किसान से बातें
पाला और पिघलन

अध्याय 3 · 27 मिनट का पठन

पाला और पिघलन

“वह ऊन के समान हिम को गिराता है, और राख के समान पाला बिखेरता है। वह बर्फ के टुकड़े गिराता है, उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है? वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है; वह वायु बहाता है, तब जल बहने लगता है।” — भजन संहिता 147:16-18 एक सुबह अपनी खिड़की से बाहर देखते हुए हमने देखा कि पृथ्वी ने श्वेत ओढ़नी ओढ़ ली है; क्योंकि केवल थोड़े ही घंटों में भूमि पर काफी गहराई तक हिम बिछ गया था। कुछ घंटों बाद हमने फिर बाहर देखा, तो खेत पहले के समान हरे दिखाई दिए, और जुती हुई भूमि ऐसी नंगी पड़ी थी मानो उस पर हिम का एक भी फाहा न गिरा हो।

भारी हिमपात के तुरन्त बाद हिम का शीघ्र पिघल जाना कोई असाधारण बात नहीं है। ये रोचक परिवर्तन परमेश्वर ही के द्वारा होते हैं, और उनमें केवल बाहरी संसार के लिये ही उसका कोई उद्देश्य नहीं होता, वरन् आत्मिक जगत के लिये भी कोई अभिप्राय होता है। परमेश्वर सदा शिक्षक है। जो कुछ वह करता है, उस हर एक काम के द्वारा वह अपनी सन्तानों को सिखाता है और उनके लिये गहरे भेदों में प्रवेश का मार्ग खोलता है।

धन्य हैं वे, जो प्रभु के हाथों के कामों में अपनी बुद्धि के लिये ही नहीं, वरन् अपनी स्वर्ग से जन्मी आत्मा के लिये भी भोजन पाते हैं।

मैं पहले तो तुम्हारा ध्यान प्रकृति के उन कार्यों की ओर दिलाऊँगा जिनका वर्णन पाठ में है; और दूसरे, अनुग्रह के उन कार्यों की ओर जिनके वे सबसे उपयुक्त प्रतीक हैं।

I. पहले, प्रकृति के कार्यों पर विचार करो यदि हम पाले और पिघलन में परमेश्वर के हाथ की ओर तुम्हारा ध्यान दिलाएँ, तो हम इन कुछ मिनटों को व्यर्थ गया हुआ नहीं समझेंगे, चाहे केवल प्राकृतिक आधार पर ही क्यों न हो।

1. प्रभु के काम की प्रत्यक्षता पर ध्यान दो प्रभु के काम की प्रत्यक्षता पर ध्यान दो। इन शब्दों को पढ़ते हुए मुझे यह देखकर आनन्द होता है कि हमारा परमेश्वर संसार में कैसा उपस्थित है।

यह नहीं लिखा है कि “प्रकृति के नियम हिम उत्पन्न करते हैं,” वरन् यह कि “वह ऊन के समान हिम को गिराता है,” मानो हिम का हर एक फाहा सीधे उसकी हथेली से निकलकर आता हो।

हमें यह नहीं बताया गया कि कुछ प्राकृतिक प्रक्रियाएँ नमी को पाले का रूप देती हैं; नहीं — वरन् जैसे मूसा ने भट्ठी में से राख लेकर मिस्र के ऊपर उड़ा दी थी, वैसे ही प्रभु के विषय में कहा गया है कि वह “राख के समान पाला बिखेरता है।” यह नहीं कहा गया कि सनातन परमेश्वर ने संसार को चला दिया और अब बर्फ केवल किसी यन्त्र की क्रिया से बनती रहती है। नहीं, कदापि नहीं — ओलों में गिरनेवाला बर्फ का हर एक टुकड़ा परमेश्वर की ओर से है; “वह बर्फ के टुकड़े गिराता है।” जैसे गोफन चलानेवाला अपनी गोफन से एक-एक पत्थर सधे हुए हाथ से छोड़ता है, वैसे ही हर एक ओले का मार्ग ईश्वरीय सामर्थ्य के द्वारा ठहराया जाता है।

ध्यान दो, बर्फ के टुकड़ों को गिरानेवाला वही है — वे उसी के हैं; और अगले ही वाक्य में हम उसकी ठण्ड के विषय में पढ़ते हैं। ये शब्द प्रकृति को अद्भुत रीति से प्रतापी बना देते हैं। जब हम हर एक ओले को परमेश्वर का ओला, और बर्फ के हर एक टुकड़े को उसकी बर्फ समझकर देखते हैं, तब जल के वे हीरे कितने बहुमूल्य हो जाते हैं। जब ठण्ड हमारे अंगों को काटती है और हर एक वस्त्र को भेदकर भीतर घुस जाती है, तब यह स्मरण करके हमें शान्ति मिलती है कि यह उसी की ठण्ड है।

जब पिघलन आती है, तो देखो पाठ उसके विषय में कैसे बोलता है: “वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है।” वह इसे प्रकृति की कुछ शक्तियों के भरोसे नहीं छोड़ता, वरन् एक राजा के समान — “वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है; वह वायु बहाता है।” हर एक वायु पर उसका विशेष स्वामित्व है; चाहे वह जमाने के लिये उत्तर से आए, चाहे पिघलाने के लिये दक्षिण से, वह उसी की वायु है।

देखो, परमेश्वर के मन्दिर में सब कुछ कैसे उसकी महिमा का बखान करता है। दृश्य जगत के हर एक दृश्य में प्रभु को देखना सीखो, क्योंकि सचमुच सब कुछ वही करता है। ईश्वरीय कार्यों की प्रत्यक्षता का यह विचार परमेश्वर के प्रबन्ध में भी ले जाना चाहिए। यदि तुम अपनी हानियों और कठिनाइयों में परमेश्वर का हाथ देख सको, तो इससे तुम्हें बड़ी शान्ति मिलेगी; निश्चय तुम अपने परमेश्वर के प्रत्यक्ष काम के विरुद्ध कुड़कुड़ाओगे नहीं।

यह प्रतिदिन की दया में असाधारण मिठास भर देगा, और जीवन की सुख-सुविधाओं को और भी सुखदायक बना देगा, क्योंकि वे एक पिता के हाथ से आती हैं। यदि तुम्हारी मेज़ पर थोड़ा ही भोजन हो, तो भी जब तुम जानोगे कि तुम्हारे पिता ने बुद्धि और प्रेम से उसे तुम्हारे लिये सजाया है, तब वह तुम्हारे सन्तुष्ट मन के लिये पर्याप्त होगा।

यही तुम्हारी रोटी और तुम्हारे पानी पर आशीष ले आएगा। यही बिना साज-सामान के कमरे की नंगी दीवारों को राजमहल के समान वैभवशाली बना देगा, और कठोर बिछौने को रूई के गद्दे में बदल देगा — यह सब मेरा पिता करता है। जब दूसरे लोगों को मृत्यु के अन्धेरे हाथ के सिवा, जो हमारे सबसे प्रियजनों पर प्रहार करता है, और कुछ दिखाई नहीं देता, तब भी हम उसकी प्रेम भरी मुस्कान देखते हैं। जब रोग हमारे पशुओं को खेत में मारकर गिरा देता है, तब भी हम पिता का हाथ देखते हैं। जब हम स्वयं रोग की खाट पर पड़े होते हैं, तब भी हम परमेश्वर को दया के काम में लगा हुआ देखते हैं।

यह सदा हमारे पिता ही का काम और करनी है। आओ, हम इससे आगे न बढ़ें। वरन् इस सत्य की अपनी समझ को बढ़ाएँ, और स्मरण रखें कि यह बड़ी बातों के समान छोटी बातों पर भी लागू होता है।

एक सच्चे कवि की ये पंक्तियाँ तुम्हारे मन को छू लें: “यदि देश में महामारी फैलती है, तो तुम कहते हो कि यह प्रभु ही ने किया है — तो क्या जब एक छोटा सा कीड़ा गुलाब की कली पर रेंगता है, तब उसने नहीं किया? यदि आल्प्स पर्वत से हिम का पहाड़ टूटकर गिरता है, तो तुम परमेश्वर के प्रबन्ध की इच्छा के आगे काँप उठते हो — तो क्या जब पोपलर के पेड़ से सूखे पत्ते झड़ते हैं, तब उसी इच्छा का उतना ही सम्बन्ध नहीं?”

तुम्हारे हृदय हर एक बात पर यह गीत गाएँ: यहोवा शाम्मा — यहोवा वहाँ है।

2. ईश्वरीय कार्य की सहजता पर ध्यान दो इसके बाद मैं तुमसे विनती करता हूँ कि धन्यवाद के साथ ईश्वरीय कार्य की सहजता पर ध्यान दो। ये पद ऐसे पढ़े जाते हैं मानो पाला और हिम बनाना संसार भर में सबसे सरल बात हो। कोई मनुष्य ऊन के बोरे में हाथ डालकर मुट्ठी भर ऊन बाहर उछाल देता है — परमेश्वर उतनी ही सहजता से हिम देता है: “वह ऊन के समान हिम को गिराता है।” कोई मनुष्य मुट्ठी भर राख लेकर हवा में उछाल देता है, और वह चारों ओर बिखरकर गिरती है — “राख के समान पाला बिखेरता है।” तुषार और हिम प्रकृति के अचम्भे हैं। जिन्होंने बर्फ के कणों की असाधारण सुन्दरता को ध्यान से देखा है, वे मुग्ध हो गए हैं, और फिर भी प्रभु उन्हें सहज ही बना देता है। “वह बर्फ के टुकड़े गिराता है” — उतनी ही सहजता से, जितनी सहजता से हम जाड़े के दिनों में रॉबिन चिड़ियों के लिये खिड़की के बाहर रोटी के टुकड़े डाल देते हैं।

जब नदियाँ जमकर ठोस हो जाती हैं और पृथ्वी लोहे की जंजीरों में जकड़ी रहती है, तब यह सब पिघलता कैसे है? अनगिनत आगें सुलगाकर नहीं, न पृथ्वी के भीतर बिजली के झटके भेजकर। नहीं — “वह आज्ञा देकर उन्हें गलाता है; वह वायु बहाता है, तब जल बहने लगता है।”

सारा काम एक वचन और एक श्वास से पूरा हो जाता है। यदि तुम्हें और मुझे कोई बड़ा काम करना होता, तो कितना हाँफना और जोर लगाना पड़ता। बड़े-बड़े अभियन्ता भी, जो यन्त्रों के द्वारा अचम्भे के काम करते हैं, उनके लिये बहुत शोर और हलचल मचाते हैं। सर्वशक्तिमान के साथ ऐसा नहीं है। हमारी पृथ्वी चौबीस घंटों में एक बार घूम जाती है, और फिर भी वह उतना शोर भी नहीं करती जितना एक बालक का लट्टू करता है।

अन्तरिक्ष में लुढ़कते वे विशाल लोक चुपचाप अपने-अपने मार्ग पर चलते हैं। यदि मैं किसी कारखाने में जाऊँ, तो कान फाड़नेवाली गड़गड़ाहट सुनता हूँ। यदि मैं पानी से चलनेवाली गाँव की चक्की के पास खड़ा होऊँ, तो वहाँ लगातार खड़खड़ाहट होती रहती है। परन्तु परमेश्वर के बड़े-बड़े पहिये बिना शोर और बिना रगड़ के घूमते हैं। ईश्वरीय यन्त्र सहजता से चलता है। यह सहजता प्रकृति के समान परमेश्वर के प्रबन्ध में भी दिखाई देती है। तुम्हारा स्वर्गीय पिता तुम्हें छुड़ाने में उतना ही समर्थ है जितना हिम को पिघलाने में, और यदि तुम उस पर भरोसा रखो, तो वह तुम्हें उतनी ही सरल रीति से छुड़ाएगा। जितनी सहजता से वह प्रकृति में काम करता है, उतनी ही सहजता से वह अपनी मुट्ठी खोलकर, सब प्राणियों को आहार से तृप्त करता है। परमेश्वर के काम की सहजता पर ध्यान दो — वह केवल अपनी मुट्ठी खोलता है।

3. ईश्वरीय कार्यों की विविधता पर ध्यान दो इसके आगे, प्रकृति में ईश्वरीय कार्यों की विविधता पर ध्यान दो। जब प्रभु पाले को अपना औज़ार बनाकर काम करता है, तब वह हिम रचता है — एक अद्भुत रचना, जिसका हर एक कण कारीगरी का एक अचम्भा है।

परन्तु वह केवल हिम से सन्तुष्ट नहीं होता। उसी जल से वह सुन्दरता का एक और रूप बनाता है जिसे हम पाला कहते हैं, और एक तीसरा चमकीला पदार्थ भी — झिलमिलाती बर्फ — और यह सब ठण्ड के एक ही साधन के द्वारा। जमे हुए जल के इन कई रूपों में अभ्यस्त आँख कैसी अद्भुत विविधता पहचान सकती है।

जो परमेश्वर ठण्ड से बाढ़ के जल को ठोस बना देता है, वही शीघ्र ही उसे गर्मी से पिघला देता है। परन्तु पिघलन में भी एकरसता नहीं है। कभी तो धाराएँ अपने बन्दीगृह से ऐसे वेग से छूटती हैं कि नदियाँ उमड़ पड़ती हैं और मैदान पर बाढ़ छा जाती है। कभी धीरे-धीरे, छोटी-छोटी धारों में, बूँदें अपनी स्वतंत्रता फिर पा लेती हैं। यही विविधता प्रकृति के हर एक विभाग में दिखाई देती है।

ऐसे ही परमेश्वर के प्रबन्ध में भी, प्रभु के पास अपने लोगों को परखने के लिये पाले जैसी परीक्षाओं के हजार रूप हैं, और उन्हें आनन्दित करने और शान्ति देने के लिये दया की दस हजार किरणें हैं। यदि वह चाहे, तो तुम्हें हिम की परीक्षा से, या पाले की परीक्षा से, या बर्फ की परीक्षा से दुःख दे सकता है। और फिर, एक ही क्षण में, वह अपने वचन से विपत्ति के बन्धनों को ढीला कर सकता है — और वह भी अनगिनत रीतियों से। मनुष्य तो अपने उद्देश्य पूरे करने के लिये गिने-चुने उपायों तक सीमित हैं, परन्तु परमेश्वर की समझ असीम है, और वह अपनी इच्छा के अनुसार ऐसे मार्गों से काम करता है जिनकी नश्वर मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता।

4. परमेश्वर के काम की शीघ्रता पर विचार करो मैं तुमसे यह भी कहूँगा कि प्रकृति में परमेश्वर के कामों की शीघ्रता पर विचार करो। क्षयर्ष के दिनों में यह एक अद्भुत बात समझी जाती थी कि चिट्ठियाँ वेग चलनेवाले पशुओं पर सवार हरकारों के हाथ भेजी जाती थीं। हमारे अपने देश में हमने सोचा कि हम अचम्भों के युग में पहुँच गए हैं, जब रेलगाड़ी के धुरे वेग के मारे तपने लगे; और अब तार के द्वारा तो ऐसा लगता है मानो हम अपने हाथ अनन्त तक फैला देते हैं। परन्तु परमेश्वर के कार्यों की तुलना में हमारा वेग है ही क्या?

पवित्रशास्त्र ठीक ही कहता है: “वह पृथ्वी पर अपनी आज्ञा का प्रचार करता है, उसका वचन अति वेग से दौड़ता है।” — भजन संहिता 147:15 वचन निकला, “हिम के भण्डार खोल दो,” और अनगिनत फाहे झुण्ड के झुण्ड उतर आए। फिर कहा गया, “उन्हें बन्द कर दो,” और फिर एक भी हिमकण दिखाई न दिया। तब स्वामी ने कहा, “दक्षिणी वायु बहे और हिम पिघल जाए,” और उसके वचन का शब्द सुनते ही वह लोप हो गया। हे विश्वासी, तुम नहीं बता सकते कि परमेश्वर कितनी जल्दी तुम्हारी सहायता को आ पहुँचे।

“वह करूब पर सवार होकर उड़ा, वरन् पवन के पंखों पर सवारी करके वेग से उड़ा।” — भजन संहिता 18:10 वह अपने प्रिय जनों को बचाने के लिये ऊपर से आएगा। वह आकाश को फाड़कर उतर आएगा। वह ऐसे वेग से उतरेगा कि स्वर्ग के परदों को हटाने के लिये भी न रुकेगा, वरन् अपनी उतावली में उन्हें फाड़ डालेगा, और पहाड़ों को पिघलाकर अपने चरणों पर बहा देगा, कि जो संकट की घड़ी में उसकी दुहाई देते हैं उन्हें छुड़ाए। वह सामर्थी परमेश्वर जो बर्फ को इतनी शीघ्रता से पिघला सकता है, वही उकाब के पंख धारण करके तुम्हारे छुटकारे के लिये फुर्ती से आ सकता है।

हे परमेश्वर, उठ, और अपनी सन्तानों की सहायता कर — और वह भी पौ फटते ही। 5. एक और विचार: परमेश्वर की भलाई पर विचार करो एक और विचार: प्रकृति और परमेश्वर के प्रबन्ध के सब कार्यों में परमेश्वर की भलाई पर विचार करो।

पहले उस भलाई के विषय में नकारात्मक रूप से सोचो। “उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?” कड़ाके के जाड़े में तुम कंगालों के विषय में सोचे बिना नहीं रह सकते — जब तुम गहरा हिम पड़ा हुआ देखते हो, तो केवल कठोर हृदय ही उन्हें भूल सकता है। परन्तु मान लो कि वह हिम लगातार गिरता ही रहे। उसे रोकनेवाला कौन है? जो परमेश्वर हमारे लिये एक दिन हिम भेजता है, वह चाहे तो पचास दिन तक भेज सकता है। क्यों नहीं? और जब पाला हमें इतनी कठोरता से जकड़ लेता है, तो वह महीने पर महीने क्यों न बना रहे? हम तो केवल उस भलाई का धन्यवाद कर सकते हैं जो “उसकी की हुई ठण्ड” को इतनी दूर तक नहीं भेजती कि हमारे प्राण मूर्छित हो जाएँ। उत्तरी ध्रुव की ओर यात्रा करनेवाले इस प्रश्न पर विचार करके काँप उठते हैं, “उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?”

क्योंकि जब परमेश्वर ठण्ड को खुला छोड़ देना चाहता है, तब उसमें एक प्रकार की कुचल डालनेवाली शक्ति होती है। आओ, हम परमेश्वर को उसकी उस रोकनेवाली दया के लिये धन्यवाद दें, जिसके द्वारा वह ठण्ड को वश में रखता है।

केवल नकारात्मक रूप से ही नहीं, वरन् सकारात्मक रूप से भी हिम में दया है। क्या यह एक अर्थपूर्ण उपमा नहीं है?

“वह ऊन के समान हिम को गिराता है।” कहा जाता है कि हिम पृथ्वी को गरम रखता है। वह उन छोटे-छोटे पौधों की रक्षा करता है जो अभी-अभी भूमि से झाँकने लगे हैं और जो नहीं तो पाले से मारे जाते। रूई के वस्त्र के समान हिम उन्हें कड़ी ठण्ड से बचाए रखता है। इसी लिये वॉट्स एक सौ सैंतालीसवें भजन के अपने पद्यानुवाद में गाता है: “ऊन सरीखे हिम के फाहे वह भेजा करता, और उगते अनाज की यों रक्षा करता।”

प्राचीन लोगों में यह धारणा थी कि हिम भूमि के हृदय को गरम करता और उसे उपजाऊ बनाता है, और इसलिए वे उसके लिये परमेश्वर की स्तुति करते थे। निश्चय पाले में बहुत दया है। यदि पाला महामारी को पुकारकर न कहता, “यहीं तक आ, और आगे न बढ़,” तो वह कहीं अधिक समय तक चलती रहती। यदि कड़ाके की रातें लाखों हानिकारक कीड़ों को नष्ट न करतीं, तो वे इतने बढ़ जाते कि पृथ्वी के बहुमूल्य फलों को चट कर जाते; पर इस प्रकार ये उपद्रवी कीड़े मिट जाते हैं। मनुष्य चाहे ठण्ड के कारण अपने आप को घाटे में समझे, परन्तु अन्त में वह परमेश्वर के प्रबन्ध के उस विधान से, जो जाड़े को ठहराता है, बड़े लाभ में रहता है। पुराने लेखकों में से एक का यह अनोखा कथन, कि “हिम ऊन है, और पाला आग है, और बर्फ रोटी है, और वर्षा पेय है,” सच है, यद्यपि वह एक विरोधाभास सा लगता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि पाला मिट्टी को भुरभुरा करके उपज को बढ़ाता है, और इस प्रकार बर्फ रोटी बन जाती है।

इस प्रकार वे ही साधन, जो कुछ समय के लिये मजदूरों से उनकी रोज़ी छीन लेते हैं, वे ही उपाय हैं जिनके द्वारा परमेश्वर हर एक प्राणी की आवश्यकता पूरी करता है। इसलिए हिम और पाले में भी परमेश्वर की भलाई को उतनी ही स्पष्टता से पहचानो जितनी उस पिघलन में जो जाड़े के काम को बहा ले जाती है। हे मसीही, विपत्ति के पाले में परमेश्वर की भलाई को स्मरण रखो। निश्चय जानो कि जब परमेश्वर क्लेश की काटनेवाली हवाएँ भेजना चाहता है, तब वह उनमें उपस्थित रहता है, और वह सदा प्रेम ही है — दुःख में भी उतना ही प्रेम, जितना तब जब वह तुम पर आनन्द की कोमल दक्षिणी वायु फूँकता है।

उसके हाथ के हर एक काम में परमेश्वर की करुणा को देखो। उसकी स्तुति करो — धूपकाल और सर्दी दोनों उसी ने ठहराए हैं — तुम्हारा गीत पूरे वर्ष भर गूँजता रहे। उसकी स्तुति करो — दिन वही देता है और रात वही भेजता है — हर घड़ी उसका धन्यवाद करो। अपना साहस न छोड़ो क्योंकि उसका प्रतिफल बड़ा है।

जैसे दाऊद ने हिम, और वर्षा, और आँधी को एक गीत में गूँथ दिया, वैसे ही तुम भी अपनी परीक्षाओं, अपने कष्टों, अपनी कठिनाइयों और विपत्तियों को स्तुति के एक मधुर भजन में गूँथ लो, और निरन्तर कहते रहो: “आओ, हर्षित मन से हम, प्रभु की स्तुति गाएँ, क्योंकि वह दयालु है।”

प्रकृति के कार्यों के विषय में इतना ही। यह एक बहुत ही लुभानेवाला विषय है, परन्तु दूसरे खेत मुझे बुला रहे हैं। II. अनुग्रह के कार्य अब मैं तुमसे बड़ी गम्भीरता और आग्रह के साथ अनुग्रह के उन कार्यों के विषय में बात करना चाहता हूँ जिनके बाहरी प्रतीक पाला और पिघलन हैं। परमेश्वर के अपने लोगों के लिये एक ऐसा समय आता है जब वह व्यवस्था के पाले के द्वारा उनसे व्यवहार करने आता है। प्राण के लिये व्यवस्था चीरती हुई उत्तरी वायु के समान है। विश्वास उसमें प्रेम देख सकता है, परन्तु स्वाभाविक आँख नहीं देख सकती। वह एक ठण्डा, भयानक, शान्तिहीन झोंका है। परमेश्वर की व्यवस्था की पूरी मार के सामने खुला रहना अनन्त विनाश के पाले से मारा जाना होगा। उसे थोड़े समय के लिये अनुभव करना भी मनुष्य के सारे अस्तित्व को ठिठुरा देगा और उसके पूरे व्यक्तित्व को भय से अकड़ा देगा। “उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?” जब व्यवस्था अपने भण्डारों से गरजती हुई निकलती है, तब कौन उसे सह सकता है?

प्राण पर व्यवस्था का प्रभाव यह होता है कि वह मनुष्य के सुख की नदियों को बाँध देती है। जब विवेक के भय किसी पर छाए हों, तब कोई आनन्द नहीं कर सकता। जब परमेश्वर की व्यवस्था प्राण में से होकर बहती है, तब गाना-बजाना और नाचना अपना आनन्द खो देते हैं, प्याला आनन्दित करने की अपनी शक्ति खो देता है, और पृथ्वी के मोहजाल टूट जाते हैं। सुख की नदियाँ जमकर बर्फीली उदासी बन जाती हैं। आशा की कलियाँ अचानक पाले से झुलस जाती हैं, और प्राण को कोई शान्ति नहीं मिलती। कभी उसे धनी बनने में सन्तोष मिलता था, परन्तु अब सारे सोने-चाँदी पर जंग और क्षय लगा हुआ दिखाई देता है। हर एक सुहानी आशा पाले से मारी जाती है, और आत्मा जाड़े की निराशा में जकड़ी रहती है। यह ठण्ड पापी को अनुभव कराती है कि उसके वस्त्र कितने फटे-पुराने हैं। गर्मी के मौसम में वह इधर-उधर इतराता फिरता था और अपने चिथड़ों को राजसी वस्त्र समझता था, परन्तु अब पाला उसके वस्त्र के हर एक छेद को ढूँढ़ निकालता है, और भयानक व्यवस्था के हाथों में वह ऐसे काँपता है जैसे पीपल के पत्ते।

न्याय की उत्तरी वायु मनुष्य को भीतर-बाहर से टटोल डालती है। वह नहीं जानता था कि उसके भीतर क्या है, परन्तु अब वह देखता है कि उसका भीतरी भाग सड़ाहट और क्षय से भरा है। व्यवस्था की जाड़े की साँस के भयों में से ये कुछ हैं। व्यवस्था और भय का यह पाला अकेला हो, तो वह केवल कठोर ही बनाता है।

पाले के बाद पिघलन आए, तो उसके समान कोई वस्तु चट्टान को नहीं फोड़ती और न कगार को गिराती है; परन्तु अकेला पाला पृथ्वी को लोहे के समान कर देता है, और जो हल का फाल उसे भेदने का यत्न करता है उसे तोड़ डालता है।

जो पापी सुसमाचार से अलग केवल परमेश्वर की व्यवस्था के प्रभाव में है, वह निराशा से कठोर हो जाता है और कहता है, “कोई आशा नहीं है; इसलिए मैं अपनी ही अभिलाषाओं के पीछे चलूँगा। जब इस जीवन के बाद मेरे लिये कोई स्वर्ग नहीं, तो मैं इसी पृथ्वी को अपना स्वर्ग बना लूँगा; और जब नरक मेरी बाट जोह रहा है, तो कम से कम जो मिठास पाप मुझे यहाँ दे सकता है, उसका तो आनन्द उठा लूँ।”

यह व्यवस्था का दोष नहीं है। दोष उस भ्रष्ट हृदय का है जो उससे कठोर हो जाता है। फिर भी उसका प्रभाव ऐसा ही होता है। जब प्रभु व्यवस्था के पाले के द्वारा काम कर चुकता है, तब वह सुसमाचार की पिघलन भेजता है। जब प्रतिज्ञा के देश से दक्षिणी वायु बहती है, और परमेश्वर की पिता-तुल्य करुणा और कोमल दया की बहुमूल्य सुधि दिलाती है, तब हृदय तुरन्त पिघलने लगता है। लहू से मोल ली गई क्षमा का बोध उसे शीघ्र ही गला देता है। आँखें आँसुओं से भर जाती हैं, हृदय कोमलता में पिघल जाता है, आनन्द की नदियाँ खुलकर बहने लगती हैं, और आशा की कलियाँ सुहानी हवा में खिल उठती हैं।

स्वर्गीय वसन्त उन फूलों के कान में फुसफुसाता है जो ठण्डी भूमि में सो रहे थे। वे उसका शब्द सुनकर अपने सिर उठाते हैं, क्योंकि: “क्योंकि देख, सर्दी जाती रही; वर्षा भी हो चुकी और जाती रही है। पृथ्वी पर फूल दिखाई देते हैं, चिड़ियों के गाने का समय आ पहुँचा है, और हमारे देश में पिण्डुक का शब्द सुनाई देता है।” — श्रेष्ठगीत 2:11-12 परमेश्वर अपना वचन भेजकर कहता है, “तेरी कठिन सेवा पूरी हुई है, तेरे अधर्म का दण्ड अंगीकार किया गया है।” — यशायाह 40:2 जब वह धन्य और हियाव देनेवाला वचन सामर्थ्य के साथ प्राण में आता है, और पवित्र आत्मा की मधुर साँस हृदय पर गरम दक्षिणी वायु के समान काम करती है, तब जल बहने लगता है, और मन पवित्र आनन्द, ज्योति और स्वतंत्रता से भर जाता है।

“व्यवस्था का जाड़ा बीत गया, पाले भागे, वसन्त आ गया; हम पवित्र पिण्डुक को सुनते, जो नये, हर्षित वर्ष का सन्देश देता।” यह दिखाकर कि प्रकृति में पाले और पिघलन के बीच, और अनुग्रह में व्यवस्था और सुसमाचार के बीच एक समानता है, अब मैं अनुग्रह के विषय में वे ही विचार दोहराऊँगा जो मैंने प्रकृति के विषय में तुम्हारे सामने रखे थे।

1. अनुग्रह में परमेश्वर के काम की प्रत्यक्षता पर ध्यान दो हमने प्रकृति में परमेश्वर के कामों की प्रत्यक्षता से आरम्भ किया था। अब, हे प्रिय मित्रो, अनुग्रह में परमेश्वर के कामों की प्रत्यक्षता पर ध्यान दो। जब हृदय परमेश्वर की व्यवस्था से सचमुच प्रभावित होता है, जब पाप बहुत ही पापमय दिखाई देने लगता है, जब सांसारिक आशाएँ व्यवस्था के कारण जम जाती हैं, जब प्राण अपनी बंजरता और पूरे विनाश को अनुभव करता है — तो यह परमेश्वर की उँगली है।

केवल प्रचारक की बात मत करो। उसका मन लगाकर प्रचार करना उचित था। परमेश्वर ने उसे एक साधन के रूप में काम में लिया, परन्तु सब कुछ परमेश्वर ही करता है। जब अनुग्रह की पिघलन आती है, तब मैं तुमसे विनती करता हूँ कि शान्ति की हर एक किरण में, जो व्याकुल विवेक को आनन्दित करती है, परमेश्वर के स्पष्ट हाथ को पहचानो, क्योंकि केवल प्रभु ही “खेदित मनवालों को चंगा करता है, और उनके घाव पर मरहम-पट्टी बाँधता है।” — भजन संहिता 147:3 हम साधनों पर ही रुक जाने को बहुत अधिक उतावले रहते हैं। मूर्खता मनुष्यों को हृदय तोड़ने या हृदय चंगा करने के लिये संस्कारों की ओर ताकने को ले जाती है, परन्तु संस्कार कहते हैं, “यह हम में नहीं है।” कुछ लोग वचन के प्रचार की ओर ताकते हैं और उससे ऊपर नहीं देखते, परन्तु विश्वासयोग्य प्रचारक तुमसे कहेंगे, “यह हम में नहीं है।” वाक्पटुता और उत्साह, अपनी चरम सीमा पर भी, न तो किसी हृदय को तोड़ सकते हैं और न चंगा कर सकते हैं। यह परमेश्वर का काम है — कोई गौण काम नहीं, मानो परमेश्वर केवल प्राकृतिक नियम के पीछे खड़ा हो — वरन् उसका अपना और प्रत्यक्ष काम। जब विवेक दीन किया जाता है, तब वह अपना ही हाथ बढ़ाता है, और उसी के दाहिने हाथ के द्वारा विवेक को छुटकारा मिलता और वह शुद्ध किया जाता है।

मेरी इच्छा है कि यह विचार तुम्हारे साथ बना रहे, क्योंकि नहीं तो तुम न परमेश्वर की ठीक-ठीक स्तुति करोगे, और न सिद्धान्त में खरे बने रहोगे। मन-फिराव के विषय में खरी शिक्षा से सब भटकाव इसी बात को भूल जाने से उत्पन्न होते हैं कि वह आदि से अन्त तक ईश्वरीय काम है। मसीह के लिये सबसे धीमी अभिलाषा भी उतना ही परमेश्वर का काम है जितना उसके प्रिय पुत्र का दान। अल्फा से ओमेगा तक, पवित्र आत्मा ही अपनी सुइच्छा निमित्त हमारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है। — फिलिप्पियों 2:13 जैसे तुमने उसकी बर्फ फेंकने और पिघलन भेजने में परमेश्वर की उँगली को स्पष्ट देखा है, वैसे ही मैं विनती करता हूँ कि तुम्हें पाप का बोध देने और उद्धारकर्ता के चरणों तक ले आने में भी परमेश्वर की कारीगरी को पहचानो। अचम्भे के काम करनेवाले परमेश्वर की हार्दिक स्तुति में एक साथ मिल जाओ, जो अपनी इच्छा के मत के अनुसार सब कुछ करता है।

“तेरे मुख की खोज जो हमने की, वह सब तेरे अनुग्रह से हुई; तेरी दया सारी स्तुति माँगती है, और सारी स्तुति उसी की होगी।

कोई पापी तुझसे पहले पहल नहीं कर सकता; तेरा अनुग्रह आगे-आगे चलनेवाला, सर्वशक्तिमान और सेंतमेंत है।” 2. प्रकृति के विषय में दूसरा विचार वह सहजता है जिससे प्रभु काम करता है। न कोई संघर्ष है, न कोई हलचल। इसे अनुग्रह के काम पर लागू करो। परमेश्वर के लिये किसी मनुष्य के हृदय में पाप का बोध उत्पन्न करना कितना सहज है! हे हठीले पापी, हम तुम्हें छू भी नहीं सकते, और जीवन की परिस्थितियाँ भी तुम्हें जगाने में असफल रही हैं। तुम मरे हुए हो — अपने पापों में पूरी रीति से मरे हुए। परन्तु यदि महिमामय प्रभु अपने आत्मा की वायु भेजे, तो वह तुम्हें पिघला देगा। जो मनुष्य शाप देता और पाप में जीता है, जिसकी बातें अपवित्रता से भरी हैं — यदि प्रभु उस पर दृष्टि करे और अपना अदम्य अनुग्रह उस पर प्रगट करे, तो वह भी एक दिन परमेश्वर की स्तुति करेगा, उसके नाम को धन्य कहेगा, और उसकी महिमा के लिये जीएगा।

परमेश्वर को सीमा में मत बाँधो। सतानेवाला शाऊल प्रेरित पौलुस बन गया। तो फिर जिसके विषय में तुम लगभग निराश हो चुके हो, वह भी क्यों न बचाया जाए? हो सकता है तुम्हारा पति पहुँच से बाहर लगता हो, हो सकता है तुम्हारे पुत्र ने स्वर्ग का भी और तुम्हारा भी अपराध किया हो — परन्तु कोई भी परमेश्वर की पहुँच से बाहर नहीं है। सबसे कठोर और सबसे हठीले पाप को भी उसके अनुग्रह की गर्मी के आगे झुकना ही पड़ता है। अपराध का सबसे बड़ा हिमखण्ड भी परमेश्वर के प्रेम के महासागर में पिघल सकता है।

हे प्रिय पापी, कदाचित् परमेश्वर ने तुम्हारे प्राण में एक लम्बा, ठण्डा जाड़ा भेजा है, और ऐसा लगता है मानो वह कभी समाप्त ही न होगा। मैं तुम्हें उत्साहित करना चाहता हूँ कि आशा रखो और उसके अनुग्रहपूर्ण आगमन के लिये प्रार्थना करो। मिस स्टील की कविता इस भावना को पूरी रीति से प्रगट करती है: “कठोर जाड़ा अपनी बर्फीली जंजीरें डालता, प्रकृति को चारों ओर से घेर लेता; मैदान कैसे सूने, कैसे शान्तिहीन हैं, जो अभी हाल में हरियाली से सजे थे!

सूर्य अपनी जीवनदायी किरणें समेट लेता, और प्रकाश और गर्मी चले जाते; और मुरझाई, निर्जीव सी प्रकृति, मेरे हृदय का चिह्न जान पड़ती— मेरा हृदय, जहाँ मन का जाड़ा राज्य करता, रात के अन्धेरे ओढ़ने में लिपटा, ठण्डी, निष्क्रिय जंजीरों में बँधा; कैसा उजाड़ और उदास!

लौट आ, हे आनन्दमय सूर्य, और ले आ अपनी प्राण जिलानेवाली किरण; यह मन का जाड़ा वसन्त बन जाएगा, यह अन्धकार हर्षित दिन।”

परमेश्वर के लिये तुम्हें बचाना सहज है। वह कहता है, “मैंने तेरे अपराधों को काली घटा के समान और तेरे पापों को बादल के समान मिटा दिया है” (यशायाह 44:22)। मुझे स्मरण है कि एक साँझ मैंने ऊपर एक काले बादल को देखा, और मुझे निश्चय था कि वर्षा होगी; मैं भीतर चला गया, और जब फिर बाहर आया, तो आकाश निर्मल था — वायु उस बादल को उड़ा ले गई थी।

तुम्हारे प्राण के साथ भी ऐसा ही है। परमेश्वर एक ही क्षण में तुम्हारे सब पापों को दूर कर सकता है। यीशु ने क्रूस पर सब बाधाएँ हटा दीं, और यदि तुम उस पर विश्वास करो, तो उसने तुम्हारे सब पापों को गहरे समुद्र में डाल दिया है। यदि तुम विश्वास कर सको, तो “विश्वास करनेवाले के लिये सब कुछ हो सकता है” (मरकुस 9:23)।

3. प्रकृति में परमेश्वर के काम के विषय में अगला विचार उसकी विविधता है। पाला तीन रूपों में प्रगट होता है — हिम, तुषार, और बर्फ — और पिघलन भी कई रूपों में आती है। हृदय में परमेश्वर का काम भी ऐसा ही है।

पाप का बोध हर एक के लिये अलग होता है। कुछ लोग उसे कोमलता से, गिरते हुए हिम के समान अनुभव करते हैं — पहले तो उन्हें उसका पता भी मुश्किल से चलता है। सच्चा मन फिराव चुपचाप और धीरे से आरम्भ हो सकता है। दूसरे उसे ओलों के समान अनुभव करते हैं, कठोर और शोर भरा, जो भय के बोध के साथ हृदय पर चोट करता है। परमेश्वर अलग-अलग रीतियों से काम करता है, परन्तु हर एक रीति उसके उद्देश्य को पूरा करती है। उसके आगमन के लिये धन्यवादी रहो, परन्तु यह ठहराने का यत्न मत करो कि वह किस रीति से काम करे।

जहाँ तक सुसमाचार की पिघलन की बात है, परमेश्वर के अनुग्रह के लिये कोई विशेष मार्ग मत माँगो। पिघलन धीरे-धीरे और सब ओर होती है। पहले ऊपर की बर्फ पिघलती है, और धीरे-धीरे गर्मी पूरे ढेर में समा जाती है, यहाँ तक कि हर एक जमी हुई चट्टान ढीली पड़ जाती है। इसी रीति से आत्मा हृदय में धीरे-धीरे काम करता है — बुद्धि को प्रकाशित करता, इच्छा को स्वतंत्र करता, भय को दूर करता, आशा जगाता, आत्मा को जागृत करता, और शान्ति और आनन्द उत्पन्न करता है। जैसे तुम वायु को नहीं देख सकते, वैसे ही उसे काम करते हुए भी नहीं देख सकते, परन्तु उसके प्रभावों को अनुभव कर सकते हो। यदि तुम्हारा अनुभव दूसरों के अनुभव से भिन्न हो, तो चकित मत हो। परमेश्वर के काम में एक नमूना है, जैसे हिम, तुषार और बर्फ में एक समानता है, परन्तु बारीकियाँ अलग-अलग होती हैं।

4. परमेश्वर के काम की शीघ्रता पर ध्यान दो: “उसका वचन अति वेग से दौड़ता है” (भजन संहिता 147:15)। अन्तिम हिम को हटाने में परमेश्वर को देर नहीं लगी। किसी मनुष्य को ऐसा काम पूरा करने में कई दिन लग सकते हैं, परन्तु परमेश्वर का वचन तुरन्त काम करता है। प्राण के साथ भी ऐसा ही है। जब प्रभु किसी हृदय को आशीष देता है, तब वह शीघ्रता से काम कर सकता है। चाहे तुम बहुत समय से पाप और व्यवस्था के बोझ के नीचे दबे रहे हो, परमेश्वर एक ही क्षण में तुम्हें स्वतंत्र कर सकता है। वह तुम्हें मृत्यु से जीवन में, और दण्ड की आज्ञा से धर्मी ठहराए जाने में ला सकता है। “मैं तुझ से सच कहता हूँ कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा” (लूका 23:43), यीशु ने एक मरते हुए डाकू से कहा।

केवल मसीह के बलिदान पर विश्वास करो, और तुम उद्धार पाओगे।

5. अन्त में, परमेश्वर की भलाई पर विचार करो। कैसी दया है कि उसने हम पर हमारी सहने की शक्ति से अधिक व्यवस्था का बोझ नहीं डाला! “उसकी की हुई ठण्ड को कौन सह सकता है?” (भजन संहिता 147:17)। जब परमेश्वर किसी प्राण पर अपना क्रोध प्रगट करता है, तो वह भयानक होता है। पाप मनुष्य को कुचल डालनेवाले बोझ के समान दबा सकता है, परन्तु यीशु ने उसे हमारे लिये उठा लिया है। युगों की चट्टान पर भी हम इसलिए आनन्द नहीं करते कि हम उसे स्वयं उठाते हैं, वरन् इसलिए कि उसने उसे उठा लिया है। पाप के बोध का पाला घमण्ड को नीचा करता, आत्म-धार्मिकता को नष्ट करता, और हमें मूर्खता से बचाए रखता है। परन्तु परमेश्वर की करुणा की पिघलन कैसी अद्भुत है! जैसे ही उसकी दया प्राण को छूती है, कठोरता मिट जाती है, ठण्ड जाती रहती है, गर्मी और प्रेम बहने लगते हैं, और जीवन लौट आता है।

हम निराशा में से ऐसे उठते हैं जैसे बीज भूमि में से उगते हैं। विश्वास सूर्य को ग्रहण करने के लिये क्रोकस के फूल के समान खुल जाता है; आशा प्रिमरोज़ के समान ऊपर ताकती है, और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं से आनन्दित होती है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि हमारे हृदयों में वसन्त आ गया है, और जाड़ा सदा के लिये चला गया है।

“जहाँ अनन्त वसन्त बसा रहता है, और फूल कभी नहीं मुरझाते।

केवल एक पतली सी धारा ही उस स्वर्गीय देश को हमारे देश से अलग करती है।” हे तुम जो व्यवस्था के पाले में ठिठुर रहे हो, प्रभु पर विश्वास करो, और उसका प्रेम तुम्हारे लिये आनन्द और शान्ति के गरम दिन ले आएगा। आमीन।

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