अध्याय 9 · 44 मिनट का पठन
सच्ची प्रार्थना—सच्ची सामर्थ्य!
“इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, कि जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”—मरकुस 11:24।
यह पद कुछ-कुछ चमत्कारों के विश्वास से सम्बन्ध रखता है; परन्तु मैं समझता हूँ कि इसका कहीं अधिक सम्बन्ध विश्वास के चमत्कार से है। जो भी हो, आज भोर हम इसे उसी प्रकाश में देखेंगे। मेरा विश्वास है कि यह पाठ केवल प्रेरितों की ही नहीं, वरन् उन सबकी मीरास है जो प्रेरितों के विश्वास में चले, और प्रभु यीशु मसीह की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करते रहे। जो परामर्श मसीह ने बारहों को और अपने निकट के अनुयायियों को दिया था, वही आज भोर परमेश्वर के वचन में हमसे दोहराया जाता है। हमें अनुग्रह मिले कि हम निरन्तर उसका पालन करें। “जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” कितने ही लोग हैं जो शिकायत करते हैं कि उन्हें प्रार्थना में आनन्द नहीं मिलता। वे उसकी उपेक्षा नहीं करते, क्योंकि ऐसा करने का साहस उनमें नहीं; परन्तु यदि साहस होता तो वे उसकी उपेक्षा कर देते, क्योंकि उसमें कोई सुख पाना उनसे इतना दूर है। और क्या हमें भी यह विलाप नहीं करना पड़ता कि कभी-कभी रथों के पहिये निकल जाते हैं, और जब हम विनती में होते हैं तब बड़ी कठिनाई से आगे खिसकते हैं? हम ठहराया हुआ समय तो बिता देते हैं, परन्तु घुटनों से बिना ताज़गी पाए उठते हैं, उस मनुष्य के समान जो अपने बिछौने पर लेटा तो रहा, पर ऐसी नींद नहीं सोया कि सचमुच उसका बल लौट आए। जब वह समय फिर आता है तो विवेक हमें फिर घुटनों पर ला बिठाता है, पर परमेश्वर के साथ मीठी संगति नहीं होती। इस दृढ़ निश्चय के साथ कि वह हमारी घटी पूरी करेगा, उससे अपनी आवश्यकताएँ खोलकर कहना नहीं होता। रटे-रटाए वाक्यों का एक और चक्कर पूरा करके हम घुटनों से उठ खड़े होते हैं, और कदाचित् पहले से भी अधिक विवेक में व्याकुल और मन में दुःखी होकर। मेरी समझ में बहुत से मसीही हैं जिन्हें इसी बात की शिकायत करनी पड़ती है—कि वे इसलिए प्रार्थना नहीं करते कि परमेश्वर के निकट आने की अनुमति पाना एक धन्य बात है, वरन् इसलिए कि उन्हें प्रार्थना करनी ही है, क्योंकि यह उनका कर्तव्य है, क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि वे न करें तो मसीही होने के पक्के प्रमाणों में से एक खो बैठेंगे। हे भाइयो, मैं तुम्हें दोषी नहीं ठहराता; परन्तु साथ ही, यदि आज भोर मैं तुम्हें अनुग्रह की इतनी नीची दशा से उठाकर किसी ऊँचे और अधिक स्वस्थ वातावरण में ले जाने का साधन बन सकूँ, तो मेरा प्राण अत्यन्त आनन्दित होगा। यदि मैं तुम्हें एक और भी उत्तम मार्ग दिखा सकूँ; यदि अब से तुम प्रार्थना को अपना स्वाभाविक वातावरण, अपने जीवन के सबसे आनन्ददायक अभ्यासों में से एक समझने लगो; यदि तुम उसे अपने आवश्यक भोजन से भी बढ़कर मानने लगो, और स्वर्ग के सर्वोत्तम सुखों में से एक जानकर उसका मूल्य आँको, तो निश्चय मेरा एक बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाएगा, और तुम्हें एक बड़ी आशीष के लिये परमेश्वर का धन्यवाद करना होगा।
तो अब मुझ पर ध्यान दो, जब मैं तुमसे विनती करता हूँ कि पहले, पाठ को देखो; दूसरे, अपने चारों ओर देखो; और फिर, ऊपर की ओर देखो।
I. पहले, पाठ को देखो। यदि तुम इसे ध्यान से देखोगे, तो मैं समझता हूँ तुम्हें वे आवश्यक गुण दिखाई देंगे जो प्रार्थना में किसी भी बड़ी सफलता और प्रबलता के लिये ज़रूरी हैं। हमारे उद्धारकर्ता के किए हुए प्रार्थना के वर्णन के अनुसार, सदा कुछ निश्चित विषय होने चाहिए जिनके लिये हम विनती करें। वह वस्तुओं की बात करता है—“जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो।” तो ऐसा जान पड़ता है कि उसने यह बात कभी सोची ही नहीं कि परमेश्वर की सन्तान उसके पास प्रार्थना करने तब जाएगी जब उनके पास प्रार्थना करने को कुछ न हो। प्रार्थना की एक और आवश्यक योग्यता है सच्ची लालसा; क्योंकि स्वामी यहाँ मानकर चलता है कि जब हम प्रार्थना करके माँगते हैं, तब हमारे मन में लालसाएँ होती हैं। सच तो यह है कि वह प्रार्थना नहीं है; वह प्रार्थना जैसी कोई वस्तु हो सकती है, उसका बाहरी रूप या कोरा ढाँचा, परन्तु वह जीवित वस्तु नहीं, वह सब पर प्रबल होनेवाली, सर्वसामर्थी वस्तु नहीं जिसे प्रार्थना कहते हैं, जब तक उसमें लालसाओं की भरपूरी और उमड़ न हो। यह भी ध्यान दो कि सफल प्रार्थना का एक आवश्यक गुण विश्वास है—“विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया।” तुम ऐसी प्रार्थना नहीं कर सकते कि वह स्वर्ग में सुनी जाए और तुम्हारे प्राण की सन्तुष्टि तक उसका उत्तर मिले, जब तक तुम यह विश्वास न करो कि परमेश्वर सचमुच सुनता है और तुम्हें उत्तर देगा। एक और योग्यता यहाँ ठीक ऊपर ही दिखाई देती है, अर्थात् यह कि दृढ़ विश्वास के संग सदा एक प्रत्यक्ष आशा भी चलनी चाहिए—“विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया।” केवल यह विश्वास नहीं कि “मिलेगा” वरन् यह कि “मिल गया”—उन्हें ऐसा गिनो मानो वे मिल चुकीं, ऐसा हिसाब लगाओ मानो वे तुम्हारे पास पहले से हैं, और ऐसा व्यवहार करो मानो वे तुम्हारे पास हैं—ऐसा व्यवहार करो मानो तुम्हें निश्चय है कि वे तुम्हें मिलेंगी—विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।” आओ, इन चार योग्यताओं पर एक-एक करके दृष्टि डालें।
प्रार्थना को किसी भी मूल्य का बनाने के लिये, विनती करने के निश्चित विषय होने चाहिए। हे मेरे भाइयो, हम प्रायः अपनी प्रार्थनाओं में इस-उस और न जाने किस-किस बात के पीछे भटकते फिरते हैं, और हमें कुछ नहीं मिलता, क्योंकि उनमें से किसी में भी हम सचमुच कुछ नहीं चाहते। हम बहुत से विषयों पर बकबक करते हैं, परन्तु प्राण किसी एक विषय पर अपने को एकाग्र नहीं करता। क्या तुम कभी-कभी पहले से यह सोचे बिना घुटनों पर नहीं गिर पड़ते कि तुम परमेश्वर से क्या माँगना चाहते हो? तुम ऐसा आदत के कारण करते हो, तुम्हारे हृदय में कोई हलचल हुए बिना। तुम उस मनुष्य के समान हो जो किसी दुकान पर जाए और यह न जाने कि उसे कौन-सी वस्तुएँ लेनी हैं। सम्भव है वहाँ पहुँचकर वह संयोग से कोई अच्छी ख़रीद कर ले, परन्तु निश्चय ही यह अपनाने योग्य बुद्धिमानी की रीति नहीं है। इसी प्रकार प्रार्थना में लगा मसीही बाद में किसी सच्ची लालसा तक पहुँच सकता है और अपना उद्देश्य पा सकता है; परन्तु वह कितना अधिक सफल होता, यदि वह सोच-विचार और आत्म-परीक्षा द्वारा अपने प्राण को तैयार करके, किसी ऐसे विषय के लिये परमेश्वर के पास आता जिस पर वह सच्ची विनती के साथ निशाना साधने को था। यदि हम महारानी के दरबार में भेंट की अनुमति माँगते, तो हमसे आशा की जाती कि हम इस प्रश्न का उत्तर दें, “आप उनसे किसलिए मिलना चाहते हैं?” हमसे यह आशा न की जाती कि हम राजसी उपस्थिति में चले जाएँ, और वहाँ पहुँचकर तब कोई निवेदन सोचें। परमेश्वर की सन्तान के साथ भी ऐसा ही है। उसे उस बड़े प्रश्न का उत्तर देने योग्य होना चाहिए, “तेरा क्या निवेदन है? और तू क्या माँगता है? वह पूरा किया जाएगा।” कल्पना करो कि एक धनुर्धारी अपने धनुष से तीर चला रहा है, और उसे पता ही नहीं कि निशाना कहाँ है! क्या उसके सफल होने की कोई सम्भावना है? सोचो कि खोज-यात्रा पर निकला एक जहाज़ समुद्र में उतरता है, और कप्तान को कुछ भी पता नहीं कि वह क्या ढूँढ़ रहा है! क्या तुम आशा करोगे कि वह विज्ञान की खोजों से या सोने के ख़ज़ानों से लदा हुआ लौटेगा? और हर बात में तो तुम्हारी कोई योजना होती है। तुम यह जाने बिना काम पर नहीं जाते कि कोई वस्तु है जिसे बनाने का तुमने विचार किया है; तो फिर यह कैसे कि तुम यह जाने बिना परमेश्वर के पास जाते हो कि तुम क्या पाना चाहते हो? यदि तुम्हारे सामने कोई विषय होता, तो तुम्हें प्रार्थना कभी नीरस और भारी काम न लगती; मुझे निश्चय है कि तुम उसके लिये तरसते। तुम कहते, “मुझे एक वस्तु चाहिए। भला होता कि मैं अपने परमेश्वर के निकट जाकर उससे वह माँग सकता; मेरी एक आवश्यकता है, मैं चाहता हूँ कि वह पूरी हो, और मैं तब तक तरसता रहता हूँ जब तक अकेले में न जा सकूँ, कि उसके सामने अपना मन उण्डेलूँ, और उससे वह वस्तु माँगूँ जिसके लिये मेरा प्राण इतनी व्याकुलता से हाँफता है” तुम पाओगे कि यदि तुम्हारे सामने कुछ विषय हों जिन पर तुम निशाना साधो, और मैं समझता हूँ यह भी कि यदि कुछ व्यक्ति हों जिनका तुम नाम लो, तो यह तुम्हारी प्रार्थनाओं के लिये अधिक सहायक होगा। परमेश्वर से केवल सामान्य रूप से पापियों के लिये विनती मत करो, वरन् सदा कुछ विशेष लोगों का नाम लो। यदि तुम रविवार-पाठशाला के शिक्षक हो, तो केवल यह मत माँगो कि तुम्हारी कक्षा आशीषित हो, वरन् परमप्रधान के सामने अपने बच्चों के लिये नाम ले-लेकर निश्चित रूप से प्रार्थना करो। और यदि तुम्हारे घराने के लिये कोई दया है जिसकी तुम्हें लालसा है, तो घुमा-फिराकर मत जाओ, वरन् परमेश्वर से अपनी बिनतियों में सीधे और सरल रहो। जब तुम उससे प्रार्थना करो, तो उसे बताओ कि तुम्हें क्या चाहिए। यदि तुम्हारे पास पर्याप्त धन नहीं, यदि तुम कंगाली में हो, यदि तुम संकट में हो, तो अपनी दशा उसके सामने रख दो। परमेश्वर के साथ झूठी विनम्रता मत बरतो। सीधे मुद्दे पर आओ; उससे ईमानदारी से बात करो। उसे उन सुन्दर घुमावदार वाक्यों की कोई आवश्यकता नहीं जिन्हें मनुष्य उस समय बराबर काम में लाते हैं जब वे अपना मतलब साफ़-साफ़ कहना नहीं चाहते। यदि तुम्हें कोई सांसारिक या आत्मिक दया चाहिए, तो वैसा ही कहो। उसे प्रकट करने के लिये शब्द ढूँढ़ने को सारी बाइबल मत छान मारो। अपनी आवश्यकताओं को उन शब्दों में प्रकट करो जो स्वभाव से तुम्हारे मन में आते हैं। वे ही सबसे अच्छे शब्द होंगे, इस पर भरोसा रखो। अब्राहम के शब्द अब्राहम के लिये सबसे अच्छे थे, और तुम्हारे शब्द तुम्हारे लिये सबसे अच्छे होंगे। याकूब और एलिय्याह के समान, उन्हीं के वाक्य काम में लाते हुए, प्रार्थना करने के लिये तुम्हें पवित्रशास्त्र के सारे पदों का अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं। यदि तुम ऐसा करोगे तो तुम उनका अनुकरण नहीं करोगे। तुम अक्षरशः और दास की नाईं उनकी नकल कर सकते हो, परन्तु तुममें वह आत्मा नहीं जिसने उनके शब्दों को सुझाया और उनमें जान डाली। अपने शब्दों में प्रार्थना करो। परमेश्वर से साफ़-साफ़ बात करो; जो तुम्हें चाहिए वह सीधे माँगो। व्यक्तियों का नाम लो, वस्तुओं का नाम लो, और अपनी विनतियों के विषय पर सीधा निशाना साधो, और मुझे निश्चय है कि तुम शीघ्र ही पाओगे कि वह थकान और नीरसता, जिसकी शिकायत तुम अपनी मध्यस्थता की प्रार्थनाओं में प्रायः करते हो, फिर तुम पर न आएगी; या कम से कम उतनी आदतन न आएगी जितनी अब तक आती रही है।
“परन्तु,” कोई कहता है, “मुझे नहीं लगता कि मेरे पास प्रार्थना करने के कोई विशेष विषय हैं।” आह! मेरे प्रिय भाई, मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो या कहाँ रहते हो कि तुम्हारे पास प्रार्थना के लिये कोई विशेष विषय ही नहीं, क्योंकि मैं तो पाता हूँ कि हर दिन अपनी कोई न कोई आवश्यकता या क्लेश लेकर आता है, और मेरे पास हर दिन अपने परमेश्वर को बताने के लिये कुछ न कुछ होता है। परन्तु यदि हम पर कोई क्लेश न भी होता, हे मेरे प्रिय भाइयो, यदि हम अनुग्रह में ऐसी ऊँचाई पर पहुँच गए होते कि हमारे पास माँगने को कुछ न होता, तो भी क्या हम मसीह से इतना प्रेम करते हैं कि हमें यह प्रार्थना करने की कोई आवश्यकता नहीं कि हम उससे और अधिक प्रेम करें? क्या हममें इतना विश्वास है कि हमने यह पुकारना छोड़ दिया है, “प्रभु, इसे बढ़ा?” मुझे निश्चय है कि थोड़ी-सी आत्म-परीक्षा से तुम सदा शीघ्र जान लोगे कि कोई न कोई उचित विषय है जिसके लिये तुम दया के द्वार को खटखटा सकते हो, और पुकार सकते हो, “हे प्रभु, मेरे मन का मनोरथ मुझे दे।” और यदि तुम्हारे मन में कोई लालसा ही न हो, तो तुम्हें केवल उस पहले परखे हुए मसीही से पूछना है जो तुम्हें मिले, और वह तुम्हें एक बता देगा। “ओह,” वह तुम्हें उत्तर देगा, “यदि तुम्हारे पास अपने लिये माँगने को कुछ नहीं, तो मेरे लिये प्रार्थना करो। माँगो कि एक बीमार पत्नी चंगी हो जाए। प्रार्थना करो कि प्रभु एक निराश हृदय पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए; माँगो कि प्रभु किसी ऐसे सेवक की सहायता भेजे जिसने व्यर्थ परिश्रम किया है, और व्यर्थ ही अपना बल खो दिया है।” जब तुम अपने लिये माँग चुको, तो दूसरों के लिये विनती करो; और यदि तुम्हें कोई ऐसा न मिले जो कोई विषय सुझा सके, तो इस विशाल सदोम पर, तुम्हारे सामने पड़े इस नगर पर जो दूसरे गमोरा के समान है, दृष्टि करो; इसे निरन्तर अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के सामने ले जाओ, और पुकारो, “भला हो कि लन्दन तेरी दृष्टि में बना रहे, कि उसका पाप थम जाए, कि उसकी धार्मिकता ऊँची की जाए, कि पृथ्वी का परमेश्वर इस नगर में से अपने लिये बहुत से लोग प्राप्त करे।”
निश्चित विषय के साथ-साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि उसे पाने की सच्ची लालसा हो। “ठण्डी प्रार्थनाएँ,” एक पुराने धर्मज्ञानी का कहना है, “इन्कार माँगती हैं।” जब हम प्रभु से ठण्डेपन से और बिना उत्कटता के माँगते हैं, तो मानो हम उसका हाथ रोक देते हैं, और उसे वही आशीष देने से रोकते हैं जिसे ढूँढ़ने का हम दिखावा करते हैं। जब तुम्हारा विषय तुम्हारी आँखों के सामने हो, तो तुम्हारे प्राण पर उस विषय का मूल्य, उसके लिये तुम्हारी अपनी अत्यधिक आवश्यकता, और उस विषय के न मिलने पर तुम पर आनेवाला संकट ऐसा छा जाना चाहिए कि तुम विवश होकर उसके लिये वैसे ही विनती करो जैसे कोई मनुष्य अपने प्राण के लिये विनती करता है। मनुष्य से की गई सच्ची प्रार्थना का एक सुन्दर उदाहरण दो कुलीन स्त्रियों के आचरण में मिला, जिनके पतियों को मृत्युदण्ड सुनाया गया था और जिन्हें फाँसी दी जाने ही वाली थी, जब वे राजा जॉर्ज के सामने आईं और उनकी क्षमा के लिये गिड़गिड़ाईं। राजा ने उन्हें रूखेपन और क्रूरता से झिड़क दिया। जॉर्ज प्रथम! यह ठीक उसके स्वभाव के अनुरूप था। और जब वे फिर, और फिर, और फिर गिड़गिड़ाती रहीं, तो उन्हें घुटनों से उठाया न जा सका; उन्हें सचमुच घसीटकर दरबार से बाहर ले जाना पड़ा, क्योंकि वे तब तक हटने को तैयार न थीं जब तक राजा उन पर मुस्कुराकर यह न कह दे कि उनके पति जीवित रहेंगे। हाय! वे सफल न हुईं, परन्तु अपने पतियों के प्राणों के लिये इस प्रकार लगातार गिड़गिड़ाते रहने के कारण वे सचमुच कुलीन स्त्रियाँ थीं। परमेश्वर से प्रार्थना करने की हमारी रीति भी यही है। जो वस्तु हमें चाहिए उसकी हममें ऐसी लालसा होनी चाहिए कि जब तक वह न मिले तब तक हम न उठें—तो भी उसकी ईश्वरीय इच्छा के अधीन रहकर। यह जानकर कि जो वस्तु हम माँगते हैं वह अनुचित नहीं हो सकती, और उसने आप उसकी प्रतिज्ञा की है, हमने ठान लिया है कि वह दी ही जानी चाहिए; और यदि न दी जाए, तो हम उस प्रतिज्ञा को लेकर फिर, और फिर विनती करेंगे, यहाँ तक कि हमारी बिनतियाँ थमने से पहले स्वर्ग के फाटक हिल उठें। कोई आश्चर्य नहीं कि इन दिनों परमेश्वर ने हमें अधिक आशीष नहीं दी, क्योंकि हम प्रार्थना में वैसे उत्साही नहीं जैसे हमें होना चाहिए। हाय, वे ठण्डे मन की प्रार्थनाएँ जो होंठों पर ही मर जाती हैं—वे जमी हुई विनतियाँ; वे मनुष्यों के हृदयों को नहीं हिलातीं, तो परमेश्वर के हृदय को कैसे हिलाएँगी? वे हमारे अपने प्राणों से नहीं निकलतीं, वे हमारे अन्तरतम हृदय के गहरे गुप्त सोतों से नहीं उमड़तीं, और इसलिए वे उस तक नहीं उठ सकतीं जो केवल प्राण की पुकार सुनता है, जिसके सामने कपट कोई परदा नहीं बुन सकता, न औपचारिकता कोई भेष धर सकती है। हमें उत्कट होना ही चाहिए, नहीं तो हमें यह आशा रखने का कोई अधिकार नहीं कि प्रभु हमारी प्रार्थना सुनेगा।
और निश्चय, हे मेरे भाइयो, यदि हम उस अस्तित्व की महानता को समझ लेते जिसके सामने हम विनती करते हैं, तो यही सारी हलकाई को रोकने और निरन्तर उत्कटता को विवश करने के लिये पर्याप्त होता। हे मेरे परमेश्वर, क्या मैं तेरे सामने आकर ठण्डे मन के शब्दों से तेरा ठट्ठा करूँ? क्या स्वर्गदूत तेरे सामने अपने मुँह ढाँपते हैं, और क्या मैं बिना प्राण और बिना हृदय के किसी रीति को बड़बड़ाकर पूरा कर देने से सन्तुष्ट रहूँ? आह, मेरे भाइयो! हम बहुत कम जानते हैं कि हमारी कितनी प्रार्थनाओं से प्रभु घृणा करता है। तुम्हें और मुझे यह घृणित लगता कि सड़कों पर लोग हमसे ऐसे माँगें मानो जो वे माँग रहे हैं वह उन्हें चाहिए ही नहीं। परन्तु क्या हमने परमेश्वर के साथ ऐसा ही नहीं किया? क्या वह वस्तु, जो मनुष्य के लिये स्वर्ग का सबसे बड़ा वरदान है, हमारे लिये एक सूखा, मरा हुआ कर्तव्य नहीं बन गई? जॉन ब्रैडफोर्ड के विषय में कहा जाता था कि प्रार्थना में उसकी एक विशेष कला थी, और जब उससे उसका भेद पूछा गया तो उसने कहा, “जब मैं जानता हूँ कि मुझे क्या चाहिए, तब मैं सदा उसी प्रार्थना पर ठहरा रहता हूँ, जब तक मुझे यह अनुभव न हो कि मैंने परमेश्वर से उसके लिये विनती कर ली है, और जब तक परमेश्वर और मेरे बीच उस विषय पर लेन-देन न हो जाए।” मैं दूसरी विनती पर तब तक कभी नहीं जाता जब तक पहली को पूरा न कर लूँ।” हाय उन कुछ लोगों पर जो आरम्भ करते हैं, “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए;” और इससे पहले कि वे उस आराधनापूर्ण विचार—“तेरा नाम पवित्र माना जाए,”—को मन में उतार पाएँ, वे अगले शब्द दोहराने लगते हैं—“तेरा राज्य आए;” फिर कदाचित् उनके मन में कोई बात खटकती है, “क्या मैं सचमुच चाहता हूँ कि उसका राज्य आए? यदि वह अभी आ जाए तो मैं कहाँ होऊँगा?” और जब वे उस पर सोच ही रहे होते हैं, उनकी आवाज़ आगे बढ़ती जाती है, “तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो;” इस प्रकार वे अपनी प्रार्थनाओं को गड्डमड्ड कर देते हैं और वाक्यों को एक-दूसरे में मिला देते हैं। आह! हर एक पर तब तक ठहरे रहो जब तक तुमने सचमुच उसे प्रार्थना में न उतार लिया हो। डोरी पर एक साथ दो तीर चढ़ाने का यत्न मत करो, दोनों चूक जाएँगे। जो अपनी बन्दूक में एक साथ दो बार बारूद भरे, वह सफलता की आशा नहीं कर सकता। पहले एक गोली चलाओ, फिर दोबारा भरो। एक बार परमेश्वर से विनती करो और प्रबल हो जाओ, फिर दोबारा विनती करो। पहली दया पा लो, फिर दूसरी के लिये जाओ। अपनी प्रार्थनाओं के रंगों को एक-दूसरे में तब तक मिलाते जाने से सन्तुष्ट मत हो जब तक देखने को कोई चित्र ही न रहे, केवल एक बड़ा धब्बा, बुरी तरह पोते हुए रंगों का एक लेप। स्वयं प्रभु की प्रार्थना को देखो। उसमें कैसी स्पष्ट और तीखी रेखाएँ हैं। उसमें कुछ निश्चित दयाएँ हैं, और वे एक-दूसरे में घुल-मिल नहीं जातीं। वह वहाँ खड़ी है, और जब तुम उसे पूरा देखते हो तो वह एक भव्य चित्र है; गड़बड़ी नहीं, वरन् सुन्दर क्रम। तुम्हारी प्रार्थनाएँ भी ऐसी ही हों। एक पर ठहरे रहो जब तक उसमें प्रबल न हो जाओ, फिर अगली पर जाओ। निश्चित विषयों और उत्कट लालसाओं के एक साथ मिल जाने पर, इस आशा का भोर होने लगता है कि तुम परमेश्वर से प्रबल होगे।
परन्तु फिर: ये दोनों बातें किसी काम की न होतीं यदि इनमें एक और भी अधिक आवश्यक और ईश्वरीय गुण न मिला होता, अर्थात् परमेश्वर पर दृढ़ विश्वास। हे भाइयो, क्या तुम प्रार्थना पर विश्वास करते हो? मैं जानता हूँ कि तुम प्रार्थना करते हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के लोग हो; परन्तु क्या तुम प्रार्थना की सामर्थ्य पर विश्वास करते हो? बहुत से मसीही हैं जो नहीं करते; वे समझते हैं कि यह एक अच्छी बात है, और वे मानते हैं कि कभी-कभी यह अचम्भे के काम करती है; परन्तु वे यह नहीं समझते कि प्रार्थना, सच्ची प्रार्थना, सदा सफल होती है। वे समझते हैं कि उसका प्रभाव बहुत सी और बातों पर निर्भर है, पर उसमें अपने आप में कोई आवश्यक गुण या सामर्थ्य नहीं। अब मेरे अपने प्राण का दृढ़ निश्चय यह है कि प्रार्थना सारे विश्व में सबसे महान सामर्थ्य है; कि उसमें बिजली, आकर्षण, गुरुत्वाकर्षण, या उन और गुप्त शक्तियों से, जिन्हें मनुष्यों ने नाम तो दे दिए हैं पर जिन्हें वे समझते नहीं, कहीं अधिक सर्वशक्तिमान बल है। सारे विश्व पर प्रार्थना का प्रभाव उतना ही स्पष्ट, उतना ही सच्चा, उतना ही निश्चित, उतना ही अटल है जितना पदार्थ के किसी भी नियम का। जब कोई मनुष्य सचमुच प्रार्थना करता है, तो यह प्रश्न ही नहीं रहता कि परमेश्वर उसकी सुनेगा या नहीं; उसे उसकी सुननी ही होगी; इसलिए नहीं कि प्रार्थना में कोई विवशता है, वरन् इसलिए कि प्रतिज्ञा में एक मीठी और धन्य विवशता है। परमेश्वर ने प्रार्थना सुनने की प्रतिज्ञा की है, और वह अपनी प्रतिज्ञा पूरी करेगा। क्योंकि वह परमप्रधान और सच्चा परमेश्वर है, वह आप अपना इन्कार नहीं कर सकता। आह! यह सोचना; कि तुम, एक तुच्छ मनुष्य, यहाँ खड़े होकर परमेश्वर से बात कर सकते हो, और परमेश्वर के द्वारा सारे संसारों को हिला सकते हो। तो भी जब तुम्हारी प्रार्थना सुनी जाएगी, सृष्टि में कोई खलबली न होगी; चाहे बड़े से बड़े उद्देश्य पूरे हों, तो भी परमेश्वर का प्रबन्ध एक क्षण के लिये भी अस्त-व्यस्त न होगा। न कोई पत्ता पेड़ से समय से पहले गिरेगा, न कोई तारा अपने मार्ग में ठहरेगा, न पानी की एक बूँद अपने सोते से धीमी टपकेगी; सब कुछ वैसा ही चलता रहेगा, और तो भी तुम्हारी प्रार्थना सब कुछ पूरा कर चुकी होगी। वह परमेश्वर के आदेशों और उद्देश्यों से, जैसे-जैसे वे प्रतिदिन पूरे होते जाते हैं, बात करेगी; और वे सब तुम्हारी प्रार्थना से पुकारकर कहेंगे, “तू हमारा भाई है; हम आदेश हैं, और तू प्रार्थना; परन्तु तू आप भी एक आदेश है, हमारे समान पुराना, हमारे समान निश्चित, हमारे समान प्राचीन।” हमारी प्रार्थनाएँ दूसरे रूप में परमेश्वर के आदेश हैं। परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाएँ जीवित हृदयों से साँस बनकर निकली हुई परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ ही हैं, और वे प्रतिज्ञाएँ वही आदेश हैं, केवल दूसरे रूप और ढंग में ढाली हुई। यह मत कहो, “मेरी प्रार्थनाएँ आदेशों पर कैसे प्रभाव डाल सकती हैं?” वे नहीं डाल सकतीं, सिवाय इसके कि तुम्हारी प्रार्थनाएँ स्वयं आदेश हैं, और जब वे निकलती हैं, तो हर एक प्रार्थना जो पवित्र आत्मा की प्रेरणा से तुम्हारे प्राण में उपजी है, उतनी ही सर्वशक्तिमान और उतनी ही अनन्त है जितना वह आदेश जिसने कहा, “उजियाला हो, तो उजियाला हो गया;” या जितना वह आदेश जिसने अपने लोगों को चुना, और मसीह के बहुमूल्य लहू के द्वारा उनका छुटकारा ठहराया। तुझमें प्रार्थना की सामर्थ्य है, और आज तू उस विश्व के सबसे प्रबल सेवकों के बीच खड़ा है जिसे परमेश्वर ने बनाया है। तुझे स्वर्गदूतों पर सामर्थ्य है, वे तेरी इच्छा पर उड़ेंगे। तुझे आग, और जल, और पृथ्वी के तत्वों पर सामर्थ्य है। तुझमें यह सामर्थ्य है कि अपनी आवाज़ तारों के पार तक सुनाए; जहाँ गर्जन सन्नाटे में मिट जाते हैं, वहाँ तेरी आवाज़ अनन्तता की प्रतिध्वनियों को जगाएगी। स्वयं परमेश्वर का कान सुनेगा, और स्वयं परमेश्वर का हाथ तेरी इच्छा के आगे झुकेगा। वह तुझसे कहता है कि पुकार, “तेरी इच्छा पूरी हो,” और तेरी इच्छा पूरी होगी। जब तू उसकी प्रतिज्ञा लेकर विनती कर सकता है, तब तेरी इच्छा उसकी इच्छा है। मेरे प्रिय मित्रो, क्या यह भय उपजानेवाली बात नहीं लगती कि किसी के हाथों में ऐसी सामर्थ्य हो कि वह प्रार्थना कर सके? तुमने कभी-कभी ऐसे मनुष्यों के विषय में सुना होगा जो एक विचित्र और रहस्यमय शक्ति रखने का दावा करते थे, जिससे वे अथाह गहराइयों से आत्माओं को बुला सकते, मेंह बरसा सकते, या सूर्य को रोक सकते थे। वह सब कल्पना की उपज थी; परन्तु यदि वह सच भी होता, तो भी मसीही उनसे बड़ा जादूगर है। यदि उसे परमेश्वर पर विश्वास भर हो, तो उसके लिये कोई बात अनहोनी नहीं। वह गहरे से गहरे जल में से छुड़ाया जाएगा—वह कठिन से कठिन क्लेशों में से बचाया जाएगा—अकाल में वह खिलाया जाएगा—महामारी में वह अछूता निकल जाएगा—विपत्ति के बीच वह दृढ़ और बलवन्त होकर चलेगा—युद्ध में वह सदा ढाल से ढँका रहेगा—और लड़ाई के दिन वह अपना सिर ऊँचा करेगा, यदि वह केवल प्रतिज्ञा पर विश्वास कर सके, और उसे परमेश्वर की आँखों के सामने थामे रहे, और अटल भरोसे के मन्त्र के साथ उसे लेकर विनती करे। कोई बात नहीं, मैं फिर कहता हूँ, कोई बल ऐसा प्रचण्ड नहीं, कोई ऊर्जा ऐसी अद्भुत नहीं, जैसी वह ऊर्जा जो परमेश्वर ने हर उस मनुष्य को दी है जो याकूब के समान मल्लयुद्ध कर सकता है, और इस्राएल के समान प्रार्थना में उससे प्रबल हो सकता है। परन्तु इस पर हमें विश्वास होना चाहिए; हमें प्रार्थना को वही मानना चाहिए जो वह है, नहीं तो वह वैसी नहीं होती जैसी उसे होना चाहिए। जब तक मैं अपनी प्रार्थना को प्रभावशाली न मानूँ, वह प्रभावशाली न होगी, क्योंकि बहुत कुछ वह मेरे विश्वास पर ही निर्भर करेगी। परमेश्वर मुझे दया दे सकता है, तब भी जब मुझमें विश्वास न हो; वह उसका अपना प्रभुतापूर्ण अनुग्रह होगा, परन्तु उसने ऐसा करने की प्रतिज्ञा नहीं की है। परन्तु जब मुझमें विश्वास हो, और मैं सच्ची लालसा के साथ प्रतिज्ञा लेकर विनती कर सकूँ, तब यह केवल सम्भावना की बात नहीं रह जाती कि मुझे आशीष मिलेगी या नहीं, या मेरी इच्छा पूरी होगी या नहीं। जब तक सनातन परमेश्वर अपने वचन से फिर न जाए, जब तक उसकी खाई हुई शपथ रद्द न हो जाए, और वह आप वह न रह जाए जो वह है, तब तक “हम जानते हैं, कि जो कुछ हमने उससे माँगा, वह पाया है।”
और अब एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ने के लिये: निश्चित विषयों, उत्कट लालसाओं और प्रार्थना के प्रभाव पर दृढ़ विश्वास के साथ—और आह, ईश्वरीय अनुग्रह हमारे साथ ऐसा ही करे!—उनमें एक प्रत्यक्ष आशा भी मिली होनी चाहिए। हमें इस योग्य होना चाहिए कि दयाओं के मिलने से पहले ही उन्हें गिन लें, यह विश्वास करते हुए कि वे मार्ग में हैं। कुछ दिन हुए मैं एक प्यारी-सी छोटी पुस्तक पढ़ रहा था, जिसकी ओर मैं तुम सबका ध्यान दिलाना चाहूँगा, जिसे एक अमेरिकी लेखक ने लिखा है जो प्रार्थना की सामर्थ्य को भली-भाँति जानता जान पड़ता है, और जिसका मैं बहुत सी अच्छी बातों के लिये ऋणी हूँ—एक छोटी पुस्तक जिसका नाम है द स्टिल आवर, उसमें मुझे दानिय्येल की पुस्तक के एक अंश का उल्लेख मिला, मेरे विचार में दसवें अध्याय का, जहाँ, जैसा वह कहता है, प्रार्थना का सारा यन्त्र खोलकर दिखा दिया गया जान पड़ता है। दानिय्येल घुटनों के बल प्रार्थना कर रहा है, और प्रधान स्वर्गदूत मीकाएल उसके पास आता है। वह उससे बातें करता है, और उसे बताता है कि ज्यों ही दानिय्येल ने समझने-बूझने के लिये मन लगाया और अपने परमेश्वर के सामने अपने को दीन किया, त्यों ही उसके वचन सुने गए, और प्रभु ने उस स्वर्गदूत को भेज दिया। फिर वह संसार की सबसे व्यावहारिक रीति से उससे कहता है, “मुझे पहले ही यहाँ आ जाना चाहिए था, परन्तु फारस के राज्य का प्रधान मेरा सामना किए रहा; तो भी तेरी जाति के प्रधान ने मेरी सहायता की, और मैं तुझे शान्ति देने और मैं तुझे समझाने आया हूँ।” अब देखो। परमेश्वर हमारे हृदयों में लालसा फूँकता है, और ज्यों ही लालसा वहाँ होती है, हमारे पुकारने से पहले ही वह उत्तर देना आरम्भ कर देता है। शब्द स्वर्ग की ओर आधे मार्ग तक भी नहीं पहुँचे होते, वे अभी होंठों पर ही काँप रहे होते हैं—वह उन शब्दों को जानता है जो हम बोलनेवाले हैं—कि वह उनका उत्तर देने लगता है, स्वर्गदूत को भेजता है; स्वर्गदूत आता है और आवश्यक आशीष नीचे ले आता है। यदि तुम इसे अपनी आँखों से देख पाते, तो यह तो एक प्रकाशन ही होता। कुछ लोग समझते हैं कि आत्मिक बातें स्वप्न हैं, और हम कोरी कल्पनाओं की बातें करते हैं। नहीं, मेरा सचमुच विश्वास है कि मसीही की प्रार्थना में उतनी ही वास्तविकता है जितनी बिजली की कौंध में; और मसीही की प्रार्थना की उपयोगिता और उत्तमता उतनी ही प्रत्यक्ष रूप से जानी जा सकती है जितनी बिजली की कौंध की सामर्थ्य, जब वह पेड़ को चीर डालती है, उसकी डालियाँ तोड़ देती है, और उसे ठीक जड़ तक फाड़ देती है। प्रार्थना कोई कल्पना या गढ़ी हुई कथा नहीं; वह एक वास्तविक, सच्ची वस्तु है, जो विश्व को विवश करती है, परमेश्वर के नियमों को भी बेड़ियों में बाँधती है, और उस महान और पवित्र परमेश्वर को अपने दीन परन्तु कृपापात्र प्राणी—मनुष्य—की इच्छा सुनने को विवश करती है। परन्तु हमें सदा इस पर विश्वास करने की आवश्यकता है। हमें प्रार्थना में एक प्रत्यक्ष निश्चय की आवश्यकता है। दयाओं के आने से पहले ही उन्हें गिन लेना! निश्चित होना कि वे आ रही हैं! ऐसा व्यवहार करना मानो वे हमें मिल चुकीं! जब तुमने अपनी प्रतिदिन की रोटी माँग ली हो, तो फिर चिन्ता से व्याकुल न होना, वरन् विश्वास करना कि परमेश्वर ने तुम्हारी सुन ली है, और वह तुम्हें देगा। जब तुम अपने बीमार बच्चे का मामला परमेश्वर के सामने ले जा चुके हो, तो विश्वास करना कि बच्चा चंगा हो जाएगा, या यदि न हो, तो वह तुम्हारे लिये और बड़ी आशीष और परमेश्वर के लिये और अधिक महिमा का कारण होगा, और इस प्रकार उसे उसी पर छोड़ देना। यह कह सकना, “मैं जानता हूँ कि उसने अब मेरी सुन ली है; मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूँगा; मैं अपने परमेश्वर की ओर ताकता रहूँगा, और सुनूँगा कि मेरे प्राण से वह क्या कहेगा।” हे मसीही, क्या तुम कभी निराश हुए, जब तुमने विश्वास से प्रार्थना की और उत्तर की आशा रखी? आज भोर मैं यहाँ अपनी गवाही देता हूँ, कि ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने उस पर भरोसा रखा हो और उसे अपने प्रति विफल पाया हो। मैंने मनुष्य पर भरोसा रखा और धोखा खाया, परन्तु जब भी मैंने अपनी विनती के साथ उसकी सुनने की इच्छा पर विश्वास और उसकी प्रतिज्ञा का निश्चय जोड़ा, मेरे परमेश्वर ने मेरी की हुई विनती को एक बार भी अस्वीकार नहीं किया।
परन्तु मैं किसी को कहते सुनता हूँ, “क्या हम सांसारिक बातों के लिये प्रार्थना कर सकते हैं?” हाँ, अवश्य कर सकते हो। हर बात में अपनी आवश्यकताएँ परमेश्वर पर प्रकट करो। यह केवल आत्मिक बातों के लिये नहीं, वरन् प्रतिदिन के कामकाज के लिये भी है। अपनी छोटी से छोटी परीक्षाएँ उसके सामने ले जाओ। वह प्रार्थना के सुननेवाले परमेश्वर है; वह पवित्रस्थान का परमेश्वर होने के साथ-साथ तुम्हारे घर का भी परमेश्वर है। जो कुछ तुम्हारे पास है, सब कुछ सदा परमेश्वर के सामने ले जाते रहो। जैसा एक भले मनुष्य ने, जो शीघ्र ही इस कलीसिया से जुड़नेवाला है, अपनी स्वर्गवासी पत्नी के विषय में मुझसे कहा, “ओह,” उसने कहा, “वह ऐसी स्त्री थी कि जब तक वह किसी बात को प्रार्थना का विषय न बना लेती, मैं उससे कोई काम कभी न करवा पाता था। बात चाहे जो हो, वह कहा करती थी, ‘मुझे इसे प्रार्थना का विषय बनाना है;’” आह, हममें हर बात को प्रभु के सामने फैला दिया जाने की यह मीठी आदत और अधिक हो, जैसे हिजकिय्याह ने रबशाके की पत्री के साथ किया, और उसे वहीं छोड़ देने की, यह कहते हुए, “तेरी इच्छा पूरी हो, मैं इसे तुझे सौंपता हूँ!” लोग कहते हैं कि ब्रिस्टल के श्रीमान मूलर धुन में बहके हुए हैं, क्योंकि वे सात सौ बच्चों को इकट्ठा करते हैं और विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनका प्रबन्ध करेगा; यद्यपि थैली में कुछ नहीं होता, तो भी वे केवल वही कर रहे हैं जो हर मसीही मनुष्य का साधारण आचरण होना चाहिए। वे एक ऐसे नियम पर चल रहे हैं जिसका संसारी मनुष्य को सदा ठट्ठा करना ही है, क्योंकि वह उसे समझता नहीं; एक ऐसी रीति जो इन्द्रियों के दुर्बल निर्णय को सदा ऐसी ही लगेगी कि वह साधारण समझ पर नहीं, वरन् साधारण समझ से ऊँची किसी वस्तु पर—असाधारण विश्वास पर—टिकी है। आह, हममें वह असाधारण विश्वास होता कि हम परमेश्वर को उसके वचन पर मान लें! जो मनुष्य उस पर भरोसा रखता है, उसे वह लज्जित या व्याकुल होने न दे सकता है, न देगा। इस प्रकार मैंने अब, जैसे मुझसे बन पड़ा, तुम्हारे सामने वे चार बातें रखी हैं जिन्हें मैं प्रबल प्रार्थना के लिये आवश्यक समझता हूँ—“जो कुछ तुम प्रार्थना करके माँगो तो विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
II. इस प्रकार तुमसे पाठ को देखने के लिये कहने के बाद, अब मैं चाहता हूँ कि तुम अपने चारों ओर देखो। प्रार्थना के लिये होनेवाली हमारी सभाओं पर अपने चारों ओर दृष्टि करो, और अपनी निजी मध्यस्थता की प्रार्थनाओं पर भी अपने चारों ओर दृष्टि करो, और दोनों को इस पाठ के आशय से परखो। पहले, प्रार्थना-सभाओं पर अपने चारों ओर दृष्टि करो; इस विषय में मैं बहुत तीखा नहीं बोल सकता, क्योंकि मैं सच्चाई से विश्वास करता हूँ कि जो प्रार्थना-सभाएँ प्रायः हमारे बीच होती हैं, उनमें उन दोषों में से, जिनकी ओर मैं संकेत करनेवाला हूँ, उन और सब सभाओं से कहीं कम हैं जिनमें मैं कभी गया हूँ। तो भी उनमें कुछ दोष हैं, और मैं आशा करता हूँ कि जो कुछ हम कहेंगे उसे हर वह भाई अपने ऊपर लेगा जो प्रार्थना-सभाओं में सबके सामने विनती करने का अभ्यस्त है। क्या यह सच नहीं कि ज्यों ही तुम सभा में प्रवेश करते हो, तुम्हें लगता है कि बहुत से प्रार्थना करनेवालों का वरदान (कदाचित् यह कठोर कहना है, पर मैं समझता हूँ ईमानदारी से) इसमें है कि उनकी स्मरण-शक्ति अच्छी हो, जिससे वे बहुत से ऐसे पद याद रख सकें जो हमारे परदादाओं के दादाओं के दिनों से सदा उद्धृत होते आए हैं, और उन्हें अच्छे नियमित क्रम में दोहरा सकें। कुछ कलीसियाओं में, विशेषकर गाँव की कलीसियाओं में, यह वरदान मज़बूत फेफड़ों में भी है, जिससे वे बिना साँस लिये पच्चीस मिनट तक टिके रहें जब वे संक्षेप में हों, और पौन घण्टे तक जब वे कुछ अधिक खिंच जाएँ। यह वरदान इसमें भी है कि कोई विशेष वस्तु न माँगी जाए, वरन् हर बात के पूरे दायरे में से होकर गुज़रा जाए, जिससे प्रार्थना नोकवाला तीर न रहकर किसी बेढब यन्त्र-सी बन जाए, जिसकी कोई नोक ही नहीं, और तो भी जो सारी की सारी नोक होने के लिये बनी है, जिसका निशाना हर वस्तु पर है, और इसलिए जो किसी पर नहीं लगती। प्रायः उन्हीं भाइयों से सबसे अधिक प्रार्थना करने को कहा जाता है जिनमें ये विचित्र, और कदाचित् उत्तम, वरदान होते हैं, यद्यपि मुझे निश्चय कहना पड़ता है कि ऐसे वरदानों की बड़ी धुन में रहने की प्रेरित की आज्ञा का पालन मुझसे नहीं होता। अब यदि इसके बदले किसी ऐसे मनुष्य से प्रार्थना करने को कहा जाए जिसने पहले कभी सबके सामने प्रार्थना नहीं की; मान लो वह उठता है और कहता है, “हे प्रभु, मैं अपने आप को ऐसा पापी पाता हूँ कि तुझसे बोल भी नहीं पाता; प्रभु, प्रार्थना करने में मेरी सहायता कर! हे प्रभु, मेरे बेचारे प्राण को बचा! भला होता कि तू मेरे पुराने साथियों को बचाता! प्रभु, हमारे सेवक को आशीष दे! हमें जागृति देने की कृपा कर। हे प्रभु, मैं और कुछ नहीं कह सकता; यीशु के निमित्त मेरी सुन! आमीन।” तो फिर, तुम्हें किसी प्रकार ऐसा लगता है मानो तुमने स्वयं प्रार्थना करना आरम्भ कर दिया हो। तुम्हें उस मनुष्य में रुचि हो जाती है, कुछ तो इस डर से कि कहीं वह रुक न जाए, और कुछ इसलिए कि तुम्हें निश्चय है कि जो उसने कहा, वही उसका अभिप्राय था। और यदि उसके बाद कोई और उठकर उसी आत्मा में प्रार्थना करे, तो तुम बाहर जाकर कहते हो, “यह सच्ची प्रार्थना है।” मैं उस दूसरी प्रकार की तीस मिनट की प्रार्थना से ऐसी तीन मिनट की प्रार्थना कहीं अधिक पसन्द करूँगा, क्योंकि एक प्रार्थना करना है और दूसरी प्रचार करना। मुझे अनुमति दो कि मैं एक पुराने प्रचारक की बात उद्धृत करूँ जो उसने प्रार्थना के विषय पर कही थी, और उसे तुम्हें परामर्श के एक छोटे-से वचन के रूप में दूँ—“स्मरण रख, प्रभु तेरी प्रार्थनाओं के अंकगणित के कारण तेरी नहीं सुनेगा; वह उनकी गिनती नहीं करता। वह तेरी प्रार्थनाओं के अलंकार-शास्त्र के कारण तेरी नहीं सुनेगा; उसे उस वाक्पटु भाषा की परवाह नहीं जिसमें वे कही जाती हैं। वह तेरी प्रार्थनाओं की ज्यामिति के कारण तेरी न सुनेगा; वह उन्हें उनकी लम्बाई या उनकी चौड़ाई से नहीं नापता। वह तेरी प्रार्थनाओं के संगीत के कारण तेरी ओर ध्यान न देगा; उसे मधुर स्वरों या सुरीले वाक्यों की परवाह नहीं। न वह तेरी प्रार्थनाओं के तर्कशास्त्र के कारण तेरी ओर दृष्टि करेगा; कि वे भली-भाँति क्रम में रखी और उत्तम रीति से बाँटी गई हैं। परन्तु वह तेरी सुनेगा, और जो आशीष वह तुझे देगा उसका परिमाण वह तेरी प्रार्थनाओं की ईश्वरीयता के अनुसार नापेगा। यदि तू मसीह के व्यक्तित्व को लेकर विनती कर सके, और यदि पवित्र आत्मा तुझमें जोश और उत्कटता फूँके, तो जो आशीषें तू माँगेगा, वे निश्चय तुझ तक आएँगी।” हे भाइयो, मैं चाहता हूँ कि पुरानी प्रार्थनाओं का वह सारा भण्डार जला दूँ जिसे हम ये पचास वर्ष से काम में लाते आ रहे हैं। वह “तेल जो एक बर्तन से दूसरे बर्तन में जाता है,”—वह “घोड़ा जो लड़ाई में वेग से दौड़ता है,”—वह ग़लत उद्धृत, बिगाड़ा हुआ पद, “जहाँ दो या तीन इकट्ठे मिलते हैं, वहाँ तू उनके बीच में होगा,” और वह भी उन्हें आशीष देने के लिये,”—और वे सब और उद्धरण जिन्हें हम गढ़ते, तोड़ते-मरोड़ते, और एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक नकल करते आए हैं। भला होता कि हम परमेश्वर से केवल अपने ही हृदयों से बोलने आते। यह हमारी प्रार्थना-सभाओं के लिये बड़ी अच्छी बात होती; उनमें अधिक लोग आते; और मुझे निश्चय है कि वे अधिक फलवन्त होतीं, यदि हर मनुष्य औपचारिकता की उस आदत को झाड़ फेंकता, और परमेश्वर से वैसे बात करता जैसे एक बालक अपने पिता से बात करता है; जो हमें चाहिए वह उससे माँगते, और फिर बैठकर बात समाप्त कर देते। मैं यह पूरी मसीही उत्कटता के साथ कहता हूँ। प्रायः, क्योंकि मैंने किसी प्रचलित रूप में प्रार्थना करना नहीं चुना, लोगों ने कहा है, “यह मनुष्य श्रद्धालु नहीं!” मेरे प्रिय महोदय, आप मेरी श्रद्धा के न्यायी नहीं। मेरा स्थिर रहना या गिर जाना मेरे स्वामी ही से सम्बंध रखता है। मैं नहीं समझता कि अय्यूब ने किसी को उद्धृत किया। मैं नहीं समझता कि याकूब ने स्वर्ग में के उस पुराने पवित्र जन को,—अपने पिता अब्राहम को—उद्धृत किया। मैं नहीं पाता कि यीशु मसीह ने प्रार्थना में पवित्रशास्त्र उद्धृत किया। उन्होंने दूसरों के शब्दों में प्रार्थना नहीं की, वरन् अपने ही शब्दों में की। परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम पुराने पवित्रस्थान के उन उत्तम परन्तु बहुत बासी सुगन्ध-द्रव्यों को बटोरते फिरो। वह तुम्हारे अपने प्राण के ताज़े जैतून से अभी-अभी निकाला हुआ नया तेल चाहता है। वह सुगन्ध-द्रव्य और लोबान चाहता है—उन पुराने सन्दूकों के नहीं जहाँ वे पड़े-पड़े अपनी सुगन्ध खो बैठे, वरन् वह ताज़ा धूप और ताज़ा गन्धरस चाहता है, जो तुम्हारे अपने प्राण के अनुभव के ओपीर से लाया गया हो। चौकस रहो कि तुम सचमुच प्रार्थना करो; प्रार्थना की भाषा मत सीखो, वरन् प्रार्थना की आत्मा को खोजो; और सर्वशक्तिमान परमेश्वर तुम्हें आशीष दे, और तुम्हें अपनी विनतियों में और अधिक सामर्थी बनाए।
मैंने कहा है, “अपने चारों ओर देखो।” मैं चाहता हूँ कि तुम यह काम जारी रखो, और अपनी निजी कोठरियों के चारों ओर देखो। आह, हे भाइयो और बहनो, हममें से कुछ के लिये कोई स्थान ऐसा नहीं जिसे देखने में हमें इतनी लज्जा आए जितनी अपनी कोठरी के द्वार को देखने में। मैं यह नहीं कह सकता कि उसके कब्ज़ों में जंग लग गया है; वे अपने ठहराए हुए समयों पर खुलते और बन्द होते हैं। मैं यह नहीं कह सकता कि द्वार पर ताला पड़ा है और उस पर मकड़ी के जाले लगे हैं। हम स्वयं प्रार्थना की उपेक्षा नहीं करते; परन्तु वे दीवारें, दीवार में से निकली वे कड़ियाँ, वे कैसी कहानी सुना सकती हैं! “आह!” दीवार पुकार उठ सकती है, “मैंने तुझे तब सुना है जब तू ऐसी बड़ी जल्दी में था कि अपने परमेश्वर के साथ मुश्किल से दो मिनट बिता सका, और मैंने तुझे तब भी सुना है जब तू न सोया था न जागा, और जब तू जानता भी न था कि तू क्या कह रहा है।” फिर एक कड़ी पुकार उठ सकती है, “मैंने तुझे आकर दस मिनट बिताते और कुछ भी न माँगते सुना है, कम से कम तेरे हृदय ने तो कुछ नहीं माँगा। होंठ हिले, परन्तु हृदय ने कुछ नहीं माँगा। होंठ हिले, परन्तु हृदय चुप था।” दूसरी कड़ी कैसे पुकार सकती है—“आह! मैंने तुझे कराहते हुए अपना प्राण उण्डेलते सुना है, परन्तु मैंने तुझे अविश्वास के साथ जाते देखा है, यह विश्वास न करते हुए कि तेरी प्रार्थना सुनी गई, प्रतिज्ञा को दोहराते हुए, पर यह न सोचते हुए कि परमेश्वर उसे पूरा करेगा।” निश्चय कोठरी की चारों दीवारें अपने क्रोध में एक साथ आकर हम पर गिर पड़ सकती हैं, क्योंकि हमने बहुत बार अपने अविश्वास से, और अपनी उतावली से, और हर प्रकार के पापों से परमेश्वर का अपमान किया है। हमने उसकी दया के सिंहासन पर भी, ठीक उस स्थान पर जहाँ उसकी कृपा सबसे पूरी रीति से प्रकट होती है, उसका अपमान किया है। क्या तुम्हारे साथ ऐसा नहीं है? क्या हम में से हर एक को अपनी-अपनी बारी में इसे मान नहीं लेना चाहिए? तो हे मसीही भाइयो, चौकस रहो कि सुधार हो; और परमेश्वर तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में पहले से अधिक सामर्थी और अधिक सफल बनाए।
III. परन्तु तुम्हें देर तक न रोकूँ, इसलिए अन्तिम बात यह है—ऊपर देखो, ऊपर की ओर देखो। ऊपर देखो, हे मसीही भाइयो और बहनो, और आओ, हम रोएँ। हे परमेश्वर, तूने हमें एक सामर्थी हथियार दिया है, और हमने उसमें जंग लगने दिया है। तूने हमें वह दिया है जो तेरे ही समान सामर्थी है, और हमने उस सामर्थ्य को सोया पड़ा रहने दिया है। क्या यह घिनौना अपराध न होता, यदि किसी मनुष्य को आँख दी जाती जिसे वह खोलता नहीं, या हाथ जिसे वह उठाता नहीं, या पाँव जो इसलिए अकड़ जाता कि वह उसे काम में नहीं लाता? और हम अपने विषय में क्या कहें, जब परमेश्वर ने हमें प्रार्थना में सामर्थ्य दी है, और तो भी वह सामर्थ्य निश्चल पड़ी है? आह, यदि विश्व हमारे समान निश्चल होता, तो हम कहाँ होते? हे परमेश्वर, तू सूर्य को प्रकाश देता है और वह उससे चमकता है। तू तारों को भी प्रकाश देता है और वे टिमटिमाते हैं। पवनों को तू बल देता है और वे बहती हैं। और वायु को तू जीवन देता है और वह चलती है, और मनुष्य उसमें साँस लेते हैं। परन्तु अपने लोगों को तूने ऐसा वरदान दिया है जो बल, और जीवन, और प्रकाश से उत्तम है, और तो भी वे उसे निश्चल पड़ा रहने देते हैं। वे लगभग भूल चुके हैं कि वह सामर्थ्य उनके हाथ में है; वे उसे कभी-कभार ही काम में लाते हैं, यद्यपि वह अनगिनत लाखों के लिये आशीष का कारण होती। रो, हे मसीही मनुष्य। रोम के सम्राट कॉन्सटेंटाइन ने देखा कि दूसरे सम्राटों के सिक्कों पर उनकी मूर्तियाँ सीधी खड़ी मुद्रा में थीं—विजय मनाती हुई। इसके बदले उसने आज्ञा दी कि उसकी मूर्ति घुटने टेके हुए ढाली जाए, क्योंकि उसने कहा—“इसी रीति से मैंने विजय पाई है।” जब तक हमारी मूर्ति घुटने टेके हुए न ढाली जाए, हम कभी विजय न पाएँगे। हमारे हारने का, और हमारे झण्डों के धूल में घिसटने का कारण यह है कि हमने प्रार्थना नहीं की। जाओ—अपने परमेश्वर के पास लौट जाओ, शोक के साथ, और उसके सामने मान लो, हे एप्रैमियो, कि तुमने शस्त्रधारी और धनुर्धारी होने पर भी, युद्ध के समय पीठ दिखा दी। अपने परमेश्वर के पास जाओ और उससे कहो कि यदि प्राणों का उद्धार नहीं होता, तो यह इसलिए नहीं कि उसमें बचाने की सामर्थ्य नहीं, वरन् इसलिए कि तुमने नाश होते पापियों के लिये मानो कभी प्रसव-पीड़ा नहीं सही। तुम्हारा हृदय कीरहेरेस के कारण वीणा का सा क्रन्दन नहीं करता, न रूबेन के गोत्र के विभाजनों के कारण तुम्हारी आत्मा व्याकुल हुई है। जागो, जागो, हे इस्राएल के लोगो; विकल हो, हे निश्चिन्त लोगो; तुम जिन्होंने प्रार्थना की उपेक्षा की है; हे पापियो, तुम जो स्वयं सिय्योन के भीतर हो, और जो सुख से रहते आए हो। अपने आप को जगाओ; अपने परमेश्वर से मल्लयुद्ध करो और संघर्ष करो, और तब आशीष आएगी—उसकी दया की प्रथम और अन्तिम वर्षा, और पृथ्वी बहुतायत से उपज देगी, और सारी जातियाँ उसको धन्य कहेंगी। तो ऊपर देखो, और रोओ।
एक बार फिर ऊपर देखो और आनन्द करो। यद्यपि तुमने उसके विरुद्ध पाप किया है, तो भी वह तुमसे अब भी प्रेम करता है। तुमने उससे प्रार्थना नहीं की और न उसके मुख के खोजी हुए, परन्तु देखो, वह अब भी तुम्हें पुकारता है—“मेरे दर्शन के खोजी हो;” और वह यह नहीं कहता, “मुझे व्यर्थ में ढूँढ़ो।” तुम भले ही सोते के पास न गए हो, परन्तु वह पहले के समान ही सेंत-मेंत बहता है। तुम परमेश्वर के निकट नहीं आए, परन्तु वह अब भी अनुग्रह करने की बाट जोहता है, और तुम्हारी सब विनतियाँ सुनने को तैयार है। देखो, वह तुमसे कहता है, “आनेवाली बातों के विषय में मुझसे पूछो, और मेरे बेटे-बेटियों के विषय में मुझे आज्ञा दो।” कैसी धन्य बात है कि स्वर्ग में का स्वामी सदा सुनने को तैयार है! ऑगस्टीन का उस मनुष्य के दृष्टान्त पर एक बहुत सुन्दर विचार है जिसने आधी रात को अपने मित्र का द्वार खटखटाया और कहा, “हे मित्र; मुझे तीन रोटियाँ दे।” उसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार चलती है—मैं दया का द्वार खटखटाता हूँ, और घोर आधी रात है। “क्या घर के सेवकों में से कोई आकर मुझे उत्तर न देगा?” नहीं; मैं खटखटाता हूँ, परन्तु वे सोए हुए हैं। हे परमेश्वर के प्रेरितो—हे महिमा पाए हुए शहीदो—तुम सोए हुए हो; तुम अपने बिछौनों पर विश्राम कर रहे हो; तुम मेरी प्रार्थना नहीं सुन सकते। परन्तु क्या बच्चे उत्तर न देंगे? क्या ऐसे बच्चे नहीं जो आकर अपने भाई के लिये द्वार खोलने को तैयार हों? नहीं; वे सोए हुए हैं। हे मेरे भाइयो जो चले गए हो—जिनके साथ मैं मीठी-मीठी बातें करता था, और जो मेरे हृदय के साथी थे—तुम मुझे उत्तर नहीं दे सकते, क्योंकि तुम यीशु में विश्राम कर रहे हो; तुम्हारे कार्य उनके साथ हो लेते हैं, परन्तु तुम मेरे लिये काम नहीं कर सकते। परन्तु जब सेवक सोए हुए हैं, और जब बच्चे उत्तर नहीं दे सकते, तब स्वामी जाग रहा है,—आधी रात को भी जाग रहा है। मेरे प्राण के लिये आधी रात हो सकती है, परन्तु वह मेरी सुनता है, और जब मैं कह रहा होता हूँ, “मुझे तीन रोटियाँ दे,” तो वह द्वार पर आता है और मुझे जितना चाहिए उतना देता है। हे मसीही, तो ऊपर देखो और आनन्द करो। यदि तुम्हारा मुँह खुला है, तो सदा एक कान खुला है। यदि तुम्हारा हृदय तत्पर है, तो सदा एक हाथ तत्पर है। तुम्हें केवल पुकारना है और प्रभु सुनता है; वरन् तुम्हारे पुकारने से पहले ही वह उत्तर देगा, और तुम्हारे माँगते ही वह तुम्हारी सुन लेगा। आह! तो प्रार्थना में पीछे मत रहो। जब तुम घर पहुँचो तो उसके पास जाओ; वरन् मार्ग में ही चुपचाप अपना मन उसकी ओर उठाओ; और तुम्हारा निवेदन या विनती चाहे जो हो, उसे यीशु के नाम से माँगो, और वह तुम्हारे लिये पूरा किया जाएगा।
फिर भी, एक बार और, हे प्रिय मसीही भाइयो, ऊपर देखो, और अब से अपनी प्रार्थनाओं को सुधारो। प्रार्थना को अब किसी काल्पनिक कथा या कठिन कर्तव्य के रूप में मत देखो; उसे एक वास्तविक सामर्थ्य के रूप में, एक वास्तविक आनन्द के रूप में देखो। जब दार्शनिक कोई छिपी हुई शक्ति खोज लेते हैं, तो उन्हें उसे काम में लाने में आनन्द आता जान पड़ता है। मेरा विश्वास है कि ऐसे बहुत से बड़े अभियन्ता हुए हैं, जिन्होंने मनुष्यों के कुछ सबसे अद्भुत निर्माणों की रूपरेखा बनाई और उन्हें खड़ा किया, इसलिए नहीं कि वे लाभदायक होते, वरन् केवल अद्भुत काम कर दिखाने की अपनी सामर्थ्य को प्रकट करने के प्रेम से। संसार को यह दिखाने के लिये कि कौशल क्या कर सकता है और मनुष्य क्या पूरा कर सकता है, उन्होंने कम्पनियों को ऐसे उद्यमों में लगने को ललचाया जो, जहाँ तक मैं देख सका, प्रत्यक्ष रूप से कभी लाभ न दे सकते थे, ताकि उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले। हे मसीही लोगो, क्या एक बड़ा अभियन्ता बड़े कामों का यत्न करे और अपनी सामर्थ्य दिखाए, और क्या तुम, जिनके पास उससे बढ़कर सामर्थ्य है जितनी किसी भी मनुष्य ने अपने परमेश्वर से अलग रहकर कभी चलाई हो—क्या तुम उसे निश्चल पड़ी रहने दोगे? नहीं, किसी बड़े विषय को सोचो, उसके लिये अपनी विनतियों की नसें तान दो। अपने हृदय की हर नस लालसा के गाढ़े लहू से लबालब भर जाने दो, और उसके लिये परमेश्वर से संघर्ष करो, और मल्लयुद्ध करो, और खींचतान करो, और जूझो, प्रतिज्ञाओं को काम में लाते हुए और उसके गुणों को लेकर विनती करते हुए, और देखो कि क्या परमेश्वर तुम्हें तुम्हारे मन की अभिलाषा नहीं देता। मैं आज तुम्हें चुनौती देता हूँ कि प्रार्थना में मेरे स्वामी की उदारता से आगे बढ़कर दिखाओ। मैं तुम्हें खुली ललकार देता हूँ। उसे जितना वह है उससे अधिक मानकर उस पर विश्वास करो; अपना मुँह इतना पसारो कि वह उसे भर न सके; अभी उसके पास उससे अधिक विश्वास माँगने जाओ जितने की प्रतिज्ञा अनुमति देती है; साहस करो, जोखिम उठाओ, यदि हो सके तो सनातन परमेश्वर से आगे निकल जाओ; इसका यत्न करो। या जैसा मैं इसे कहना अधिक पसन्द करूँगा, अपनी विनतियाँ और आवश्यकताएँ लो, और देखो कि क्या वह तुम्हारा आदर नहीं करता। परखकर देखो कि यदि तुम उस पर विश्वास करो तो क्या वह प्रतिज्ञा पूरी नहीं करता, और अपने आत्मा के अभिषेक के तेल से तुम्हें भरपूर आशीष नहीं देता, जिसके द्वारा तुम प्रार्थना में बलवन्त हो जाओगे।
जाते-जाते मैं ये थोड़े-से शब्द और जोड़े बिना नहीं रह सकता। मैं जानता हूँ कि तुममें से कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी प्रार्थना नहीं की। तुमने कदाचित् बहुत वर्षों तक प्रार्थना का कोई रूप दोहराया है, पर एक बार भी प्रार्थना नहीं की। आह! बेचारे प्राणी, तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है, और जब तक तुम नये सिरे से जन्म न लो, तुम उस प्रकार प्रार्थना नहीं कर सकते जिस प्रकार प्रार्थना करने का निर्देश मैं मसीही को देता आया हूँ। परन्तु मुझे तुमसे इतना कहने दो। क्या तुम्हारा हृदय उद्धार के लिये तरसता है? क्या आत्मा ने धीरे से कहा है, “हे पापी, यीशु के पास आ, वह तेरी सुनेगा?” उस फुसफुसाहट पर विश्वास करो, क्योंकि वह तुम्हारी सुनेगा। जागृत पापी की प्रार्थना परमेश्वर को ग्रहणयोग्य है। वह खेदित मनवालों की सुनता है, और उन्हें चंगा भी करता है। अपनी कराहें और अपनी आहें परमेश्वर के पास ले जाओ, और वह तुम्हें उत्तर देगा। “आह,” परन्तु कोई कहता है, “मेरे पास विनती करने को कुछ नहीं।” अच्छा, तो वैसे विनती करो जैसे दाऊद ने की—“मेरे अधर्म को जो बहुत हैं क्षमा कर।” वह विनती तुम्हारे पास है—कहो, उस प्रिय के निमित्त जिसने अपना लहू बहाया,” और हे पापी, तुम प्रबल होगे। परन्तु अपने पाप को हाथ में लिये हुए परमेश्वर के पास जाकर दया मत माँग। तुम उस बलवाई के विषय में क्या सोचोगे जो अपने राजा के सामने उपस्थित हुआ, और अपनी कमर में कटार खोंसे हुए, और अपनी छाती पर अपने बलवे की घोषणा लगाए हुए क्षमा माँगने लगा? क्या वह क्षमा पाने के योग्य होता? वह किसी भी दशा में उसके योग्य न हो सकता था, और निश्चय वह अपने स्वामी का इस प्रकार ठट्ठा करने के कारण, जब वह दया ढूँढ़ने का दिखावा कर रहा था, दुगने दण्ड के योग्य होता। यदि किसी पत्नी ने अपने पति को त्याग दिया हो, तो क्या तुम समझते हो कि उसमें इतनी ढिठाई होगी कि वह निर्लज्ज माथे के साथ लौट आए, और अपने जार की बाँह पर टेक लगाए हुए क्षमा माँगे? नहीं, उसमें ऐसी ढिठाई न हो सकती थी, और तो भी तुम्हारे साथ ऐसा ही है—कदाचित् दया माँगते हुए भी पाप में चलते रहना—परमेश्वर से मेल करने की प्रार्थना करते हुए भी अपनी अभिलाषा को पालना और उसमें लिप्त रहना। जाग! जाग! और अपने परमेश्वर की दुहाई दे, हे सोनेवाले। नाव चट्टान के निकट पहुँच रही है; कदाचित् कल वह उससे टकराकर चूर-चूर हो जाए, और तू अनन्त दुःख की अथाह गहराइयों में डाल दिया जाए। अपने परमेश्वर की दुहाई दे, मैं कहता हूँ; और जब तू उसे पुकारे, तो अपना पाप फेंक दे, नहीं तो वह तेरी नहीं सुन सकता। यदि तू अपने अपवित्र हाथ उठाए और तेरे दाहिने हाथ में मिथ्या हो, तो तेरे होंठों पर प्रार्थना व्यर्थ है। आह, उसके पास आओ, उससे कहो, “सब अधर्म दूर कर; अनुग्रह से हमको ग्रहण कर; सेंत-मेंत हम से प्रेम कर,” और वह तुम्हारी सुनेगा, और तुम अब भी प्रबल राजकुमारों के समान प्रार्थना करोगे, और एक दिन उसके तारों-भरे सिंहासन के सामने विजेता से भी बढ़कर होकर खड़े होगे, जो सब के ऊपर परम परमेश्वर होकर सदा राज्य करता है, और युगानुयुग धन्य है।
अध्याय 9 पूरा हुआ
सच्ची प्रार्थना—सच्ची सामर्थ्य!