अध्याय 10 · 23 मिनट का पठन
मसीही जीवन का आनन्द
समृद्ध जीवन
पुराने इतिहासकार बताते हैं कि जब हमारे राजाओं में से एक बन्धुआई से लौटा, तब चीपसाइड में ऐसे फव्वारे थे जिनसे दाखमधु बहता था। राजा इतना उदार था और प्रजा इतनी आनन्दित थी कि उन्होंने पानी के बदले दाखमधु को हर किसी के लिये सेंत-मेंत बहने दिया। हमारे जीवन को भी इतना समृद्ध, इतना भरपूर, और हमारे संगी मनुष्यों के लिये इतना आशीषमय बनाने का एक मार्ग है कि यह उपमा हम पर भी लागू हो सके, और लोग कह सकें कि जब दूसरे मनुष्यों के जीवन से पानी बहता है, तब हमारे जीवन से दाखमधु बहता है। तुमने ऐसे कुछ मनुष्यों को जाना है। जॉन हावर्ड का जीवन हमारे दीन, साधारण जीवनों जैसा नहीं था: वह इतना परोपकारी था, और मानवजाति के प्रति उसकी सहानुभूति इतनी आत्म-त्याग से भरी थी, कि उसके जीवन की धाराएँ उत्तम दाखमधु के समान थीं। सम्भव है, तुमने व्यक्तिगत रूप से किसी प्रसिद्ध पवित्र जन को जाना हो, जो यीशु के बहुत निकट रहता था: जब वह बोलता था, तो उसके शब्दों में एक अभिषेक और एक सुवास होती थी, उसकी बातों में एक ठोसपन और एक बल होता था, जिसकी तुम सराहना तो कर सकते थे, पर जिस तक तुम स्वयं पहुँच नहीं पाते थे। तुमने कभी-कभी कहा है, "काश, मेरे शब्द भी ऐसे ही भरपूर, ऐसे ही मीठे, ऐसे ही परिपक्व और ऐसे ही अभिषेक से भरे होते जैसे अमुक व्यक्ति के शब्द हैं। आह, काश मेरे काम भी उतने ही समृद्ध होते, उनका रंग उतना ही गहरा और उनका स्वाद उतना ही शुद्ध होता जितना किसी और के कामों का, जिसकी ओर तुम संकेत करते हो। जो कुछ मैं कर पाता हूँ, वह उसकी ऊँची उपलब्धियों की तुलना में थोड़ा और खोखला ही जान पड़ता है। आह, काश मैं और अधिक कर पाता! आह, काश मैं अपने तुच्छ मैल के बदले हर घर में शुद्ध सोने की धाराएँ भेज पाता!" तो हे मसीही, इससे तुम्हें यह प्रेरणा मिलनी चाहिए कि तुम अपने हृदय को उत्तम वस्तुओं से भरा रखो। परमेश्वर के वचन की कभी, कभी भी उपेक्षा न करो; वह तुम्हारे हृदय को उपदेशों से, तुम्हारे सिर को समझ से, और तुम्हारे अन्तःकरण को करुणा से समृद्ध करेगा; तब तुम्हारी बातचीत, जब वह तुम्हारे मुँह से निकलेगी, तुम्हारे प्राण से निकलेगी, और तुम्हारे भीतर की सब बातों के समान समृद्ध, अभिषेक से भरी और स्वादिष्ट होगी। बस तुम्हारा हृदय मीठे, उदार प्रेम से भरा रहे, तो जो धारा तुम्हारे होंठों से बहेगी, वह भी मीठी और उदार होगी। सबसे बढ़कर, यीशु को अपने हृदय में बसा लो, और तब तुम में से जीवन के जल की नदियाँ बह निकलेंगी, जो सूखार के उस कुएँ के जल से भी अधिक स्फूर्ति देनेवाली, अधिक शुद्ध और अधिक तृप्त करनेवाली होंगी, जिसमें से याकूब ने पिया था। मसीही के साथ अगम्य धन की उस बड़ी खान की ओर निकल पड़ो, और पवित्र आत्मा को पुकारो कि वह तुम्हारे हृदय को उद्धार के लिये समृद्ध करे। तब तुम्हारा जीवन और तुम्हारा चाल-चलन तुम्हारे संगियों के लिये एक वरदान होगा; और जब वे तुम्हें देखेंगे, तो तुम्हारा चेहरा चमकेगा, और तुम्हारा मुख परमेश्वर के स्वर्गदूत के समान होगा।
भरा हुआ हृदय
तुमने हमारी जल-कम्पनियों के बनाए हुए वे बड़े जलाशय देखे हैं, जिनमें हज़ारों घरों को पहुँचाने के लिये पानी रखा जाता है। अब, हृदय मनुष्य का जलाशय है, जिससे उसके जीवन की धाराएँ बहती हैं।
वह जीवन अलग-अलग नलियों से होकर बह सकता है—मुँह, हाथ, आँख; तो भी हाथ, आँख और होंठ से जो कुछ निकलता है, उन सबका स्रोत वही बड़ा सोता और केन्द्रीय जलाशय है, अर्थात् हृदय; और इसलिए यह दिखाना कठिन नहीं कि इस जलाशय को ठीक दशा और स्थिति में रखना कितना आवश्यक है, क्योंकि नहीं तो जो कुछ नलियों से होकर बहेगा, वह दूषित और सड़ा हुआ होगा। हृदय को केवल शुद्ध ही नहीं, वरन् भरा हुआ भी रखना आवश्यक है। केन्द्रीय जलाशय का पानी चाहे कितना ही शुद्ध क्यों न हो, जब तक जलाशय स्वयं भरा न हो, तब तक हमें भरपूर आपूर्ति नहीं मिल सकती। खाली सोता निश्चय ही खाली नलियाँ उत्पन्न करेगा; यन्त्र चाहे कितना ही सटीक क्यों न हो, और बाकी सब कुछ चाहे कितनी ही अच्छी व्यवस्था में क्यों न हो, फिर भी यदि वह जलाशय सूखा है, तो हम व्यर्थ ही पानी की बाट जोहेंगे। तो देखो, हृदय को भरा हुआ रखना कितना आवश्यक है; और यह आवश्यकता तुमसे यह प्रश्न पुछवाए: "परन्तु मैं अपने हृदय को भरा हुआ कैसे रखूँ? मेरी भावनाएँ प्रबल कैसे हों? मैं अपनी अभिलाषाओं को जलता हुआ और अपने उत्साह को प्रज्वलित कैसे रखूँ?" हे मसीही! एक पद है जो यह सब समझा देता है: "मेरे सब सोते तुझी में पाए जाते हैं," दाऊद ने कहा। यदि तुम्हारे सब सोते परमेश्वर में हैं, तो तुम्हारा हृदय भरपूर भरा रहेगा। यदि तुम कलवरी के चरणों में जाओगे, तो वहाँ तुम्हारा हृदय प्रेम और कृतज्ञता में नहा उठेगा। यदि तुम प्रायः एकान्त की घाटी में अपने परमेश्वर से बातें करते हो, तो तुम्हारा हृदय शान्त संकल्प से भर जाएगा। यदि तुम अपने स्वामी के साथ जैतून के पहाड़ पर जाते हो, कि उसके साथ यरूशलेम पर रोओ, तो तुम्हारा हृदय कभी न मरनेवाले प्राणों के प्रति प्रेम से भर जाएगा। यदि तुम निरन्तर अपनी प्रेरणा, अपना जीवन, अपना सम्पूर्ण अस्तित्व पवित्र आत्मा से पाते रहते हो, जिससे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते, और यदि तुम मसीह के साथ घनिष्ठ सहभागिता में जीते हो, तो इसका कोई भय नहीं कि तुम्हारा हृदय सूख जाएगा। जो प्रार्थना के बिना जीता है—जो थोड़ी-सी प्रार्थना के साथ जीता है—जो कभी-कभार ही वचन पढ़ता है—जो कभी-कभार ही ऊपर से नई प्रेरणा के लिये स्वर्ग की ओर ताकता है—वही वह मनुष्य होगा जिसका हृदय सूखा और बंजर हो जाएगा; परन्तु जो गुप्त में अपने परमेश्वर को पुकारता है—जो पवित्र एकान्त में बहुत समय बिताता है—जो परमप्रधान के वचनों पर ध्यान करने में आनन्दित होता है—जिसका प्राण मसीह को सौंपा हुआ है—जो उसकी परिपूर्णता में आनन्दित होता है, उसकी सर्व-पर्याप्तता में मगन होता है, उसके दूसरे आगमन के लिये प्रार्थना करता है, और उसके महिमामय आगमन के विचार में आनन्द पाता है—ऐसे मनुष्य का हृदय अवश्य ही उमड़ता हुआ होगा; और जैसा उसका हृदय है, वैसा ही उसका जीवन होगा। वह एक भरपूर जीवन होगा; वह ऐसा जीवन होगा जो कब्र में से भी बोलेगा, और भविष्य में अपनी गूँज जगाएगा। "सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर," और पवित्र आत्मा से विनती करो कि वह उसे भरा हुआ रखे; क्योंकि नहीं तो तुम्हारे जीवन से निकलनेवाली धाराएँ निर्बल, उथली और ऊपरी होंगी; और तुम्हारा जीना और न जीना बराबर ही होगा।
आह, ऐसा भरा हुआ, गहरा और विशाल हृदय मिल जाए! ऐसा हृदय रखनेवाला मनुष्य ढूँढ़ो, और वही वह मनुष्य है जिसमें से जीवन के जल बहेंगे, जो अपनी ताज़गी देनेवाली धाराओं से जगत को आनन्दित करेंगे।
धर्म का सुख
कोई मनुष्य हमारे प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह को सचमुच जान ले, तो वह सुखी मनुष्य होगा; और वह मसीह के आत्मा में से जितना गहरा पीएगा, उतना ही अधिक सुखी होता जाएगा। जो धर्म दुःखी रहने को कर्तव्य सिखाता है, वह ऊपर से ही झूठा है, क्योंकि परमेश्वर ने जब जगत बनाया, तब उसने अपने प्राणियों के सुख का ध्यान रखा। अपने चारों ओर की हर वस्तु को देखकर तुम यह सोचे बिना नहीं रह सकते कि परमेश्वर ने बड़े यत्न से, पूरे ध्यान के साथ, मनुष्य को प्रसन्न करने के उपाय ढूँढ़े हैं। उसने हमें केवल अत्यन्त आवश्यक वस्तुएँ ही नहीं दीं, वरन् उससे अधिक दिया है; केवल उपयोगी ही नहीं, वरन् शोभा की वस्तुएँ भी। बाड़ की झाड़ियों में खिले फूल, आकाश के तारे, प्रकृति की सुन्दरता, पहाड़ और घाटी—ये सब केवल इसलिए नहीं रचे गए कि हमें इनकी आवश्यकता थी, वरन् इसलिए कि परमेश्वर दिखाना चाहता था कि वह हमसे कितना प्रेम करता है, और वह कितना चाहता है कि हम सुखी रहें। तो यह सम्भव नहीं कि जिस परमेश्वर ने सुखी जगत बनाया, वह दुःख भरा उद्धार भेजे। जो सुखी सृष्टिकर्ता है, वह सुखी उद्धारकर्ता भी होगा; और जिन्होंने प्रभु की भलाई का स्वाद चख लिया है, वे गवाही दे सकते हैं कि धर्म के मार्ग "आनन्ददायक हैं, और उसके सब मार्ग कुशल के हैं।" और यदि यही जीवन सब कुछ होता, यदि मृत्यु हमारे सम्पूर्ण जीवन का गाड़ा जाना होती, और यदि कफ़न अनन्तकाल का भी कफ़न होता, तो भी मसीही होना एक उजली और सुखद बात होती, क्योंकि यह आँसुओं की इस घाटी को उजियाला देता है, और रोने की तराई के कुओं को प्रेम और आनन्द की धाराओं से लबालब भर देता है।
धर्म—वर्तमान का आनन्द
धर्म के अपने वर्तमान आनन्द हैं। तुम जो उन्हें जानते हो, बोलो, क्योंकि तुम बता सकते हो; तो भी तुम उन सबको गिना नहीं सकते। आह, पृथ्वी जिन्हें भला या बड़ा कहती है, क्या तुम उन सब आनन्दों के बदले अपना धर्म छोड़ दोगे? कहो, यदि तुम्हारा अमर जीवन बुझाया जा सकता, तो क्या तुम इस जगत के सारे राज्यों के बदले भी उसे दे दोगे? हे दरिद्रता की सन्तानो, क्या यह अन्धकार में तुम्हारे लिये दीपक नहीं रहा? क्या इसने तुम्हारे क्लेश की घनी छायाओं में तुम्हें उजियाला नहीं दिया? हे परिश्रम की सन्तानो, क्या यह तुम्हारा विश्राम, तुम्हारा मीठा चैन नहीं रहा? क्या परमेश्वर की चितौनियाँ तुम्हारे परदेशीपन के घर में तुम्हारे गीत गाने का विषय नहीं बनीं? हे दुःख की सन्तानो, जो पीड़ा से छटपटाते हो, क्या धर्म तुम्हारे कष्टों में तुम्हारे लिये मीठा विराम नहीं रहा? क्या रोगी के कमरे में धर्म का होना अनमोल नहीं? और हे व्यापारियो, तुम अपने विषय में आप ही बोलो। जीवन में से होकर निकलने के लिये तुम्हें कठिन संघर्ष करने पड़ते हैं। कभी-कभी तुम बड़े संकट की दशा तक पहुँचा दिए गए हो, और तुम सफल होगे या नहीं, यह मानो एक धागे पर लटका हुआ लगता था। क्या तुम्हारी कठिनाइयों में तुम्हारा धर्म तुम्हारे लिये आनन्द नहीं रहा? क्या इसने तुम्हारे मन को शान्त नहीं किया? जब तुम सांसारिक बातों के कारण खीझे और व्याकुल हुए, तब क्या तुम्हें अपनी कोठरी में जाकर, द्वार बन्द करके, गुप्त में अपने पिता को अपनी सारी चिन्ताएँ बताना सुखद न लगा? और हे धनवानो, यदि तुमने स्वामी से प्रेम किया है, तो क्या तुम भी यही गवाही नहीं दे सकते? उद्धारकर्ता के बिना तुम्हारा सारा धन तुम्हारे किस काम का होता? क्या तुम यह नहीं कह सकते कि तुम्हारे धर्म ने तुम्हारे सोने पर मुलम्मा चढ़ाया, और तुम्हारी चाँदी को और भी अधिक चमका दिया? क्योंकि तुम्हारे पास जो कुछ है, वह सब इस विचार से मीठा हो जाता है कि ये सब भी तुम्हारे पास हैं और मसीह भी। क्या परमेश्वर की कोई भी सन्तान कभी इसका इन्कार कर सकी है? हमने बहुत-से अविश्वासियों के विषय में सुना है जो मरते समय अपने अविश्वास पर पछताए: क्या तुमने कभी किसी के विषय में सुना कि उसने अपनी मृत्यु-शैया पर पवित्रता के जीवन की ओर दुःख के साथ पीछे मुड़कर देखा हो? हमने कभी, कभी भी किसी ऐसे मसीही को नहीं जाना जिसने अपने मसीही होने पर पछतावा किया हो। हमने मसीहियों को इतना दुःख उठाते देखा है कि हमें अचम्भा हुआ कि वे जीवित कैसे हैं; इतने कंगाल कि हम उनकी दुर्दशा पर चकित हुए; हमने उन्हें सन्देहों से इतना भरा देखा कि हमें उनके अविश्वास पर तरस आया; परन्तु हमने उन्हें तब भी यह कहते कभी नहीं सुना, "मुझे पछतावा है कि मैंने अपने आप को मसीह को सौंप दिया।" नहीं; मृत्यु की अन्तिम पकड़ में, जब हृदय और मन दोनों हार रहे थे, हमने उन्हें इस धन को अपनी छाती से लगाए, और अपने हृदय से चिपटाए देखा है, यह अनुभव करते हुए कि यही उनका जीवन, उनका आनन्द, उनका सब कुछ है। आह! यदि तुम सुखी होना चाहते हो, यदि तुम उद्धार पाना चाहते हो, यदि तुम अपने मार्ग पर धूप बिछाना चाहते हो, और बिच्छू-बूटी को उखाड़ना और काँटों को भोथरा करना चाहते हो, तो "पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी।" पहले सुख को मत ढूँढ़ो; पहले मसीह को ढूँढ़ो; और सुख उसके पीछे आएगा। पहले प्रभु को ढूँढ़ो, और तब वह इस जीवन में तुम्हारी सुधि लेगा, और आनेवाले जीवन में जो कुछ महिमामय है, उस सबसे वह उसका मुकुट सजाएगा।
मन फिरानेवाले पर आनन्द
स्वर्गदूत जानते हैं कि स्वर्ग के आनन्द क्या हैं, और इसलिए वे एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में आनन्द करते हैं। हम मोतियों के फाटकों, सोने की सड़कों, श्वेत वस्त्रों, सोने की वीणाओं और कभी न मुरझानेवाले फूलों के मुकुटों की बातें करते हैं; परन्तु यदि कोई स्वर्गदूत हमसे स्वर्ग के विषय में बात कर सकता, तो वह मुस्कुराकर कहता, "ये सब सुन्दर बातें केवल बच्चों की बोली हैं, और तुम छोटे बच्चे हो, और अनन्त आनन्द की महानता को समझ नहीं सकते; इसलिए परमेश्वर ने तुम्हें बच्चों की एक पहली पोथी और एक वर्णमाला दी है, जिससे तुम स्वर्ग के विषय में पहले मोटे-मोटे अक्षर सीख सको, परन्तु वह क्या है, यह तू नहीं जानता। हे नश्वर मनुष्य, तेरी आँख ने अब तक उसका वैभव नहीं देखा; तेरे कान अब तक उसके संगीत से मुग्ध नहीं हुए; तेरा हृदय अब तक उसके अनुपम आनन्दों से विभोर नहीं हुआ।" हाँ, हम बातें कर सकते हैं, सोच सकते हैं, अनुमान लगा सकते हैं और सपने देख सकते हैं, परन्तु उस असीम स्वर्ग को, जिसे परमेश्वर ने अपनी सन्तानों के लिये तैयार किया है, हम कभी नाप नहीं सकते। परन्तु स्वर्गदूत उसकी महिमा जानते हैं; इसी कारण वे उस मन फिरानेवाले पापी पर आनन्द करते हैं जो इस प्रकार ऐसी विरासत का वारिस बन गया है।
कभी न थकनेवाला आनन्द
किसने कभी समुद्र को नीरस कहा है? नाविक के लिये भी, जो कभी-कभी वर्षों तक लगातार उस पर यात्रा करता है, लहरों के उतार-चढ़ाव में, टूटती लहर के झाग की सफ़ेदी में, कलगीदार तरंग के घुमाव में, और हर लहर के पीछे उसके भाइयों की लम्बी कतार की खिलवाड़ भरी दौड़ में सदा एक ताज़गी रहती है। हममें से किसने कभी शिकायत की है कि सूर्य हमें बहुत थोड़ी विविधता देता है? क्या हुआ यदि वह भोर को वही घोड़े जोतता है, और अपने रथ से वही सुनहरा तेज चमकाता है, नीरस एकरूपता के साथ आकाश के शिखर पर चढ़ता है, फिर अपने रथ को नीचे की ओर हाँकता है, और अपने धधकते घोड़ों को आज्ञा देता है कि वे अपने जलते हुए खुरों को पश्चिम के गहरे समुद्र में डुबोएँ? या हममें से कौन उस रोटी से ऊबकर शिकायत करेगा जिसे हम खाते हैं, कि वह स्वाद में फीकी लगने लगी है? हम उसे आज खाते हैं, कल खाते हैं, परसों खाते हैं; बीते हुए वर्षों से हम उसे खाते आए हैं; फिर भी वही एक अपरिवर्तित भोजन मेज़ पर परोसा जाता है, और रोटी जीवन का आधार बनी रहती है। इन सांसारिक अनुभवों को स्वर्गीय भेदों की भाषा में ढालो। यदि मसीह तुम्हारा भोजन और तुम्हारी आत्मिक रोटी है; यदि मसीह तुम्हारा सूर्य, तुम्हारी स्वर्गीय ज्योति है; यदि मसीह प्रेम का वह समुद्र है जिसमें तुम्हारी भावनाएँ तैरती हैं, और जिसमें तुम्हारे सारे आनन्द पाए जाते हैं, तो यह सम्भव नहीं कि तुम मसीही लोग उसमें नीरसता की शिकायत करो। "वह कल और आज और युगानुयुग एक-सा है;" तो भी उसके पास "अपनी जवानी की ओस" है। वह सोने के मर्तबान में रखे उस मन्ना के समान है जो सदा एक-सा रहता था; परन्तु वह उस मन्ना के समान भी है जो स्वर्ग से उतरता था, हर भोर नया। वह मूसा की उस छड़ी के समान है जो सूखी थी और जिसका आकार नहीं बदलता था; परन्तु वह हमारे लिये हारून की छड़ी के समान भी है, जिसमें कलियाँ फूटती हैं, फूल फूलते हैं, और बादाम लगते हैं।
क्षमा का आनन्द
आह, यह कैसी आनन्दमय बात है कि प्राण में स्वर्गीय धूप की एक किरण हो, और परमेश्वर का वही शब्द सुनाई दे जब वह दिन के ठंडे समय हमारे प्राणों की वाटिका में फिरता हुआ हमसे कहता है, "हे पुत्र, तेरे पाप जो बहुत थे, सब क्षमा हुए।" उस स्वर्गीय शब्द की फुसफुसाहट हमारे हृदय को लगभग ईश्वरीय आनन्द तक उठा सकती है। वह ऐसा आनन्द देती है जिसकी बराबरी इस संसार के सारे सुख, धन और भोग-विलास भी नहीं कर सकते। स्वीकृति का ईश्वरीय चुम्बन पाना, अच्छे से अच्छा वस्त्र पहनाया जाना, हाथ में अंगूठी और पाँवों में जूतियाँ पहनना, और उस स्वर्गीय गाने-बजाने और नाचने का शब्द सुनना जिसके साथ लौटनेवाले उड़ाऊ पुत्रों का उनके पिता के घर में स्वागत होता है—यह सचमुच ऐसा आनन्द और ऐसी धन्यता है जिसे पाने के लिये सारे संसार भी दे देना थोड़ा है।
सच्ची आशीष
मसीह जब आशीष देता है, तो केवल वचन से नहीं, वरन् काम से भी आशीष देता है। सत्य के होंठ उससे अधिक की प्रतिज्ञा नहीं कर सकते, जितना प्रेम के हाथ निश्चय ही देंगे।
अनावश्यक कंगाली
बहुत-से विश्वासी सन्देह की झोंपड़ी में रहते हैं, जबकि वे विश्वास के महल में रह सकते थे।
स्तुति की आत्मा
"हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह; और जो कुछ मुझ में है, वह उसके पवित्र नाम को धन्य कहे।" हे मेरी स्मृति, जाग, और गीत के लिये विषय ढूँढ़। बता कि बीते दिनों में परमेश्वर ने मेरे लिये क्या-क्या किया है। हे मेरे विचारो, मेरे बचपन की ओर उड़ चलो, और पालने की दयाओं का गीत गाओ। मेरी जवानी और उसके आरम्भिक उपकारों पर फिर से दृष्टि करो। उस धीरजवन्त अनुग्रह का गीत गाओ जो मेरे भटकने में मेरे पीछे-पीछे चला, और जिसने मेरे विद्रोहों को सहा। वह आनन्दमय घड़ी फिर से मेरी आँखों के सामने लाओ जब मैंने पहली बार प्रभु को जाना, और उसकी दया की अनुपम कहानी फिर से सुनाओ। हे मेरे विवेक, जाग, और संगीत को ताल दे। हे मेरी समझ, आगे आ, और उसकी करुणा को तराजू में तौल। देख, क्या तू उसकी दयाओं के धूल जैसे छोटे-छोटे कणों को भी गिन सकती है। देख, क्या तू उस अगम्य धन का अनुमान लगा सकती है जो परमेश्वर ने अपने उस दान में, जो वर्णन से बाहर है, अर्थात् मसीह यीशु में, तुझे दिया है। उसके उस अनन्त प्रेम का वर्णन कर जो उसने तुझसे किया है। उस सनातन वाचा के खज़ानों का हिसाब लगा जो उसने तेरी ओर से बाँधी, और जो "सब बातों में ठीक की हुई और अटल" थी। उस ईश्वरीय बुद्धि का ऊँचे स्वर से गीत गा जिसने तेरे छुटकारे की युक्ति रची, उस प्रेम का जिसने उसकी योजना बनाई, और उस अनुग्रह का जिसने उसे पूरा किया। "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह!" क्योंकि क्या मेरे चारों ओर सारी प्रकृति उसकी स्तुति नहीं करती? यदि मैं चुप रहूँ, तो मैं सारी सृष्टि में एक अपवाद ठहरूँगा। क्या गर्जन उसकी स्तुति नहीं करता जब वह सेनाओं के परमेश्वर के कूच में नगाड़ों के समान गड़गड़ाता है? क्या पहाड़ उसकी स्तुति नहीं करते जब उनकी चोटियों पर के वन आराधना में झूमते हैं? क्या बिजली आधी रात के अन्धकार पर आग के अक्षरों में उसका नाम नहीं लिखती? क्या सारी पृथ्वी का एक स्वर नहीं है, और क्या मैं चुप रहूँ, क्या मैं चुप रह सकता हूँ? "हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह।"
आनन्द से बल
जब मन आनन्दित होता है, तभी वह परिश्रम कर सकता है। "यहोवा का आनन्द तुम्हारा दृढ़ गढ़ है।"
सदा आनन्दित रहो
जब कभी कोई मसीही मनुष्य अपनी परीक्षाओं में शोक और निराशा की आत्मा के आगे झुक जाता है; जब वह परमेश्वर से अनुग्रह नहीं माँगता कि संकट से पुरुषार्थ और प्रसन्नता के साथ लड़ सके; जब वह अपने स्वर्गीय पिता से बल और सान्त्वना नहीं माँगता जिससे वह हर समय प्रभु में आनन्दित रह सके, तब वह मसीही धर्म के उन ऊँचे, सामर्थी और उत्तम सिद्धान्तों का अनादर करता है, जो मनुष्य को सँभाले रखने और गहरे से गहरे क्लेश के समय में भी उसे सुखी बनाने के योग्य हैं। सुसमाचार का यह गौरव है कि वह हृदय को संकट से ऊपर उठा देता है; हमारे धर्म की महिमाओं में से एक यह है कि वह हमसे यह कहलवाता है, "चाहे अंजीर के वृक्षों में फूल न लगें, और न दाखलताओं में फल लगें, जैतून के वृक्ष से केवल धोखा पाया जाए और खेतों में अन्न न उपजे, तो भी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मगन रहूँगा, अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के द्वारा अति प्रसन्न रहूँगा।"
मसीही हर्ष
दाऊद जैसे अपनी भक्ति के लिये प्रसिद्ध था, वैसे ही अपने हृदय के आनन्द और हर्ष के लिये भी प्रसिद्ध था। सांसारिक लोग प्रायः सोचते हैं कि ईश्वरीय बातों पर मनन करने से मन उदास हो जाता है। परन्तु इससे बड़ी भूल कोई नहीं। कोई मनुष्य इतना सुखी नहीं कि यदि उसके पास धर्म होता तो वह और भी सुखी न होता। जिस मनुष्य के पास सांसारिक सुख की भरपूरी है, यदि उसके हृदय में परमेश्वर का अनुग्रह होता, तो वह अपने सुख का कोई भाग न खोता; वरन् वह आनन्द उसकी सारी समृद्धि में मिठास जोड़ देता; वह उसके कटोरे से बहुत-सी कड़वी तलछट छान देता, और उसे दिखाता कि छत्ते से और अधिक मधु कैसे निकाला जाए। भक्ति सबसे उदास मनुष्य को भी आनन्दित कर सकती है, और आनन्दित लोगों को और भी आनन्दित कर सकती है; वह चेहरे को स्वर्गीय हर्ष से चमका देती है, और आँखों को दस गुना अधिक तेज से दमका देती है; और सांसारिक मनुष्य चाहे कितना ही सुखी क्यों न हो, यदि वह प्रायश्चित्त करनेवाली दया के सोते के पास आए, यदि वह जान ले कि उसका नाम अनन्त जीवन की पुस्तक में लिखा है, तो वह पाएगा कि ऐसा अमृत भी है जो उसके अब तक पिए हुए हर रस से अधिक मीठा है। तब सांसारिक दयाओं पर छुटकारे की शोभा चढ़ जाएगी और उनका मूल्य बढ़ जाएगा। वे उसके लिये फिर वे छायामय भूत न रहेंगी जो धूप की किरण में घड़ी भर के लिये नाचते हैं। वह उन्हें और भी अधिक बहुमूल्य समझेगा, क्योंकि वे उसे मानो ईश्वरीय वसीयतनामे के कुछ पूरक लेखों में दी गई हैं, जिसमें इस समय के और आनेवाले जीवन की भी प्रतिज्ञा है। जब भलाई और करुणा जीवन भर उसके साथ-साथ बनी रहेंगी, तब वह कृतज्ञता भरी आशा के साथ उस भविष्य की ओर दृष्टि बढ़ा सकेगा जब वह यहोवा के धाम में सर्वदा वास करेगा, और भजनकार के साथ कह सकेगा, "तूने मुझको सर्वदा के लिये आशीषित किया है; तू अपने सम्मुख मुझको हर्ष और आनन्द से भर देता है।"
इस कारण तुम मगन होते हो
"इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अब कुछ दिन तक नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुःख में हो।" तो क्या कोई मसीही "मगन" हो सकता है जबकि वह "दुःख में" है? हाँ, निश्चय ही हो सकता है। नाविक हमें बताते हैं कि समुद्र के कुछ भागों में सतह पर एक तेज़ धारा एक ओर बहती है, जबकि नीचे गहराई में एक तेज़ धारा दूसरी ओर बहती है। वहाँ दो समुद्र आपस में मिलकर एक-दूसरे में बाधा नहीं डालते, वरन् सतह पर पानी की एक धारा एक दिशा में बहती है, और नीचे दूसरी धारा उलटी दिशा में। मसीही ठीक ऐसा ही है। सतह पर दुःख की एक धारा काली लहरों में लुढ़कती है, परन्तु नीचे गहराई में बड़े आनन्द की एक प्रबल अन्तर्धारा है जो वहाँ सदा बहती रहती है। क्या तुम पूछते हो कि इस बड़े आनन्द का कारण क्या है? प्रेरित हमें बताता है, "इस कारण तुम मगन होते हो।" उसका अर्थ क्या है? उसकी पत्री देखो, और तुम समझ जाओगे। वह लिख रहा है "उन परदेशियों के नाम, जो पुन्तुस आदि में तितर-बितर होकर रहते हैं।" और पहली बात जो वह उनसे कहता है, यह है कि वे "परमेश्वर पिता के भविष्य ज्ञान के अनुसार चुने गए हैं।" यही वह निश्चय है—"इस कारण तुम मगन होते हो।" आह! जब मसीही सबसे अधिक "नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुःख में" होता है, तब भी यह कैसी दया है कि वह जान सकता है कि वह अब भी परमेश्वर का चुना हुआ है! जो कोई मनुष्य निश्चय जानता है कि परमेश्वर ने "उसे जगत की उत्पत्ति से पहले चुन लिया है," वह भली-भाँति कह सकता है, "इस कारण मैं मगन होता हूँ।" आओ, इस पर विचार करें। परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी को बनाने से पहले, या आकाशमण्डल के खम्भों को उनके सुनहरे आधारों में रखने से पहले, अपना प्रेम मुझ पर लगाया; महान महायाजक की छाती पर उसने मेरा नाम लिखा; और उसकी अनन्त पुस्तक में वह लिखा है, कभी न मिटने के लिये—"परमेश्वर पिता के भविष्य ज्ञान के अनुसार चुने गए।" अरे, इससे तो मनुष्य का प्राण उसके भीतर उछल सकता है, और शरीर की दुर्बलताएँ उस पर जो भी उदासी लादें, वह कुछ भी न ठहरेगी; क्योंकि उसके उमड़ते आनन्द की यह प्रचण्ड धारा उसके शोक के बाँध को बहा ले जाएगी। हर बाधा को तोड़ती और लाँघती हुई, वह उसके सारे दुःखों पर ऐसी बाढ़ ले आएगी कि वे डूबकर ढँक जाएँगे, और फिर कभी उनका नाम भी न लिया जाएगा। "इस कारण तुम मगन होते हो।" आओ, हे मसीही! तुम उदास और गिरे हुए हो। एक क्षण के लिये सोचो: तुम परमेश्वर के चुने हुए और बहुमूल्य हो। चुनाव की घण्टी को अपने कानों में बजने दो—वाचा की वह प्राचीन सब्त की घण्टी; और उसके स्वरों में अपना नाम सुनाई देने दो, और कहो, मैं तुमसे विनती करता हूँ, कहो, क्या यह तुमसे यह नहीं कहलवाता कि "तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अब कुछ दिन तक नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दुःख में हो?"
फिर, तुम एक और कारण देखोगे। प्रेरित कहता है कि हम "पवित्र आत्मा के पवित्र करने के द्वारा आज्ञा मानने, और यीशु मसीह के लहू के छिड़के जाने के लिये चुने गए हैं"—"इस कारण हम मगन होते हैं।" क्या प्रभु यीशु मसीह की आज्ञाकारिता मेरी कमर पर बँधी है, कि वह मेरी शोभा और मेरा महिमामय वस्त्र हो? और क्या यीशु का लहू मुझ पर छिड़का गया है, कि मेरा सारा दोष और मेरा सारा पाप दूर करे? तो क्या मैं इस कारण मगन न होऊँ? आत्मा की सारी उदासियों में, जो मुझ पर आ सकती हैं, ऐसा क्या है जो मुझसे मेरी वीणा तुड़वा दे, चाहे मैं एक क्षण के लिये उसे मजनू वृक्षों पर टाँग ही क्यों न दूँ? क्या मैं आशा नहीं रखता कि मेरे गीत फिर से स्वर्ग तक चढ़ेंगे; और अभी भी, घने अन्धकार में से, क्या मेरे आनन्द की चिनगारियाँ दिखाई नहीं देतीं, जब मैं स्मरण करता हूँ कि यीशु का लहू अब भी मुझ पर है, और मसीहा की महिमामय धार्मिकता अब भी मुझे घेरे हुए है?
परन्तु प्रेरित की सबसे बड़ी और उत्साह देनेवाली सान्त्वना यह है कि हम "एक अविनाशी और निर्मल, और अजर विरासत के लिये जो हमारे लिये स्वर्ग में रखी है," चुने गए हैं, ठीक वैसे ही जैसे हम भी उसके लिये रखे गए हैं। यह सचमुच उसे मगन कर सकता है। वह मृत्यु के फाटकों के निकट पहुँच रहा है, और उसकी आत्मा दुःख में है, क्योंकि उसे वह सब पीछे छोड़ना है जो जीवन में प्रिय है। इसके अतिरिक्त, बीमारी स्वाभाविक रूप से उस पर उदासी ले आती है। परन्तु तुम उसके कमरे में उसके पास बैठते हो, और उससे इनकी चर्चा करने लगते हो
"उमड़ती बाढ़ के उस पार के मधुर खेत, जीवित हरियाली से सजे हुए।"तुम उसे यरदन के उस पार के कनान के विषय में बताते हो—उस देश के विषय में जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है—उस मेम्ने के विषय में जो सिंहासन के बीच में है, और उन सब महिमाओं के विषय में जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं; और तुम देखते हो कि उसकी धुँधली आँख स्वर्गदूतों की-सी चमक से जगमगा उठती है, "उसका दुःख" पूरी तरह जाता रहा है, और उसके हृदय की भाषा यह है—
"मैं यरदन के तूफ़ानी तट पर खड़ा हूँ, और लालसा भरी आँख डालता हूँ कनान के उस सुन्दर और सुखी देश पर, जहाँ मेरी सम्पत्ति रखी है।"आनेवाली महिमा और सुख की प्रत्याशा उसे ऐसे आनन्द से भर देती है जो "वर्णन से बाहर" है।
अध्याय 10 पूरा हुआ
मसीही जीवन का आनन्द