किसान से बातें
आत्मिक सिला बीनना

अध्याय 15 · 39 मिनट का पठन

आत्मिक सिला बीनना

“उसको पूलों के बीच-बीच में भी बीनने दो, और दोष मत लगाओ।” — रूत 2:15 देहात के लोग सिला बीनना समझते हैं। मैं आशा करता हूँ कि यह रीति कभी मिट न जाए, ताकि कंगालों को कटनी में से सदा उनका भाग मिलता रहे। परन्तु बहुत से लोग, जो हर वर्ष अपने गाँव के खेतों में सिला बीनना देखते हैं, अब तक इतने समझदार नहीं हुए कि सिला बीनने का आत्मिक अर्थ समझ सकें। आज का विषय यही है, और मेरा पाठ रूत की उस कहानी से लिया गया है जिसे तुम सब जानते हो। मैं उसके द्वारा अपनी बात को सरल परन्तु शिक्षाप्रद रीति से समझाऊँगा। पहले, एक महान किसान है; रूत की कहानी में वह बोअज था, हमारी कहानी में वह हमारा स्वर्गीय पिता है। दूसरे, एक दीन सिला बीननेवाली है; रूत सिला बीननेवाली थी, परन्तु वह हर एक विश्वासी का चित्र है। तीसरे, रूत को एक अनुग्रह भरी अनुमति दी गई: “उसको पूलों के बीच-बीच में भी बीनने दो, और दोष मत लगाओ।” वही अनुमति आत्मिक रूप से हमें भी दी गई है।

पहली बात, सारी पृथ्वी का परमेश्वर एक महान किसान है। स्वाभाविक बातों में भी यह सच है।

खेती के सारे काम उसी की सामर्थ्य और बुद्धि से होते हैं। मनुष्य भूमि को जोत सकता है और बीज बो सकता है, परन्तु जैसा यीशु ने कहा, “मेरा पिता किसान है।” — यूहन्ना 15:1 वह बादलों और धूप पर प्रभुता करता है; वह हवाओं को दिशा देता है और ओस और वर्षा बाँटता है; वह पाला और गर्मी देता है; और इन सब स्वाभाविक क्रियाओं के द्वारा वह मनुष्यों और पशुओं के लिये भोजन जुटाता है। यह सारी खेती दूसरों के भले के लिये है, कभी अपने लिये नहीं। उसे हमारे परिश्रम की कोई आवश्यकता नहीं। “हजारों पहाड़ों के जानवर मेरे ही हैं,” — भजन संहिता 50:10। सबसे निर्मल दया और उदारता परमेश्वर के हृदय में है। यद्यपि सब कुछ परमेश्वर का है, तो भी सृष्टि और विधान में उसके काम उसके अपने लिये नहीं, वरन् उसके प्राणियों के लिये हैं। इससे हमें उस पर भरोसा रखने का हियाव मिलता है।

आत्मिक बातों में भी परमेश्वर एक महान किसान है, और उसका सारा काम उसकी सन्तानों के लिये होता है, कि वे उत्तम से उत्तम आत्मिक भोजन से पाली-पोसी जाएँ। उन चौड़े-चौड़े सुसमाचार के खेतों को देखो जिन्हें हमारा स्वर्गीय पिता अपनी सन्तानों के लिये सँभालता है। ये खेत बहुत उपजाऊ हैं। “इस्राएल निडर बसा रहता है, अन्न और नये दाखमधु के देश में याकूब का सोता अकेला ही रहता है; और उसके ऊपर के आकाश से ओस पड़ा करती है।”

— व्यवस्थाविवरण 33:28 परमेश्वर जिस भी खेत को सँभालता है, उसमें भरपूर उपज होती है; उसके यहाँ न फसल मारी जाती है, न अकाल पड़ता है।

उसकी खेती के एक भाग का नाम है सिद्धान्त का खेत। वहाँ बढ़िया गेहूँ के कैसे भरे-भरे पूले हैं! जिन्हें यहाँ सिला बीनने की अनुमति मिलती है, वे आवश्यकता से अधिक बटोर लेंगे, क्योंकि यह भूमि बहुतायत से उपज देती है। चुनाव के पूले को देखो, जो गेहूँ की भारी और पुष्ट बालों से भरा है, वैसी ही मोटी और अच्छी-अच्छी बालें जैसी फ़िरौन ने अपने स्वप्न में देखी थीं। वहाँ अन्त तक स्थिर बने रहने का पूला है, जिसकी हर एक बाल इस प्रतिज्ञा का चित्र है कि परमेश्वर ने जो काम आरम्भ किया है, उसे वह पूरा करेगा।

यदि इनमें भाग लेने का विश्वास हमारे पास न हो, तो भी हम मसीह के लहू के द्वारा छुटकारे के पूलों में से सिला बीन सकते हैं। बहुत से लोग जो चुनाव या अन्त तक स्थिर बने रहने की शिक्षा को अपना भोजन नहीं बना पाते, वे प्रायश्चित्त को भोजन बना सकते हैं और इस बात में आनन्द कर सकते हैं कि मसीह हमारे स्थान पर खड़ा हुआ। जब इन भरपूर पूलों पर मनन किया जाता है, तब वे प्रभु के घराने के लिये राजसी भोजन बन जाते हैं।

मुझे आश्चर्य होता है कि परमेश्वर के कुछ भण्डारी इस खेत के फाटक पर ताला क्यों लगा देते हैं, मानो वे इसे खतरनाक समझते हों। मैं चाहता हूँ कि मेरे लोग यहाँ केवल सिला ही न बीनें, वरन् गाड़ियाँ भर-भरकर घर ले जाएँ, क्योंकि जब भोजन सत्य हो, तब उन्हें कभी बहुत अधिक नहीं खिलाया जा सकता। क्या मेरे साथी सेवक डरते हैं कि यदि परमेश्वर के लोगों को बहुत अधिक भोजन मिल गया तो वे घमण्डी हो जाएँगे? मुझे तो यह डर है कि यदि खरी शिक्षा की रोटी रोक ली गई तो वे भूखे मर जाएँगे। यदि हम परमेश्वर की आज्ञाओं और चेतावनियों से प्रेम रखते हैं, तो हमें सिद्धान्तों से डरने की आवश्यकता नहीं; हमें आनन्द के साथ उनका अध्ययन करना और उन्हें अपना भोजन बनाना चाहिए। परमेश्वर के भेद करनेवाले अनुग्रह के सिद्धान्त वचन की बाकी बातों के साथ-साथ सुनाए जाने चाहिए, और जो प्रचार-मंच इन सच्चाइयों को बाहर रखते हैं, वे अधूरे हैं। परमेश्वर के लोगों को इस खेत से बाहर मत रखो। फाटक खोलो और भीतर आओ, हे परमेश्वर की सब सन्तानो! मेरे स्वामी के खेत में ऐसा कुछ नहीं उगता जो तुम्हें हानि पहुँचाए। सुसमाचार का सिद्धान्त सदा सुरक्षित है। तुम पेट भरने तक भोज कर सकते हो और तुम्हें कोई हानि न होगी। किसी भी प्रगट किए हुए सत्य से मत डरो। अज्ञानता से डरो, पवित्र ज्ञान से नहीं। यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ते जाओ। परमेश्वर के वचन में जो कुछ सिखाया गया है वह सब अध्ययन के लिये है; किसी बात की उपेक्षा मत करो। सिद्धान्त के खेत में प्रतिदिन जाओ और पूरे परिश्रम से सिला बीनो।

2. उस महान किसान का एक और खेत है जिसका नाम प्रतिज्ञा का खेत है; मुझे उसके विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि मैं आशा करता हूँ कि तुम अक्सर उसमें जाते और उसमें से बटोरते हो। आओ, हम उसके किसी एक पूले में से केवल एक-दो बालें लेकर तुम्हें दिखाएँ, कि तुम्हें दिन भर वहीं ठहरने और साँझ को भरपूर उपज घर ले जाने का प्रोत्साहन मिले। यह रही एक बाल: “चाहे पहाड़ हट जाएँ और पहाड़ियाँ टल जाएँ, तो भी मेरी करुणा तुझ पर से कभी न हटेगी, और मेरी शान्तिदायक वाचा न टलेगी,” (यशायाह 54:10)।

यह रही एक और: “जब तू जल में होकर जाए, मैं तेरे संग-संग रहूँगा और जब तू नदियों में होकर चले, तब वे तुझे न डुबा सकेगी; जब तू आग में चले तब तुझे आँच न लगेगी, और उसकी लौ तुझे न जला सकेगी,” (यशायाह 43:2)। यह रही एक और; इसका डंठल तो छोटा है, परन्तु यह दानों से भारी है: “मेरा अनुग्रह तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है,” (2 कुरिन्थियों 12:9)।

एक और बाल है जिसका डंठल लम्बा है, परन्तु जो अनाज से बहुत भरपूर है: “तुम्हारा मन व्याकुल न हो, तुम परमेश्वर पर विश्वास रखते हो मुझ पर भी विश्वास रखो। मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं, यदि न होते, तो मैं तुम से कह देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा, कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो,” (यूहन्ना 14:1-3)। कैसी प्रतिज्ञा है यह—“फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा।” सचमुच, प्रियो, हम प्रतिज्ञा के खेत के विषय में वह कह सकते हैं जो सारे इंग्लैंड के किसी भी खेत के विषय में नहीं कहा जा सकता: वह इतना भरपूर है कि इससे अधिक भरपूर हो ही नहीं सकता, और उसमें अनाज की इतनी बालें हैं कि तुम उसमें एक और नहीं समा सकते। जैसा कवि गाता है: “इससे बढ़कर वह और क्या कहे, जो तुमसे वह कह चुका है,— तुमसे, जो शरण के लिये यीशु के पास भाग आए हो?”

हे कंगालो और दरिद्रो, उस खेत में सिला बीनो, और कभी यह न सोचो कि तुम बिना अधिकार घुस आए हो। सारा खेत तुम्हारा है; हर एक बाल तुम्हारी है। तुम पूलों में से भी बटोर सकते हो, और जितना अधिक तुम लेते हो, उतना ही अधिक ले सकते हो।

फिर विधियों का खेत है; यहाँ बहुत सा अच्छा गेहूँ उगता है। बपतिस्मे का खेत हम में से कुछ के लिये विशेष रूप से फलदायी रहा है, क्योंकि उसने हमें मसीह में हमारी मृत्यु, हमारा गाड़ा जाना और हमारा जी उठना दिखाया है, और इस रीति से हमें ढाढ़स और शिक्षा दी है। अपने आपको खुलेआम प्रभु की ओर का घोषित करना हमारे लिये भला रहा है, और हमने पाया है कि अपने प्रभु की आज्ञाओं को मानने में बड़ा प्रतिफल है।

परन्तु मैं तुम्हें इस खेत में अधिक देर न रोकूँगा, क्योंकि कुछ लोग समझते हैं कि यहाँ की मिट्टी गीली है; मैं उनके लिये और अधिक ज्योति और और अधिक अनुग्रह की कामना करता हूँ। अब हम प्रभु-भोज के खेत की ओर बढ़ेंगे, जहाँ प्रभु का सबसे उत्तम अनाज उगता है। इस चुने हुए स्थान पर हमने कैसी-कैसी उत्तम वस्तुओं का स्वाद चखा है! क्या हमने वहाँ सबसे मधुर और सबसे अधिक बल देनेवाले आत्मिक भोजन का आनन्द नहीं लिया? सारी जागीर में कोई खेत इस बीचवाले खेत की, इस मुकुट-मणि की बराबरी नहीं करता; यह राजा का खेत है। हे सुसमाचार के सिला बीननेवाले, इसी खेत में बने रहो; हर सप्ताह के पहले दिन इसमें सिला बीनो, और वहाँ अपने प्रभु को देखने की आशा रखो; क्योंकि लिखा है, “उन्होंने उसे रोटी तोड़ते समय पहचाना,” (लूका 24:35)। स्वर्गीय किसान का एक खेत पहाड़ी पर भी है, जो बाकी खेतों में से सबसे अच्छे खेत के बराबर है, चाहे वह उनसे बढ़कर न भी हो।

जब तक तुम इस खेत में से होकर न जाओ, तब तक तुम बाकी किसी खेत में सचमुच प्रवेश नहीं कर सकते; दूसरे खेतों का मार्ग इसी पहाड़ी खेत में से होकर जाता है, जिसका नाम है मसीह के साथ सहभागिता और संगति। यह प्रभु के सबसे चुने हुए लोगों के सिला बीनने का खेत है। तुम में से कुछ इसमें से केवल जल्दी-जल्दी होकर निकल गए हैं और वहाँ पर्याप्त देर नहीं ठहरे; परन्तु जो यहाँ रहना जानते हैं, सचमुच यहीं बसना जानते हैं, वे अपनी घड़ियाँ सबसे अधिक लाभ और आनन्द के साथ बिताएँगे।

केवल जब हमारी मसीह के साथ सहभागिता और संगति होती है, तभी विधियाँ, सिद्धान्त और प्रतिज्ञाएँ हमें लाभ पहुँचाती हैं। जब तक हम मसीह के प्रेम का आनन्द न लें, उसका स्वरूप धारण न करें, निरन्तर उसके साथ न रहें और उसके प्रेम में मगन न हों, तब तक बाकी सब कुछ सूखा और बंजर है। मुझे खेद है कि थोड़े ही मसीही इस खेत का मूल्य समझते हैं; उनके लिये इतना ही बहुत है कि वे सिद्धान्त में खरे हों और आचरण में लगभग ठीक हों। पवित्र आत्मा के द्वारा मसीह के साथ घनिष्ठ मेल-जोल की उन्हें जितनी चिन्ता होनी चाहिए, उससे कहीं कम है। यदि हम इस खेत में सिला बीनते, तो हम में कहीं कम चिड़चिड़ापन, कहीं कम घमण्ड और कहीं कम आलस होता। यह एक आड़वाला, सुरक्षित खेत है, और इसमें तुम्हें ऐसा भोजन मिलेगा जो स्वर्गदूतों के भोजन से भी उत्तम है; वरन् तुम स्वयं यीशु को उस रोटी के रूप में पाओगे जो स्वर्ग से उतरी। धन्य है यह खेत; हम प्रतिदिन उसमें जाया करें। स्वामी सब विश्वासियों के लिये फाटक पूरा खुला छोड़ देता है; आओ, हम भीतर जाएँ और सुनहरी बालें तब तक बटोरते रहें जब तक और न उठा सकें। इस प्रकार हमने उस महान किसान को उसके खेतों में देखा; आओ, हम आनन्द करें कि ऐसा किसान हमारे निकट है और सिला बीनने को ऐसे खेत हैं।

II. और अब, दूसरी बात, हमारे सामने एक दीन सिला बीननेवाली है। रूत सिला बीननेवाली थी, और वह इस बात का उदाहरण ठहर सकती है कि परमेश्वर के खेतों में हर एक विश्वासी को कैसा होना चाहिए।

1. विश्वासी एक कृपापात्र सिला बीननेवाला है, क्योंकि वह जितना उठा सके उतना घर ले जा सकता है; प्रभु सब कुछ सेंत-मेंत देता है। मैं सिला बीननेवाले का रूपक इसलिए काम में लेता हूँ क्योंकि थोड़े ही मसीही इससे आगे बढ़ पाते हैं, यद्यपि यदि वे समर्थ हों तो उन्हें ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता है। कोई पूछ सकता है, विश्वासी सारे खेत की कटनी क्यों नहीं कर लेता? मेरा उत्तर है, यदि वह कर सके तो उसका स्वागत है; जो लोग खरी चाल चलते हैं, उनसे यहोवा कोई अच्छी वस्तु रख न छोड़ेगा। यदि तुम्हारा विश्वास एक बड़ी गाड़ी के समान है और सारे खेत को उठा सकता है, तो तुम्हें उसे ले जाने की पूरी अनुमति है। हाय, हमारा विश्वास छोटा है; हम कटनी नहीं करते, केवल सिला बीनते हैं। सीमा हम में है, परमेश्वर में नहीं। परमेश्वर करे कि तुम सब इस रूपक से आगे बढ़ जाओ और अपने पूले लेकर घर लौटो।

2. फिर, सिला बीननेवाली को परिश्रम और थकान सहनी पड़ती है। वह तड़के उठती है और किसी खेत में जाती है; यदि वह बन्द हो, तो दूसरे में चली जाती है; यदि उसमें से पहले ही बीना जा चुका हो, तो वह जल्दी से और आगे बढ़ती है। दिन भर वह झुकी रहती है, एक-एक बाल बटोरती है, और विश्राम करने को कभी-कभार ही बैठती है। रात को वह घर लौटती है, और यदि खेत अच्छा था तो भारी बोझ लादे लौटती है। प्रियो, आओ, हम भी आत्मिक भोजन खोजने में ऐसा ही करें।

आओ, हम स्वामी के खेतों में थोड़ी सी थकान से न डरें; यदि बीनने को बहुत है, तो हमें उस बहुमूल्य अनाज को बटोरने में थकना नहीं चाहिए, क्योंकि प्रतिफल बड़ा है। मैं एक मित्र को जानता हूँ जो सुसमाचार सुनने के लिये हर रविवार पाँच मील पैदल चलकर आता है, और उतनी ही दूरी चलकर लौटता है। एक और मित्र दस मील को छोटी बात समझता है; वे बुद्धिमान हैं, क्योंकि परमेश्वर का शुद्ध वचन सुनने के लिये कोई भी परिश्रम बहुत बड़ा नहीं है। सिला बीननेवाली यह आशा नहीं रखती कि बालें चलकर उसके पास आएँगी; वह जानती है कि सिला बीनना कठिन परिश्रम है।

हो सकता है कि सबसे अच्छा खेत हमें सदा पास ही न मिले; हमें गाँव के दूसरे छोर तक जाना पड़े। परन्तु सिला बीननेवालों को नखरे नहीं करने चाहिए; जहाँ कहीं प्रभु सुसमाचार भेजता है, वहीं हमें जाना चाहिए।

3. सिला बीननेवाली जो भी बाल बटोरती है, उसके लिये उसे झुकना पड़ता है। घमण्डी लोगों को वचन से शायद ही कभी लाभ होता है, क्योंकि वे आशा रखते हैं कि अनाज उठाकर उनके हाथ में दिया जाए। वे उस प्रचारक की प्रशंसा करते हैं जो सत्य को ऊँचा, पहुँच से बाहर टाँग देता है; परन्तु यह कोई बड़ा कमाल नहीं। प्रचारक का काम सत्य को सब की पहुँच में रखना है, बच्चों की भी और बड़ों की भी। कंगाल सिला बीननेवालों के लिये जानबूझकर मुट्ठियाँ गिराई जा सकती हैं, और वे उन्हें बटोरने के लिये झुकने में कोई संकोच नहीं करते। यदि हम केवल पढ़े-लिखे लोगों के लिये प्रचार करें, तो बुद्धिमान तो समझ लेते हैं, परन्तु अनपढ़ नहीं समझते। कंगालों को सरलता से प्रचार करो, तो दूसरे भी चाहें तो समझ सकते हैं। जो लोग सीधे-सादे सत्य के लिये झुकना नहीं चाहते, उन्हें सिला बीनना छोड़ देना चाहिए। यदि किसी बालक से सीखने से मुझे सुसमाचार समझने में सहायता मिले, तो मैं उससे भी सीखूँगा। प्रभु के खेत में सिला इतना भरपूर है कि कठिन परिश्रम सार्थक हो जाता है। भूखे प्राण यह जानते हैं; उन्हें रोका नहीं जाना चाहिए। हम प्रार्थना, दीनता और अंगीकार के द्वारा झुकते हैं, और अपने प्राणों के लिये प्रतिदिन की रोटी बटोरते हैं।

4. सिला बीननेवाली एक-एक बाल करके बटोरती है; कभी-कभी मुट्ठियाँ भी गिरती हैं, परन्तु प्रायः वह एक-एक डंठल करके ही बटोरती है।

रूत पर तो मुट्ठियों की कृपा हुई थी, परन्तु साधारणतः बीननेवाली झुकती है, बटोरती है, और फिर झुकती है।

जहाँ बहुतायत मिले, वहाँ जाओ; यदि न मिले, तो एक-एक बाल बटोरने में आनन्द करो। कुछ लोग केवल अपने प्रिय सेवक की सभा में जाते हैं और दूसरों को सुनने से इनकार करते हैं; स्मरण रखो, “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें,” (इब्रानियों 10:25)। अपने प्राण को भोजन से वंचित मत करो। यदि तुम एक साथ बहुत न बटोर सको, तो थोड़ा-थोड़ा करके बटोरो। यहाँ थोड़ा और वहाँ थोड़ा सीखने में सन्तुष्ट रहो; नहीं तो तुम आधे भूखे रहोगे, और फिर उसी तुच्छ समझे गए सेवक के पास लौटकर वह उठाओगे जो उसका खेत उपजाता है।

5. सिला बीननेवाली जो कुछ बटोरती है उसे अपने हाथ में थामे रखती है; वह उसे गिराती नहीं। कुछ लोग कोई अच्छा विचार सुनते हैं, परन्तु अगले के लिये झपट पड़ते हैं, और पहले का सब कुछ खो बैठते हैं। अन्त में एक मुट्ठी गिर जाती है, और वे पहले का सब कुछ भूल जाते हैं। उपदेश एक खेत के समान है; बटोरो, बाँधो और घर ले जाओ, परन्तु उसे व्यर्थ बातचीत में मत खोओ। मैं एक मनुष्य को जानता था जो उपदेश के बाद जल्दी-जल्दी घर जा रहा था, परन्तु उस उपदेश पर बहस करते हुए कुछ डीकनों ने, जो कुछ उसे स्मरण था, वह सब नष्ट कर दिया। ऐसी हानियों से बचो; चुपचाप घर जाओ और अपना बीना हुआ सँभाले रखो। उस कंजूस के समान बनो जो जो कुछ बटोरता है सब रख छोड़ता है; ओछी बातचीत के कारण अपना अनन्त धन मत खोओ।

6. फिर सिला बीननेवाली गेहूँ को दाँवती है। किसी उपदेश को दाँवना बुद्धिमानी है, चाहे उसे किसी ने भी प्रचार किया हो, क्योंकि उसमें कुछ न कुछ पुआल सदा होता है। बहुत से लोग प्रचारक की आलोचना करके “दाँवते” हैं, परन्तु उत्तम यह है कि मनन और प्रार्थना के द्वारा सत्य को पुआल से अलग किया जाए। उपदेश को सोच-विचार के खलिहान पर रखो, उसे प्रार्थना से पीटो, तो गेहूँ तुम्हारा हो जाएगा। इसकी उपेक्षा मत करो; यदि सिला बीननेवाली अनाज को बिना दाँवे रख छोड़े, तो चूहे उसे खा जाएँगे। शैतान, पाप और संसार बिना दाँवे हुए उपदेश को नष्ट कर सकते हैं। जो सावधानी से दाँवता है और सत्य को पुआल से अलग करता है, वह बुद्धिमान सुननेवाला बन जाता है, और जो कुछ सुनता है उसे अपना भोजन बनाता है।

7. अन्त में, सिला बीननेवाली अनाज को फटकती है। रूत ने यह खेत में ही किया; हमें शायद यह घर पर करना पड़े। उसने भूसी को वहीं छोड़ दिया; हमें भी बहुमूल्य को निकम्मे से अलग करना चाहिए, और भूसी को छोड़ देना चाहिए। सेवकों की ओछी बातें या अटपटी टिप्पणियाँ घर मत ले जाओ। पूछो, “प्रचारक ने ऐसा क्या कहा जो सचमुच सुनने योग्य था?” प्रायः उत्तर होता है, “मुझे स्मरण नहीं।” उन्होंने गेहूँ को छानकर फेंक दिया और भूसी घर ले आए। तुम इसका उलटा नियम अपनाओ: पुआल गिरा दो, अच्छा अनाज रख लो। सावधानी से परखो, झूठी शिक्षा को ठुकराओ, और सच्चे सिद्धान्त को थामे रहो। यही स्वर्गीय सिला बीनने की कला है। प्रभु हमें बुद्धि दे, कि हम “सुख के सब प्रयोजनों के लिये धनी” हों, और हमारी लालसा उत्तम पदार्थों से तृप्त हो, और हमारी जवानी उकाब के समान नई हो जाए (भजन संहिता 103:5)।

III. और अब, अन्त में, यहाँ एक अनुग्रह भरी अनुमति दी गई है: “उसको पूलों के बीच-बीच में भी बीनने दो, और दोष मत लगाओ” (रूत 2:15)। रूत को पूलों के बीच जाने का कोई अधिकार नहीं था, जब तक बोअज ने यह कहकर उसे अनुमति न दी, “उसे ऐसा करने दो।” खेत के उस भाग में बटोरने की अनुमति मिलना, जहाँ गेहूँ अभी-अभी काटा गया था और अब तक कुछ भी इकट्ठा नहीं किया गया था, एक बड़ी कृपा थी। परन्तु बोअज ने धीरे से यह भी कह दिया कि उसके लिये जानबूझकर मुट्ठियाँ गिरा दी जाएँ—यह इससे भी बड़ी कृपा थी। बोअज के मन में रूत के लिये गुप्त स्नेह था; और इसी प्रकार, प्रियो, हमारे प्रभु के अनन्त प्रेम ही के कारण वह हमें अपने सबसे अच्छे खेतों में आने और पूलों के बीच सिला बीनने देता है। उसका अनुग्रह हमें सिद्धान्त, प्रतिज्ञाओं और अनुभव की आशीषें पाने देता है। सारी स्वर्गीय आशीषें परमेश्वर सेंत-मेंत देता है; अपने आप में हमारा उन पर कोई अधिकार नहीं—हमारा भाग उसके सर्वोच्च अनुग्रह से है।

आओ, हम ध्यान दें कि यद्यपि भोजन के ये समय बिना चेतावनी के आते हैं, तो भी कुछ विशेष ऋतुएँ हैं जिनमें हम उनकी आशा रख सकते हैं।

पूर्वी देशों के काटनेवाले प्रायः दिन की गर्मी में किसी पेड़ की छाया में या किसी झोंपड़ी के नीचे बैठकर जलपान करते हैं। उसी प्रकार, जब क्लेश, कठिनाई, सताव और हानि हम पर सबसे भारी पड़ते हैं, तब प्रायः प्रभु हमें सबसे मधुर शान्ति देता है। विश्राम की आशा रखने से पहले हमें तब तक परिश्रम करना होगा जब तक तपती धूप के कारण हमारे मुँह से पसीना न टपकने लगे; जिन विशेष भोजों को प्रभु अपने सच्चे कर्मचारियों के लिये तैयार करता है, उनमें बुलाए जाने से पहले हमें दिन भर का भार उठाना और धूप सहनी होगी।

जब तुम्हारे क्लेश का दिन सबसे अधिक तपता है, तब यीशु का प्रेम सबसे अधिक मधुर लगेगा।

भोजन के ये समय कभी-कभी किसी परीक्षा से पहले आते हैं। एलिय्याह को झाऊ के पेड़ के नीचे भोजन दिया गया, क्योंकि उसे उसी भोजन के बल से चालीस दिन और चालीस रात यात्रा करनी थी। (“वह झाऊ के पेड़ तले लेटकर सो गया और देखो एक दूत ने उसे छूकर कहा, ‘उठकर खा।’ उसने दृष्टि करके क्या देखा कि मेरे सिरहाने पत्थरों पर पकी हुई एक रोटी, और एक सुराही पानी रखा है; तब उसने खाया और पिया और फिर लेट गया। दूसरी बार यहोवा का दूत आया और उसे छूकर कहा, ‘उठकर खा, क्योंकि तुझे बहुत लम्बी यात्रा करनी है।’ तब उसने उठकर खाया पिया; और उसी भोजन से बल पाकर चालीस दिन-रात चलते-चलते परमेश्वर के पर्वत होरेब को पहुँचा।” — 1 राजाओं 19:5-8) यदि तुम्हें यीशु के साथ संगति की असाधारण घड़ियाँ मिलती हैं, तो तैयार रहो: हो सकता है कि तुम आगे किसी लम्बी परीक्षा में प्रवेश करनेवाले हो। जैसे कोई जहाज़ जब भरपूर रसद लादता है तो वह किसी दूर की यात्रा की तैयारी कर रहा होता है, वैसे ही ये भरपूर आत्मिक घड़ियाँ तुम्हें अधिक कठिन समयों के लिये तैयार करती हैं। मीठा पोषण प्राण को कठोर संघर्ष के लिये तैयार करता है।

विश्राम के समय सेवा या कठिनाई के बाद भी आ सकते हैं। शैतान ने मसीह की परीक्षा की, और उसके बाद स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे। (“तब शैतान उसके पास से चला गया, और स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।” — मत्ती 4:11) याकूब ने परमेश्वर से मल्लयुद्ध किया, और उसके बाद स्वर्गदूतों के दल उससे आ मिले। (“तब याकूब ने यह कहकर उस स्थान का नाम पनीएल रखा; ‘परमेश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है।’ … इसलिए उसने उस स्थान का नाम महनैम रखा।”

— उत्पत्ति 32:30-31) अब्राहम ने राजाओं को हराया और युद्ध से लौटा, और तब मलिकिसिदक रोटी और दाखमधु लेकर उससे मिला। (“तब शालेम का राजा मलिकिसिदक, जो परमप्रधान परमेश्वर का याजक था, रोटी और दाखमधु ले आया। और उसने अब्राम को यह आशीर्वाद दिया, ‘परमप्रधान परमेश्वर की ओर से, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, तू धन्य हो। और धन्य है परमप्रधान परमेश्वर, जिसने तेरे द्रोहियों को तेरे वश में कर दिया है।’ तब अब्राम ने उसको सब का दशमांश दिया।” — उत्पत्ति 14:18-20) संघर्ष के बाद सन्तोष आता है, युद्ध के बाद भोज। जब तुमने अपने प्रभु की सेवा विश्वासयोग्यता से की हो, तब तुम बैठ सकते हो, और तुम्हारा स्वामी तुम्हारी सेवा करेगा।

संसार के लोग धर्म के विषय में चाहे जो कहें कि वह कठिन है, हम तो उसे ऐसा नहीं पाते। मसीह के लिये कटनी करने में कठिनाइयाँ तो हैं, परन्तु जो रोटी हम खाते हैं वह स्वर्गीय मिठास से भरी है, और जो दाखमधु हम पीते हैं वह सबसे उत्तम दाख की बारियों से आता है।

“अपनी धन्य दशा मैं न बदलूँ, जग के सारे भले-बड़े के बदले; जब तक मेरा विश्वास थामे रहे, पापी के सोने से मैं डाह न करूँ।”

अब हम एक और बात की ओर मुड़ते हैं: सिला बीननेवाली को प्रेम से इन भोजनों में बुलाया जाता है। अर्थात् वह कंगाल, काँपता हुआ परदेशी, जो कटनी करने के लिये बहुत निर्बल है, जिसका खेत पर दया के सिवाय कोई अधिकार नहीं — वह कंगाल पापी जो अपने दोषों को जानता है, जिसके पास थोड़ी ही आशा और थोड़ा ही आनन्द है — प्रेम के भोज में बुलाया जाता है।

हमारे पाठ में सिला बीननेवाली को आने का निमन्त्रण दिया गया है: “खाने के समय यहीं आकर रोटी खा।” (रूत 2:14) अपने वस्त्रों, अपने चरित्र, अपनी दरिद्रता या अपनी शारीरिक निर्बलता की लज्जा को पवित्र भोज के स्थान से अपने को दूर मत रखने दो। “खाने के समय यहीं आकर रोटी खा।” मैं एक बहरी स्त्री को जानता था जो कभी कोई ध्वनि नहीं सुन सकती थी, तो भी वह परमेश्वर के घर में सदा उपस्थित रहती थी। जब उससे पूछा गया कि क्यों, तो उसने कहा कि एक मित्र ने उसे पाठ बता दिया था, और जब वह उसके लोगों के साथ बैठती थी, तब परमेश्वर उसे उस पाठ पर बहुत से मधुर विचार देता था। उसे लगता था कि विश्वासी होने के नाते उसे परमेश्वर के लोगों के साथ उपस्थित रहकर परमेश्वर का आदर करना चाहिए। वह सबसे उत्तम संगति का आनन्द लेती थी — परमेश्वर की उपस्थिति, पवित्र स्वर्गदूतों और पवित्र लोगों की संगति। यदि उसे आने में आनन्द मिलता था, तो जो सुन सकते हैं उन्हें कभी दूर नहीं रहना चाहिए। यद्यपि हम अपनी अयोग्यता का अनुभव करते हैं, तो भी हमें परमेश्वर के घर में रहने की लालसा रखनी चाहिए, उन बीमारों के समान जो चंगे होने की आशा में बैतहसदा के कुण्ड पर प्रतीक्षा करते थे। (“यरूशलेम में भेड़-फाटक के पास एक कुण्ड है, जो इब्रानी भाषा में बैतहसदा कहलाता है, और उसके पाँच ओसारे हैं।… बहुत से बीमार… पानी के हिलने की आशा में।” — यूहन्ना 5:2-3) हे काँपते हुए प्राण, शैतान की परीक्षाओं को कभी अपने को उपासकों की सभा से दूर मत रखने दो: “खाने के समय यहीं आकर रोटी खा।”

इसके अतिरिक्त, उसे केवल आने का ही नहीं, वरन् खाने का भी निमन्त्रण मिला। परमेश्वर के वचन में जो कुछ मीठा और शान्तिदायक है, उसमें भाग लेने के लिये टूटे मनवालों को निमन्त्रण है। “मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया…” (“…मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया, जिनमें सबसे बड़ा मैं हूँ।” — 1 तीमुथियुस 1:15) …और “…मसीह भक्तिहीनों के लिये मरा।” (“परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है, कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।” — रोमियों 5:8) तुम शायद अपने मन में कह रहे हो, “काश, मैं भी बच्चों की रोटी खा पाता!” — और तुम खा सकते हो। प्रभु के निमन्त्रण के सिवाय तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।

“विवेक तुम्हें ठिठकने न दे, न योग्यता के व्यर्थ सपने तुम्हें रोकें।”

जब वह तुम्हें आने को कहता है, तो उसकी बात पर भरोसा करो। यदि कोई प्रतिज्ञा है, तो उसका विश्वास करो। यदि कोई प्रोत्साहन है, तो उसे ग्रहण करो, और उसकी मिठास को अपनी होने दो।

इससे भी बढ़कर, उससे केवल खाने का ही नहीं, वरन् अपना कौर सिरके में डुबाने का भी आग्रह किया गया। यह खट्टापन नहीं, वरन् एक हल्का, ताज़गी देनेवाला पेय था जो खेतों में रोटी के साथ लिया जाता था — पानी मिले दाखमधु या फलों के रस जैसा कुछ, जो स्वाद बढ़ा देता है। प्रियो, प्रभु के कर्मचारियों के पास उनकी रोटी के साथ चटनी भी है: केवल सिद्धान्त ही नहीं, वरन् वह पवित्र आनन्द भी जो उनके साथ आता है। उदाहरण के लिये, चुनाव का सिद्धान्त रोटी के समान है; और यह जानने का आनन्द कि “…उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया।” (“…जैसा उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पहले उसमें चुन लिया…” — इफिसियों 1:4) वह चटनी है जिसमें रोटी डुबाई जाती है। हे कंगाल सिला बीननेवाले, तुम्हें भी अपना कौर डुबाने का निमन्त्रण है।

मैं लोगों को टॉपलेडी का भजन गाते सुना करता था: “केवल दया का ऋणी हूँ मैं, वाचा की दया के गीत गाता हूँ… हाँ, मैं अन्त तक स्थिर रहूँगा, उतना ही निश्चित जितना बयाना दिया गया; स्वर्ग की महिमित आत्माएँ मुझसे अधिक सुखी हैं, पर अधिक सुरक्षित नहीं।” पहले मैं इसे गा नहीं पाता था — यह बहुत ही मीठा था। परन्तु मैं परमेश्वर का धन्यवाद करता हूँ कि मैंने इसमें अपना कौर डुबाने का साहस किया, और अब मुझे इसके बिना अपनी रोटी शायद ही अच्छी लगती है। मैं चाहता हूँ कि हर एक काँपता हुआ पापी परमेश्वर के वचन की शान्तिदायक सच्चाइयों में भाग ले, उनमें भी जिन्हें “ऊँचा सिद्धान्त” कहा जाता है। पहले सरल सच्चाइयों का विश्वास करो, फिर अधिक गहरी सच्चाइयों का आनन्द लो।

शायद सिला बीननेवाली हिचकिचाती है और कहती है, “मेरा कोई अधिकार नहीं; मैं काटनेवाली नहीं हूँ।” परन्तु यीशु तुम्हें बुलाता है।

आओ! उसका निमन्त्रण स्वीकार करो और निकट आओ। तुम कह सकते हो, “मैं निर्बल हूँ; मुझे मुश्किल से कोई दाना मिलता है।” तो भी यीशु तुम्हें बुलाता है। तुम कह सकते हो, “मैं परदेशी हूँ, पापी हूँ।” परन्तु यीशु तुम्हारे पाप को जानता है और तो भी तुम्हें बुलाता है। तुम कह सकते हो, “मुझे लगता है कि मैं इसके योग्य नहीं।” यीशु तुम्हें आने को कहता है। तुम्हारा सन्देह तुम्हारे विश्वास से कहीं अधिक ढिठाई है।

तुम्हारे लिये पर्याप्त अनुग्रह है। यीशु की दया ऐसा समुद्र नहीं जो सुखाया जा सके; वह कभी नहीं चुकती।

अब आओ। यीशु तुमसे प्रेम रखता है और तुम्हें अपनी मेज़ पर भोज करते देखकर आनन्दित होता है। एक भेद की बात सुनो: वह तुमसे विवाह करना चाहता है। यदि तुम उसकी दुल्हन बन जाओ, तो खेत तुम्हारे हो जाएँगे, क्योंकि पत्नी अपने पति की सारी मीरास में भागी होती है। सारी प्रतिज्ञाएँ जो “मसीह में हाँ और आमीन” हैं (“क्योंकि परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएँ हैं, वे सब उसी में हाँ के साथ हैं…” — 2 कुरिन्थियों 1:20) अब मसीह में तुम्हारी हैं। यद्यपि तुम परदेशी हो, तो भी यीशु तुमसे प्रेम रखता है: “…मनुष्य का पुत्र खाता-पीता आया, और वे कहते हैं कि ‘देखो, पेटू और पियक्कड़ मनुष्य, चुंगी लेनेवालों और पापियों का मित्र!’” (मत्ती 11:19 — पापियों के प्रति यीशु का हृदय दिखाते हुए)। अच्छा चरवाहा खोई हुई भेड़ को ढूँढ़ने के लिये निन्यानवे को छोड़ देता है।

(“…तुम में से कौन है जिसकी सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक खो जाए…” — लूका 15:4) उड़ाऊ पुत्र के लौटने का उत्सव स्वर्ग में मनाया जाता है। (“…क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है: खो गया था, अब मिल गया है।” — लूका 15:24) हे काँपती हुई सिला बीननेवाली, आ! यीशु तुम्हें बुलाता है: “खाने के समय यहीं आकर रोटी खा, और अपना कौर सिरके में डूबा।” — रूत 2:14 बोअज ने रूत को पूलों के बीच सिला बीनने दिया, इसका मुख्य कारण प्रेम था। वह उसे वहाँ चाहता था, क्योंकि उसके मन में उसके लिये गहरा स्नेह था, जिसे उसने बाद में और भी पूरी रीति से प्रगट किया। इसी प्रकार प्रभु अपने लोगों को सिला बीनने देता है, क्योंकि वह उनसे प्रेम रखता है। क्या पिछले सब्त के दिन खेतों में तुम्हें प्राण को धनी करनेवाला समय मिला? क्या तुम मिस्र से लौटते हुए यूसुफ के भाइयों के समान अपना बोरा भरा हुआ लेकर घर लौटे?

क्या तुम उस बहुतायत से तृप्त हुए? वह तुम्हारे स्वामी की भलाई थी। अपनी सारी आत्मिक आशीषों को उसके अनन्त प्रेम का प्रमाण समझो। जब तुम स्मरण करते हो कि हर एक मधुर अनुभव, आत्मा का हर एक ऊँचा आनन्द, उसके प्रेम से आता है, तब तुम्हारा आत्मिक “अनाज” और भी आसानी से पिसेगा और और भी अधिक मीठा लगेगा। तुम्हारे आनन्द, तुम्हारी गहरी आत्मिक प्रसन्नता की घड़ियाँ, सब परमेश्वर के स्नेह के प्रमाण हैं—उनके लिये दुगुना आनन्द करो।

बोअज ने रूत को सिला बीनने दिया, इसका एक और कारण यह था कि वह उसका कुटुम्बी था। इसी प्रकार हमारा प्रभु हमें विशेष आशीषें देता है, क्योंकि वह हमारा कुटुम्बी है।

यीशु, हमारा छुड़ानेवाला, हमारा सबसे निकट का कुटुम्बी है, हमारी हड्डियों में की हड्डी और हमारे माँस में का माँस। यह एक अद्भुत भेद है कि मसीह अपनी कलीसिया का पति है। वह उचित रूप से अपनी दुल्हन को पूलों के बीच सिला बीनने दे सकता है, क्योंकि जो कुछ उसका है वह पहले से ही उसकी दुल्हन का है। उसके हित और दुल्हन के हित एक ही हैं। वह कह सकता है, “हे प्रिय, जितना चाहो ले लो; तुम मेरी परिपूर्णता में भागी होती हो तो मैं कंगाल नहीं हो जाता। तुम मेरी हो, और जो कुछ मेरा है वह सब तुम्हारा है।”

इसलिए, हे मेरे मित्रो, जो तुम्हारे प्रभु का है उससे अपने को धनी करो। जितनी बार हो सके, आत्मिक सिला बीनने जाओ। आशीष बटोरने का कोई अवसर कभी मत चूको। अनुग्रह के सिंहासन के पास, एकान्त मनन में, भक्तिपूर्ण पुस्तकें पढ़ने में, या विश्वासयोग्य मसीहियों की संगति में सिला बीनो। चाहे तुम केवल एक छोटी सी मुट्ठी ही ले सको, तो भी वह कुछ न होने से अच्छा है। तुम में से जो काम-धन्धे और चिन्ताओं में व्यस्त हैं, यदि तुम प्रभु के खेत में केवल पाँच मिनट भी बिता सको, तो बिताओ। यदि तुम पूला न उठा सको, तो एक बाल उठाओ; यदि बाल न मिले, तो एक दाना ही उठा लो। जितना बटोर सको, बटोरो।

एक और बात: सिला बीनने से कभी मत डरो। विश्वास रखो और परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को अपने लिये माँगो। यीशु तुम्हें अपने वरदानों का खुलकर उपयोग करते देखकर आनन्दित होता है। उसका निमन्त्रण यह है, “हे मित्रों, तुम भी खाओ, हे प्यारों, पियो, मनमाना पियो” (श्रेष्ठगीत 5:1)। जब तुम्हें कोई भरपूर प्रतिज्ञा मिले, तो उसी पर जीओ। पवित्रशास्त्र में से मधु निकालो और उसकी मिठास का आनन्द लो। यदि तुम्हें कोई अद्भुत आशीष मिले, तो उसे आनन्द से उठा ले जाओ। तुम प्रभु के विषय में बहुत अधिक विश्वास कर ही नहीं सकते; जब स्वर्ग के सारे खत्ते तुम्हारे लिये खुले हैं, तब थोड़े से भाग से सन्तुष्ट मत हो। परिश्रम और भरोसे के साथ सिला बीनो, यह जानते हुए कि जो खेतों और पूलों का स्वामी है वह प्रेम से तुम्हारी चौकसी करता है, और एक दिन तुम्हें अनन्त महिमा में अपने साथ एक कर लेगा। धन्य है वह सिला बीननेवाली जो जिन खेतों में जाती है उनमें अनन्त प्रेम और अनन्त जीवन पाती है!

अनाज के खेतों में भोजन का समय “फिर खाने के समय बोअज ने उससे कहा, यहीं आकर रोटी खा, और अपना कौर सिरके में डूबा। तो वह लवनेवालों के पास बैठ गई; और उसने उसको भुनी हुई बालें दीं; और वह खाकर तृप्त हुई, वरन् कुछ बचा भी रखा” (रूत 2:14)। हम अनाज के खेतों में केवल सिला बीनने ही नहीं जाते, वरन् काटनेवालों के साथ विश्राम करने भी जाते हैं, कि किसी घनी छायावाले पेड़ के नीचे बैठकर अपने आप को ताज़ा करें। परमेश्वर करे कि डरपोक सिला बीननेवाले इस निमन्त्रण को स्वीकार करें, और भोजन का पूरा आनन्द लेने का साहस रखें, और कुछ घर भी ले जाएँ कि अपने ज़रूरतमन्द मित्रों के साथ बाँटें।

पहली बात, परमेश्वर के काटनेवालों के भोजन के समय होते हैं। जो परमेश्वर के लिये काम करते हैं, वे उसे एक भला स्वामी पाएँगे।

वह बैलों की भी चिन्ता करता है, और उसने इस्राएल को आज्ञा दी, “दाँवते समय चलते हुए बैल का मुँह न बाँधना” (व्यवस्थाविवरण 25:4)।

तो वह अपने सेवकों की कितनी अधिक चिन्ता करता है! “उसने अपने डरवैयों को आहार दिया है; वह अपनी वाचा को सदा तक स्मरण रखेगा” (भजन संहिता 111:5)। यीशु के खेतों के काटनेवालों को केवल अन्तिम प्रतिफल ही नहीं, वरन् मार्ग में शान्ति भी मिलती है। परमेश्वर अपने सेवकों को दो बार प्रतिफल देता है: पहले स्वयं काम में, और दूसरे उस आनन्द में जो उस काम से उपजता है। वह अपनी सेवा में ऐसा आनन्द देता है कि वे कह सकते हैं, “हे प्रभु, हम तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हैं” (भजन संहिता 40:8)। स्वर्ग दिन-रात उसकी सेवा करना है, और जब हम पृथ्वी पर मन लगाकर उसकी सेवा करते हैं, तब हमें उसका स्वाद मिल जाता है।

परमेश्वर भोजन के विशेष समय भी ठहराता है, जब उसके सेवक वचन सुनने के लिये इकट्ठे होते हैं। जब प्रभु सेवकों को आशीष देता है, तब वे पुराने समय के चेलों के समान करते हैं: यीशु से रोटियाँ और मछलियाँ लेकर लोगों में बाँटते हैं। हम अपने बल से किसी एक प्राण को भी तृप्त नहीं कर सकते, परन्तु प्रभु के साथ हजारों का भी प्रबन्ध हो जाता है। तुम जानते हो कि आनन्द के साथ वचन सुनने बैठना और शिक्षा को अपने प्राण के लिये मीठी पाना क्या होता है। जब अनुग्रह के सिद्धान्त स्पष्टता से समझाए जाते हैं, जब मसीह को ऊँचा उठाया जाता है, जब आत्मा के काम को स्मरण किया जाता है, और पिता की योजना का आदर किया जाता है, तब मेज़ भरपूर होती है और परमेश्वर की सब सन्तानें तृप्त होती हैं।

अक्सर परमेश्वर पढ़ने और मनन में भोजन के निजी समय भी ठहराता है। “उसके मार्गों में उत्तम-उत्तम पदार्थ पाए जाते हैं” (भजन संहिता 65:11)। वचन पर मनन करने से बढ़कर विश्वासी का पोषण और कोई बात नहीं करती। लोग विश्वास में धीरे-धीरे इसलिए बढ़ते हैं कि वे सत्य को बहुत कम चबाते हैं। पशुओं को जुगाली करनी पड़ती है; जो वे चरते हैं वह नहीं, वरन् जो वे पचाते हैं वही उन्हें पोषण देता है। हमें सत्य को अपने मन में बार-बार उलटना-पलटना चाहिए, कि उससे पोषण पाएँ। निजी भक्ति ऐसा देश है जिसमें दूध और मधु की धारा बहती है, एक ऐसी वाटिका जो आत्मिक फल और आनन्द उपजाती है। पृथ्वी का कोई भोज उसकी बराबरी नहीं कर सकता। वचन पर मनन हरी-हरी चराइयाँ, सुखदाई जल, और मधु से बढ़कर आनन्द देता है। प्रार्थना और मनन की ये निजी घड़ियाँ वैसी ही ताज़गी देती हैं, जैसी दोपहर को अपने स्वामी के साथ बैठे काटनेवालों को मिलती है। जब और सब कुछ विफल हो गया, तब बहुतों ने बाइबल को ही अपना भोजन, पानी और साथी पाया है।

भोजन का एक विशेष रूप से ठहराया हुआ समय कम से कम सप्ताह में एक बार आता है—प्रभु-भोज। वहाँ हमें अक्षरशः भी और आत्मिक रूप से भी भोजन मिलता है। रोटी और दाखमधु मसीह की देह और लहू के प्रतीक हैं, जो अनन्त जीवन देते हैं: “जो मेरा माँस खाता, और मेरा लहू पीता है, अनन्त जीवन उसी का है, और मैं अन्तिम दिन फिर उसे जिला उठाऊँगा” (यूहन्ना 6:54)। आह, प्रभु-भोज में हमें कैसे मधुर अनुभव मिले हैं! यदि कुछ लोग इस विधि में मसीह को भोजन बनाने की आशीष को समझ लेते, तो वे कलीसिया की संगति की उपेक्षा न करते। स्वामी की आज्ञाओं को मानने में बड़ा प्रतिफल है, और उनकी उपेक्षा करने में हानि। मसीह प्रभु-भोज की मेज़ से बँधा नहीं है, तो भी “यदि तुम मुझसे प्रेम रखते हो, तो मेरी आज्ञाओं को मानोगे” (यूहन्ना 14:15) हमें स्मरण दिलाता है कि वह वहाँ हमसे मिलता है।

मेज़ पर हमारा प्राण प्रतीक से वास्तविकता की ओर उठता है; हम आत्मिक रोटी खाते हैं और यीशु की छाती की ओर अपना सिर टिकाते हैं: “वह मुझे भोज के घर में ले आया, और उसका जो झण्डा मेरे ऊपर फहराता था वह प्रेम था” (श्रेष्ठगीत 2:4)।

भोजन के इन नियमित समयों के अतिरिक्त, परमेश्वर अनुग्रह की अचानक घड़ियाँ भी देता है। चलते-फिरते हम अचानक प्रेम की बाढ़ का अनुभव करते हैं; काम-धन्धे के बीच हमारे मन ऊपर उठ जाते हैं और वसन्त के सोतों की नाईं नाच उठते हैं।

रोगशय्या पर भी कोमल अनुग्रह हमारी परीक्षाओं को मीठा बना सकता है। भोर को मसीह ओस के समान हमारे मन में विचार टपकाता है; साँझ को मनन हमें ताज़ा करता है; रात के पहरों में वह हमारा गीत बन जाता है।

परमेश्वर के काटनेवाले कठिन परिश्रम करते हैं, परन्तु जब वे विश्राम करते हैं और अपने स्वामी के भरपूर प्रबन्ध में से खाते हैं, तब उन्हें शान्ति मिलती है। फिर बल पाकर वे दिन की गर्मी में कटनी करने को फिर उठ खड़े होते हैं।

अब, तीसरी बात—और कहानी में यह एक बहुत ही मधुर बात है—बोअज ने उसे भुनी हुई बालें दीं। उसने वैसा ही किया जैसा उससे कहा गया था: “यहीं आकर रोटी खा” (रूत 2:14)। वह कहाँ बैठी? ध्यान से देखो कि वह “लवनेवालों के पास बैठ गई” (रूत 2:14)। उसने अपने आप को उनमें से एक नहीं समझा। तुम में से कुछ के समान, जो प्रभु-भोज के निकट नहीं आते परन्तु बैठकर देखते रहते हैं, तुम भी “लवनेवालों के पास” बैठे हो। तुम्हें डर है कि तुम परमेश्वर के लोग नहीं हो, तो भी तुम उनसे प्रेम रखते हो, और इसलिए उनके पास बैठते हो। यदि कोई आशीष मिलनी है और तुम पूरी रीति से उस तक नहीं पहुँच सकते, तो तुम उन लोगों के जितना निकट हो सके उतना निकट बैठोगे जिन्हें वह मिलती है।

और जब वह वहाँ बैठी थी, तब क्या हुआ? क्या उसने हाथ बढ़ाकर स्वयं भोजन ले लिया? नहीं, लिखा है, “उसने उसको भुनी हुई बालें दीं” (रूत 2:14)। यही तो बात है: केवल कटनी का प्रभु ही सबसे उत्तम आत्मिक ताज़गी दे सकता है। मैं अपने स्वामी के नाम से सच्चाई और प्रेम के साथ निमन्त्रण दे सकता हूँ, तो भी जब तक आत्मा उन्हें न खींचे, कोई नहीं आएगा। कोई भी काँपता हुआ हृदय केवल मेरे कहने से ईश्वरीय आशीष ग्रहण नहीं करता। जब स्वयं राजा निकट आकर भुनी हुई बालें देता है, तभी वे ग्रहण की जाती हैं। वह यह कैसे करता है? अपने अनुग्रहकारी आत्मा के द्वारा वह पहले तुम्हारे भीतर विश्वास जगाता है। तुम्हें शायद डर हो कि तुम जैसा पापी कभी “प्रिय में ग्रहणयोग्य” नहीं ठहर सकता (इफिसियों 1:6), तो भी आत्मा तुम्हारी आशा में जीवन फूँकता है और उसे दृढ़ विश्वास में बदल देता है, जो कहता है, “हाँ, मेरा प्रेमी मेरा है, और उसकी लालसा मेरी ओर नित बनी रहती है” (श्रेष्ठगीत 7:10)।

यह करके उद्धारकर्ता और भी करता है: वह परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे मन में उण्डेलता है। मसीह का प्रेम डिब्बे में बन्द मीठे इत्र के समान है। केवल वही जानता है कि डिब्बा कैसे खोला जाए और सुगन्ध कैसे फैलाई जाए। वह स्वयं परमेश्वर का प्रेम प्राण में डालता है।

परन्तु यीशु इससे भी अधिक करता है: जब वह हमें अपने साथ घनिष्ठ संगति देता है, तब वह अपने ही हाथ से भुनी हुई बालें देता है। यह न सोचो कि यह कोई सपना है; आज भी मसीह से बातें करना सचमुच होता है। जितने निश्चय से तुम किसी घनिष्ठ मित्र से बातचीत कर सकते हो या किसी प्रिय साथी के साथ शान्ति पा सकते हो, उतने ही निश्चय से तुम यीशु से संगति कर सकते हो और इम्मानुएल की उपस्थिति में आनन्द कर सकते हो। वह दूर का उद्धारकर्ता नहीं; वह निकट है। उसका वचन हमारे मुँह में और हमारे मन में है, और हम आज उसके साथ वैसे ही चलते हैं जैसे पुराने समय के चुने हुए लोग चलते थे, और उससे वैसे ही संगति करते हैं जैसे उसके प्रेरित पृथ्वी पर करते थे—आत्मिक रूप से, परन्तु सचमुच।

फिर से, प्रभु यीशु भुनी हुई बालें तब देता है जब आत्मा भीतर गवाही देता है कि हम “परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं” (1 यूहन्ना 5:1)। विश्वासी अपने उद्धार को सब सन्देह से परे जान सकता है।

जैसा फिलिप द मॉर्नी ने अपने समय में कहा था, आत्मा उद्धार को हमारे लिये ज्यामिति के किसी प्रमाण के समान स्पष्ट कर सकता है। जितना स्पष्ट यह है कि दो और दो चार होते हैं, उतनी ही स्पष्टता से हम “जान सकते हैं कि हम मृत्यु से पार होकर जीवन में पहुँचे हैं” (1 यूहन्ना 3:14)। आकाश का सूर्य आँख के लिये उतना निश्चित नहीं, जितना आत्मा के द्वारा आश्वस्त किए गए हृदय के लिये उद्धार निश्चित है।

अब बेचारी रूत की काँपती हुई प्रार्थना उठे: हे प्रभु, मुझे भुनी हुई बालें दे! “मुझे भलाई का कोई चिन्ह दिखा; अपने दास का उपकार कर; मुझे खींच ले, कि मैं तेरे पीछे दौड़ूँ” (भजन संहिता 86:17; श्रेष्ठगीत 1:4)। हे प्रभु, अपना प्रेम मेरे मन में उण्डेल दे!

“हे पवित्र आत्मा, स्वर्गीय कबूतर, अपनी सारी जीवनदायक सामर्थ्य लेकर आ; आ, उद्धारकर्ता का प्रेम हम में उण्डेल दे, तब हमारा प्रेम भी सुलग उठेगा।”

मसीह तक पहुँचने का कोई मार्ग नहीं, सिवाय इसके कि मसीह स्वयं को हम पर प्रगट करे। बोअज के भुनी हुई बालें देने के बाद हमें बताया गया है कि “वह खाकर तृप्त हुई, वरन् कुछ बचा भी रखा” (रूत 2:14)। हर एक रूत के साथ ऐसा ही होगा। हर एक पश्चात्तापी विश्वासी बनेगा, हर एक विलाप करनेवाला गीत गानेवाला बनेगा। दोष-बोध और हिचकिचाहट के लम्बे समय आ सकते हैं, परन्तु एक समय आएगा जब प्राण प्रभु के पक्ष में निर्णय करेगा और कहेगा, “यदि नाश हो गई तो हो गई” (एस्तेर 4:16)। “मैं जैसा हूँ वैसा ही यीशु के पास जाऊँगा। मैं अपने किन्तु-परन्तु और अगर-मगर से नहीं खेलूँगा। जब वह मुझसे यह विश्वास करने को कहता है कि वह मेरे लिये मरा, तो मैं अपने उद्धार के लिये उसके क्रूस पर भरोसा रखूँगा।” जब ऐसा होगा, तब तुम तृप्त हो जाओगे। तुम्हारा मन उन बहुमूल्य सच्चाइयों से भर जाएगा जिन्हें मसीह प्रगट करता है; तुम्हारा हृदय यीशु में, जो परम सुन्दर है, सन्तुष्ट रहेगा; तुम्हारी आशा सुरक्षित रहेगी, क्योंकि स्वर्ग में मसीह को छोड़ तुम्हारा और कौन है?

तुम्हारी लालसाएँ पूरी होंगी, क्योंकि इससे बढ़कर और क्या तृप्त कर सकता है कि हम मसीह को, “उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके साथ दुःखों में सहभागी होने के मर्म को” जानें (फिलिप्पियों 3:10)?

“वह खाकर तृप्त हुई” (रूत 2:14)। हम में से कुछ ने मसीह के प्रेम के गहरे घूँट पिए हैं, यह सोचकर कि हम उसे पूरा का पूरा पी जाएँगे, परन्तु बहुत कुछ छोड़ना ही पड़ा। हमने प्रभु के प्रेम की मेज़ पर भूखे की सी लालसा से भोज किया है, यह कहते हुए, “अनन्त के सिवाय और कुछ मुझे तृप्त नहीं कर सकता,” और फिर भी वह अनन्त हमें दे दिया गया। पापी होते हुए भी हम पाते हैं कि हमारे पाप क्षमा हो गए हैं और यीशु में योग्यता की बहुतायत है। परमेश्वर के वचन के मधुर भाग बाद में आनन्द लेने के लिये हमारे लिये बचे रहते हैं। जैसा यीशु ने कहा, “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते” (यूहन्ना 16:12)। मसीह के साथ इससे ऊँची संगति, इससे गहरी घनिष्ठता, सहभागिता की इससे बड़ी ऊँचाई अभी आनी बाकी है।

थोड़ी देर बाद हम देखते हैं कि रूत ने अपने बचे हुए भोजन का क्या किया। वह उसे घर ले जाकर नाओमी के पास ले गई (रूत 2:14)। इसी प्रकार, तुम जो सोचते हो कि प्रभु की आशीषों पर तुम्हारा कोई दावा नहीं, तुम्हें खाने, तृप्त होने, और घर पर भूखे लोगों के साथ बाँटने की भी अनुमति मिलेगी। हे नये विश्वासियो, यह आदत डालो: जब तुम कोई उपदेश सुनो, तो किसी ऐसे प्रियजन के बारे में सोचो जो आ नहीं सकता, और उसके लिये कुछ घर ले जाओ। जैसे तुमसे प्रेम किया गया है, वैसे ही प्रेम करो। स्मरण रखो: “तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन के साथ प्रेम रख, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख” (मत्ती 22:37-39)। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम न करो और पहले उसका अनुग्रह ग्रहण न करो, तो तुम अपने पड़ोसी के प्राण से सचमुच प्रेम नहीं कर सकते। अपना बीना हुआ उनके लिये घर ले जाओ जो अपने लिये नहीं बटोर सकते।

मैं इससे अधिक कृपालु निमन्त्रण नहीं जानता: “आओ, यीशु के पास तुम्हारा स्वागत है।” यदि तुम काँपते हुए पापी हो, तो प्रभु तुम्हें भुनी हुई बालों की एक मुट्ठी दे, और तुम्हें तब तक भरता रहे जब तक तुम पूरी रीति से तृप्त न हो जाओ।

अध्याय 15 पूरा हुआ

आत्मिक सिला बीनना

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