परमेश्वर की बाट जोहना
दृढ़ और हियाव बाँधे हुए

अध्याय 10 · 5 मिनट का पठन · 6 मिनट का श्रवण

दृढ़ और हियाव बाँधे हुए

आठवाँ दिन। परमेश्वर की बाट जोहना: दृढ़ और हियाव बाँधे हुए।

'यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बाँध,

और तेरा हृदय दृढ़ रहे;

हाँ, यहोवा ही की बाट जोहता रह।'— भजन संहिता 27:14 (R.V.)

भजनकार ने अभी-अभी कहा था, 'यदि मुझे विश्वास न होता कि जीवितों की पृथ्वी पर यहोवा की भलाई को देखूँगा, तो मैं मूर्छित हो जाता।' यदि परमेश्वर पर उसका विश्वास न होता, तो उसका हृदय मूर्छित हो जाता। परन्तु परमेश्वर पर उस भरोसेमन्द निश्चय में, जो विश्वास देता है, वह अपने आप को और हमें सब बातों से बढ़कर एक ही बात स्मरण रखने को उभारता है,—कि परमेश्वर की बाट जोही जाए। 'यहोवा की बाट जोहता रह; हियाव बाँध और तेरा हृदय दृढ़ रहे; हाँ, यहोवा की बाट जोहता रह।' परमेश्वर की हमारी बाट जोहने की प्रमुख आवश्यकताओं में से एक, और उसकी धन्यता तथा आशीष के गहरे भेदों में से एक, यह शान्त, भरोसेमन्द प्रतीति है कि वह व्यर्थ नहीं है; यह विश्वास करने का हियाव कि परमेश्वर सुनेगा और सहायता करेगा; कि हम ऐसे परमेश्वर की बाट जोह रहे हैं जो अपने लोगों को कभी निराश कर ही नहीं सकता।

'हियाव बाँध और तेरा हृदय दृढ़ रहे।' ये शब्द बहुधा किसी बड़े और कठिन काम के सम्बन्ध में मिलते हैं, जब बलवन्त शत्रुओं की सामर्थ्य के साथ भिड़न्त सामने हो, और सारी मानवीय शक्ति की पूरी अपर्याप्तता प्रगट हो। क्या परमेश्वर की बाट जोहना ऐसा कठिन काम है कि उसके लिये भी ऐसे शब्दों की आवश्यकता पड़े, 'हियाव बाँध, और तेरा हृदय दृढ़ रहे'? हाँ, निश्चय ही। जिस छुटकारे के लिये हमें बहुधा बाट जोहनी पड़ती है, वह उन शत्रुओं से है जिनके सामने हम असमर्थ हैं। जिन आशीषों के लिये हम विनती करते हैं वे आत्मिक और सर्वथा अनदेखी हैं; ऐसी बातें जो मनुष्यों से हो नहीं सकतीं; स्वर्गीय, अलौकिक, ईश्वरीय वास्तविकताएँ। हमारे प्राण परमेश्वर के साथ संगति रखने के इतने कम अभ्यस्त हैं, और जिस परमेश्वर की हम बाट जोहते हैं वह बहुधा अपने आप को छिपाए हुए जान पड़ता है। हम जिन्हें बाट जोहनी पड़ती है, बहुधा इस भय में पड़ जाते हैं कि हम ठीक रीति से बाट नहीं जोहते, कि हमारा विश्वास बहुत निर्बल है, कि हमारी अभिलाषा उतनी सीधी या उतनी तत्पर नहीं जितनी होनी चाहिये, कि हमारा समर्पण पूरा नहीं है। हमारा हृदय भला ही मूर्छित हो जाए और रह जाए। भय और सन्देह के इन सब कारणों के बीच परमेश्वर का यह शब्द सुनना कितना धन्य है, ‘यहोवा की बाट जोहता रह! हियाव बाँध, और तेरा हृदय दृढ़ रहे! हाँ, यहोवा ही की बाट जोहता रह! स्वर्ग या पृथ्वी या अधोलोक की कोई वस्तु—कोई भी वस्तु तुझे इस पूर्ण निश्चय के साथ अपने परमेश्वर की बाट जोहने से न रोके कि वह व्यर्थ नहीं हो सकती।

इस प्रकार हमारा पाठ हमें जो एक ही सीख देता है वह यह है कि जब हम अपने आप को परमेश्वर की बाट जोहने में लगाएँ, तो हमें पहले ही से यह ठान लेना चाहिये कि यह इस अत्यन्त भरोसेमन्द आशा के साथ होगा कि परमेश्वर हम से मिलेगा और हमें आशीष देगा। हमें अपने मन में यह बात बाँध लेनी चाहिये कि कोई बात कभी इतनी निश्चित न थी जितनी यह कि परमेश्वर की बाट जोहना हमारे लिये अकथनीय और अनपेक्षित आशीष लाएगा। हम परमेश्वर को, और हम में उसके काम को, जो हम अनुभव करते हैं उसी से आँकने के इतने अभ्यस्त हैं कि बड़ी सम्भावना यही है कि जब हम उसकी बाट जोहना अधिक साधने लगेंगे, तब हम निराश हो जाएँगे, क्योंकि हमें उससे कोई विशेष आशीष नहीं मिलती। हमारे पास यह सन्देश आता है, 'सबसे बढ़कर, जब तुम परमेश्वर की बाट जोहो, तो उमड़ती हुई आशा के मन से जोहो। जिसकी तुम बाट जोह रहे हो वह परमेश्वर ही है—अपनी महिमा में, अपनी सामर्थ्य में, अपने प्रेम में, जो तुम्हें आशीष देने को तरसता है।'

यदि आप कहें कि आपको डर है कि कहीं आप व्यर्थ आशा से अपने आप को धोखा न दे बैठें, क्योंकि आपको अपनी वर्तमान दशा में ऐसी विशेष आशाओं के लिये कोई आधार न दिखता है और न अनुभव होता है, तो मेरा उत्तर यह है कि परमेश्वर ही वह आधार है जिसके कारण आप बड़ी-बड़ी बातों की आशा रख सकते हैं। ओह, यह सीख अवश्य सीख लीजिए। आप अपनी ही बाट जोहने नहीं जा रहे कि देखें आप क्या अनुभव करते हैं और आप में क्या परिवर्तन आते हैं। आप परमेश्वर की बाट जोहने जा रहे हैं, कि पहले यह जानें कि वह कौन है, और उसके बाद यह कि वह क्या करेगा। परमेश्वर की बाट जोहने का सारा कर्तव्य और सारी धन्यता इसी में जड़ पकड़े हुए है कि वह ऐसा धन्य जन है, भलाई और सामर्थ्य और जीवन और आनन्द से इतना भरा हुआ कि वह उमड़ पड़ता है, कि हम, चाहे कितने ही अभागे क्यों न हों, थोड़ी देर भी उसके सम्पर्क में नहीं आ सकते बिना इसके कि वह जीवन और वह सामर्थ्य गुप्त रीति से, चुपचाप हम में प्रवेश करने और हमें आशीष देने लगे। परमेश्वर प्रेम है! यही आपकी आशा का एकमात्र और पूर्णतः पर्याप्त आधार है। प्रेम अपनी भलाई नहीं चाहता: परमेश्वर का प्रेम तो बस उसका यह आनन्द है कि वह अपने आप को और अपनी धन्यता को अपनी सन्तानों को बाँट दे। आइए, और चाहे आप अपने आप को कितना ही निर्बल अनुभव करें, बस उसकी उपस्थिति में बाट जोहिए। जैसे किसी निर्बल, रोगी बीमार को धूप में बाहर लाया जाता है कि उसकी गरमी उसके भीतर तक उतर जाए, वैसे ही आप में जो कुछ अन्धकारमय और ठण्डा है उस सब के साथ परमेश्वर के पवित्र, सर्वशक्तिमान प्रेम की धूप में आइए, और वहीं बैठकर बाट जोहिए, इस एक ही विचार के साथ: मैं यहाँ हूँ, उसके प्रेम की धूप में। जैसे सूर्य उस निर्बल जन में अपना काम करता है जो उसकी किरणें ढूँढ़ता है, वैसे ही परमेश्वर आप में अपना काम करेगा। ओह, उस पर पूरा भरोसा रखिए। 'यहोवा की बाट जोहता रह! हियाव बाँध, और तेरा हृदय दृढ़ रहे! हाँ, यहोवा की बाट जोहता रह'!

'हे मेरे मन, परमेश्वर के सामने चुपचाप रह!'

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दृढ़ और हियाव बाँधे हुए

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