किसान से बातें
फल लाने के लिये मरनेवाला गेहूँ का दाना

अध्याय 4 · 17 मिनट का पठन

फल लाने के लिये मरनेवाला गेहूँ का दाना

“यीशु ने उनसे कहा, ‘वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो। मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, कि जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है। जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्त जीवन के लिये उसकी रक्षा करेगा।’” यूहन्ना 12:23-25 कुछ यूनानी यीशु को देखना चाहते थे। ये अन्यजाति के लोग थे, और यह उल्लेखनीय बात थी कि वे ठीक इसी समय हमारे प्रभु से भेंट करने आए। जब उन्होंने कहा, “हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं,” तो उनका अर्थ केवल उसे देख लेना न था, जैसे कोई सड़क पर किसी को देख लेता है। वे उसे इस अर्थ में “देखना” चाहते थे कि उससे मिलें, उससे बातचीत करें और उससे शिक्षा पाएँ। ये यूनानी उस बड़ी भीड़ के पहले लोग थे जो हर एक जाति, और भाषा, और लोगों में से एक दिन मसीह के पास आनेवाली थी। उद्धारकर्ता को उन्हें देखकर स्वाभाविक रूप से कुछ आनन्द हुआ, यद्यपि उसने इसके विषय में अधिक कुछ नहीं कहा, क्योंकि उसका मन अपने निकट आते बलिदान और उसके अर्थ पर लगा हुआ था। फिर भी उसने इन अन्यजातियों पर इतना ध्यान दिया कि उसके दास यूहन्ना ने उसके वचन जिस रीति से लिखे, उस पर इसका प्रभाव पड़ा।

यहाँ उद्धारकर्ता अपनी व्यापक मनुष्यता प्रगट करता है और अपने आपको “मनुष्य का पुत्र” कहता है। उसने पहले भी ऐसा किया था, परन्तु अब एक विशेष अभिप्राय से। वह कहता है, “वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो।” यहाँ वह “दाऊद के पुत्र” के रूप में नहीं, परन्तु “मनुष्य के पुत्र” के रूप में बोलता है।

इस घड़ी में यीशु सारी मनुष्यजाति के साथ अपने सम्बन्ध पर बल देता है। वह केवल अपनी यहूदी विरासत या यहूदियों के प्रति अपनी सेवकाई को ही सामने नहीं रखता। यद्यपि वह इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया था, तो भी मरनेवाले उद्धारकर्ता के रूप में वह अपने आपको पूर्ण मनुष्य के रूप में, हर एक व्यक्ति के सच्चे भाई के रूप में प्रस्तुत करता है—चाहे वह यहूदी हो या अन्यजाति। प्रभु यीशु में सारी मनुष्यता साकार है; उसमें सब लोग एक ही परिवार के रूप में जुड़ जाते हैं। काले और गोरे, धनी और निर्धन, बुद्धिमान और भोले, सबका मनुष्य-स्वभाव एक ही है। मनुष्य के पुत्र के रूप में यीशु हर जीवित मनुष्य से निकट सम्बन्ध रखता है।

इन यूनानियों के आने पर हमारा प्रभु अपनी महिमा के विषय में बोलने लगता है। “वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो।” वह अभी अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने का उल्लेख नहीं करता, यद्यपि वह निकट है, परन्तु इन पहले अन्यजाति विश्वासियों को देखकर वह उस महिमा पर विचार करता है जो उसके बलिदान से उत्पन्न होगी। स्मरण रखो, मसीह उन प्राणों में महिमा पाता है जिनका वह उद्धार करता है। जैसे वैद्य चंगा करने से आदर पाता है, वैसे ही प्राणों का वैद्य उनके द्वारा महिमा पाता है जिन्हें वह छुड़ाता है। जब यूनानियों ने कहा, “श्रीमान हम यीशु से भेंट करना चाहते हैं,” तो यह एक सीधी-सादी इच्छा थी, मानो कोई हरा अंकुर फूटा हो, फिर भी यीशु उसमें कटनी के पहले चिह्न के रूप में आनन्दित हुआ, और उसने उसमें अपने क्रूस की महिमा की आरम्भिक प्रतिज्ञा देखी।

इन यूनानियों की उपस्थिति भूमि में गाड़े गए गेहूँ के दाने के रूपक को भी समझाती है। गेहूँ का यूनानी संस्कृति से कुछ सम्बन्ध अवश्य था, परन्तु मुख्य बात यह नहीं है। इससे कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उद्धारकर्ता वह प्रक्रिया आरम्भ कर रहा था जो उसके मानव जीवन को घेरे हुए यहूदी “छिलके” को तोड़कर बाहर निकलनेवाली थी।

इससे पहले यीशु ने कहा था कि उसकी सेवकाई इस्राएल तक सीमित है, और उसने सुरूफिनीकी स्त्री को भी यह सीमा स्मरण कराई थी। जब उसने सत्तर चेलों को भेजा, तो उनसे कहा कि सामरियों के किसी नगर में प्रवेश न करना, परन्तु इस्राएल ही पर ध्यान लगाना।

परन्तु अब गेहूँ का दाना—मनुष्य का पुत्र—फूटकर बाहर आ रहा है। मृत्यु में “बोए” जाने से पहले ही वह अपनी जीवन देनेवाली सामर्थ्य प्रगट करता है। परमेश्वर का मसीह, यद्यपि दाऊद का पुत्र है, तो भी पिता की ओर से न केवल यहूदी है और न केवल अन्यजाति, परन्तु पूर्ण मनुष्य है, जो सब लोगों के प्रति सहानुभूति रखता है। जिन्हें उसने चुना है, उन सबको वह अपने भाई मानता है, चाहे वे स्त्री हों या पुरुष, किसी भी जाति के हों, या किसी भी युग में जीते हों। इन यूनानियों को देखकर सच्चा मसीह अपने आपको खुलकर ऐसा प्रगट करता है जैसा उसने पहले नहीं किया था। यही गेहूँ के दाने के रूपक का अर्थ है।

इस खण्ड में हमें दो मुख्य शिक्षाएँ दिखाई देती हैं: सैद्धान्तिक शिक्षा और व्यावहारिक नैतिक सिद्धान्त। सैद्धान्तिक शिक्षा यीशु अपने चेलों के सामने कई गहरे विरोधाभास रखता है।

पहला, यद्यपि वह पहले से ही महिमामय था, तो भी उसकी महिमा होनी अभी बाकी थी। “वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो।” यीशु सदा महिमामय था। उसका मानव जीवन परमेश्वरत्व से जुड़ा हुआ था। पृथ्वी पर उसकी नैतिक सिद्धता भी उसकी महिमा को प्रतिबिम्बित करती थी। परन्तु जिस उद्देश्य से वह आया था—मनुष्यजाति का उद्धारकर्ता होने के लिये—उसने उसके आदर को और भी बढ़ा दिया। आज्ञाकारिता से भरा उसका जीवन, परीक्षा का सामना करना, और विश्वासयोग्यता से परमेश्वर की सेवा करना, यह सब अपने आप में महिमामय था।

प्रेरित यूहन्ना लिखता है: “वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा” (यूहन्ना 1:14)। यह केवल रूपान्तर की ओर ही नहीं, परन्तु मनुष्यों के बीच उसके साधारण जीवन की ओर भी संकेत करता है। आत्मिक मनवाले लोगों ने यीशु के प्रतिदिन के जीवन में उसके अनुग्रह और सच्चाई की महिमा को पहचाना।

फिर भी यीशु की पूरी महिमा होनी अभी बाकी थी। उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण के द्वारा और भी आदर आनेवाला था। यद्यपि वह पहले से ही महिमामय था, तो भी मनुष्य के पुत्र की परम महिमा उसकी आज्ञाकारिता और बलिदान से बँधी हुई थी।

दूसरा विरोधाभास यह है कि उसकी महिमा लज्जा के द्वारा आनेवाली थी। वह कहता है, “वह समय आ गया है, कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो,” फिर भी वह अपनी मृत्यु की बात करता है। उसकी महिमा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है उसका अपने आपको शून्य कर देना, उसका यहाँ तक आज्ञाकारी रहना कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली। उसका सबसे ऊँचा आदर उसकी दीनता और उसके दुःख से आता है। उसके गालों पर थूका गया, पीड़ा से उसकी आँखें धुँधली हो गईं, कीलों से उसके हाथ छेदे गए। परमेश्वर के पुत्र के रूप में महिमा उसमें स्वभाव से थी; मनुष्य के पुत्र के रूप में उसकी महिमा क्रूस से और उन दुःखों से आती है जो उसने हमारे पापों के लिये सहे।

हमें क्रूस पर चढ़ाए गए उद्धारकर्ता को आनेवाले राजा से कभी अलग नहीं करना चाहिए। प्रायश्चित्त उसके आदर का केन्द्र है। जब लोग कहते हैं, “वह क्रूस पर से उतर आए, तो हम उस पर विश्वास करें,” तो वे यह नहीं समझते कि क्रूस ही के द्वारा यीशु सिंहासन पर चढ़ता है। आज मनुष्य का पुत्र इसलिए महिमा पाता है कि वह मरा और उसने अपने लहू के द्वारा हमें छुड़ाया।

एक और विरोधाभास यह है कि यीशु को अकेला होना ही था—नहीं तो वह अकेला ही रह जाता। “जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है।” मनुष्य के पुत्र को मरना और कब्र का अकेलापन सहना था, नहीं तो वह अकेला रह जाता। यदि वह गतसमनी के अकेलेपन में और क्रूस के दुःख में न उतरता, और यह पुकारकर न कहता, “हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?” (मत्ती 27:46), तो वह हमारा उद्धार नहीं कर सकता था।

यद्यपि वह पिता या आत्मा से कभी रहित न था, तो भी उसके दुःख में कोई मनुष्य उसका साथी न था। मनुष्य का पुत्र किसी दूसरे मनुष्य पर भरोसा नहीं कर सकता था।

देह के बिना सिर अधूरा है, और अपने लोगों के बिना यीशु भेड़ों के बिना चरवाहा होता। कलीसिया उसकी देह है, और उसी की परिपूर्णता है, जो सब में सब कुछ पूर्ण करता है।

वह पत्नी के बिना पति होता, परन्तु वह अपनी दुल्हिन से इतना गहरा प्रेम करता है कि इसी कारण उसने अपने पिता को छोड़ दिया और जिसे उसने चुना था, उसके साथ एक ही तन हो गया। वह उससे मिला रहा और उसके लिये मरा; यदि वह ऐसा न करता, तो वह दुल्हिन के बिना दूल्हा होता। ऐसा कभी हो ही नहीं सकता था। उसका हृदय ऐसे स्वार्थी सुख का आनन्द लेने के योग्य ही नहीं जिसमें कोई और सहभागी न हो।

यदि तुमने श्रेष्ठगीत पढ़ा है, जहाँ दूल्हे का हृदय प्रगट किया गया है, तो तुमने देखा होगा कि वह अपनी प्रिय, अपनी कबूतरी, अपनी निर्मल की संगति चाहता है। उसका सुख मनुष्यों की संगति से होता है। खम्भे की चोटी पर बैठा शिमोन स्टाइलाइट्स यीशु मसीह नहीं है; गुफा में रहनेवाला संन्यासी भले ही अच्छी नीयत रखता हो, परन्तु जिसके क्रूस का आदर करने का वह दावा करता है, उसमें उसे अपने एकान्तवास का कोई उदाहरण नहीं मिलता। यीशु मनुष्यजाति का मित्र था; वह लोगों से कतराता नहीं था, परन्तु खोए हुओं को ढूँढ़ने आया था। जैसा लिखा है: “यह तो पापियों से मिलता है और उनके साथ खाता भी है” (लूका 15:2)।

वह सब लोगों को अपनी ओर खींचता है, और इसी कारण वह पृथ्वी पर से ऊँचे पर चढ़ाया गया। फिर भी यदि यह महान और आकर्षक मनुष्य गतसमनी में अकेला न होता, पिलातुस के सामने अकेला न होता, सिपाहियों के ठट्ठों के बीच अकेला न होता, और क्रूस पर अकेला न होता, तो उसे स्वर्ग में अकेला ही रहना पड़ता। यदि गेहूँ का यह बहुमूल्य दाना मृत्यु के अकेलेपन में न उतरता, तो वह अकेला ही रह जाता। परन्तु क्योंकि वह मर गया, इसलिए वह “बहुत फल लाता है।”

यह हमें चौथे विरोधाभास तक ले आता है: जीवन देने के लिये मसीह को मरना ही था। “जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना 12:24)। दूसरों को जीवन देने के लिये यीशु को मरना ही था। बहुत से लोग मृत्यु को ठीक से नहीं समझते; वे मृत्यु को अस्तित्व के मिट जाने से, और जीवन को केवल अस्तित्व से जोड़ बैठते हैं। “जो प्राणी पाप करे वही मर जाएगा” (यहेजकेल 18:4): उसका अस्तित्व मिट नहीं जाता, परन्तु वह परमेश्वर से, जो उसका सच्चा जीवन है, अलग होकर मर जाता है। बहुत से लोग जीते तो हैं, परन्तु उनमें सच्चा जीवन नहीं है, और वे उसे देखेंगे भी नहीं, क्योंकि “परमेश्वर का क्रोध उन पर रहता है” (यूहन्ना 3:36)।

गेहूँ का दाना जब भूमि में बोया जाता है, तो मर जाता है—क्या उसका अस्तित्व मिट जाता है? कदापि नहीं। मृत्यु का अर्थ है जीवन रखनेवाली वस्तु का अपने मूल तत्वों में बिखर जाना। हमारे लिये यह देह और प्राण का अलग होना है; दाने के लिये यह उन अंशों का टूट जाना है जिनसे बीज बना है। जब हमारा ईश्वरीय प्रभु भूमि में रखा गया, तो उसकी देह सड़ने न पाई, परन्तु कुछ समय के लिये उसका प्राण उसकी देह से अलग हुआ; इस प्रकार वह सचमुच मरा। यदि वह सचमुच न मरता, तो वह हम में से किसी को भी जीवन न दे सकता था।

प्रियो, यह मसीही विश्वास का हृदय प्रगट करता है: उसकी शिक्षा में मसीह की मृत्यु ही सारे जीवन का स्रोत है।

यदि केवल उसका प्रचार या केवल उसका आदर्श पर्याप्त होता, तो वह मनुष्यों के बीच शिक्षा देकर और जीवन बिताकर चेले उत्पन्न कर सकता था। फिर भी वह घोषणा करता है कि जब तक वह मर न जाए, वह फल नहीं लाएगा। कोई तर्क दे सकता है कि उसकी मृत्यु उसके आदर्श को पूरा करती है और उसकी शिक्षा पर मुहर लगाती है; यह सच है, परन्तु यदि वह जीवित ही रहता, और जैसे आश्चर्यकर्म करता और शिक्षा देता था वैसे ही करता रहता, तो भी उससे मनुष्यजाति में आत्मिक जीवन उत्पन्न न होता।

प्रायश्चित्त के बिना कोई भी आत्मिक जीवन तक नहीं पहुँच सकता। यीशु मसीह के उस बहुमूल्य लहू को छोड़ परमेश्वर को जानने का कोई मार्ग नहीं, जिसके द्वारा हमारी पिता के पास पहुँच होती है। यदि मसीही विश्वास की नैतिक शिक्षाएँ उसके सिद्धान्तों से अधिक महत्त्वपूर्ण होतीं, तो यीशु मरा ही क्यों? पवित्रता का एक लम्बा जीवन नैतिकता तो सिखा सकता था, परन्तु उससे एक भी प्राण का उद्धार न होता। केवल मृत्यु के द्वारा ही वह आत्मिक जीवन उत्पन्न कर सकता था। न जीवित रहकर, न शिक्षा देकर, न आश्चर्यकर्मों के द्वारा—परन्तु केवल मरकर और मरे हुओं में से जी उठकर ही वह दूसरों को जीवन दे सकता था।

संसार में सारा आत्मिक जीवन मसीह की मृत्यु से आता है। पुराना नियम इस सत्य की छायाएँ दिखाता है। सृष्टि के समय जीवन पहली बार संसार में आया, परन्तु पतन में खो गया। बाद में नूह के द्वारा जीवन फिर से एक प्रतीकात्मक मृत्यु, गाड़े जाने और जी उठने के द्वारा आया: नूह जहाज में गया, भीतर बन्द हो गया, और जब जल घट गया तो एक नये संसार में निकल आया। इसी प्रकार आज हम मसीह के साथ मरे हुए हैं, मसीह के साथ गाड़े गए हैं, और उसके साथ जी भी उठे हैं। मसीह के साथ मृत्यु, गाड़े जाने और जी उठने के द्वारा आनेवाले जीवन को छोड़ कोई सच्चा आत्मिक जीवन नहीं है।

क्या तुम इसे अनुभव से जानते हो? यदि नहीं, तो तुम सिद्धान्त तो जानते हो, परन्तु अपनी आत्मा के भीतर परमेश्वर की सामर्थ्य को नहीं जानते। जब कभी प्रायश्चित्त की शिक्षा पर आक्रमण हो, हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए। हम मसीह के जीवन को बहुमूल्य समझते हैं, परन्तु केवल उसका आदर्श उद्धार नहीं करता—हमारे लिये उसकी मृत्यु उद्धार करती है। यदि मसीह उन्नीस सौ वर्ष और जीवित रहता, और वैसे ही शिक्षा देता और जीवन बिताता, तो भी उससे मनुष्यजाति में आत्मिक जीवन की एक चिंगारी भी उत्पन्न न होती। बिना मरे वह कोई फल नहीं लाता। यदि तुम जीवन चाहते हो, तो तुम्हें विश्वास करना होगा कि यीशु तुम्हारे लिये मरा। तुम्हें समझना होगा कि यीशु मसीह का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है (1 यूहन्ना 1:7)। जब तुम यह समझ लोगे कि गेहूँ का दाना मरने के लिये भूमि में डाला जाता है, तभी तुम अपने प्राण में फल ला सकोगे और दूसरों के जीवन में फल देख सकोगे।

एक और शिक्षा: क्योंकि यीशु सचमुच भूमि में पड़कर मर गया, इसलिए हम बड़े परिणामों की आशा रख सकते हैं। “जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना 12:24)। कुछ लोग सोचते हैं कि मसीह के उद्धार देनेवाले लाभ थोड़े ही लोगों को मिलते हैं, मानो केवल एक छोटा, चुना हुआ समूह ही परमेश्वर की महिमा करेगा।

परन्तु हम अभी अपने प्रभु यीशु के पूरे फल को नहीं जान सकते। ऐसा दिन आ सकता है जब लाखों लोग एक स्वर से परमेश्वर की आराधना करेंगे, जब पृथ्वी यहोवा की महिमा के ज्ञान से ऐसी भर जाएगी जैसे समुद्र जल से भर जाता है।

हाँ, सुसमाचार-प्रचार का काम धीरे-धीरे आगे बढ़ सकता है, परन्तु बीज बोया जा चुका है, और गेहूँ का वह दाना जो भूमि में पड़कर मर गया, बहुत फल लाएगा। जब हम मसीह के बलिदान पर, और उस असीम प्रेम पर जो उसने दिखाया, विचार करते हैं, तो हमें विश्वास करना चाहिए कि उसके प्राणों का दुःख थोड़ा-सा फल उत्पन्न नहीं करेगा। परिणाम बलिदान की महानता के अनुरूप होगा। यहोवा सदा सर्वदा राज्य करता रहेगा! हालेलूय्याह! जैसे क्रूस की कराहों ने स्वर्गदूतों को चकित किया, वैसे ही क्रूस के परिणाम स्वर्ग की सेनाओं को विस्मित कर देंगे।

यीशु से अभी बड़ी-बड़ी बातें होनी बाकी हैं। हे थके हुए लोगो, ढाढ़स बाँधो। दृढ़ रहो, आशा के साथ काम करो, आनन्द के साथ दुःख सहो, क्योंकि राज्य यहोवा ही का है, और सब जातियों पर वही प्रभुता करता है।

अन्त में, कुछ व्यावहारिक शिक्षाएँ: जो बात मसीह के विषय में सच है, वह कुछ मात्रा में परमेश्वर की हर एक सन्तान के विषय में भी सच है।

“जब तक गेहूँ का दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना 12:24)। यह हम पर भी लागू होता है, जैसा अगला पद दिखाता है: “जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्त जीवन के लिये उसकी रक्षा करेगा” (यूहन्ना 12:25)।

पहला, यदि हमें जीना है, तो हमें मरना होगा। मरकर उसमें प्रवेश करने के सिवा कोई आत्मिक जीवन नहीं है। तुम्हारी अपनी धार्मिकता का भरोसा मरना होगा। अपने आप पर तुम्हारे हर भरोसे को मरना होगा। परमेश्वर का आत्मा तुम्हें जिलाने से पहले पुराने स्वभाव को घात करे, यह आवश्यक है। “घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा” (यशायाह 40:8)। उस जीवन का आनन्द लेने से पहले, जो आत्मा देता है, तुम्हें उसकी छँटाई और काट-छाँट का अनुभव करना होगा।

आगे, जो कुछ है उसे बचाए रखने के लिये हमें सब कुछ समर्पित करना होगा। “जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है।” सब कुछ परमेश्वर को सौंपे बिना तुम्हें न आत्मिक जीवन मिल सकता है, न आशा, न आनन्द, न शान्ति, न स्वर्ग। जब तुम अपना कुछ भी न रखने को तैयार होगे, तभी मसीह में सब कुछ पाओगे। घमण्ड, विद्रोह और हठ को उतारकर रख देना होगा। यदि तुम सब कुछ समर्पित नहीं करते, तो तुम उसे पहले ही खो चुके हो। पूर्ण समर्पण ही उसे बचाए रखने का एकमात्र मार्ग है। परमेश्वर के बहुत से लोगों ने यह बात दुःखदायी अनुभव से सीखी है।

आगे, अपने आपको पाने के लिये हमें अपने आपको खोना होगा। “जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है; वह अनन्त जीवन के लिये उसकी रक्षा करेगा।” अपने लिये जीना छोड़ दो, तो तुम सचमुच जीओगे। जो व्यक्ति अपने ही लिये जीता है, वह जीवन का सार, उसका आनन्द और उसका मुकुट खो देता है। परन्तु यदि तुम परमेश्वर और दूसरों के लिये जीते हो, तो तुम सच्चा जीवन पाते हो।

“पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी” (मत्ती 6:33)। दूसरों की सेवा में अपने आपको खो देने से बड़ा कोई आनन्द नहीं।

अन्त में, यदि तुम दूसरों तक जीवन पहुँचाना चाहते हो, तो तुम्हें किसी न किसी मात्रा में अपने प्रति मरना होगा। शायद अक्षरशः नहीं, परन्तु तुम्हें तैयार रहना होगा। इतिहास यही दिखाता है: सुसमाचार सबसे अधिक उन पुरुषों और स्त्रियों के द्वारा फैला जिन्होंने उसके लिये दुःख उठाया और प्राण दिए—लोलार्ड, एनाबैप्टिस्ट, और हर श्रेणी के शहीद। उन्होंने अपने प्राण दे दिए, और उनकी मृत्यु ने अनगिनत दूसरों के लिये जीवन उत्पन्न किया। आत्म-बलिदान ईश्वरीय बढ़ती का नियम है। मृत्यु बढ़ती से पहले आती है। दूसरों का उद्धारकर्ता अपने आपको नहीं बचा सकता। और हे प्रिय मित्र, तुम यह न कहना, “मैं अब और शिक्षा नहीं दे सकता, मैं बहुत थक गया हूँ।” तुम जानते हो कि थक जाना क्या होता है, परन्तु अपने प्रभु पर ध्यान करो। वह थकावट को जानता था, फिर भी वह भलाई करते-करते कभी नहीं थका। क्या तुम गेहूँ के उस दाने के समान बने रहोगे जो निष्फल और भुला दिया गया है, या फल लाओगे? क्या तुम परमेश्वर को तुम्हें वहाँ रखने दोगे जहाँ तुम बढ़ सको—रविवार की पाठशाला, पर्चे बाँटना, सड़कों पर सेवकाई? चाहे इसकी कीमत सब कुछ हो, तो भी स्मरण रखो: “जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना 12:24)।

आओ, हम पवित्र समर्पण के एक ऊँचे स्तर तक उठें, छिपे रहकर, अपने प्रति मरते हुए, फिर भी अपने प्रभु की महिमा के लिये भरपूर फल लाते हुए। मैंने इस पाठ पर केवल एक दृष्टि डाली है; किसी और समय हम इसमें और भी गहरे उतर सकते हैं।

अध्याय 4 पूरा हुआ

फल लाने के लिये मरनेवाला गेहूँ का दाना

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