अध्याय 1 · 28 मिनट का पठन
आलसी का खेत
“मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास होकर जाता था, तो क्या देखा, कि वहाँ सब कहीं कटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है, और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है।
तब मैंने देखा और उस पर ध्यानपूर्वक विचार किया; हाँ मैंने देखकर शिक्षा प्राप्त की।” — नीतिवचन 24:30-32 इसमें सन्देह नहीं कि सुलैमान को कभी-कभी यह अच्छा लगता होगा कि अपने राजसी वस्त्र उतारकर एक ओर रख दे, दरबार की औपचारिकताओं से छुटकारा पाए, और बिना पहचाने देहात में घूमता फिरे। ऐसे ही किसी अवसर पर उसने अपने एक देशवासी की छोटी-सी जागीर के टूटे हुए बाड़े के ऊपर से झाँककर देखा। उस भूमि में जोती हुई ज़मीन का एक टुकड़ा और एक दाख की बारी थी। एक ही दृष्टि में उसने जान लिया कि वह किसी आलसी की है जिसने उसकी सुधि नहीं ली। घास-पात घनी होकर उग आई थी और उसने सारी भूमि को ढाँप लिया था। इस दृश्य से सुलैमान ने शिक्षा पाई। साधारणतः लोग बुद्धि तभी सीखते हैं जब उनके पास पहले से बुद्धि होती है। चित्रकार की आँख किसी दृश्य में सुन्दरता इसलिए देखती है क्योंकि उसके मन में सुन्दरता बसी होती है। “जिस किसी के पास है, उसे और दिया जाएगा,” और उसके पास बहुत हो जाएगा, क्योंकि वह कटीले पेड़ों और बिच्छू पौधों से ढँके खेत से भी कटनी काट लेगा।
मन की आँख का उपयोग करने में एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच बड़ा अन्तर होता है। मेरे पास एक पुस्तक है जिसका नाम है एक शान्त आँख की कटनी, और वह अच्छी पुस्तक है। शान्त आँख की कटनी किसी आलसी की भूमि से भी उतनी ही बटोरी जा सकती है जितनी किसी सुव्यवस्थित खेत से। जब हम बच्चे थे, तब हमें आँखें और बिना आँखें नाम की एक छोटी-सी कविता सिखाई गई थी। उसमें बहुत सच्चाई थी। कुछ लोगों की आँखें तो होती हैं परन्तु वे देखते नहीं, और यह लगभग वैसा ही है जैसे आँखें हों ही नहीं। परन्तु दूसरों की आँखें शिक्षा खोज निकालने में बड़ी पैनी होती हैं। कुछ लोग केवल ऊपरी सतह को देखते हैं, जबकि दूसरे न केवल बाहरी छिलके को, वरन् बाहरी वस्तुओं के भीतर छिपी सत्य की जीवित गिरी को भी देख लेते हैं।
हम हर जगह शिक्षा पा सकते हैं। आत्मिक मन के लिये बिच्छू पौधों का भी अपना प्रयोजन है और घास-पात का भी अपना पाठ है। क्या काँटे और ऊँटकटारे पापी मनुष्यों को शिक्षा देने के लिये नहीं हैं?
क्या वे इसलिए भूमि से नहीं उगते कि हमें दिखाएँ कि पाप ने क्या कर डाला है, और जब हम परमेश्वर के विरुद्ध बलवे के बीज बोते हैं तो कैसी उपज निकलती है? “मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास होकर जाता था,” सुलैमान कहता है। “मैंने देखा और उस पर ध्यानपूर्वक विचार किया; हाँ मैंने देखकर शिक्षा प्राप्त की।” तुम जो कुछ भी देखो, उस पर ध्यानपूर्वक विचार करने की चौकसी करो, तब तुम्हारा देखना व्यर्थ न होगा।
तुम्हें हर जगह पुस्तकें और उपदेश मिलेंगे — भूमि पर और समुद्र में, पृथ्वी पर और आकाश में। तुम हर जीवित पशु, पक्षी, मछली और कीड़े से, और भूमि से उगनेवाले हर उपयोगी या निकम्मे पौधे से सीख सकते हो। जो बातें हमें नहीं भातीं, उनसे भी हम मूल्यवान पाठ बटोर सकते हैं। सुलैमान को निश्चय ही वे कटीले पेड़ और बिच्छू पौधे अच्छे नहीं लगे जिन्होंने दाख की बारी को ढाँप लिया था, फिर भी उसने उनमें शिक्षा पाई। बहुतों को बिच्छू पौधे डंक मारते हैं, परन्तु उनसे सीखते थोड़े ही हैं। कुछ लोग झाड़ियों से घायल हो जाते हैं, परन्तु यहाँ एक ऐसा मनुष्य था जिसे उनसे लाभ पहुँचा। बुद्धि में यह गुण है कि वह झाड़ियों से अंगूर और बिच्छू पौधों से अंजीर बटोर लेती है। जो पौधे अप्रिय और हानिकारक लगते हैं, उनसे भी वह भलाई निकाल लेती है।
काँटों की शिकायत मत करो; वरन् उनसे लाभ उठाओ। बिच्छू पौधों से अपने आप को डंक मत लगवाओ; उन्हें दृढ़ता से पकड़ो और अपने प्राण के स्वास्थ्य के लिये उनका उपयोग करो।
परीक्षाएँ और क्लेश, चिन्ताएँ और उलझनें, छोटी-छोटी झुँझलाहटें और निराशाएँ — यदि तुम उन्हें अवसर दो तो ये सब तुम्हारी सहायता कर सकती हैं। सुलैमान के समान उन्हें देखो और उन पर ध्यानपूर्वक विचार करो — उन पर दृष्टि करो और शिक्षा पाओ। जहाँ तक हमारी बात है, हम अब पहले सुलैमान के द्वारा किए गए आलसी के वर्णन पर विचार करेंगे: वह “निर्बुद्धि मनुष्य” है। दूसरे, हम आलसी की भूमि के उसके वर्णन पर ध्यान देंगे: “वहाँ सब कहीं कटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है।” जब हम इन दोनों बातों पर विचार कर चुकेंगे, तब अन्त में वह शिक्षा बटोरेंगे जो यह उपेक्षित भूमि हमें दे सकती है।
पहले, सुलैमान के द्वारा किए गए आलसी मनुष्य के वर्णन के विषय में सोचो। सुलैमान ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसकी बात हम काटें, क्योंकि उसमें बड़ी बुद्धि थी, और उसने नीतिवचन की पुस्तक ईश्वरीय प्रेरणा से लिखी। सुलैमान कहता है कि आलसी “निर्बुद्धि मनुष्य” है। आलसी मनुष्य स्वयं ऐसा नहीं सोचता।
वह अपने हाथ जेबों में डाले रहता है, और उसके आत्मविश्वास भरे ढंग को देखकर तुम सोचोगे कि बैंक ऑफ इंग्लैंड उसी का है। अपनी दृष्टि में वह बड़ा बुद्धिमान है और ऐसे चलता-फिरता है मानो दूसरों पर अपनी तथाकथित योग्यता की छाप छोड़ना चाहता हो। यह बुद्धि उसने कैसे पाई, यह कहना कठिन है। उसने सोचने का कष्ट कभी उठाया ही नहीं। मैं यह नहीं कह सकता कि वह उछलकर निष्कर्षों पर पहुँच जाता है, क्योंकि वह कभी उछलता ही नहीं; वह तो बस आलस्य से उनमें धँसकर बैठ जाता है। फिर भी वह मानता है कि वह सब कुछ जानता है और हर प्रश्न का निपटारा कर चुका है।
मनन करना उसके लिये बहुत परिश्रम का काम है। विद्या पाने का कष्ट सहने को वह कभी तैयार नहीं हुआ।
फिर भी वह अपने आप को स्वभाव से ही चतुर समझकर प्रसन्न होता है। वह जितना जानता है उससे अधिक जानना नहीं चाहता, क्योंकि उसकी अपनी समझ में वह पर्याप्त जानता है — यद्यपि सच तो यह है कि वह कुछ भी नहीं जानता।
यह कहावत चापलूसी भरी नहीं है, परन्तु सुलैमान ने उसे “निर्बुद्धि मनुष्य” कहकर ठीक ही किया।
आज के शिष्ट समाज के अनुसार यह बात कठोर लग सकती है, विशेषकर इसलिए कि उस मनुष्य के पास एक खेत और एक दाख की बारी थी। जैसी कहावत है, “जब मेरे पास एक घोड़ा और एक गाय होती है, तो हर कोई मुझे नमस्कार करता है।”
जिस मनुष्य के पास भूमि और सम्पत्ति हो, उसके विषय में यह कैसे कहा जा सकता है कि उसमें समझ की कमी है? क्या साधारणतः यह नहीं माना जाता कि मनुष्य की बुद्धि उसके धन से नापी जाती है? धन के साथ प्रायः तथाकथित योग्यता की प्रशंसा भी चली आती है। संसार की रीति यही है।
परन्तु पवित्रशास्त्र की रीति यह नहीं है। चाहे उसके पास खेत और दाख की बारी हो या न हो, सुलैमान कहता है कि यदि वह आलसी है तो वह मूर्ख है — या सीधे शब्दों में कहें तो, वह समझ से खाली है।
वह न केवल समझता नहीं, वरन् उसमें समझने की क्षमता भी नहीं है। यदि वह आलसी है, तो उसका सिर खाली है। उसे सज्जन कहा जा सकता है। वह ज़मींदार हो सकता है। उसके पास दाख की बारी और खेत हो सकते हैं।
फिर भी ये सम्पत्तियाँ उसे कुछ भी अच्छा नहीं बनातीं। वरन् वे उसे और बुरा बना देती हैं, क्योंकि वह निर्बुद्धि मनुष्य है और इसलिए जो कुछ उसके पास है उसका ठीक उपयोग नहीं कर सकता।
मैं आनन्दित हूँ कि सुलैमान हमें इतनी स्पष्टता से बताता है कि आलसी मनुष्य निर्बुद्धि है, क्योंकि यह उपयोगी जानकारी है। मैं ऐसे लोगों से मिला हूँ जो समझते थे कि वे अनुग्रह के सिद्धान्तों को पूरी तरह समझते हैं। वे पवित्र लोगों के चुनाव, परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण, ईश्वरीय आज्ञप्ति की निश्चितता, आत्मा के कार्य की अनिवार्यता, और उन सब महिमामय सिद्धान्तों को जो हमारे विश्वास का ढाँचा खड़ा करते हैं, स्पष्ट रूप से समझा सकते थे।
फिर भी इन सच्चाइयों से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि उन्हें कुछ करना ही नहीं है, और इस प्रकार वे आलसी बन गए।
कुछ न करना ही उनका धर्ममत बन गया। वे दूसरों को भी प्रभु के लिये परिश्रम करने को प्रोत्साहित नहीं करते थे, क्योंकि वे कहते थे, “परमेश्वर अपना काम आप करेगा। उद्धार पूरी तरह अनुग्रह से है।”
उनका विचार यह था कि मनुष्य को बस प्रतीक्षा करनी चाहिए और कुछ नहीं करना चाहिए — चुपचाप बैठा रहे और स्वर्गीय सहायता की आशा करते हुए घास को टखनों तक बढ़ने दे। उनकी दृष्टि में, स्वयं को उद्यम में लगाना परमेश्वर की अनन्त योजना में हस्तक्षेप करना होता।
मैंने ऐसे मनुष्य को मुँह बिचकाते, अपना बूढ़ा सिर हिलाते, और उन उत्साही विश्वासियों के विरुद्ध कठोर बातें कहते देखा है जो आत्माओं को जीतने का प्रयत्न कर रहे थे। मैंने उसे जवानों का साहस तोड़ते और, भाप से चलनेवाले भारी हथौड़े के समान, उन्हें भ्रष्ट-मत और अज्ञानी कहकर कुचलते देखा है।
ऐसे हठधर्मी व्यक्ति की आलोचना हम कैसे सहें? इस तथाकथित ज्ञानी और दोष ढूँढ़नेवाले आलसी से हम कैसे बचें? सुलैमान हमारी सहायता को आता है और यह घोषणा करके उसका मुँह बन्द कर देता है कि वह निर्बुद्धि है। वह स्वयं को खरी शिक्षा का मापदण्ड समझकर बाकी सब का न्याय कर सकता है, फिर भी सुलैमान एक दूसरा मापदण्ड लगाता है और कहता है कि उसमें समझ की कमी है। वह सिद्धान्त को जानता तो हो सकता है, परन्तु उसे सचमुच समझता नहीं। यदि समझता, तो जानता कि अनुग्रह के सिद्धान्त हमें उसी अनुग्रह को खोजने की ओर ले जाते हैं जिसका वे प्रचार करते हैं।
जब हम परमेश्वर को काम करते देखते हैं, तो सीखते हैं कि वह हम में काम करता है — हमें आलसी बनाने के लिये नहीं, परन्तु इसलिए कि अपनी सुइच्छा निमित्त हमारे मन में “इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव” डाले (फिलिप्पियों 2:13)। परमेश्वर ने जो एक प्रजा को पहले से ठहराया है, उसका अर्थ यह है कि उसने उन्हें “भले कामों के लिये” ठहराया है (इफिसियों 2:10), ताकि वे उसकी स्तुति प्रगट करें। यदि तुम या मैं किसी भी सिद्धान्त से — चाहे वह कितना ही सच्चा क्यों न हो — यह निष्कर्ष निकालें कि हम परमेश्वर की बातों के विषय में आलसी और उदासीन रह सकते हैं, तो हम में समझ की कमी है। हम सुसमाचार का दुरुपयोग करते हैं। जो पोषण के लिये दिया गया था, उसे हम विष बना देते हैं। आलसी, चाहे वह अपने काम-धन्धे में सुस्त हो या अपने प्राण के विषय में लापरवाह, निर्बुद्धि मनुष्य है।
साधारण नियम के रूप में, हम किसी व्यक्ति की समझ को उसकी उपयोगी सक्रियता से नाप सकते हैं। कुछ लोग अपने आप को “सुसंस्कृत” कहते हैं, फिर भी वे किसी भी चीज़ की खेती नहीं करते। मैंने जो देखा है, उसके अनुसार आज का बहुत-सा विचार बोतल में बन्द धुएँ के समान है — देखने में प्रभावशाली, परन्तु ठोस कुछ भी उत्पन्न नहीं करता। ऐसे लोग हैं जो विश्लेषण कर सकते हैं, वाद-विवाद कर सकते हैं, बाल की खाल निकाल सकते हैं और खण्डन कर सकते हैं, परन्तु इसी बीच खेत की रेघारियों में धतूरा उग आता है और हल बिना काम के पड़ा-पड़ा जंग खा जाता है। यदि तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारी संस्कृति या तुम्हारी शिक्षा तुम्हें अपनी पीढ़ी में व्यावहारिक रूप से परमेश्वर की सेवा करने की ओर नहीं ले जाती, तो तुमने वह नहीं सीखा जिसे सुलैमान बुद्धि कहता है। तुम उस धन्य जन के समान नहीं हो — जो देहधारी बुद्धि है — जिसके विषय में लिखा है, “वह भलाई करता फिरा” (प्रेरितों के काम 10:38)।
आलसी व्यक्ति हमारे उद्धारकर्ता के समान नहीं है, जिसने कहा, “मेरा पिता परमेश्वर अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूँ।” (यूहन्ना 5:17)। सच्ची बुद्धि व्यावहारिक होती है। खोखली संस्कृति केवल बोलती और सिद्धान्त गढ़ती है।
बुद्धि अपना खेत जोतती है। बुद्धि अपनी दाख की बारी की गुड़ाई करती है। बुद्धि अपनी फसलों की रखवाली करती है। बुद्धि हर वस्तु का सबसे अच्छा उपयोग करती है। जो ऐसा नहीं करता, वह चाहे जितने ज्ञान का दावा करे, निर्बुद्धि मनुष्य है। उसमें समझ की कमी क्यों है? क्या इसलिए नहीं कि उसके पास ऐसे अवसर हैं जिनका वह उपयोग नहीं करता? उसका दिन आ गया है और बीतता जा रहा है, फिर भी वह घड़ियों को निरुद्देश्य फिसल जाने देता है। हम में से हर एक अपने आप को गम्भीरता से जाँचे। क्या मैं बीतते हुए पलों का उपयोग कर रहा हूँ? इस मनुष्य के पास दाख की बारी थी, परन्तु उसने उसकी खेती नहीं की। उसके पास खेत था, परन्तु उसने उसे नहीं जोता। क्या हम अपने अवसरों का उपयोग करते हैं? हम में से हर एक में परमेश्वर की सेवा करने की कुछ न कुछ योग्यता है। क्या हम उसे काम में लाते हैं?
यदि हम उसकी सन्तान हैं, तो उसने हमें ऐसी जगह नहीं रखा जहाँ हमें निकम्मा ही रहना पड़े। उसने हमें कोई न कोई स्थान दिया है जहाँ हम उस ज्योति से चमक सकें जो उसने हमें दी है, चाहे वह एक छोटी-सी मोमबत्ती ही क्यों न हो। क्या हम चमक रहे हैं? क्या हम “सब जलाशयों के पास बीज बोते” हैं? क्या हम भोर को अपना बीज बोते हैं और साँझ को भी अपना हाथ नहीं रोकते? (सभोपदेशक 11:6) यदि नहीं, तो सुलैमान का निर्णय अटल है: आलसी निर्बुद्धि मनुष्य है; समझ से खाली मनुष्य। इस मनुष्य के पास ऐसे अवसर थे जिनका उसने उपयोग नहीं किया। उसके ऐसे कर्तव्य भी थे जिन्हें उसने पूरा नहीं किया। जब परमेश्वर ने हर इस्राएली को भूमि का एक भाग दिया, तो उसका यह अभिप्राय नहीं था कि वह उजाड़ पड़ी रहे, वरन् यह कि उसकी खेती की जाए।
जब परमेश्वर ने आदम को अदन की वाटिका में रखा, तो वह केवल उसकी सुन्दरता निहारने के लिये नहीं था, वरन् इसलिए कि “उसमें काम करे और उसकी रखवाली करे” (उत्पत्ति 2:15)। इसी प्रकार हर इस्राएली की भूमि को विश्वासयोग्य परिश्रम के द्वारा अपनी पूरी उपज तक पहुँचना था। स्वामित्व अपने साथ उत्तरदायित्व लाया। आलसी उस उत्तरदायित्व में चूक गया, और इसलिए उसमें समझ की कमी थी।
तुम्हारी भूमिका क्या है? पिता? स्वामी? सेवक? प्रचारक? शिक्षक? इन भूमिकाओं में तुम्हारे अपने खेत और दाख की बारियाँ हैं। यदि तुम उनका ठीक उपयोग करने में चूकते हो, तो तुम अपने अस्तित्व के उद्देश्य की उपेक्षा करते हो और उस बुलाहट से पीछे रह जाते हो जो परमेश्वर ने तुम्हें दी है। उस आलसी किसान के पास ऐसी योग्यताएँ भी थीं जिनका उसने उपयोग नहीं किया। यदि वह चाहता तो अपनी भूमि जोत सकता था। वह रोगी नहीं था; वह बस अपनी इच्छा से आलसी था।
परमेश्वर हम से वह नहीं माँगता जो हमारे पास नहीं है। “उसके अनुसार ग्रहण भी होता है जो उसके पास है न कि उसके अनुसार जो उसके पास नहीं” (2 कुरिन्थियों 8:12)। जिस मनुष्य को दो तोड़े मिले हैं, उससे पाँच उत्पन्न करने की आशा नहीं की जाती, परन्तु उससे यह आशा अवश्य की जाती है कि वह अपने दोनों का उपयोग करे। इस आलसी ने वह करने का प्रयत्न भी करने से इनकार किया जो स्पष्ट रूप से उसके बस में था। बहुतों की योग्यताएँ सोई पड़ी हैं। दूसरे अपने वरदानों का उपयोग उस देनेवाले के लिये नहीं, वरन् अपने लिये करते हैं। यदि परमेश्वर ने हमें भलाई करने की कोई भी सामर्थ्य दी है, तो आओ, हम उसका उपयोग करें। यह संसार थका हुआ और दुष्ट है। ऐसे अन्धकार में हमें जुगनू की ज्योति को भी नहीं छिपाना चाहिए। भ्रम से भरे संसार में हमें सत्य का एक भी वचन नहीं रोकना चाहिए।
हमारी आवाज़ चाहे कितनी ही निर्बल क्यों न हो, आओ, हम उसे सत्य और धार्मिकता के लिये ऊँचा करें। आओ, अवसरों की उपेक्षा करके, कर्तव्यों को अनदेखा करके, और अपनी योग्यताओं का उपयोग न करके हम निर्बुद्धि न बनें। प्राण के विषयों में आलसी विशेष रूप से निर्बुद्धि है, क्योंकि वह उन बातों से खिलवाड़ करता है जिनमें अत्यन्त गम्भीरता चाहिए।
क्या तुमने अपने हृदय की खेती कभी नहीं की? क्या हल ने तुम्हारे प्राण की कठोर मिट्टी को कभी नहीं तोड़ा? क्या वचन का बीज कभी बोया ही नहीं गया — या उसने जड़ ही नहीं पकड़ी?
क्या तुमने लालसा के नये अंकुरों को कभी नहीं सींचा? क्या पाप के घास-पात को उखाड़ने का कभी प्रयत्न नहीं किया? तुम दर्पण के सामने समय बिताकर अपने शरीर की देखभाल करते हो, परन्तु अपने प्राण की उपेक्षा करते हो। तुम उस देह को सजाते हो जो शीघ्र ही मिट्टी में मिल जाएगी, जबकि तुम्हारा प्राण बिना धुला और बिना देखभाल के पड़ा रहता है। यह सबसे बड़ी मूर्खता है। जो अपने हृदय की दाख की बारी के विषय में आलसी है, वह सचमुच निर्बुद्धि है।
और यदि तुम मसीही हो, सचमुच उद्धार पाए हुए, फिर भी प्रभु के काम में लापरवाह, तो तुम थोड़ी ही समझ दिखाते हो। यदि तुम खोई हुई आत्माओं के संकट को जानते हो, तो उन्हें बचाने के लिये जतन क्यों नहीं करते? समय रुकता नहीं। मृत्यु रुकती नहीं। नरक रुकता नहीं। शैतान निठल्ला नहीं बैठा। अन्धकार की शक्तियाँ सक्रिय हैं। तो फिर यदि स्वामी ने हमें अपनी दाख की बारी में रखा है, तो हम सुस्त कैसे रह सकते हैं? यदि हम परमेश्वर के असीम प्रेम के द्वारा बचाए गए हैं, तो क्या हमें उसकी सेवा में खर्च नहीं करना, वरन् आप भी खर्च नहीं हो जाना चाहिए? बातों का क्रम ही यह माँग करता है कि उद्धार पाया हुआ व्यक्ति उत्साही हो।
जो मसीही सेवा में आलसी है, वह नहीं जानता कि वह क्या खो रहा है। परमेश्वर के साथ संगति का सबसे समृद्ध भाग परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण हृदय से समर्पण है। कुछ लोगों के पास बस इतना ही धर्म होता है कि यह सन्देह बना रहे कि उनके पास कुछ है भी या नहीं। वे थोड़ी-सी भक्ति तो दिखाते हैं, परन्तु आत्मा के कार्य का प्रमाण थोड़ा ही होता है। हमें मसीह को प्रतिबिम्बित करना है। परन्तु कुछ लोग इसके बदले उसकी निन्दा कराते हैं। जब हम आलसी सेवकों को देखते हैं, तो मान लेते हैं कि उनका स्वामी भी उदासीन होगा।
संसार कभी यह न सोचे कि मसीह दुःख के प्रति उदासीन है या उसमें उत्साह की कमी है। फिर भी यदि उसकी सेवा का दावा करनेवाले निरे आलसी हों, तो वे ऐसा ही सोच सकते हैं। आलसी व्यक्ति सेवा के आदर और आनन्द दोनों को खो देता है। जिस काम से प्रेम रखने का वह दावा करता है, उसका वह अनादर करता है, और अपने मरने के तकिये के लिये काँटे तैयार करता है।
यह बात पक्की ठहरे: आलसी, चाहे वह प्रचारक हो, सेवक (डीकन) हो, या साधारण मसीही, निर्बुद्धि मनुष्य है।
अब, दूसरे, आओ हम आलसी की भूमि पर विचार करें: “मैं आलसी के खेत के पास से और निर्बुद्धि मनुष्य की दाख की बारी के पास होकर जाता था, तो क्या देखा, कि वहाँ सब कहीं कटीले पेड़ भर गए हैं; और वह बिच्छू पौधों से ढँक गई है, और उसके पत्थर का बाड़ा गिर गया है।” (नीतिवचन 24:30-31) भूमि सदा कुछ न कुछ उपजाएगी। जो मिट्टी खेत या दाख की बारी के योग्य है, वह किसी न किसी प्रकार का फल देगी। इसी प्रकार हमारे हृदय और हमारे प्रभाव के क्षेत्र भी कुछ न कुछ उपजाएँगे। हम कोरे बनकर नहीं जी सकते। हम या तो भलाई करेंगे या बुराई।
यदि तुम मसीह के काम में निठल्ले हो, तो तुम शैतान के काम में सक्रिय हो। सोते रहकर आलसी ने किसी भी परिश्रम की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह काँटों की खेती की। यदि हम मसीह के लिये गेहूँ नहीं उपजाते, तो हम ऐसा घास-पात उगाएँगे जो केवल जलाने के योग्य है। यदि प्राण की खेती परमेश्वर के लिये नहीं की जाती, तो वह अपना स्वाभाविक फल उपजाएगा।
और वह स्वाभाविक फल क्या है? पाप और दुर्दशा। यदि बच्चों को बिना शिक्षा के छोड़ दिया जाए, तो वे क्या उपजाएँगे? यदि किसी नगर को सुसमाचार के बिना छोड़ दिया जाए, तो वहाँ क्या उगेगा? अपराध और भ्रष्टता। कटनी तो सदा होगी। यदि हम आलसी हैं, तो वह कटनी स्वयं हमारे लिये भी पीड़ादायक होगी। काँटों पर कोई चैन से विश्राम नहीं करता। जब तुम सोते हो, तब शैतान बोता है। यदि तुम अच्छा बीज रोक रखोगे, तो वह बुरा बीज खुले हाथ बिखेरेगा। उससे पछतावा उत्पन्न होगा, कदाचित् अनन्तकाल तक के लिये।
“वह तेरे लिये काँटे और ऊँटकटारे उगाएगी” (उत्पत्ति 3:18)। प्रायः बुरी उपज बहुतायत से होती है। अच्छी भूमि की यदि उपेक्षा की जाए तो वह बहुत घास-पात उपजाती है। जो व्यक्ति परमेश्वर के लिये बहुत कुछ कर सकता था, यदि उसे निठल्ला छोड़ दिया जाए तो वह बहुत हानि करेगा। सबसे अच्छी वस्तु उपेक्षित होकर सबसे बुरी बन जाती है। यदि तुम उद्धार चाहते हो, तो तुम्हें मार्ग दिखाने के लिये प्रयत्न करना पड़ता है। परन्तु यदि तुम नाश होना चाहते हो, तो उसके लिये केवल उपेक्षा ही पर्याप्त है: “हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से उपेक्षा करके कैसे बच सकते हैं?” (इब्रानियों 2:3) आलसी कहता है, “छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के लेटे रहना” (नीतिवचन 24:33), और काँटे अनगिनत बढ़ जाते हैं और उसके लिये बहुत-से डंक तैयार कर रखते हैं।
जब हम आलसी मनुष्य की दाख की बारी को देखते हैं, तो आओ, भक्तिहीन आलसी के हृदय में भी झाँकें। उसे मन फिराव और विश्वास की कोई चिन्ता नहीं। अपने प्राण या अनन्तकाल के विषय में गम्भीरता से सोचना उसके लिये बहुत परिश्रम का काम है। वह जीवन को आराम से बिताना पसन्द करता है, “थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के लेटे रहना।” उसके मन और चरित्र में क्या उग रहा है? इन आत्मिक आलसियों में से कुछ में तुम मतवालापन, अशुद्धता, लोभ, क्रोध, घमण्ड, और बहुत-से दूसरे ऊँटकटारे और बिच्छू पौधे देखते हो। दूसरों में, जहाँ प्रतिष्ठित वातावरण ऐसे प्रगट पापों को रोके रहता है, तुम्हें बुराई की अलग-अलग किस्में मिलती हैं। हृदय खाली नहीं रह सकता। या तो मसीह उसमें बसेगा या शैतान। मेरे मित्र, यदि तुमने परमेश्वर के पक्ष में निर्णय नहीं किया है, तो तुम तटस्थ नहीं रह सकते। इस संघर्ष में हर व्यक्ति या तो परमेश्वर के साथ खड़ा है या उसके विरुद्ध।
तुम कागज़ के कोरे पन्ने के समान नहीं रह सकते। शैतान की स्पष्ट लिखावट तुम पर है; क्या तुम उसके चिह्न नहीं देख सकते? जब तक मसीह ने उस पन्ने पर अपना अनुग्रहकारी नाम नहीं लिख दिया, तब तक शैतान के हस्ताक्षर बने रहते हैं। तुम कह सकते हो, “मैं खुले पाप में नहीं जीता; मैं सदाचारी हूँ।” फिर भी यदि तुम अपने हृदय को ध्यान से जाँचो, तो तुम्हें परमेश्वर और उसके मार्गों के प्रति बैर दिखाई देगा। तुम न उसकी व्यवस्था से प्रेम रखते हो, न उसके पुत्र से, न उसके सुसमाचार से। तुम मन से उससे दूर हो गए हो, व्यर्थ विचारों और गलत अभिलाषाओं से भरे हुए हो।
जब तक तुम आत्मिक आलसी बने रहोगे और अपने हृदय को बिना जोते छोड़े रहोगे, तब तक ये बढ़ते और फैलते जाएँगे। परमेश्वर का आत्मा तुम्हें जगाए। वह तुम्हें गम्भीर और सच्चे मनन के लिये उभारे।
तब तुम देखोगे कि इन हानिकारक उपजों को जड़ से उखाड़ना होगा, कि तुम्हारे हृदय को पाप के बोध के द्वारा तोड़ा जाना चाहिए, और उसमें सुसमाचार का अच्छा बीज बोया जाना चाहिए, जब तक कि वह उस महान किसान के लिये कटनी न दे। मित्र, यदि तुम मसीह पर विश्वास करते हो, तो मुझे अपने हृदय में भी झाँकने दो, विशेषकर यदि तुम सुस्त मसीही हो। मुझे डर है कि वहाँ भी बिच्छू पौधे और ऊँटकटारे उग रहे होंगे। क्या मैंने तुम्हें हाल ही में यह गाते नहीं सुना, “यही बात है जिसे जानने को मैं तरसता हूँ”? वह प्रश्न तुम्हें प्रायः सताएगा, क्योंकि निठल्ले मन में सन्देह सहज ही उग आता है।
मुझे स्मरण नहीं कि मैंने जॉन वेस्ली की डायरी में कहीं पढ़ा हो कि उसने अपने उद्धार पर सन्देह किया। वह अपने स्वामी की कटनी में इतना व्यस्त था कि उसे अपने परमेश्वर पर अविश्वास करने की बात सूझी ही नहीं।
कुछ मसीहियों में विश्वास थोड़ा इसलिए है क्योंकि उन्होंने राई का वह दाना कभी बोया ही नहीं जो उन्हें दिया गया था।
यदि तुम अपने विश्वास का उपयोग नहीं करते, तो वह बढ़ेगा कैसे? जब मसीह की सेवा में विश्वास को सक्रिय रूप से काम में लाया जाता है, तो वह जड़ पकड़ता है, बलवन्त होता है, और अन्त में सन्देह को दबा देता है। दूसरे लोग उदास आशंकाओं से पीड़ित रहते हैं। वे असन्तुष्ट, चिड़चिड़े, स्वार्थी और कुड़कुड़ानेवाले बन जाते हैं — प्रायः इसलिए कि वे निठल्ले हैं। यही वह घास-पात है जो आलसी की बारी में उगता है।
मैंने ऐसे आलसी विश्वासियों को जाना है जो इतने चिड़चिड़े हो गए कि उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। सबसे उत्साही मसीही भी उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर सकता था। सबसे प्रेमी विश्वासी भी उनकी दृष्टि में कभी पर्याप्त स्नेही नहीं थे। सबसे सक्रिय कलीसिया भी कभी पर्याप्त जोशीली नहीं थी। वे हर जगह दोष ढूँढ़ते थे, वहाँ भी जहाँ परमेश्वर स्पष्ट रूप से काम कर रहा था। आलोचना, झगड़े और लगातार कुड़कुड़ाने की यह आत्मा उन बिच्छू पौधों में से एक है जो आत्मिक आलस्य के स्थान पर निश्चय ही उगते हैं।
यदि तुम्हारा हृदय परमेश्वर के लिये फल नहीं लाता, तो वह निश्चय ही ऐसी उपज उपजाएगा जो तुम्हें और दूसरों को हानि पहुँचाती है।
काँटे प्रायः अच्छे बीज को दबा देते हैं, परन्तु यह धन्य बात है जब अच्छा बीज इतनी बहुतायत से उगता है कि वह काँटों को दबा देता है। परमेश्वर कुछ विश्वासियों को इतना फलवन्त बना देता है कि जब शैतान जंगली दाने बोता है, तो वे उग नहीं पाते। पवित्र आत्मा हृदय में बुराई को इतना निर्बल कर देता है कि वह फिर प्रभुता नहीं करती। यदि तुम आलसी हो, तो अपने हृदय के खेत को जाँचो और जो कुछ देखो उस पर शोक करो।
अब अपने घर पर विचार करो। यह गम्भीर बात है जब कोई व्यक्ति अपने ही परिवार की खेती करने में चूक जाता है।
अपने आरम्भिक दिनों में मैं एक ऐसे मनुष्य को जानता था जो प्रायः उन गाँवों में मेरे साथ जाया करता था जहाँ मैं प्रचार करता था। मुझे उसका साथ अच्छा लगता था, जब तक कि मैंने उसके विषय में और अधिक नहीं जान लिया। वह हर साँझ सभाओं में जाता था, फिर भी अपने बहुत-से बच्चों की उपेक्षा करता था। वे भक्तिहीन जवान बन गए, क्योंकि उनके पिता ने उन्हें मसीह तक ले जाने का कभी प्रयत्न नहीं किया। यदि घर में उपेक्षा है, तो बाहर के उत्साह से क्या लाभ? यह कहना कितना दुःखद है, “मैंने अपनी निज दाख की बारी की रखवाली नहीं की” (श्रेष्ठगीत 1:6)।
मैंने एक बार एक ऐसे मनुष्य के विषय में सुना जिसने अपने बच्चों को परमेश्वर के विषय में सिखाने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह उनके मन में पहले से कोई झुकाव नहीं डालना चाहता था। वह चाहता था कि वे आगे चलकर अपना धर्म स्वयं चुनें। उसके एक बेटे की बाँह टूट गई, और जब डॉक्टर उसे बैठा रहा था, तब वह लड़का गालियाँ बक रहा था। डॉक्टर ने कहा, “तुम अपने बेटे के मन में भलाई की ओर झुकाव डालने से डरते रहे, परन्तु शैतान को ऐसी कोई झिझक नहीं थी।” यह हमारा कर्तव्य है कि हम खेत की खेती अच्छी फसल के पक्ष में करें, नहीं तो उस पर शीघ्र ही घास-पात छा जाएगा। बच्चे को भलाई की ओर चलाओ, नहीं तो वह स्वभाव से ही बुराई की ओर बह जाएगा। जैसा घरों के साथ है, वैसा ही पाठशालाओं के साथ भी है। एक मनुष्य जो बाद में इस कलीसिया में सम्मिलित हुआ, पहले नास्तिक था। वह अपने अविश्वास का कुछ कारण अपनी पाठशाला के अनुभव को मानता था।
रविवार को लड़कों को गिरजे की एक दूर की दीर्घा में बन्द कर दिया जाता था जहाँ वे मुश्किल से एक शब्द भी सुन पाते थे। वे अन्तहीन प्रार्थनाएँ सहते थे, परन्तु कोई भी बात उनके हृदय को नहीं छूती थी। अन्त में वह धर्म से इतना ऊब गया कि उसने ठान लिया कि छूटते ही वह उसे छोड़ देगा। संडे-स्कूल के शिक्षकों को सावधान रहना चाहिए।
कक्षाएँ इतनी नीरस बनाई जा सकती हैं कि बच्चे रविवार से ही अरुचि करने लगें। युवा हृदयों को मसीह तक लाए बिना समय व्यर्थ गँवाया जा सकता है।
कुछ मसीही माता-पिताओं ने अपनी कठोरता और कोमलता की कमी के द्वारा प्रेम के बदले कड़वाहट के बीज बोए हैं। हम अपने बच्चों के बीच ऐसे रहें कि वे न केवल हम से, वरन् स्वर्ग में रहनेवाले हमारे पिता से भी प्रेम करें। माता-पिता प्रसन्न और सच्चा विश्वास दिखाएँ, ताकि बच्चे उनके उदाहरण पर चलने की इच्छा करें। यदि घर में विश्वास राज्य नहीं करता, तो हम अव्यवस्था, घमण्ड, मूर्खता और बुराई के आरम्भ देखेंगे। अपने घर को आलसी का खेत न बनने दो। हर सेवक (डीकन), कक्षा-अगुवा और प्रचारक उस खेत को जाँचे जो उसे सौंपा गया है। यदि हम अपने उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करते हैं, तो हम उन बाँझ पेड़ों के समान हो जाते हैं जो उस भूमि को रोके रहते हैं जिसका उपयोग फलवन्त पेड़ कर सकते थे। जब तक हम सच्ची सेवा नहीं करते, तब तक हम सहायता करने के बदले बाधा ही डालेंगे। इस पर गम्भीरता से विचार करो। तुम तटस्थ नहीं रह सकते। यदि तुम कोई लाभ नहीं कमाते, तो तुम हानि उत्पन्न करते हो। परमेश्वर ऐसा करे कि हम लाभदायक दास बनें।
अब संसार के विशाल खेत को देखो। देखो, वह किस प्रकार कटीले पेड़ों से भर गया है। विशाल प्रदेश भ्रम, अविश्वास और झूठे धर्म से ढँके हुए हैं। संसार क्रूरता, अत्याचार, अशुद्धता और दुर्दशा से भरा पड़ा है। इसमें से कितना कुछ एक लापरवाह कलीसिया के कारण है? लगभग दो हज़ार वर्ष बीत गए हैं, फिर भी दाख की बारी का बहुत-सा भाग अब भी घास-पात से भरा पड़ा है। जहाँ कहीं कलीसिया ने मिशनरी परिश्रम बन्द किया, वहीं उसका पतन हुआ। जब वह जंगल को फिर से खेती योग्य बनाना छोड़ देती है, तो वह स्वयं बाँझ हो जाती है। यह पूछने के बदले कि कलीसिया ने बीती शताब्दियों में क्या किया, आओ हम यह पूछें कि हम अब क्या करेंगे।
क्या हम उसी भूमि को बार-बार जोतते रहेंगे जबकि विशाल खेत अछूते पड़े हैं? परमेश्वर हमें हमारी सुस्ती से जगाए। नहीं तो विवरण यह हो सकता है: “मैं सुस्त कलीसियाके खेत के पास से होकर जाता था, तो क्या देखा, कि वहाँ सब कहीं कटीले पेड़ भर गए हैं।” इसमें एक पाठ है। अपने आप पर छोड़ दिए जाने पर मानव स्वभाव केवल काँटे और बिच्छू पौधे ही उपजाता है। अनुग्रह के बिना हम केवल यही उपजाते। यदि अब हम अच्छा फल लाते हैं, तो यह पूरी तरह अनुग्रह के कारण है। तो आओ, हम अपने जीवन में अनुग्रह का फल प्रगट करें। क्या हम मसीह की सेवा उससे कम उत्साह से करेंगे जितने उत्साह से हमने कभी पाप की सेवा की थी? क्या हम उसके लिये उससे कम त्याग करेंगे जितना हमने अपनी पुरानी अभिलाषाओं के लिये किया था? पवित्र आत्मा हम में बहुतायत से फल उत्पन्न करे।
हम यह भी सीखते हैं कि कर्म के बिना अच्छे इरादे कितने खोखले होते हैं। यह मनुष्य सदा यही सोचता रहा कि किसी दिन कड़ा परिश्रम करेगा। उसने कहा, “छोटी सी नींद, एक और झपकी, थोड़ी देर हाथ पर हाथ रख के लेटे रहना” (नीतिवचन 24:33)। बस थोड़ी-सी देर — फिर वह आरम्भ करेगा। परन्तु वह दिन कभी नहीं आया। बहुत-से लोग गम्भीर उपदेश सुनते हैं और उनका प्रत्युत्तर देने का इरादा करते हैं। वे “किसी दिन” परमेश्वर की ओर फिरने का विचार रखते हैं। कुछ ने चालीस वर्ष तक टाल-मटोल की है। तुम कब फिरोगे? “मरने से पहले,” तुम कहते हो। क्या तुम इसे अपनी अन्तिम घड़ी तक टालोगे? क्या यह बुद्धिमानी है? तुम अचानक मर सकते हो। जीवन अनिश्चित है। छोटी-छोटी देरियों से सावधान रहो। तुम पहले ही बहुत समय गँवा चुके हो। अभी निर्णय करो। पवित्र आत्मा तुम्हें निर्णय तक पहुँचाए।
“निश्चय तुम्हें इस पर तो आपत्ति नहीं होगी कि मैं थोड़ा और सो लूँ?” आलसी कहता है। “तुमने मुझे इतनी जल्दी जगा दिया। मैं बस एक और छोटी-सी झपकी माँगता हूँ।” “मेरे प्रिय भाई, सवेरा बहुत चढ़ आया है।” वह उत्तर देता है, “मैं जानता हूँ, कुछ देर तो हो गई है; परन्तु यदि मैं बस एक झपकी और ले लूँ तो इससे बहुत अधिक देर नहीं हो जाएगी।” तुम उसे फिर जगाते हो, और बताते हो कि दोपहर हो गई है। वह कहता है, “यह दिन का सबसे गर्म समय है: मैं कह सकता हूँ कि यदि मैं उठ भी गया होता तो सोफ़े पर जाकर कड़ी धूप से थोड़ा विश्राम ही करता।” जब लगभग साँझ हो जाती है, तब तुम उसका द्वार खटखटाते हो, और तब वह चिल्लाता है, “अब उठने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि दिन तो लगभग बीत चुका है।”
तुम उसे उसके घास-पात से भरे खेत और झाड़-झंखाड़ से भरी दाख की बारी की याद दिलाते हो, और वह उत्तर देता है, “हाँ, मैं जानता हूँ, मुझे उठना ही है।” वह अपने आप को झकझोरता है और कहता है, “मुझे नहीं लगता कि यदि मैं घड़ी के घण्टा बजाने तक रुक जाऊँ तो कुछ बहुत बिगड़ जाएगा। मैं एक-दो मिनट और आराम कर लूँगा।”
वह अपने बिछौने से चिपका हुआ है, जीते जी मरा हुआ, अपने आलस्य में गड़ा हुआ। यदि वह सदा सोता रह सकता तो सोता रहता, परन्तु वह ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि न्याय का दिन उसे जगा देगा। लिखा है, “और अधोलोक में उसने पीड़ा में पड़े हुए अपनी आँखें उठाई” (लूका 16:23)। परमेश्वर करे कि तुम आत्मिक आलसी उससे पहले जाग जाओ; परन्तु जब तक तुम समय रहते अपने आप को उद्यम में नहीं लगाते, तब तक नहीं जागोगे, क्योंकि “अभी प्रसन्नता का समय है; देखो, अभी उद्धार का दिन है” (2 कुरिन्थियों 6:2)। और हो सकता है कि यह अभी हो, या कभी नहीं।
कल केवल मूर्खों के पंचांग में मिलता है; आज बुद्धिमान मनुष्य का समय है, हमारे अनुग्रहकारी परमेश्वर का चुना हुआ अवसर है। भला होता कि पवित्र आत्मा तुम्हें इस वर्तमान घड़ी को पकड़ लेने की ओर ले चले, ताकि तुम मसीह यीशु पर विश्वास के द्वारा तुरन्त अपने आप को प्रभु को सौंप दो, और फिर उसकी दाख की बारी से— “शीघ्र उखाड़ फेंको वे हानिकर घास-पात, जो व्यर्थ ही चूसते हैं भले पौधों से भूमि की उर्वरता।”
अध्याय 1 पूरा हुआ
आलसी का खेत