प्रार्थना के द्वारा सामर्थ्य
प्रार्थना आत्मिक अगुवाई की पहचान है

अध्याय 17 · 7 मिनट का पठन

प्रार्थना आत्मिक अगुवाई की पहचान है

मुझे ऐसे सौ प्रचारक दे दो जो पाप के सिवा और किसी से न डरें और परमेश्वर के सिवा और किसी की अभिलाषा न रखें, तो मुझे इसकी रत्ती भर भी चिन्ता नहीं कि वे पादरी हों या साधारण जन; ऐसे ही लोग नरक के फाटकों को हिला देंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग का राज्य स्थापित करेंगे। परमेश्वर प्रार्थना के उत्तर के सिवा और कुछ नहीं करता।—जॉन वेस्ली

प्रेरित जानते थे कि उनकी सेवकाई के लिए प्रार्थना कितनी आवश्यक और अनमोल है। वे जानते थे कि प्रेरित होने का उनका ऊँचा अधिकार, उन्हें प्रार्थना की आवश्यकता से मुक्त करने के बजाय, और भी प्रबल आवश्यकता के कारण उन्हें उसके प्रति और अधिक बाँधता है; इसलिए वे अत्यन्त सतर्क थे कि कहीं कोई और महत्त्वपूर्ण काम उनका समय न खा जाए और उन्हें उस रीति से प्रार्थना करने से न रोके जैसे उन्हें करनी चाहिए; इसलिए उन्होंने कंगालों की सेवा के नाज़ुक और समय खा जाने वाले कर्तव्यों की देखरेख के लिए साधारण जनों को नियुक्त किया, ताकि वे (प्रेरित) निर्बाध होकर, “प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।” प्रार्थना को पहला स्थान दिया गया है, और प्रार्थना के साथ उनका सम्बन्ध सबसे प्रबल रूप में रखा गया है—“उसी में लगे रहना,” उसे अपना कार्य बना लेना, अपने आप को प्रार्थना के लिए समर्पित कर देना, उसमें उत्कटता, तात्कालिकता, धीरज और समय लगाना।

पवित्र, प्रेरितीय पुरुषों ने प्रार्थना के इस दिव्य कार्य के लिए स्वयं को कैसे समर्पित कर दिया! पौलुस कहता है, “रात दिन बहुत ही प्रार्थना करते रहते हैं।” “हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे रहेंगे”—यही प्रेरितीय समर्पण की एकमत साक्षी है। इन नए नियम के प्रचारकों ने परमेश्वर के लोगों के लिए प्रार्थना में स्वयं को कैसे उँडेल दिया! अपनी प्रार्थना के द्वारा उन्होंने परमेश्वर को अपनी कलीसियाओं में पूरी सामर्थ्य से कैसे बसा दिया! इन पवित्र प्रेरितों ने व्यर्थ ही यह नहीं समझ लिया कि परमेश्वर के वचन को विश्वासयोग्यता से सुनाकर उन्होंने अपने ऊँचे और गम्भीर कर्तव्य पूरे कर लिए, वरन् उनके प्रचार को उनकी प्रार्थना की उत्कटता और आग्रह ने ही टिकाऊ और प्रभावी बनाया। प्रेरितीय प्रार्थना उतनी ही थका देने वाली, श्रमसाध्य और अनिवार्य थी जितना प्रेरितीय प्रचार। उन्होंने अपने लोगों को विश्वास और पवित्रता की सर्वोच्च ऊँचाइयों तक पहुँचाने के लिए रात दिन सामर्थ्य से प्रार्थना की। और उन्हें इस ऊँची आत्मिक ऊँचाई पर थामे रखने के लिए उन्होंने और भी अधिक सामर्थ्य से प्रार्थना की। जिस प्रचारक ने मसीह की पाठशाला में अपने लोगों के लिए मध्यस्थता की ऊँची और दिव्य कला कभी नहीं सीखी, वह प्रचार की कला कभी नहीं सीखेगा, चाहे उपदेश-रचना का शास्त्र उसमें टनों में क्यों न उँडेल दिया जाए, और चाहे वह उपदेश गढ़ने और उपदेश देने में सबसे प्रतिभाशाली प्रतिभा क्यों न हो।

प्रेरितीय, सन्त-सदृश अगुओं की प्रार्थनाएँ उन लोगों को भी सन्त बनाने में बहुत कुछ करती हैं जो प्रेरित नहीं हैं। यदि बाद के वर्षों में कलीसिया के अगुए अपने लोगों के लिए उतनी ही सावधानी और उत्कटता से प्रार्थना करते जितनी प्रेरित करते थे, तो सांसारिकता और धर्मत्याग के वे दुखद, अंधकारमय समय न तो इतिहास को बिगाड़ते, न कलीसिया के तेज को धुँधला करते, और न उसकी उन्नति को रोकते। प्रेरितीय प्रार्थना प्रेरितीय सन्त बनाती है और कलीसिया में पवित्रता और सामर्थ्य के प्रेरितीय समय बनाए रखती है।

मनुष्यों के लिए मध्यस्थ बनने के लिए आत्मा की कैसी उच्चता, उद्देश्य की कैसी शुद्धता और उन्नति, कैसी निःस्वार्थता, कैसा आत्म-बलिदान, कैसा नितान्त परिश्रम, कैसी आत्मिक उत्कटता, कैसी दिव्य सूझबूझ आवश्यक है!

प्रचारक को अपने लोगों के लिए प्रार्थना में स्वयं को उँडेल देना है; इसलिए नहीं कि वे केवल उद्धार पाएँ, वरन् इसलिए कि वे सामर्थ्यपूर्वक उद्धार पाएँ। प्रेरितों ने प्रार्थना में स्वयं को इसलिए उँडेल दिया कि उनके सन्त सिद्ध हो जाएँ; इसलिए नहीं कि परमेश्वर की बातों में उनकी थोड़ी-सी रुचि हो, वरन् इसलिए कि वे “परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ।” पौलुस ने इस लक्ष्य को पाने के लिए अपने प्रेरितीय प्रचार पर भरोसा नहीं किया, वरन् “मैं इसी कारण उस पिता के सामने घुटने टेकता हूँ।” पौलुस की प्रार्थना पौलुस के चेलों को सन्तता के राजमार्ग पर पौलुस के प्रचार से कहीं आगे ले गई। इपफ्रास ने कुलुस्से के सन्तों के लिए अपने प्रचार से जितना किया, उतना ही या उससे अधिक प्रार्थना से किया। वह उनके लिए सदा प्रार्थना में उत्कटता से परिश्रम करता रहा कि “तुम सिद्ध होकर पूर्ण विश्वास के साथ परमेश्वर की इच्छा पर स्थिर रहो।”

प्रचारक सबसे बढ़कर परमेश्वर के अगुए हैं। कलीसिया की दशा के लिए मुख्य रूप से वे ही उत्तरदायी हैं। वे ही उसके चरित्र को गढ़ते हैं, उसके जीवन को सुर और दिशा देते हैं।

हर दृष्टि से बहुत कुछ इन अगुओं पर निर्भर करता है। वे ही समयों और संस्थाओं को गढ़ते हैं। कलीसिया दिव्य है, जो निधि वह अपने में समेटे है वह स्वर्गीय है, फिर भी उस पर मनुष्य की छाप है। यह निधि मिट्टी के बर्तनों में रखी है, और उसमें बर्तन की महक आती है। परमेश्वर की कलीसिया अपने अगुओं को गढ़ती है, या अपने अगुओं से गढ़ी जाती है। चाहे वह उन्हें गढ़े या उनसे गढ़ी जाए, वह वैसी ही होगी जैसे उसके अगुए हैं; आत्मिक, यदि वे आत्मिक हों, सांसारिक, यदि वे सांसारिक हों, मिली-जुली, यदि उसके अगुए वैसे हों। इस्राएल के राजाओं ने इस्राएल की भक्ति को चरित्र दिया। कोई कलीसिया बिरले ही अपने अगुओं के धर्म के विरुद्ध विद्रोह करती या उससे ऊपर उठती है। दृढ़ता से आत्मिक अगुए; पवित्र सामर्थ्य के पुरुष, जब अगुवाई में हों, तो परमेश्वर की कृपा के चिन्ह हैं; दुर्बल या सांसारिक अगुओं के पीछे विपत्ति और दुर्बलता चलती है। इस्राएल तब बहुत गिर गया था जब परमेश्वर ने लड़कों को उनके हाकिम और बच्चों को उन पर प्रभुता करने वाले कर दिया। भविष्यद्वक्ता कोई सुखद दशा की भविष्यवाणी नहीं करते जब बच्चे परमेश्वर के इस्राएल पर अंधेर करें और स्त्रियाँ उन पर प्रभुता करें। आत्मिक अगुवाई के समय कलीसिया के लिए महान आत्मिक समृद्धि के समय होते हैं।

प्रार्थना दृढ़ आत्मिक अगुवाई के प्रमुख लक्षणों में से एक है। सामर्थी प्रार्थना के पुरुष सामर्थ्य के पुरुष होते हैं और वस्तुओं को गढ़ते हैं। परमेश्वर के साथ उनकी सामर्थ्य विजयी चाल रखती है।

वह मनुष्य कैसे प्रचार कर सकता है जो एकान्त कोठरी में परमेश्वर से अपना सन्देश ताज़ा-ताज़ा नहीं पाता? वह कैसे प्रचार कर सकता है जब तक परमेश्वर के साथ एकान्त की संगति में उसका विश्वास सजीव, उसकी दृष्टि स्वच्छ, और उसका हृदय उष्ण न हुआ हो? हाय, उन मंच के होंठों पर जिन्हें इस कोठरी की ज्वाला ने छुआ तक नहीं। वे सदा सूखे और अभिषेकहीन रहेंगे, और ऐसे होंठों से दिव्य सत्य कभी सामर्थ्य के साथ नहीं निकलेंगे। जहाँ तक धर्म के वास्तविक हितों का प्रश्न है, कोठरी के बिना मंच सदा एक निष्फल वस्तु ही रहेगा।

कोई प्रचारक प्रार्थना के बिना पदीय, मनोरंजक, या विद्वत्तापूर्ण रीति से प्रचार कर सकता है, परन्तु इस प्रकार के प्रचार और पवित्र हाथों तथा प्रार्थनामय, रोते हुए हृदयों से परमेश्वर का अनमोल बीज बोने के बीच एक अपरिमेय दूरी है।

प्रार्थनाहीन सेवकाई परमेश्वर के समस्त सत्य और परमेश्वर की कलीसिया की अन्त्येष्टि करानेवाली है। उसके पास सबसे मूल्यवान ताबूत और सबसे सुन्दर फूल भले ही हों, फिर भी वह एक अन्त्येष्टि ही है, इस मोहक साज-सज्जा के बावजूद। प्रार्थनाहीन मसीही परमेश्वर के सत्य को कभी नहीं सीखेगा; प्रार्थनाहीन सेवकाई परमेश्वर के सत्य की शिक्षा कभी नहीं दे सकेगी। प्रार्थनाहीन कलीसिया ने सहस्राब्दी महिमा के युग खो दिए हैं। प्रार्थनाहीन कलीसिया ने हमारे प्रभु के आगमन को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया है। प्रार्थनाहीन कलीसिया की मृतप्राय सेवा को देखकर नरक ने अपने आप को बढ़ा लिया है और अपनी भयंकर गुफाओं को भर लिया है।

सबसे उत्तम, सबसे महान भेंट प्रार्थना की भेंट है। यदि बीसवीं सदी के प्रचारक प्रार्थना का पाठ भली भाँति सीख लें, और प्रार्थना की सामर्थ्य का पूरा-पूरा उपयोग करें, तो सदी के समाप्त होने से पहले ही सहस्राब्दी अपने दोपहर तक पहुँच जाएगी। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो” बीसवीं सदी के प्रचारकों के लिए तुरही का बुलावा है। यदि बीसवीं सदी अपने पाठ, अपने विचार, अपने वचन, अपने उपदेश अपनी कोठरियों में प्राप्त करे, तो अगली सदी एक नया आकाश और एक नई पृथ्वी पाएगी। पुराना, पाप से सना और पाप से ग्रहणग्रस्त आकाश और पृथ्वी प्रार्थनामय सेवकाई की सामर्थ्य के अधीन जाता रहेगा।

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