किसान से बातें
घास के खेत में

अध्याय 13 · 25 मिनट का पठन

घास के खेत में

“वह पशुओं के लिये घास उपजाता है।” — भजन संहिता 104:14 ठहराए हुए समय पर सारा संसार घास की फसल बटोरने में लगा रहता है, और तुम देहात में एक मील भी मुश्किल से जा पाओगे कि नई कटी घास की मनभावनी सुगन्ध तुम्हारी साँसों में न भर जाए और घास काटनेवाले के हँसिये पर धार चढ़ाए जाने की आवाज़ सुनाई न दे। घास के खेत में भी एक सुसमाचार है, और जहाँ तक पवित्र आत्मा हमें सामर्थ्य दे, हम उसी सुसमाचार को खोलकर दिखाना चाहते हैं।

हमारा मूल वचन हमें सीधे उसी स्थान पर ले आता है, इसलिए किसी भूमिका की आवश्यकता नहीं। “वह पशुओं के लिये घास उपजाता है” — इसमें हम तीन बातों पर ध्यान देंगे: पहली, कि घास अपने आप में शिक्षा देनेवाली है; दूसरी, कि जब उसमें परमेश्वर दिखाई देता है तब वह कहीं अधिक शिक्षा देती है; और तीसरी, कि पशुओं के लिये घास के उगने के द्वारा अनुग्रह की रीतियाँ समझाई जा सकती हैं।

तो पहले, “वह पशुओं के लिये घास उपजाता है।” यहाँ हमारे सामने एक ऐसी वस्तु है जो अपने आप में शिक्षा देनेवाली है। जल और ज्योति को छोड़, पवित्रशास्त्र में शायद ही कोई प्रतीक मैदान की घास से अधिक बार काम में लाया गया हो।

सबसे पहले, घास को हमारी नश्वरता के प्रतीक के रूप में देखकर शिक्षा ली जा सकती है। “सब प्राणी घास हैं।” मनुष्य का सारा इतिहास एक चरागाह में देखा जा सकता है। वह हरा और कोमल होकर उगता है, और बचपन के उस पाले के अधीन रहता है जो उसके नन्हे जीवन को धमकाता है; वह बढ़ता है, सयाना होता है, और जैसे घास फूलों से सजती है वैसे ही वह भी सुन्दरता धारण करता है; परन्तु कुछ समय बाद उसका बल जाता रहता है और उसकी सुन्दरता पर झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे घास मुर्झा जाती है और उसके पीछे एक नई पीढ़ी आती है जो अपनी बारी में वह भी मुर्झा जाती है। हमारी ही तरह घास भी केवल सड़ने के लिये पकती है। मनुष्य की सन्तान समय आने पर सयानी होती है, और फिर ढलकर हरी घास के समान मुर्झा जाती है।

कुछ घास को तो पकने तक छोड़ा ही नहीं जाता, परन्तु घास काटनेवाले का हँसिया उसे उतार ले जाता है, ठीक वैसे ही जैसे तेज़ पाँववाली मृत्यु आदम की बेपरवाह सन्तानों को जा पकड़ती है। “सब प्राणी घास हैं, उनकी शोभा मैदान के फूल के समान है। जब यहोवा की साँस उस पर चलती है, तब घास सूख जाती है, और फूल मुर्झा जाता है; निःसन्देह प्रजा घास है।” — यशायाह 40:6-7 यह बहुत दीन करनेवाली बात है, और हमें बार-बार इसका स्मरण दिलाने की आवश्यकता है, कहीं ऐसा न हो कि हम तारों तले अमरता के स्वप्न देखने लगें। हमें कभी घास पर इस बात को स्मरण किए बिना नहीं चलना चाहिए कि जहाँ हरी दूब हमारी कब्रों को ढाँपती है, वहीं वह हमें उनकी याद भी दिलाती है, और अपनी हर एक पत्ती से हमारी नश्वरता पर एक उपदेश सुनाती है, जिसका मूल वचन यह है, “सब प्राणी घास हैं, उनकी शोभा मैदान के फूल के समान है।”

दूसरे, पवित्रशास्त्र में घास को अक्सर दुष्टों के चित्र के रूप में काम में लाया गया है। दाऊद अपने ही अनुभव से हमें बताता है कि जब धर्मी मनुष्य भक्तिहीनों का कुशल देखता है तो वह दुष्टों से डाह करने लगता है। हमने उन्हें हरे पेड़ों के समान फैलते हुए देखा है, मानो वे अपने-अपने स्थान पर जमे और जड़ पकड़े हुए हों; और जब हम अपनी ही विपत्तियों के नीचे तड़पते रहे, और यह अनुभव करते रहे कि हम दिन भर मार खाते आए हैं और प्रति भोर को हमारी ताड़ना होती आई है, तब हमारे मन में यह पूछने की इच्छा हुई है, “यह परमेश्वर के धर्ममय शासन से कैसे मेल खा सकता है?” भजनकार हमें स्मरण दिलाता है कि थोड़े ही समय में हम दुष्ट के स्थान से होकर जाएँगे और देखेंगे कि वह वहाँ है ही नहीं; हम उसके स्थान को भली भाँति ढूँढ़ेंगे और पाएँगे कि अब उसका कोई पता नहीं; क्योंकि वह घास के समान झट कट जाता है और हरी घास के समान मुर्झा जाता है।

“परन्तु दुष्ट तो लहराते हुए समुद्र के समान है जो स्थिर नहीं रह सकता; और उसका जल मैल और कीच उछालता है।

‘दुष्टों के लिये,’ मेरे परमेश्वर का यही वचन है, ‘शान्ति नहीं है।’” — यशायाह 57:20-21 घास सूख जाती है, फूल मुर्झा जाता है, और इसी रीति से उन लोगों का वैभव भी सदा के लिये जाता रहेगा जो नाशवान वस्तुओं पर भरोसा रखते हैं और पृथ्वी के धन में सान्त्वना खोदते फिरते हैं। जैसे पूर्व देश का किसान हरी घास को बटोरता है और उसकी पहली सुन्दरता के होते हुए भी उसे भट्ठे में झोंक देता है, वैसा ही तुम्हारा भी हाल होगा, हे डींग मारनेवाले पापियो! इसी प्रकार न्यायी अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, “जलाने के लिये उनके गट्ठे बाँध लो।”

“दुष्ट अधोलोक में लौट जाएँगे, तथा वे सब जातियाँ भी जो परमेश्वर को भूल जाती है…” — भजन संहिता 9:17 अब कहाँ है तुम्हारा रंग-रेलियाँ मनाना? अब कहाँ है तुम्हारा भरोसा? अब कहाँ है तुम्हारा घमण्ड और तुम्हारी धूमधाम? अब कहाँ हैं तुम्हारी डींगें और तुम्हारी मुँहफट निन्दा की बातें?

वे सदा के लिये चुप हो गए हैं; क्योंकि जैसे हाण्डी के नीचे काँटे चरचराते तो हैं पर झट भस्म हो जाते हैं और मुट्ठी भर राख के सिवा कुछ नहीं छोड़ते, वैसा ही इस जीवन में दुष्टों का हाल होगा; परमेश्वर के क्रोध की आग उन्हें खा जाएगी।

यह स्मरण करना अधिक सुखद है कि पवित्रशास्त्र में घास परमेश्वर के चुने हुओं का भी चित्र है। दुष्टों की तुलना जंगल के गीदड़ों से की गई है, परन्तु परमेश्वर के अपने लोग उनके स्थान पर उग आएँगे, क्योंकि लिखा है, “जिस स्थान में सियार बैठा करते हैं उसमें घास और नरकट और सरकण्डे होंगे।”

चुने हुओं की तुलना घास से अन्तिम दिनों में उनकी गिनती के कारण और उनके बढ़ने की शीघ्रता के कारण की गई है। तुम्हें वह वचन स्मरण होगा, “इस [अनाज] की एक मुट्ठी एक बड़ा गुच्छा बन जाएगी, और वह बड़ा गुच्छा जाति में एक नया पौधा बन जाएगा।” काश, वह बहुत समय से प्रतीक्षित दिन शीघ्र आए, जब परमेश्वर के लोग घास के एक अकेले गुच्छे के समान न रहेंगे, परन्तु जब वे घास के बीच में, धाराओं के पास के मजनुओं के समान उग आएँगे। घास और मजनू उन वस्तुओं में से हैं जो हमारे जाने हुए संसार में सबसे जल्दी बढ़ती हैं; इसी प्रकार एक जाति एक ही दिन में उत्पन्न होगी, और भीड़ की भीड़ एक साथ मन फिराएगी। जब परमेश्वर का आत्मा कलीसिया में सामर्थ्य से काम करता है, तब मनुष्य मसीह की ओर ऐसे फिरते हैं जैसे कबूतर अपने दरबों की ओर उड़ते हैं, यहाँ तक कि चकित कलीसिया पुकार उठती है, “ये कहाँ थे?” काश, हम वह सुनहरा युग देखने तक जीवित रहें, वह समय जिसकी भविष्यद्वक्ताओं ने पहले से चर्चा की है, जब परमेश्वर के लोगों की मण्डली चरागाहों की घास की पत्तियों के समान अनगिनत होगी, और अनुग्रह और सच्चाई फूले-फलेंगे।

परमेश्वर के लोग इस कारण कितने घास के समान हैं: वे पूरी तरह स्वर्ग के प्रभावों पर निर्भर हैं। यदि वसन्त की बौछारें और कोमल ओस रोक ली जाएँ तो हमारे खेत सूख जाते हैं; और आत्मा की अनुग्रहपूर्ण भेंटों के बिना हमारे प्राण क्या हैं? कभी-कभी कड़ी परीक्षाओं के कारण हमारे घायल हृदय कटी हुई घास के समान हो जाते हैं, और तब हमारे पास यह प्रतिज्ञा होती है, “वह घास की खूँटी पर बरसने वाले मेंह, और भूमि सींचने वाली झड़ियों के समान होगा।” हमारी कड़ी विपत्तियों ने हमारी सुन्दरता छीन ली है, और तब प्रभु हमारी सुधि लेता है और हम फिर से जी उठते हैं। उस पुरानी कहावत के लिये परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो एक सच्ची लोकोक्ति होने के साथ-साथ एक अनुग्रहपूर्ण सच्चाई भी सिखाती है, “घास की हर एक पत्ती की अपनी ओस की बूँद होती है।” परमेश्वर को यह भाता है कि वह अपने हर एक दास को अपनी विशेष दया दे: “धन यहोवा की आशीष ही से मिलता है, और वह उसके साथ दुःख नहीं मिलाता।”

फिर एक बार, घास उस भोजन के समान है जिससे प्रभु अपने चुने हुओं की आवश्यकताएँ पूरी करता है। तेईसवाँ भजन लो, और तुम पाओगे कि यह चित्र चरवाहों के गीत के सबसे मधुर रूप में उतारा गया है: “वह मुझे हरी-हरी चराइयों में बैठाता है; वह मुझे सुखदाई जल के झरने के पास ले चलता है।”

जैसे भेड़ को उसके स्वभाव के अनुकूल आहार मिलता है, और उसका चरवाहा यह आहार इतनी बहुतायत से देता है कि वह न केवल चरती है परन्तु चारे के बीच में ही बैठ जाती है, भरपूरी से तृप्त और पूरी तरह निश्चिन्त, वैसे ही परमेश्वर के लोग भी होते हैं जब यीशु मसीह उन्हें वाचा की चराइयों में ले जाता है और उन पर वे बहुमूल्य सच्चाइयाँ प्रगट करता है जिन पर उनके प्राण पलते हैं।

प्रियो, क्या हमने यह प्रतिज्ञा सच्ची नहीं पाई, “सेनाओं का यहोवा इसी पर्वत पर सब देशों के लोगों के लिये ऐसा भोज तैयार करेगा जिसमें भाँति-भाँति का चिकना भोजन और निथरा हुआ दाखमधु होगा; उत्तम से उत्तम चिकना भोजन और बहुत ही निथरा हुआ दाखमधु होगा”? मेरे प्राण ने कभी-कभी मसीह को इतना खाया है कि मुझे लगा कि मैं और ग्रहण नहीं कर सकता, और तब मैं अपने परमेश्वर की बहुतायत में विश्राम करने को लेट गया हूँ, उसकी प्रसन्नता से तृप्त और प्रभु की भलाई से भरपूर।

इस प्रकार तुम देखते हो कि जो कान लगाएँगे उनके लिये घास स्वयं भी शिक्षा से खाली नहीं है। दूसरे स्थान पर, घास के उगने में परमेश्वर दिखाई देता है। पहले वह एक काम करनेवाले के रूप में दिखाई देता है — “वह घास उपजाता है”। दूसरे, वह एक देखभाल करनेवाले के रूप में दिखाई देता है — “वह पशुओं के लिये घास उपजाता है”।

पहले, एक काम करनेवाले के रूप में परमेश्वर घास की हर एक पत्ती में देखा जा सकता है, यदि हमारे पास उसे पहचानने की आँखें हों। संसार अन्धा है जब वह ‘प्राकृतिक नियमों’ और ‘प्राकृतिक कारणों’ की बातें करता है और यह भूल जाता है कि नियम अपने आप काम नहीं कर सकते, और तथाकथित प्राकृतिक कारण तब तक कारण हैं ही नहीं जब तक पहला कारण उन्हें गति न दे। पुराने रोमी लोग कहा करते थे, परमेश्वर ने गरजा; परमेश्वर ने बरसाया। हम कहते हैं, गरज रहा है; बरस रहा है। पर “कौन” गरज रहा है? ऐसे सब कथन परमेश्वर के विचार से बच निकलने के प्रयास हैं। हम आम तौर पर कहते हैं, “प्रकृति के काम कैसे अद्भुत हैं!” परन्तु “प्रकृति” है क्या? मुझे सड़क पर का एक अविश्वासी स्मरण है, जो प्रकृति के विषय में बोल रहा था, और एक मसीही ने उससे पूछा कि क्या वह बता सकता है कि प्रकृति क्या है। उसने कोई उत्तर न दिया। घास का उपजना परमेश्वर के वास्तविक काम से अलग किसी प्राकृतिक नियम का फल नहीं है; केवल नियम तो शक्तिहीन होता, जब तक कि वह महान स्वामी स्वयं उस पदार्थ में, जो नियम के अधीन है, शक्ति न भेजे — बहुत कुछ उस भाप के इंजन के समान जो कपास की मिल के सारे पहियों को शक्ति पहुँचाता है। अब जब मैं जानता हूँ कि मेरा परमेश्वर वहाँ अपने प्राणियों के लिये काम कर रहा है, तो मैं घास पर ऐसे विश्राम पाता हूँ जैसे किसी राजसी पलंग पर।

तुमसे परमेश्वर को एक काम करनेवाले के रूप में देखने को कहकर, मैं चाहता हूँ कि तुम इसे काम में लाओ — इसलिए मैं तुमसे आग्रह करता हूँ कि रोज़ की साधारण वस्तुओं में परमेश्वर को देखो। वह घास उपजाता है — और घास तो साधारण वस्तु है। तुम उसे हर कहीं देखते हो, फिर भी परमेश्वर उसमें है। उसका अध्ययन करो, उसे तोड़कर देखो; मैदान के हर एक फूल में और हर एक हरी पत्ती में परमेश्वर के गुण प्रगट होते हैं।

इसी रीति से अपने रोज़ के अनुभवों में परमेश्वर को देखो — अपनी दैनिक परेशानियों में, अपने साधारण आनन्दों में, अपनी नित्य की दयाओं में। यह न कहो, “परमेश्वर को देखने से पहले मुझे कोई आश्चर्यकर्म देखना होगा।” सच तो यह है कि हर एक वस्तु आश्चर्य से भरी है। अपनी मेज़ की रोटी में और अपने कटोरे के जल में परमेश्वर को देखो। यदि तुम हर एक घटना में कह सको, “यह सब मेरे पिता ने किया है,” तो यह जीने की सबसे आनन्दमय रीति होगी। छोटी-छोटी बातों में भी परमेश्वर को देखो। जीवन की छोटी बातें अक्सर सबसे बड़ी परेशानियाँ होती हैं। मनुष्य यह सुनकर कि उसका घर जल गया, उससे कहीं अधिक शान्त रहेगा, जितना वह तब कुढ़ेगा जब वह अपनी मेज़ पर ठीक से न पका हुआ माँस देखे, जबकि उसने उसके उत्तम होने की आशा की थी। जूते में पड़ा छोटा-सा कंकड़ ही यात्री को लँगड़ाने पर विवश करता है। छोटी बातों में भी और बड़ी बातों में भी परमेश्वर को देखना — यह विश्वास करना कि जब लहर चट्टान से टकराकर टूटती है तो उसकी फुहार की हर एक बूँद का मार्ग उतना ही परमेश्वर के हाथ में है जितना अपनी कक्षा में घूमते सबसे विशाल ग्रह की गति — यही सब सच्चा ज्ञान है।

एकान्त की वस्तुओं के बीच परमेश्वर के काम करने के विषय में भी सोचो; क्योंकि घास केवल वहीं नहीं उगती जहाँ लोग उसकी देखभाल करते हैं, परन्तु उस सुनसान पहाड़ की ढलान पर भी उगती है जहाँ कोई यात्री कभी नहीं गया। जहाँ केवल किसी जंगली पक्षी की आँख ने हरी घास और काई को देखा है, वहाँ भी परमेश्वर के काम अपनी सुन्दरता दिखाते हैं; क्योंकि परमेश्वर के काम मनुष्यों के अतिरिक्त और आँखों के लिये भी सुन्दर हैं। और तुम, परमेश्वर की एकाकी सन्तान, जो किसी दूर के गाँव में अनदेखी और अनजानी रहती है — स्वर्ग का प्रेम तुम्हें भूला नहीं है। वह बिलकुल अकेले में घास उगाता है; क्या वह अकेलेपन के होते हुए भी तुम्हें फूलने-फलने न देगा? वह एकान्त और उपेक्षा में भी तुम्हारे अनुग्रह के गुणों को बढ़ा सकता है और तुम्हें स्वर्ग के लिये तैयार कर सकता है। घास हमारे पाँवों तले पड़ी रहती है, और कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता कि वह पाँव से कुचली जाती है, फिर भी परमेश्वर उसे उगाता है। कदाचित तुम सताए हुए और थके-माँदे हो, परन्तु इससे निराश न हो, क्योंकि परमेश्वर सब पिसे हुओं के लिये धर्म के काम करता है: वह घास उगाता है, और वह जीवन के सब दबावों और क्लेशों के बीच भी तुम्हारे हृदय को हरा-भरा रख सकता है, ताकि चाहे सारा संसार तुम्हें रौंदता फिरे, तौभी तुम आनन्दित और पवित्र बने रहो, और उस अमर जीवन में जीते रहो जो स्वयं परमेश्वर तुम्हें देता है, चाहे नरक भी अपनी एड़ी तुम पर क्यों न रख दे।

हे दीन और दरिद्र, अनदेखे, सताए हुए और रौंदे हुए जन, परमेश्वर घास उगाता है, और वह तुम्हारी भी सुधि लेगा।

परन्तु मैंने कहा था कि हमें इस वचन में परमेश्वर को एक महान देखभाल करनेवाले के रूप में भी देखना चाहिए। “वह पशुओं के लिये घास उपजाता है।” क्या परमेश्वर बैलों ही की चिन्ता करता है? या क्या यह केवल हमारे लिये कहा गया है? “दाँवते समय चलते हुए बैल का मुँह न बाँधना।” यह दिखाता है कि परमेश्वर मैदान के पशुओं की चिन्ता करता है; परन्तु यह इससे भी अधिक दिखाता है: कि वह चाहता है कि जो उसके लिये काम करते हैं वे काम करते हुए खिलाए जाएँ। परमेश्वर पशुओं की चिन्ता करता है और उनके लिये घास उगाता है। तो हे मेरे प्राण, चाहे तूने कभी-कभी दाऊद के साथ कहा है, “मैं अबोध और नासमझ था, मैं तेरे सम्मुख मूर्ख पशु के समान था,” तौभी परमेश्वर तेरी चिन्ता करता है।

“वह पशुओं को और कौवे के बच्चों को जो पुकारते हैं, आहार देता है।” वहाँ तुम्हारे सामने पक्षियों के लिये परमेश्वर की चिन्ता का उदाहरण है, और यहाँ हमारे सामने पशुओं के लिये उसकी चिन्ता है; और हे मेरे सुननेवाले, चाहे तुम अपने आप को कौवे के समान काला और अशुद्ध, और आत्मिक भलाई से उतना ही दूर समझो जितने पशु हैं, तौभी इस वचन से शान्ति पाओ: वह पशुओं को घास देता है, और वह तुम्हें अनुग्रह देगा, चाहे तुम अपने आप को उसके सामने पशु के समान समझो।

ध्यान दो कि वह उन पशुओं की चिन्ता करता है जो अपनी चिन्ता करने में असहाय हैं। पशु न घास लगा सकते हैं और न उसे उगा सकते हैं। चाहे वे इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते, तौभी वह उनके लिये सब कुछ करता है: वह घास उगाता है। तुम जो अपनी सहायता करने में पशुओं के समान असहाय हो, जो केवल खड़े होकर दुःख में कराह सकते हो पर नहीं जानते कि क्या करें, परमेश्वर अपनी करुणा से तुम्हें सम्भाल सकता है और अपनी कोमलता से तुम पर अनुग्रह कर सकता है। अपनी प्रार्थनाओं का मिमियाना स्वर्ग तक पहुँचने दो; अपनी लालसाओं का अर्थ उस तक पहुँचने दो, और सहायता तुम्हारे पास आएगी, चाहे तुम अपनी सहायता न कर सको। पशु गूँगे, बेज़ुबान प्राणी हैं, फिर भी परमेश्वर उनके लिये घास उगाता है। क्या वह उनकी सुनेगा जो बोल नहीं सकते, और उनकी न सुनेगा जो बोल सकते हैं? जब हमारा परमेश्वर मैदान के पशुओं पर भी ध्यान से दृष्टि रखता है, तो जब उसके अपने बेटे और बेटियाँ उसके दर्शन के खोजी होना चाहें, तब वह निश्चय ही उन पर दया करेगा।

यह भी कहना है: परमेश्वर न केवल पशुओं की चिन्ता करता है, परन्तु जो भोजन वह उनके लिये देता है वह उनके उपयुक्त भी है—वह पशुओं के लिये घास उगाता है, ठीक वैसा ही भोजन जिसकी जुगाली करनेवाले पशुओं को आवश्यकता होती है। इसी रीति से प्रभु परमेश्वर अपने लोगों के लिये उपयुक्त पोषण का प्रबन्ध करता है। विश्वास से उस पर निर्भर रहो और प्रार्थना में उसकी बाट जोहो, और तुम्हें अपने उपयुक्त भोजन मिलेगा। तुम परमेश्वर की दया में ठीक वही पाओगे जिसकी तुम्हारे स्वभाव को आवश्यकता है—तुम्हारी अपनी अनोखी आवश्यकताओं से मेल खाती हुई सामग्री।

यह “उपयुक्त” भोजन प्रभु पशुओं के लिये सुरक्षित रखता है, क्योंकि पशुओं का भोजन और कोई नहीं खाता। घास उनके लिये है, और कोई दूसरा उसे नहीं लेता; वह उन्हीं के लिये रखी गई है। इसी रीति से परमेश्वर ने अपने लोगों के लिये एक विशेष प्रबन्ध किया है: “यहोवा के भेद को वही जानते हैं जो उससे डरते हैं, और वह अपनी वाचा उन पर प्रगट करेगा” — भजन संहिता 25:14। यद्यपि घास को खाने की छूट तो किसी को भी है, फिर भी उन पशुओं को छोड़, जिनके लिये वह तैयार की गई थी, कोई प्राणी उसकी परवाह नहीं करता। इसी प्रकार, यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह सबके सामने सेंत-मेंत रखा गया है, तौभी केवल चुने हुए ही उस पर ध्यान देते हैं और उसे ग्रहण करने को तैयार होते हैं। घास पशुओं के लिये ऐसी सुरक्षित रहती है मानो दीवारों ने उसे घेर रखा हो; वैसे ही, यद्यपि परमेश्वर का अनुग्रह सेंत-मेंत है, वह वास्तव में उन्हीं के लिये सुरक्षित है जिन्हें उसने चुना है।

घास में परमेश्वर काम करनेवाले और देखभाल करनेवाले, दोनों रूपों में दिखाई देता है। तो आओ, हम हर समय उसके विधान में उसका हाथ देखें। उसे केवल तभी न देखें जब हम बहुतायत का आनन्द लेते हैं, परन्तु तब भी जब हमारी सामग्री थोड़ी हो; क्योंकि कड़ाके के जाड़े में भी पशुओं के लिये घास तैयार हो रही होती है। और तुम, हे शोक की सन्तानो, अपनी परीक्षाओं और विपत्तियों में भी परमेश्वर की देखभाल के अधीन हो; वह तुममें अपने अनुग्रहपूर्ण उद्देश्य पूरे करेगा। शान्त रहो और परमेश्वर का उद्धार देखो। जाड़े की हर एक रात सीधे घास काटने और कटनी के आनन्द भरे दिनों से जुड़ी है; शोक का हर एक समय आनेवाले आनन्द से बँधा हुआ है।

हमारी तीसरी बात सबसे रोचक है: पशुओं के लिये घास का प्रबन्ध करने में परमेश्वर का काम हमें उसके अनुग्रह के उदाहरण देता है।

मैं इस वचन पर मनन करता हूँ और अपने आप से कहता हूँ, “वह पशुओं के लिये घास उपजाता है। यहाँ मैं उस प्राणी के लिये पूरा प्रबन्ध देखता हूँ। मैं भी एक प्राणी हूँ, परन्तु पशुओं से श्रेष्ठ। निश्चय परमेश्वर जैसे उनके लिये प्रबन्ध करता है वैसे ही मेरे लिये भी करेगा। तौभी स्वभाव से मैं बेचैन रहता हूँ: जो मैं चाहता हूँ वह मुझे इस संसार में नहीं मिलता। यदि मैं इसका सारा धन भी पा लूँ, तौभी मैं असन्तुष्ट रहूँगा; यदि नाशवान धन में से वह सब कुछ मेरे पास हो जिसकी मेरा मन इच्छा कर सके, तौभी मेरा प्राण खाली रहेगा। कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा होगा जो मुझ अमर प्राणवाले मनुष्य को तृप्त कर सके। परमेश्वर बैल को पूरी तरह तृप्त करता है; तो उसके पास कुछ ऐसा अवश्य होगा जो मुझे भी पूरी तरह तृप्त करे, यदि मैं उसे ग्रहण करूँ। घास तो है; पशु उसे खाते हैं और फिर सन्तुष्ट होकर बैठ जाते हैं; परन्तु पृथ्वी पर जो कुछ मैंने पाया उसने मुझे कभी इतना तृप्त नहीं किया कि मैं पूरा विश्राम पाऊँ। इसलिए कुछ ऐसा अवश्य है जो मुझे तृप्त करेगा, यदि मैं उस तक पहुँच सकूँ।” क्या यह ठीक तर्क नहीं है? मैं मसीहियों और अविश्वासियों दोनों से कहता हूँ कि यहाँ तक मेरे पीछे चले आओ।

आओ, एक कदम और आगे बढ़ें: पशुओं के लिये केवल घास का प्रबन्ध ही नहीं किया गया, परन्तु वे उसे सचमुच पाते भी हैं। तो मैं भी जो चाहता हूँ उसे क्यों न पाऊँ? मेरा प्राण किसी ऐसी वस्तु के लिये भूखा और प्यासा है जो उससे परे है जिसे मैं देख या सुन सकता हूँ; मेरे प्राण को तृप्त करने के लिये कुछ तो अवश्य होगा। पशु उसे खाते हैं जो उन्हें तृप्त करता है; तो मैं भी तृप्ति क्यों न पाऊँ? मैं प्रार्थना करने लगता हूँ, “हे प्रभु, मेरी लालसा को उत्तम पदार्थों से तृप्त कर, जिससे मेरी जवानी उकाब के समान नई हो जाए” — भजन संहिता 103:5।

प्रार्थना करते हुए मैं सोचता हूँ: परमेश्वर ने पशुओं के लिये वही प्रबन्ध किया है जो उनके स्वभाव के अनुकूल है—वे शरीर हैं, और शरीर घास खाता है। मैं भी शरीर हूँ, परन्तु आत्मा भी हूँ; मुझे तृप्त करने के लिये आत्मिक पोषण चाहिए। वह कहाँ है?

जब मैं परमेश्वर के वचन की ओर फिरता हूँ, तो मैं पाता हूँ, “घास तो सूख जाती, और फूल मुर्झा जाता है; परन्तु हमारे परमेश्वर का वचन सदैव अटल रहेगा” — यशायाह 40:8, और यह कि जो बातें यीशु कहता है वे “आत्मा हैं, और जीवन भी हैं” — यूहन्ना 6:63।

“यहाँ मेरे प्राण के लिये आत्मिक भोजन है,” मैं कहता हूँ; “मैं इसमें आनन्द करूँगा।” काश, परमेश्वर मुझे यह समझने में सहायता दे कि वह आत्मिक भोजन क्या है, और मुझे उसे ग्रहण करने के योग्य करे; क्योंकि यद्यपि परमेश्वर पशुओं के लिये घास का प्रबन्ध करता है, तौभी उन्हें उसे स्वयं खाना पड़ता है। यदि वे मना करें, तो उनका पोषण नहीं होता। मुझे पशुओं का अनुकरण करना चाहिए और जो परमेश्वर मेरे लिये देता है उसे ग्रहण करना चाहिए। पवित्रशास्त्र में क्या प्रबन्ध किया गया है? मुझे बताया जाता है कि प्रभु यीशु मेरे स्थान पर दुःख उठाने, लहू बहाने और मरने आया, और यदि मैं उस पर भरोसा रखूँ तो मेरा उद्धार होगा। उद्धार पाकर, उसके प्रेम के विचार मुझे सान्त्वना और आनन्द देंगे, और मुझे बल देंगे। इन सच्चाइयों को खाने के सिवा मुझे और करना ही क्या है? पशु चरागाह में अपनी भूख के सिवा और कुछ नहीं लाते; वे उसमें जाते हैं और खाते हैं। इसी प्रकार मुझे विश्वास के द्वारा मसीह पर जीवित रहना है। हे प्रभु, मुझे उसे खाने का अनुग्रह दे; मुझे उसके लिये भूखा और प्यासा बना; मुझे उसे ग्रहण करने का विश्वास दे, ताकि मैं तेरी प्रसन्नता से तृप्त और प्रभु की भलाई से भरपूर हो जाऊँ।

यद्यपि यह वचन छोटा दिखाई देता है, तौभी मनन करने पर यह बढ़ता जाता है। मैं ईश्वरीय अनुग्रह के और भी उदाहरण देता हूँ। यहाँ पहले से चलनेवाले अनुग्रह का चित्र है: पशुओं के सृजे जाने से पहले ही घास उग आई थी। उत्पत्ति में हम देखते हैं कि परमेश्वर ने पशुओं को बनाने से पहले घास का प्रबन्ध किया। कैसी दया है कि अपने लोगों के लिये परमेश्वर की वाचा की सामग्री उनके जन्म से पहले ही तैयार कर दी गई थी! आदम के गिरने से पहले ही परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु मसीह को अपने चुने हुओं का उद्धारकर्ता ठहराकर दे दिया; संसार में पाप के आने से बहुत पहले परमेश्वर की सनातन दया ने उसे पहले से देख लिया और हर एक चुने हुए प्राण के लिये एक शरणस्थान का प्रबन्ध कर दिया। यह जानना कैसी शान्ति की बात है कि मेरे भूखे होने से पहले परमेश्वर ने मन्ना तैयार कर रखा है; मेरे प्यासे होने से पहले परमेश्वर ने जंगल की चट्टान से निर्मल धाराएँ बहाई हैं कि मेरे प्राण की प्यास बुझे! देखो, सर्वोच्च अनुग्रह क्या कुछ कर सकता है! पशुओं के चरागाह में आने से पहले घास तैयार रहती है; मुझे दया की आवश्यकता का अनुभव होने से पहले ही दया मेरे लिये तैयार की जा चुकी है।

यहाँ सेंत-मेंत अनुग्रह का उदाहरण है: जब बैल खेत में आता है, तो वह कोई रुपया नहीं लाता। इसी प्रकार मैं, एक दीन और दरिद्र पापी, कुछ नहीं लाता, परन्तु बिन रुपये और बिना दाम मसीह को ग्रहण करता हूँ। “प्रभु पशुओं के लिये घास उगाता है, और इसी प्रकार वह मेरे दरिद्र प्राण के लिये अनुग्रह का प्रबन्ध करता है, यद्यपि मेरे पास न रुपया है, न कोई योग्यता, न अपनी कोई श्रेष्ठता।”

परमेश्वर पशुओं को घास क्यों देता है? क्योंकि वे उसके हैं। पवित्रशास्त्र पुष्टि करता है, “चाँदी तो मेरी है, और सोना भी मेरा ही है, सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है, और हजारों पहाड़ों के जानवर मेरे ही हैं” — हाग्गै 2:8। परमेश्वर अपने पशुओं के लिये घास का प्रबन्ध करता है; वैसे ही परमेश्वर के लोगों के लिये अनुग्रह का प्रबन्ध किया गया है।

पशुओं का हर एक झुण्ड परमेश्वर का है: किसान के किसी बछड़े पर दाग लगाने से बहुत पहले परमेश्वर उस पर चिन्ह लगा चुका होता है; वैसे ही आदम के गिरने से बहुत पहले चुननेवाले प्रेम की छाप हमारे माथे पर लगा दी गई थी: “तेरी आँखों ने मेरे बेडौल तत्व को देखा; और मेरे सब अंग जो दिन-दिन बनते जाते थे वे रचे जाने से पहले तेरी पुस्तक में लिखे हुए थे” — भजन संहिता 139:16।

परमेश्वर पशुओं को इसलिए भी खिलाता है क्योंकि उसने उनके साथ वाचा बाँधी है। “पशुओं के साथ वाचा?”

कोई पूछता है। हाँ, सचमुच: जब जल-प्रलय के बाद परमेश्वर ने नूह से बात की, तो उसने कहा, “मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारे पश्चात् जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साथ भी वाचा बाँधता हूँ; और सब जीवित प्राणियों से भी जो तुम्हारे संग हैं, क्या पक्षी क्या घरेलू पशु, क्या पृथ्वी के सब जंगली पशु” — उत्पत्ति 9:9-10। इस प्रकार पशुओं के साथ एक वाचा बाँधी गई: बोने और काटने के समय कभी न थमेंगे; इसलिए पृथ्वी उनके लिये उपज देती है, और उन्हीं के लिये प्रभु घास उगाता है। यदि परमेश्वर पशुओं के साथ अपनी वाचा निभाता है, तो क्या वह अपने प्रियों के साथ उसे न निभाएगा? हाँ, उसके चुने हुए मसीह में वाचा के भागी हैं, और वह समय और अनन्तकाल में उनकी सब आवश्यकताओं का प्रबन्ध करता है, और अपने सनातन प्रेम की भरपूरी में से उन्हें तृप्त करता है।

परमेश्वर पशुओं को खिलाता है, और फिर पशु उसकी स्तुति करते हैं। दाऊद लिखता है, “पृथ्वी में से यहोवा की स्तुति करो, हे समुद्री अजगरों और गहरे सागर, हे अग्नि और ओलों, हे हिम और कुहरे, हे उसका वचन माननेवाली प्रचण्ड वायु! हे पहाड़ों और सब टीलों, हे फलदाई वृक्षों और सब देवदारों! हे वन-पशुओं और सब घरेलू पशुओं, हे रेंगनेवाले जन्तुओं और हे पक्षियों!” — भजन संहिता 148:7-10। प्रभु अपने लोगों को इसलिए खिलाता है कि उनका मन उसका भजन गाता रहे और कभी चुप न हो। जब दूसरे प्राणी उसकी महिमा करते हैं, तो विशेष करके यहोवा के छुड़ाए हुए, जिन्हें उसने शत्रु के हाथ से छुड़ा लिया है, उसका प्रचार करें।

फिर भी, हमारा वचन अब तक चुका नहीं है। स्वयं घास पर विचार करो: “वह घास उपजाता है”।

यहाँ एक धर्मसिद्धान्त की शिक्षा है: यदि घास परमेश्वर के बिना नहीं उग सकती, तो ईश्वरीय कार्य के बिना मनुष्य के हृदय में अनुग्रह कैसे उत्पन्न हो सकता है? अनुग्रह तो घास की तुलना में परमेश्वर की बुद्धि की कहीं अधिक अद्भुत उपज है।

यदि घास किसी ईश्वरीय कारण के बिना नहीं उग सकती, तो अनुग्रह की हर एक बढ़ती का मूल परमेश्वर में ही ढूँढ़ा जाना चाहिए, और सारी महिमा उसी को दी जानी चाहिए।

इसके अतिरिक्त, यदि परमेश्वर घास बनाने और उसकी देखभाल करने को उचित समझता है, तो वह हमारे हृदयों में अपने अनुग्रह को बढ़ाने का काम और भी अधिक आदर के साथ करेगा। यदि वह महान अदृश्य आत्मा, जिसके विचार ऊँचे और महान हैं, बाड़े के पास की उस दीन उपज की रखवाली करने को नीचे झुकता है, तो निश्चय वह हममें अपने बीज की भी देखरेख करेगा, जो “अविनाशी बीज” है, परमेश्वर के जीविते और सदा ठहरनेवाले वचन के द्वारा बोया गया — 1 पतरस 1:23।

मुंगो पार्क ने, अफ्रीका के मरुस्थलों की खोज करते हुए, काई के एक छोटे-से टुकड़े से शान्ति पाई, क्योंकि उसने हरियाली के उस एकाकी टुकड़े में भी परमेश्वर की बुद्धि और सामर्थ्य देखी।

इसी प्रकार, जब तुम घास काटने के लिये तैयार खेत देखो, तो तुम्हारा हृदय आनन्द से उछल पड़े कि परमेश्वर ने कैसे घास उपजाई है, और जाड़े की ठण्ड और वसन्त के पाले में से उसकी देखभाल करता रहा, जब तक कि मेंह और धूप ने उसे सिद्ध न कर दिया। तो हे मेरे प्राण, चाहे तू शोक के बहुत से पाले और परीक्षा के लम्बे जाड़े सहे, प्रभु तुझे हमारे प्रभु, और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनुग्रह और पहचान में बढ़ाता जाएगा; उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन।

पृष्ठ 1 / 1 · 25 मिनट अध्याय में शेष