अध्याय 1 · 9 मिनट का पठन
परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ
प्रतिज्ञाओं की बहुमूल्यता
परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ विश्वासी के लिये धन की एक अक्षय खान हैं। धन्य है वह, यदि वह उनकी छिपी हुई नसों को खोज निकालना, और उनके गुप्त खज़ानों से अपने आप को धनी बनाना जानता है। वे एक शस्त्रागार हैं, जिसमें आक्रमण और बचाव के सब प्रकार के हथियार रखे हैं। धन्य है वह जिसने उस पवित्र शस्त्रागार में प्रवेश करना, झिलम और टोप पहनना, और भाले और तलवार पर हाथ डालना सीख लिया है। वे एक औषधालय हैं, जिसमें विश्वासी को सब प्रकार की बल देनेवाली औषधियाँ और धन्य अमृत मिलेंगे; वहाँ न हर घाव के लिये मरहम की घटी है, न हर मूर्छा के लिये पुष्टिकारक पेय की, न हर रोग के लिये उपचार की। धन्य है वह जो स्वर्गीय औषधि-विद्या में भली भाँति निपुण है, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के चंगा करनेवाले गुणों को थाम लेना जानता है। प्रतिज्ञाएँ मसीही के लिये भोजन का भण्डार हैं। वे उन खत्तों के समान हैं जिन्हें यूसुफ ने मिस्र में बनवाया था, या उस सोने के मर्तबान के समान जिसमें मन्ना रखा गया था। धन्य है वह जो प्रतिज्ञा की जौ की पाँच रोटियाँ और मछलियाँ लेकर उन्हें तब तक तोड़ सकता है जब तक उसकी पाँच हज़ार आवश्यकताएँ सब पूरी न हो जाएँ, और वह बचे हुए टुकड़ों से भरी हुई टोकरियाँ उठा सके। प्रतिज्ञाएँ मसीही की स्वतन्त्रता का मैग्ना कार्टा हैं; वे उसकी स्वर्गीय सम्पत्ति के स्वामित्व-पत्र हैं। धन्य है वह जो उन्हें भली भाँति पढ़ना, और उन सबको अपना कहना जानता है। हाँ, वे वह रत्न-कक्ष हैं जिसमें मसीही के मुकुट के खज़ाने सुरक्षित रखे हैं। राजचिह्न उसी के हैं, जिन्हें वह आज छिपकर निहार सकता है, और जिन्हें वह आगे चलकर स्वर्गलोक में खुलेआम धारण करेगा। उसे पहले ही राजा के समान वह चाँदी की कुंजी मिल चुकी है जो तिजोरी-कक्ष को खोलती है; वह अभी भी राजदण्ड थाम सकता, मुकुट पहन सकता, और अपने कंधों पर राजसी चोगा डाल सकता है। अहा, हमारे विश्वासयोग्य, वाचा पालनेवाले परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ कितनी अवर्णनीय रूप से धनी हैं! यदि हमारे पास सबसे महान वक्ता की जीभ होती, और यदि वह जीभ वेदी पर से उठाए हुए अंगारे से छुई जाती, तो भी वह परमेश्वर की बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाओं की स्तुति का दसवाँ भाग भी न कह सकती। वरन् वे भी, जिन्होंने विश्राम में प्रवेश किया है, जिनकी जीभें करूबों और सारापों के ऊँचे और आनन्द-विभोर वाक्चातुर्य के अनुरूप सधी हुई हैं, वे भी मसीह के अगम्य धन की ऊँचाई और गहराई, लम्बाई और चौड़ाई कभी बता नहीं सकते, जो परमेश्वर के भण्डार-गृह में—उसके अनुग्रह की वाचा की प्रतिज्ञाओं में—संचित है।
उसने आप ही कहा है
प्रेरित, अपने स्वामी के समान, उद्धरण देने में सदा बहुत तत्पर रहते थे। प्रेरणा-प्राप्त जन होने के कारण वे सदा नए शब्दों का प्रयोग कर सकते थे, तो भी उन्होंने (और इसमें वे हमारे लिये आदर्श हैं) उन पुराने शब्दों को उद्धृत करना अधिक पसन्द किया जिन पर पहले ही ईश्वरीय अधिकार की मुहर लग चुकी है—"उसने आप ही कहा है।" आओ, हम भी ऐसा ही करें, क्योंकि यद्यपि सेवकों के शब्द मीठे हो सकते हैं, तो भी परमेश्वर के वचन उनसे अधिक मीठे हैं; और यद्यपि मौलिक विचारों में नयेपन का आकर्षण हो सकता है, तो भी परमेश्वर के प्राचीन वचनों में पुराने और बहुमूल्य सिक्कों की सी खनक, और वज़न, और मूल्य है, और जिस दिन हमें उन्हें काम में लाना पड़ेगा, उस दिन वे कभी खोटे न निकलेंगे। "उसने आप ही कहा है," यह वचन न केवल सन्देहों और भयों को दूर भगाता है, वरन् हमारे सब आत्मिक गुणों को पोषण भी देता है। जब प्रेरित हमें सन्तुष्ट करना चाहता है, तो वह कहता है, "जो तुम्हारे पास है, उसी पर संतोष किया करो; क्योंकि उसने आप ही कहा है;" और जब वह हमें साहसी और निडर बनाना चाहता है, तो वह इसे इस बल के साथ कहता है, "उसने आप ही कहा है, मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा, और न कभी तुझे त्यागूँगा।" इसलिए हम बेधड़क होकर कह सकते हैं, "प्रभु, मेरा सहायक है; मैं न डरूँगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?" जब प्रेरित पौलुस विश्वास को पोषित करना चाहता है, तो वह पवित्रशास्त्र में से अब्राहम, इसहाक, याकूब, मूसा, गिदोन, बाराक और यिफतह के उदाहरणों से हमें खिलाकर ऐसा करता है। जब कोई दूसरा प्रेरित धीरज का पाठ पढ़ाकर हमें शान्त करना चाहता है, तो वह कहता है, "तुम ने अय्यूब के धीरज के विषय में तो सुना ही है;" या यदि वह हमारी प्रार्थनाशीलता को उभारना चाहता है, तो कहता है, "एलिय्याह भी तो हमारे समान दुःख-सुख भोगी मनुष्य था; और उसने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, और प्रबल हुआ।" "उसने आप ही कहा है," यह हर एक आत्मिक गुण के लिये ताज़गी देनेवाला भोजन है, और हर एक पाप के लिये निर्णायक प्राणघातक प्रहार। यहाँ तुम्हारे पास उसके लिये पोषण है जो भला है, और उसके लिये विष है जो बुरा है। इसलिए पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ो, क्योंकि इसी प्रकार तुम ईश्वरीय जीवन में स्वस्थ, बलवन्त और तेजस्वी होकर बढ़ोगे।
परन्तु पढ़कर उनमें ढूँढ़ने, और स्मरण करके उन्हें सँजोने के अतिरिक्त, हमें अनुभव के द्वारा उन्हें परखना भी चाहिए, और जितनी बार कोई प्रतिज्ञा सच्ची प्रमाणित हो, उतनी बार हमें उसके सामने एक चिह्न लगाना चाहिए, और ध्यान देना चाहिए कि हम भी, प्राचीनकाल के एक जन के समान, कह सकते हैं, "मेरे दुःख में मुझे शान्ति उसी से हुई है, क्योंकि तेरे वचन के द्वारा मैंने जीवन पाया है।" यशायाह ने कहा, "यहोवा की बाट जोहता रह," और फिर उसने जोड़ा, "मैं कहता हूँ, यहोवा ही की बाट जोहता रह," मानो उसका अपना अनुभव उसे अपने सुननेवालों के सामने परमेश्वर की वाणी को दोहराने के लिये प्रेरित कर रहा था। प्रतिज्ञा को परखो; परमेश्वर का बैंक-नोट काउंटर पर ले जाओ, और देखो कि उसका भुगतान होता है या नहीं। उस उत्तोलक को पकड़ो जिसे उसने तुम्हारी परीक्षाओं को उठाने के लिये ठहराया है, और आज़माओ कि उसमें सचमुच सामर्थ्य है या नहीं। इस ईश्वरीय पौधे को अपने मारा के कड़वे जल में डालो, और जानो कि वह उसे कैसे मीठा कर देता है। यह नमक लो, और इसे गंदले जल में डालो, और देखो कि क्या वह वैसे ही मीठा नहीं हो जाता जैसे प्राचीनकाल में एलीशा भविष्यद्वक्ता के द्वारा वह जल हो गया था। "चखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है ... क्योंकि उसके डरवैयों को किसी बात की घटी नहीं होती।"
कभी न चुकनेवाली प्रतिज्ञाएँ
परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ पूरी हो जाने पर चुक नहीं जातीं, क्योंकि एक बार पूरी हो जाने पर भी वे ठीक वैसी ही खरी बनी रहती हैं जैसी पहले थीं, और हम उनके दूसरी बार पूरे होने की बाट जोह सकते हैं। मनुष्य की प्रतिज्ञाएँ, अपनी सबसे अच्छी दशा में भी, उस हौद के समान हैं जिसमें थोड़े ही समय का भण्डार रहता है; परन्तु परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ एक सोते के समान हैं, जो कभी खाली नहीं होता, सदा उमड़ता रहता है, इसलिए तुम उनमें से वह सारा परिमाण निकाल सकते हो जो उनमें प्रत्यक्ष रूप से समाया है, और वे फिर भी पहले के समान भरी रहेंगी।
प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करना
परमेश्वर कभी-कभी, ठीक उस समय जब कोई परीक्षा उन पर आनेवाली होती है, अपने लोगों को "विश्वास ही के द्वारा" नई प्रतिज्ञाएँ देता है। एलिय्याह के साथ ऐसा ही हुआ। परमेश्वर ने उससे कहा, "करीत नामक नाले में जा; सुन, मैंने कौवों को आज्ञा दी है कि वे तुझे वहाँ खिलाएँ।" यह अकाल के आरम्भ में हुआ। वह वहाँ रहा, और परमेश्वर ने प्रतिज्ञा पूरी की, क्योंकि एलिय्याह ने उसे विश्वास के द्वारा प्राप्त किया था। विश्वास के अनुसार चलते हुए, और अब भी परमेश्वर पर निर्भर रहते हुए, वह करीत के पास ठहरा रहता है, और इस विश्वास के फलस्वरूप परमेश्वर उसे एक नई प्रतिज्ञा देता है, "चलकर सीदोन के सारफत नगर में जा—सुन, मैंने वहाँ की एक विधवा को तेरे खिलाने की आज्ञा दी है।" जिस विश्वास ने पहली प्रतिज्ञा ग्रहण की, उसी ने दूसरी का सम्मान प्राप्त किया। हमारे साथ भी ऐसा ही है। यदि हमें एक छोटी सी प्रतिज्ञा मिली है, और अब तक हमने उसे पूरा होते देखा है; यदि हम उसी के सहारे जीते रहे हैं और उसे अपने प्राणों का सहारा और आधार बनाया है, तो निश्चय ही परमेश्वर हमें एक और, और उससे बड़ी प्रतिज्ञा देगा। और इस प्रकार प्रतिज्ञा से प्रतिज्ञा की ओर अपना मार्ग तय करते हुए, हम पाएँगे कि प्रतिज्ञाएँ उस सीढ़ी के डण्डे हैं जिसे याकूब ने देखा था, जिसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचा है। जो प्रतिज्ञा तुम्हारे पास है, उसके विषय में सन्देह और अविश्वास करो, तो तुम यह आशा नहीं कर सकते कि परमेश्वर तुम्हारे प्राण पर अपना प्रकाशन बढ़ाएगा। जो प्रतिज्ञा बीते कल तुम्हारे हृदय पर रखी गई, उसके विषय में डरो और अविश्वास करो, तो आनेवाले कल तुम्हें कोई नई प्रतिज्ञा न मिलेगी। परन्तु जो कुछ परमेश्वर तुम्हें दे चुका है, उस पर सरल विश्वास के साथ चलो, और तुम बल पर बल पाते जाओगे, और अनुग्रह पर अनुग्रह, और प्रतिज्ञा पर प्रतिज्ञा पाते जाओगे। परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे प्राण में कोई ऐसी प्रतिज्ञा फुसफुसाएगा जो ऐसी सामर्थ्य के साथ घर कर जाएगी मानो स्वर्ग से किसी स्वर्गदूत ने उसे तुमसे कहा हो, और तुम "विश्वास ही के द्वारा" वे प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करोगे जो पहले तुम्हारी पहुँच से बाहर थीं।
प्रतिज्ञाएँ और आज्ञाएँ
यदि तुम चाहते हो कि प्रतिज्ञाएँ तुम्हारे लिये पूरी हों, तो ध्यान रखो कि तुम प्रतिज्ञा के साथ जुड़ी हुई आज्ञा का पालन करो। मूसा का उदाहरण लो। मूसा जानता था कि इस्राएल के लोगों को यह प्रतिज्ञा दी गई थी कि वे संसार के लिये आशीष ठहरेंगे; परन्तु उसे प्राप्त करने के लिये आवश्यक था कि वह आत्म-त्याग करे, अतः उसने "फ़िरौन की बेटी का पुत्र कहलाने से इन्कार किया; इसलिए कि उसे पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और भी उत्तम लगा।" यदि प्रतिज्ञा तुम्हें अपना इन्कार करने की आज्ञा देती है, तो उसके बिना तुम उसे प्राप्त नहीं कर सकते। ऐसा करो, और वह तुम्हारे लिये पूरी होगी। या मान लो कि प्रतिज्ञा साहस माँगती है—साहस से काम लो। या क्या प्रतिज्ञा आज्ञाकारिता माँगती है—आज्ञाकारी बनो। स्मरण करो कि राहाब ने अपनी खिड़की से लाल रंग की डोरी कैसे लटकाई, क्योंकि वही उसके विश्वास की परख थी। तुम भी ऐसा ही करो। जो कुछ मसीह ने तुमसे कहा है, वही करो। किसी आज्ञा की उपेक्षा मत करो, चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न लगे। जो कुछ तुम्हारा स्वामी तुमसे कहता है, वही करो, और कोई प्रश्न मत पूछो, क्योंकि वह बुरा सेवक है जो अपने स्वामी की आज्ञा पर प्रश्न उठाता है। निःसन्देह तुम भी, उस कूशी खोजे के समान, आज्ञा मानने के बाद आनन्द करता हुआ अपने मार्ग चला जाओगे। या क्या प्रतिज्ञा उनसे की गई है जो उस देश के विषय में "अच्छा समाचार" देते हैं? स्मरण रखो, कालेब और यहोशू ही वे दो जन थे जिन्होंने प्रतिज्ञा प्राप्त की, क्योंकि केवल उन्हीं ने परमेश्वर का आदर किया। तुम भी परमेश्वर का आदर करो। ठट्ठा करनेवाला संसार तुम्हारी अटल गवाही सुने कि तुम्हारा परमेश्वर भला और सच्चा है। तुम्हारा कराहना और कुड़कुड़ाना मनुष्यों को यह सन्देह न करने दे कि तुम्हारा स्वामी कठोर है, और उसके सेवकों को न कोई आनन्द है, न कोई सान्त्वना, न कोई सुख। यह प्रगट हो जाए कि जिसकी तुम सेवा करते हो वह कोई मिस्री बेगार करानेवाला नहीं; उसका जूआ सहज है; उसकी सेवा आनन्द है, उसका प्रतिफल अवर्णनीय है। "जो मेरा आदर करें मैं उनका आदर करूँगा।" आज्ञाओं का पालन करने में चौकस रहो, और परमेश्वर तुम्हारे लिये प्रतिज्ञाओं को पूरा करेगा।
अध्याय 1 पूरा हुआ
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