अध्याय 11 · 5 मिनट का पठन
प्रार्थना
लगातार प्रार्थना
उन प्रार्थनाओं को मत छोड़ो जिन्हें परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हारे हृदयों में डाला है—क्योंकि स्मरण रखो, जो वस्तुएँ तुमने माँगी हैं वे बाट जोहने के योग्य हैं। इसके अतिरिक्त, जब तुम प्रार्थना में होते हो तब तुम भिखारी हो; इसलिए तुम्हें यह चुनने का अधिकार नहीं कि परमेश्वर किस समय तुम्हारी सुने। यदि तुम अपने विषय में ठीक विचार रखते, तो तुम कहते, "आश्चर्य है कि वह कभी मेरी सुनता भी है, जबकि मैं इतना अयोग्य हूँ। क्या वह अनन्त परमेश्वर सचमुच मेरी ओर कान लगाता है? क्या मैं आशा रखूँ कि वह अन्त में मेरी सुनेगा? तब तो मुझे अपनी प्रार्थनाएँ जारी रखनी ही चाहिए।"
और स्मरण रखो कि यही तुम्हारी एकमात्र आशा है: कोई दूसरा उद्धारकर्ता नहीं। यही, या कुछ भी नहीं—मसीह का लहू, या फिर अनन्त क्रोध। और यदि तुम उससे मुँह मोड़ लो, तो तुम किसके पास जाओगे? दया के लिये गिड़गिड़ाते हुए आज तक कोई नाश नहीं हुआ; इसलिए लगे रहो।
इसके अतिरिक्त, तुमसे अच्छे मनुष्यों को भी बाट जोहनी पड़ी है। राजाओं, कुलपतियों और भविष्यद्वक्ताओं ने बाट जोही है; इसलिए निश्चय तुम भी राजा की ड्योढ़ी में थोड़ी देर बैठे रहने में सन्तुष्ट हो सकते हो। जैसे मोर्दकै फाटक में बैठा करता था, वैसे बैठना तो आदर की बात है। प्रार्थना करते रहो—बाट जोहते रहो!
"आह!" कोई कहता है, "मैं तो बहुत समय से यही करता आ रहा हूँ।" हाँ, हाँ, परन्तु बाट जोहने के भिन्न-भिन्न प्रकार होते हैं। कोई मनुष्य कहता है, "मैं बाट जोहता रहा हूँ:" परन्तु वह हाथ पर हाथ धरे सो गया है। तुम इस रीति से तब तक बाट जोहते रह सकते हो जब तक कि तुम नाश न हो जाओ। जिस बाट जोहने की बात मैं कर रहा हूँ, वह है "सब कुछ तैयार रखना"—उस दीन रोगी की सी बाट जोहना जो वैद्य की प्रतीक्षा करता है, और पीड़ा में चिल्लाता है, "क्या वैद्य आ रहा है?" जब मैं कहता हूँ कि ऐसा कोई भी खाली हाथ नहीं लौटाया जाएगा, तो मैं अपने स्वामी का जामिन बनता हूँ। वह अपनी प्रतिज्ञा कभी नहीं तोड़ेगा। उसे आजमाकर देखो—उसे आजमाकर देखो!
विश्वास से की गई प्रार्थना
स्वर्ग में प्रार्थनाएँ बहुत कुछ हमारे विश्वास के अनुपात में सुनी जाती हैं। थोड़ा विश्वास बहुत बड़ी दया पा लेगा, परन्तु बड़ा विश्वास उससे भी बड़ी। पुराने समय में यह रीति थी कि पल्ली के सब कंगाल भोजन-सामग्री के लिये कटोरे लेकर हर घर पर जाते थे; और कटोरा चाहे जितना बड़ा हो, हर उदार व्यक्ति उसे भर देता था। विश्वास हमारा कटोरा है: यदि हमारे पास केवल "थोड़ा विश्वास" है, तो वही भरा जाएगा; परन्तु यदि हमारे पास "बड़ा विश्वास" है, तो वह भी भर दिया जाएगा। थोड़ा विश्वास बहुत पाता है; परन्तु बड़ा विश्वास एक कुलीन और राजसी व्यापारी है, और बड़ा व्यापार करता है—जहाँ थोड़ा विश्वास केवल सैकड़ों कमाता है, वहाँ वह लाखों प्राप्त करता है। बड़ा विश्वास परमेश्वर के भण्डार को थाम लेता है।
प्रार्थना में लगे रहो
बहुत प्रार्थना किया करो। परमेश्वर के पौधे कोठरी के गर्म वातावरण में अधिक शीघ्र बढ़ते हैं—वह आत्मिक पौधों को शीघ्र उगानेवाला पौधघर है। जो बलवन्त होना चाहता है, उसे बार-बार अनुग्रह के सिंहासन के सामने घुटने टेकने चाहिए। आत्मिक युद्धों के लिये सारे अभ्यासों में घुटनों का अभ्यास सबसे अधिक स्वास्थ्यकर और बल देनेवाला है।
अधीनता से रहित प्रार्थनाएँ
जब हम अपनी प्रार्थनाओं पर दृष्टि करते हैं, तो हमारे पास उस अधीन न होनेवाली आत्मा पर विलाप करने का बड़ा कारण है जो प्रायः उनमें समाई रहती है। कितनी ही बार हमने अपनी प्रार्थनाओं में किसी आशीष के लिये परमेश्वर से केवल मल्लयुद्ध ही नहीं किया—क्योंकि वह तो उचित था—परन्तु अधिकार जताकर उसकी माँग की है! हमने यह नहीं कहा, "हे मेरे परमेश्वर, यदि तुझे यही भाए, तो इसे मुझसे रोक ले;" हम यह कहने को तैयार नहीं रहे, जैसा छुड़ानेवाले ने कहा था, "फिर भी जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो;" परन्तु हमने अपनी अज्ञानता के अन्धे झुकाव के अनुसार माँगा है, मानो हम उसकी इच्छा की सर्वज्ञ सम्मति से कोई इन्कार सह ही नहीं सकते। अपने प्रभु की श्रेष्ठ बुद्धि और अनुग्रह के प्रति दीन आदरभाव को भूलकर, हमने माँगा है और घोषणा की है कि जब तक हमें वह विशेष वस्तु न मिले जिस पर हमारा मन लगा था, तब तक हम सन्तुष्ट न होंगे। अब, जब कभी हम परमेश्वर के पास आते हैं, और किसी ऐसी वस्तु को माँगते हैं जिसे हम सचमुच भली समझते हैं, तो हमें गिड़गिड़ाकर विनती करने का अधिकार है; परन्तु जब हम उत्कटता की सीमा लाँघकर माँग करने लगते हैं, तब हम भूल करते हैं। आशीष माँगना हमारा काम है, परन्तु यह ठहराना हमारा काम नहीं कि वह आशीष क्या होगी। ईश्वरीय आशीर्वाद के सामर्थी हाथों के नीचे अपना सिर रखना हमारा काम है, परन्तु उन हाथों को उठाना, जैसे यूसुफ ने याकूब के हाथों को उठाया था, और यह कहना हमारा काम नहीं, "हे पिता, ऐसा नहीं।" यदि वह हाथ बदलकर आशीष दे, तो भी हमें सन्तुष्ट रहना चाहिए; उतने ही सन्तुष्ट कि वह अपना बायाँ हाथ हमारे सिर पर रखे, जितने कि दाहिना। हमें परमेश्वर के दान-भण्डार में घुसपैठ नहीं करनी चाहिए, "वह तो यहोवा है; जो कुछ वह भला जाने वही करे।" प्रार्थना कभी भी परमेश्वर की प्रभुता पर बेड़ी बनने के लिये नहीं ठहराई गई। हमें प्रार्थना के अन्त में सदा यह स्वर्गीय पुनश्च जोड़ना चाहिए, "हे पिता, यदि इसी में तेरी सबसे अधिक महिमा हो, तो इसे रोक ले।" मसीह हुक्म चलानेवाली प्रार्थनाओं से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा।
अध्याय 11 पूरा हुआ
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