यूट्रोपियस के विरुद्ध
John Chrysostom

उपदेश · 16 मिनट का पठन

यूट्रोपियस के विरुद्ध

चित्र: John Chrysostom John Chrysostom

पाठ

सभोपदेशक 1:2

संक्षेप में

“व्यर्थ ही व्यर्थ”—यह उपदेश कॉन्स्टेंटिनोपल के महागिरजे में उस समय दिया गया जब यूट्रोपियस, वह पतित राजमंत्री जिसने कभी कलीसिया से शरण देने का अधिकार छीनने का यत्न किया था, काँपता हुआ उसी वेदी से लिपटा पड़ा था जिस पर उसने प्रहार किया था। यूहन्ना क्रिसोस्तोम उसे कुछ भी नहीं बख्शते, और फिर भी उसके लिये बिनती करते हैं, और उस मनुष्य के सत्यानाश को सामर्थ्य की रिक्तता और उस दया के विषय में एक उपदेश बना देते हैं जो बैरी को भी आश्रय देती है।

1. “व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है”—यह कहना सदा ही उचित है, परन्तु विशेष रूप से इस समय। अब कहाँ हैं तेरे कौंसुल-पद की वे जगमगाती साज-सज्जाएँ? कहाँ हैं वे दीप्तिमान मशालें? कहाँ है वह नृत्य, और नाचनेवालों के पाँवों का वह कोलाहल, और वे भोज और वे उत्सव? कहाँ हैं वे हार और रंगशाला के वे परदे? कहाँ है वह जयजयकार जो नगर में तुझे मिलता था, कहाँ है घुड़दौड़ के मैदान में उठनेवाला वह घोष और दर्शकों की वह चापलूसी? वे चले गए—सब के सब चले गए: वृक्ष पर एक ऐसी आँधी चली कि उसके सारे पत्ते झाड़कर गिर पड़े, और उसने उसे हमारे सामने बिलकुल नंगा और जड़ तक हिला हुआ कर दिखाया; क्योंकि उस झोंके का वेग इतना प्रचण्ड था कि उसने वृक्ष की इन सब जड़-नसों को झकझोर दिया और अब उसे जड़ समेत उखाड़ फेंकने की धमकी दे रहा है। अब कहाँ हैं तेरे वे बनावटी मित्र? कहाँ हैं तेरी वे मदिरा-गोष्ठियाँ और तेरे वे रात्रि-भोज? कहाँ है खुशामदियों का वह झुण्ड, और वह दाखमधु जो दिन भर उँडेला जाता था, और तेरे रसोइयों के गढ़े हुए वे नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन? कहाँ हैं वे लोग जो तेरी सामर्थ्य के आगे बिछे जाते थे और तेरी कृपा पाने के लिये सब कुछ करते और कहते थे? वे सब रात के दृश्यमात्र थे, और ऐसे स्वप्न जो दिन का उजियाला होते ही लोप हो गए: वे वसन्त के फूल थे, और वसन्त बीतते ही सब मुर्झा गए: वे एक छाया थे जो ढल गई—वे एक धुआँ थे जो छँट गया, बुलबुले जो फूट गए, मकड़ी के जाले जो फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। इसी कारण हम निरन्तर यह आत्मिक गीत गाते हैं—“व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है।” क्योंकि यह वचन निरन्तर हमारी दीवारों पर और हमारे वस्त्रों पर, बाज़ार में और घर में, गलियों में और द्वारों तथा ड्योढ़ियों पर, और सबसे बढ़कर हर एक जन के विवेक पर लिखा रहना चाहिए, और सदा मनन का विषय बना रहना चाहिए। और जब कि छलपूर्ण वस्तुएँ, और मुखौटे और ढोंग बहुतों को वास्तविक जान पड़ते हैं, तो हर एक जन को उचित है कि प्रतिदिन, रात्रि-भोज पर भी और प्रातःभोज पर भी, और सामाजिक सभाओं में, अपने पड़ोसी से कहे और अपने पड़ोसी से बदले में सुने—“व्यर्थ ही व्यर्थ, सब कुछ व्यर्थ है।” क्या मैं तुझसे निरन्तर यह नहीं कहता रहा कि धन एक भगोड़ा दास है? परन्तु तूने मेरी एक न सुनी। क्या मैंने तुझसे यह न कहा था कि वह एक कृतघ्न सेवक है? परन्तु तू न माना। देख, अब वास्तविक अनुभव ने सिद्ध कर दिया है कि वह केवल भगोड़ा और कृतघ्न सेवक ही नहीं, वरन् हत्यारा भी है; क्योंकि यही है जिसने अब तुझे भयभीत और काँपता हुआ कर दिया है। जब तू सत्य बोलने के लिये मुझे निरन्तर डाँटता था, तब क्या मैंने तुझसे यह न कहा था, “मैं तुझसे उनकी अपेक्षा कहीं अधिक प्रेम रखता हूँ जो तेरी चापलूसी करते हैं?” “मैं जो तुझे डाँटता हूँ, तेरी उनकी अपेक्षा कहीं अधिक चिन्ता करता हूँ जो तेरे दरबार में हाज़िरी बजाते हैं?” क्या मैंने इन बातों में यह भी न जोड़ा था कि जो घाव मित्र के हाथ से लगें वे बैरी के स्वेच्छा से किए हुए चुम्बनों से कहीं अधिक विश्वासयोग्य हैं। यदि तू मेरे घावों को सह लेता, तो उनके चुम्बन तेरा यह विनाश न करते; क्योंकि मेरे घाव स्वास्थ्य उपजाते हैं, परन्तु उनके चुम्बनों ने एक असाध्य रोग उत्पन्न किया है। अब कहाँ हैं तेरे पिलानेवाले, कहाँ हैं वे जो बाज़ार में तेरे लिये मार्ग खाली कराते और सब के कानों में तेरी प्रशंसा अनवरत गुँजाते थे? वे भाग गए, उन्होंने तेरी मित्रता से इनकार कर दिया, वे तेरे संकट के सहारे अपनी ही सुरक्षा का प्रबन्ध कर रहे हैं। परन्तु मैं ऐसा नहीं करता; नहीं, तेरी विपत्ति में मैं तुझे नहीं छोड़ता, और अब जब तू गिर चुका है, तब मैं तेरी रक्षा और सेवा-टहल करता हूँ। और जिस कलीसिया के साथ तूने बैरी का सा व्यवहार किया, उसी ने अपनी छाती खोलकर तुझे उसमें ले लिया है; जब कि जिन रंगशालाओं की तूने खुशामद की, और जिनके विषय में तू बारम्बार मुझ पर क्रोधित होता था, उन्हीं ने तुझे धोखा दिया और तेरा सत्यानाश किया। और फिर भी मैं तुझसे यह कहते कभी न थका, “तू ये काम क्यों करता है?” “तू कलीसिया को कुपित कर रहा है, और अपने आप को सिर के बल नीचे गिरा रहा है,” तौभी तू मेरी सब चेतावनियों से दूर भागता रहा। और अब घुड़दौड़ के मैदानों ने, तेरा धन चट कर लेने के बाद, तेरे विरुद्ध तलवार पैनी की है; परन्तु जिस कलीसिया ने तेरे कुसमय के क्रोध को सहा, वही तुझे जाल में से छुड़ा लेने की अभिलाषा से हर दिशा में दौड़ी फिर रही है।

2. और ये बातें मैं अब इसलिए नहीं कहता कि जो गिरा पड़ा है उसे पाँवों तले रौंदूँ, वरन् इस अभिलाषा से कि जो अब तक खड़े हैं वे और अधिक सुरक्षित हो जाएँ; इसलिए नहीं कि जो घायल हुआ है उसके घावों को कुरेदूँ, वरन् इसलिए कि जो अब तक घायल नहीं हुए उन्हें भले-चंगे बनाए रखूँ; इसलिए नहीं कि जो लहरों में डगमगा रहा है उसे डुबो दूँ, वरन् इसलिए कि जो अनुकूल वायु में नाव खेते जा रहे हैं उन्हें शिक्षा दूँ, कि कहीं वे भी लहरों में समा न जाएँ। और यह किस रीति से हो सकता है? मनुष्य के कामों के उलट-फेर पर दृष्टि रखने से। क्योंकि यदि यह मनुष्य भी इस उलट-फेर से डरता रहता, तो उसे इसका अनुभव कभी न होता; परन्तु जब न उसके अपने विवेक ने और न दूसरों की सम्मति ने उसमें कुछ सुधार किया, तो कम से कम तुम, जो अपने धन पर फूले नहीं समाते, उसकी विपत्ति से लाभ उठाओ: क्योंकि मनुष्य के कामों से अधिक निर्बल और कुछ नहीं। इसलिए उनकी तुच्छता जताने के लिये कोई चाहे जो भी शब्द काम में लाए, वह वास्तविकता से घटकर ही होगा; चाहे वह उन्हें धुआँ कहे, या घास, या स्वप्न, या वसन्त के फूल, या और कोई नाम दे; ऐसी नाशवान हैं वे, और अस्तित्वहीन वस्तुओं से भी अधिक शून्य; परन्तु यह कि अपनी इस शून्यता के साथ-साथ उनमें एक अत्यन्त घातक तत्त्व भी है, इसका प्रमाण हमारे सामने रखा है। क्योंकि इस मनुष्य से अधिक ऊँचा और कौन था? क्या वह धन में सारे संसार से बढ़कर न था? क्या वह प्रतिष्ठा की सबसे ऊँची चोटी पर न चढ़ गया था? क्या सब लोग उसके सामने काँपते और डरते न थे? तौभी देखो! वह बन्दी से भी अधिक अभागा हो गया है, दास से भी अधिक दयनीय, भूख से गलते हुए भिखारी से भी अधिक कंगाल; प्रतिदिन उसे पैनी तलवारों का और अपराधी की कब्र का और मृत्यु के लिये उसे बाहर ले जाते हुए बधिक का दर्शन होता है; और उसे यह भी सुध नहीं कि उसने कभी कोई सुख भोगा भी था, न सूर्य की किरण तक उसे सुहाती है, वरन् दोपहर को भी उसकी दृष्टि ऐसी धुँधली पड़ जाती है मानो वह घोर अन्धकार से घिरा हो। परन्तु मैं चाहे कितना ही यत्न करूँ, मृत्यु की घड़ी-घड़ी की प्रतीक्षा में उस पर जो पीड़ा स्वभावतः बीत रही है, उसे मैं शब्दों में तुम्हारे सामने न रख सकूँगा। परन्तु सचमुच मेरे किसी शब्द की आवश्यकता ही क्या है, जब कि उसने आप ही इसे हमारे लिये एक प्रत्यक्ष चित्र के समान स्पष्ट कर दिखाया है? क्योंकि कल जब राजभवन से लोग उसे बलपूर्वक घसीट ले जाने की मनसा से आए, और वह पवित्र वस्तुओं की शरण में भागा, तब उसका मुख वैसा ही था जैसा अब है—किसी मुर्दे के मुख से कुछ भी अच्छा नहीं: और उसके दाँतों का किटकिटाना, और उसकी सारी देह का थरथराना और काँपना, और उसका लड़खड़ाता स्वर, और हकलाती जीभ, और सचमुच उसका सारा रूप-रंग ऐसा था मानो उसका प्राण पत्थर हो गया हो।

3. अब ये बातें मैं उसे उलाहना देने या उसकी विपत्ति पर ताना मारने के लिये नहीं कहता, वरन् इस अभिलाषा से कि तुम्हारे मन उसकी ओर कोमल हो जाएँ, और तुम तरस खाने पर उभर आओ, और तुम इस बात पर राज़ी हो जाओ कि जो दण्ड उस पर पहले ही पड़ चुका है उतने से ही सन्तोष कर लो। क्योंकि हमारे बीच बहुत से ऐसे निर्दयी लोग हैं जो सम्भवतः इस बात के लिये मुझ में दोष निकालने को तत्पर हैं कि मैंने उसे पवित्रस्थान में शरण दी; इसलिए मैं उसके दुःखों का बखान इसी अभिलाषा से करता हूँ कि अपने वर्णन के द्वारा उनके कठोर हृदय कोमल कर दूँ।

क्योंकि हे प्रिय भाई, मुझे बता, तू मुझ पर क्यों क्रोधित है? तू कहता है कि इसलिए, कि जो कलीसिया से निरन्तर युद्ध करता रहा, वही उसी के भीतर शरण ले चुका है। परन्तु निश्चय हमें तो सबसे बढ़कर परमेश्वर की महिमा करनी चाहिए, कि उसने उसे ऐसे भारी संकट में पड़ने दिया कि वह कलीसिया की सामर्थ्य और उसकी करुणा, दोनों का अनुभव कर ले:—उसकी सामर्थ्य का, इसमें कि उसने कलीसिया पर जो आक्रमण किए थे उन्हीं के फल में उस पर यह भारी उलट-फेर आ पड़ा है: और उसकी करुणा का, इसमें कि जिस पर उसने आक्रमण किया था, वही अब उसके आगे अपनी ढाल कर देती है और उसे अपने पंखों तले ले लेती है, और उसे पूरी सुरक्षा में रखती है, अपने पुराने घावों में से किसी का बदला नहीं चुकाती, वरन् अत्यन्त प्रेम से अपनी छाती उसके लिये खोल देती है। क्योंकि यह किसी भी विजय-चिन्ह से बढ़कर महिमामय है, यह एक जगमगाती जय है, यह अन्यजातियों और यहूदियों दोनों को लज्जित करती है, यह कलीसिया का उजियाला मुख दिखाती है: इसमें कि अपने बैरी को बन्दी के रूप में पाकर वह उसे छोड़ देती है, और जब सब ने उसकी उजड़ी दशा में उसे तुच्छ जाना, तब वह अकेली एक स्नेही माता के समान उसे अपने आँचल में छिपा लेती है, और राजा के कोप का, और लोगों के रोष का, और उनके उमड़ते हुए बैर का सामना करती है। यह वेदी का एक शृंगार है। तू कहता है, यह तो अनोखा शृंगार है, जब कि दोषी पापी को, अन्धेर करनेवाले को, डाकू को वेदी पकड़ लेने दिया जाता है। नहीं! ऐसा मत कह: क्योंकि उस वेश्या ने भी तो यीशु के पाँव पकड़े थे, जो सबसे अधिक श्रापित और अशुद्ध पाप से कलंकित थी: तौभी उसका वह काम यीशु के लिये निन्दा का कारण न हुआ, वरन् उसके आदर और प्रशंसा का ही कारण ठहरा: क्योंकि उस अशुद्ध स्त्री ने उसका, जो शुद्ध था, कुछ बिगाड़ न किया, वरन् वह नीच वेश्या ही उसके स्पर्श से शुद्ध हो गई जो शुद्ध और निष्कलंक था। इसलिए हे मनुष्य, कुढ़ मत। हम तो उस क्रूस पर चढ़ाए हुए के दास हैं जिसने कहा, “इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहें हैं।” परन्तु तू कहता है, उसी ने तो अपने अध्यादेशों और भाँति-भाँति की व्यवस्थाओं के द्वारा यहाँ शरण का अधिकार काट डाला था। ठीक! तौभी अब उसने अनुभव से जान लिया है कि उसने क्या किया था, और उसने आप ही अपने कामों से सबसे पहले उस व्यवस्था को तोड़ा है, और सारे संसार के लिये एक तमाशा बन गया है; और चुप रहते हुए भी वह वहाँ से सब को चेतावनी का स्वर सुनाता है, यह कहते हुए, “ऐसे काम मत करना जैसे मैंने किए, कि तुम्हें वैसा न भोगना पड़े जैसा मैं भोग रहा हूँ।” वह अपनी विपत्ति के द्वारा एक शिक्षक के रूप में प्रकट होता है, और वेदी बड़ी आभा बिखेरती है, और अब इस बात से सबसे बड़ा भय उपजाती है कि उसने सिंह को बन्धन में डाल रखा है; क्योंकि राजपद का कोई भी चित्र तब कहीं अधिक शोभायमान होगा जब राजा केवल बैंजनी वस्त्र पहने और मुकुट धारण किए सिंहासन पर बैठा ही न देखा जाए, वरन् राजा के पाँवों के पास बर्बर लोग भी हाथ पीछे बँधे हुए अपने सिर झुकाए पड़े हों। और यह कि इसमें किसी लुभानेवाले तर्क का प्रयोग नहीं हुआ, इसके साक्षी तुम आप ही हो—यह उत्साह, और लोगों की यह भीड़। क्योंकि आज हमारे सामने का दृश्य सचमुच उज्ज्वल है, और यह सभा वैभवशाली, और मैं आज यहाँ उतनी बड़ी मण्डली देखता हूँ जितनी पवित्र फसह के पर्व पर होती है। इस प्रकार उस मनुष्य ने बिना बोले तुम्हें यहाँ बुला लिया है, और फिर भी अपने कामों के द्वारा तुरही के शब्द से भी अधिक स्पष्ट स्वर निकाल रहा है: और तुम सब आज यहाँ उमड़ आए हो—कुमारियाँ अपने कक्ष छोड़कर, और सुहागिनें स्त्रियों के अन्तःपुर छोड़कर, और पुरुष बाज़ार छोड़कर—कि तुम मनुष्य के स्वभाव को दोषी ठहराया हुआ देखो, और सांसारिक कामों की अस्थिरता को उघड़ी हुई देखो, और उस वेश्या-मुख को, जो थोड़े ही दिन पहले दमकता था (अन्धेर से मिली समृद्धि ऐसी ही होती है), किसी झुर्रीदार बुढ़िया से भी अधिक कुरूप देखो; यही मुख, मैं कहता हूँ, तुम ऐसा देख सकते हो कि विपत्ति की क्रिया ने मानो किसी स्पंज से उसका लेप और रंग-रोगन पोंछ डाला हो।

4. इस विपत्ति की सामर्थ्य ऐसी ही है: इसने उसको, जो प्रसिद्ध और प्रतापी था, मनुष्यों में सबसे तुच्छ कर दिखाया है। और यदि कोई धनी इस सभा में आए, तो वह इस दृश्य से बहुत लाभ उठाता है: क्योंकि जब वह उस मनुष्य को देखता है जो सारे संसार को हिला देता था, अब सामर्थ्य की इतनी ऊँची चोटी से नीचे घसीटा हुआ, भय से सिकुड़ा हुआ, खरगोश या मेंढक से भी अधिक भयभीत, बिना बेड़ियों के उस खम्भे से जकड़ा हुआ, जहाँ उसका भय ही उसकी साँकल का काम दे रहा है, आतंकित और थरथराता हुआ—तब वह अपना घमण्ड घटाता है, अपना अभिमान नीचे रखता है, और मनुष्य के कामों के विषय में वह बुद्धि पाकर जिसका पाना उसके लिये आवश्यक है, वह उस पाठ में उदाहरण के द्वारा सिखाया हुआ लौटता है जो पवित्रशास्त्र आज्ञा के द्वारा सिखाता है:—“हर एक प्राणी घास के समान है, और उसकी सारी शोभा घास के फूल के समान है: घास सूख जाती है, और फूल झड़ जाता है” या “वे घास के समान झट कट जाएँगे, और हरी घास के समान मुर्झा जाएँगे” या “उसके दिन धुएँ के समान उड़े जाते हैं,” और इसी प्रकार के सब वचन। फिर कंगाल जब भीतर आकर इस दृश्य को देखता है, तो वह अपने आप को तुच्छ नहीं समझता, न अपनी दरिद्रता के कारण रोता है, वरन् अपनी दरिद्रता का कृतज्ञ होता है, क्योंकि वही उसके लिये शरणस्थान है, और शान्त बन्दरगाह, और दृढ़ गढ़; और जब वह ये बातें देखता है, तो वह सौ बार यही चाहेगा कि जहाँ है वहीं बना रहे, बजाय इसके कि थोड़े समय के लिये सब मनुष्यों की सम्पत्ति का सुख भोगे और उसके बाद अपने ही प्राण के जोखिम में पड़े। क्या तू देखता है कि धनी और कंगाल, ऊँचे और नीचे, दास और स्वतंत्र—सब ने इस मनुष्य के यहाँ शरण लेने से कितना बड़ा लाभ उठाया है? क्या तू देखता है कि हर एक जन यहाँ से एक औषधि लिए हुए लौटेगा, केवल इस दृश्य से चंगा होकर? अच्छा! क्या मैंने तुम्हारे आवेश को नरम कर दिया, और तुम्हारा क्रोध निकाल दिया? क्या मैंने तुम्हारी निर्दयता बुझा दी? क्या मैंने तुम्हें तरस खाने पर उभार दिया? सचमुच मैं समझता हूँ कि हाँ; और तुम्हारे मुख और तुम्हारे बहते हुए आँसुओं की धाराएँ इसका प्रमाण हैं। तो फिर जब कि तुम्हारी कठोर चट्टान गहरी और उपजाऊ भूमि बन गई है, तो आओ हम बिना विलम्ब दया का कुछ फल उपजाएँ, और तरस की एक लहलहाती फसल दिखाएँ—सम्राट के सामने गिरकर, वरन् इससे भी बढ़कर दयालु परमेश्वर से बिनती करके, कि वह सम्राट के रोष को ऐसा नरम कर दे और उसका हृदय ऐसा कोमल कर दे कि वह वह सारा अनुग्रह हमें दे दे जो हम माँगते हैं। क्योंकि सचमुच उस दिन से, जब से यह मनुष्य यहाँ शरण के लिये भागा है, कोई छोटा परिवर्तन नहीं हुआ है; क्योंकि जैसे ही सम्राट को यह मालूम हुआ कि वह इस शरणस्थान की ओर दौड़ गया है, यद्यपि सेना उपस्थित थी, और उसके कुकर्मों के कारण भड़की हुई थी, और माँग कर रही थी कि वह वध के लिये सौंप दिया जाए, तौभी सम्राट ने एक लम्बा भाषण देकर सिपाहियों के रोष को शान्त करने का यत्न किया, और यह कहता रहा कि केवल उसके अपराध ही नहीं, वरन् जो कोई भला काम उसने किया हो वह भी हिसाब में लिया जाना चाहिए; और उसने कहा कि वह उन भले कामों के लिये कृतज्ञ है, और जो काम इसके विपरीत थे उनके लिये वह एक संगी प्राणी समझकर उसे क्षमा करने को तैयार है। और जब उन्होंने फिर उस पर दबाव डाला कि राजकीय प्रताप के अपमान का पलटा लिया जाए, और वे चिल्लाते, उछलते और अपने भाले भाँजते रहे, तब उसकी कोमल आँखों से आँसुओं की धाराएँ बह निकलीं, और उस पवित्र मेज़ की याद उन्हें दिलाकर जिसकी शरण वह मनुष्य लेने भागा था, वह अन्त में उनके क्रोध को शान्त करने में सफल हुआ।

5. इसके अतिरिक्त मुझे कुछ ऐसे तर्क भी जोड़ने दो जो हमारे ही विषय में हैं। क्योंकि तुम किस क्षमा के योग्य ठहरोगे, यदि सम्राट अपमानित होकर भी कुछ बैर नहीं रखता, परन्तु तुम, जिन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं भोगा, इतना क्रोध दिखाते हो? और इस सभा के विसर्जित हो जाने के बाद तुम पवित्र भेदों को कैसे छूओगे, और वह प्रार्थना कैसे दोहराओगे जिसमें हमें यह कहने की आज्ञा दी गई है, “जिस प्रकार हमने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर”—जब तुम अपने अपराधी से पलटा माँग रहे हो? क्या उसने तुम पर बड़े अन्याय और अपमान किए हैं? मैं इससे इनकार नहीं करता। तौभी यह समय न्याय का नहीं, वरन् दया का है; लेखा माँगने का नहीं, वरन् करुणा दिखाने का: दावों की जाँच करने का नहीं, वरन् उन्हें छोड़ देने का; दण्ड-आज्ञा और पलटे का नहीं, वरन् दया और अनुग्रह का। इसलिए कोई भी न झुँझलाए और न कुढ़े, वरन् आओ हम दयालु परमेश्वर से बिनती करें कि वह उसे मृत्यु से थोड़ा अवकाश दे, और इस आते हुए विनाश से उसे छुड़ाए, कि वह अपना अपराध त्याग सके; और आओ हम मिलकर उस दयालु सम्राट के पास जाएँ और कलीसिया के निमित्त, वेदी के निमित्त, उससे यह बिनती करें कि वह एक मनुष्य का प्राण पवित्र मेज़ के लिये भेंट के रूप में छोड़ दे। यदि हम ऐसा करें, तो सम्राट आप ही हमें ग्रहण करेगा, और उसकी प्रशंसा से भी पहले हमें परमेश्वर की स्वीकृति मिलेगी, जो हमारी दया का बड़ा प्रतिफल हमें देगा। क्योंकि जैसे वह निर्दयी और अमानुष जन को तुच्छ जानता और उससे बैर रखता है, वैसे ही वह दयालु और मनुष्य-प्रेमी जन का स्वागत करता और उससे प्रेम रखता है; और यदि ऐसा जन धर्मी हो, तो उसके लिये गूँथा जानेवाला मुकुट और भी अधिक महिमामय होता है: और यदि वह पापी हो, तो वह उसके पापों को अनदेखा कर देता है, और यह उसे उस दया के प्रतिफल के रूप में देता है जो उसने अपने संगी दास पर दिखाई। “क्योंकि” वह कहता है, “मैं बलिदान नहीं परन्तु दया चाहता हूँ,” और सारे पवित्रशास्त्र में तुम पाओगे कि वह सदा इसी को खोजता रहता है, और इसी को पाप से छुटकारे का साधन ठहराता है। इस प्रकार तब हम उसे अपने ऊपर प्रसन्न करेंगे, इस प्रकार हम अपने पापों से छूटेंगे, इस प्रकार हम कलीसिया को शोभा देंगे, इस प्रकार हमारा दयालु सम्राट भी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, हमारी सराहना करेगा, और सब लोग हमारी जयजयकार करेंगे, और पृथ्वी के छोर हमारे नगर की मानवता और नम्रता पर चकित होंगे, और जितने संसार भर में इन कामों का समाचार सुनेंगे वे सब हमारी बड़ाई करेंगे। इसलिए कि हम इन भली वस्तुओं का सुख भोगें, आओ हम प्रार्थना और बिनती में गिर पड़ें, और उस बन्दी को, उस भगोड़े को, उस शरणागत को संकट से छुड़ाएँ, कि हम आप भी हमारे प्रभु यीशु मसीह की कृपा और दया से आनेवाली आशीषों को प्राप्त करें, जिसकी महिमा और सामर्थ्य अब और युगानुयुग बनी रहे। आमीन।

इस उपदेश में पवित्रशास्त्र सभोपदेशक 1:2

सार्वजनिक डोमेन। मूल पाठ का स्रोत: मूल संस्करण.

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Chrysostom, John. “यूट्रोपियस के विरुद्ध.” Sermon. Ochorus, https://ochorus.com/hi/sermons/against-eutropius/.
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Chrysostom, John. “यूट्रोपियस के विरुद्ध.” Sermon. Ochorus. https://ochorus.com/hi/sermons/against-eutropius/.
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