किसान से बातें
गिरा हुआ बाड़ा

अध्याय 2 · 24 मिनट का पठन

गिरा हुआ बाड़ा

“मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास होकर जाता था, तो क्या देखा, कि वहाँ सब कहीं कटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है, और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है।

तब मैंने देखा और उस पर ध्यानपूर्वक विचार किया; हाँ मैंने देखकर शिक्षा प्राप्त की।” नीतिवचन 24:30-32 इस आलसी मनुष्य ने अपने साथी मनुष्यों की कोई हानि नहीं की: वह न चोर था, न उपद्रवी, न दूसरों के कामों में टाँग अड़ानेवाला। उसे दूसरों की चिन्ताओं से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि वह तो अपनी चिन्ताओं पर भी ध्यान नहीं देता था—उसमें बहुत परिश्रम लगता था। वह खुल्लमखुल्ला दुष्ट भी नहीं था; उसके लिये भी उसमें पर्याप्त फुर्ती नहीं थी। उसे हर काम आराम से करना भाता था। जो ठीक चल रहा था, उसे वह सदा वैसा ही छोड़ देता था; और उसी तरह जो बिगड़ रहा था, उसे भी वैसा ही छोड़ देता था, जैसा कि उसकी बारी के बिच्छू पौधे और ऊँटकटारे साफ़ प्रमाणित करते थे।

अपने आप को परेशान करने से क्या लाभ? सौ वर्ष बाद तो सब कुछ एक सा ही होगा; इसलिए जो कुछ जैसा आता, वह उसे वैसा ही ले लेता था। कुछ लोग उसके विषय में कहते थे कि वह बुरा मनुष्य नहीं था; फिर भी, कदाचित् अन्त में यही पाया जाएगा कि संसार में उस मनुष्य से बुरा कोई नहीं जो भला नहीं है। कुछ बातों में तो उसमें इतना भी दम नहीं कि वह बुरा बन सके; उसके चरित्र में इतना बल ही नहीं कि वह परमेश्वर की या बाल की सेवा कर सके। वह तो बस अपनी ही सेवा करता है, अपने आराम की उपासना करता है और अपने सुख की आराधना करता है।

फिर भी उसका इरादा सदा ठीक होने का रहता था। अरे भाई! वह अब बहुत देर तक नहीं सोएगा; बस एक और झपकी ले लेगा, और फिर अपने काम में जुट जाएगा और तुम्हें दिखा देगा कि वह क्या कर सकता है। किसी न किसी दिन वह पूरे मन से लग जाने और खोए हुए समय की भरपाई करने की ठाने बैठा था। उसके आरम्भ करने का समय सचमुच कभी आया ही नहीं, पर वह सदा आ ही रहा था। वह सदा मन फिराने की सोचता रहा, पर अपने पाप में चलता रहा। वह विश्वास करने की सोचता रहा, पर अविश्वासी होकर मर गया। वह मसीही बनने की सोचता रहा, पर मसीह के बिना जीता रहा। वह दो विचारों में लटके रहा, क्योंकि वह निर्णय करने का कष्ट उठाना नहीं चाहता था; और इस प्रकार वह टालमटोल के कारण नाश हो गया।

यह चित्र—आलसी मनुष्य, और बिच्छू पौधों और खरपतवार से भरा उसका बगीचा और खेत—ऐसे अनेक मनुष्यों का चित्र है जिन्होंने मसीही होने का अंगीकार तो किया, परन्तु जो परमेश्वर की बातों में आलसी हो गए हैं। ऐसे मनुष्य के भीतर आत्मिक जीवन मुरझा गया है। वह पीछे हट गया है। वह स्वस्थ आत्मिक उत्साह से उतरकर परमेश्वर की बातों के प्रति सुस्ती और उदासीनता में आ पड़ा है। जब उसके हृदय के भीतर बातें बिगड़ गई हैं, और हर प्रकार की बुराइयाँ उसमें घुसकर बढ़ गई हैं और जड़ पकड़ चुकी हैं, तब बाहर उसके दैनिक आचरण में भी बिगाड़ हो रहा है। जो पत्थर का बाड़ा उसके चरित्र की रक्षा करता था, वह गिर गया है, और वह हर बुराई के लिये खुला पड़ा है। अब हम इसी बात पर मनन करेंगे: “उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है।”

तो आओ, हम सुलैमान के साथ चलें, और उसके साथ खड़े होकर विचार करें, और इस गिरे हुए बाड़े को देखते हुए शिक्षा प्राप्त करें। जब हम उसकी जाँच कर चुकें, तब गिरे हुए बाड़ों के परिणामों पर विचार करें; और फिर, अन्त में, इस आलसी को जगाने का यत्न करें ताकि उसका बाड़ा अब भी सुधारा जा सके। यदि यह आलसी मनुष्य हम ही में से कोई हो, तो परमेश्वर की असीम दया हमें जगाए, इससे पहले कि यह टूटा हुआ बाड़ा घात में घूमती बुराइयों के पूरे झुण्ड को भीतर आने दे।

I. आओ, हम इस गिरे हुए बाड़े को देखें। आरम्भ में यह बहुत अच्छा बाड़ा था, क्योंकि यह पत्थर का बाड़ा था। खेतों के चारों ओर प्रायः लकड़ी के बाड़े होते हैं जो जल्दी सड़ जाते हैं, या झाड़ियों की बाड़ें होती हैं जिनमें आसानी से दरारें की जा सकती हैं; परन्तु यह पत्थर का बाड़ा था। ऐसे बाड़े पूर्व के देशों में बहुत आम हैं, और हमारे अपने कुछ प्रान्तों में भी, जहाँ पत्थर बहुतायत से मिलता है। आरम्भ में यह एक पक्की सुरक्षा था, और इसने उस छोटी सी जागीर को सुरक्षित घेर रखा था जो ऐसे बुरे हाथों में पड़ गई थी। उस मनुष्य के पास खेती के लिये एक खेत था, और दाख की बारी या बगीचे के लिये भूमि का एक और टुकड़ा। मिट्टी उपजाऊ थी, क्योंकि उसमें कटीले पेड़ और बिच्छू पौधे बहुतायत से उगते थे; और जहाँ ये उगते हैं, वहाँ अच्छी वस्तुएँ भी उग सकती हैं। फिर भी उस आलसी ने अपनी सम्पत्ति की कोई सुधि न ली, वरन् बाड़े को जर्जर होने दिया, और बहुत से स्थानों पर उसे पूरी तरह गिर जाने दिया।

मैं उन कुछ पत्थर के बाड़ों का उल्लेख करूँ जिन्हें मनुष्य पीछे हटते समय ढहने देते हैं। बहुत बार जवानी में खरे सिद्धान्त मन में बैठाए गए थे, परन्तु वे भुला दिए जाते हैं। मसीही शिक्षा कितनी बड़ी आशीष है! हमारे माता-पिता ने शिक्षा और उदाहरण दोनों के द्वारा हम में से बहुतों को सिखाया कि क्या पवित्र है, क्या आदरणीय है, और क्या नेकनामी का है। हमने उनके जीवन में देखा कि कैसे जीना चाहिए। उन्होंने परमेश्वर का वचन हमारे सामने खोला, और हमें सिखाया कि परमेश्वर और मनुष्यों के प्रति क्या उचित है। उन्होंने हमारे लिये प्रार्थना की, और हमारे साथ प्रार्थना की, यहाँ तक कि परमेश्वर की बातों ने हमें चारों ओर से घेर लिया और पत्थर के बाड़े के समान हमें घेरे रखा।

हम उन आरम्भिक छापों से कभी छुटकारा नहीं पा सके। भटकने के दिनों में भी, जब हम प्रभु को उद्धार के लिये नहीं जानते थे, उन सच्चाइयों का हम पर स्वस्थ प्रभाव बना रहा। जब हम बुराई करना चाहते थे, तब हम रोके गए। जब हम जूझते हुए मसीह की ओर बढ़ रहे थे, तब हमें सहायता मिली। यह बहुत दुःख की बात है जब लोग इन पहले सिद्धान्तों को ऐसे हिलने और हटने देते हैं जैसे सीमा के बाड़े से पत्थर गिरते हैं। जवान लोग पहले अपने माता-पिता की पुराने ढंग की रीतियों के विषय में हल्की बातें करने लगते हैं।

जल्द ही वे केवल पुराने ढंग को ही तुच्छ नहीं जानते, वरन् स्वयं उन रीतियों को तुच्छ जानने लगते हैं। वे दूसरी संगति ढूँढ़ते हैं, और उस संगति से बुराई के सिवा कुछ नहीं सीखते। वे ऐसे स्थानों में सुख ढूँढ़ते हैं जिन्हें देखकर उनके माता-पिता काँप उठें। इससे बात और भी बिगड़ती है। यदि वे अपने पिता के पके बालों को शोक के साथ कब्र में नहीं उतारते, तो इसका श्रेय उन्हें नहीं जाता।

मैंने ऐसे जवानों को जाना है जो सचमुच मसीही थे, पर दुःख के साथ पीछे हट गए, क्योंकि उन्हें उन पवित्र सिद्धान्तों को बदलने, छिपाने या उनमें हेर-फेर करने के लिये मना लिया गया जिनकी शिक्षा उन्हें माता की गोद से मिली थी। यह बड़ी विपत्ति है जब अंगीकार करनेवाले विश्वासी डगमगाने लगते हैं और उपदेश की हर एक वायु से उछाले, और इधर-उधर घुमाए जाते हैं। जब हम उन गम्भीर और पवित्र सच्चाइयों से खिलवाड़ कर सकते हैं जो माता के आँसुओं से सींची गईं और पिता के विश्वासयोग्य जीवन से सम्भाली गईं, तो यह मन की दुर्बलता और हृदय के खोटेपन को प्रकट करता है।

“मैं तेरा दास, और तेरी दासी का पुत्र हूँ” (भजन संहिता 116:16)। दाऊद को यह एक आदर भी लगा और पवित्र बन्धन भी कि वह उसका पुत्र था जो परमेश्वर की दासी कहलाती थी।

तुम जिन्होंने मसीही शिक्षा पाई है, सावधान रहो कि उससे खिलवाड़ न करो। “हे मेरे पुत्र, अपने पिता की आज्ञा को मान, और अपनी माता की शिक्षा को न तज।

उनको अपने हृदय में सदा गाँठ बाँधे रख; और अपने गले का हार बना ले।” (नीतिवचन 6:20-21) चरित्र की सुरक्षा खरे सिद्धान्त में भी पाई जाती है। यह भी एक दृढ़ पत्थर का बाड़ा है। हम में से बहुतों को परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार की शिक्षा मिली है और उन्होंने उसे भली-भाँति सीखा है, यहाँ तक कि वे उस विश्वास के लिये पूरा यत्न कर सकते हैं जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था। धन्य हैं वे जिनका धर्म अनन्त सत्य के स्पष्ट ज्ञान पर टिका है।

ऐसा धर्म जो जोश ही जोश हो और जिसमें शिक्षा थोड़ी हो, कुछ समय तक काम दे सकता है; परन्तु जीवन भर की दृढ़ता के लिये उन महान सिद्धान्तों का ज्ञान होना आवश्यक है जो सुसमाचार की नींव हैं। जब मैं किसी मनुष्य के विषय में सुनता हूँ कि वह सुसमाचार की जीवनदायी सच्चाइयों को एक-एक करके छोड़ता जा रहा है और अपनी उदारता पर घमण्ड करता है, तो मैं काँप उठता हूँ। मैं उसे यह कहते सुनता हूँ, “ये मेरे विचार हैं, पर दूसरों को अपने विचार रखने का अधिकार है।” केवल मतों की बात हो तो ऐसा कहना उचित है; परन्तु परमेश्वर के प्रकट किए हुए सत्य के विषय में हम ऐसा नहीं कह सकते। वह सत्य एक है और कभी नहीं बदलता, और सब उसे ग्रहण करने के लिये बाध्य हैं। तुम्हें सत्य के विषय में तुम्हारा निजी विचार नहीं बचाता, वरन् स्वयं वह सत्य बचाता है जैसा परमेश्वर ने उसे प्रकट किया है, जब उसे विश्वास से अपनाया जाए।

मैं किसी सिद्धान्त को व्यक्त करने का अपना ढंग तो खुशी से छोड़ दूँगा, पर स्वयं उस सिद्धान्त को नहीं। एक मनुष्य उसे इस रीति से कह सकता है, दूसरा किसी और रीति से; परन्तु स्वयं सत्य को कभी त्यागना नहीं चाहिए। उदारवादी पन्थ (ब्रॉड स्कूल) की आत्मा हम से निश्चितता छीन लेती है। मैं उसके कुछ अगुवों से पूछना चाहूँगा कि क्या वे मानते हैं कि पवित्रशास्त्र में सिखाई गई कोई भी बात ऐसी है जिसके लिये मरना उचित हो, और क्या वे शहीद मूर्ख थे जिन्होंने उन बातों के लिये अपने प्राण दे दिए जो कदाचित् केवल मत ही थीं। यह उदारवादी कलीसियाई आत्मा पत्थर के बाड़ों को गिरा देती है। वह शैतान और उसके सारे दल को भीतर आने देती है, और यदि उसका सामना न किया गया तो वह परमेश्वर की कलीसिया की अपार हानि करेगी। विश्वास की ढीली दशा किसी भी मनुष्य के प्राण की हानि करती है।

हम कट्टर नहीं हैं; फिर भी यदि हम ऐसी विश्वासयोग्यता से जीएँ कि लोग हमें कट्टर कहने लगें, तो इसमें हमारी कोई हानि नहीं। हाल ही में मैं एक ऐसे मनुष्य से मिला जिस पर कट्टरता का दोष लगाया गया था, और मैंने कहा, “अपना हाथ दो। मुझे कभी-कभी कट्टर लोगों से मिलना अच्छा लगता है। वे दुर्लभ होते जा रहे हैं, और जिस मिट्टी से वे बने हैं वह इतनी पक्की है कि यदि वह अधिक होती तो हम अपने बीच अधिक मर्द और बिना रीढ़ के कम प्राणी देखते।”

इन दिनों हमने रीढ़वाले मनुष्य कम ही देखे हैं; अधिकतर तो जेलीफ़िश के समान रहे हैं। एक समय था जब मैं कहता, “उदार बनो और संकीर्णता को उतार फेंको।” अब मुझे कहना पड़ता है, “सत्य में स्थिर रहो।” वह विश्वास जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था, अब मुझे और भी अधिक प्रिय है जब उसे संकीर्ण कहा जाता है, क्योंकि मैं उस चौड़ाई से थक गया हूँ जो टूटी हुई बाड़ों से आती है।

विश्वास के कुछ अटल सत्य और निश्चित निश्चय हैं, और यदि तुम इन पत्थर के बाड़ों को ढहने दो तो तुम पर हाय! मुझे डर है कि आलसी बहुत हैं, और आनेवाली पीढ़ियाँ उस लापरवाही पर विलाप करेंगी जिसकी इस असावधान युग में वाहवाही की जाती है।

एक और बाड़ा जिसकी प्रायः उपेक्षा की जाती है, वह पहले से बनी हुई भक्तिपूर्ण आदतों का बाड़ा है। आलसी इस बाड़े को खण्डहर हो जाने देता है। मैं जीवन और चरित्र की कुछ महत्त्वपूर्ण रक्षाओं का उल्लेख करूँ।

एक है गुप्त प्रार्थना की आदत। निजी प्रार्थना नियमित रूप से, कम से कम सुबह और शाम, की जानी चाहिए। परमेश्वर के निकट आने के ठहराए हुए समयों के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। पहले परमेश्वर का मुख देखे बिना मनुष्य का मुख देखना खतरनाक है। अपना हृदय परमेश्वर को सौंपे बिना संसार में निकल जाना उसे हर आत्मिक घुसपैठिये के लिये खुला छोड़ देना है। रात को दिन भर की दया के लिये परमेश्वर का धन्यवाद किए बिना, पशुओं के समान जो अपने थान में जाते हैं, बिस्तर पर चले जाना लज्जा की बात है। जैसे हम साँझ की आग का आनन्द निश्चय लेते हैं, वैसे ही साँझ का बलिदान भी निश्चय चढ़ाया जाना चाहिए। हमें अपने आप को मनुष्यों के रक्षक के पंखों के नीचे रखना चाहिए।

कहा जाता है, “हम हर समय प्रार्थना कर सकते हैं।” यह सच है; परन्तु मुझे डर है कि जो ठहराए हुए समयों पर प्रार्थना नहीं करते, वे शायद ही कभी प्रार्थना करते हैं। जो नियमित रूप से प्रार्थना करते हैं, वही सबसे अधिक निरन्तर प्रार्थना करते हैं। आत्मिक जीवन कठोर औपचारिकता पर नहीं पनपता; परन्तु क्योंकि जीवन सदा कोई न कोई बाहरी रूप धारण करता है, इसलिए हमें उसकी भीतरी सामर्थ्य के साथ-साथ उसकी बाहरी आदतों की भी चिन्ता करनी चाहिए। नियमित निजी प्रार्थना के बाड़े में कभी बड़ी दरारें न पड़ने दो।

मैं और आगे बढ़ता हूँ। पारिवारिक प्रार्थना में रक्षा की बड़ी सामर्थ्य है, और मुझे गहरा दुःख है कि बहुत से मसीही परिवार उसकी उपेक्षा करते हैं। एक समय था जब इंग्लैण्ड में रोमी मत बहुत कम आगे बढ़ पाता था, क्योंकि वह केवल उस वस्तु की छाया देता था जो मसीही घरों के पास पहले से ही सच्चे रूप में थी।

“क्या तुम सुबह वह घण्टी सुनते हो?”

“वह किस लिये है?”

“गिरजे में जाकर प्रार्थना करने के लिये।” प्यूरिटन ने उत्तर दिया, “मुझे वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं। मैंने अपने बच्चों को इकट्ठा कर लिया है। हमने पवित्रशास्त्र पढ़ा है, प्रार्थना की है, और परमेश्वर की स्तुति गाई है। हमारे घर में ही कलीसिया है।” साँझ को घण्टी फिर बजी। वह सन्ध्या-आराधना के लिये थी। परन्तु वह अपनी साँझ की उपासना अपनी ही मेज़ के चारों ओर पहले ही कर चुका था, जिसकी मुख्य शोभा बड़ी बाइबल थी। उन्होंने कहा कि बिना याजक के कोई आराधना हो ही नहीं सकती। उसने उत्तर दिया कि हर भक्त मनुष्य को अपने घर में याजक होना चाहिए।

इस प्रकार पवित्र लोगों ने याजकों की चालबाज़ी का सामना किया और पीढ़ी से पीढ़ी तक विश्वास को सुरक्षित रखा।

परमेश्वर के अधीन, घर की उपासना और प्रचार-मंच ही प्रोटेस्टेंट विश्वास के पत्थर के बाड़े हैं। मेरी प्रार्थना है कि ये बाड़े कभी न गिराए जाएँ।

एक और रक्षा करनेवाला बाड़ा सप्ताह के बीच की सभा है। जब लोग सप्ताह के बीच की सभाओं को छोड़ देते हैं, तो उनके धर्म की सामर्थ्य घटने लगती है। मैं उनकी बात नहीं कर रहा जिन्हें परमेश्वर के प्रबन्ध से बीमारी, काम या कर्तव्य के कारण रुकावट होती है। अपवाद होते हैं। मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो आ तो सकते हैं, पर न आना चुनते हैं। जब कोई कहता है, “मेरे लिये रविवार के उपदेश ही बहुत हैं। मुझे प्रार्थना-सभाएँ या व्याख्यान नहीं चाहिए,” तो यह प्रकट करता है कि उसमें वचन की भूख नहीं है, और यह बुरा लक्षण है। यदि तुम रविवार के चारों ओर तो बाड़ा बाँधो और सप्ताह के बाकी दिनों को खुला छोड़ दो, तो शैतान के पशु भीतर घुसकर बड़ा विनाश करेंगे।

बाइबल पढ़ने और मसीही बातचीत के बाड़े को भी बनाए रखने में सावधान रहो। भक्त लोगों की संगति करो। परमेश्वर के साथ संगति करो। आत्मा की आशीष से तुम परीक्षा के विरुद्ध एक दृढ़ बाड़ा बनाए रखोगे। नहीं तो परीक्षाएँ तुम्हारे प्राण के खेतों में घुसकर सारा अच्छा फल चट कर जाएँगी। बहुतों ने विश्वास के खुले अंगीकार के पत्थर के बाड़े में अपने दैनिक जीवन के खेत के लिये बड़ी सुरक्षा पाई है। मैं तुम से बात कर रहा हूँ जो सच्चे विश्वासी हो, और तुम जानते हो कि यीशु के अनुयायी के रूप में खुले तौर पर जाना और पहचाना जाना बहुत बार एक दृढ़ रक्षा सिद्ध हुआ है।

मुझे उस दिन पर कभी पछतावा नहीं हुआ—और न कभी होगा—जब मैं कैम्ब्रिजशायर में लार्क नाम की छोटी सी नदी तक पैदल गया और वहाँ बपतिस्मा में मसीह के साथ गाड़ा गया। ऐसा करके मैंने अपने सब आदरणीय मित्रों की राय के विरुद्ध काम किया; परन्तु स्वयं यूनानी नया नियम पढ़ने के बाद मैंने अपने आप को बाध्य पाया कि अपने विश्वास के अंगीकार पर डुबकी का बपतिस्मा लूँ, और मैंने वैसा ही किया। उस काम के द्वारा मैंने संसार के सामने घोषणा की, “मैं तुम्हारे लिये मर गया हूँ, और मसीह में तुम्हारे लिये गाड़ा गया हूँ, और मैं आशा करता हूँ कि अब से आगे नये जीवन के अनुसार चाल चलूँगा।”

उस दिन, परमेश्वर के अनुग्रह से, मैंने उस सेनापति की युक्ति अपनाई जो जीतने तक लड़ने की ठान चुका था, और इसलिए उसने अपनी नावें जला दीं ताकि पीछे हटने का कोई मार्ग न रहे। मैं विश्वास करता हूँ कि मनुष्यों के सामने मसीह का गम्भीर अंगीकार काँटों की बाड़ के समान है, जो मनुष्य को सीमा के भीतर रखता है और उन्हें दूर रखता है जो उसे भटकाना चाहते हैं। निःसन्देह, वह केवल एक बाड़ है, और यदि वह खरपतवार के खेत को घेरे हो तो व्यर्थ है; परन्तु जब गेहूँ उग रहा हो, तो बाड़ का बड़ा महत्त्व है।

तुम जो यह सोचते हो कि तुम प्रभु के भी हो सकते हो और फिर भी सार्वजनिक भूमि के समान खुले पड़े रह सकते हो, बड़ी भूल में हो। तुम्हें संसार से अलग होना चाहिए और उस वाणी को मानना चाहिए जो कहती है, “उनके बीच में से निकलो और अलग रहो” (2 कुरिन्थियों 6:17)।

उद्धार की प्रतिज्ञा उसके लिये है जो मन से विश्वास करता है और मुँह से अंगीकार करता है (रोमियों 10:9-10)। साहस से कहो, “मैं तो अपने घराने समेत यहोवा ही की सेवा नित करूँगा” (यहोशू 24:15)। ऐसे अंगीकार के द्वारा तुम राजा के राजमार्ग पर पाँव रखते हो और अपने आप को तीर्थयात्रियों के प्रभु की सुरक्षा में सौंप देते हो, और वह तुम्हारी सुधि लेगा।

प्रायः, जब तुम अन्यथा हिचकिचाते, तब तुम कहोगे, “प्रभु की मन्नतों का भार मुझ पर बना है; मैं कैसे पीछे हटूँ?” इसलिए मैं तुम से आग्रह करता हूँ: पत्थर का बाड़ा खड़ा करो और उसे बनाए रखो। यदि किसी स्थान पर वह गिरा दिया गया है, तो उसे फिर से बनाओ। अपने आचरण और बातचीत से यह प्रकट होने दो कि तुम यीशु के अनुयायी हो और ऐसे जाने जाने से लज्जित नहीं हो।

सच्चे पुरुषों और स्त्रियों के समान अपने धार्मिक सिद्धान्तों को दृढ़ता से थामे रहो। लाभ के लिये या समाज में प्रतिष्ठा के लिये मुड़ न जाओ। धन को अपना बाड़ा गिराने न दो। मैंने कुछ ऐसे लोगों को जाना है जिन्होंने अपनी बग्घी निकालने के लिये, और धनी संसारी लोगों को उनकी प्रतिष्ठा के कारण अपनी संगति में बुलाने के लिये, बाड़े में चौड़ी दरार कर दी। जो मनुष्यों को प्रसन्न करने के लिये सिद्धान्त छोड़ देते हैं, वे अन्त में तुच्छ समझे जाएँगे; परन्तु जो विश्वासयोग्य है, वह परमेश्वर से आदर पाएगा। विश्वास पर अटल बने रहने की इस बाड़ की रक्षा करो, और तुम उसमें बड़ी आशीष पाओगे।

एक और पत्थर के बाड़े का उल्लेख करना बाकी है: चरित्र की दृढ़ता। हमारा पवित्र विश्वास मनुष्य को सिखाता है कि वह मसीह के लिये निर्णायक हो और पापपूर्ण आदतों को हटाने में अटल रहे। “यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे” (मत्ती 5:29)। यह नहीं कहता कि उस पर पट्टी बाँध लो।

“यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उसको काटकर अपने पास से फेंक दे” (मत्ती 5:30)। यह नहीं कहता कि उसे गलपट्टी में लटका लो। सच्चा धर्म पूरा-पूरा होता है। वह कहता है, “अशुद्ध वस्तु को मत छूओ” (2 कुरिन्थियों 6:17)।

परन्तु बहुत से लोग परमेश्वर के मार्गों में इतने आलसी हैं कि उनमें अपनी कोई दृढ़ता नहीं। बुरे साथी उन्हें लुभाते हैं, और वे “नहीं” नहीं कह पाते। उन्हें बार-बार के इन्कार से बना पत्थर का बाड़ा चाहिए। ये रहे उसके पत्थर: “नहीं। नहीं। नहीं।” अलग होने का साहस करो। मसीह से लिपटे रहने की ठान लो। दृढ़ निश्चय करो कि अपने जीवन में ऐसी किसी वस्तु को स्थान न दोगे—चाहे वह कितनी भी लाभदायक या सुखदायक हो—जिससे यीशु के नाम का अनादर हो। सत्य में अडिग, पवित्रता में अटल, ईमानदारी में अचल, दया में स्थिर, और सिधाई में दृढ़ बनो। यदि परमेश्वर का अनुग्रह तुम्हारे चारों ओर ऐसा बाड़ा बाँध दे, तो शैतान भी उसे पहचानकर कहेगा, “क्या तूने उसके चारों ओर बाड़ा नहीं बाँधा?” (अय्यूब 1:10)।

मैंने तुम्हें बहुत देर तक बाड़े के ऊपर से झाँकते रखा है। अब मैं तुम्हें भीतर बुलाऊँ, और हम गिरे हुए बाड़े के परिणामों पर विचार करें।

पहला, सीमा मिट जाती है। अलगाव की जो रेखाएँ कभी खरे सिद्धान्तों, भक्तिपूर्ण आदतों, खुले अंगीकार और दृढ़ संकल्प से बनी रहती थीं, वे अब नहीं रहीं। अब यह प्रश्न उठता है: यह मनुष्य मसीही है या नहीं? बाड़ा इतना गिर चुका है कि वह अब यह भी नहीं जानता कि क्या प्रभु का है और क्या सार्वजनिक भूमि के समान खुला पड़ा है। वह नहीं जानता कि वह स्वयं राजा के राज्य का भाग है या केवल संसार के शासन के अधीन पड़ी बंजर भूमि।

ऐसा तब होता है जब बाड़ों को बनाए नहीं रखा जाता। यदि वह मनुष्य परमेश्वर के निकट रहता, खराई से चलता, और पवित्र जीवन और धीरज से बाट जोहने में आत्मा की भरपूर उपस्थिति का आनन्द लेता, तो वह ठीक-ठीक जानता कि सीमा कहाँ है। वह जानता कि उसकी भूमि सब पवित्र जनों की पल्ली में है, या बेमालिक भूमि में, या उस क्षेत्र में जहाँ शैतान राज्य करता है।

मैंने एक प्रिय बूढ़ी पवित्र स्त्री के विषय में सुना जिस पर मृत्यु के निकट शैतान ने आक्रमण किया। उसने धीरे से अपनी उँगली हिलाई और कहा, “चुनी हुई! चुनी हुई! चुनी हुई!” वह जानती थी कि वह चुनी हुई है, और उसे ये शब्द स्मरण थे, “यहोवा जो यरूशलेम को अपना लेता है, वही तुझे घुड़के” (जकर्याह 3:2)। जब खेत के चारों ओर बाड़ा दृढ़ खड़ा हो, तब हम शैतान का सामना कर सकते हैं और कह सकते हैं, “प्रभु की सम्पत्ति को छोड़ दे। मैं मसीह का हूँ, तेरा नहीं।” ऐसा बोल पाने के लिये तुम्हें बाड़ों की सावधानी से मरम्मत करनी होगी, ताकि सीमा स्पष्ट रहे और तुम घोषणा कर सको, “अनधिकार प्रवेश करनेवाले, सावधान!” शत्रु के लिये एक इंच भी न छोड़ो। जब वह उस पर चढ़ने का यत्न करे, तो बाड़े को और ऊँचा करो। वह कभी कोई दरार न पाए जिससे होकर वह भीतर आ सके।

दूसरा, जब बाड़ा गिरता है, तो सुरक्षा खो जाती है। जब किसी मनुष्य का हृदय बिना बाड़े का होता है, तो उसके विचार व्यर्थता के पहाड़ों पर भटकते फिरते हैं। भेड़ों के समान विचारों को भी घेरे में रखना पड़ता है, नहीं तो वे भटक जाएँगे।

दाऊद ने कहा, “मैं व्यर्थ विचारों से बैर रखता हूँ” (भजन संहिता 119:113)। आलसी मनुष्यों के पास ये बहुत होते हैं, क्योंकि जब तक हर दरार बन्द न की जाए और हर फाटक सुरक्षित न किया जाए, व्यर्थ विचार धड़धड़ाकर भीतर घुस आएँगे। पवित्र चिन्तन, शान्ति देनेवाले मनन, भक्तिपूर्ण लालसाएँ, और परमेश्वर के साथ अनुग्रहपूर्ण संगति—ये सब लुप्त हो जाएँगे, यदि हम आलस्य से बाड़े को ढहने दें।

जब अच्छी वस्तुएँ चली जाती हैं, तो बुरी वस्तुएँ भीतर आ जाती हैं। जब बाड़ा गिरा हो, तो हर आने-जानेवाला उसे एक निमन्त्रण समझता है।

फाटक खुला है, और वे भीतर चले आते हैं। क्या वहाँ फल हैं? वे उन्हें तोड़ लेते हैं। वे ऐसे घूमते हैं मानो किसी सार्वजनिक उद्यान में हों, और हर कोने में ताक-झाँक करते हैं। क्या तुम्हारे हृदय में कोई निजी स्थान केवल यीशु के लिये है? शैतान और संसार उसमें घुस आएँगे। इसमें आश्चर्य क्या? जब दरारें चौड़ी खुली हों, तो हर भटका हुआ पशु जितना खाता है उससे अधिक रौंदता और बिगाड़ता है। इसी प्रकार हर प्रकार की बुरी अभिलाषा और कल्पना असुरक्षित प्राण को चरती है।

यदि तुम जान-बूझकर परीक्षा की ओर चलते हो, तो यह प्रार्थना करना व्यर्थ है, “हमें परीक्षा में न ला” (मत्ती 6:13)। परमेश्वर तुम्हें परीक्षा में नहीं ले जाएगा, परन्तु तुम स्वयं अपने आप को ले जा सकते हो। यदि तुम अपने आप को बुरे प्रभावों के सामने खोल देते हो, तो तुम परमेश्वर के पवित्र आत्मा को शोकित करते हो, और वह तुम्हें तुम्हारी मूर्खता का फल भोगने के लिये छोड़ सकता है। क्या तुरन्त बाड़े की मरम्मत कर लेना अधिक बुद्धिमानी न होगी?

एक और परिणाम भी है: भूमि ही खो सकती है। इंग्लैण्ड में टूटा हुआ बाड़ा किसी का स्वामित्व नहीं छीनता; परन्तु फ़िलिस्तीन में पहाड़ियों की ढलानों पर के खेत सीढ़ीदार बाड़ों के सहारे टिके रहते थे। जब वे बाड़े ढह जाते, तो मिट्टी एक-एक सीढ़ी करके खिसक जाती, और उसके साथ दाखलताएँ और पेड़ भी चले जाते।

फिर वर्षा मिट्टी को पूरी तरह बहा ले जाती, और केवल बंजर चट्टान रह जाती।

आत्मिक रूप से भी ऐसा ही है। कोई मनुष्य अपने आप की और परमेश्वर की बातों की उपेक्षा कर सकता है—सिद्धान्त और पवित्र जीवन के विषय में लापरवाह होकर—यहाँ तक कि भलाई करने की उसकी सामर्थ्य जाती रहती है। उसका मन, हृदय और बल मानो लुप्त हो जाते हैं। भविष्यद्वक्ता ने कहा, “एप्रैम एक भोली पंडुकी के समान हो गया है जिसके कुछ बुद्धि नहीं” (होशे 7:11)।

बहुत से लोग ऐसी ही भोली पंडुकियाँ हैं। जो मनुष्य धर्म से खिलवाड़ करता है, वह अपने प्राण से खिलवाड़ करता है, और जल्द ही गम्भीर विचार या उपयोगी सेवा के योग्य नहीं रहता।

इसलिए इस बुरे दिन में दृढ़ खड़े रहो। जब धार्मिक विचार कीचड़ के समान फिसलकर अविश्वास के मृत सागर में जा रहे हों, तब अपने जीवन, विश्वास और चरित्र के चारों ओर पक्के बाड़े बनाओ। “इसलिए स्थिर रहो” (इफिसियों 6:14), और सब कुछ पूरा करके स्थिर बने रहो। पवित्र आत्मा तुम्हें जड़ पकड़ाए और दृढ़ करे, ताकि तुम अपना साहस न छोड़ो, क्योंकि “उसका प्रतिफल बड़ा है” (इब्रानियों 10:35)।

अन्त में, मैं आलसी को जगाने का यत्न करूँ। उठने का समय हो गया है। सूरज ने ओस को पहले ही सुखा दिया है। तुम और “थोड़ी सी नींद” माँगते हो। यदि तुम थोड़ा और सोओगे, तो हो सकता है तुम तब तक न जागो जब तक दूसरे संसार में अपनी आँखें न उठाओ। अभी उठो। अपने बिस्तर से कूद पड़ो, इससे पहले कि वह तुम्हारी कब्र बन जाए।

अपने हृदय को देखो। उपेक्षा के कारण पाप खरपतवार के समान उग आए हैं। तुमने परमेश्वर और मसीह की उपेक्षा की है, यहाँ तक कि तुम संसारी, लापरवाह और उदासीन हो गए हो। तुम में से कुछ लोग कभी वह पवित्र नाम धारण करते थे; अब तुम संसार के समान दिखते हो। अपने उपेक्षित बाड़ों के परिणामों की जाँच करो। अपनी तुलना उन परिश्रमी विश्वासियों से करो—जो कदाचित् निर्धन और अनपढ़ हैं—जो विश्वासयोग्यता से मसीह की सेवा करते हैं। अपने सारे वरदानों और अवसरों के रहते भी तुम एक निकम्मे दास बन गए हो। क्या अब अपने आप को जगाने का समय नहीं आया?

उन दूसरों पर विचार करो जो कभी बाद में जागने का इरादा रखते थे। उनमें से कुछ खुले पाप में गिर पड़े और उन्होंने मसीह का अनादर किया। वे तुम से बस थोड़ा ही आगे गए थे। तुम्हारा हृदय भी लगभग वैसा ही है। वैसी ही परीक्षा में तुम भी उनके समान गिर सकते हो। आलसी अंगीकार करनेवाला किसी भी बात के लिये तैयार रहता है। आलसी हृदय शैतान की चिंगारियों के लिये सूखा ईंधन है।

प्रभु यीशु मसीह के आगमन को स्मरण करो। क्या वह तुम्हें सोता हुआ पाएगा? न्याय को स्मरण करो। जब स्वामी लौटेगा, तब तुम व्यर्थ गँवाए समय और काम में न लाए गए तोड़ों के लिये क्या बहाना दोगे?

और तुम, मेरे मित्र, जिसका अब तक मन-फिराव नहीं हुआ, यदि तुम अपने प्राण की चिन्ता किए बिना जीवन में बहते चले जाते हो, तो तुम निश्चय नाश हो जाओगे। “यदि धर्मी व्यक्ति ही कठिनता से उद्धार पाएगा, तो भक्तिहीन और पापी का क्या ठिकाना?”

(1 पतरस 4:18)। उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है; परन्तु अनुग्रह आलस्य या उदासीनता उत्पन्न नहीं करता। वह फुर्ती, जोश, उत्कटता, लगन और आत्म-त्याग उत्पन्न करता है।

परमेश्वर हमें यह दे कि उसका पवित्र आत्मा हम में वास करे, कि सब कुछ ठीक क्रम में हो जाए, हृदय से पाप उखाड़ दिए जाएँ, और सम्पूर्ण मनुष्य पवित्र करनेवाले अनुग्रह के द्वारा उन नाश करनेवालों से बचा रहे जो हर नीचे बाड़े के पास घात लगाए रहते हैं। हे प्रभु, दया करके हमें स्मरण कर। अपनी सामर्थ्य से हमारे चारों ओर बाड़ा बाँध। हमें उस आलस्य से बचा जो हमें बुराई के सामने खोल देगा, यीशु के निमित्त। आमीन।

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