पूलों के बीच बीनी हुई बालें
पवित्रता और नया जीवन

अध्याय 12 · 13 मिनट का पठन

पवित्रता और नया जीवन

धर्म एक व्यक्तिगत विषय

कुछ लोग कहते हैं कि वे मसीह के धर्म की पवित्रता को मसीह के लोगों की पवित्रता से परखेंगे। मेरा उत्तर यह है कि तुम्हें इस प्रश्न को ऐसी किसी कसौटी पर परखने का कोई अधिकार नहीं। जो उचित कसौटी तुम्हें काम में लानी चाहिए, वह यह है कि तुम स्वयं इसे आजमाकर देखो—"चखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है।" चखने और देखने के द्वारा तुम उसकी भलाई को परखोगे, और इसी रीति से तुम्हें उसके सुसमाचार की पवित्रता को भी परखना होगा। तुम्हारा काम यह है कि तुम स्वयं अपने लिये क्रूस पर चढ़ाए हुए मसीह को ढूँढ़ो, न कि भ्रष्टता को वश में करने और हृदय को पवित्र करने की अनुग्रह की सामर्थ्य के विषय में किसी दूसरे मनुष्य का बयान मान लो। जब परमेश्वर ने तुम्हें बाइबल दी है, तो उसकी इच्छा यह थी कि तुम उसे पढ़ो, न कि मनुष्यों को पढ़कर ही सन्तुष्ट हो जाओ। तुम्हें उन भावनाओं से सन्तुष्ट नहीं होना है जो दूसरों की बातचीत से उठती हैं; सच्चे धर्म को जानने का तुम्हारा एकमात्र सामर्थ्य यह है कि उसका पवित्र आत्मा तुम्हारे अपने हृदय पर कार्य करे, जिससे तुम स्वयं अनुभव कर सको कि धर्म की सामर्थ्य क्या है। तुम्हें धर्म को उससे बाहर की या उससे अलग किसी भी वस्तु के आधार पर परखने का कोई अधिकार नहीं। और यदि तुम उसे स्वयं आजमाने से पहले ही तुच्छ जानते हो, तो तुम्हें इस संसार में मूर्ख और आनेवाले संसार में अपराधी ठहरकर खड़ा होना पड़ेगा। तो भी अधिकांश मनुष्यों का यही हाल है। यदि तुम किसी मनुष्य को बाइबल की निन्दा करते सुनो, तो प्रायः यह निष्कर्ष निकाल सकते हो कि उसने उसे कभी नहीं पढ़ा। और यदि तुम किसी मनुष्य को धर्म के विरुद्ध बोलते सुनो, तो पूरा निश्चय रख सकते हो कि उसने कभी नहीं जाना कि धर्म क्या है। सच्चा धर्म जब एक बार हृदय पर अधिकार कर लेता है, तो वह मनुष्य को कभी उससे झगड़ने नहीं देता। जो मसीह को तनिक भी जानता है, वह मनुष्य मसीह को अपना सबसे अच्छा मित्र कहेगा। हमें बहुत-से ऐसे लोग मिले हैं जिन्होंने इस संसार के सुख-भोगों को तुच्छ जाना, परन्तु हमें एक भी ऐसा नहीं मिला जो एक बार धर्म का आनन्द लेने के बाद घृणा से या ऊबकर उससे फिर गया हो। नहीं! नहीं! तुमने अपने भ्रम स्वयं चुने, और अपने ही जोखिम पर चुने; तुम उन्हें अपने ही संकट पर पालते हो। क्योंकि यदि तुम अपना धर्म दूसरे लोगों से लेते हो, और धर्म का अंगीकार करनेवालों के उदाहरण से भटककर धर्म को त्याग देते हो, तो भी तुम्हारे अपने लहू का दोष तुम्हीं पर है। परमेश्वर ने तुम्हें मनुष्यों के चरित्रों के अनिश्चित नक्शे के भरोसे नहीं छोड़ा: उसने तुम्हें अपना ही वचन दिया है; साक्षी का वह और भी दृढ़ वचन, जिस पर ध्यान करके तुम अच्छा करते हो।

पवित्रता

पवित्रता वह स्थापत्य-नक्शा है जिसके अनुसार परमेश्वर अपना जीवित मन्दिर बनाता है।

नया मन

परमेश्वर यह प्रतिज्ञा नहीं करता कि वह हमारे स्वभाव को सुधारेगा, या हमारे टूटे हृदयों की मरम्मत करेगा। नहीं; प्रतिज्ञा यह है कि वह हमें नया मन और सीधी आत्मा देगा। मनुष्य का स्वभाव इतना बिगड़ चुका है कि उसकी मरम्मत हो ही नहीं सकती। वह कोई ऐसा घर नहीं जिसमें थोड़ी-सी टूट-फूट हो—कहीं छत से कोई खपरैल उड़ गया हो, और कहीं भीतर की छत से थोड़ा पलस्तर झड़ गया हो। नहीं; वह भीतर से बाहर तक सड़ चुका है; उसकी नींव तक खोखली हो गई है; उसमें एक भी शहतीर ऐसा नहीं जो ठीक हो; अपनी सबसे ऊँची छत से लेकर अपनी सबसे निचली नींव तक वह पूरा का पूरा सड़ा हुआ है, और गिरने ही वाला है। परमेश्वर उसकी मरम्मत करने का यत्न नहीं करता; वह दीवारों को टेक नहीं लगाता, न द्वार पर फिर से रंग चढ़ाता है; वह उसे सजाता-सँवारता नहीं, परन्तु यह ठान लेता है कि पुराना घर पूरी रीति से ढा दिया जाए, और वह एक नया घर बनाएगा। वह इतना बिगड़ चुका है कि उसकी मरम्मत नहीं हो सकती। यदि उसमें थोड़ी ही टूट-फूट होती, तो वह फिर से ठीक किया जा सकता था। यदि "मनुष्यत्व" कहलानेवाली उस बड़ी मशीन का केवल एक-आध पहिया ही बिगड़ा होता, तो जिसने मनुष्य को बनाया वह पूरी मशीन को ठीक कर सकता था; जहाँ दाँता टूट गया था वहाँ वह नया दाँता लगा देता, और जहाँ पहिया नष्ट हो गया था वहाँ दूसरा पहिया, और मशीन फिर से चलने लगती। परन्तु नहीं; उसका सब कुछ बिगड़ा हुआ है; एक भी लीवर ऐसा नहीं जो टूटा न हो; एक भी धुरी ऐसी नहीं जो अपनी जगह से हिल न गई हो। "तुम्हारा सिर घावों से भर गया, और तुम्हारा हृदय दुःख से भरा है। पाँव से सिर तक कहीं भी कुछ आरोग्यता नहीं, केवल चोट और कोड़े की मार के चिन्ह और सड़े हुए घाव हैं।" इसलिए प्रभु इस वस्तु की मरम्मत करने का यत्न नहीं करता, परन्तु वह कहता है, "मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा।"

तुम में मसीह

"तुम में मसीह" का होना क्या है? रोमन कैथोलिक क्रूस को अपनी छाती पर लटकाता है; सच्चा मसीही क्रूस को अपने हृदय में लिए फिरता है; और हृदय के भीतर का क्रूस पीठ पर के क्रूस की सबसे मधुर औषधियों में से एक है। यदि तुम्हारे हृदय में क्रूस है—तुम में क्रूस पर चढ़ाया हुआ मसीह, जो महिमा की आशा है—तो इस संसार के कष्टों का क्रूस तुम्हें बहुत हलका लगेगा, और तुम उसे सहज ही उठा सकोगे। हृदय में मसीह का अर्थ है: वह मसीह जिस पर विश्वास किया गया, वह मसीह जिससे प्रेम किया गया, वह मसीह जिस पर भरोसा रखा गया, वह मसीह जिससे सगाई की गई, वह मसीह जिससे संगति की गई, मसीह हमारा प्रतिदिन का भोजन, और हम स्वयं वह मन्दिर और महल जिसमें यीशु मसीह प्रतिदिन चलता-फिरता है। आह! बहुत-से ऐसे हैं जो इस वाक्यांश के अर्थ से बिलकुल अनजान हैं। वे नहीं जानते कि यीशु मसीह का उनमें होना क्या है। यद्यपि वे कलवरी पर के मसीह के विषय में थोड़ा-बहुत जानते हैं, तो भी हृदय में के मसीह के विषय में कुछ नहीं जानते। अब, स्मरण रखो कि कलवरी पर का मसीह किसी मनुष्य का उद्धार नहीं करेगा, जब तक कि मसीह हृदय में न हो। मरियम का पुत्र, जो चरनी में जन्मा, तुम्हारा उद्धार नहीं करेगा, जब तक कि वह तुम्हारे हृदय में भी जन्म न ले, और वहाँ वास न करे—तुम्हारा आनन्द, तुम्हारा बल, और तुम्हारी सान्त्वना होकर।

जीवन का महान लक्ष्य

मसीही होने के नाते हमें अपने जीवन के महान लक्ष्य में संसार से सदा अलग पहचाने जाना चाहिए। जहाँ तक सांसारिक मनुष्यों की बात है, उनमें से कुछ धन के पीछे हैं, और कुछ यश के; कुछ सुख-चैन ढूँढ़ते हैं, और कुछ भोग-विलास। गौण रूप में तुम इनमें से किसी को भी ढूँढ़ सकते हो, परन्तु एक मसीही के रूप में तुम्हारा मुख्य और प्रधान उद्देश्य सदा मसीह के लिये जीना होना चाहिए। महिमा के लिये जीना? हाँ, परन्तु उसकी महिमा के लिये। सुख-चैन के लिये जीना? हाँ, परन्तु तुम्हारी सारी सान्त्वना उसी में हो। आनन्द के लिये जीना? हाँ, परन्तु जब तुम आनन्दित हो, तो स्तुति के भजन गाओ, और अपने-अपने मन में प्रभु के सामने गाते और स्तुति करते रहो। धन के लिये जीना? हाँ, परन्तु विश्वास में धनी होने के लिये। तुम धन इकट्ठा कर सकते हो, परन्तु उसे स्वर्ग में इकट्ठा करो, "जहाँ न तो कीड़ा, और न काई बिगाड़ते हैं, और जहाँ चोर न सेंध लगाते और न चुराते हैं।" अपने प्रतिदिन के जीवन को पूरी रीति से यीशु की सेवा में अर्पित करके, और "मेरे लिये जीवित रहना मसीह है" को अपना आदर्श-वाक्य बनाकर, तुम सबसे साधारण धन्धे को भी सचमुच पवित्र बना सकते हो। इस प्रकार समर्पित जीवन जीना सचमुच सम्भव है; और यदि कोई इसकी सम्भावना से इन्कार करे, तो वह स्वयं दोषी ठहरे, क्योंकि वह इस आज्ञा को नहीं मानता: "इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।"

धर्म—आज का विषय

धर्म वर्तमान की वस्तु होना ही चाहिए, क्योंकि वर्तमान का भविष्य से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है। पवित्रशास्त्र में हमें बताया गया है कि यह जीवन बोने का समय है, और भविष्य कटनी है, "जो अपने शरीर के लिये बोता है, वह शरीर के द्वारा विनाश की कटनी काटेगा; और जो आत्मा के लिये बोता है, वह आत्मा के द्वारा अनन्त जीवन की कटनी काटेगा।" जैसे बीज पौधे को उत्पन्न करता है, वैसे ही यह वर्तमान जीवन अनन्त भविष्य को उत्पन्न करता है। स्वर्ग और नरक, अन्ततः, हमारे वर्तमान चरित्र का विकास ही हैं, क्योंकि क्या यह नहीं लिखा है, "जो पवित्र है, वह पवित्र बना रहे; जो अन्याय करता है, वह अन्याय ही करता रहे?" क्या हम नहीं जानते कि हर पाप के हृदय में दण्ड की आज्ञा ऊँघ रही है? क्या यह एक भयानक सत्य नहीं कि अनन्त यातना का अंकुर हर घृणित इच्छा में, हर अपवित्र विचार में, हर अशुद्ध काम में सोया पड़ा है, इस प्रकार कि नरक सोए हुए लावे का एक बड़ा विस्फोट भर है—वह लावा जो इतना शान्त पड़ा था कि जब पहाड़ चोटी तक सुन्दर हरियाली से ढका हुआ था, तब मृत्यु आती है और उस लावे को उठने की आज्ञा देती है; और मनुष्य के अनन्त अस्तित्व की ढलानों पर से अनन्त दुर्दशा का धधकता लावा बह निकलता है? तो भी वह वहाँ पहले से था, क्योंकि पाप ही नरक है, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह दुर्दशा की भूमिका है। स्वर्ग के विषय में भी ऐसा ही है; मैं जानता हूँ कि स्वर्ग एक प्रतिफल है, जो कमाई के रूप में नहीं, परन्तु अनुग्रह से मिलता है; तो भी मसीही के भीतर वह कुछ है जो उसके लिये स्वर्ग को पहले से ही ले आता है। मसीह ने क्या कहा? "मैं अपनी भेड़ों को अनन्त जीवन देता हूँ।" उसने यह नहीं कहा, "मैं दूँगा," परन्तु "मैं देता हूँ।" ज्यों ही वे मुझ पर विश्वास करते हैं, मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ। "जो मेरे भेजनेवाले पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है, और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती।" मसीही के भीतर स्वर्गलोक की क्यारियाँ हैं; ठीक समय पर वह ज्योति जो धर्मी के लिये बोई गई है, और वह आनन्द जो सीधे मनवालों के लिये बोया गया है, उग आएगा, और वे कटनी काटेंगे। तो क्या यह स्पष्ट नहीं कि धर्म ऐसी वस्तु है जो हमें यहीं पानी चाहिए? क्या यह साफ-साफ प्रकट नहीं किया गया कि धर्म वर्तमान के लिये महत्त्वपूर्ण है? क्योंकि यदि यह जीवन भविष्य के लिये बोने का समय है, तो मैं दूसरे संसार में उस फसल से भिन्न कोई फसल काटने की आशा कैसे कर सकता हूँ जो मैं यहाँ बोता रहा हूँ? जब तक मेरा उद्धार अभी न हो, तब तक मैं कैसे भरोसा रखूँ कि तब मेरा उद्धार होगा? जब तक पृथ्वी पर मेरे अपने प्राण में उसका बयाना आरम्भ न हो, तब तक मैं कैसे आशा रखूँ कि स्वर्ग मेरी अनन्त मीरास होगा?

तुम अपने नहीं हो

यदि तुम परमेश्वर की सन्तान हो, तो तुम पूरी रीति से और सम्पूर्ण रूप से मसीह के हो। तो भी क्या बहुत-से ऐसे नहीं हैं जो यह समझते जान पड़ते हैं कि यदि वे अपने प्राण का एक कोना अपने धर्म के लिये बचा रखें, तो सब ठीक हो जाएगा? शैतान उनकी विवेक-बुद्धि और समझ के चौड़े खेतों पर अकड़कर घूमता रहे, और उनके विचारों और कल्पनाओं पर राज्य करता रहे; परन्तु यदि किसी शान्त कोने में धर्म का रूप बचा रहे, तो सब ठीक रहेगा। ओह! इस विषय में धोखा न खाओ; मसीह ने आज तक किसी मनुष्य के साथ आधा-आधा बँटवारा नहीं किया। वह या तो तुम्हें पूरा का पूरा लेगा, या तुम में से कुछ भी नहीं लेगा। वह सर्वोपरि प्रभु, सर्वोच्च स्वामी, पूर्ण अधिकारी राजा होगा, नहीं तो वह तुमसे कोई सम्बन्ध न रखेगा। यदि तुम चाहो तो शैतान की सेवा कर सकते हो, परन्तु जब तुम उसकी सेवा करोगे, तो साथ-साथ मसीह की सेवा नहीं कर सकोगे। यदि तुम पूरी रीति से परमेश्वर को समर्पित नहीं हो—यदि तुम्हारे प्राणों के अभिप्राय और उद्देश्य में तुम्हारा हर विचार, हर इच्छा, हर शक्ति, हर योग्यता और हर सम्पत्ति मसीह के लिये अर्पित और पवित्र नहीं की गई है, तो तुम्हारे पास यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि तुम उसके बहुमूल्य लहू से छुड़ाए गए हो। अपने लोगों में, जिन्हें उसने अपने लिये मोल लिया है, वह बिना किसी प्रतिद्वन्द्वी के राज्य करेगा ही। मसीह किसी भी मनुष्य का साझे का स्वामी नहीं बनेगा।

प्रकृति और अनुग्रह

जब तक तुम अनुग्रह में परमेश्वर को देखना नहीं सीख लेते, तब तक तुम प्रकृति में परमेश्वर को कभी नहीं पहचान पाओगे। हमने प्रकृति से होकर प्रकृति के परमेश्वर तक ऊपर चढ़ने के विषय में बहुत कुछ सुना है। असम्भव! ऐसा यत्न तो वैसा ही है जैसे कोई मनुष्य आल्प्स पर्वत की चोटी से स्वर्ग तक जाने का यत्न करे। स्वाभाविक मन के लिये प्रकृति और परमेश्वर के बीच अब भी एक बड़ी खाई है। इससे पहले कि तुम उसकी रची हुई सृष्टि में सर्वशक्तिमान परमेश्वर को पहचानो, तुम्हें सबसे पहले मसीह के व्यक्तित्व में देहधारी परमेश्वर को पहचानना होगा। तुमने ऐसे लोगों के विषय में बहुत कुछ सुना है जो वन की खुली वादियों में आराधना करने में आनन्द मानते हैं, पर पवित्र लोगों के पवित्रस्थान में जाना अपनी शान के विरुद्ध समझते हैं। हाँ; परन्तु उसमें सच्चाई बहुत कम थी। जहाँ बहुत खोखलापन होता है, वहाँ प्रायः बड़ा शोर होता है; और तुम बहुधा पाओगे कि जो लोग इस प्राकृतिक आराधना की सबसे अधिक बातें करते हैं, वे वही हैं जो परमेश्वर की आराधना करते ही नहीं। परमेश्वर के कार्य इतने स्थूल माध्यम हैं कि उनमें से होकर ज्योति भली-भाँति नहीं आ पाती। यदि हम सृष्टि की वस्तुओं के मार्ग से सृष्टिकर्ता का मर्म पूरी रीति से खोज निकालने चलें, तो मार्ग ऊबड़-खाबड़ है और वातावरण अन्धकारमय। परन्तु जब मैं मसीह को देखता हूँ, तो अपने प्राण और अपने परमेश्वर के बीच परमेश्वर के उस नये और जीविते मार्ग को देखता हूँ, जो अत्यन्त स्पष्ट और सुखद है। मैं तुरन्त अपने परमेश्वर के पास आ जाता हूँ, और उसे मसीह में पाकर, मैं उसे इसके अलावा और सब जगह भी पा लेता हूँ।

नये जीवन का प्रमाण

"यदि तुम ने प्रभु की भलाई का स्वाद चख लिया है," तो यह एक ईश्वरीय परिवर्तन का निश्चित प्रमाण है; क्योंकि मनुष्य स्वभाव से यीशु में कोई आनन्द नहीं पाते। मैं यह नहीं पूछता कि तुम्हारा अनुभव क्या रहा होगा, या क्या नहीं रहा होगा; यदि मसीह तुम्हें बहुमूल्य लगता है, तो तुम्हारे हृदय में अनुग्रह का कार्य हुआ है; यदि तुम उससे प्रेम रखते हो, यदि उसकी उपस्थिति तुम्हारा आनन्द है, यदि उसका लहू तुम्हारी आशा है, यदि उसकी महिमा तुम्हारा लक्ष्य और उद्देश्य है, और यदि उसका व्यक्तित्व तुम्हारे प्राण का निरन्तर प्रेम है, तो यह स्वाद तुम्हें स्वभाव से नहीं मिल सकता था, क्योंकि तुम मरे हुए थे; और यह स्वाद तुम विद्या से भी प्राप्त नहीं कर सकते थे, क्योंकि यह एक ऐसा आश्चर्यकर्म है जिसे प्रकृति पर सर्वोच्च परमेश्वर के सिवाय और कोई तुम में नहीं कर सकता था। हर परखा हुआ और व्याकुल मसीही, जो फिर भी प्रभु की भलाई का स्वाद चखता है, इस बात से शान्ति पाए। "सीधे लोग तुझ से प्रेम रखते हैं।"

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