मार्गदर्शन का भेद
उसकी उपस्थिति के रहस्य में

अध्याय 8 · 17 मिनट का पठन

उसकी उपस्थिति के रहस्य में

एक अर्थ में परमेश्वर सदा हमारे निकट रहता है। वह कोई अनुपस्थित नहीं, जिसे स्वर्ग से उतारना या गहिरे जल से ऊपर लाना पड़े। वह निकट ही है। उसका अस्तित्व समस्त अस्तित्व में व्याप्त है। हर एक लोक, जो अंतरिक्ष के महासागर में किसी छोटे द्वीप के समान तैरता है, उसकी उपस्थिति के चिह्नों से भरा है, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे मित्र का घर उसके वहाँ रहने के अनेक प्रमाणों से भरा रहता है, जिनसे तुम जान लेते हो कि वह वहाँ रहता है, चाहे तुमने उसका मुख न देखा हो। हर एक केसर का फूल जो काली मिट्टी को फोड़कर निकलता है; वन का हर एक जुगनू; हर एक पक्षी जो तुम्हारे पैरों के आगे अपने घोंसले से उड़ जाता है; जो कुछ भी है — सब उतने ही परमेश्वर की उपस्थिति से भरे हैं जितनी वह झाड़ी जो उसकी आग से जल रही थी, जिसके सामने मूसा ने यह मानते हुए कि परमेश्वर वहाँ है, अपने पाँवों से जूतियाँ उतार दीं।

परन्तु हम इसे सदा अनुभव नहीं करते। प्राय: हम घण्टों, दिनों और सप्ताहों बिता देते हैं। कभी-कभी हम प्रार्थना के समयों में लगते हैं, हम उसके भवन में आते-जाते रहते हैं, जहाँ संगति की सीढ़ी टिकी है; फिर भी वह एक छाया, एक नाम, एक परम्परा, बीते दिनों का एक स्वप्न-सा बना रहता है।

"आह! क्या ही अच्छा होता कि मैं जानता कि वह मुझे कहाँ मिल सकता है, कि मैं उसके सिंहासन तक भी पहुँच पाता! देखो! मैं आगे जाता हूँ पर वह वहाँ नहीं; और पीछे जाता हूँ, पर उसका पता नहीं पाता: बाईं ओर, जहाँ वह काम करता है, पर मैं उसे देख नहीं पाता; वह दाहिनी ओर छिप जाता है, कि मैं उसे नहीं देख पाता।"

परमेश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में यह चूक उन कुछ लोगों के धन्य अनुभव से कितनी भिन्न है जिन्होंने उसकी निकटता को अनुभव किया है!

ब्रदर लॉरेंस, वह सीधे-सादे मन का रसोइया, हमें बताता है कि साठ वर्ष से अधिक समय तक उसने परमेश्वर की उपस्थिति का बोध कभी न खोया, वरन् अपने तुच्छ काम के कर्तव्य निभाते समय भी उसका उतना ही सचेत रहा जितना पवित्र भोज में सम्मिलित होते समय।

जॉन हाउ ने अपनी बाइबल के कोरे पृष्ठ पर लातिन में यह लिखा: "आज ही भोर को मैं एक अत्यन्त मनोहर और आनन्ददायक स्वप्न से जागा, जब दिव्य महिमा के उस उच्च सिंहासन से स्वर्गीय किरणों की एक अद्भुत और प्रचुर धारा मेरे खुले और फैले हुए हृदय में मानो प्रवेश कर गई। तब से मैंने प्राय: उस विशेष दिव्य अनुग्रह की उस अनुपम बानगी पर मनन किया है, और बारम्बार नए हर्ष के साथ उसके आनन्द का रसास्वादन किया है।"

क्या ये अनुभव, इतने धन्य और प्रेरक, उस भजनकार के अनुभव के समान नहीं जिसने भजन-संग्रह का सबसे लम्बा, और कुछ अर्थों में सबसे उदात्त भजन रचा? वह अद्भुत सामर्थ्य और सुन्दरता वाले अनुच्छेदों में एक के बाद एक विचार का सोना कूट-कूटकर निकाल रहा था, कि सहसा मानो उसे यह बोध हो गया कि जिसके विषय में वह कह रहा था, वही निकट आ गया है और उस पर झुका हुआ है। परमेश्वर की उपस्थिति का बोध उसके भीतरी मन में उतर आया। और आदर तथा परमानन्द से भरा अपना मुख ऊपर उठाकर उसने पुकारा, तू निकट है, हे यहोवा!" (भजन संहिता 119:151।)

यदि परमेश्वर की निकटता का ऐसा अनुभव सदा हमारा होता, हमें वायु या ज्योति के समान लपेटे रहता; यदि हम वैसा अनुभव कर पाते जैसा उस महान प्रेरित ने अरियुपगुस पर कहा था, कि परमेश्वर दूर नहीं, वरन् वही तत्त्व है जिसमें हमारा अस्तित्व है, जैसे गहरे, शान्त सरोवरों में समुद्री फूल — तब हम समझ पाते कि दाऊद का क्या अभिप्राय था जब उसने जीवन भर यहोवा के भवन में वास करने, उसकी सुन्दरता निहारने, उसके मन्दिर में खोज करने, और उसके मण्डप के गुप्त स्थान में छिपे रहने की बात कही (भजन संहिता 27)। और तब हम शान्ति, पवित्रता और सामर्थ्य का धन्य भेद भी पा लेते।

उसकी उपस्थिति के रहस्य में शान्ति है। "संसार में तुम्हें क्लेश होगा," हमारे स्वामी ने कहा, "परन्तु मुझ में तुम्हें शान्ति मिलेगी।" कहा जाता है कि एक कीड़े में यह सामर्थ्य होती है कि वह अपने चारों ओर वायु की एक झिल्ली बना लेता है, और उसी में घिरा हुआ गंदले, ठहरे हुए जोहड़ों के बीच में उतर जाता है, और अनहानि बना रहता है। और विश्वासी भी यह जानता है कि वह दिव्य उपस्थिति की उस अदृश्य झिल्ली में बन्द है, जैसे दूर की यात्रा तय कर चुका कोई पत्र उस लिफाफे में जो उसे हानि और मैल से बचाता है।

"जो दुष्टता के पीछे लगे रहते हैं वे मेरे निकट आ पहुँचे हैं," परन्तु तू निकटतम से भी निकट है, और मैं तेरी उपस्थिति के भीतरी घेरे में वास करता हूँ। मेरे चारों ओर के पहाड़ तेरी रक्षा के घोड़ों और रथों से भरे हैं। जो हथियार मेरे विरुद्ध बनाया जाए वह सफल न होगा, क्योंकि वह मुझ तक केवल तेरे द्वारा ही पहुँच सकता है, और तुझे छूकर बिना हानि पहुँचाए एक ओर फिसल जाएगा। परमेश्वर में होना ऐसा है मानो जब आँधी अपने बन्धन से छूट पड़ी हो तब किसी सुदृढ़ घर में हो; या किसी पवित्रस्थान में, जिसके द्वार पीछा करनेवाले को बाहर रोक देते हैं।

उसकी उपस्थिति के रहस्य में पवित्रता है। जिनेवा की झील के पार दूर से दिखते हिम-ढके आल्प्स पर्वतों का केवल दर्शन ही उस मुग्ध और लालायित आत्मा को इतना ऊँचा उठा देता और ऐसा रूपान्तरित कर देता है कि वह उन सब बुरी वस्तुओं को लज्जित कर देता है जो भीतरी जीवन में घुस आना चाहती हैं। किसी नन्हे बालक की उपस्थिति, अपनी निष्कपट पवित्रता के साथ, वासना को निःशस्त्र करती हुई देखी गई है, जैसे ज्योति की एक किरण जो सरीसृपों से भरी किसी गुफा में पड़कर चिपचिपे साँपों को तितर-बितर कर देती है। परन्तु तेरी उपस्थिति मेरे लिए क्या कुछ न करेगी, यदि मैं उसका निरन्तर बोध पा लूँ, और उसके गुप्त स्थान में वास करूँ? निश्चय ही, उस आग के हृदय में, चाहे मैं काला कोयला ही क्यों न होऊँ, मैं शुद्ध, दहकता और प्रखर बना रखा जाऊँगा!

उसकी उपस्थिति के रहस्य में सामर्थ्य है। मेरी पुकार, दिन-रात, सामर्थ्य के लिए है — आत्मिक सामर्थ्य के लिए। बुद्धि, वक्तृत्व, या मानवीय बल की सामर्थ्य नहीं। ये बुराई की सघन पंक्तियों को परास्त करने में काम नहीं आ सकतीं। तू सच कहता है कि यह न तो बल से होता है और न शक्ति से। तौभी जो मानव-आत्माएँ तुझे छूती हैं वे चुम्बकित हो जाती हैं, एक ऐसी आत्मिक शक्ति से भर जाती हैं जिसका न संसार खण्डन कर सकता है और न प्रतिरोध। आह! मुझे तुझे छूने दे! मुझे तेरे साथ अटूट सम्पर्क में वास करने दे, कि तुझ में से दिव्य ऊर्जा की एक के बाद एक लहरें मेरी रीती और आतुर आत्मा में और उसके पार बहती रहें, बहती हुई पर कभी न घटती हुई, और मुझे धन्य सेवकाई के जीवन में ऊँचा उठाती हुई, जो नीचे के जंगलों को यहोवा की वाटिका के समान बना दे।

परन्तु परमेश्वर की निकटता का यह बोध हम कैसे पाएँ और कैसे बनाए रखें?

क्या हमें बेतेल लौटना होगा, उसके पत्थर के खम्भे तक, जहाँ याकूब ने भी कहा था, "निश्चय इस स्थान में परमेश्वर है"? आह, हम बिना अभिषिक्त आँखों के उसके पास खड़े रह सकते थे, और न कोई सीढ़ी देखते, न कोई वाणी सुनते; जबकि वह कुलपिता हमारे जीवन की उन उजाड़ बंजर भूमियों में परमेश्वर को पा लेता, जिन्हें हम बिना श्रद्धा या आनन्द के रौंदते हैं।

क्या हमें उस गुफा के मुँह तक यात्रा करनी होगी जिसकी छाया में एलिय्याह खड़ा था, धीमी शान्त वाणी के संगीत से रोमांचित, जो गर्जन और आँधी की तुलना में और भी मधुर लगी? हाय! हम उस महिमामय उपस्थिति से अनजान उसके पास खड़े रह सकते थे; जबकि एलिय्याह, यदि आज जीवित होता, तो उसे पवन की फुसफुसाहट में, बालकों की तुतलाहट में, हृदय की धड़कनों की लय में पहचान लेता।

यदि हम अपनी वर्तमान दशा में प्रेरित पौलुस के पास खड़े होते जब वह तीसरे स्वर्ग तक उठा लिया गया, तो सम्भवतः हमें एक तम्बू बनानेवाले की दुकान, या किसी किराए के डेरे का एक अँधेरा कमरा ही दिखता — हम अँधेरे में, जबकि वह परमानन्द में; जबकि वह, यदि फिर से जीवित होता, तो हमारे भाप के जहाजों पर स्वर्गदूतों को, हमारे मन्दिरों में दर्शनों को, और हमारे अधिक धुँधले आकाशों की सौम्य महिमा के बीच स्वर्ग की ओर खुलते द्वारों को पहचान लेता।

वास्तव में, हम अपने साथ हर जगह ज्योति या अन्धकार का अपना घेरा लिए फिरते हैं। परमेश्वर आज भी संसार में उतना ही है जितना तब था जब हनोक उसके साथ-साथ चलता था, और मूसा उससे आमने-सामने बातें करता था। वह आज हमारे लिए भी उतना ही एक जीवित, उज्ज्वल, महिमामय सत्य होने को तैयार है जितना उनके लिए था। परन्तु दोष हमारा है। हमारी आँखें अभिषिक्त नहीं, क्योंकि हमारे हृदय ठीक नहीं। मन के शुद्ध लोग आज भी परमेश्वर को देखते हैं, और जो उससे प्रेम रखते और उसकी आज्ञाएँ मानते हैं, उन पर वह आज भी अपने आप को ऐसे प्रकट करता है जैसे संसार पर नहीं करता। हम अपने युग को दोष देना छोड़ दें; अपने आप को दोष दें। पतित हम हैं, वे नहीं।

तब आत्मा की वह कैसी दशा है जो परमेश्वर की उपस्थिति और निकटता को सबसे सहजता से पहचान लेती है? आइए हम उसकी उपस्थिति के रहस्य में सदा बने रहने और उसके मण्डप में छिपे रहने का धन्य भेद सीखने का यत्न करें (भजन संहिता 31:20)।

तब आरम्भ ही में यह स्मरण रख कि न तू, और न हमारी जाति का कोई भी, परमेश्वर की उपस्थिति का वह आनन्दमय बोध पा सकता है, सिवाय यीशु के द्वारा। पिता को कोई नहीं जानता, केवल पुत्र और वे जिन पर पुत्र उसे प्रकट करे; और पिता के पास कोई नहीं आता, केवल उसके द्वारा। यीशु के बिना परमेश्वर की उपस्थिति भय का विषय है, जिससे दुष्टात्माएँ नरक में छिप जाती हैं, और पापी लँगोट गूँथते या पेड़ों के बीच छिप जाते हैं। परन्तु उसमें सब बाधाएँ टूट जाती हैं, सब परदे फट जाते हैं, सब बादल छँट जाते हैं, और सबसे निर्बल विश्वासी भी वहाँ जी सकता है, जहाँ मूसा ठहरा था, उस आग के बीच में, जिसकी भस्म करनेवाली लपटों के सामने कोई अशुद्धता ठहर नहीं सकती।

"प्रभु के कार्य का कौन-सा भाग परमेश्वर की उपस्थिति के इस धन्य बोध से सबसे निकटता से जुड़ा है?"

उसके क्रूस के लहू के द्वारा ही पापी निकट लाए जाते हैं। अपनी मृत्यु में उसने न केवल परमेश्वर के कोमल प्रेम को प्रकट किया, वरन् हमारे पापों को दूर कर दिया, और हमारे लिए निष्कलंक सुन्दरता के वे वस्त्र बुन दिए, जिन्हें पहने हुए हम राजा के भीतरी उपस्थिति-कक्ष में आनन्द से स्वागत किए जाते हैं। स्मरण रख, यह कहा गया है, "मैं प्रायश्चित्त के ढकने पर से तुझ से बातें किया करूँगा।" वह सोने की पटिया जिस पर हारून महा पवित्रस्थान में प्रवेश करते समय लहू छिड़कता था, यीशु का प्रतिरूप थी। वही सच्चा प्रायश्चित्त का ढकना है। और जब तू उसकी मृत्यु में उसके साथ गहनतम संगति में प्रवेश करता है, और उसके स्मारक-भोज की आत्मा में सबसे निरन्तर जीता है, तभी तू उसकी निकटता को सबसे गहराई से अनुभव करेगा। अब भी, जैसे इम्माऊस में हुआ, वह रोटी तोड़ने में अपने आप को प्रकट करना प्रिय जानता है।

और क्या बस इतना ही है? क्योंकि यह मैंने बहुत बार सुना है, और फिर भी मैं उस गुप्त स्थान में वैसे नहीं जी पाता जैसा मैं चाहता हूँ।"

ठीक ऐसा ही है; और इसीलिए, जो हमारे किसी भी यत्न से न हो सकता, उसे हमारे लिए करने को, हमारे प्रभु ने अपने पिता से पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा पाई है, कि वह हमारे हृदयों में परमेश्वर की उपस्थिति को स्वयं ले आए। समझ ले कि जब तू मसीह का है, तो वह धन्य सहायक तेरा है। वह तेरे भीतर वैसे ही है जैसे तेरे प्रभु के भीतर था, और जिस मात्रा में तू आत्मा में जीता, आत्मा के अनुसार चलता, और अपना सम्पूर्ण स्वभाव उसके लिए खोल देता है, उसी मात्रा में तू अपने आप को उसका उपस्थिति-कक्ष बनता हुआ पाएगा, जो उसकी महिमा की ज्योति से जगमगा उठेगा। और ज्यों-ज्यों तू यह अनुभव करता है कि वह तुझ में है, त्यों-त्यों तू यह भी अनुभव करेगा कि तू सदा उसी में है। इसी प्रकार उस प्रिय प्रेरित ने लिखा, "इसी से हम जानते हैं कि हम उसमें बने रहते हैं और वह हम में, क्योंकि उसने हमें अपने आत्मा में से दिया है।"

"यह सब मैं जानता हूँ, फिर भी मैं अपने भीतर आत्मा के वास के इस अद्भुत तथ्य को अनुभव नहीं कर पाता; तब भला मैं उसमें अपने वास को कैसे अनुभव कर सकूँगा?"

इसका कारण यह है कि तेरा जीवन इतना उतावला है। तू मनन और प्रार्थना के लिए पर्याप्त समय नहीं निकालता। जब तक इन्द्रियाँ भोग-विलास में लगी रहती हैं, या नाड़ी तेज़ चलती रहती है, या मस्तिष्क अनेक उतावले विचारों की आवाजाही से भरा रहता है, तब तक न तेरे भीतर के परमेश्वर के आत्मा को और न तेरे बाहर परमेश्वर की उपस्थिति को पहचाना जा सकता है। जब पानी ठहर जाता है, तभी वह स्वच्छ हो जाता है, और नीचे के कंकड़ीले तल को दिखा देता है। शान्त रह, और जान ले कि परमेश्वर तेरे भीतर और चारों ओर है! आत्मा की चुप्पी में अनदेखा दृश्य हो जाता है, और अनन्त वास्तविक। सूर्य से चौंधियाई आँख उसके मण्डप की सुन्दरताओं को तब तक नहीं देख पाती जब तक उसे उस चकाचौंध से छूटने का समय न मिल जाए। कोई भी दिन परमेश्वर के सामने मौन प्रतीक्षा के अपने समय के बिना न बीते।

"क्या कोई और शर्तें भी हैं जिन्हें मुझे पूरा करना चाहिए, कि मैं उसकी उपस्थिति के रहस्य में बना रहूँ?"

मन का शुद्ध रह। हर एक स्वीकृत पाप आत्मा की खिड़कियों पर मैल की और मोटी परतें जमा देता है, जिससे परमेश्वर का दर्शन धुँधला पड़ जाता है। परन्तु अशुद्धता और स्वार्थ पर पाई गई हर एक जय आत्मिक दृष्टि को स्वच्छ कर देती है, और आँखों से मानो छिलके गिर पड़ते हैं। पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में अपने आप का इनकार कर, पाप को तनिक भी स्थान न दे, शैतान का सामना कर, और तू परमेश्वर को देखेगा।

अपवित्र आत्मा परमेश्वर को नहीं देख सकती, चाहे उसे स्वर्ग के बीच में ही क्यों न रख दिया जाए। परन्तु पवित्र आत्माएँ पृथ्वी की साधारण नित्य बातों के बीच परमेश्वर को देख लेती हैं, और हर जगह एक खुला दर्शन पाती हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के और अधिक निकट नहीं हो सकते थे, चाहे वे काँच के समुद्र के पास ही खड़े होते। वहाँ उनका एकमात्र लाभ यही होता कि उनके नश्वर और पापमय स्वभाव का परदा फट जाने के कारण, दर्शन अधिक सीधा और अधिक पूर्ण होता।

उसकी आज्ञाओं को मान। एक भी मात्रा या बिन्दु ऐसा न रहे जो न पहचाना जाए और न माना जाए। जिसके पास मेरी आज्ञाएँ हैं और जो उन्हें मानता है, वही है जो मुझ से प्रेम रखता है, और जो मुझ से प्रेम रखता है वह मेरे पिता का प्रिय होगा, और मैं उससे प्रेम रखूँगा, और अपने आप को उस पर प्रकट करूँगा। मूसा, वह विश्वासयोग्य सेवक, दर्शी भी था, और परमेश्वर से आमने-सामने ऐसे बातें करता था जैसे कोई अपने मित्र से बातें करता है।

प्रार्थना की आत्मा में बने रहो। कभी-कभी दर्शन तेरी अभिलाषा की उत्कटता और स्थिरता को परखने के लिए ठहर जाएगा। और कभी वह ऐसे आ जाएगा जैसे भोर आकाश पर चुपके से फैल जाती है, और तुझे पता चलने से पहले ही, तू अपने आप को इस बोध में पाएगा कि वह निकट है। वह सदा बिना घोषणा के, बन्द द्वारों के भीतर से अपने चेलों के बीच में सरक आया करता था। "तेरे पाँवों के चिह्न नहीं जाने जाते।"

ऐसे समयों में हम संत बर्नार्ड के साथ सचमुच कह सकते हैं: "वह आँखों से भीतर न आया, क्योंकि उसकी उपस्थिति किसी रंग से चिह्नित न थी; न कानों से, क्योंकि कोई शब्द न था; न श्वास से, क्योंकि वह वायु में न मिला; न स्पर्श से, क्योंकि वह अछूत था। तब तू पूछता है कि मैंने कैसे जाना कि वह उपस्थित था। इसलिए कि वह एक जिलानेवाली सामर्थ्य था। ज्यों ही वह भीतर आया, उसने मेरी सोई हुई आत्मा को जगा दिया। उसने मेरे उस हृदय को हिलाया और बेधा, जो पहले अजनबी, पथरीला, कठोर और रोगी था, कि मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कह सकी, और मेरे भीतर जो कुछ है उस सब ने उसके पवित्र नाम की स्तुति की।"

परमेश्वर से ऊँचे स्वर में बोलने की आदत डाल। सम्भवतः सदा नहीं, क्योंकि हमारी अभिलाषाएँ प्राय: इतनी पवित्र या गहरी होती हैं कि शब्दों में नहीं ढाली जा सकतीं। परन्तु यह अच्छा है कि परमेश्वर से घर में बैठे या मार्ग में चलते समय ऐसे बात करने की आदत डाल ली जाए मानो किसी उपस्थित मित्र से। परमेश्वर के साथ बातों पर चर्चा करने की आदत खोज — अपने पत्रों की, अपनी योजनाओं की, अपनी आशाओं की, अपनी भूलों की, अपने दुखों और पापों की। जब बातें उसकी उपस्थिति के शान्त प्रकाश में लाई जाती हैं तब वे बहुत ही भिन्न दिखने लगती हैं। कोई परमेश्वर से ऊँचे स्वर में देर तक बात नहीं कर सकता बिना यह अनुभव किए कि वह निकट है।

वचन पर बहुत मनन कर। यही वह वाटिका है जहाँ यहोवा परमेश्वर टहलता है, वह मन्दिर जहाँ वह वास करता है, वह उपस्थिति-कक्ष जहाँ वह दरबार लगाता है, और जहाँ वह उन्हें मिलता है जो उसे ढूँढ़ते हैं। वचन के द्वारा ही हम उस वचन को खाते हैं। और उसने कहा, "जो मेरा माँस खाता और मेरा लहू पीता है, वह मुझ में बना रहता है और मैं उसमें।"

मसीही कार्य में परिश्रमी बन। प्रार्थना का स्थान सचमुच उसकी प्रकट उपस्थिति का स्थान है, परन्तु वह उपस्थिति वहाँ से मिट जाती यदि नीचे हमारे लिए कर्तव्य की घण्टी बज चुकने के बाद भी हम वहीं ठहरे रहते। हम उसे सदा अपने आवश्यक काम में लगे रहते हुए पाएँगे: "जो धार्मिकता के काम करता है उससे तू मिलता है।" ज्यों ही हम अपने दैनिक कामों को निकलते हैं, उसकी उपस्थिति का दूत हमें अभिवादन करने आता है, और हमारे साथ-साथ चलने को मुड़ जाता है। "तुम जाओ," स्वामी ने कहा; "देखो, मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ।" केवल मन्दिर के आँगनों में, या एकान्त घाटियों में, या रोगियों के कमरों में ही नहीं, वरन् दैनिक कर्तव्य की आवाजाही में, जीवन की साधारण बातों में, अस्तित्व के नीरस समतल पर भी, हम सदा उसकी उपस्थिति के रहस्य में रह सकते हैं, और अहाब के सामने एलिय्याह की भाँति, और जकर्याह से गब्रिएल की भाँति कह सकेंगे, "मैं परमेश्वर के सम्मुख खड़ा रहता हूँ" (1 राजा 17:1; लूका 1:19)।

परमेश्वर की उपस्थिति को पहचानने की आदत डाल।"धन्य है वह मनुष्य जिसे तू चुन लेता और अपने निकट आने देता है, कि वह तेरे आँगनों में वास करे।" इसके समान कोई जीवन नहीं। यह अनुभव करना कि परमेश्वर हमारे साथ है; कि वह हमें कभी किसी ऐसे स्थान से होकर नहीं ले जाता जो उसके भी निकलने के लिए बहुत सँकरा हो; कि अब हम फिर कभी अकेले नहीं हो सकते, एक क्षण के लिए भी नहीं; कि वह हमें आगे और पीछे से घेरे हुए है, और अपने हाथ से ढाँपे हुए है; कि वह हमारे और अधिक निकट नहीं हो सकता, चाहे हम स्वर्ग में ही क्यों न होते। उसे मित्र, और निर्णायक, और सलाहकार, और मार्गदर्शक के रूप में पाना। यह अनुभव करना कि हमारे जीवनों में कभी कोई यरीहो ऐसा न होगा जहाँ यहोवा की सेना के प्रधान की उपस्थिति न हो, उन अदृश्य पर पराक्रमी दलों के साथ, जिनके धावे के सामने सब शहरपनाहें गिर पड़नी ही चाहिए। तब क्या आश्चर्य कि प्राचीन काल के पवित्र जन युद्ध में वीर हो उठते थे, जब वे उसे यह कहते सुनते थे, "मैं तेरे साथ हूँ; मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा और न त्यागूँगा।"

दूर हो जा, हे भय और शोक और अन्धकारमय घाटी के आतंक! "तू मुझे मनुष्यों की बड़ाई से अपनी उपस्थिति के गुप्त स्थान में छिपाएगा; तू मुझे झगड़ालू जीभों से अपने मण्डप में गुप्त रूप से रखेगा।"

अध्याय 8 पूरा हुआ

उसकी उपस्थिति के रहस्य में

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