की जाए। ये दो बातें ऐसे बन्धन में बँधी हैं जिसका कभी विच्छेद न हो: प्रचारक को प्रार्थना करनी ही चाहिए; प्रचारक के लिये प्रार्थना की ही जानी चाहिए। अपने इस महान कार्य के भयावह उत्तरदायित्वों को पूरा करने और सबसे बड़ी, सबसे सच्ची सफलता पाने के लिये उसे उतनी सारी प्रार्थना चाहिए जितनी वह स्वयं कर सकता है, और उतनी सारी भी जितनी वह दूसरों से करवा सकता है। सच्चा प्रचारक, अपने भीतर प्रार्थना की आत्मा और वास्तविकता को उसके सबसे प्रबल रूप में विकसित करने के पश्चात्, परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं का बड़ी लालसा से लोभ करता है।

मनुष्य जितना अधिक पवित्र होता है, उतना ही अधिक वह प्रार्थना का मोल जानता है; उतना ही स्पष्ट वह देखता है कि परमेश्वर स्वयं को प्रार्थना करनेवालों को सौंप देता है, और आत्मा के प्रति परमेश्वर के प्रकाशन की माप वही है जो परमेश्वर के लिये आत्मा की तड़प और आग्रहपूर्ण प्रार्थना की माप है। उद्धार कभी किसी प्रार्थनाहीन हृदय तक अपना मार्ग नहीं पाता। पवित्र आत्मा कभी किसी प्रार्थनाहीन आत्मा में बना नहीं रहता। प्रचार कभी किसी प्रार्थनाहीन प्राण की उन्नति नहीं करता। मसीह प्रार्थनाहीन मसीहियों को नहीं जानता। सुसमाचार किसी प्रार्थनाहीन प्रचारक के द्वारा आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। वरदान, योग्यताएँ, शिक्षा, वाक्पटुता, परमेश्वर की बुलाहट—ये प्रार्थना की माँग को घटा नहीं सकते, वरन् केवल प्रचारक के प्रार्थना करने और उसके लिये प्रार्थना किए जाने की अनिवार्यता को और तीव्र कर देते हैं। ज्यों-ज्यों प्रचारक की आँखें अपने कार्य की प्रकृति, उत्तरदायित्व और कठिनाइयों के प्रति खुलती हैं, त्यों-त्यों वह और अधिक देखेगा, और यदि वह सच्चा प्रचारक है तो और अधिक अनुभव करेगा, कि प्रार्थना कितनी आवश्यक है; केवल स्वयं प्रार्थना करने की बढ़ती माँग ही नहीं, वरन् दूसरों को भी पुकारने की कि वे अपनी प्रार्थनाओं से उसकी सहायता करें।

पौलुस इसका एक दृष्टान्त है। यदि कोई मनुष्य व्यक्तिगत बल के जोर से, बुद्धि की सामर्थ्य से, संस्कृति से, व्यक्तिगत अनुग्रह से, परमेश्वर की प्रेरितीय नियुक्ति से, परमेश्वर की असाधारण बुलाहट से सुसमाचार को आगे बढ़ा सकता था, तो वह मनुष्य पौलुस था। कि प्रचारक को प्रार्थना में लगा रहनेवाला मनुष्य होना ही चाहिए, इसका पौलुस एक श्रेष्ठ उदाहरण है। और कि सच्चे प्रेरितीय प्रचारक को अपनी सेवकाई को सफलता का पूरा अंश देने के लिये अन्य भले लोगों की प्रार्थनाओं की आवश्यकता है, इसका पौलुस सर्वोपरि उदाहरण है। वह परमेश्वर के सब सन्तों की सहायता माँगता है, उसका लोभ करता है, और उसके लिये उत्कट भाव से गिड़गिड़ाता है। वह जानता था कि आत्मिक क्षेत्र में भी, अन्य स्थानों के समान, एकता में सामर्थ्य है; कि विश्वास, अभिलाषा और प्रार्थना के संकेन्द्रण और संचय से आत्मिक बल का परिमाण तब तक बढ़ता जाता है जब तक वह अपनी सामर्थ्य में प्रबल और अजेय न हो जाए। प्रार्थना की इकाइयाँ मिलकर, जल की बूँदों के समान, एक ऐसा महासागर बना देती हैं जो हर प्रतिरोध को ठुकरा देता है। इसलिये पौलुस ने, आत्मिक शक्तियों की अपनी स्पष्ट और पूरी समझ के साथ, यह ठान लिया कि वह प्रार्थना की सब बिखरी हुई इकाइयों को इकट्ठा करके और उन्हें अपनी सेवकाई पर उँडेलकर, अपनी सेवकाई को महासागर के समान प्रभावशाली, अनन्त और अजेय बना दे। क्या पौलुस की परिश्रम और परिणामों में, तथा कलीसिया और संसार पर उसकी छाप में जो श्रेष्ठता थी, उसका समाधान इसी बात में न मिलेगा कि वह औरों की अपेक्षा अधिक प्रार्थना को अपने ऊपर और अपनी सेवकाई पर केन्द्रित कर सका? रोम के अपने भाइयों को उसने लिखा: “और हे भाइयों; मैं यीशु मसीह का जो हमारा प्रभु है और पवित्र आत्मा के प्रेम का स्मरण दिलाकर, तुम से विनती करता हूँ, कि मेरे लिये परमेश्वर से प्रार्थना करने में मेरे साथ मिलकर लौलीन रहो।” इफिसियों से वह कहता है: “और हर समय और हर प्रकार से आत्मा में प्रार्थना, और विनती करते रहो, और जागते रहो कि सब पवित्र लोगों के लिये लगातार विनती किया करो, और मेरे लिये भी कि मुझे बोलने के समय ऐसा प्रबल वचन दिया जाए कि मैं साहस से सुसमाचार का भेद बता सकूँ।” कुलुस्सियों से वह बल देकर कहता है: “और इसके साथ ही साथ हमारे लिये भी प्रार्थना करते रहो, कि परमेश्वर हमारे लिये वचन सुनाने का ऐसा द्वार खोल दे, कि हम मसीह के उस भेद का वर्णन कर सकें जिसके कारण मैं कैद में हूँ। और उसे ऐसा प्रगट करूँ, जैसा मुझे करना उचित है।” थिस्सलुनीकियों से वह तीखे और दृढ़ स्वर में कहता है: “हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना करो।” पौलुस कुरिन्थ की कलीसिया को अपनी सहायता के लिये पुकारता है: “और तुम भी मिलकर प्रार्थना के द्वारा हमारी सहायता करोगे।” यह उनके काम का एक भाग था। उन्हें प्रार्थना का सहायक हाथ लगाना था। थिस्सलुनीकियों की कलीसिया को उनकी प्रार्थनाओं के महत्व और आवश्यकता के विषय में एक और अन्तिम आदेश देते हुए वह कहता है: “अन्त में, हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना किया करो, कि प्रभु का वचन ऐसा शीघ्र फैले, और महिमा पाए, जैसा तुम में हुआ। और हम टेढ़े और दुष्ट मनुष्यों से बचे रहें।” वह फिलिप्पियों के मन में यह बात बैठाता है कि उसके सारे क्लेश और विरोध उनकी प्रार्थनाओं की प्रभावशीलता के द्वारा सुसमाचार के प्रसार के अधीन किए जा सकते हैं। फिलेमोन को उसके लिये ठहरने का स्थान तैयार करना था, क्योंकि फिलेमोन की प्रार्थना के द्वारा पौलुस उसका अतिथि होने को था।

इस विषय पर पौलुस का रवैया उसकी दीनता और उन आत्मिक शक्तियों में उसकी गहरी अन्तर्दृष्टि को प्रकट करता है जो सुसमाचार को आगे बढ़ाती हैं। इससे भी बढ़कर, यह सब समयों के लिये एक शिक्षा देता है, कि यदि पौलुस अपनी सेवकाई को सफल बनाने के लिये परमेश्वर के सन्तों की प्रार्थनाओं पर इतना निर्भर था, तो यह कितनी बड़ी आवश्यकता है कि परमेश्वर के सन्तों की प्रार्थनाएँ आज की सेवकाई पर केन्द्रित हों!

पौलुस को यह नहीं लगा कि प्रार्थना के लिये यह आग्रहपूर्ण विनती उसकी प्रतिष्ठा को घटाएगी, उसके प्रभाव को कम करेगी, या उसकी भक्ति को तुच्छ ठहराएगी। और यदि ऐसा होता भी तो क्या? प्रतिष्ठा चली जाए, प्रभाव नष्ट हो जाए, उसकी ख्याति पर धब्बा लग जाए—उसे तो उनकी प्रार्थनाएँ चाहिए ही। यद्यपि वह बुलाया हुआ, नियुक्त किया हुआ, और प्रेरितों में प्रधान था, तौभी उसके लोगों की प्रार्थनाओं के बिना उसका सारा साज-सामान अधूरा था। उसने हर कहीं पत्र लिखे, और उन्हें अपने लिये प्रार्थना करने का आग्रह किया। क्या तुम अपने प्रचारक के लिये प्रार्थना करते हो? क्या तुम एकान्त में उसके लिये प्रार्थना करते हो? सार्वजनिक प्रार्थनाओं का बहुत कम मोल है, जब तक कि वे गुप्त प्रार्थना पर आधारित न हों या उसके पीछे न चलें। प्रार्थना करनेवाले प्रचारक के लिये वैसे ही हैं जैसे हारून और हूर मूसा के लिये थे। वे उसके हाथ थामे रखते हैं और उस संघर्ष का परिणाम निश्चित करते हैं जो उनके चारों ओर इतनी उग्रता से मचा हुआ है।

प्रेरितों की विनती और उद्देश्य यही था कि कलीसिया को प्रार्थना में लगा दें। उन्होंने आनन्द से देने के अनुग्रह की उपेक्षा नहीं की। वे इस बात से अनजान न थे कि आत्मिक जीवन में धार्मिक क्रियाकलाप और कार्य का क्या स्थान है; परन्तु प्रेरितीय आँकलन या आग्रह में इनमें से न कोई एक, न ही ये सब मिलकर, आवश्यकता और महत्व में प्रार्थना की तुलना में कहीं भी ठहर सकते थे। प्रार्थना के इस परम-महत्वपूर्ण दायित्व और आवश्यकता पर बल देने के लिये सबसे पवित्र और आग्रहपूर्ण विनतियाँ की गईं, सबसे उत्कट उपदेश दिए गए, और सबसे व्यापक तथा जगा देनेवाले वचन कहे गए।

“सन्तों को हर कहीं प्रार्थना में लगा दो”—यही प्रेरितीय प्रयास का भार और प्रेरितीय सफलता का मूल स्वर है। यीशु मसीह ने अपनी व्यक्तिगत सेवकाई के दिनों में यही करने का यत्न किया था। जब वह पृथ्वी के उन पके हुए खेतों को देखकर अनन्त करुणा से भर उठे जो मजदूरों के अभाव में नष्ट हो रहे थे, और अपनी ही प्रार्थना में रुककर—वह अपने चेलों की मूढ़ संवेदनाओं को प्रार्थना के कर्तव्य के प्रति जगाने का यत्न करते हैं, यह आज्ञा देते हुए: “फसल के स्वामी से विनती करो कि वह अपने खेत में काम करने के लिये मजदूर भेज दे।” “फिर उसने इसके विषय में कि नित्य प्रार्थना करना और साहस नहीं छोड़ना चाहिए उनसे यह दृष्टान्त कहा।”

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