किसान से बातें
बोनेवाले का दृष्टान्त

अध्याय 7 · 23 मिनट का पठन

बोनेवाले का दृष्टान्त

“जब बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई, और नगर-नगर के लोग उसके पास चले आते थे, तो उसने दृष्टान्त में कहा: ‘एक बोनेवाला बीज बोने निकला: बोते हुए कुछ मार्ग के किनारे गिरा, और रौंदा गया, और आकाश के पक्षियों ने उसे चुग लिया। और कुछ चट्टान पर गिरा, और उपजा, परन्तु नमी न मिलने से सूख गया। कुछ झाड़ियों के बीच में गिरा, और झाड़ियों ने साथ-साथ बढ़कर उसे दबा लिया। और कुछ अच्छी भूमि पर गिरा, और उगकर सौ गुणा फल लाया।’ यह कहकर उसने ऊँचे शब्द से कहा, ‘जिसके सुनने के कान हों वह सुन लें।’” लूका 8:4-8।

हमारे देश में, जब कोई किसान बोने निकलता है, तो वह प्रायः एक घिरे हुए खेत में काम करता है, और अपनी टोकरी से हर मेड़ और हर कूँड़ में बीज बिखेरता है। परन्तु पूर्व में, छोटे नगरों के पास, खेती की भूमि प्रायः एक खुला मैदान होती थी। वह अलग-अलग लोगों की सम्पत्तियों में बँटी होती थी, परन्तु कोई दिखाई देनेवाला बाड़ा नहीं होता था—केवल प्राचीन सीमा-चिह्न, या कदाचित् पत्थरों की छोटी-छोटी मेड़ें।

इन खुले खेतों के बीच से पगडंडियाँ होकर जाती थीं। जिन रास्तों पर सबसे अधिक लोग चलते थे, वे राजमार्ग कहलाते थे, यद्यपि वे हमारी पक्की सड़कों के समान बिलकुल न थे—वे केवल घिसी हुई लीकें थीं, जो लगातार आने-जाने से कठोर हो गई थीं। इनके अतिरिक्त छोटी-छोटी बगल की पगडंडियाँ भी थीं, जिन्हें यात्रियों ने अधिक सुरक्षित मार्ग या छोटा रास्ता ढूँढ़ते हुए बना लिया था। समय बीतने पर ये भी घिसकर कड़ी हो गईं।

जब बोनेवाला बोने निकलता था, तो वह ऐसी मिट्टी में काम करता था जिसे एक सीधे-सादे, पुराने ढंग के हल ने बस ऊपर-ऊपर से खुरच दिया था। उसका लक्ष्य यही होता था कि अपना अधिकांश बीज वहीं बिखेरे। परन्तु क्योंकि खेत के बीचों-बीच से एक रास्ता जाता था, इसलिए जब तक वह एक चौड़ी पट्टी को खाली न छोड़ दे, कुछ बीज रास्ते पर अवश्य गिरता। किसी और स्थान पर कोई चट्टान सतह के निकट तक उभरी होती, जिस पर मिट्टी की केवल एक पतली परत होती। बीज वहाँ भी गिरता।

किसी और कोने में भूमि बिच्छू पौधों और ऊँटकटारों की जड़ों से उलझी हुई हो सकती थी।

किसान वहाँ भी बीज बिखेर देता, और अनाज और जंगली पौधे दोनों साथ-साथ उगते— जब तक कि अधिक बलवन्त काँटे नन्हे पौधों को ऐसा दबा न लेते कि वे कोई पका हुआ फल न ला पाते।

यह स्मरण रखना कि बाइबल पूर्व में लिखी गई, और उसके चित्र उसी परिवेश से लिए गए हैं, प्रायः उसका अर्थ समझने में हमारी उससे कहीं अधिक सहायता करता है, जितनी केवल अंग्रेज़ी खेती की रीतियों की कल्पना करने से होती। सुसमाचार का प्रचारक उस बोनेवाले के समान है। वह बीज को स्वयं नहीं बनाता; वह तो उसे उसके ईश्वरीय स्वामी की ओर से दिया जाता है। कोई भी मनुष्य पृथ्वी में उगनेवाला छोटे से छोटा दाना तक नहीं बना सकता, तो उस स्वर्गीय बीज को बनाना तो और भी दूर की बात है जो अनन्त जीवन देता है। सेवक एकान्त की प्रार्थना में अपने स्वामी के पास जाता है और माँगता है कि उसे सुसमाचार सिखाया जाए। इसी रीति से वह अपनी टोकरी राज्य के अच्छे बीज से भरता है।

तब वह अपने स्वामी के नाम से बाहर जाता है और उस बहुमूल्य सत्य को बिखेरता है। यदि वह ठीक-ठीक जानता कि सबसे अच्छी भूमि कहाँ है—किन हृदयों को पाप के बोध ने पहले से तैयार कर रखा है—तो कदाचित् वह केवल वहीं अपना ध्यान लगाता। परन्तु क्योंकि वह मनुष्यों के हृदयों के भीतर नहीं देख सकता, इसलिए उसे सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करना है। उसे कठोर हृदयों पर, भटकते हुए मनों पर, और इस संसार की चिन्ताओं और सुख-विलास में उलझे हुए लोगों पर भी बीज बिखेरना है।

उसे परिणाम उस प्रभु पर छोड़ देने हैं जिसने उसे बीज दिया। कटनी के लिये वह उत्तरदायी नहीं है; वह केवल इस बात के लिये उत्तरदायी है कि अपना काम सच्चाई और परिश्रम से करे। चाहे अनाज की एक भी बाल कभी काटनेवाले को आनन्दित न करे, तौभी यदि बोनेवाले ने सावधान हाथों से ठीक बीज बोया है, तो उसका स्वामी उसे प्रतिफल अवश्य देगा। इस आश्वासन के बिना हम भविष्यद्वक्ता के साथ यह पुकारने से कैसे बच सकते थे, “जो समाचार हमें दिया गया, उसका किसने विश्वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ?” (यशायाह 53:1)।

हमारा कर्तव्य हमारे सुननेवालों के स्वभाव से नहीं, परन्तु हमारे परमेश्वर की आज्ञा से निर्धारित होता है। लोग चाहे सुनें या न सुनें, हमें सुसमाचार प्रचार करना ही है। हमें सब जलाशयों के पास बीज बोना है। हृदयों की दशा चाहे जैसी भी हो, सेवक को प्रचार करना ही है—कूँड़ के साथ-साथ चट्टान को भी, जुते हुए खेत के साथ-साथ रास्ते को भी।

अब मैं उन चार प्रकार के सुननेवालों के विषय में बोलूँगा जिनका वर्णन हमारे प्रभु के दृष्टान्त में है। पहले, वे जो रास्ते के समान हैं—केवल सुननेवाले। दूसरे, वे जो पथरीली भूमि के समान हैं—थोड़ी देर के लिये प्रभावित, परन्तु स्थायी फल के बिना। तीसरे, वे जो काँटों के बीच हैं—जहाँ वचन उगने तो लगता है, परन्तु जीवन की चिन्ताओं, धन के धोखे, और सांसारिक सुख-विलास से दब जाता है।

और अन्त में, वह छोटा-सा समूह—परमेश्वर उसे बहुत बढ़ाए—अर्थात् अच्छी भूमि, जिनमें वचन भरपूर फल उत्पन्न करता है।

I. मार्ग का किनारा “कुछ मार्ग के किनारे गिरा, और रौंदा गया, और आकाश के पक्षियों ने उसे चुग लिया।” तुममें से बहुत-से लोग आशीष की खोज में आराधना में नहीं आते। तुम्हारा न तो परमेश्वर की आराधना करने का इरादा होता है, न यह कि जो तुम सुनते हो उससे तुम बदल जाओ। तुम उस रास्ते के समान हो जो कभी अनाज का खेत बनने के लिये था ही नहीं। यदि सत्य का एक भी बीज तुममें उग आए, तो वह उतना ही आश्चर्यजनक होगा जितना किसी भीड़-भरी सड़क के बीचों-बीच गेहूँ का उगना।

यदि बीज कुशलता से बिखेरा जाए, तो उसमें से कुछ थोड़ी देर के लिये तुम्हारे विचारों पर टिक सकता है। चाहे तुम उसे पूरी तरह न समझो, परन्तु यदि वह आकर्षक ढंग से रखा गया हो, तो कदाचित् तुम कुछ समय तक उसकी चर्चा करो—जब तक कि कोई अधिक मनोरंजक बात तुम्हारा ध्यान न खींच ले। यह छोटा-सा लाभ भी थोड़े ही समय का होता है। शीघ्र ही तुम जो कुछ सुना था, सब भूल जाते हो।

हम चाहते हैं कि यह आशा कर सकें कि वचन तुम्हारे साथ बना रहेगा, परन्तु तुम्हारा हृदय लगातार आवाजाही से इतना कठोर हो गया है कि बीज के जड़ पकड़ने के लिये कोई स्थान ही नहीं है। शैतान निन्दाओं, अभिलाषाओं, झूठ और खोखले मनबहलावों के साथ लगातार उस पर से गुज़रता रहता है। घमण्ड भारी पहियों के समान उस पर लुढ़कता है। लोभ उसे तब तक रौंदता है जब तक वह पत्थर के समान कठोर न हो जाए।

बीज को टिकने का कोई स्थान नहीं मिलता। विचार लगातार इधर-उधर दौड़ते रहते हैं। तुम्हारा प्राण एक बाज़ार बन गया है जहाँ हर वस्तु का लेन-देन होता है। तुम खरीदने और बेचने में व्यस्त हो, तौभी तुम यह नहीं समझते कि तुम सत्य को बेच रहे हो और अपना ही विनाश खरीद रहे हो।

तुम कहते हो कि तुम्हारे पास आत्मिक बातों पर विचार करने का समय नहीं है। तुम्हारे हृदय की सड़क पर इतनी भीड़ है कि बीज के उगने के लिये कोई जगह नहीं है। यदि वह कभी अंकुरित होने भी लगे, तो कोई नया मनोरंजन या ध्यान भटकानेवाली बात उसके पकने से पहले ही उसे कुचल देती है। जैसे किसी नगर की सबसे व्यस्त गलियों में अनाज कभी नहीं उग सकता, वैसे ही जो हृदय लगातार शोर, घमण्ड, चिन्ता और परमेश्वर के विरुद्ध बलवे से भरा है, उसमें सत्य नहीं उग सकता।

हमने इस कठोर मार्ग के किनारे को देख लिया; अब आओ, हम विचार करें कि जब अच्छा वचन ऐसे हृदय पर गिरता है तो उसका क्या होता है।

यदि बीज उचित भूमि पर गिरता तो वह उग आता। परन्तु वह गलत स्थान पर जा पड़ा है, और वह उतना ही सूखा पड़ा रहता है जितना बोनेवाले के हाथ से पहली बार छूटते समय था। सुसमाचार का वचन उस हृदय की सतह पर पड़ा रहता है, परन्तु कभी उसके भीतर प्रवेश नहीं करता। वह किसी व्यस्त सड़क पर गिरती बर्फ के समान है: वह गीले फ़र्श को छूती है, पिघलती है, और तुरन्त लुप्त हो जाती है। वचन को प्राण में जीवन जगाने का समय ही नहीं मिलता। वह थोड़ी देर वहाँ ठहरता है, परन्तु न कभी जड़ पकड़ता है और न कोई स्थायी प्रभाव उत्पन्न करता है।

यदि वचन कभी उनके हृदयों में प्रवेश ही नहीं करता, तो लोग सुनने आते क्यों हैं? इस प्रश्न ने हमें प्रायः उलझन में डाला है। कुछ लोग किसी भी कारण से एक भी रविवार नहीं छोड़ेंगे। उन्हें आराधना के लिये इकट्ठा होना अच्छा लगता है। फिर भी उनकी आँखों से एक आँसू तक नहीं गिरता। उनके प्राण कभी स्तुति में स्वर्ग की ओर नहीं उठते। वे पाप के अंगीकार में सच्चे मन से सम्मिलित नहीं होते। वे आनेवाले न्याय या अपने प्राणों की भावी दशा पर गम्भीरता से विचार नहीं करते। उनके हृदय लोहे के समान हैं; सेवक चाहे तो पत्थरों के ढेर को भी उतना ही प्रचार कर ले।

ऐसे संवेदनहीन पापियों को यहाँ क्या खींच लाता है? कभी-कभी ऐसा लगता है कि इन अनगढ़, बेपरवाह हृदयों का मन फिराने की जितनी आशा है, उतनी ही जंगली पशुओं का मन फिराने की भी होती। क्या सारी भावना मिट गई है? क्या लोग केवल इसलिए आराधना में आते हैं कि यह प्रतिष्ठा की बात है? या क्या आने से वे अपने पापों में अधिक चैन अनुभव करते हैं? यदि वे न आते, तो उनका विवेक उन्हें कचोट सकता था; परन्तु आकर वे अपने आप को यह विश्वास दिला देते हैं कि वे धार्मिक हैं।

हाय, मेरे सुननेवालो, तुम्हारी दशा पर तो स्वर्गदूत भी रो पड़े। सुसमाचार का सूर्य तुम्हारे मुख पर चमकता है, फिर भी तुम्हारी आँखें अंधी बनी रहती हैं। स्वर्ग का संगीत तुम्हारे कानों में गूँजता है, फिर भी तुम उसे सचमुच नहीं सुनते। तुम किसी सुन्दर वाक्य की सराहना कर सकते हो। तुम किसी उदाहरण की प्रशंसा कर सकते हो। परन्तु उसका आत्मिक अर्थ—सन्देश के भीतर की जीवित सामर्थ—तुम नहीं पकड़ते। तुम विवाह के भोज में बैठे हो, परन्तु भोजन का स्वाद नहीं लेते। स्वर्ग छुड़ाए गए प्राणों पर आनन्द मनाता है, फिर भी तुम बिना छुटकारे के, ईश्वर रहित और मसीह से अलग बने रहते हो। चाहे हम तुमसे विनती करें, तुम्हारे लिये प्रार्थना करें, और तुम पर आँसू बहाएँ, तुम सदा की भाँति कठोर और लापरवाह बने रहते हो। परमेश्वर तुम पर दया करे और तुम्हारे कठोर हृदय को तोड़ दे, कि उसका वचन तुम्हारे भीतर वास करे।

चित्र अभी पूरा नहीं हुआ। यह खण्ड हमें बताता है कि आकाश के पक्षियों ने बीज को चुग लिया। क्या यहाँ मार्ग के किनारे का कोई सुननेवाला है? कदाचित् आज उसका ध्यान से सुनने का इरादा ही नहीं था। जब उपदेश समाप्त होता है, तो कोई उसे संदिग्ध संगति में बुला लेता है। वह साथ चला जाता है, और अच्छा बीज शीघ्र ही चुग लिया जाता है।

ऐसे बहुत-से प्रभाव हैं जो किसी हृदय से सुसमाचार को झपट लेने को तैयार रहते हैं। स्वयं शैतान—जिसे पवित्रशास्त्र “आकाश के अधिकार के अधिपति” कहता है—किसी अच्छे विचार को चुरा ले जाने के लिये सदा उतावला रहता है।

और वह अकेला काम नहीं करता। उसके अनगिनत सहायक हैं। पति या पत्नी, बच्चे, मित्र, शत्रु, ग्राहक, लेनदार—इनमें से कोई भी बीज को खा जाने का साधन बन सकता है, और प्रायः वे सफल भी हो जाते हैं। कैसी दुःखद बात है कि स्वर्गीय बीज शैतान का भोजन बन जाए—कि परमेश्वर का अनाज अशुद्ध पक्षियों का पेट भरे।

यदि तुम बचपन से सुसमाचार सुनते आए हो, तो तुम पर कितनी गाड़ियाँ भर-भरकर उपदेश व्यर्थ गए हैं? अपनी जवानी के दिनों में कदाचित् तुमने किसी ऐसे विश्वासयोग्य प्रचारक को सुना हो, जो अपनी मण्डली के लिये तब तक प्रार्थना करता रहा जब तक उसकी आँखें आँसुओं से लाल न हो गईं। क्या तुम्हें वे रविवार याद हैं जब तुमने अपने मन में कहा था, “मैं अपने कमरे में जाकर प्रार्थना करूँगा”? परन्तु तुमने नहीं की। पक्षियों ने बीज चुग लिया, और तुम पाप में लगे रहे।

अब भी तुम कलीसिया से शायद ही कभी अनुपस्थित रहते हो। फिर भी सुसमाचार तुम्हारे प्राण पर ऐसे गिरता है मानो लोहे पर गिरा हो। व्यवस्था चाहे गर्जन के साथ प्रचार की जाए—तुम उसका ठट्ठा तो नहीं करते, परन्तु तुम हिलते भी नहीं।

मसीह तुम्हारे सामने ऊँचे पर उठाया जा सकता है। उसके घावों का वर्णन किया जा सकता है। उसका लहू तुम्हारी आँखों के सामने रखा जा सकता है। तुमसे आग्रहपूर्वक विनती की जा सकती है कि उसकी ओर दृष्टि करो और जीवित रहो। परन्तु यह समुद्र के किनारे-किनारे बीज बोने के समान है।

मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? क्या मैं यहाँ खड़ा होकर इस कठोर रास्ते पर रोऊँ? मेरे आँसू उसे नरम नहीं कर सकते; वह बहुत समय से रौंदा जाता रहा है। क्या मैं सुसमाचार का हल ले आऊँ? उसका फाल ऐसी दबी हुई मिट्टी में धँस नहीं सकता। तब क्या? हे परमेश्वर, केवल तू ही जानता है कि यीशु के बहुमूल्य लहू के द्वारा सबसे कठोर हृदय को कैसे पिघलाया जाए। हम विनती करते हैं, अभी ऐसा कर। अच्छे बीज को जीवित करके और उससे स्वर्गीय कटनी उत्पन्न करके अपने अनुग्रह की महिमा कर।

अब दूसरे प्रकार के सुननेवाले पर विचार करो। कुछ बीज चट्टान पर गिरा, और उपजा, परन्तु नमी न मिलने से सूख गया। तुम खेत के बीच में उस चट्टान का चित्र अपने मन में खींच सकते हो, जिस पर मिट्टी की केवल एक पतली परत है। बीज वहाँ भी वैसे ही गिरता है जैसे और सब जगह। वह शीघ्र अंकुरित होता है। वह तेज़ी से बढ़ता है। फिर वह मुरझाकर मर जाता है।

केवल वे ही, जो प्राणों से गहरा प्रेम करते हैं, उन आशाओं, आनन्दों और कड़वी निराशाओं को समझ सकते हैं जो इन पथरीले स्थानों के कारण हुई हैं। कुछ सुननेवाले ऐसे हैं जिनके हृदय कोमल और संवेदनशील प्रतीत होते हैं। जब दूसरे कुछ भी अनुभव नहीं करते, तब ये स्पष्ट रूप से द्रवित हो जाते हैं। चाहे सन्देश न्याय के विषय में हो या क्रूस पर मसीह के प्रेम के विषय में, वे हिल उठते हैं। उन पर गहरी छाप पड़ती है।

वे बदलने का निश्चय करते हैं, फिर भी टालते रहते हैं। वे परमेश्वर के कठोर विरोधी नहीं हैं। वे खुले और उत्सुक दिखाई देते हैं। आनन्दित होकर हम सन्देश को उनकी ओर मोड़ते हैं, और ऐसा लगता है कि वह भीतर उतर रहा है। परन्तु सतह के नीचे एक छिपा हुआ कवच है। कोई स्थायी घाव नहीं होता।

पवित्रशास्त्र उनका वर्णन इस प्रकार करता है: “और वैसे ही जो पत्थरीली भूमि पर बोए जाते हैं, ये वे हैं, कि जो वचन को सुनकर तुरन्त आनन्द से ग्रहण कर लेते हैं। परन्तु अपने भीतर जड़ न रखने के कारण वे थोड़े ही दिनों के लिये रहते हैं; इसके बाद जब वचन के कारण उन पर क्लेश या उपद्रव होता है, तो वे तुरन्त ठोकर खाते हैं” (मरकुस 4:16-17)।

क्या हमने बहुतों को वचन को आनन्द से ग्रहण करते नहीं देखा? उन्हें पाप का कोई गहरा बोध नहीं होता, फिर भी वे झट से मसीह पर विश्वास का अंगीकार कर लेते हैं। उनका विश्वास सच्चा दिखाई देता है। बीज अंकुरित हो गया है। एक हरा अंकुर निकल आया है। हम यह सोचकर परमेश्वर का धन्यवाद करते हैं कि एक प्राण का उद्धार हो गया। परन्तु हमारा आनन्द समय से पहले का है। गहराई की वही कमी, जिसके कारण उन्होंने झट से प्रत्युत्तर दिया था, कठिनाई आने पर उन्हें मुरझा भी देती है।

हम यह प्रायः देखते हैं। कोई कलीसिया में सम्मिलित होने की विनती करता है और हमें बताता है कि किसी उपदेश ने उसे कितनी गहराई से छू लिया।

वह कहता है कि उसने तुरन्त विश्वास कर लिया और ऐसा आनन्द उसने पहले कभी अनुभव नहीं किया। हम पाप के बोध के विषय में पूछते हैं। उसका विचार है कि हाँ, उसे बोध हुआ था। जो बात वह निश्चित रूप से जानता है, वह यह है कि धर्म से उसे बड़ा सुख मिलता है।

हम पूछते हैं कि क्या वह स्थिर बना रहेगा, और उसे पूरा भरोसा है कि वह बना रहेगा। सब कुछ नया प्रतीत होता है। वह दावा करता है कि जिससे वह पहले प्रेम करता था, अब उससे घृणा करता है। और यह सब अचानक हो गया है, हृदय की गहरी जुताई के बिना। मानो कोई खेत जादू से पल भर में गेहूँ से ढक गया हो। कदाचित् उसे संगति में ग्रहण कर लिया जाता है। कुछ ही सप्ताहों में वह कम नियमित हो जाता है। जब उसे नम्रता से टोका जाता है, तो वह समझाता है कि विरोध के कारण बातें कठिन हो गई हैं। शीघ्र ही वह पूरी तरह लुप्त हो जाता है। थोड़े-से उपहास या असुविधा ने उसे पीछे हटा दिया है। सेवक अपने आप को उस किसान के समान पाता है जिसने अपने खेत को हरा-भरा और लहलहाता देखा था, पर जागकर पाया कि पाले ने हर अंकुर को नष्ट कर दिया है।

यदि मार्ग के किनारे का सुननेवाला होना दुःखद है, तो चट्टान के समान होना भी उससे शायद ही अच्छा है। यह दूसरा समूह आरम्भ में अधिक आशा देता है। वे उत्सुकता से इकट्ठे होते हैं, विशेषकर किसी नये सेवक के आसपास। वे समर्पित दिखाई देते हैं। परन्तु समय सब कुछ परखता है। जो बलवन्त दिखाई देता था, वह उथला निकलता है। जब परीक्षाएँ आती हैं, तो वे मुरझा जाते हैं।

तुममें से कुछ इस समूह के हो सकते हो। तुमने गहराई से अनुभव किया है। तुमने बार-बार निश्चय किया है। फिर भी वर्ष बीतते जाते हैं, और कुछ नहीं बदलता। न कोई गहराई है, न आत्मा का कोई स्थिर कार्य। क्या यह ऐसा ही बना रहे?

क्या किसी दिन तुम्हारा जीवन उस पौधे के रूप में स्मरण किया जाएगा जो अंकुरित तो हुआ पर कभी पका नहीं? परमेश्वर न करे।

आत्मा तुममें गहराई से और सामर्थ के साथ कार्य करे, कि तुम अब भी परमेश्वर के लिये फल लाओ और मसीह को आदर दो।

III. मैं तीसरे वर्ग पर संक्षेप में बात करूँगा, और परमेश्वर का आत्मा मेरी सहायता करे कि मैं तुम्हारे साथ सच्चाई से व्यवहार करूँ।

“कुछ झाड़ियों के बीच में गिरा, और झाड़ियों ने साथ-साथ बढ़कर उसे दबा लिया।” अब, यह अच्छी भूमि थी। पहले दो प्रकार बुरे थे; मार्ग का किनारा उचित स्थान नहीं था, चट्टान किसी भी पौधे के उगने के लिये उपयुक्त जगह नहीं थी; परन्तु यह अच्छी भूमि है, क्योंकि इसमें काँटे उगते हैं।

जहाँ कहीं ऊँटकटारा उगकर फल-फूल सकता है, वहाँ गेहूँ भी फूले-फलेगा। यह उपजाऊ, भरपूर मिट्टी थी; इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि किसान ने वहाँ खुले हाथ से बोया, और खेत के उस कोने पर मुट्ठी पर मुट्ठी बीज फेंका। देखो, जब एक-दो महीने बाद वह उस स्थान को देखने आता है तो वह कितना प्रसन्न है। बीज उग आया है। यह सच है कि वहाँ नीचे एक संदेहजनक छोटा-सा पौधा है जो लगभग गेहूँ के ही बराबर है। “अरे!” वह सोचता है, “यह कुछ विशेष नहीं, अनाज इससे आगे बढ़ जाएगा। जब वह बलवन्त हो जाएगा तो इन थोड़े-से ऊँटकटारों को दबा देगा जो दुर्भाग्य से उसके साथ मिल गए हैं।” आह, किसान महोदय, तुम बुराई की सामर्थ को नहीं समझते, नहीं तो तुम ऐसे सपने न देखते! वह फिर आता है, और बीज बढ़ गया है, यहाँ तक कि अनाज में बालें भी आ गई हैं; परन्तु ऊँटकटारे, काँटे और झाड़-झंखाड़ आपस में ऐसे गुँथ गए हैं कि बेचारे गेहूँ को धूप की एक किरण भी कठिनाई से मिल पाती है। वह चारों ओर से काँटों से इतना दबा हुआ है कि बिलकुल पीला दिखाई देता है; पौधा भूखा मर रहा है। फिर भी वह बढ़ता रहता है, और सचमुच ऐसा लगता है कि वह थोड़ा-सा फल लाएगा। हाय, उससे कभी कुछ नहीं निकलता। उससे काटनेवाला कभी अपनी अँकवार नहीं भरता।

हमारे बीच यह वर्ग बहुत बड़ी संख्या में है। ये वचन सुनते हैं और जो सुनते हैं उसे समझते भी हैं।

वे सत्य को घर ले जाते हैं; उस पर सोच-विचार करते हैं; यहाँ तक कि धर्म का अंगीकार भी कर लेते हैं।

गेहूँ उगता हुआ और बाल बनाता हुआ दिखाई देता है; शीघ्र ही वह पूर्णता तक पहुँच जाएगा। जल्दी मत करो; इन पुरुषों और स्त्रियों को बहुत कुछ सँभालना है; उन पर एक बड़े व्यापार की चिन्ताएँ हैं; उनके प्रतिष्ठान में न जाने कितने सैकड़ों लोग काम करते हैं; उनकी भक्ति के विषय में धोखा मत खाओ—उनके पास उसके लिये समय ही नहीं है। वे तुमसे कहेंगे कि उन्हें जीना तो है ही; कि वे इस संसार की उपेक्षा नहीं कर सकते; कि उन्हें किसी न किसी प्रकार वर्तमान की देखभाल करनी ही है, और जहाँ तक भविष्य की बात है, वे आगे चलकर उस पर उचित ध्यान देंगे। वे सुसमाचार का प्रचार सुनने आते रहते हैं, और धर्म का वह बेचारा, छोटा, ठिठुरा हुआ अंकुर किसी तरह बढ़ता रहता है।

इस बीच वे धनी हो गए हैं; वे आराधना के स्थान पर बग्घी में आते हैं; मन जो कुछ चाह सकता है, वह सब उनके पास है। आह! अब तो बीज उगेगा, है न? नहीं, नहीं।

अब उन्हें कोई चिन्ता नहीं है; दुकान छोड़ दी गई है, वे देहात में रहते हैं; अब उन्हें यह पूछना नहीं पड़ता, “अगला बिल चुकाने के लिये पैसा कहाँ से आएगा?” या “हम बढ़ते हुए परिवार का पालन-पोषण कैसे करेंगे?” अब उनके पास बहुत कम के बदले बहुत अधिक है, क्योंकि उनके पास धन है, और वे इतने धनी हैं कि अनुग्रह से भरे नहीं रह पाते। “परन्तु,” कोई कहता है, “वे अपना धन परमेश्वर के लिये खर्च कर सकते थे।” निश्चय ही कर सकते थे, परन्तु वे नहीं करते, क्योंकि धन धोखा देनेवाला है। उन्हें बहुत-से अतिथियों का सत्कार करना पड़ता है, और संसार के साथ चलना पड़ता है, और इस प्रकार मसीह और उसकी कलीसिया पीछे छूट जाते हैं।

हाँ, परन्तु वे अपना धन खर्च करने लगते हैं, और निश्चय ही उन्होंने उस कठिनाई पर जय पा ली है, क्योंकि वे मसीह के काम के लिये उदारता से देते हैं, और दान-पुण्य में खुले हाथ के हैं; अब तो वह छोटा अंकुर बढ़ेगा, है न? नहीं, क्योंकि अब सुख-विलास के काँटों को देखो। दूसरों के प्रति उनकी उदारता में अपने प्रति उदारता भी सम्मिलित है; उनके सुख-विलास, मनोरंजन और व्यर्थ बातें सच्चे धर्म के गेहूँ को दबा देती हैं; सुसमाचार के सत्य के अच्छे दाने उग नहीं सकते, क्योंकि उन्हें उस संगीत-सभा में, उस नृत्य-समारोह में, और उस संध्या-गोष्ठी में जाना ही है, और इस प्रकार वे परमेश्वर की बातों के विषय में सोच नहीं पाते। मैं इस वर्ग के कई उदाहरण जानता हूँ। मैं एक को जानता था, जो राजदरबार के ऊँचे घेरों में था, और जिसने मेरे सामने मान लिया कि काश वह निर्धन होता, क्योंकि तब वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर पाता। उसने मुझसे कहा, “आह, महोदय, यह राजनीति, यह राजनीति, काश मैं इससे छूट जाता, यह मेरे हृदय का जीवन खाए जा रही है। मैं जैसा चाहता हूँ, वैसे परमेश्वर की सेवा नहीं कर पाता।”

मैं एक और को जानता हूँ, जो धन के बोझ से दबा था, जिसने मुझसे कहा, “आह, महोदय, धनी होना एक भयानक बात है; जब चारों ओर इतनी सांसारिक वस्तुएँ हों, तो कोई उद्धारकर्ता के निकट बना नहीं रह सकता।”

आह, मेरे प्रिय पाठको, मैं यह नहीं माँगूँगा कि परमेश्वर तुम्हें बीमारी की खाट पर लिटा दे, कि वह तुम्हारा सारा धन छीन ले और तुम्हें निर्धनता में पहुँचा दे; परन्तु, आह, यदि वह ऐसा करे, और तुम अपने प्राणों को बचा लो, तो यह सबसे अच्छा सौदा होगा जो तुम कभी कर सकते हो। यदि वे बड़े लोग, जो अब शिकायत करते हैं कि काँटे बीज को दबा रहे हैं, अपना सारा धन और सुख-विलास छोड़ सकते, यदि वे जो प्रतिदिन ऐश्वर्य में रहते हैं, डेवढ़ी पर पड़े लाज़र का स्थान ले सकते, तो यदि उनके प्राणों का उद्धार हो जाए, यह उनके लिये एक सुखद बदलाव होता। कोई मनुष्य प्रतिष्ठित और धनी होकर भी स्वर्ग जा सकता है; परन्तु यह कठिन काम होगा, क्योंकि “परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है।” परमेश्वर कुछ धनवानों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कराता तो है, परन्तु उनका संघर्ष कठिन होता है। सँभलकर, हे जवान, सँभलकर! धन की चोटी पर चढ़ने की जल्दी मत कर! यह ऐसा स्थान है जहाँ बहुतों के सिर फिर जाते हैं। परमेश्वर से यह मत माँग कि वह तुझे लोकप्रिय बना दे; जिनके पास लोकप्रियता है, वे उससे थक जाते हैं। आगूर के साथ पुकार, “मुझे न तो निर्धन कर और न धनी बना।” परमेश्वर करे कि मैं सुनहरे मध्य मार्ग पर चलूँ, और मेरे हृदय में सदा वह अच्छा बीज बना रहे जो उसकी अपनी महिमा के लिये सौ गुणा फल लाएगा।

IV. अब मैं अन्तिम प्रकार के साथ, अर्थात् अच्छी भूमि के साथ, समाप्त करता हूँ। जैसा कि तुम देखोगे, अच्छी भूमि चार में से केवल एक है। क्या हमारे सुननेवालों में से चार में से एक भी भली-भाँति तैयार हृदय के साथ वचन को ग्रहण करेगा?

भूमि को “अच्छी” कहा गया है; इसलिए नहीं कि वह स्वभाव से अच्छी थी, परन्तु इसलिए कि अनुग्रह ने उसे अच्छा बना दिया था। परमेश्वर ने उसे जोता था; उसने पाप के बोध के हल से उसे उलट-पुलट किया था, और वह मेड़ और कूँड़ में वैसे ही पड़ी थी जैसे उसे पड़ा रहना चाहिए। जब सुसमाचार का प्रचार हुआ, तो हृदय ने उसे ग्रहण किया, क्योंकि उस मनुष्य ने कहा, “यही तो वह आशीष है जो मुझे चाहिए। एक दीन पापी को दया ही की आवश्यकता है।” इस प्रकार सुसमाचार के प्रचार ने इस उथल-पुथल की हुई, जुती हुई भूमि को शान्ति दी। बीज नीचे गिरा और उसने अच्छी जड़ पकड़ ली। कुछ लोगों में उसने उत्कट प्रेम, हृदय की विशालता, और उद्देश्य का ऐसा समर्पण उत्पन्न किया जो उत्तम प्रकार का था, उस बीज के समान जो सौ गुणा फल लाता है। वह मनुष्य परमेश्वर का एक सामर्थी सेवक बन गया; उसने खर्च किया, वरन् आप भी खर्च हो गया। उसने मसीह की सेना की अगली पंक्तियों में अपना स्थान लिया, युद्ध के सबसे घमासान भाग में खड़ा रहा, और साहस के ऐसे काम किए जिन्हें थोड़े ही कर सकते थे—बीज ने सौ गुणा फल उत्पन्न किया। वह उसी प्रकार के एक और हृदय में गिरा; वह मनुष्य सबसे अधिक तो नहीं कर सकता था, फिर भी उसने बहुत कुछ किया। उसने अपने आप को परमेश्वर को सौंप दिया, और अपने व्यापार में उसके पास अपने प्रभु के पक्ष में कहने को कोई न कोई बात रहती थी; अपनी प्रतिदिन की चाल में वह चुपचाप अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर के उपदेश की शोभा बढ़ाता था—वह साठ गुणा फल लाया। फिर वह एक और पर गिरा, जिसकी योग्यताएँ और गुण थोड़े थे; वह तारा नहीं बन सकता था, परन्तु जुगनू बन सकता था; वह सबसे बड़ों के समान नहीं कर सकता था, परन्तु वह कुछ न कुछ करने से सन्तुष्ट था, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो।

बीज उसमें दस गुणा, कदाचित् बीस गुणा फल लाया था। यहाँ ऐसे कितने लोग हैं? क्या कोई है जो अपने मन में प्रार्थना करता है, “हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर”? बीज ठीक स्थान पर गिरा है। हे प्राणी, तेरी प्रार्थना सुनी जाएगी। परमेश्वर किसी मनुष्य के मन में दया की लालसा कभी नहीं जगाता जब तक कि वह उसे देने का इरादा न रखता हो। क्या कोई और फुसफुसाता है, “आह, काश मैं उद्धार पाऊँ”? प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर, तो तू, हाँ तू भी, उद्धार पाएगा। क्या तू सबसे बड़ा पापी रहा है? मसीह पर भरोसा रख, और तेरे बड़े-बड़े पाप ऐसे लुप्त हो जाएँगे जैसे चक्की का पाट बाढ़ के नीचे डूब जाता है। क्या यहाँ कोई भी ऐसा नहीं जो उद्धारकर्ता पर भरोसा करेगा? क्या यह सम्भव है कि आत्मा बिलकुल अनुपस्थित है? कि वह एक भी प्राण में कार्य नहीं कर रहा? एक भी आत्मा को जीवन नहीं दे रहा? हम प्रार्थना करेंगे कि वह अब उतरे, कि वचन व्यर्थ न जाए।

अध्याय 7 पूरा हुआ

बोनेवाले का दृष्टान्त

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