मार्गदर्शन का भेद
बोझ, और उनके साथ क्या करें

अध्याय 6 · 17 मिनट का पठन

बोझ, और उनके साथ क्या करें

क्या आप विश्रामदिन मानते हैं? वह अक्षरशः सातवें दिन का विश्राम नहीं, परन्तु वह भीतरी विश्राम जिसका वह दिन धन्य प्रतिरूप था। जीवन के बाहरी कामकाज में जो ठहराव आता है वह तो उस भीतरी शान्ति का दृष्टान्त मात्र था, जो एक ही दिन के लिए नहीं परन्तु सब दिनों के लिए है; एक ही जाति के लिए नहीं परन्तु सब मनुष्यों के लिए है; केवल आनेवाले जीवन के लिए नहीं परन्तु अभी के लिए है। परमेश्वर के लोगों के लिए जो विश्रामदिन का पालन रखा है, जिसे उसके चारों ओर बहनेवाली आँधियों ने रत्ती भर भी घटाया नहीं, वह उन सब विश्वासयोग्य आत्माओं के लिए है, जो उसे जब चाहें ग्रहण कर सकती हैं और अपने साथ लिए फिर सकती हैं

"धुँधली गली और झगड़ते बाज़ार से होकर,

अधिक व्यस्त पाँवों से अपना दैनिक काम करते हुए,

क्योंकि उनकी गुप्त आत्माएँ एक पवित्र राग दोहराती रहती हैं।"

एक ऐसा राग जो परमेश्वर के जीवन और अस्तित्व के अनन्त तारों और सुरों से लिया गया है।

विश्रामदिन के पालन का रहस्य बोझ न उठाने में है। "यहोवा यों कहता है, अपनी आत्माओं के विषय में चौकस रहो, और विश्रामदिन के दिन कोई बोझ न उठाना, और न यरूशलेम के फाटकों से भीतर लाना। और न विश्रामदिन के दिन अपने घरों में से कोई बोझ बाहर ले जाना।" और आगे आनेवाले वचनों में एक राजा की निरन्तर उपस्थिति को बोझों के विषय में आज्ञाकारिता पर निर्भर बताया गया है (यिर्मयाह 17:24, आदि)। नहेमायाह इस बात में इतना आग्रही था कि उसने अपने सेवकों को नगर के फाटकों पर, जो सिय्योन के धूसर शिखर पर मुकुट सरीखे थे, इसलिए खड़ा किया, "कि विश्रामदिन के दिन कोई बोझ भीतर न लाया जाए" (नहेमायाह 13:19)।

और जो बात उन बीते दिनों में सच थी वह सदा सच है। जब बोझ खुलकर आत्मा के आँगन में लाए जाते हैं तब सच्चा विश्रामदिन का पालन हो ही नहीं सकता। यह तो वैसा ही है जैसे कोई तब सोने की कोशिश करे जब उत्साही, स्वस्थ बच्चों का झुंड घर में ऊपर-नीचे धमाचौकड़ी मचा रहा हो, और सब कमरों में लुका-छिपी खेल रहा हो। चिन्ता आत्मा के विश्राम को उतना ही भंग कर देगी जितना पाप करता है। और तब तक कोई आशा नहीं कि हम उस शान्ति को जान पाएँ जो सारी समझ से परे है, जब तक हम उन बोझ ढोनेवाले विचारों की लम्बी कतार के विरुद्ध द्वार बन्द करने की कला न सीख लें, जो नीचे के संसार से सदा पहाड़ी चढ़ते हुए आते रहते हैं, कि हमारी आत्मा को अपने पाँवों की खटखट और अपनी चिल्लाहट के कोलाहल से भर दें।

हमें यह वर्णन करने के लिए रुकने की आवश्यकता नहीं कि बोझ उठाना भारी बोझ से दबे हुए लोगों के लिए क्या परिणाम लाता है। वे चिन्ता से भरे चेहरे, थकी हुई आँख, और भारी कदम में स्पष्ट दिखाई देते हैं। परन्तु इनसे भी गहरे यह है कि प्रार्थना में सामर्थ्य नहीं रहती, परमेश्वर में आनन्द नहीं रहता, हरी चराइयों में लेटना नहीं होता, विश्राम के जल के किनारे चलना नहीं होता। जैसे ध्रुवीय प्रदेशों के हिमकण या उष्णकटिबन्ध के रेतकण किसी छोटी सी झोंपड़ी के सामने ऐसी दीवार खड़ी कर देते हैं जो प्रकाश को रोकने के लिए काफी होती है, वैसे ही चिन्ताएँ, जिनमें से हर एक अपने आप में अत्यन्त सूक्ष्म है, परमेश्वर के धन्य प्रकाश को आत्मा से बाहर रोक देती हैं और जहाँ परमेश्वर ने दोपहर चाही थी वहाँ आधी रात कर देती हैं।

बोझ उठाना दुःख की बात है कि परमेश्वर का अनादर करता है। जब संसार के लोग उनके चेहरों को देखते हैं जो अपने आप को परमेश्वर की सन्तान होने का दावा करते हैं, और उन्हें उन्हीं परछाइयों से अंधकारमय पाते हैं जो उनके अपने चेहरों पर पड़ी रहती हैं, तो वे भली भाँति सोच सकते हैं कि वह कैसा पिता है। मनुष्य चाहे जो भी दावे करे, हम उसे उसकी सन्तान के चेहरों से आँके बिना नहीं रह सकते। और यदि परमेश्वर को उसकी कुछ सन्तानों द्वारा उसके विषय में अनजाने में दी गई गवाही से आँका जाए, तो उसके शत्रुओं द्वारा उसके विरुद्ध कही गई कठोरतम बातें सच्चाई से बहुत दूर नहीं हैं।

ऐसी परिस्थितियों में अविश्वासी उचित ही तर्क कर सकता है, "या तो कोई परमेश्वर है ही नहीं, या वह सहायता करने में असमर्थ है, या वह वास्तव में प्रेम नहीं करता, या वह अपनी सन्तान की आवश्यकताओं के प्रति लापरवाह है। धर्म मेरे किस काम का होगा?"

हम या तो निन्दालेख हैं या बाइबिल; बन्दरगाह की बत्तियाँ हैं या चेतावनी के संकेत; आकर्षित करनेवाले हैं या दूर धकेलनेवाले; और हम इनमें से कौन हैं यह बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि हम अपने बोझों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

निःसन्देह चिन्ता और पीड़ा में अन्तर है; अपनी घबराहटों का स्वयं बनाया हुआ बोझ उठाने में, और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार दुःख उठाने में। हमें उन दुःखों को हल्का नहीं समझना चाहिए जिन्हें हमारा पिता ऐसी शिक्षाएँ सिखाने के लिए भेजता है जो केवल उसी पाठशाला में सीखी जा सकती थीं जिसकी बेंचों पर हमारा प्रभु आज्ञाकारिता सीखने के लिए हमसे पहले बैठ चुका है। ताड़ना पाई हुई आत्मा को धीरे-धीरे चलना चाहिए, और दुःख उठाने के लिए स्वयं को अलग कर लेना चाहिए। परन्तु यह बोझ उठाने से बहुत भिन्न है। पिता की चिन्ता के विषय में कोई सन्देह नहीं रहेगा, परिणामों के विषय में कोई घबराहट नहीं, लम्बे भविष्य के विषय में कोई पूर्वाशंका नहीं, जो विश्वास की दृष्टि को समुद्र के क्षितिज-किनारे के समान चमकता दिखाई देता है जिस पर सूर्य वैभव से चमक रहा होता है, यद्यपि ठीक ऊपर काले बादल मँडराते हों।

सवेरे भली भाँति जागने से पहले कभी-कभी हमें एक उदासी का भाव सा होने लगता है, मानो सब कुछ ठीक न हो; और एक शब्द सा उन बोझों की लम्बी कहानी सुनाता प्रतीत होता है जो उठाने हैं, और उन कठिनाइयों की जिनका घंटे बीतते-बीतते सामना करना है।

"हाय!" वह शब्द कहता है, "यह कितना दुःखदायी दिन होगा।"

"कैसे?" हम डरते हुए पूछते हैं।

"याद रख कि उस लेनदार से मिलना है, वह उलझा हुआ धागा सुलझाना है, वह चिढ़ शान्त करनी है, उन प्रचण्ड क्रोधों का सामना करना है। प्रार्थना करने से कोई लाभ नहीं। अच्छा हो कि जहाँ है वहीं पड़ा रह, और फिर जैसे-तैसे दिन घसीटता चला जा। तू उस शहीद के समान है जिसे मार डालने के लिए ले जाया जा रहा हो।"

और बहुत बार हम इस सुझाव के आगे झुक गए हैं, और थके-हारे घंटों को घसीटते चले गए हैं, अपना दैनिक काम ऐसे हाथों से करते हुए जो व्यस्त हैं और ऐसी शक्ति से जो उन बोझों में खप गई है जिन्हें हमने अपने ऊपर ले लिया है। परमेश्वर ने उन सब कर्तव्यों के लिए शक्ति देने की प्रतिज्ञा की है जो वह ठहराता है, परन्तु उन बोझों के लिए नहीं जिन्हें हम स्वयं इसके अतिरिक्त उठाने का चुनाव कर लेते हैं।

बोझ उठाने का एकमात्र उपाय यही है कि सब बोझ प्रभु पर डाल दिए जाएँ।भजन संहिता 55:22 के संशोधित संस्करण का हाशिया यों पढ़ता है: जो उसने तुझे दिया है उसे प्रभु पर डाल दे। प्रभु ने तुझे जो भी बोझ दिया है, उसे उसी को लौटा दे। चिन्ता के बोझ के साथ वैसा ही व्यवहार कर जैसा कभी पाप के बोझ के साथ किया था; घुटने टेककर उसे जानबूझकर यीशु के हाथ में सौंप दे। उससे कह, "हे प्रभु, मैं यह, और यह, और यह तुझे सौंपता हूँ। मैं इन्हें उठा नहीं सकता, ये मुझे कुचल रहे हैं; परन्तु मैं इन सबको निश्चय ही तुझे सौंपता हूँ कि तू इन्हें सम्भाले, ठीक करे, और व्यवस्थित करे। तूने मेरे पाप उठा लिए हैं। मेरे दुःख भी ले ले, और बदले में मुझे अपनी शान्ति, अपना विश्राम दे।" जैसा जॉर्ज हर्बर्ट बड़े अनोखे ढंग से कहते हैं, "हमें उन सबको मसीह की थैली में डाल देना चाहिए।"

क्या हमारा प्रभु यीशु कम से कम उतना ही सच्चा और विश्वासयोग्य न होगा जितना कोई सबसे अच्छा सांसारिक मित्र जिसे हमने कभी जाना है? और क्या हम सबके जीवन में ऐसे समय नहीं आए जब हम इतने थके या असहाय थे कि अपनी सहायता स्वयं न कर सके, और हमने कृतज्ञता से कोई थका देनेवाली चिन्ता किसी भले, बलवन्त मनुष्य को सौंप दी, यह निश्चय जानकर कि एक बार जब वह उसे सौंप दी गई, तो वह तब तक विश्राम न करेगा जब तक वह उसे अपनी सन्तुष्टि के अनुसार पूरा न कर ले? और निश्चय ही जिसने हमसे इतना प्रेम किया कि हमारे लिए मर गया, उस पर भरोसा किया जा सकता है कि वह हमारे दैनिक जीवन के सब छोटे-छोटे मामलों को भी ठीक कर देगा!

निःसन्देह एक-दो शर्तें हैं जिन्हें हमें पूरा करना ही होगा, इससे पहले कि हम अपने बोझ प्रभु यीशु के हाथ सौंप सकें और पूर्ण भरोसे के साथ उन्हें उसी के पास छोड़ सकें। हमें अपने पाप उस पर डाल देने चाहिए इससे पहले कि हम अपनी चिन्ताएँ डाल सकें। हमारे उद्धारकर्ता के काम के द्वारा हमें परमेश्वर के साथ मेल में होना चाहिए इससे पहले कि हमारे पक्ष में उसके अनुग्रहमय हस्तक्षेप पर विश्वास के द्वारा हमें परमेश्वर की शान्ति मिल सके। हमें परमेश्वर की योजना पर भी जीना चाहिए, बादल के नीचे ठहरे रहना, उसकी व्यवस्थाओं का पालन करना और जहाँ तक हम जानते हैं उसकी योजनाओं को पूरा करना। हमें विश्वास को प्रतिज्ञा से पोषण भी देना चाहिए, क्योंकि यह भोजन उसे फलने-फूलने के लिए अनिवार्य है। और जब हम यह सब कर चुकेंगे तब हमें यह इतना कठिन न लगेगा

"घुटने टेकना, और अपना बोझ डाल देना,

अपने परमेश्वर से प्रार्थना करते समय ही,

फिर हलके मन के उल्लास के साथ उठ खड़ा होना।"

I.‑‑ अनुग्रह में कैसे बढ़ें, इसका बोझ मसीह को सौंप दो।

कुछ गम्भीर लोगों के लिए यह बहुत बड़ा बोझ है। वे एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन में, एक वक्ता से दूसरे वक्ता के पास, हाथ में नोटबुक लिए जाते रहते हैं, आशीष (जैसा वे उसे कहते हैं) पाने के लिए इतने उत्सुक, और अकसर दान देनेवाले के व्यक्तित्व से अधिक दान की मस्ती के विषय में सोचते हैं। और क्योंकि वे औरों के विषय में सुनते हैं जिन्हें ऐसे अनुभव हुए हैं जिन्हें वे नहीं जानते, इसलिए वे निराशा और आत्म-भर्त्सना के भारी बोझ ढोते हैं।

उतनी ही अच्छी तरह शिशु-कक्षा का कोई बालक इसलिए झुँझला सकता है कि वह पाठशाला की ऊँची कक्षाओं में दाखिल नहीं किया गया। परन्तु वह अपनी भावी उन्नति के विषय में क्यों चिन्ता करे? उसका एकमात्र काम वे पाठ सीखना है जो उसके शिक्षक ने उसके लिए ठहराए हैं। जब ये सीख लिए जाएँगे तब यह उसी का काम होगा कि वह अपने विद्यार्थी को और सिखाए, और उसे ऐसे पदों तक बढ़ाए जहाँ अधिक तेजी से उन्नति की जा सके। और हमारा काम यह है कि हम उन पाठों को सीखें जो प्रभु यीशु दिन-प्रतिदिन हमारे सामने रखता है, और उसी पर छोड़ दें कि वह हमें परमेश्वर के पूर्ण ज्ञान और प्रेम में ले चले।

थोमा हमारे स्वामी की पाठशाला के मन्दबुद्धि विद्यार्थियों में से एक था। जो सब औरों को स्पष्ट था वह उसे दिखाई न देता था। परन्तु उसे डाँटने और अंधकार में टटोलने के लिए छोड़ देने के बजाय, स्वामी ने उससे विशेष भेंट की, और अपने जी उठने के आनन्दमय तथ्य को इतना सरल कर दिया कि वह सन्देही औरों के साथ आनन्द मना सका। अपनी मन्दबुद्धि के विषय में चिन्ता मत कर; इससे तो केवल यही होगा कि प्रिय स्वामी तुझ पर अधिक लम्बा और अधिक व्यक्तिगत ध्यान देगा। माताएँ अपनी सन्तानों में से रोगी, दुर्बल और मूढ़ पर सबसे अधिक परिश्रम करती हैं।

II.‑‑ मसीही अंगीकार बनाए रखने का बोझ मसीह को सौंप दो।

बहुत से लोग एक गुप्त भावना के कारण प्रभु के लोगों के साथ खुलकर अपनी पहचान बनाने से रुक जाते हैं कि वे कभी टिक न सकेंगे। वे अपने साथ यह घबराया हुआ भय लिए फिरते हैं कि कहीं वे अपने मसीही अंगीकार पर कलंक न लाएँ, और मसीह के झंडों को धूल में न घसीट दें। लगभग अनजाने में, वे दाऊद के वचन दोहराते हैं, "अब मैं किसी न किसी दिन शाऊल के हाथ से नाश हो जाऊँगा।"

इतने पवित्र विषय के बारे में ऐसी घबराहट मसीह के मुख को छिपा देगी, जैसे अछूती वाष्प की मालाएँ राजसी, हिम-ढँकी चोटियों को छिपा देती हैं। और इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं। जिसने बचाया वही थामे रख सकता है। जैसा उसका प्रेम का हृदय है, वैसा ही उसका सामर्थ्य का भुजबल है। वह ठोकर खाने से बचाए रखने में समर्थ है, और हमें अपनी महिमा की उपस्थिति के सामने निर्दोष प्रस्तुत करने में। परन्तु जब तक हम नाव से लिपटे रहते हैं, या उसकी बाजू पर एक हाथ भी टिकाए रखते हैं, तब तक हम उस थामे रखने की पर्याप्तता को कभी न जान पाएँगे। केवल तभी, जब हम पूरी तरह से स्वामी के सामर्थ्य पर भरोसा करते हुए ठीक जल पर पाँव रख देंगे, हम जान पाएँगे कि जो कुछ उसे सौंपा गया है उसे वह उस दिन के लिए कितने धन्य और निश्चित रूप से रखता है।

हमें उसमें प्रतिदिन बने रहने का बोझ भी नहीं उठाना चाहिए। बल्कि हम उसी पर भरोसा रखें कि वह हमें अपने ही में भरोसा करते और बने रहते हुए बनाए रखे। यदि हम ऐसा करें तो वह हमें निराश न करेगा, और प्रार्थना, बाइबिल के अध्ययन, और संगति के उन अभ्यासों के लिए हमें रुचि देकर हमारे विश्वास का उत्तर देगा, जो अटूट संगति के रहस्य हैं।

III. ‑‑ मसीही सेवा का बोझ मसीह को सौंप दो।

अपनी मण्डलियों को कैसे बनाए रखें; पड़ोसी सेवकों की प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी जगह कैसे टिकाए रखें; अपने तन्त्र की स्फूर्ति और कार्यक्षमता को कैसे बनाए रखें; साथी और अधीनस्थ सेवकों के बीच उठनेवाले मतभेदों को कैसे सुलझाएँ; उपदेशों और भाषणों के लिए पर्याप्त सामग्री कहाँ से पाएँ ‑‑ ऐसे-ऐसे बोझों के दबाव के नीचे कितने ही सेवक टूट जाते हैं! वे काम तो सह सकते थे, परन्तु चिन्ता नहीं।

फिर भी इस काम की जिम्मेदारी हमारी नहीं परन्तु हमारे स्वामी की है। वह इस संसार को अपनी बाहों में उठाए हुए है, जैसे कोई माता अपने रोगी बच्चे को। वह मनुष्य की अनन्त आवश्यकता की सेवा कर रहा है। वह अपने पिता की महिमा के लिए अपनी महान उद्धार की योजना को आगे बढ़ा रहा है। हमसे वह केवल इतना चाहता है कि हम उन दैनिक कामों को विश्वासयोग्यता से पूरा करें जो वह देता है।

नाविक-किशोर अपने झूले में गहरी नींद सोता रहे; कप्तान भली भाँति जानता है कि जहाज़ का मार्ग क्या है। दौड़-धूप करनेवाला लड़का जैसा उसे कहा जाता है वैसा लाने-ले जाने में सन्तुष्ट रहे; कम्पनी के अगुए जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं, और उनके पास अपनी सब आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भरपूर साधन हैं। और मसीही सेवक ऐसे बोझ उठाने से सावधान रहे जिन्हें केवल प्रभु ही उठा सकता है। प्रभु ने हमें अपने काम पर कभी न भेजा होता यदि उसने पहले यह न गिन लिया होता कि वह हमें पार निकालने में समर्थ है।

IV. ‑‑ भावनाओं के उतार-चढ़ाव का बोझ मसीह को सौंप दो।

हमारी भावनाएँ अप्रैल के मौसम के समान परिवर्तनशील हैं। वे असंख्य सूक्ष्म कारणों से प्रभावित होती हैं ‑‑ हमारा शारीरिक स्वास्थ्य, वायुमण्डल की दशा, अत्यधिक थकान, नींद की कमी ‑‑ साथ ही उनसे भी जो आत्मिक और भीतरी हैं। कोई भी तारवाला वाद्य हमारी अपेक्षा सूक्ष्म परिवर्तनों से इतना प्रभावित नहीं होता। और जब हम देखते हैं कि भावना की लहर उतर रही है तब हम उसे बड़े दुःख से मन में लगा लेते हैं।

ऐसे समय हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि यह देखें कि क्या हमारी भावना की कमी किसी जाने-बूझे पाप या चिन्ता के कारण है; और यदि नहीं, तो हम इस विषय में आगे की सारी घबराहट उसी को सौंप दें जो हमारी बनावट को जानता है, और स्मरण रखता है कि हम धूल मात्र हैं। और ज्योंही हम अंधेरी सीढ़ियों से नीचे उतरें, आइए हम उसकी इच्छा की रेलिंग को दृढ़ता से थामे रहें, अंधकार में होते हुए भी उसकी इच्छा पूरी करने के लिए तैयार। "मैं अब भी उतना ही तेरा अपना हूँ, अपनी आत्मा की गहराइयों में अब भी उतना ही तुझे समर्पित हूँ, जितना तब जब मैं तेरे प्रेम में सबसे अधिक सुखी अनुभव करता था।"

V. ‑‑ अन्य सब बोझ मसीह को सौंप दो।

बार-बार बदलते नौकर; अनुचित माँगें रखनेवाले मालिक; निर्दयी गपशप और निन्दा की कहानियाँ जो तुम्हारे विषय में फैलाई जा रही हैं; व्यापार की उलझनें और विपत्तियाँ; गुज़ारा चलाने की कठिनाइयाँ; अपना निवास, या स्थिति बदलने और दूसरा पाने का प्रश्न; बचपन के रोगों और जवानी की उद्दण्डता से भरी सन्तानें; बीमारी और बुढ़ापे के लिए प्रबन्ध। कुछ ऐसे हैं जिनके कारोबार विशेष रूप से कष्टदायक हैं, और चिन्ता के विचार उत्पन्न करने योग्य हैं; औरों का क्षितिज सदा भीख माँगने और दरिद्रगृह के दुबले-पतले प्रेतों से घिरा रहता है।

इनमें से कोई एक भी हमारे विश्राम को भंग कर देगा, जैसे एक भौंकता हुआ कुत्ता सबसे शान्त रात में हमारी नींद तोड़ सकता है, और जैसे आँख में धूल का एक कण उसे सबसे सुन्दर दृश्य का आनन्द लेने के अयोग्य कर देगा।

तब हमारे लिए इसके सिवा और कुछ नहीं कि हम अपना बोझ, वरन् अपने आप को भी, परमेश्वर पर लुढ़का दें (भजन संहिता 22:8, हाशिया)।

जब एक छोटा लड़का, अपने पिता को कुछ पुस्तकें हटाने में सहायता करने की कोशिश करते हुए, एक भारी पुस्तक के बोझ के नीचे सीढ़ियों पर गिर पड़ा, तो पिता उसकी सहायता के लिए दौड़ा और लड़के और बोझ दोनों को उठा लिया, और उन्हें अपनी बाहों में अपने कमरे तक ले गया। और क्या हमारा पिता इससे बुरा करेगा? वह अवश्य ही हमसे अनन्त प्रेम करता होगा, और सदा पास रहता होगा। "वह तुम्हारी चिन्ता करता है।"

परमेश्वर के साथ व्यवहार करने में यह एक अच्छा तरीका है, और यदि तुम्हें उसकी इच्छा का पूरा निश्चय न हो, तो यह कहना कि तुम जहाँ हो वहीं रहोगे, या जो करते आए हो वही करते रहोगे, जब तक कि वह भली भाँति स्पष्ट न कर दे कि वह क्या चाहता है और तुम्हें उसे करने का सामर्थ्य न दे। अपने मार्ग की जिम्मेदारी परमेश्वर पर लुढ़का दो (नीतिवचन 16:3, हाशिया), और यह आशा रखो कि वह जो भी परिवर्तन चाहता है उसे तुम पर इतने अचूक ढंग से प्रकट कर देगा, कि यद्यपि तुम मन्दबुद्धि और मूढ़ हो, तौभी तुम भूल न करो।

पोशाक, या गहनों, या सन्देहजनक बातों के विषय में चिन्ता मत करो। शैतान को यह अच्छा लगता है कि वह आत्मा का ध्यान मसीह से हटाकर उसी की ओर मोड़ दे। यह तो ऐसा है मानो कोई युवती अपने कमरे में एक घंटा यह सोचते हुए बिताए कि वह अपने प्रेमी से किस पोशाक में मिले, जो नीचे बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है। वह उसके पास चली जाए, और यदि वह चाहे, तो वह जल्दी ही उसे स्पष्ट बता देगा कि वह क्या पसन्द करता है। यीशु की उपस्थिति में प्रवेश करो, और तुम धुँधले प्रश्नों और सन्देहजनक विवादों में न छोड़े जाओगे, परन्तु तुम्हें उसकी इच्छा स्पष्ट और अचूक रूप से बताई जाएगी, और सदा निश्चित रूप से एक समय में एक ही बात के विषय में।

आर्चबिशप लेटन मधुरता से कहते हैं: "जब तुझे कुछ करना या सहना हो, जब तू किसी कारोबार के काम में लगा हो, तो जा, परमेश्वर को उसके विषय में बता, और उसे उससे अवगत करा ‑‑ हाँ, उसी पर उसका बोझ डाल दे ‑‑ और चिन्ता के मामले में तेरा काम पूरा हो गया। अब कोई चिन्ता नहीं, परन्तु अपने कर्तव्य में मधुर, शान्त परिश्रम, और अपने मामलों को सम्भालने के लिए उसी पर निर्भरता। परमेश्वर पर लुढ़क जा, सबकी एक ही गठरी बना ले; अपनी चिन्ताओं को, और उनके साथ अपने आप को भी, एक ही बोझ की भाँति, सब कुछ अपने परमेश्वर पर लुढ़का दे।"

और इस प्रकार, जब कोई बोझ आत्मा में नहीं लाए जाते, परन्तु तुरन्त धन्य प्रभु के हाथ सौंप दिए जाते हैं, तो परमेश्वर की शान्ति भीतरी मन्दिर को भर देगी। और यद्यपि बाहर जीभों का झगड़ा हो, और इस बेचैन संसार की रगड़ हो, जैसे विक्षुब्ध समुद्र जब शान्त नहीं रह सकता, और अनेक कामों का दबाव हो, तौभी ये बातें उस जीवन की प्राचीरों पर ही टूटकर बिखर जाएँगी जो परमेश्वर की घेरनेवाली उपस्थिति है; जबकि, भीतर, आत्मा एक अटूट विश्रामदिन मनाती रहती है, समुद्र की उन शान्त गहराइयों के समान, जो उन तूफानों से विचलित नहीं होतीं जो सतह को झाग और प्रकोप में मथ डालते हैं। "परमेश्वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे है, मसीह यीशु में तुम्हारे हृदयों और मनों की रक्षा करेगी।" (फिलिप्पियों 4:7)।

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