परमेश्वर की बाट जोहना ·उसकी युक्ति के लिये

अध्याय 17 · 5 मिनट का पठन

एआई अनुवाद — मातृभाषी समीक्षा बाकी

उसकी युक्ति के लिये

पंद्रहवाँ दिन। परमेश्वर की बाट जोहना: उसकी युक्ति के लिये।

'परन्तु वे झट उसके कामों को भूल गए; और उसकी युक्ति के लिये न ठहरे।'—भजन संहिता 106:13।

यह बात जंगल में परमेश्वर के लोगों के पाप के विषय में कही गई है। उसने उन्हें अद्भुत रीति से छुड़ाया था, और वह उतनी ही अद्भुत रीति से उनकी हर घटी पूरी करने को तैयार था। परन्तु जब घटी का समय आया, तब 'वे उसकी युक्ति के लिये न ठहरे।' उन्होंने यह न सोचा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही उनका अगुवा और उनका दाता है; उन्होंने यह न पूछा कि उसकी योजनाएँ क्या हो सकती हैं। उन्होंने केवल अपने ही मन के विचार सोचे, और अपने अविश्वास से परमेश्वर की परीक्षा की और उसे रिस दिलाई। 'वे उसकी युक्ति के लिये न ठहरे।'

सब युगों में यही परमेश्वर के लोगों का पाप रहा है! कनान देश में, यहोशू के दिनों में, जिन तीन ही असफलताओं का वर्णन हम पढ़ते हैं, वे इसी एक पाप के कारण हुईं। ऐ नगर पर चढ़ाई करने में, गिबोनियों से वाचा बाँधने में, और सारे देश को अधिकार में लेने को आगे बढ़े बिना बस जाने में, वे उसकी युक्ति के लिये न ठहरे। और इसी रीति से बढ़ा हुआ विश्वासी भी इस सबसे सूक्ष्म परीक्षा के जोखिम में है—अर्थात् परमेश्वर का वचन लेकर उसके विषय में अपने ही विचार सोचना, और उसकी युक्ति के लिये न ठहरना। आओ, हम इस चेतावनी को मान लें और देखें कि इस्राएल हमें क्या सिखाता है। और आओ, हम इसे विशेष रूप से केवल ऐसा जोखिम न समझें जिसके सामने अकेला जन पड़ा है, वरन् ऐसा भी जिससे परमेश्वर के लोगों को अपने सामूहिक रूप में सावधान रहने की आवश्यकता है।

परमेश्वर के साथ हमारा सारा सम्बन्ध इसी पर टिका है, कि उसकी इच्छा हम में और हमारे द्वारा वैसे ही पूरी हो जैसे वह स्वर्ग में पूरी होती है। उसने प्रतिज्ञा की है कि वह अपने आत्मा के द्वारा, जो सब सत्य का मार्ग बतानेवाला है, अपनी इच्छा हम पर प्रगट करेगा। और हमारा स्थान यही ठहरता है कि हम उसकी युक्ति के लिये ठहरे रहें, क्योंकि हमारे विचारों और हमारे कामों का एकमात्र अगुवा वही है। हमारी कलीसिया की आराधना में, हमारी प्रार्थना-सभाओं में, हमारे सम्मेलनों में, और परमेश्वर के काम के किसी भी भाग में प्रबन्धकों, संचालकों, समितियों या सहायकों के रूप में होनेवाली हमारी सब सभाओं में, हमारा पहला उद्देश्य सदा यही होना चाहिए कि हम परमेश्वर की मनसा जान लें। परमेश्वर सदा अपनी इच्छा के मत के अनुसार काम करता है; उसकी इच्छा का वह मत जितना अधिक खोजा, पाया और आदर किया जाएगा, उतनी ही अधिक निश्चय और सामर्थ्य के साथ परमेश्वर हमारे लिये और हमारे द्वारा अपना काम करेगा।

ऐसी सब सभाओं का बड़ा जोखिम यह है कि इस बोध में कि हमारे पास हमारी बाइबल है, और परमेश्वर की अगुवाई का हमारा बीता हुआ अनुभव है, और हमारा खरा विश्वास-मत है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की हमारी सच्ची अभिलाषा है, हम इन्हीं पर भरोसा रखते हैं, और यह नहीं समझते कि हर पग पर हमें स्वर्गीय अगुवाई की आवश्यकता है और वह हमें मिल भी सकती है। परमेश्वर की इच्छा के ऐसे अंश हो सकते हैं, परमेश्वर के वचन के ऐसे प्रयोग, परमेश्वर की निकट उपस्थिति और अगुवाई के ऐसे अनुभव, उसके आत्मा की सामर्थ्य के ऐसे प्रगटीकरण, जिनके विषय में हम अब तक कुछ भी नहीं जानते। हो सकता है कि परमेश्वर तैयार हो, नहीं, परमेश्वर तैयार है ही, कि वह इन्हें उन प्राणों पर खोल दे जो पूरे मन से इस पर ठाने हुए हैं कि वह अपनी ही चाल पूरी रीति से चलाए, और जो धीरज के साथ इस बात के लिये ठहरने को तैयार हैं कि वह उन्हें प्रगट करे। जब हम उन सब बातों के लिये परमेश्वर की स्तुति करते हुए इकट्ठे होते हैं जो उसने की, सिखाई और दी हैं, तब हो सकता है कि उसी समय हम उससे बड़ी बातों की आशा न रखकर उसे सीमित कर रहे हों। जब परमेश्वर चट्टान में से जल दे चुका था, तभी उन्होंने रोटी के लिये उस पर भरोसा न रखा। जब परमेश्वर यरीहो को उसके हाथ में सौंप चुका था, तभी यहोशू ने समझा कि ऐ पर जय पाना निश्चित है; वह अब जान गया था कि परमेश्वर क्या कर सकता है, और परमेश्वर से युक्ति के लिये न ठहरा। और इसी रीति से, जब हम यह समझते हैं कि जिस बात की हम आशा रख सकते हैं उसके लिये परमेश्वर की सामर्थ्य को हम जानते और उस पर भरोसा रखते हैं, तब हो सकता है कि समय न देकर, और उसकी युक्ति के लिये ठहरने का अभ्यास निश्चय के साथ न बढ़ाकर, हम उसे रोक रहे हों।

किसी सेवक का इससे बढ़कर गम्भीर कोई कर्तव्य नहीं कि वह लोगों को परमेश्वर की बाट जोहना सिखाए। ऐसा क्यों हुआ कि कुरनेलियुस के घर में, जब 'पतरस ये बातें कह ही रहा था कि पवित्र आत्मा वचन के सब सुननेवालों पर उतर आया'? उन्होंने कहा था, 'अब हम सब यहाँ परमेश्वर के सामने हैं, ताकि जो कुछ परमेश्वर ने तुझ से कहा है उसे सुनें।' यदि परमेश्वर की युक्ति के लिये ठहरना न हो, तो हम परमेश्वर के सत्य की सबसे उत्साही व्याख्या देने और सुनने को इकट्ठे हो सकते हैं और तौभी आत्मिक लाभ थोड़ा ही हो। हमारी सब सभाओं में हमें पवित्र आत्मा पर विश्वास करने की आवश्यकता है, कि वही परमेश्वर के पवित्र लोगों का अगुवा और शिक्षक है, जब वे इस बात के लिये ठहरते हैं कि वह उन्हें उन बातों में ले चले जो परमेश्वर ने तैयार की हैं, और जो मनुष्य के चित्त में नहीं चढ़ी।

परमेश्वर की उपस्थिति का बोध पाने के लिये प्राण की और अधिक स्थिरता; परमेश्वर की बड़ी योजनाएँ क्या हो सकती हैं, इसकी अनजानता का और अधिक बोध; इस निश्चय पर और अधिक विश्वास कि परमेश्वर के पास हमें दिखाने को इससे बड़ी बातें हैं; और यह अधिक अभिलाषा कि वह आप ही नई महिमा में प्रगट हो: परमेश्वर के पवित्र लोगों की सभाओं के चिन्ह यही होने चाहिए, यदि वे इस उलाहने से बचना चाहते हैं, 'वे उसकी युक्ति के लिये न ठहरे।'

'हे मेरे मन, परमेश्वर के सामने चुपचाप रह!'

विषय-सूची

परमेश्वर की बाट जोहना Andrew Murray

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