अध्याय 10 · 25 मिनट का पठन
खेत के मजदूर
“मैंने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया। इसलिए न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला, परन्तु परमेश्वर जो बढ़ानेवाला है। लगानेवाला और सींचनेवाला दोनों एक हैं; परन्तु हर एक व्यक्ति अपने ही परिश्रम के अनुसार अपनी ही मजदूरी पाएगा। क्योंकि हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं; तुम परमेश्वर की खेती हो।” 1 कुरिन्थियों 3:6-9 मैं अपने पाठ के अन्त से आरम्भ करूँगा, क्योंकि जो कुछ मैं कहना चाहता हूँ उसकी रूपरेखा बनाने का सबसे सरल मार्ग मुझे यही लगता है। पहले हम यह देखेंगे कि कलीसिया परमेश्वर का खेत है: “तुम परमेश्वर की खेती हो।” रिवाइज़्ड वर्शन के हाशिये में हम पढ़ते हैं, “तुम परमेश्वर की जोती हुई भूमि हो,” और यही वह शब्द है जिसे मैं काम में लाना चाहता हूँ। “तुम परमेश्वर की जोती हुई भूमि हो,” अर्थात् उसका खेत। खेत के विषय में बात करने के बाद, हम इस बात पर थोड़ा कहेंगे कि प्रभु अपनी जागीर पर मजदूरों को काम पर लगाता है। और जब हम मजदूरों को देख लेंगे—जैसे वे बेचारे हैं—तब हम स्मरण करेंगे कि स्वयं परमेश्वर ही महान काम करनेवाला है: “हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं।”
I. हम इस बात पर विचार करने से आरम्भ करते हैं कि कलीसिया परमेश्वर का खेत है। प्रभु ने अपने सर्वोच्च चुनाव के द्वारा कलीसिया को अपना बना लिया है। उसने उसे मोल लेकर भी अपने लिये सुरक्षित कर लिया है, क्योंकि उसके लिये उसने बहुत बड़ा दाम चुकाया है। “क्योंकि यहोवा का अंश उसकी प्रजा है; याकूब उसका नपा हुआ निज भाग है।” परमेश्वर के खेत की एक-एक एकड़ भूमि का दाम उद्धारकर्ता ने लहू के समान पसीना बहाकर चुकाया—हाँ, अपने ही हृदय के लहू से। उसने हम से प्रेम किया, और हमारे लिये अपने आपको दे दिया; यही वह दाम है जो उसने चुकाया। अब से कलीसिया परमेश्वर की न्यायसंगत सम्पत्ति है, और उस पर स्वामित्व का अधिकार उसी के पास है। हमारे लिये यह आनन्द की बात है कि हम अपने नहीं हैं; हम दाम देकर मोल लिये गए हैं। कलीसिया चुनाव के द्वारा और मोल लिये जाने के द्वारा परमेश्वर का खेत है।
और अब उसने बाड़ा बाँधकर उसे अपना बना लिया है। कभी वह साझी भूमि के समान खुली पड़ी थी, नंगी और बंजर, काँटों और ऊँटकटारों से ढँकी हुई, और हर एक जंगली पशु का बसेरा; क्योंकि हम “अन्य लोगों के समान स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान थे।” ईश्वरीय पूर्वज्ञान ने उस उजाड़ भूमि पर दृष्टि की, और चुननेवाले प्रेम ने अनुग्रह के पूरे नाप से उसका भाग नाप लिया, और हमें सदा के लिये प्रभु की निज जागीर होने के लिये अलग कर दिया। ठीक समय पर प्रभावशाली अनुग्रह सामर्थ्य के साथ आया और उसने हमें शेष मनुष्यजाति से अलग कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे खेतों के चारों ओर बाड़ा और खाई बनाकर उन्हें खुली भूमि से अलग किया जाता है। क्या प्रभु ने यह घोषणा नहीं की कि उसने अपनी दाख की बारी को चुन लिया है और उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा है?
“हम एक बारी हैं जो चारों ओर से घेरी गई, चुनी गई और निराली भूमि ठहराई गई; एक छोटा सा टुकड़ा, जिसे अनुग्रह ने घेर लिया संसार के विशाल जंगल में से।” प्रभु ने इस खेत को जोतकर-बोकर भी स्पष्ट रूप से अपना बना लिया है। वह अपने खेत के लिये इससे अधिक और क्या कर सकता था? उसने मिट्टी का स्वभाव ही पूरी तरह बदल दिया है। बंजर से उसने उसे फलवन्त बना दिया है। उसने उसे जोता है, खोदा है, उपजाऊ बनाया है, सींचा है, और उसमें हर प्रकार के फूल और फल लगाए हैं। उसने उसके लिये अब तक बहुत से मनभावने गुच्छे उपजाए हैं, और इससे भी उज्ज्वल दिन आनेवाले हैं, जब स्वर्गदूत कटनी पर जयजयकार करेंगे, और मसीह “अपने प्राणों का दुःख उठाकर उसे देखेगा और तृप्त होगा।”
यह खेत प्रभु की निरन्तर रक्षा से सुरक्षित रहता है। उसने न केवल अपनी अद्भुत सामर्थ्य से उसे घेरा और जोता-बोया कि वह उसका अपना खेत हो, वरन् वह उसे निरन्तर अपने अधिकार में बनाए रखता है।
“मैं यहोवा उसकी रक्षा करता हूँ; मैं क्षण-क्षण उसको सींचता रहूँगा। मैं रात-दिन उसकी रक्षा करता रहूँगा ऐसा न हो कि कोई उसकी हानि करे।” यदि परमेश्वर की निरन्तर सामर्थ्य न होती, तो उसके बाड़े शीघ्र ही तोड़ दिए जाते और जंगली पशु उसके खेतों को चट कर जाते। दुष्ट हाथ सदा इस यत्न में लगे रहते हैं कि उसकी दीवारें ढा दें और उसे फिर से उजाड़ दें, ताकि संसार में कोई सच्ची कलीसिया न रहे। परन्तु प्रभु अपनी भूमि के लिये जलन रखता है और उसे नष्ट नहीं होने देगा। यदि परमेश्वर किसी कलीसिया को अपने लिये सुरक्षित न रखे, तो वह बहुत दिन तक कलीसिया बनी न रहेगी।
क्या हो, यदि परमेश्वर कहे, “अब मैं तुम को बताता हूँ कि अपनी दाख की बारी से क्या करूँगा। मैं उसके काँटेवाले बाड़े को उखाड़ दूँगा कि वह चट की जाए, और उसकी दीवार को ढा दूँगा कि वह रौंदी जाए”? तब वह कैसा उजाड़ जंगल बन जाएगी! वह क्या कहता है?
“मेरा जो स्थान शीलो में था, जहाँ मैंने पहले अपने नाम का निवास ठहराया था, वहाँ जाकर देखो कि मैंने अपनी प्रजा इस्राएल की बुराई के कारण उसकी क्या दशा कर दी है?” यरूशलेम को जाओ, जहाँ कभी उसकी महिमा का नगर और उसके निवास का स्थान था—आज वहाँ क्या बचा है? रोम को जाओ, जहाँ कभी पौलुस ने सामर्थ्य के साथ सुसमाचार का प्रचार किया था—अब वह मूर्तिपूजा के केन्द्र के सिवाय और क्या है? प्रभु दीवट को हटा सकता है, और जो स्थान दिन के समान उजियाला था उसे रात के समान अंधकारमय होने के लिये छोड़ सकता है। इसलिए परमेश्वर का खेत इसी कारण खेत बना रहता है कि वह सदा उसमें उपस्थित रहता है, और उसे अपनी पहली जंगली दशा में लौटने से रोकता है। कलीसिया को जोती-बोई दशा में बनाए रखने के लिये सर्वशक्तिमान सामर्थ्य उतनी ही आवश्यक है जितनी आरम्भ में उसे उजाड़ से छुड़ाकर खेत बनाने के लिये थी।
क्योंकि कलीसिया परमेश्वर का अपना खेत है, इसलिए वह उससे कटनी पाने की आशा रखता है। संसार उजाड़ भूमि है, और वह उससे कुछ आशा नहीं रखता; परन्तु हम जोती हुई भूमि हैं, और इसलिए हम से कटनी की आशा की जाती है। खुली बंजर भूमि पर बाँझपन शोभा दे सकता है, परन्तु किसी खेत में वह लज्जा की बात होगी। प्रेम बदले में प्रेम की आशा रखता है; दिया गया अनुग्रह अनुग्रह से भरे फल की माँग करता है। जब हम उद्धारकर्ता के लहू के समान पसीने की बूँदों से सींचे गए हैं, तो क्या हम उसकी स्तुति के लिये सौ गुना फल न लाएँ? जब परमेश्वर का अनन्त आत्मा हमें सम्भाले रहता है, तो क्या हम में उसकी महिमा के लिये फल उत्पन्न न हो? हमारे लिये प्रभु की चिन्ता में बड़ा खर्च, परिश्रम और विचार लगा है। क्या उसके अनुरूप कुछ लौटाया न जाए? क्या प्रभु को आज्ञाकारिता की कटनी, पवित्रता की कटनी, उपयोगिता की कटनी, स्तुति की कटनी न मिले?
क्या ऐसा ही नहीं होना चाहिए?
मुझे लगता है कि कुछ कलीसियाएँ यह भूल जाती हैं कि प्रभु के खेत के हर एक टुकड़े से उपज की आशा की जाती है, क्योंकि उनके यहाँ कभी कटनी नहीं होती और न वे उसकी बाट ही जोहती हैं। किसान मनबहलाव के लिये अपनी भूमि नहीं जोतते या अपने खेत नहीं बोते; वे काम की बात सोचते हैं। वे इसलिए जोतते और बोते हैं कि उन्हें कटनी चाहिए। यदि यह सच्चाई कुछ विश्वासियों के मन में बैठ जाए, तो निश्चय ही वे बातों को दूसरी दृष्टि से देखने लगेंगे। परन्तु आजकल ऐसा लगता है मानो हम सोचते हैं कि परमेश्वर की कलीसिया से किसी उपज की आशा नहीं की जाती, और वह केवल अपने ही सुख और निजी लाभ के लिये है। हे भाइयो और बहनो, ऐसा नहीं होना चाहिए। उस महान किसान को अपने परिश्रम का कुछ प्रतिफल अवश्य मिलना चाहिए। हर एक खेत को अपनी उपज देनी होगी, और सारी जागीर को उसकी स्तुति उपजानी होगी।
हम श्रेष्ठगीत की दुल्हिन के साथ मिलकर कहते हैं, “मेरी निज दाख की बारी मेरे ही लिये है; हे सुलैमान, हजार तुझी को और फल के रखवालों को दो सौ मिलें।”
परन्तु मैं वहीं लौटता हूँ जहाँ से मैंने आरम्भ किया था। यह खेत चुनाव के द्वारा, मोल लिये जाने के द्वारा, बाड़ा बाँधे जाने के द्वारा, जोते-बोए जाने के द्वारा, और सुरक्षित रखे जाने के द्वारा, पूरी रीति से प्रभु का है। तो देखो, मजदूरों में से किसी का इस जागीर के छोटे से भाग को भी अपना कहना कितना अनुचित होगा।
यदि किसी धनी मनुष्य का एक बड़ा खेत हो, तो वह क्या सोचेगा यदि हल जोतनेवाला कहे, “मैं इस खेत को जोतता हूँ, इसलिए यह मेरा है। मैं इस खेत को अपना कहूँगा”? या कोई दूसरा कहे, “पिछले वर्ष मैंने उस भूमि की कटनी की थी, इसलिए वह मेरी है”? क्या हो, यदि बाकी सब मजदूर खेत को आपस में बाँट लें और खेतों के नाम अपने-अपने नाम पर रख दें? स्वामी उन सब को तुरन्त निकाल देगा। खेत अपने स्वामी का है, और उसे उसी के नाम से पुकारा जाना चाहिए। उसे मजदूरों के नामों से पुकारना कोई समझ की बात नहीं।
क्या तुच्छ मनुष्य परमेश्वर की महिमा छीन लें? स्मरण करो कि पौलुस ने इसे किस प्रकार कहा: “अपुल्लोस कौन है? और पौलुस कौन है? केवल सेवक, जिनके द्वारा तुम लोगों ने विश्वास किया, जैसा हर एक को प्रभु ने दिया।” “क्या मसीह बँट गया? क्या पौलुस तुम्हारे लिये क्रूस पर चढ़ाया गया? या तुम्हें पौलुस के नाम पर बपतिस्मा मिला?”
सारी कलीसिया उसी की है जिसने अपनी प्रभुता में उसे चुना, अपने लहू से उसे मोल लिया, अपने अनुग्रह से उसके चारों ओर बाड़ा बाँधा, अपनी बुद्धि से उसे जोता-बोया, और अपनी सामर्थ्य से उसे सुरक्षित रखा। पृथ्वी पर केवल एक ही कलीसिया है, और जो प्रभु से प्रेम रखते हैं उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए। पौलुस एक मजदूर है, अपुल्लोस एक मजदूर है, कैफा एक मजदूर है—परन्तु खेत पौलुस का नहीं, उसका छोटा सा भाग भी नहीं। उसका कोई भाग अपुल्लोस या कैफा का नहीं, क्योंकि “तुम मसीह के हो।”
सच तो यह है कि इस विषय में मजदूर खेत के हैं, न कि खेत मजदूरों का: “क्योंकि सब कुछ तुम्हारा है, क्या पौलुस, क्या अपुल्लोस, क्या कैफा।” “क्योंकि हम अपने को नहीं, परन्तु मसीह यीशु को प्रचार करते हैं, कि वह प्रभु है; और उसके विषय में यह कहते हैं, कि हम यीशु के कारण तुम्हारे सेवक हैं।”
II. अब हम अपनी दूसरी बात पर आते हैं: वह महान किसान मजदूरों को काम पर लगाता है। परमेश्वर साधारणतः मनुष्यों के द्वारा ही अपनी योजनाएँ पूरी करता है। यदि वह चाहे, तो अपने पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्यों के हृदयों में सीधे कार्य कर सकता है, परन्तु वह उसका काम है, हमारा नहीं। हमें इस प्रकार के निर्देश दिए गए हैं: “क्योंकि जब परमेश्वर के ज्ञान के अनुसार संसार ने ज्ञान से परमेश्वर को न जाना तो परमेश्वर को यह अच्छा लगा, कि इस प्रचार की मूर्खता के द्वारा विश्वास करनेवालों को उद्धार दे।” स्वामी की आज्ञा यह नहीं है, “चुपचाप बैठे रहो और देखो कि परमेश्वर का आत्मा जातियों का मन कैसे फिराता है,” वरन् यह, “तुम सारे जगत में जाकर सारी सृष्टि के लोगों को सुसमाचार प्रचार करो।”
संसार के लिये भोजन जुटाने में परमेश्वर की रीति को देखो। “हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे,” इस प्रार्थना के उत्तर में वह बादलों को आज्ञा दे सकता था कि वे हर भोर हर एक मनुष्य के द्वार पर मन्ना बरसाएँ। परन्तु वह जानता है कि परिश्रम करना हमारे लिये भला है, इसलिए वह हमारी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिये हल जोतनेवाले और बोनेवाले के हाथों को काम में लाता है। परमेश्वर अपने चुने हुए खेत, अर्थात् कलीसिया को, आश्चर्यकर्मों के द्वारा या स्वर्गदूतों के द्वारा जोत-बो सकता था, परन्तु वह बड़ी दया से उसे उसी के बेटे-बेटियों के द्वारा आशीष देता है। वह हमारी ही भलाई के लिये हमें काम में लाता है, क्योंकि हम जो उसके खेतों में परिश्रम करते हैं, जितना देते हैं उससे कहीं अधिक लाभ स्वयं पाते हैं। परिश्रम हमारी आत्मिक मांसपेशियों को दृढ़ करता है और हमें आत्मिक रूप से स्वस्थ रखता है। “मुझ पर जो सब पवित्र लोगों में से छोटे से भी छोटा हूँ, यह अनुग्रह हुआ कि मैं अन्यजातियों को मसीह के अगम्य धन का सुसमाचार सुनाऊँ।”
हमारा महान स्वामी यह चाहता है कि उसके खेत के हर एक मजदूर को उससे कुछ लाभ मिले, क्योंकि लिखा है, “दाँवते समय चलते हुए बैल का मुँह न बाँधना।” मजदूर की दिन भर की रोटी मिट्टी ही से आती है। यद्यपि वह अपने लिये नहीं, वरन् अपने स्वामी के लिये काम करता है, तौभी वह भोजन में अपना भाग पाता है। प्रभु के भण्डार में बोनेवाले को बीज और खानेवाले को रोटी मिलती है। हम परमेश्वर की कलीसिया की देखभाल में चाहे कितनी भी निःस्वार्थता से उसकी सेवा करें, हम स्वयं भी उसके फल में भागी होते हैं। यह परमेश्वर की बड़ी दया है कि वह हमें काम में लाता ही है, क्योंकि हम अधिक से अधिक निकम्मे औज़ार हैं, और बहुधा सहायता से अधिक बाधा ही होते हैं।
परमेश्वर के काम पर लगाए गए सब मजदूर आवश्यक काम में लगे हैं। ध्यान दो: “मैंने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा।” किसने बड़ा ढोल पीटा या अपनी ही तुरही फूँकी? किसी ने नहीं। परमेश्वर के खेत में कोई केवल सजावट के लिये नहीं रखा जाता। मैंने ऐसे उपदेश पढ़े हैं जो केवल दिखावे के लिये ही बने जान पड़ते थे, क्योंकि उनमें सुसमाचार का एक दाना भी न था। वे बिना फाल के हलों, बिना गेहूँ की बीज-बोने की मशीनों, या मक्खन के बने औज़ारों के समान थे। मैं नहीं मानता कि परमेश्वर उन लोगों को मजदूरी देता है जो केवल अपना दिखावा करने के लिये उसके खेतों में घूमते फिरते हैं। जो वक्ता मंच पर अपनी वाक्पटुता का प्रदर्शन करते हैं, वे अपने स्वामी के लिये फसल उपजानेवाले विश्वासयोग्य मजदूरों की अपेक्षा मुर्गियाँ उठाते फिरनेवाले आवारा लोगों के अधिक समान हैं।
कलीसिया के बहुत से सदस्य ऐसे जीते हैं मानो खेत पर उनका एकमात्र काम जंगली बेर तोड़ना या जंगली फूल बीनना हो। दूसरे लोग कैसे जोतते और कैसे काटते हैं, इसकी आलोचना करने में वे बड़े फुर्तीले हैं, परन्तु स्वयं काम करने के लिये हाथ तक नहीं उठाते। हे मेरे मित्रो, आओ। तुम क्यों यहाँ दिन भर बेकार खड़े हो? “फसल तो बहुत है पर मजदूर थोड़े हैं।” जो लोग अपने आप को दूसरों से अधिक सुसंस्कृत समझते हैं, यदि तुम सचमुच मसीही हो, तो तुम्हें घमण्ड से इधर-उधर घूमना और कठिन परिश्रम करनेवालों को तुच्छ जानना नहीं चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो मैं कहूँगा कि तुमने अपने स्वामी को पहचानने में भूल की है। कदाचित् तुम सोचते हो कि तुम किसी ऐसे की सेवा करते हो जो परिणाम से अधिक दिखावे को महत्त्व देता है, परन्तु हमारा महान प्रभु व्यावहारिक है, और उसकी जागीर पर उसके मजदूर आवश्यक काम करते हैं।
जब तुम और मैं प्रचार करते या शिक्षा देते हैं, तो हमें अपने आप से पूछना चाहिए, “इससे क्या भलाई होगी? मैं एक कठिन विषय पढ़ाने जा रहा हूँ—क्या वह सचमुच किसी की सहायता करेगा? मैंने एक उलझी हुई धर्मवैज्ञानिक बात चुनी है— क्या वह किसी उपयोगी उद्देश्य को पूरा करेगी?” कोई मजदूर अपनी ही किसी सूझ पर बहुत कठिन परिश्रम कर सकता है और फिर भी कुछ उपयोगी पूरा न करे। कुछ उपदेश केवल तर्कों के छोटे-छोटे भेद दिखाते हैं, और उससे क्या भलाई होती है? मान लो कि हम खेतों में बुरादा बोएँ या उन पर इत्र छिड़कें—उससे क्या होगा? क्या परमेश्वर हमारे नैतिक निबन्धों, चमकाए हुए भाषणों और सुरुचिपूर्ण वाक्यों को आशीष देगा? हमें उपयोगिता को लक्ष्य बनाना चाहिए। परमेश्वर के साथ मिलकर काम करनेवाले होने के नाते, हमें उसी काम पर ध्यान लगाना चाहिए जिसका सचमुच महत्त्व है। “मैंने लगाया,” एक कहता है—और यह अच्छा है, क्योंकि लगाना तो होगा ही। “मैंने सींचा,” दूसरा कहता है—और यह भी अच्छा और आवश्यक है। तुम में से हर एक ठोस लेखा दे सके, परन्तु कोई केवल प्रदर्शन, सार्वजनिक भाषण, या मनोरंजन के आयोजन से सन्तुष्ट न हो।
प्रभु के खेत में काम का बँटवारा है। पौलुस ने भी यह नहीं कहा, “मैंने लगाया और सींचा।”
नहीं—पौलुस ने लगाया। और अपुल्लोस ने यह नहीं कहा, “मैंने सींचा भी और लगाया भी।” उसके लिये सींचना ही बहुत था। किसी के पास सब वरदान नहीं होते। यह कितनी मूर्खता है जब लोग कहते हैं, “मुझे यह प्रचारक अच्छा लगता है क्योंकि वह विश्वासियों को सिद्धान्त में उन्नत करता है, परन्तु जब वह बाहर गया हुआ था तो मुझे दूसरे प्रचारक से कोई लाभ न हुआ, क्योंकि उसका ध्यान पापियों का मन फिराने पर था।” हाँ, वह लगा रहा था। तुम तो पहले ही लगाए जा चुके हो; तुम्हें फिर से लगाए जाने की आवश्यकता नहीं। तुम्हें धन्यवादी होना चाहिए कि दूसरे लोग लाभ पा रहे हैं। “क्योंकि इस पर यह कहावत ठीक बैठती है: ‘बोनेवाला और है और काटनेवाला और।’” यह शिकायत करने के बदले कि हल जोतनेवाला हँसुआ क्यों नहीं लाया, तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए कि उसे गहरा जोतने और कठोर हृदयों को तोड़ने की शक्ति मिले।
परमेश्वर के खेत में मजदूरों के बीच उद्देश्य की एकता है। “लगानेवाला और सींचनेवाला दोनों एक हैं।” एक ही स्वामी उन्हें काम पर लगाता है। यद्यपि वह उन्हें अलग-अलग समयों पर और खेत के अलग-अलग भागों में भेजता है, तौभी वे एक ही उद्देश्य में एक हैं—एक ही कटनी के लिये काम करना।
इंग्लैण्ड में हम सिंचाई को पूरी रीति से नहीं समझते, क्योंकि वहाँ के किसान अपनी सारी भूमि को नहीं सींच सकते।
परन्तु पूर्व के देशों में किसान अपने खेतों के लगभग हर एक भाग को सींचते हैं। सिंचाई के बिना कोई फसल न होती। इटली, मिस्र या पलिश्तीन जैसे स्थानों में कुएँ, पम्प, रहट, डोल, नालियाँ, छोटी-छोटी धाराएँ, और नलियाँ होती हैं जो हर एक पौधे तक पानी पहुँचाती हैं। इसके बिना तीव्र गर्मी सब कुछ सुखा देती। लगाने के लिये बुद्धि चाहिए; सींचने के लिये भी उतनी ही चाहिए। इन दोनों को मिलाने के लिये मजदूरों का एक मन होना आवश्यक है। जब मजदूर एक दूसरे के विरुद्ध चलते और एक दूसरे के विरोध में काम करते हैं, तो यह हानिकारक होता है। कलीसिया में तो यह विशेष रूप से हानिकारक है। यदि मेरा सहायक उसे न सींचे जो मैंने लगाया है, तो मैं सफलता से कैसे लगा सकता हूँ? या यदि कुछ लगाया ही न गया हो, तो सींचने से क्या लाभ? जब मूर्ख लोग खेती पर झगड़ते हैं तो वह विफल हो जाती है, क्योंकि बोने से लेकर काटने तक वह एक ही निरन्तर काम है। आओ, हम जीवन भर मिलकर काम करें, क्योंकि फूट बाँझपन की ओर ले जाती है।
हमारे पाठ में हमें बताया गया है कि सब मजदूर मिलकर भी कुछ नहीं हैं। “इसलिए न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला।” अपने स्वामी के बिना मजदूर कुछ नहीं हैं। किसी खेत के सब मजदूर मिलकर भी, बिना किसी अगुवे के, उसका प्रबन्ध नहीं कर सकते; और संसार के सब प्रचारक और मसीही कार्यकर्ता कुछ भी पूरा नहीं कर सकते, जब तक परमेश्वर उनके साथ न हो।
परमेश्वर के खेत के हर एक मजदूर ने अपनी योग्यताएँ परमेश्वर ही से पाई हैं। जब तक प्रभु प्रतिदिन उसे न सिखाए, कोई नहीं जानता कि प्राणों में कैसे लगाए या उन्हें कैसे सींचे। ये पवित्र वरदान सेंतमेंत अनुग्रह के काम हैं। सब मजदूरों को परमेश्वर के निर्देशन में काम करना होगा, नहीं तो वे व्यर्थ परिश्रम करते हैं। आत्मा के मार्गदर्शन के बिना वे न जानते कि कब और कैसे काम करें, और उसकी सहायता के बिना वे एक अच्छा विचार भी नहीं सोच सकते। सब मजदूरों को अपना बीज परमेश्वर से पाना होगा, नहीं तो वे गेहूँ के बदले खरपतवार बोएँगे। सब अच्छा बीज परमेश्वर के भण्डार से आता है। यदि हम प्रचार करते हैं, तो वह परमेश्वर का सच्चा वचन होना चाहिए, नहीं तो कुछ भी स्थायी फल न निकलेगा।
बोने की शक्ति भी स्वामी ही से आती है। जब तक परमेश्वर हमारे साथ न हो, हम प्रचार नहीं कर सकते। जब तक पवित्र आत्मा उसमें जीवन न डाले, उपदेश खोखली बकवास है। “मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुँह से कहना यहोवा की ओर से होता है।” जब अच्छा बीज बोया जा चुका होता है, तो सारा परिणाम परमेश्वर पर निर्भर होता है। यदि वह ओस और वर्षा रोक ले, तो बीज नहीं उगेगा। यदि वह उस पर न चमके, तो हरी बाल नहीं पकेगी। मनुष्य का हृदय बंजर ही बना रहेगा—चाहे स्वयं पौलुस ही प्रचार क्यों न कर रहा हो—जब तक पवित्र आत्मा उसके साथ कार्य न करे और वचन को आशीष न दे। क्योंकि बढ़ती केवल परमेश्वर ही से आती है, इसलिए मजदूरों को उनके उचित स्थान पर रखो। हमें बहुत ऊँचा न समझो, क्योंकि सब कुछ कर चुकने के बाद भी हम निकम्मे दास ही हैं।
तौभी, यद्यपि पवित्रशास्त्र कहता है कि मजदूर कुछ नहीं हैं, वह यह भी कहता है कि उन्हें प्रतिफल मिलेगा। परमेश्वर हम में हमारे भले काम उत्पन्न करता है और फिर उनके लिये हमें प्रतिफल देता है। “हर एक व्यक्ति अपने ही परिश्रम के अनुसार अपनी ही मजदूरी पाएगा।” प्रतिफल सफलता पर नहीं, वरन् परिश्रम पर आधारित है। बहुत से निराश मजदूर इसमें शान्ति पा सकते हैं। तुम्हें परिणामों के अनुसार नहीं, वरन् विश्वासयोग्य परिश्रम के अनुसार मजदूरी मिलती है। हो सकता है तुम्हें कठोर मिट्टी जोतनी पड़े या कठिन भूमि बोनी पड़े, और पत्थर, पक्षी, काँटे, राहगीर और झुलसानेवाली धूप तुम्हारे विरोध में काम करें—परन्तु उन बातों के लिये तुम उत्तरदायी नहीं हो। तुम्हारा प्रतिफल तुम्हारे काम के अनुसार है।
“बोनेवाला और है और काटनेवाला और,” परन्तु काटनेवाला सारा प्रतिफल नहीं पाता; बोनेवाला भी आनन्द में भागी होगा। मजदूर चाहे कुछ न समझे जाएँ, परन्तु वे अपने प्रभु के आनन्द में प्रवेश करेंगे।
पाठ के अनुसार, मजदूर मिलकर सफल हुए हैं, और यह भी उनके प्रतिफल का एक भाग है।
“मैंने लगाया, अपुल्लोस ने सींचा, परन्तु परमेश्वर ने बढ़ाया।” बहुधा प्रार्थना में हम कहते हैं, “कोई पौलुस लगाए, कोई अपुल्लोस सींचे, परन्तु जब तक परमेश्वर न बढ़ाए, सब व्यर्थ है।” यह सच है। परन्तु एक और सच्चाई है जिसकी बहुधा अनदेखी की जाती है: जब पौलुस लगाता है और अपुल्लोस सींचता है, तो परमेश्वर सचमुच बढ़ाता है। हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं है। परमेश्वर के बिना कोई बढ़ती न होती, परन्तु हम परमेश्वर के बिना नहीं हैं। जब विश्वासयोग्य मजदूर उचित आत्मा में परिश्रम करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें आशीष देता है। वह आशीष प्रतिफल का एक बड़ा भाग है।
III. अब हम मुख्य बात पर लौटते हैं: स्वयं परमेश्वर ही महान काम करनेवाला है। वह चाहे जिन मजदूरों को काम में लाए, परन्तु बढ़ती केवल उसी से आती है। तुम जानते हो कि प्राकृतिक खेती में यह सच है। सबसे कुशल किसान भी गेहूँ को अंकुरित होने, बढ़ने और पकने पर विवश नहीं कर सकता।
वह कटनी तक किसी खेत की रक्षा भी नहीं कर सकता, क्योंकि बहुत से संकट उस पर मँडराते रहते हैं। ठीक जब किसान कटनी की आशा करता है, तभी गेरुई या कोई रोग उसे नष्ट कर सकता है। बढ़ती परमेश्वर ही को देनी होगी। यदि कोई परमेश्वर पर निर्भर है, तो वह किसान है। उसी के द्वारा हम सब वर्ष प्रति वर्ष अपने भोजन के लिये परमेश्वर पर निर्भर रहते हैं। “खेती से राजा का भी काम निकलता है।” परमेश्वर खत्ते और घास के ढेर में बढ़ती देता है, और आत्मिक खेत में तो यह और भी अधिक सच है।
यदि तुम सोचते हो कि किसी प्राण को जीतना सरल है, तो उसका प्रयत्न करके देखो। ईश्वरीय सहायता के बिना तो तुम एक संसार रचने का प्रयत्न भी कर सकते हो। तुम एक मक्खी तक नहीं रच सकते—तो नया मन और स्थिर आत्मा कैसे रच सकते हो? नया जन्म एक बड़ा भेद है जो तुम्हारी सामर्थ्य से परे है। “हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसकी आवाज सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।” इस विषय में तुम या मैं क्या कर सकते हैं? यह हमारे वश से बाहर है। हम परमेश्वर के सत्य की घोषणा कर सकते हैं, परन्तु उस सत्य को हृदय और विवेक पर लागू करना बिलकुल दूसरी बात है।
मैंने अपने सारे हृदय से यीशु मसीह का प्रचार किया है, तौभी मैं जानता हूँ कि मैंने किसी ऐसे मनुष्य में, जिसका नया जन्म नहीं हुआ, कभी उद्धार देनेवाला परिणाम उत्पन्न नहीं किया, जब तक परमेश्वर के आत्मा ने उसका हृदय न खोला और उसमें सत्य का जीवित बीज न लगाया। अनुभव हमें यही सिखाता है। बीज के उग आने के बाद उसे जीवित रखना भी प्रभु ही का काम है। हम सोचते हैं कि हमारे पास नये विश्वासी हैं, परन्तु बहुधा हमें निराशा होती है। बहुत से सेब के पेड़ों के फूलों के समान होते हैं—सुन्दर परन्तु फलहीन। कुछ दूसरे उन छोटे सेबों के समान होते हैं जो पकने से पहले ही गिर जाते हैं।
जो कोई किसी बड़ी कलीसिया की अगुवाई करता है और प्राणों की गहरी चिन्ता रखता है, उसे शीघ्र ही यह निश्चय हो जाएगा कि जब तक परमेश्वर कार्य न करे, कुछ भी पूरा न होगा—न मन-फिराव, न पवित्रीकरण, न अन्त तक स्थिर रहना, न परमेश्वर की महिमा, न उद्धारकर्ता के दुःख की तृप्ति—जब तक प्रभु हमारे साथ न हो। “मुझसे अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।”
इस सच्चाई से मैं कई व्यावहारिक शिक्षाएँ निकालता हूँ। पहली, यदि कलीसिया का सारा खेत उस महान स्वामी का है और उसके बिना मजदूर कुछ नहीं हैं, तो इससे उन सब में एकता बढ़नी चाहिए जिन्हें वह काम पर लगाता है। यदि हम एक ही स्वामी की सेवा करते हैं, तो आओ, हम आपस में न झगड़ें।
यह दुःख की बात है जब हम उन भलाई के कामों पर आनन्दित नहीं हो पाते जो दूसरी कलीसियाई शाखाओं के लोग करते हैं, जो हम से भिन्न रीति से काम करते हैं। यदि कोई नया मजदूर आए और दूसरे औज़ारों से काम करे, तो क्या मैं उसका शत्रु बन जाऊँ?
यदि वह अपना काम मुझसे अच्छा करता है, तो क्या मैं उससे जलूँ?
क्या तुम्हें स्मरण है कि एक बार चेले एक दुष्टात्मा को नहीं निकाल सके थे? इससे उन्हें दीन हो जाना चाहिए था। तौभी उसके थोड़े ही समय बाद उन्होंने किसी को मसीह के नाम से दुष्टात्माएँ निकालते देखा, और उसे रोकने लगे, क्योंकि वह उनके दल का न था। वे स्वयं दुष्टात्मा को नहीं निकाल सके थे, फिर भी उन्होंने उसे रोकने का प्रयत्न किया जो निकाल सकता था। कुछ समूह प्राणों को जीत रहे हैं, परन्तु क्योंकि वे यह हमारी शैली में नहीं करते, इसलिए हम उन्हें अनुचित ठहराते हैं। उनकी रीतियाँ अनोखी हो सकती हैं, परन्तु वे सचमुच प्राणों को मसीह के पास लाते हैं—और सबसे अधिक महत्त्व इसी का है। आलोचना करने के बदले, आओ, हम हर एक को प्रोत्साहित करें जो मसीह के पक्ष में खड़ा है। “पर ज्ञान अपने कामों में सच्चा ठहराया गया है।” यदि स्वामी किसी नये हल जोतनेवाले को स्वीकार करता है, तो मजदूरों को उससे सन्तुष्ट रहना चाहिए। यदि महान प्रभु ने तुम्हें काम पर लगाया है, तो उसके चुनाव पर प्रश्न उठाना मेरा काम नहीं। क्या मैं तुम्हारी सहायता कर सकता हूँ? क्या मैं तुम्हें दिखा सकता हूँ कि और अच्छा कैसे करो? या क्या तुम सुधरने में मेरी सहायता कर सकते हो? मजदूरों को एक दूसरे के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए।
इस सच्चाई से सब मजदूरों को परमेश्वर पर गहराई से निर्भर भी हो जाना चाहिए। हे जवान, क्या तुम प्रचार करने जा रहे हो? “हाँ, मैं बड़े-बड़े काम करने जा रहा हूँ।” सचमुच? क्या तुम भूल गए कि तुम कुछ नहीं हो? “इसलिए न तो लगानेवाला कुछ है, और न सींचनेवाला।” कोई शिक्षक विश्वासियों को शान्ति देने के लिये सुसमाचार के सत्य से भरा हुआ आए, परन्तु यदि वह परमेश्वर पर पूरी निर्भरता के साथ नहीं आता, तो वह भी कुछ नहीं है। सामर्थ्य परमेश्वर की है। मनुष्य खोखला है और उसके शब्द हवा हैं; सामर्थ्य और बुद्धि केवल परमेश्वर ही की हैं। यदि हम दीन बने रहें, तो हमारा प्रभु हमें काम में लाएगा। परन्तु यदि हम अपने आप को ऊँचा करें, तो वह हमें हमारी शून्यता पर छोड़ देगा। यह सच्चाई परमेश्वर के खेत में काम करनेवाले हर एक को गरिमा भी देती है। इन शब्दों से मेरा हृदय आनन्द से भर उठता है: “क्योंकि हम परमेश्वर के सहकर्मी हैं।” हम उसके खेत के साधारण मजदूर हैं, तौभी हम उसके साथ काम करते हैं। क्या प्रभु सचमुच हमारे साथ काम करता है?
जो परिणाम निकलते हैं उनसे हम जानते हैं कि वह करता है। “मेरा पिता परमेश्वर अब तक काम करता है, और मैं भी काम करता हूँ।”
परमेश्वर की सब सन्तानों के विषय में यह सच है। जब तुम अपने सारे हृदय से उसकी सेवा करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे साथ होता है। जब तुम अपनी कक्षा से यीशु के विषय में बात करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे द्वारा बोलता है। जब तुम किसी अजनबी को रोककर उसे विश्वास के द्वारा उद्धार के विषय में बताते हो, तो मसीह तुम्हारे द्वारा वैसे ही बोलता है जैसे वह कुएँ पर उस स्त्री से बोला था।
जब तुम खुले मैदान में प्रायश्चित्त करनेवाले लहू के द्वारा क्षमा का प्रचार करते हो, तो वह पतरस का परमेश्वर है जो अपने पुत्र के विषय में गवाही देता है, जैसे उसने पिन्तेकुस्त के दिन दी थी।
अन्त में, इस सच्चाई को हमें घुटनों पर ले आना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर के बिना हम कुछ नहीं हैं, इसलिए आओ, हम इस पवित्र काम में सहायता के लिये उसकी दोहाई दें। बोनेवाला और काटनेवाला दोनों मिलकर प्रार्थना करें, नहीं तो वे कभी मिलकर आनन्द न मनाएँगे। यदि आशीष रोकी गई है, तो इसलिए कि हमने न तो उसे माँगा और न उसकी आशा रखी। हे सहकर्मियो, आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के पास चलें, और हम काटनेवालों को अपनी पूलियाँ लिए लौटते देखेंगे, चाहे बोते समय वे रोते हुए ही क्यों न निकले हों।
हमारे पिता की, जो किसान है, युगानुयुग महिमा होती रहे। आमीन।
अध्याय 10 पूरा हुआ
खेत के मजदूर