पूलों के बीच बीनी हुई बालें
विश्वास और निश्चय

अध्याय 2 · 12 मिनट का पठन

विश्वास और निश्चय

विश्वास अनिवार्य है

"जो-जो बातें सुहावनी हैं, और जो-जो बातें पवित्र हैं, और जो-जो बातें मनभावनी हैं," उन्हें पाने का यत्न करो; परन्तु स्मरण रखो कि ये सब बातें एक साथ मिलकर भी, विश्वास के बिना, परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करतीं। सद्गुण, विश्वास के बिना, चूना पुते हुए पाप मात्र हैं। अविश्वास हर बात को व्यर्थ कर देता है। वह गंधी के तेल में पड़ी मरी हुई मक्खी है; वह हण्डे में का जहर है। विश्वास के बिना—चाहे तुम में पवित्रता के सारे सद्गुण हों, परोपकार की सारी उदारता हो, निःस्वार्थ सहानुभूति की सारी कोमलता हो, प्रतिभा की सारी योग्यताएँ हों, देशभक्ति का सारा साहस हो, और सिद्धान्त की सारी दृढ़ता हो—तुम्हें परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने का कोई अधिकार नहीं, क्योंकि "विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है।"

विश्वास हर सद्गुण को पालता-पोसता है; अविश्वास हर सद्गुण को कली ही में मुरझा देता है। हजारों प्रार्थनाएँ अविश्वास के कारण रुक गई हैं; स्तुति के बहुत से गीत, जो आकाश के गायक-मण्डल के स्वर को और ऊँचा कर देते, अविश्वास भरी कुड़कुड़ाहट से दबा दिए गए हैं; मन में उपजा बहुत सा उत्तम उद्यम बाहर आने से पहले ही अविश्वास के कारण झुलस गया है। विश्वास मसीही के लिये शिमशोन की लट के समान है: उसे काट डालो, तो वह कुछ भी नहीं कर सकता। पतरस, जब तक उसमें विश्वास था, समुद्र की लहरों पर चलता रहा। परन्तु थोड़ी ही देर में उसके पीछे से एक लहर उठी, और उसने कहा, "यह मुझे बहा ले जाएगी;" फिर एक और लहर सामने से आई, और वह चिल्ला उठा, "यह मुझे डुबो देगी;" और उसने सोचा, "मैं इतना ढीठ कैसे हो गया कि इन लहरों के ऊपर चलने लगा?" और ज्यों ही उसने सन्देह किया, वह डूबने लगा। विश्वास पतरस का जीवन-रक्षक था—उसी ने उसे ऊपर थामे रखा; परन्तु अविश्वास ने उसे नीचे डुबो दिया। मसीही के जीवन के विषय में कहा जा सकता है कि वह सदा "पानी पर चलना" ही है, और हर लहर उसे निगल जाना चाहती है; परन्तु विश्वास उसे खड़ा रहने की सामर्थ्य देता है। जिस क्षण तुम विश्वास करना छोड़ देते हो, उसी क्षण संकट और विफलता पीछे आ लगते हैं। ओह, तो फिर तू क्यों सन्देह करता है?

सन्देहों का उपचार

अपने विश्वास को दृढ़ करने का सबसे उत्तम मार्ग है मसीह के साथ सहभागिता रखना। यदि तुम मसीह के साथ सहभागिता रखते हो, तो तुम अविश्वासी नहीं रह सकते। जब उसका बायाँ हाथ मेरे सिर के नीचे होता है, और अपने दाहिने हाथ से वह मेरा आलिंगन करता है, तब मैं सन्देह नहीं कर सकता। जब मेरा प्रियतम अपनी मेज पर बैठता है, और वह मुझे भोज के घर में ले आता है, और उसका जो झण्डा मेरे ऊपर फहराता है वह प्रेम है, तब सचमुच मैं विश्वास करता हूँ। जब मैं उसके साथ भोज करता हूँ, तो मेरा अविश्वास लज्जित हो जाता है और अपना सिर छिपा लेता है। बोलो, तुम जिन्हें हरी-हरी चराइयों में ले चला गया है, और सुखदाई जल के झरने के पास बैठाया गया है; तुम जिन्होंने उसके सोंटे और उसकी लाठी को देखा है, और आशा रखते हो कि जब तुम घोर अंधकार से भरी हुई तराई में होकर चलोगे तब भी उन्हें देखोगे; बोलो, तुम जो मरियम के साथ उसके चरणों में बैठे हो, या जिन्होंने उस परमप्रिय यूहन्ना के साथ अपना सिर उसकी छाती पर टिकाया है; क्या तुमने यह नहीं पाया कि जब तुम मसीह के निकट रहे तब तुम्हारा विश्वास बलवन्त हुआ, और जब तुम उससे दूर हो गए तब तुम्हारा विश्वास निर्बल हो गया? यह असम्भव है कि कोई मसीह के मुख को निहारे और फिर उस पर सन्देह करे। जब तुम उसे देख नहीं पाते, तभी उस पर सन्देह करते हो; परन्तु जब तुम्हारा प्रियतम तुमसे बातें करता है, और कहता है, "हे मेरी प्रिय, हे मेरी सुन्दरी, उठकर चली आ।" तब तुम्हें विश्वास करना ही पड़ता है। तब कोई हिचकिचाहट नहीं रहती; तुम्हें अपने सन्देह की तराइयों से उठकर निश्चय की पहाड़ियों पर चढ़ना ही पड़ता है।

विश्वास की बढ़ती

अधिकतर मनुष्यों का विश्वास बड़े क्लेश के द्वारा ही बढ़ता है। धूप भरे दिनों में हम विश्वास में बलवन्त नहीं होते। आँधी-तूफान के मौसम में ही विश्वास अधिक दृढ़ होता है। विश्वास कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जो स्वर्ग से कोमल ओस के समान टपक पड़े; वह प्रायः बवण्डर और आँधी में आता है। पुराने बांज वृक्षों को देखो; वे धरती में इतनी गहरी जड़ें कैसे पकड़ सके? मार्च की आँधियों से पूछो, वे तुम्हें बता देंगी। यह अप्रैल की बौछार ने नहीं किया, न मई की मधुर धूप ने, परन्तु उस प्रचण्ड वायु ने, जो वृक्ष को इधर-उधर झकझोरती रही, जिससे उसकी जड़ें और गहरी उतरती गईं और उन्होंने और दृढ़ पकड़ बना ली। और हमारे साथ भी ऐसा ही होना चाहिए। घर की छावनियों में हम बड़े योद्धा नहीं बना सकते; वे तो उड़ती गोलियों और गरजती तोपों के बीच ही बनते हैं। हम सर्पेन्टाइन झील पर अच्छे नाविक बनने की आशा नहीं कर सकते; उन्हें दूर गहरे समुद्र में प्रशिक्षित होना पड़ता है, जहाँ प्रचण्ड हवाएँ गरजती हैं, और सेनाओं के परमेश्वर के कूच में बजते नगाड़ों के समान मेघ गरजते हैं। आँधियाँ और तूफान ही वे बातें हैं जो मनुष्यों को कठोर और हट्टे-कट्टे नाविक बनाती हैं। वे यहोवा के कामों को, और उन आश्चर्यकर्मों को जो वह गहरे समुद्र में करता है, देखते हैं। मसीहियों के साथ भी ऐसा ही है। महा-विश्वास को बड़ी परीक्षाओं से होकर जाना ही पड़ता है। श्री महा-हृदय कभी श्री महा-हृदय न बनता, यदि वह पहले कभी श्री महा-संकट न रहा होता। सत्य-के-लिये-वीर कभी उन शत्रुओं को भगा न पाता, और न इतना वीर बनता, यदि शत्रुओं ने पहले उस पर आक्रमण न किया होता। बहुत विश्वास तक पहुँचने से पहले हमें बड़े क्लेशों की आशा रखनी चाहिए।

विश्वास का कर्ता और सिद्ध करनेवाला

हे प्रभु! तुझसे अलग होकर उत्तम से उत्तम मनुष्य भी कितने तुच्छ हैं! जब तू उन्हें उठाता है तो वे कितने ऊँचे उठ जाते हैं! यदि तू अपना हाथ खींच ले तो वे कितने नीचे गिर पड़ते हैं! संकट के बीच हमारा आनन्द यही है कि तू हमें यह कहने की सामर्थ्य देता है, "चाहे वह मुझे घात करे, तो भी मैं उस पर भरोसा रखूँगा;" परन्तु यदि तू अपना आत्मा हटा ले, तो सबसे उजले दिन में भी हम तुझ पर भरोसा नहीं रख सकते। जब हमारे चारों ओर आँधियाँ घिर आती हैं, तब यदि तू हमारे संग हो, तो हम उन पर मुस्कुरा सकते हैं; परन्तु मनुष्य के हृदय पर कभी चमकी सबसे सुहानी भोर में भी, यदि तू अब भी हमारे संग न रहे कि उस विश्वास को, जो तूने आप ही दिया है, सुरक्षित और दृढ़ रखे, तो हम सन्देह करते और ठोकर खाते हैं।

विश्वास और भावना

हमारा उद्धार विश्वास से होता है, भावना से नहीं; तो भी पवित्र विश्वास और पवित्र भावना के बीच वैसा ही सम्बन्ध है जैसा जड़ और फूल के बीच। विश्वास उस जड़ के समान स्थायी है जो सदा मिट्टी में गड़ी रहती है; भावना आती-जाती है, और उसकी अपनी ऋतुएँ होती हैं—कन्द सदा हरा डण्ठल ऊपर नहीं निकालता, और सदा अपने अनेक फूलों से मुकुटित रहना तो और भी दूर की बात है। विश्वास वृक्ष है, मूल वृक्ष; हमारी भावनाएँ वर्ष की अलग-अलग ऋतुओं में उस वृक्ष के रूप-रंग के समान हैं। कभी-कभी हमारा प्राण बौर और फूलों से लद जाता है, और मधुमक्खियाँ मधुर गुनगुनाती हैं, और हमारे हृदयों के भीतर मधु बटोरती हैं। तब हमारी भावनाएँ हमारे विश्वास के जीवन की गवाही देती हैं, ठीक वैसे ही जैसे वसन्त की कलियाँ वृक्ष के जीवन की गवाही देती हैं। फिर, हमारी भावनाएँ और भी अधिक बल पकड़ती हैं, और जब हम अपने आनन्द की ग्रीष्म ऋतु में पहुँच जाते हैं, तब कदाचित् फिर से पतझड़ के सूखे पीले पत्ते की नाईं मुरझाने लगते हैं; वरन् कभी-कभी हमारी उदासी और निराशा का शीतकाल वृक्ष का एक-एक पत्ता झाड़ देता है, और हमारा बेचारा विश्वास हरियाली के किसी चिह्न के बिना एक झुलसे हुए ठूँठ के समान खड़ा रह जाता है। तो भी, जब तक विश्वास का वृक्ष वहाँ है, हमारा उद्धार हो चुका है। विश्वास में फूल आएँ या न आएँ, वह हमारे अनुभव में आनन्द का फल लाए या न लाए, जब तक वह अपनी पूरी स्थिरता के साथ वहाँ है, हमारा उद्धार हो चुका है। फिर भी, यदि वह कभी-कभी आनन्द से न खिले, और बहुधा पवित्रता का फल न लाए, तो हमारे पास अपने विश्वास के जीवन पर सन्देह करने का अत्यन्त गम्भीर कारण होगा।

अविश्वास का पाप

कुछ लोग परमेश्वर की करुणा पर सन्देह करने को बहुत छोटा पाप समझते हैं; वरन् कुछ ने तो परमेश्वर के लोगों के सन्देहों और भयों को ऊँचा उठाकर आत्मा के फल और अनुग्रह के गुण, और अनुभव में बड़ी उन्नति के प्रमाण तक बना दिया है। परन्तु परमेश्वर की कृपा, विश्वासयोग्यता और प्रेम पर सन्देह करना बहुत ही घोर अपराध है। वह पाप हलका नहीं हो सकता जो परमेश्वर को झूठा ठहराता है; और तो भी अविश्वास वास्तव में इस्राएल के पवित्र की सच्चाई पर गन्दा और निन्दा भरा सन्देह डालता है। वह अपराध छोटा नहीं हो सकता जो आकाश और पृथ्वी के सृजनहार पर झूठी शपथ खाने का दोष लगाता है; और तो भी, यदि मैं उसकी शपथ पर अविश्वास करूँ, और उसकी उस प्रतिज्ञा पर, जिस पर उसके अपने पुत्र के लहू की मुहर लगी है, विश्वास न करूँ, तो मैं परमेश्वर की शपथ को अपने भरोसे के अयोग्य गिनता हूँ; और इस प्रकार मैं सचमुच स्वर्ग के राजा पर यह दोष लगाता हूँ कि वह अपनी वाचा और शपथ के प्रति झूठा है। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर पर अविश्वास अनगिनत पापों का सोता है। जैसे काला बादल वर्षा की बहुत सी बूँदों का स्रोत होता है, वैसे ही अंधकारमय अविश्वास बहुत से अपराधों की जननी है। यह ऐसा पाप है जिसे हर विश्वासी को दोषी ठहराना चाहिए, जिसके विरुद्ध संघर्ष करना चाहिए, जिसे यदि सम्भव हो तो वश में करना चाहिए, और जो निश्चय ही हमारे गहरे पश्चाताप और घृणा का विषय होना चाहिए।

अल्प-विश्वास

"अल्प-विश्वास" की एक असुविधा यह है कि यद्यपि उसका स्वर्ग पहुँचना सदा निश्चित है, तो भी वह बहुत कम ऐसा समझता है। अल्प-विश्वास स्वर्ग के लिये उतना ही सुरक्षित है जितना महा-विश्वास। जब यीशु मसीह अन्तिम दिन अपने रत्नों को गिनेगा, तब वह बड़े मोतियों के साथ-साथ छोटे मोतियों को भी अपने लिये ले लेगा। हीरा चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, तो भी वह बहुमूल्य है, क्योंकि वह हीरा है। इसी प्रकार विश्वास, चाहे कितना ही थोड़ा क्यों न हो, यदि वह सच्चा विश्वास है, तो वह उस विश्वास के "जैसा बहुमूल्य" है जो प्रेरितों ने प्राप्त किया था। मसीह अपने मुकुट का सबसे छोटा रत्न भी कभी न खोएगा। अल्प-विश्वास स्वर्ग के लिये सदा सुरक्षित है, क्योंकि अल्प-विश्वास का नाम अनन्त जीवन की पुस्तक में लिखा है। अल्प-विश्वास जगत की उत्पत्ति से पहले परमेश्वर के द्वारा चुना गया था। अल्प-विश्वास मसीह के लहू से मोल लिया गया था; हाँ, और उसका दाम उतना ही चुकाया गया जितना महा-विश्वास का। "हर एक मनुष्य के लिये एक शेकेल," छुटकारे का यही दाम था। हर एक मनुष्य को, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, राजकुमार हो या किसान, अपने को एक शेकेल देकर छुड़ाना पड़ता था। मसीह ने छोटे और बड़े सबको एक ही अति बहुमूल्य लहू से मोल लिया है। अल्प-विश्वास स्वर्ग के लिये सदा सुरक्षित है, क्योंकि परमेश्वर ने उसमें काम आरम्भ किया है, और वह उसे आगे बढ़ाता रहेगा। परमेश्वर उससे प्रेम करता है, और अन्त तक उससे प्रेम करता रहेगा। परमेश्वर ने उसके लिये एक मुकुट तैयार कर रखा है, और वह उस मुकुट को वहाँ व्यर्थ टँगा न रहने देगा; उसने स्वर्ग में उसके लिये एक भवन खड़ा किया है, और वह उस भवन को सदा के लिये सूना न रहने देगा। अल्प-विश्वास सदा सुरक्षित है, परन्तु वह बहुत कम इसे जानता है। यदि तुम उससे मिलो, तो वह कभी-कभी नरक से डरा हुआ मिलता है; बहुधा इस बात से डरा हुआ कि परमेश्वर का क्रोध उस पर रहता है। वह तुमसे कहेगा कि नदी के उस पार का देश उस जैसे अधम का कभी नहीं हो सकता। कभी इसका कारण यह होता है कि वह अपने आपको बहुत अयोग्य अनुभव करता है; कभी, वह कहता है, कारण यह है कि परमेश्वर की बातें इतनी अच्छी हैं कि सच नहीं हो सकतीं; या वह सोच ही नहीं सकता कि वे उस जैसे व्यक्ति के लिये सच हो सकती हैं। कभी वह डरता है कि वह चुना हुआ नहीं है; कभी वह भय खाता है कि उसकी बुलाहट ठीक से नहीं हुई, या वह ठीक से मसीह के पास नहीं आया; फिर, उसका भय यह होता है कि वह अन्त तक थामे न रहेगा, कि वह अन्त तक स्थिर बना न रह सकेगा; और यदि तुम उसके हजार भयों को मार डालो, तो कल तक उसके पास निश्चय ही भयों की एक और सेना खड़ी होगी; क्योंकि अविश्वास उन वस्तुओं में से है जिन्हें तुम नष्ट नहीं कर सकते; तुम उसे बार-बार मार सकते हो, फिर भी वह जीवित रहता है। वह उन बुरी जंगली घासों में से है जो खेत जला दिए जाने के बाद भी मिट्टी में सोई पड़ी रहती हैं, और उन्हें बस थोड़ा सा प्रोत्साहन, या थोड़ी सी असावधानी चाहिए, और वे फिर से फूट निकलती हैं। अब, महा-विश्वास का स्वर्ग पहुँचना निश्चित है, और वह यह जानता है। वह पिसगा की चोटी पर चढ़ता है, और चारों ओर का सारा दृश्य निहारता है; वह मोतियों के फाटकों के भीतर प्रवेश करने से पहले ही स्वर्गलोक की मधुरता चख लेता है; वह उन सड़कों को देखता है जो सोने से पटी हैं; वह नगर की उन शहरपनाहों को देखता है जिनकी नींवें बहुमूल्य पत्थरों की हैं; वह महिमा पाए हुओं का रहस्यमय संगीत सुनता है, और पृथ्वी पर ही स्वर्ग की सुगन्ध सूँघने लगता है। परन्तु बेचारा अल्प-विश्वास सूर्य की ओर मुश्किल से देख पाता है; वह बहुत कम उजियाला देखता है; वह तराई में टटोलता फिरता है, और यद्यपि सब कुछ सुरक्षित है, तो भी वह सदा अपने को असुरक्षित समझता है।

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