चौगुना सुसमाचार
मसीह हमारा पवित्र करनेवाला

अध्याय 2 · 23 मिनट का पठन

मसीह हमारा पवित्र करनेवाला

"और उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएँ।" यूहन्ना 17:19.

अन्तिम उपवाक्य का हाशिये का पाठ यह है, "ताकि वे भी सचमुच पवित्र किए जाएँ।" इससे ऐसा जान पड़ता है कि कोई ऐसी वस्तु है जो संसार में पवित्रता के नाम से चलती है, परन्तु सच्चा पवित्रीकरण नहीं है। मसीही जीवन के खोटे रूप भी हैं, और अधूरे रूप भी, जो उस सब को प्रगट नहीं करते जो मसीह की परिपूर्णता हमारे लिये कर सकती है। पवित्रीकरण चौगुने सुसमाचार का दूसरा चरण है।

1. यह क्या नहीं है।

हम पहले यह देखेंगे कि यह क्या नहीं है। मसीही चरित्र में अच्छे तत्व, यहाँ तक कि पवित्र तत्व भी हैं, जो पवित्रीकरण नहीं हैं।

  1. यह नया जन्म नहीं है। पवित्रीकरण मन-परिवर्तन नहीं है। मसीही बनना एक महान् और धन्य बात है। यह कभी छोटी बात नहीं है। अनन्त काल के लिये उद्धार पाना अनन्त आनन्द का कारण है; परन्तु आत्मा को पवित्रीकरण में भी प्रवेश करना अवश्य है। ये दोनों एक ही नहीं हैं। नया जन्म तो आरम्भ है। यह बीज का अंकुर है, परन्तु पौधे की ग्रीष्म ऋतु की परिपूर्णता नहीं। हृदय ने अभी पाप के पुराने तत्वों पर पूरी विजय नहीं पाई है। कभी-कभी वह उनसे हार जाता है। नया जन्म एक घर बनाने और उस काम को अच्छी रीति से पूरा करने के समान है। पवित्रीकरण तो यह है कि स्वामी आकर उसमें वास करे और उसे आनन्द, जीवन और सुन्दरता से भर दे। बहुत से मसीही मन-परिवर्तन करके वहीं रुक जाते हैं। वे मसीह में अपने जीवन की परिपूर्णता की ओर आगे नहीं बढ़ते, और इस प्रकार जो कुछ उनके पास पहले से है उसे भी खो देने के जोखिम में पड़ जाते हैं। जर्मनी मार्टिन लूथर की शिक्षाओं के द्वारा विश्वास से धर्मी ठहराए जाने का महान् सत्य ले आया, परन्तु वह मसीही जीवन की गहरी शिक्षाओं की ओर आगे न बढ़ सका। इसका परिणाम क्या हुआ? आज जर्मनी ठंडा और निर्जीव है, और बुद्धिवाद तथा उसके साथ चलनेवाली सारी बुराइयों की जड़ ही बन गया है। इंग्लैंड में यह कितना भिन्न रहा है! वेस्ली, और बैक्सटर, और व्हिटफील्ड जैसे पुरुषों के परिश्रम, जो पवित्र आत्मा के कार्य को समझते थे, इंग्लैंड के, और उसकी सन्तान अमेरिका के मसीही जीवन को गहरी और अधिक स्थायी धाराओं में ले गए हैं। तुम पाओगे कि जो पुरुष और स्त्रियाँ अपने मसीही अनुभव में उसमें अपने उत्तराधिकार की परिपूर्णता पाने के लिये आगे नहीं बढ़ते, वे प्रायः ठंडे और औपचारिक हो जाते हैं। उनके अपने हृदय की बुराई फिर सिर उठाएगी और बहुत सम्भव है कि उन पर हावी हो जाए, और उनका काम मसीह के कार्य के लिये गड़बड़ी और विनाश लाएगा। यदि वे इस परिणाम से बच भी जाएँ, तो यह मानो आग में से होकर ही होगा। तुमने निःसन्देह ऐसे युवा मसीहियों को देखा होगा जो आश्चर्यजनक रूप से मन-परिवर्तित और परमेश्वर के प्रेम से भरे हुए जान पड़े, परन्तु वे मसीह के गहरे जीवन में प्रवेश न कर सके, और किसी बुरी घड़ी में वे गिर गए। उन्होंने एक नया हृदय तो पाया था, परन्तु वे उस गहरी शिक्षा और जीवन को पाने में चूक गए जो मसीह के पास उसकी सारी सन्तान के लिये है।
  2. पवित्रीकरण न तो नैतिकता है, न चरित्र की कोई उपलब्धि। मानव जीवन में बहुत कुछ ऐसा है जो सुन्दर तो है पर पवित्रीकरण नहीं। मनुष्य स्वयं एक अच्छा मानव चरित्र गढ़कर फिर उसे परमेश्वर का काम नहीं कह सकता। वह उस दबाव को न सह सकेगा जो निश्चय ही उस पर आएगा। केवल वही घर जो युगों की चट्टान पर बना है, तत्वों के प्रकोप में सुरक्षित रूप से टिका रहेगा।
  3. पवित्रीकरण तुम्हारा अपना काम नहीं है; यह कोई क्रमिक उपलब्धि नहीं जिसमें तुम अपने ही प्रयत्नों से बढ़ सको। यदि तुम स्वयं ऐसा ढाँचा बना सको, और वर्ष-प्रति-वर्ष उसमें जोड़ते जाओ जब तक वह पूरा न हो जाए, तो क्या तब तुम एक क्षम्य गर्व के साथ अलग खड़े होकर उसे अपना ही काम न मानोगे? नहीं, प्रिय मित्रो, तुम बढ़-बढ़कर पवित्रीकरण में नहीं पहुँच सकते। उसमें प्रवेश कर लेने के बाद तुम मसीह में जीवन के अधिक परिपूर्ण, अधिक पके और अधिक परिपक्व विकास में बढ़ोगे, परन्तु उसके आरम्भ में तुम्हें इसे एक दान के रूप में लेना है, वृद्धि के रूप में नहीं। यह प्राप्ति है, उपलब्धि नहीं। तुम स्वयं को पवित्र नहीं कर सकते। एक ही काम करने का है—अपने आप को पूरी तरह परमेश्वर को दे देना, एक स्वेच्छिक बलिदान के रूप में। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उसके लिये यह करना तो एक छोटी-सी बात है। परन्तु शुद्ध करने और भरने का काम तो उसी को करना है।
  4. पवित्रीकरण मृत्यु का काम नहीं है। यह विचित्र है कि कोई यह सोचे कि मरने के संघर्ष में कोई पवित्र करनेवाला प्रभाव हो सकता है। तौभी बहुतों ने वर्षों तक इसी भ्रम में जीवन बिताया है। वे आशा रखते हैं कि उस अन्तिम घड़ी का ठंडा पसीना और डूबते हृदय की ऐंठती धड़कन किसी न किसी रीति से उन्हें उनके पवित्र करनेवाले की बाँहों में रख देगी। यह कुछ हद तक उस पुराने विचार से आता है कि उनका पाप देह में बसा है—वह पुरानी मनीकी शिक्षा कि शरीर अपवित्र है, और यदि हम एक बार देह से छूट जाएँ, तो देहरहित निवासी पाप से मुक्त हो जाएगा और तुरन्त असीम पवित्रता में कूद पड़ेगा। इन हड्डियों और मांस और स्नायुओं में कोई पाप नहीं है। यदि तू अपना हाथ काट फेंके तो तूने कोई पाप नहीं खोया। यदि दोनों हाथ चले जाएँ तो तू पहले जैसा ही पापी है। यदि तू अपना सिर काट डाले और अपने प्राण दे दे, तो भी पाप आत्मा में बना रहेगा। पाप देह में नहीं है, वह हृदय में, और आत्मा में, और इच्छा में है। इस मिट्टी की देह को उतार फेंक, तौभी आत्मा शेष रह जाएगी—एक कठोर, विद्रोही, पापी वस्तु। मृत्यु उसे पवित्र न करेगी। मन-परिवर्तन के लिये यह एक बुरा समय है। पवित्र होने के लिये यह और भी बुरा समय होगा। मैं किसी को यह सलाह न दूँगा कि वह अपने उद्धार को मरने की घड़ी तक टाल दे, जब हृदय दबा हुआ और मस्तिष्क धुँधला होता है, और मन को विश्वास, विश्राम और विजय के बोध की आवश्यकता होती है ताकि वह आनन्द की परिपूर्णता के साथ उसकी उपस्थिति में प्रवेश कर सके। न ही यह पवित्र आत्मा के गहरे कार्य के लिये कोई अच्छा समय है। पवित्रीकरण में समझ-बूझकर तब प्रवेश करना चाहिए जब मन स्पष्ट हो। यह एक सोचा-समझा कार्य है जो सारी शक्तियों के शान्त प्रयोग की माँग करता है, जो ईश्वरीय आत्मा के नियंत्रक प्रभाव के अधीन काम करती हैं।
  5. पवित्रीकरण आत्म-सिद्धि नहीं है। हम कभी भी स्वभाव से इतने अच्छे न हो जाएँगे कि पाप की कोई सम्भावना या परीक्षा ही न रहे। हम कभी ऐसे स्थान पर न पहुँचेंगे जहाँ हमें हर क्षण उसमें बने रहने की आवश्यकता न हो। जिस क्षण हमें ऐसा लगता है कि हम उसके बिना जी सकते हैं, उसी क्षण हमारे भीतर एक अलग जीवन उठ खड़ा होता है जो पवित्र किया हुआ जीवन नहीं है। स्वर्ग की उन्नत आत्माएँ अपनी ऊँची दशा से क्यों गिरीं, इसका कारण शायद यह था कि वे अपनी ही सुन्दरता के प्रति सचेत हो गईं, और उनके हृदयों में घमण्ड उठ खड़ा हुआ। उन्होंने अपने आप को देखा, और अपने ही लिये ईश्वर के समान बन बैठीं। जिस क्षण तू या मैं इस बात के प्रति सचेत हो जाते हैं कि हम बलवन्त या शुद्ध हैं, उसी क्षण विघटन का काम आरम्भ हो जाता है। इसने हमें उससे स्वतंत्र कर दिया है, और हमने अपने आप को मसीह के जीवन से अलग कर लिया है। हमें सीधे-सादे, खाली बर्तन होना है, ऐसे खुले माध्यम जिनमें से होकर उसका जीवन बह सके। तब मसीह की सिद्धता हमें सौंप दी जाएगी। और हम अपने आप में उत्तरोत्तर कम और कम होते जाएँगे, ज्यों-ज्यों वह हमारे भीतर अधिक और अधिक बढ़ता जाएगा।
  6. पवित्रीकरण भावनाओं की कोई दशा नहीं है। यह न कोई परमानन्द है, न कोई अनुभूति। यह जीवन की इच्छा और उद्देश्य में बसता है। यह जीवन और आचरण का परमेश्वर की इच्छा और चरित्र के साथ व्यावहारिक अनुरूप होना है। इच्छा को परमेश्वर को चुनना अवश्य है। हृदय का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह उसके अधीन हो जाए, उसे प्रसन्न करे और उसकी आज्ञा माने। महत्वपूर्ण बात यही है—उससे प्रेम करना, उसे चुनना और उसकी पवित्र इच्छा को पूरा करना। तेरे भीतर वह आत्मा हो और तू आनन्दित न हो—यह हो ही नहीं सकता। जो आत्मा केवल सनसनीखेज आनन्द के लिये तरसती है, उसमें अब भी एक अपवित्र आत्म-जीवन है। उसे परमेश्वर से बहुत कुछ पाने से पहले आत्म के उस रूप से निकलकर परमेश्वर में प्रवेश करना अवश्य है।

II. पवित्रीकरण क्या है।

आइए, हम सकारात्मक पक्ष को देखें।

  1. यह पाप से पृथक होना है। शब्द का मूल भाव यही है। पवित्र किया हुआ मसीही पाप से, एक बुरे संसार से, यहाँ तक कि अपने ही आप से, और हर उस वस्तु से पृथक होता है जो नये जीवन में उसके और मसीह के बीच अलगाव का कारण बने। इसका अर्थ यह नहीं कि पाप और शैतान का नाश किया जाना है। परमेश्वर अभी सहस्राब्दी नहीं लाता, परन्तु वह पवित्र की हुई आत्मा और हर अपवित्र वस्तु के बीच एक सीमा-रेखा खींच देता है। मसीहियों की बड़ी कठिनाई यह है कि वे बुराई को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। वे सोचते हैं कि यदि पाप का सचमुच सिर काट दिया जाए और शैतान मार डाला जाए तो वे परम आनन्दित हो जाएँगे। उनमें से बहुतों के लिये मन-परिवर्तन के बाद यह आश्चर्य की बात होती है कि परमेश्वर अब भी शैतान को जीवित रहने देता है। उसने कहीं भी यह प्रतिज्ञा नहीं की कि वह शैतान को मार डालेगा, परन्तु उसने यह प्रतिज्ञा की है कि वह मसीही और पाप के बीच एक चौड़ा, गहरा यरदन रख देगा। उसके साथ करने योग्य एक ही बात है—उसे ठुकरा देना और उसे छोड़ देना। यदि हम उसे भीतर आने दें तो संसार में हम सब को नष्ट कर देने के लिये पर्याप्त पाप है। वायु उससे भरी है, जैसे हमारे कुछ पश्चिमी राज्यों की वायु वहाँ जलाए जानेवाले मुलायम कोयले की कालिख से भरी रहती है। यह समय के अन्त तक ऐसा ही रहेगा, परन्तु हे प्रिय, परमेश्वर की मंशा यही है कि तू और मैं अपनी आत्मा में उससे पृथक रहें।
  2. पवित्रीकरण का अर्थ परमेश्वर के लिये समर्पण भी है। शब्द का मूल भाव यह भी है। यह पाप से पृथक होना और परमेश्वर के लिये समर्पित होना है। पवित्र किया हुआ मसीही हर बात में परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिये पूरी तरह उसके अधीन हो जाता है; उसका पहला विचार सदा यही होता है, "तेरी इच्छा पूरी हो"; उसकी एक ही अभिलाषा यह होती है कि वह परमेश्वर को प्रसन्न करे और उसकी पवित्र इच्छा को पूरा करे। यही भाव समर्पण शब्द से व्यक्त होता है। पुराने नियम में जो भी वस्तुएँ परमेश्वर के लिये अलग की जाती थीं, वे पवित्र कहलाती थीं, चाहे उनमें पहले कोई पाप रहा ही न हो। निवास पवित्र किया गया था; उसने कभी पाप न किया था, परन्तु वह परमेश्वर को समर्पित था। इसी अर्थ में निवास के सारे बर्तन पवित्र किए गए थे। वे एक पवित्र उपयोग के लिये अलग किए गए थे। प्रिय मित्रो, परमेश्वर हमसे केवल पाप से पृथक होने से कहीं अधिक की आशा रखता है। वह तो केवल नकारात्मक भलाई है। वह यह आशा रखता है कि हम पूरी तरह उसी को समर्पित हों, और हमारे हृदय की सर्वोच्च कामना यही हो कि हम उससे प्रेम करें, उसका आदर करें और उसे प्रसन्न करें। क्या हम इस बात में उसकी आशाओं को पूरा कर रहे हैं?
  3. पवित्रीकरण में परमेश्वर के स्वरूप के अनुरूप होना सम्मिलित है। हमें उसके स्वरूप में होना है, और यीशु मसीह की छाप से अंकित होना है।
  4. पवित्रीकरण का अर्थ परमेश्वर के स्वरूप के साथ-साथ उसकी इच्छा के अनुरूप होना भी है। पवित्र किया हुआ मसीही समर्पित और आज्ञाकारी होता है। वह जीवन में सबसे बढ़कर ईश्वरीय इच्छा की चाह रखता है, क्योंकि वह उसके लिये किसी भी अन्य वस्तु से अधिक दयालु और बुद्धिमानी भरी है। वह इस बात के प्रति सचेत रहता है कि यदि वह उसे चूक जाए तो कुछ खो देता है। वह जानता है कि यह उसकी अपनी इच्छा से कहीं अधिक उसकी सर्वोच्च भलाई को बढ़ाएगी, और सहज ही पुकार उठता है, "तेरी इच्छा पूरी हो।"

    "हे परमेश्वर की मधुर, प्रिय इच्छा,

    तुझ पर मैं अपने आप को लिटा देता और विश्राम पाता हूँ,

    जैसे शिशु अपनी माता की छाती पर।"

  5. पवित्रीकरण का अर्थ प्रेम है—परमेश्वर और सारी मनुष्यजाति के प्रति सर्वोच्च प्रेम। यही व्यवस्था की पूर्ति है। यह सारी आज्ञाकारिता का सोता है, वह स्रोत जिससे सारी उचित बातें बहती हैं। प्रेम के बिना हम परमेश्वर के स्वरूप के अनुरूप नहीं हो सकते, क्योंकि परमेश्वर प्रेम है। सच्चे पवित्र किए हुए जीवन में यही शायद सबसे प्रबल विशेषता है। यह अन्य सारे सद्गुणों को कोमलता और गरमाहट से ढक देता है। यह ठंडे और नंगे समर्पण की बर्फीली चोटियों को लेकर उन्हें काई और हरियाली से ढक देता है। यह हृदय में उजली धूप भेजता है, और हर वस्तु को गरम और जीवन से भरपूर बना देता है, जो अन्यथा ठंडी और उजाड़ रहती। वह जंगली मनुष्य अपने शत्रुओं के सामने खड़े होकर ऐसी निष्ठुर दृढ़ता के साथ टुकड़े-टुकड़े कट जाने में समर्थ था कि उसे रोना भी तुच्छ जान पड़ा, परन्तु उसकी उदासीनता किसी पथरीली चट्टान के समान थी। यह यीशु के हृदय का वह गरम, कोमल प्रेम न था, जिसने उसे अपनी पीड़ामय मृत्यु के आगे नम्रता से झुका दिया, क्योंकि वह उसके पिता की इच्छा थी। यह तो उसके प्रेमी हृदय का स्वतःस्फूर्त, आनन्दमय उमड़ना था। प्रिय मित्रो, यदि हम परमेश्वर के प्रति प्रेम से इस प्रकार भर जाएँ, तो वह औरों की ओर बह निकलेगा, और हम अपने पड़ोसियों से वैसा ही प्रेम करेंगे जैसा हम अपने आप से करते हैं।

III. पवित्रीकरण का स्रोत.

सारी बात का मर्म यह देखना है कि यीशु स्वयं ही हमारा पवित्रीकरण है। हमें इसे केवल किसी ऊँची पर्वत-चोटी के समान नहीं देखना चाहिए जहाँ वह खड़ा है और जिस पर हमें चढ़ना है, परन्तु हमारे और उसके बीच लगभग दुर्गम चट्टानें हैं जिन पर हमें चढ़ना होगा इससे पहले कि हम उसके पास खड़े हो सकें। परन्तु यीशु स्वयं ही हमारा पवित्रीकरण बन जाता है। "उनके लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि वे भी सचमुच पवित्र किए जाएँ।" ऐसा जान पड़ता है मानो उसे कुछ डर था कि उसके अनुयायी उससे अलग होकर पवित्रीकरण ढूँढ़ने लगेंगे, और यह जानते हुए कि वह उसके द्वारा ही उन तक पहुँच सकता है, उसने कहा, "मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ।"

  1. उसने इसे हमारे लिये मोल लिया है। यह कलवरी के फल का एक अंश है। एक ही बलिदान के द्वारा उसने उन्हें जो पवित्र किए जाते हैं सदा के लिये सिद्ध कर दिया है। "उसी इच्छा के अनुसार हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान किए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।"
  2. यह हमारे प्रयत्नों से हमारे पास नहीं आता, परन्तु यह हमें क्रूस पर उसकी मृत्यु के मोल के रूप में सौंप दिया जाता है। यह यीशु के मोल लेने के द्वारा उतना ही हमारा है जितनी क्षमा। तुझे पवित्र और शुद्ध होने का उतना ही अधिकार है जितना उद्धार पाने का। तू परमेश्वर के पास जाकर इसे अपने उत्तराधिकार के रूप में उतना ही माँग सकता है जितना तू पाप की क्षमा माँग सकता है। यदि यह तेरे पास नहीं है, तो तू अपने छुटकारे के विशेषाधिकारों से वंचित रह रहा है।
  3. पवित्रीकरण उन मुफ्त दानों में से एक के रूप में ग्रहण किया जाना है जिन्हें परमेश्वर हमें देना चाहता है। यदि यह दान नहीं है, तो यह छुटकारे का अंश नहीं है। यदि यह छुटकारे का अंश है, तो यह यीशु के लहू के समान ही मुफ्त है।
  4. यह यीशु के व्यक्तिगत रूप से भीतर वास करने के द्वारा आता है। वह हृदय में केवल धार्मिकता ही नहीं रख देता, परन्तु वह स्वयं व्यक्तिगत रूप से वहाँ वास करने आता है। शब्द निर्बल हैं; वे सचमुच इस विचार को व्यक्त करने में सर्वथा अपर्याप्त हैं। जब हम अन्य सारे मार्गों से पूरी निराशा तक पहुँच जाते हैं, तब हम यह सत्य सीखते हैं। और यीशु मसीह स्वयं हृदय में आता है और वहाँ अपना ही जीवन जीता है, और इस प्रकार आत्मा का पवित्रीकरण बन जाता है। पाठ का यही अर्थ है। यीशु अपने आप को अपने ही लोगों के लिये पवित्र करता है, और जो कोई उससे अलग होकर पवित्र जीवन जीने का प्रयत्न करता है वह सचमुच पवित्र नहीं किया गया। उन्हें सचमुच पवित्र होने के लिये यीशु को अपने जीवन के रूप में भीतर लेना अवश्य है। ईश्वरीय पवित्रता का व्यक्तिगत भाव यही है। "परन्तु उसी की ओर से तुम मसीह यीशु में हो, जो परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान, और धार्मिकता, और पवित्रता, और छुटकारा ठहरा।" यीशु परमेश्वर की ओर से हमारे लिये ज्ञान ठहरा है। वह सच्चा तत्वज्ञान है, वह अनन्त सोफ़िया, जो गहरे-से-गहरे तत्वज्ञान, धार्मिकता, पवित्रता और छुटकारे से कहीं ऊँचा है। इस प्रकार हमारे हृदय में यीशु हमारा ज्ञान बन जाता है। वह हमें केवल सुधारकर हमें कोई अचरज की वस्तु नहीं बना देता। परन्तु वह तो हम में आकर वैसे ही जीता है जैसे वह प्राचीन काल में अपनी गलील की सेवा में जीया।

जब निवास बनकर तैयार हुआ, तब पवित्र आत्मा उतर आया और उस पर अधिकार कर लिया, और करूबों के बीच वाचा के सन्दूक पर जलती हुई आग में वास किया। जब वह उसे समर्पित कर दिया गया, तब परमेश्वर वहाँ रहने लगा। इसी प्रकार जब हम परमेश्वर को समर्पित किए जाते हैं, तब वह हम में वास करने आता है और अपने जीवन को हमारे सारे अस्तित्व में संचारित कर देता है। जो मरियम के गर्भ में आया, जो पिन्तेकुस्त के दिन चेलों पर सामर्थ्य के साथ उतरा, वही तेरे और मेरे पास आता है जब हम पूरी तरह उसे समर्पित होते हैं—इतनी वास्तविकता से मानो हम उसे दृश्य रूप में फड़फड़ाते हुए वहाँ अपने कंधे पर उतरते देखें। वह उस पार के जगत से हमारे भीतर वास करने आता है, इतनी सच्चाई से मानो हम दृश्य रूप में उसकी छाया के तले रह रहे हों। परमेश्वर सचमुच हृदय में वास करने आता है और हमारे भीतर अपना पवित्र जीवन जीता है। यहेजकेल के 36वें अध्याय में हमारे पास यह प्रतिज्ञा है: "मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा।" यह क्षमा है; पुराने पाप सब मिटा दिए जाते हैं। "मैं तुम्हें नया हृदय भी दूँगा"; यह नया जन्म है। "मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर रखूँगा, और तुम से अपनी विधियों पर चलवाऊँगा, और तुम मेरे नियमों को मानकर उन पर चलोगे"; आह! यह तो नये जन्म और क्षमा से कुछ बढ़कर है। यह तो जीवित परमेश्वर का उस नये हृदय में वास करने आना है। यह पवित्र आत्मा का उस मांस के हृदय में वास करना है जो परमेश्वर ने दिया है, कि हमारे सारे अस्तित्व की हर गति, हर विचार, हर मंशा, हर अभिलाषा भीतर के परमेश्वर के उमड़ते जीवन से उत्पन्न हो। यह फिर से देह में प्रगट परमेश्वर है। पवित्रीकरण की एकमात्र सच्ची परिणति यही है। इसी प्रकार ही मनुष्य पूरी तरह पवित्रता के जीवन में प्रवेश कर सकता है। ज्यों-ज्यों हम इस प्रकार पवित्र आत्मा के अधिकार में आते हैं, हम ईश्वरीय स्वभाव के भागी बना दिए जाते हैं। किसी भी पुरुष या स्त्री के लिये परमेश्वर के साथ इस सम्बन्ध में प्रवेश करना एक पवित्र बात है। यह सबसे दीन और सबसे अनाकर्षक प्राणी को उसके साथ सिंहासन पर बैठा देता है। यदि हम जान लें कि परमेश्वर इस प्रकार हमारे भीतर वास कर रहा है, तो हम उस पवित्र उपस्थिति की महिमा के आगे झुक जाएँगे। हम पाप के द्वारा उसे अपवित्र करने का साहस न करेंगे। हमारे हृदयों पर एक शान्ति छा जाएगी, और हम झुके हुए सिर के साथ चलेंगे, इस बात के प्रति सचेत कि हम अपने हृदयों के भीतर कैसा रत्न लिये फिरते हैं। हे प्रिय, क्या तू जानता है कि मसीह को इस प्रकार अपने लिये पवित्र किया हुआ पाना क्या है? क्या तू व्यक्तिगत रूप से जानता है कि पूरी तरह उसे समर्पित होना, और उसे अपने से यह कहते सुनना क्या है, "तेरे लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूँ, ताकि तू सचमुच पवित्र किया जाए"?

IV. यह किस रीति से ग्रहण किया जाता है।

  1. इससे पहले कि हम इसे पाने का प्रयत्न करें, हमें पवित्रीकरण की अपनी आवश्यकता का एक ईश्वरीय प्रकाशन होना अवश्य है। हमें स्वयं यह देखना है कि हम पवित्र नहीं किए गए हैं, और यह कि यदि हम आनन्दित रहना चाहते हैं तो हमें पवित्र होना ही अवश्य है। हमें उस स्थान तक लाने के लिये जहाँ हम यह देख सकें, परमेश्वर प्रायः पहला काम यह करता है कि हमें भूलों में गिरने देकर और हमारी दुर्बलताओं को हमारी दृष्टि में लाकर हमें अपने आप से पूरी तरह लज्जित कर देता है। इन अपमानजनक आत्म-प्रकाशनों में हम देख पाते हैं कि हम कहाँ धर्मी नहीं हैं, और हमें यह सीखने पर विवश किया जाता है कि सुधार के जो संकल्प हम अपने ही बल से करते हैं उन्हें हम निभा नहीं सकते। परमेश्वर ने युगों-युगों से अपनी प्यारी सन्तान को यह पाठ सीखने दिया है, और बार-बार की विफलताओं के द्वारा सीखने दिया है, और हममें से हर एक को सदा इसे स्वयं ही सीखना होता है।
  2. हमें यीशु को अपने पवित्र करनेवाले के रूप में देखने आना अवश्य है। यदि एक साँस में हम पुकार उठें, "हाय, मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! इस मृत्यु की देह से मुझे कौन छुड़ाएगा?" तो अगली ही साँस में हमें यह जोड़ना अवश्य है, "मैं अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ।" हमें उसमें वह महान् छुड़ानेवाला देखना है, और यह जानना है कि वह हमारी हर आवश्यकता को पूरा करने और उसकी पूर्ति करने में समर्थ है।
  3. हमें हर बात में अपने आप को पूरी तरह उसे समर्पित करना अवश्य है। हमें अपने आप को उसे भली-भाँति, निश्चित रूप से और बिना किसी शर्त के दे देना है, और इसे हृदय पर ऐसे उकेर लेना है मानो वह चट्टानों पर लिखा हो, या आकाश पर चित्रित हो। इसे अपनी स्मृति के इतिहास में गहराई से खोद ले। सदा यह स्मरण रख कि उस दिन और उस घड़ी मैंने अपने आप को पूरी तरह मसीह को दे दिया और वह पूरी तरह मेरा हो गया।
  4. हमें यह विश्वास करना अवश्य है कि जो समर्पण हम करते हैं उसे वह ग्रहण करता है। वह इसके विषय में उतना ही उत्सुक, उतना ही इच्छुक और उतना ही सच्चा है जितने तुम हो। स्वर्ग की शान्ति के बीच वह तेरी मन्नतें सुनने को झुक जाता है, और जब तू समाप्त कर लेता है तब वह फुसफुसाता है, "यह हो गया। मैं प्यासे को जीवन के जल के सोते में से सेंत-मेंत दूँगा। जो जय पाए वही इन वस्तुओं का अधिकारी होगा।"

बहुत से लोग इन चरणों में से कुछ के विषय में भूल करते हैं। उनमें से कुछ अपनी पुरानी भलाई में से थोड़ा-सा थामे रहते हैं और इसीलिये विफलताओं से मिलते हैं। दूसरे दूसरे चरण पर ठोकर खाते हैं। वे यह नहीं देखते कि यीशु ही उनका पूर्ण पवित्र करनेवाला है। और बहुत से तीसरा चरण उठाकर हर बात का पूरा समर्पण उसे नहीं कर पाते। बहुत से लोग इन चरणों को उठा लेने पर भी इसलिये विफल होते हैं कि वे यह विश्वास नहीं कर पाते कि यीशु उन्हें ग्रहण करता है। इन चारों चरणों को स्पष्ट रखो। "मैं मर चुका हूँ, मेरा अपना जीवन समर्पित किया जाकर दृष्टि से ओझल गाड़ दिया गया है। यीशु मेरा पवित्र करनेवाला और मेरा सर्वस्व है। मैं हर बात उसके हाथ में सौंप देता हूँ कि जैसा वह उत्तम समझे वैसा उसके साथ करे। मैं विश्वास करता हूँ कि जो समर्पण मैं उसे करता हूँ उसे वह ग्रहण करता है। मैं विश्वास करता हूँ कि इस जीवन में या आनेवाले जगत में जो कुछ मुझे चाहिए, वह सब वह मुझ में होगा।" प्रिय मित्रो, मुझे निश्चय है कि जब तुम इन चारों चरणों को उठा लोगे तो तुम फिर कभी वैसे न रह सकोगे जैसे तुम पहले थे। कुछ ऐसा हो चुका है जो कभी अनकिया नहीं किया जा सकता। तुम प्रभु के हो गए हो। उसकी उपस्थिति तुम्हारे हृदय में आ गई है; यह पर्वत की ढलान पर बहते किसी छोटे-से सोते के समान हो सकती है, परन्तु वह गहराई और सामर्थ्य की बड़ी नदियाँ बन जाएगी।

V. व्यावहारिक चरण

जिनके द्वारा पवित्रीकरण का यह जीवन दिन-प्रतिदिन जीया जाता है।

  1. हमें परमेश्वर के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता का जीवन जीना है, सदा वही करना है जो वह कहे, और अब से पूरी तरह उसके निर्देशन के अधीन रहना है।
  2. हमें सदा मन लगाकर उसकी वाणी पर कान लगाए रहना है। हमें ध्यान से सुनना होगा, क्योंकि यीशु धीमे स्वर में बोलता है।
  3. संघर्ष या परीक्षा या जाँच के हर समय में, हमें परमेश्वर के निकट आना है और वह बात उसे सौंप देनी है। ऐसे समर्पण के बाद जिन मधुर और आनन्दमय अनुभवों की तुम स्वाभाविक रूप से आशा करोगे, उनके बदले शैतान आता है और किसी परीक्षा या प्रलोभन के द्वारा तुम्हारे विश्वास को हिलाने का प्रयत्न करता है। उसी में स्थिर रहो और आनन्दित हो कि वह तुम्हें ऐसी परीक्षाएँ पाने के योग्य ठहराता है। यदि तुम विफल हो जाओ, तो यह मत कहना कि आगे प्रयत्न करने से कोई लाभ नहीं। सिद्धान्त तो सही है। शायद तुमने वह काम स्वयं करने का प्रयत्न किया और इसीलिये विफल हुए। रुक जाओ और सब कुछ उसके चरणों में रख दो और नये सिरे से आरम्भ करो, और अपनी उसी विफलता से उसमें बने रहना सीखो। इस्राएल, ऐ में अपनी हार के बाद, अगले संघर्ष के लिये और बलवन्त हुआ। जो भेद तुमने सीखा है उसे जीकर दिखाने का प्रयत्न करो। मानवीय कला में आरम्भ में सदा लड़खड़ाहट होती है। तुम आशुलिपि के सिद्धान्त बहुत थोड़े समय में सीख सकते हो, शायद कुछ ही घंटों में, परन्तु उसमें निपुण होने के लिये महीनों के धैर्यपूर्ण अभ्यास की आवश्यकता होती है। हाल ही में हमारी एक पश्चिमी सभा में, एक महिला भाषणों की अक्षरशः रिपोर्ट ले रही थी। वह एक छोटी-सी मेज़ पर एक ऐसे यंत्र के साथ बैठी थी जिसे वे आशुलिपि-यंत्र कहते हैं। इस यंत्र की कुंजियों को छूने से एक छोटी-सी सुई कागज के फीते पर छाप काट देती थी, जो बोले गए शब्दों को पूरी शुद्धता के साथ दर्शाती थी। वह सिद्धान्त कुछ ही घंटों में सीख सकी, परन्तु इससे पहले कि वह उसकी इतनी अभ्यस्त हो जाती कि उसे सहजता से कर पाती, शान्त अभ्यास के और भी बहुत घंटे लगे। जिस क्षण हम यीशु मसीह को समर्पित होते हैं, उसी क्षण हम यह भेद सीख लेते हैं कि वही हमारा सर्वस्व होना है। परन्तु जब हम इस सत्य का अभ्यास करने का प्रयत्न करते हैं, तब हम पाते हैं कि इसे भली-भाँति सीखने में समय और धीरज लगता है। हमें उस पर टेक लगाना सीखना है। हमें थोड़ा-थोड़ा करके यह सीखना है कि हर आवश्यकता के लिये उसे किस रीति से ग्रहण करें। सिद्धान्त तो सिद्ध है। अभ्यास में यह पूरी तरह अचूक हो जाएगा। स्मरण रख, भेद यही है, "मुझ से अलग रहकर तुम कुछ नहीं कर सकते।" "जो मुझे सामर्थ्य देता है उस मसीह में मैं सब कुछ कर सकता हूँ।"
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