अध्याय 4 · 28 मिनट का पठन
तथ्य! विश्वास! भावना!
ये तीन शब्द चरित्र और जीवन के तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण घटकों के प्रतीक हैं। हम सब को किसी न किसी रूप में इनसे काम पड़ता है, परन्तु सबसे बढ़कर यह आवश्यक है कि हम इन्हें ठीक क्रम में रखें।
अधिकांश लोग भावना को पहले रखने का प्रयास करते हैं, ठीक उतनी ही सफलता के साथ जितनी यदि वे किसी घर की नींव डाले बिना उसकी सबसे ऊपरी मंज़िल बनाने का प्रयास करें। उनका क्रम है —
भावना, तथ्य, विश्वास
अथवा
भावना, विश्वास, तथ्य
दूसरे विश्वास को पहले खोजते हैं, उन तथ्यों पर विचार किए बिना जिन पर ही विश्वास और भावना विश्राम कर सकते हैं। वे उस मनुष्य के समान हैं, जो पाले भरी रात में गरम होना चाहते हुए भी उस आग के पास जाने से इनकार करता है जो चूल्हे पर चमकती हुई जल रही है।
एकमात्र सम्भव क्रम जो हृदय को आशीष और सान्त्वना पहुँचाएगा वही है जो हमारे शीर्षक में संकेतित है: —
परमेश्वर के तथ्य, वज्र की नींव के समान रखे हुए।
हमारा विश्वास, उन्हें समझता और उन पर विश्राम करता हुआ।
आनन्दित भावनाएँ, जो आती हैं, चाहे तुरन्त, या दिनों और महीनों के बीतने के बाद, जैसा परमेश्वर चाहे।
तथ्य।
बाइबल में जिन तथ्यों के विषय में हमें बताया गया है वे किसी नाले के पार रखे पैर धरने के पत्थरों के समान हैं। उस उथले स्थान तक पहुँचने से पहले जहाँ वे पड़े हैं, तू अचरज करता है कि तू पार कैसे होगा, परन्तु पानी के किनारे तक उतरने पर, वे एक तट से दूसरे तट तक की दूरी को पाट देते हैं। जब तू एक तक पहुँच जाता है तो तू दूसरे पर पग धर सकता है, और यों पार हो जाता है। यह मूर्खता है कि नाले के किनारे से दूर रहते हुए भावना से परामर्श किया जाए, या विश्वास ढूँढ़ा जाए, या यदि तू पत्थरों के उस आदिम पुल के ऊपर या नीचे से जाने पर हठ करे। तुझे उन तक उतरना होगा, उन पर विचार करना होगा, देखना होगा कि वे उस दलदली तल में कितनी दृढ़ता से जमे हैं, ध्यान देना होगा कि गाँव के लोग कितनी सहजता से आते-जाते हैं; तब तू उन पर भरोसा करने में समर्थ अनुभव करेगा, और अन्ततः, हल्के हृदय और बड़ी राहत के भाव के साथ, एक से दूसरे पर पग धरेगा।
आओ, हम कुछ तथ्यों को स्मरण करें जो पहले हमें विश्वास तक, और फिर भावना तक पहुँचाने में सहायक हो सकते हैं।
यह एक तथ्य है कि परमेश्वर हम में से हर एक से सबसे कोमल और सबसे विशेष प्रेम से प्रेम करता है। तू इस पर विश्वास न करे या इसे अनुभव न करे; गरम ग्रीष्म का सूर्य तेरी बन्द झिलमिली और परदे वाली खिड़की के सामने चमक रहा हो बिना भीतर अपने आप को दिखाए या अनुभव कराए; परन्तु परमेश्वर के तेरे प्रति प्रेम के तथ्य को समझने और सराहने में तेरी असफलता इसके होने को बदल नहीं सकती।
यह एक तथ्य है कि यीशु में तेरी तत्काल क्षमा और स्वीकृति के मार्ग से हर बाधा हटा दी गई है। परमेश्वर मरते हुए उद्धारकर्ता में था, पाप को दूर करता हुआ, हमारे पापों को अपनी ही देह पर काठ पर उठाता हुआ, संसार को अपने साथ मेल कराता हुआ। तू इस पर विश्वास न करे, या इसका आनन्द अनुभव न करे, परन्तु इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि ऐसा ही है।
अमरीका के महान युद्ध में उत्तर और दक्षिण के बीच सन्धि पर हस्ताक्षर होने के बाद, वनों में छिपे कुछ सैनिक थे, जो जामुन खाकर भूखों मरते हुए भी अपने घरों को लौट सकते थे। वे या तो शुभ समाचार जानते ही न थे, या उस पर विश्वास न करते थे, और अपने साथियों के अपनी पत्नियों और बालकों द्वारा स्वागत किए जाने के बहुत बाद तक भी भूखों मरते रहे। हानि उन्हीं की थी, परन्तु ज्ञान या विश्वास में उनकी असफलता इस तथ्य को नहीं बदलती थी कि शान्ति की घोषणा हो चुकी थी और उनके लौटने के लिए द्वार खुला पड़ा था।
किसी मित्र ने मेरे उस गाँव में, जिससे मैं गिरफ़्तारी और अपमान के भय से भाग आया हूँ, मेरे सारे कर्ज़ चुका दिए हों। उसने यह इतनी शीघ्रता से किया हो कि मेरी साख कभी बिगड़ी ही नहीं, या मेरा अच्छा नाम गँवाया ही नहीं। वहाँ मेरा स्वागत करने को वही सारा पुराना प्रेम और आदर प्रतीक्षा कर रहा हो। उसने मुझे यह बता भी दिया हो; परन्तु यदि मैं फिर भी अनुपस्थित रहूँ, और लौटने से इनकार करूँ, तो इस विषय में मेरी मूर्खता उन उपकारी कार्यों को अनकिया नहीं कर सकती, यद्यपि वह मेरे दुःख को बनाए रखती है।
यह एक तथ्य है कि ज्यों ही कोई आत्मा मसीह पर भरोसा करती है, वह मसीह के परिवार में जन्म ले लेती है, और सन्तान बन जाती है। इसमें कोई सन्देह नहीं। तू भला, या उत्सुक, या चिन्तित अनुभव न करे; तुझे हाल की असफलता का बोध भी हो; तू अपने दिन गहरे अवसाद की छाया में बिता रहा हो; परन्तु यदि तूने मसीह को ग्रहण किया है, और सचमुच उस पर भरोसा किया है, तो तू फिर से जन्मा है, मनुष्य से नहीं, न शरीर की इच्छा से, वरन् परमेश्वर से (यूहन्ना 1:12)। तू उड़ाऊ या असंगत सन्तान हो सकता है, परन्तु तू सन्तान है। यदि तू बुद्धिमान होता तो तू पिता की मेज़ पर सन्तान का स्थान लेता, और उसकी मुस्कान का आनन्द उठाता। वे तेरी बाट जोह रहे हैं। परन्तु यदि तू, दृष्टान्त के बड़े भाई के समान, बाहर ठण्ड ही में बना रहे, तो तू इस तथ्य को नहीं बदलता कि तेरा स्थान तेरे लिए तैयार है कि जब तू चाहे तब उसमें बैठ जाए।
यह एक तथ्य है कि परमेश्वर वह ले लेता है जो हम देते हैं, और ज्यों ही हम देते हैं। कोई लम्बा अन्तराल नहीं होता। जब हम छोड़ देते हैं, वह ग्रहण कर लेता है। जब हम अपने आप को उसकी वेदी पर रख देते हैं, तो हम तुरन्त उसके ठहराकर मुहरबन्द कर दिए जाते हैं। जब हम अपने आप को समर्पित करते हैं, वह ग्रहण कर लेता है। ईश्वरीय कार्य तत्क्षण होता है। सम्भव है कि तुझे इसका बोध न हो, और तू दिन-प्रतिदिन अपने आप को देता रहे। यदि तू ऐसा करता है, तो तू अपने आप को व्यर्थ की चिन्ता से लाद लेता है; तू वह देता रहता है जो अब तेरा देने को रहा ही नहीं, और तू उस धन्यता से चूक जाता है जो यह समझने में है कि धन्य प्रभु की पूर्ण सम्पत्ति, चल-वस्तु और दास होना क्या है; परन्तु तेरी भूल इस तथ्य को नहीं बदल सकती कि जब तूने पहली बार समर्पण के किसी गम्भीर कार्य में अपने आप को उसे सौंपा, तब परमेश्वर ने तुझे तेरे ही वचन पर ले लिया। "क्या हमारे विश्वास की घटी परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को व्यर्थ कर देगी?"
यह एक तथ्य है कि यीशु मसीह में हम स्वर्गीय स्थानों में बैठाए गए हैं।हम इसे बदल नहीं सकते। हम इस पर विश्वास न करें, या उन सारे विशेषाधिकारों का लाभ न उठाएँ जो इसमें निहित हैं, या यीशु के निकट होने की धन्यता का आनन्द न लें; तौभी ईश्वरीय क्रम में यही हमारी उचित स्थिति है। यदि हम विश्वास के पतले से पतले सूत्र से भी यीशु के साथ जुड़े हैं, तो हम उतने ही उसके साथ एक हैं जितने सबसे ऊँचे पवित्र जन; और जहाँ शिर है, वहाँ देह भी है। उसमें हम क्रूस पर मरे, और यों पवित्र व्यवस्था की धार्मिक माँगों को पूरा किया। उसमें हम कब्र में पड़े, और यों उस क्षेत्र से बाहर निकल गए जिस पर आकाश के अधिकार का हाकिम राज करता है। उसमें हम जी उठे और सारी प्रधानता और प्रभुता, प्रधानता और सामर्थ्य से कहीं ऊँचे चढ़ गए।
क्या शैतान मसीह के पाँवों के नीचे है? परमेश्वर के अभिप्राय में वह हमारे पाँवों के नीचे भी है। क्या मृत्यु और कब्र मसीह के सदा के लिए पीछे हैं? तो, परमेश्वर के अभिप्राय में, हम उन दोनों के ईस्टर वाले पार जा चुके हैं, और तूफ़ान की हवा-ओर हैं। जहाँ तक उनके डंक या आतंक का सम्बन्ध है, वे समुद्र के तट पर पड़े मरे हुए मिस्रियों के समान हैं। क्या महान महायाजक परदे के भीतर आकाशों में से होकर जा चुका है? तो, परमेश्वर के अभिप्राय में, हम भी बाहरी आँगन से पवित्र स्थान में जा चुके हैं, जहाँ हम सब मनुष्यों के लिए भेंट, बलिदान, विनतियाँ, और मध्यस्थताएँ चढ़ाते हैं।
यह सब अवास्तविक और असम्भव प्रतीत हो सकता है, जैसे किसी दीन सिंड्रेला को राजकुमार की दुल्हिन होने का विचार, तौभी यही हमारी सच्ची स्थिति है। ये अनन्त जगत के तथ्य हैं, चाहे तू इनका लाभ उठाए या न उठाए। ऐसे कम मामले दर्ज नहीं जिनमें दास बन्धन में भूखों मरते रहे क्योंकि वे स्वतन्त्रता का लाभ नहीं उठाना चाहते थे; और कुलीन जन एक कठोर और कठिन जीवन जीते रहे क्योंकि वे अपने अधिकारों का दावा नहीं करना चाहते थे!
यह एक तथ्य है कि पिन्तेकुस्त के वरदान में मसीह के हर सदस्य के लिए एक भाग प्रतीक्षा कर रहा है। उसने विद्रोहियों के लिए भी वरदान पाए। हर एक को अनुग्रह दिया गया है। पवित्र आत्मा की प्रतिज्ञा उतने ही लोगों के लिए है जितनों को हमारा प्रभु परमेश्वर बुलाएगा। निस्सन्देह उस भराव में, उस ईश्वरीय अभिषेक में, सेवा में उस अद्भुत सामर्थ्य में तेरा भी भाग है, जिसने प्रेरितों को डरपोक भेड़ों से बदलकर युद्ध में सिंह बना दिया। सम्भव है तूने कभी अपना दावा प्रस्तुत ही न किया हो, परन्तु ऐसा कोई अनुग्रह नहीं जो औरों के पास हो और जिसे तू न पा सके। सब कुछ तेरा है। परमेश्वर ने मसीह का अगम्य धन तेरे नाम कर दिया है। न आँख ने देखा, न कान ने सुना, न मनुष्य के मन में समाया वह सारा अनुग्रह और प्रेम और सामर्थ्य का भण्डार जो मसीह में तेरा है, ईश्वरीय जमा-कोष में तेरे लिए संचित होता हुआ। यह हज़ार अफ़सोस की बात लगती है कि तू भिखारी का जीवन जिए जब ऐसा धन और सामर्थ्य तेरा है; परन्तु यदि तू ऐसा करने पर हठ करे, तो तेरी मूर्खता और अन्धता इस तथ्य को नहीं बदलती कि परमेश्वर की परिपूर्णता मसीह में तेरी है।
ये उन्हीं तथ्यों में से कुछ हैं, जो परमेश्वर के वचन में हम पर प्रकट किए गए हैं, जो हमें व्याकुल भावना के नाले के पार दृढ़ खड़े रहने की भूमि तक पहुँचाएँगे। आओ, हम अपने विश्वास के विषय में चिन्ता करना, या भावना की नब्ज़ टटोलना छोड़ दें, और उन पर विश्राम करने आ जाएँ, यह निश्चय रखते हुए कि वे आकाश या पृथ्वी से भी अधिक अटल हैं।
विश्वास।
यदि तू सच्चा विश्वास चाहता है, तो उसके विषय में मत सोच, वरन् उन तथ्यों की ओर दृष्टि लगा जिनके विषय में हम कह रहे हैं। हमें अपने मित्रों पर भरोसा करने में कोई कठिनाई नहीं होती, क्योंकि हम दक्षिण की खिड़कियों के समान अपने हृदय उनके प्रेम के लिए खोल देते हैं। हम अपने पक्ष में उनके सारे हस्तक्षेपों को स्मरण करते हैं। हम उन सब को स्मरण करते हैं जो उन्होंने प्रतिज्ञा की और पूरा किया। विश्वास के विषय में हमारी कठिनाई कहाँ होती यदि हम उसके विषय में चिन्ता करना छोड़ दें, और विश्वास के विषय में — हमारे प्रभु यीशु मसीह में — लगे रहें?
विश्वास पन्थ से बढ़कर है। किसी पन्थ में हम किसी व्यक्ति या परिस्थिति के विषय में विश्वास करते हैं; परन्तु विश्वास में हम अपना भरोसा किसी व्यक्ति पर रख देते हैं। हमें केवल मसीह के विषय में विश्वास नहीं करना चाहिए, वरन् उसमें, जैसे लिविंगस्टन ने किया, जब एक अवसर पर सन्ध्या के समय क्रुद्ध जंगलियों की एक सेना ने उसका विरोध किया, और वह अन्धकार में चुपके से खिसक जाने को ललचाया गया; परन्तु उसकी आँख इस प्रतिज्ञा पर पड़ी, "मैं सदा तुम्हारे संग रहूँगा," और उसने लिखा, "मैं सो गया क्योंकि मैं जानता था कि यह एक सिद्ध सज्जन का वचन था।" मसीह के विषय में विश्वास मत कर, वरन् उसमें।
विश्वास अपने आप को किसी व्यक्ति से जोड़ता है। हम उस विश्वास के द्वारा उद्धार और आशीष पाते हैं जो हमारे उद्धारकर्ता के जीवन के तथ्यों में से होकर स्वयं उस तक पहुँचता है। हम प्रायश्चित्त पर नहीं, वरन् उस पर विश्राम करते हैं जिसने उसे किया; मृत्यु पर नहीं, वरन् उस पर जो मरा; पुनरुत्थान पर नहीं, वरन् उस पर जो जी उठा, ऊपर उठाया गया, और मध्यस्थता करने को सदा जीवित है; उसके विषय में दिए गए कथनों पर नहीं, वरन् उसी पर जिसके विषय में वे दिए गए हैं।
अनेक बार खोजी यह प्रश्न पूछता है, "क्या मुझ में ठीक प्रकार का विश्वास है?" यह एक आवश्यक प्रश्न है, क्योंकि एक मरा हुआ और खोटा विश्वास होता है जो चरम संकट में हमें धोखा दे जाएगा, जैसे बुरी तरह डिब्बाबन्द माँस ने उस उत्तरी ध्रुव के अन्वेषण दल को दिया, जिन्होंने अपने भण्डार के पत्थर-ढेर पर लौटने पर उसे बेकार पाया, और भूखों मर गए।
एक सरल उत्तर है, "हर वह विश्वास जो यीशु की ओर मुड़ता है वही ठीक विश्वास है।" वह कोई सचेत उल्लास न लाए। वह उतना ही निर्बल हो जितना उस स्त्री का उसके वस्त्र के छोर पर स्पर्श। वह उतना ही छोटा और तुच्छ हो जितना राई का एक दाना। वह उतना ही निराश हो जितनी पतरस की पुकार, "हे प्रभु, बचा, नहीं तो मैं डूबा जाता हूँ!" परन्तु यदि उसकी सबसे गहरी लालसा मसीह — मसीह — मसीह है, तो वही वह नन्हा सूत्र है जो खोई हुई आत्मा को उन भूमिगत मार्गों में से होकर, जिनमें वह लगभग डूब चुकी थी, जीवन की ज्योति में ले आएगा।
सच्चा विश्वास परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर भरोसा करता है। अपने पहले के जीवन में मैं यह विचारकर अधिक विश्वास खोजा करता था कि परमेश्वर कितना महान है, कितना धनी, कितना बलवन्त; वह मुझे अपने काम के लिए धन क्यों न दे, जब वह इतना धनी है? वह मेरे उत्तरदायित्वों का सारा बोझ क्यों न उठाए, जब वह इतना सामर्थी है? तथापि, इन विचारों ने मेरी उस अब निश्चित धारणा से कम सहायता की कि वह पूर्णतः विश्वासयोग्य है; मसीह में अपनी वाचा की प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य, अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति विश्वासयोग्य, और उस आत्मा के प्रति विश्वासयोग्य जो उसकी स्पष्ट पुकार पर उसके लिए किसी उद्यम में बाहर निकल पड़ी है। हम हियाव और आशा खो बैठें, हमारा सिर चकरा जाए और हमारा हृदय क्षीण हो, प्रीतम और मित्र दूर खड़े रहें, हमारे बैरियों की ठट्ठा करती वाणियाँ सुझाएँ कि परमेश्वर भूल गया या त्याग गया; परन्तु वह विश्वासयोग्य बना रहता है, वह अपने आप का इनकार नहीं कर सकता, वह उस असहाय सन्तान को नहीं ठुकरा सकता जिसे उसने जन्म दिया है, इसलिए कि वह रुग्ण है, वह उन उत्तरदायित्वों को नहीं फेंक सकता जिन्हें उसने अपने ऊपर लिया है। उसने रचा है, और उसे उठाना होगा।
कई बार मैं घोर आवश्यकता में परमेश्वर के पास गया हूँ, जो तन्त्रिका-अवसाद और हृदय की मलिनता से और बढ़ गई थी, और कहा है, "मेरा विश्वास टिमटिमाकर बुझ रहा है। उसका हाथ मानो लकवाग्रस्त है, उसकी आँख अन्धी, उसका पुराना आनन्दित गीत सदा के लिए मौन। परन्तु तू विश्वासयोग्य है, और मैं तुझी पर भरोसा कर रहा हूँ!" आत्मा को यह भाता है कि परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के पीछे जाकर स्वयं उस तक पहुँचे जिसने उन्हें दिया, जैसे पत्नी को अपने पति द्वारा विवाह-संस्कार में की गई प्रतिज्ञाएँ उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं होती जब वह उसके विषय में निश्चिन्त है, और उसके हाथ का दबाव अनुभव करती है।
अपने विश्वास की चिन्ता मत कर; परमेश्वर की विश्वासयोग्यता पर भरोसा कर। यदि वह तुझे जल पर पग धरने को कहता है, तो वह जानता है कि वह तुझे सुरक्षित नाव तक वापस ला सकता है। जब कोई ऐल्प्स-पर्वत का पथ-प्रदर्शक तुझे बर्फ़ के किसी उबड़-खाबड़ भाग के पार ले चलता है, तो वह विचारता है कि यदि तू पूरी तरह ढह भी जाए, तो क्या वह अपनी लोहे सी पकड़ और गठीले शरीर के बल से तुझे पार न ले जा सकेगा। जो लोहा रक्त के लिए है, वही परमेश्वर की विश्वासयोग्यता का विचार विश्वास के लिए है। "सारा ने सामर्थ्य पाई . . . क्योंकि उसने प्रतिज्ञा करने वाले को विश्वासयोग्य जाना"; अब्राहम विश्वास के द्वारा दृढ़ होता गया, और परमेश्वर की महिमा करता रहा।
विश्वास फल लाता है। वह ऐसा किए बिना रह नहीं सकता, क्योंकि वह आत्मा को मसीह से जोड़ देता है, ताकि उसके जीवन की ऊर्जा विश्वास की धमनी के द्वारा उसमें उँडेली जाए, और, जैसे वह भीतर आती है, वैसे ही उसे अपने लिए बाहर निकलने का मार्ग बनाना ही होगा। फल विश्वास करने वाली आत्मा से (मानो) निचोड़ लिया जाता है। चातक क्यों गाता है? वह रह नहीं सकता, क्योंकि वसन्त की आत्मा उसके हृदय में उँडेली गई है। डाली क्यों फल लाती है? वह रह नहीं सकती, क्योंकि जीवन-शक्तियाँ सदा जड़ से ऊपर उमड़ती रहती हैं। बालक अपनी माता से मिलने क्यों दौड़ता है? वह रह नहीं सकता, क्योंकि उसके हृदय ने उसका स्वभाव पी लिया है। इसी प्रकार विश्वासी, मसीह से जुड़ा हुआ, उसके हृदय से अनुग्रह पर अनुग्रह पाता है, और उसके अन्तर्वास की बहुतायत से उसका जीवन बोलता है।
ऐसा विश्वास पाना कठिन नहीं। अपनी इच्छा को मसीह के पक्ष में रख दे — कोई क्षणिक अभिलाषा नहीं, वरन् अपने अस्तित्व की सम्पूर्ण चाह और चुनाव। विश्वास करने को तैयार रह; या विश्वास करने को तैयार किए जाने को तैयार रह। अपनी आँखें मसीह की ओर उठा। यदि तू उसे न देख सके, तो उस स्थान की ओर देख जहाँ तू सोचता है कि वह है। उसे स्मरण करा कि वही विश्वास का कर्ता है, और यह उसी का वरदान है। उससे इसका दावा कर, और यह गिन कि तेरी पुकार के उत्तर में वह यह अनमोल दान अवश्य प्रदान करता है। सम्भव है तू विश्वास अनुभव न करे, परन्तु तू अपने आप को अनजाने मसीह के विषय में सोचता, मसीह पर भरोसा करता, मसीह की ओर बढ़ता हुआ पाएगा; और आत्मा का मसीह के साथ वह लगाव ही विश्वास है।
उस कोमल पौधे की देखभाल कर जो इस प्रकार तेरे भीतर रोपा गया है। उसे पर्याप्त धूप दे। अपने आप से बाहर, इस विचार में जी कि मसीह क्या है। विश्वास को प्रतिज्ञा के उसके जन्मजात भोजन पर पाल, और उसे संगति की पहाड़ियों पर उसकी जन्मजात वायु में साँस लेने दे। सन्देह के हर सुझाव के साथ वैसा ही व्यवहार कर जैसा तू अपने सबसे प्रिय मित्र की निष्ठा के विषय में प्रश्नों के साथ करता। सन्देहवादी पुस्तकों और बातों से आने वाली शीत आँधी से बच। यह निश्चय कर कि तू परमेश्वर और मनुष्य के प्रति अपने कर्तव्य की अपनी सबसे ऊँची धारणाओं के अनुरूप जिए। तेरा विश्वास ठीक तेरी आज्ञाकारिता के अनुपात में होगा। भरोसा करने की असमर्थता प्रायः सदा आज्ञा मानने में किसी असफलता को दर्शाती है। यदि विश्वास डगमगा रहा हो, तो अपने आप से पूछ कि कहीं तूने आज्ञाकारिता का सूत्र तो नहीं छोड़ दिया, और उस स्थान पर लौट जा जहाँ तूने उसे खोया। क्रिस्चियन तब तक सिंहों का सामना न कर सका जब तक उसने खेद के साथ उस कुंज तक अपने पग न लौटा लिए जहाँ वह सोया था और अपनी पत्री फिर से न पा ली।
विश्वास सर्वोपरि रूप से ग्रहण करने की क्षमता है। वह केवल यही नहीं गिनता कि परमेश्वर देता है, वरन् वह लेने को अपना हाथ बढ़ाता है। "जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्वर की सन्तान बनने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं" (यूहन्ना 1:12)। हम प्रायश्चित्त उस प्रभु से पाते हैं जो मरा, और हम परमेश्वर के अनुग्रह की बहुतायत उस प्रभु से पाते हैं जो सदा जीवित है, ताकि हम इस नश्वर जीवन में वैसे ही राज्य करें जैसे हम राज्य करने की आशा तब रखते हैं जब आकाश और पृथ्वी टल जाएँगे, और हमें हमारे प्रिय से अलग करने को कोई समुद्र न रहेगा (रोमियों 5:11,17)। सुन्दर वस्त्र तैयार हैं, विश्वास अपने आप को उनसे सजाता है।
कवच दीवार पर टँगा है, विश्वास अपने आप को उससे कसता है। जीवन का जल उसके पाँवों पर उमड़ता है, परन्तु विश्वास उसे झट उठा लेता है, जैसे गिदोन के तीन सौ जनों ने किया। इस प्रकार विश्वास परमेश्वर के साथ निश्चित रूप से व्यवहार करता है। वह उसके वरदानों को केवल यों नहीं देखता जैसे कोई राही दुकान की खिड़की में रत्नों को, वरन् वह जानता है कि परमेश्वर के राज्य की सारी राजसी सम्पदा उसकी है, और वह उन्हें जैसे चाहे वैसे ले लेता है। वह अपने पिता की वाणी सुनता है जो कहती है: "तू सदा मेरे साथ है, और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा है।"
यह पर्याप्त न था कि परमेश्वर कनान देश को प्रतिज्ञा और वाचा के द्वारा चुनी हुई जाति को दे। उन्हें उसे अपने अधिकार में करने को भीतर जाना था, उसकी भूमि पर अपना पाँव धरना था, उसके खेतों को जोतना था, और उसकी समृद्ध उपज में जीना था। ऐसा ही विश्वासी के साथ होना चाहिए। वह पहले एक जीवित विश्वास के द्वारा यीशु से जुड़ता है, जो उस पर उद्धारकर्ता, मित्र, और राजा के रूप में विश्राम करता है; फिर वह यह गिनता है कि परमेश्वर का पुत्र उसे अपने सारे असीम धन का सहवारिस बनाने में भली-भाँति समर्थ है; और, अन्ततः, वह उस प्रचुर भाग को ग्रहण करने और काम में लाने की कला सीखता है, और वर्ष-प्रतिवर्ष अपनी सम्पत्ति की बाड़ों को और पीछे धकेलता है, उस विशाल विस्तार के प्रदेश का अधिकाधिक भाग अपने में समेटता हुआ जो यीशु में उसके नाम किया गया है।
ओह! यीशु में परमेश्वर की परिपूर्णता के असीम महाद्वीप के बसने वाले, ऊँचे पर्वत पर चढ़ जा। उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की ओर दृष्टि लगा, परमेश्वर के प्रेम की लम्बाई, और चौड़ाई, और गहराई, और ऊँचाई पर। वह सब तेरा है, उस समय की नदी से जो तेरे पाँव के पास से निकलती है, अनन्तता के अन्तिम समुद्र तक। उस देश में चढ़ जाने और उसे अधिकार में करने में, और उस सब का वारिस होने में जो परमेश्वर ने अपने प्रेम के पुत्र में तुझ पर सेंतमेंत लुटाया है, ढिलाई न कर।
भावना।
हमारी भावनाएँ बहुत भ्रामक हैं, क्योंकि वे बाहर से इतनी सहजता से प्रभावित हो जाती हैं। वे हमारे स्वास्थ्य की दशा, मौसम के परिवर्तनों, प्रेम करने वालों की संगति या अनुपस्थिति से प्रभावित होती हैं। जब वायु हल्की हो, और सूर्य चमकता हो, और हम भली नींद सो चुके हों, तब हम परमेश्वर की ओर उन्मुख अनुभव करने की अधिक सम्भावना रखते हैं, बजाय इसके जब नवम्बर का टपकता कुहासा वनों को भिगो देता है। जिस पिता ने हमें रचा और हमारी बनावट जानता है, वह इसे समझता है; इतना कि जब एलिय्याह ने, कर्मेल के तनाव, अपने तीव्र पलायन, और ईज़ेबेल के लगातार हठ से हुई अपनी निराशा के बाद, अपने आप को झाऊ के पेड़ के नीचे गिरा दिया और शीघ्र मृत्यु माँगी, तब परमेश्वर ने उसके थके हुए तन्त्रिका-तन्त्र के लिए नींद, और उसकी भूख के लिए भोजन भेजा।
सामान्यतः, विश्वास भावना में फलता है। "विश्वास से धर्मी ठहरकर, हमें परमेश्वर के साथ मेल . . . . और केवल यही नहीं, वरन् हम अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर में आनन्दित भी होते हैं।" "विश्वास करके हम ऐसे आनन्द से मगन होते हैं जो वर्णन से बाहर और महिमा से भरा है।" जब उड़ाऊ लौटा, तो पिता ने उन्हें पला हुआ बछड़ा मारने की आज्ञा दी, यह कहते हुए: "आओ, हम खाएँ और आनन्द मनाएँ।" पाप के भारी बोझ से राहत है, क्षमा का आनन्दोन्माद, पिता के मुख का प्रकाश, सही होने का भाव, भविष्य पर शान्त दृष्टि। जब राजा अपने निज लोगों के पास आता है, तो घण्टे प्रतीक्षारत वायु में अपनी झंकार यों बजा उठते हैं, मानो आनन्द से मतवाले हो गए हों!
सुखी और धन्य भावना आत्मा पर आत्मा के कार्य का परिणाम है।"आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति . . . है।" वह हमारी मीरास का बयाना है, और यद्यपि अपनी नाबालिगी में हम अपने भाग की परिपूर्णता में प्रवेश करने की आशा नहीं कर सकते, तौभी हमें उसके पहले फलों का आनन्द लेने का विशेषाधिकार है। उसके सुखों की नदी की पूर्व-चखाइयाँ हैं, और आनन्द के पूर्ण समवेत गान के इक्के-दुक्के स्वर। जब पवित्र आत्मा दूल्हे को प्रकट करता है, तो प्रेम करने वाला हृदय आनन्दित होता है, चाहे विवाह अभी मनाया न गया हो।
परन्तु भावना का अभाव सदा यह नहीं दर्शाता कि हम गलत हैं। ऐसे कारण हो सकते हैं, जैसा हमने देखा, जो हमारे अवसाद का लेखा देते हैं। सम्भव है कि मसीह हमें प्रेम और प्रेम की भावना में, आनन्द और आनन्द के उल्लास में, शान्ति और शान्ति के भाव में भेद करना सिखाना चाहे। या सम्भव है कि वह यह जान लेना चाहे कि हम उससे उसी के लिए लिपटते हैं या उसके वरदानों के लिए।
बालक अपने पिता का खिड़की से अभिवादन करते हैं, जब वह मोड़ मुड़कर गली में उतरता है। वह उनके पाँवों की गलियारे में दौड़ सुनता है जब वह द्वार में अपनी चाबी डालता है। परन्तु एक दिन वह प्रश्न करने लगता है कि क्या वे उससे उस प्रेम के कारण मिलते हैं जो वे उसके लिए रखते हैं, या उन उपहारों के कारण जिनसे वह अपनी जेबें भरना कभी नहीं भूलता। इसलिए एक दिन वह उन्हें उचित सूचना दे देता है कि रात को उसके लौटने पर कोई उपहार न होंगे। उनके मुख उतर जाते हैं, परन्तु जब लौटने की घड़ी आती है तो वे यथावत् खिड़की पर होते हैं, और द्वार तक नन्हे पाँवों की वही धमाधम होती है। "आह," वह कहता है, "मेरे बालक मुझ से मेरे ही लिए प्रेम करते हैं," और वह आनन्दित होता है।
हमारा पिता कभी-कभी आनन्द की आपूर्ति काट देता है, और हमें भूखा रहने देता है, ताकि वह जान ले कि हमारे हृदयों में क्या है, और क्या हम उससे उसी के लिए प्रेम करते हैं। यदि हम फिर भी उससे यों लिपटे रहें जैसे अय्यूब रहा, तो वह आनन्दित होता है, और अपने विलाप करने वालों को दोनों हाथों से सान्त्वनाएँ लौटा देता है।
भावना को खोज और तू उससे चूक जाएगा; उसके बिना जीने में सन्तुष्ट रह, और जो तुझे चाहिए वह सब तुझे मिलेगा। यदि तू सदा अपनी धड़कनें देखता रहेगा, तो तू हृदय-रोग ले आएगा। यदि तू सदा ठण्ड से बचने को अपने आप को लपेटता रहेगा, तो तू ठिठुरन का बहुत शिकार हो जाएगा। यदि तू निरन्तर अपने स्वास्थ्य के विषय में सोचता रहेगा, तो तू रोग उत्पन्न कर लेगा। यदि तू सदा अपनी भावनाओं से परामर्श करेगा, तो तू एक सूखी और प्यासी भूमि में जिएगा, जहाँ कोई जल नहीं। जो अपना प्राण बचाता है वह उसे खो देगा।
भावना के प्रति उदासीन रह। यदि वह वहाँ है, तो धन्यवादी हो; यदि वह अनुपस्थित है, तो परमेश्वर की इच्छा पूरी करता रह, उस पर भरोसा करता, उसकी पीठ पीछे उसका भला कहता, और, सबसे बढ़कर, इसका कोई चिह्न न देता कि तू क्या सह रहा है, कहीं ऐसा न हो कि तू औरों के लिए ठोकर का कारण बने। तब आनन्द तुझे बाढ़ के समान आ घेरेगा। वह तुझे अपनी मेज़ पर बैठाएगा, और कमर बाँधकर तेरी सेवा करने को आ खड़ा होगा।
सावधानियाँ।
भक्तिमय जीवन को संवारने के लिए पाँच अन्तिम सावधानियाँ हैं, जिन पर ध्यान देने से सामान्यतः पवित्र आनन्द और शान्ति उपजेगी।
1. हमें परमेश्वर के सामने शान्त रहना चाहिए। इस युग में हमारे चारों ओर का जीवन सर्वोपरि रूप से भागदौड़ और परिश्रम का है। यह द्रुतगामी रेलगाड़ी और विद्युत तार का युग है। वर्ष महीनों में, और सप्ताह दिनों में ठूँसे जाते हैं। यह ज्वरग्रस्त उतावली धार्मिक जीवन को भी धमकाती है। धारा हमारी कलीसियाओं में पहले ही घुस चुकी है, और उनके शान्त कुण्डों को मथ चुकी है। सभाओं पर सभाएँ भीड़ लगाती हैं। वही ऊर्जावान आत्माएँ इन सब में पाई जाती हैं, और इनके अतिरिक्त बहुत से भले कामों में लगी रहती हैं। परन्तु हमें सावधान रहना चाहिए कि हम मननशील के स्थान पर सक्रिय को, पर्वत-शिखर के स्थान पर घाटी को न रख लें। दोनों में से किसी को भी सुरक्षा के साथ दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। भेड़ को भीतर और बाहर आना-जाना है। रक्त को हृदय में वापस आना है ताकि फिर से आवेशित होकर अंगों की छोर तक फिर से धकेले जाने के योग्य बने।
हमें परमेश्वर के साथ अकेले रहने का समय निकालना चाहिए। कोठरी और बन्द द्वार अनिवार्य हैं। हमें धूप भरे बरामदे की चकाचौंध खोनी होगी ताकि हम उन शान्त स्वर्गदूत-आकृतियों को देख सकें जो वेदी के ऊपर झुकी हुई हैं। हमें संसार का कोलाहल छोड़ना होगा, ताकि हम उस धीमी, शान्त वाणी के स्वरों के अभ्यस्त हो जाएँ। दाऊद के समान, हमें यहोवा के सामने बैठना होगा। धन्य हैं वे जिनके हृदय-घर में एक वेधशाला है जिसमें वे अनन्तता के महान मेहराब के नीचे प्रायः एकान्त में जा सकते हैं, अपनी दूरबीन उन प्रबल तारामण्डलों की ओर घुमाते हुए जो जीवन के ज्वर से परे घूमते हैं, और उन क्षेत्रों तक पहुँचते हुए जहाँ मानवीय वाहवाही या निन्दा की साँस उनका पीछा नहीं कर सकती!
केवल ऐसे ही क्षणों में सर्वोत्तम आत्मिक वरदान हमारी दृष्टि में उभरेंगे, या हमें उन्हें ग्रहण करने का अनुग्रह मिलेगा। यह असम्भव है कि परमेश्वर की उपस्थिति में यों ही दौड़ पड़ा जाए, जो कुछ मन को भाए झट उठा लिया जाए, और उसे लेकर भाग जाया जाए। ऐसा प्रयास मात्र भ्रम और निराशा में समाप्त होगा। प्रकृति अपनी दुर्लभतम सुन्दरता किसी संयोगवश आए पर्यटक के सामने अनावृत न करेगी। ऐसे चित्र जो जीवन भर के परिश्रम का फल हैं, अपनी गुप्त सुन्दरता किसी दीर्घा में यों ही टहलने वाले पर प्रकट नहीं करते। कोई अधिकार-पत्र एक झलक में नहीं पढ़ा जा सकता। और परमेश्वर का सर्वोत्तम उसकी पवित्र उपस्थिति में धीरजपूर्वक प्रतीक्षा किए बिना हमारा नहीं हो सकता। ऊपरी मन वाले को किसी दृष्टान्त, किसी सुन्दर कथा से टाला जा सकता है, परन्तु ऐसों को स्वर्ग के राज्य के भेद जानने को नहीं दिया जाता।
2. हमें एक उत्कट अभिलाषा से भरा होना चाहिए। किसी वस्तु की चाह रखने और उसे ठान लेने में अन्तर है। एक ही घण्टे में हम सौ भिन्न-भिन्न वस्तुओं की चाह कर सकते हैं, और उन्हें भूल सकते हैं। परन्तु इससे कितना भिन्न है वह दृढ़ निश्चय, इच्छा का वह ठहरा हुआ उद्देश्य!
लड़के की आँख अपने खेल के किसी साज-सामान पर पड़ती है, विद्यार्थी की किसी अनमोल पुस्तक पर, प्रेमी की किसी दुर्लभ और रत्नजड़ित आभूषण पर जिसकी वह उसके लिए लालसा करता है जिससे वह प्रेम करता है — और हर मामले में इच्छा पर तब तक कार्य होता रहता है जब तक वह किसी भी मोल पर उसे पाने का संकल्प न कर ले। तब वंचना और आत्म-त्याग और विलम्ब का प्रसन्नता से सामना किया जाता है। कुछ भी उस निश्चय को बुझा या ढीला नहीं कर सकता जो अपने अभीष्ट के कड़े पीछे लगा रहता है। हमारे साथ भी ऐसा ही हो। हमें भूखा और प्यासा होना चाहिए; हमें प्रबल और उत्कट अभिलाषा से भरा होना चाहिए; हमें स्वर्ग के राज्य को छीन लेने के लिए बल-प्रयोग तक करने को संकल्पित होना चाहिए। पवित्रशास्त्र की अभिव्यक्तियाँ सब इतनी तीव्र हैं — हरिण जल के सोतों के लिए हाँफता है; याकूब स्वर्गदूत को जाने नहीं देता; विधवा अन्यायी न्यायी को रात-दिन तंग करती है। हम भी यह प्रबल अभिलाषा रख सकते हैं यदि हम परमेश्वर के आत्मा को इसे अपने हृदयों में उत्पन्न करने दें। परन्तु व्यापारी को उस उत्तम मोती को खोजने और पाने पर तुला होना चाहिए। हमें सँकरे द्वार से प्रवेश करने का यत्न करना चाहिए। हमें (प्रेरित के शब्द का प्रयोग करें तो) मुकुट के लिए किसी पहलवान के समान प्राणपण से जूझना चाहिए।
3. हमारे हाथ में एक प्रतिज्ञा होनी चाहिए। परमेश्वर के साथ व्यवहार करने की यही सच्ची रीति है। बाइबल में कोई ऐसा पवित्र वचन ढूँढ़ जो ठीक तेरे मामले पर बैठता हो। किसी एक को पाना कठिन न होगा, क्योंकि वह व्यक्तिगत घटनाओं से भरी पड़ी है, जो जीवन की हर कल्पनीय विविधता से चुनी गई हैं। फिर, जब वह मिल जाए, और सम्भवतः ईश्वरीय आत्मा के द्वारा तुझ पर अंकित कर दिया जाए, तो उसे अपने साथ परमेश्वर की उपस्थिति में ले जा, या उस पर अपनी उँगली रख दे जब तू शान्त और श्रद्धामय पग से उस उपस्थिति-कक्ष में प्रवेश करे। प्रतिज्ञाएँ हमारी सम्पत्ति की सूची हैं, और हमारी आवश्यकता को हमें उस आशीष के लिए ऊपर देखने और उस पर दावा करने को प्रेरित करना चाहिए जो उसे पूरा करने को ठहराई गई है।
4. परमेश्वर पर भरोसा कर। यदि तू आत्मिक वरदान चाहता है, अपनी तृप्ति के लिए नहीं, वरन् मसीह की महिमा के लिए; यदि, जहाँ तक तू जानता है, तेरा हृदय बुराई से, और तेरा जीवन पापमय आदत से मुक्त है; यदि तू यह समझता है कि प्रतिज्ञा तेरे लिए है, क्योंकि तू केवल पुत्र ही नहीं, वरन् परमेश्वर का वारिस, और मसीह का सहवारिस है; यदि तू एक उत्कट अभिलाषा अनुभव करता है जो परमेश्वर ने तुझे ठीक इसी बिन्दु तक ले चलने को उत्पन्न की है — तब अपना मुँह भरपूर खोल, और विश्वास कर कि परमेश्वर उसे भर देता है; हर खिड़की खोल दे, और विश्वास कर कि ज्योति भीतर आती है; हर झरोखा चौड़ा खोल दे, और विश्वास कर कि जो तुझे चाहिए था और जो तूने खोजा वह तुझे मिल गया है। तेरे विश्वास के अनुसार तुझ से हो।
किसी आवश्यकता की घड़ी में, या जब तू उसकी सबसे कम आशा करे, या जब तू अपने अभ्यस्त कामों में लगा हो, तब आनन्द, या शान्ति, या मसीह के निकट होने, या औरों पर सामर्थ्य का कोई आनन्दित बोध इसका प्रमाण होगा कि तूने सचमुच पाया।
5. हमें औरों की चिन्ता करनी चाहिए। कोई ऐसा जीवन धन्य नहीं हो सकता जो आत्म-केन्द्रित हो, और, मृत सागर के समान, विशाल दीवारों से घिरा हुआ हो। पाने का रहस्य देना है; सीखने का, सिखाना; सिंहासन पर चढ़ने का, चेलों के पाँव धोने को झुकना। अपने से अधिक औरों के विषय में सोच, और तेरा अपना जीवन कभी इतना धनी और समृद्ध न होगा। "मैं चाहता हूँ — मैं चाहता हूँ — मैं चाहता हूँ कि मसीही सारे संसार में जाकर सुसमाचार फैलाएँ।" ये शब्द, कठिनता से साँस लेते हुए कहे गए, एक प्रिय मसीही सेवक के लगभग अन्तिम शब्द थे।
अध्याय 4 पूरा हुआ
तथ्य! विश्वास! भावना!