वह मेरा कल थामे हुए है ·सारा

अध्याय 11 · 9 मिनट का पठन

एआई अनुवाद — मातृभाषी समीक्षा बाकी

सारा

“विश्वास से सारा ने आप बूढ़ी होने पर भी गर्भ धारण करने की सामर्थ्य पाई; क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करनेवाले को सच्चा जाना था। इस कारण एक ही जन से जो मरा हुआ सा था, आकाश के तारों और समुद्र तट के रेत के समान, अनगिनत वंश उत्पन्न हुआ” (इब्रानियों 11:11-12)।

सारा का वृत्तान्त उत्पत्ति 18:9-15 और उत्पत्ति 21:1-7 में मिलता है।

जब हम उत्पत्ति का वृत्तान्त पढ़ते हैं, तब सारा में मानने की जो स्पष्ट कमी दिखाई देती है वह हमें चकित कर देती है, और यदि विश्वास को मानने के बराबर ठहराया जाए, तो हम उसे विश्वास की किसी महान वीरांगना के पद के योग्य कदापि न समझेंगे। सचमुच, सारा बार-बार अपना मानवीय स्वभाव प्रगट करती है, जब वह अपने पति के साथ योजनाएँ और युक्तियाँ रचती है।

परमेश्वर ने अब्राहम से कहा था कि उसका एक वारिस होगा और वह एक बड़ी जाति का पिता होगा, परन्तु सारा बाँझ है, और बुद्धि तो यही घोषित करेगी कि परमेश्वर की प्रतिज्ञा व्यर्थ है। तो भी, वह सन्तान पाकर ही रहेगी, चाहे इसके लिये उसे अपनी दासी हागार को अब्राहम की सहशय्या बनाना ही क्यों न पड़े। वह बालक सारा का ठहरना था, परन्तु जब वह हागार को उस लड़के के साथ देखती है, तब उसके हृदय में मानवीय डाह उठती है और हागार घर से निकाल दी जाती है।

इसी पुत्र इश्माएल से बड़ी अरब जातियाँ निकलनी थीं, और संसार आज तक उनका बवण्डर काटता आ रहा है। ध्यान दीजिए कि इन जातियों को स्वयं परमेश्वर ने ही खड़ा किया है, परन्तु उसकी वाचा प्रतिज्ञा की सन्तान के साथ बनी रहती है (उत्पत्ति 18:19)। अरब जातियों और इस्राएल की सन्तान के बीच चलती आ रही इस शत्रुता पर चकित मत होइए; शारीरिक मनुष्यता के फल और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के फल के बीच सदा विरोध रहेगा। उदाहरण के लिये, यीशु ने अपने चेलों से कहा कि वे अपने पिता की (एक और) प्रतिज्ञा के लिये यरूशलेम में ठहरे रहें, — पवित्र आत्मा का बपतिस्मा (प्रेरितों के काम 1:4,5)।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि इस प्रतिज्ञा का शारीरिक परिणाम प्रायः परमेश्वर के लोगों के बीच फूट और विरोध ही होता है, न कि वह बड़ी सामर्थ्य जो हमें वे गवाह बनने के योग्य करने के लिये होनी चाहिए जो बनने के लिये मसीह ने हमें बुलाया है!? इश्माएल मनुष्य की योजनाओं और युक्तियों से जन्मा, जबकि इसहाक ‘विश्वास से’ जन्मा। संसार के सारे धर्म शारीरिक चतुराई की शिक्षाओं और सिद्धान्तों पर स्थापित हैं, परन्तु यीशु मसीह की कलीसिया उन लोगों से बनी है जो विश्वास से धर्मी ठहराए गए हैं।

फिर हम सारा और अब्राहम को गरार के राजा अबीमेलेक के साथ यह ढोंग करके छल की युक्ति रचते हुए देखते हैं कि वे भाई-बहन हैं। अब्राहम को डर था कि कहीं गरारवासी उसे सारा का पति जानकर मार न डालें, ताकि अबीमेलेक उसे अपनी पत्नी बना ले। यदि राजा उन्हें भाई-बहन समझता, तो वह सारा को तब भी ले लेता, परन्तु कम से कम अब्राहम के प्राण तो बच जाते! क्या आपको यह ऐसे लोगों का वृत्तान्त लगता है जिनका परमेश्वर पर बड़ा विश्वास है?

अर्थात्, यदि विश्वास को भरोसे के बराबर ठहराया जाए। कितनी चौंका देनेवाली बात है कि उस अन्यजाति राजा अबीमेलेक में उस विश्वास के जन से अधिक मन की खराई और परमेश्वर का भय था! उसने सारा को उसके पति को लौटा दिया, उनके विवाह की पवित्रता को भंग किए बिना, और सब लोगों के सामने उनके निर्दोष ठहरने के प्रमाण के रूप में उन्हें बहुत-सी भेंटें दीं।

परमेश्वर ने अबीमेलेक और उसके घराने का आदर किया, परन्तु उसका हाथ तो अब भी अब्राहम और सारा पर ही था, कि उन्हें विश्वास के कामों में अगुवाई दे।

विश्वास से (जो परमेश्वर का कार्य अथवा दान है), सारा गर्भ धारण कर सकी।

यद्यपि वह 90 वर्ष से अधिक की थी, तो भी प्रतिज्ञा का बालक इसहाक जन्मा। पति-पत्नी सहवास में एक हुए और परमेश्वर ने शुक्राणु और अण्डाणु दोनों को जिला दिया, जिससे गर्भधारण हुआ। जब सारा ने यह मान लिया कि प्रातःकाल की मिचली परमेश्वर की सच्चाई का प्रमाण है, तब वही उसके विश्वास का प्रमाण था। उसके भीतर जो हो रहा था उसके विरुद्ध उसने संघर्ष नहीं किया, यद्यपि वह हर उस बात के विपरीत था जिसका अनुभव उसने, या उसके जाने-पहचाने किसी भी व्यक्ति ने, उस आयु में किया था। उसकी देह उसे न त्यागती, और न ही वह उसे गिरा देती जिसे परमेश्वर उसके भीतर जन्म दे रहा था।

हम प्रायः अपने जीवनों में पवित्र आत्मा के कार्यों को इसलिए ठुकरा देते हैं कि हम समझते नहीं! कितनी बार हम उस दान अथवा सेवकाई को गिरा देते हैं जिसे परमेश्वर हमारे भीतर जन्म देना चाहता है, इसलिए कि हम मोल चुकाने से डरते हैं!? सारा के साथ ऐसा नहीं था।

सारा के विश्वास से सीखने योग्य पाठ पहला, परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं का सच्चा है, तब भी जब वे असम्भव जान पड़ती हैं। सचमुच, उसके लिये कुछ भी असम्भव नहीं!

दूसरा, परमेश्वर ऐसे विश्वास के लोगों को ढूँढ़ रहा है जिनकी अगुवाई राजनीति या युक्तियाँ नहीं, वरन् वह स्वयं कर सके। आज की कलीसिया मनुष्य की योजनाओं और संगठन से इतनी भरी हुई है कि पवित्र आत्मा के चलने के लिये कोई स्थान ही नहीं रहा।

सारा ने एक पुत्र युक्ति रचकर उत्पन्न किया। उसका परिणाम तब से लेकर सदियों तक परमेश्वर के लोगों के लिये बड़ा शोक रहा है। उसका दूसरा पुत्र ‘विश्वास से’ था, प्रतिज्ञा का पुत्र। उसी से परमेश्वर ने अपनी वाचा के लोगों को स्थापित किया है, जिनके द्वारा पृथ्वी की सारी जातियाँ आशीष पाएँगी। वे ही वह जाति ठहरे जो हमारे पास बाइबल और मसीहा, हमारे उद्धारकर्ता यीशु को ले आई।

परमेश्वर का काम परमेश्वर की रीति से मुझे वह समय स्मरण आता है जब राजा दाऊद वाचा के सन्दूक को यरूशलेम लौटा लाना चाहता था। यह कथा हमारे लिये 1 इतिहास 13 और 15 में कही गई है। इब्रानियों के लिये सन्दूक अपने लोगों के बीच परमेश्वर की उपस्थिति का चिह्न था, परन्तु एली के शारीरिक याजकपद के दिनों में युद्ध में पलिश्तियों के द्वारा छीन लिए जाने के बाद वह 20 वर्ष तक देश से बाहर रहा था। सात महीने तक, जब तक सन्दूक उनके देश में रहा, पलिश्तियों ने बड़ा दुःख उठाया, इसलिए उन्होंने उसे एक नई गाड़ी पर रख दिया था जिसे ऐसी दुधार गायें खींचती थीं जो पहले कभी एक साथ जूए में जोती न गई थीं।

परमेश्वर ने उन्हें बिना किसी रोग या चोट के सन्दूक को इस्राएल की सीमाओं के भीतर सुरक्षित लौटा लाने दिया; परन्तु जब दाऊद ने ‘परमेश्वर की उपस्थिति’ को यरूशलेम लौटा लाने के लिये उसी रीति को काम में लाना चाहा, तब उसके सधे हुए बैलों ने ठोकर खाई, और उसका परिणाम मृत्यु हुआ।

दाऊद परमेश्वर पर बहुत क्रोधित हुआ, परन्तु जब उसने सन्दूक उठाने की परमेश्वर की रीति पढ़ी, जो गिनती 4 में लिखी है, तब उसे शीघ्र ही पश्चात्ताप करना पड़ा। परमेश्वर ने अपने लोगों पर दण्ड इसलिए भेजा था “क्योंकि हम उसकी खोज में नियम के अनुसार न लगे थे” (1 इतिहास 15:13)।

मेरा मत यह है कि जिसे हम कलीसिया कहते हैं उसके बहुत बड़े भाग से परमेश्वर की उपस्थिति और सामर्थ्य का अभिषेक खेद के साथ अनुपस्थित है।

क्या इसका कारण यह हो सकता है कि हम उसकी कलीसिया को अपनी रीति से बनाने का यत्न कर रहे हैं, न कि उस रीति से जो उसने ठहराई है? सचमुच, क्या ऐसा तो नहीं कि हम उसकी कलीसिया बना ही नहीं रहे, वरन् अपनी कलीसिया बना रहे हैं? उसने कभी यह प्रतिज्ञा नहीं की कि जो कुछ मनुष्य के बल या ज्ञान से किया जाए उस पर वह अपना अभिषेक रखेगा, परन्तु उसने यह कहा है, “मैं…अपनी कलीसिया बनाऊँगा, और अधोलोक के फाटक उस पर प्रबल न होंगे” (मत्ती 16:18)। इसके अतिरिक्त, वह अपनी कलीसिया उसी चट्टान पर बनाएगा, जिसका उदाहरण पतरस में दिखाई देता है! गुरु पतरस के किस लक्षण की ओर संकेत कर रहा है? निश्चय ही उसके उतावले, शारीरिक व्यवहार की ओर तो नहीं! मेरा कहना यह है कि वह चट्टान वही विश्वास है जिसे उस प्रेरित ने यीशु को मसीह अंगीकार करके प्रगट किया। “हे पतरस, तू धन्य है। मेरे पिता ने यह बात तुझ पर प्रगट की है” यीशु ने कहा (मत्ती 16:17)। विश्वास यहाँ प्रकाशन में, और उसके पीछे आनेवाले अंगीकार में दिखाई देता है; परमेश्वर की पहल, और उसके पीछे आनेवाला मनुष्य का उत्तर।

क्या अब वह समय नहीं आ गया कि हम परमेश्वर का काम परमेश्वर की रीति से करने को लौट आएँ?

अब समय आ गया है कि हम फिर से पुस्तक के लोग बनें, और अपने काम और अपनी चाल को उसी के सिद्धान्तों और नियमों पर रखें। मुझे निश्चय है कि जब हम परमेश्वर का काम परमेश्वर की रीति से करेंगे, तब हमें अपने परिश्रम पर उसके जिलानेवाले अभिषेक की प्राप्ति होगी। उदाहरण के लिये, अपने आस-पास के लोगों को सुसमाचार सुनाने के लिये हमारे पास बहुत-सी योजनाएँ और युक्तियाँ हैं। हम ‘चार आत्मिक नियम’ काम में लाते हैं, या ‘रोमियों का मार्ग।’ हम बेचनेवालों के समान क-ख-ग की युक्तियाँ सीखते हैं और ‘खोजी-अनुकूल सभाओं’ की योजना बनाते हैं। हम बहुत-से पर्चे लिखते हैं और सुसमाचार-प्रचार के कार्यक्रम रखते हैं। ये सब अच्छे हैं, परन्तु क्या ये परमेश्वर की रीति हैं?

मैं आपको यह चुनौती देता हूँ कि आप अपनी बाइबल में से एक ही ऐसा पन्ना निकालकर दिखाइए जिसे आप सुसमाचार के पर्चे के रूप में बाँट सकें। क्या आप एक भी ऐसी युक्ति पा सकते हैं जो आदि कलीसिया ने गढ़ी हो और जिसका अनुकरण हम आज कर सकें?

निश्चय ही पवित्र आत्मा चेलों में से किसी और को, मान लीजिए अन्द्रियास या फिलिप्पुस को, उभार सकता था, जो “अवश्य सफल होनेवाले पर्चे,” अथवा “अपने मित्रों को यीशु के पास जीत लाने के पचास उपाय” नामक पुस्तक रच देता — यदि आत्मा की उद्धार-योजना यही होती! हम उसे बाइबल की अन्तिम पुस्तक के रूप में छाप सकते थे, और सुविधा के लिये उसमें ‘निकालने योग्य’ पन्ने रख सकते थे।

मुझे निश्चय है कि बाइबल में परमेश्वर की उद्धार-योजना अवश्य है; तो भी, यद्यपि हम सुसमाचार के पर्चे के रूप में बाँटने को उसमें से एक पन्ना नहीं निकाल सकते, हम पूरी की पूरी पुस्तकें निकाल सकते हैं जो उसकी रीति पर बल देती हैं। वह रीति है उसके लोगों की एकता!

“हे पिता, मैं प्रार्थना करता हूँ कि वे सब एक हों, इसलिए कि जगत विश्वास करे, कि तू ही ने मुझे भेजा; और जगत जाने कि जैसा तूने मुझसे प्रेम रखा, वैसा ही तूने उनसे प्रेम रखा” (यूहन्ना 17)।

हमारी सारी योजनाएँ और युक्तियाँ कुछ न कुछ फल तो लाएँगी, क्योंकि वह अनुग्रह का परमेश्वर है, परन्तु पूरी कटनी तब तक कभी न आएगी जब तक हम इसे परमेश्वर की रीति से न करें। वह अपनी कलीसिया बनाना चाहता है, और हमें जातियाँ देना चाहता है, परन्तु वह ऐसा केवल अपनी ही रीति से करेगा।

उसकी रीति विश्वास की रीति है, और जिन रीतियों से यह प्रगट होती है उनमें से एक है आत्मा में हमारी एकता।

सारांश सारा का उदाहरण — वह युक्ति रचनेवाली जो परमेश्वर पर हँसी — हमें ये सिद्धान्त सिखाने के लिये दिया गया है: 1. परमेश्वर से सब कुछ हो सकता है।

2. मनुष्य की बुद्धि और विश्वास एक दूसरे के विरोधी हैं।

3. हमारे लिये परमेश्वर की ठहराई हुई नियति केवल विश्वास से ही प्राप्त होगी।

4. हमें परमेश्वर का काम परमेश्वर की रीति से ही करना चाहिए!

विषय-सूची

वह मेरा कल थामे हुए है Gareth Evans

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