प्रार्थना के द्वारा सामर्थ्य
सिर से नहीं, हृदय से मिलने वाला अनुग्रह

अध्याय 13 · 4 मिनट का पठन

सिर से नहीं, हृदय से मिलने वाला अनुग्रह

एक निपुण प्रचारक बनने का यत्न मत करो। यरीहो के गढ़ मेढ़ों के नरसिंगों से ढहा दिए जाते हैं। प्रचार का आहार पाने के लिए केवल यीशु की ओर ताको; और जिसकी आवश्यकता होगी वह दिया जाएगा, और जो दिया जाएगा वह आशीषित होगा, चाहे वह जौ का एक दाना हो या गेहूँ की एक रोटी, एक टुकड़ा हो या एक कण। जैसा तुम्हारा हृदय होगा, वैसा ही तुम्हारा मुख या तो बहती हुई धारा होगा या बन्द किया हुआ सोता। प्रचार में, बातचीत में, या लेखन में—सब विवाद से बचो; शैतान के सिवा किसी को नीचा मत करो, और यीशु मसीह के सिवा किसी को ऊँचा मत करो।—बेरिज

हृदय ही संसार का उद्धारकर्ता है। मस्तिष्क उद्धार नहीं करते। प्रतिभा, बुद्धि, प्रखरता, बल, स्वाभाविक वरदान—ये उद्धार नहीं करते। सुसमाचार हृदयों में से होकर बहता है। सारी प्रबलतम शक्तियाँ हृदय की शक्तियाँ हैं। सबसे मधुर और सबसे मनोहर अनुग्रह हृदय के अनुग्रह हैं। बड़े हृदय बड़े चरित्र गढ़ते हैं; बड़े हृदय दिव्य चरित्र गढ़ते हैं। परमेश्वर प्रेम है। प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं, परमेश्वर से बढ़कर कुछ नहीं। हृदय ही स्वर्ग रचते हैं; स्वर्ग प्रेम है। स्वर्ग से ऊँचा कुछ नहीं, उससे मधुर कुछ नहीं। यह हृदय है, मस्तिष्क नहीं, जो परमेश्वर के महान प्रचारक बनाता है। धर्म में हृदय का हर प्रकार से बड़ा मोल है। हृदय को मंच से बोलना चाहिए। हृदय को श्रोता-आसन में सुनना चाहिए। सचमुच, हम परमेश्वर की सेवा अपने हृदय से करते हैं। मस्तिष्क की श्रद्धांजलि स्वर्ग में नहीं चलती।

हमारा विश्वास है कि आधुनिक मंच की एक गम्भीर और अत्यन्त प्रचलित भूल यह है कि वह अपने उपदेशों में प्रार्थना से अधिक विचार, और हृदय से अधिक मस्तिष्क रखता है। बड़े हृदय बड़े प्रचारक बनाते हैं; अच्छे हृदय अच्छे प्रचारक बनाते हैं। हृदय को बढ़ाने और सींचने के लिए एक धर्मविज्ञान का विद्यालय—यही सुसमाचार की स्वर्णिम आवश्यकता है। पासबान अपने लोगों को अपने हृदय से अपने साथ बाँधता है और अपने हृदय से ही उन पर शासन करता है। वे उसके वरदानों की प्रशंसा कर सकते हैं, वे उसकी योग्यता पर गर्व कर सकते हैं, वे कुछ समय के लिए उसके उपदेशों से प्रभावित हो सकते हैं; परन्तु उसकी सामर्थ्य का गढ़ उसका हृदय है। उसका राजदण्ड प्रेम है। उसकी सामर्थ्य का सिंहासन उसका हृदय है।

अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है। मस्तिष्क कभी शहीद नहीं बनाते। यह हृदय ही है जो प्राण को प्रेम और निष्ठा के लिए समर्पित कर देता है। एक विश्वासयोग्य पासबान होने के लिए बड़े साहस की आवश्यकता है, परन्तु यह साहस केवल हृदय ही दे सकता है। वरदान और प्रतिभा साहसी हो सकते हैं, परन्तु वह हृदय के वरदान और प्रतिभा होते हैं, मस्तिष्क के नहीं।

हृदय को तैयार करने की अपेक्षा मस्तिष्क को भरना सहज है। हृदय का उपदेश रचने की अपेक्षा मस्तिष्क का उपदेश रचना सहज है। यह हृदय ही था जिसने परमेश्वर के पुत्र को स्वर्ग से खींचा। यह हृदय ही है जो मनुष्यों को स्वर्ग की ओर खींचेगा। संसार को हृदयवाले पुरुष चाहिए—जो उसके दुःख के साथ सहानुभूति रखें, जो चूमकर उसके शोक दूर करें, जो उसकी दुर्दशा पर तरस खाएँ, और उसकी पीड़ा को शान्त करें। मसीह विशेष रूप से दुःखी पुरुष थे, क्योंकि वे सबसे बढ़कर हृदय के पुरुष थे।

“अपना मन मेरी ओर लगा,” यह परमेश्वर की मनुष्यों से माँग है। “अपना मन मेरी ओर लगा!” यह मनुष्य की मनुष्य से माँग है।

एक व्यावसायिक सेवकाई एक हृदयहीन सेवकाई है। जब सेवकाई में वेतन का बड़ा भाग होता है, तब हृदय का भाग थोड़ा ही होता है। हम प्रचार को अपना व्यवसाय बना सकते हैं, और उस व्यवसाय में अपना हृदय न लगाएँ। जो अपने प्रचार में स्वयं को आगे रखता है, वह हृदय को पीछे कर देता है। जो अपने अध्ययन-कक्ष में अपने हृदय से नहीं बोता, वह परमेश्वर के लिए कभी कटनी न काटेगा। कोठरी ही हृदय का अध्ययन-कक्ष है। वहाँ हम इस विषय में कि कैसे प्रचार करें और क्या प्रचार करें, अपने पुस्तकालयों की अपेक्षा कहीं अधिक सीखेंगे। “यीशु रोया।” बाइबल का सबसे छोटा और सबसे बड़ा पद है। वही है जो रोता हुआ (महान उपदेश देते हुए नहीं), बहुमूल्य बीज लिए हुए निकल पड़ता है, और वही जयजयकार करता हुआ फिर लौटेगा, अपनी पूलियाँ अपने साथ लिए हुए।

प्रार्थना समझ देती है, बुद्धि लाती है, मन को विस्तृत और सुदृढ़ करती है। कोठरी प्रचारक के लिए एक उत्तम गुरु और पाठशाला है। प्रार्थना में विचार केवल उजला और स्पष्ट ही नहीं होता, वरन प्रार्थना में ही विचार जन्म लेता है। जब हम सचमुच प्रार्थना करते हैं, तब एक घण्टे की प्रार्थना में हम अध्ययन के अनेक घण्टों की अपेक्षा अधिक सीख सकते हैं। कोठरी में ऐसी पुस्तकें हैं जो और कहीं न पाई जातीं और न पढ़ी जातीं। कोठरी में ऐसे प्रकाशन होते हैं जो और कहीं नहीं होते।

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