अध्याय 8 · 40 मिनट का पठन
निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो
“निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” 1 थिस्सलुनीकियों 5:17।
हमारे पाठ का स्थान बहुत कुछ सुझाता है। देखो कि यह किस बात के बाद आता है। यह ठीक इस उपदेश के तुरन्त बाद आता है, “सदा आनन्दित रहो;” मानो उस आज्ञा ने पढ़नेवाले को कुछ डगमगा दिया हो, और उससे यह पुछवाया हो, “मैं सदा आनन्दित कैसे रह सकता हूँ?” और इसलिए प्रेरित ने उत्तर के रूप में यह जोड़ दिया, “सदा प्रार्थना करो।” जितनी अधिक प्रार्थना, उतना अधिक आनन्द। प्रार्थना प्राण के भीतर दबे हुए दुःखों को बह निकलने का मार्ग देती है; वे बह जाते हैं, और उनके स्थान पर पवित्र आनन्द की धाराएँ हृदय में उमड़ पड़ती हैं। साथ ही, जितना अधिक आनन्द, उतनी अधिक प्रार्थना; जब हृदय शान्त दशा में होता है, और प्रभु में आनन्द से भरा होता है, तब वह निश्चय ही आराधना में प्रभु के निकट भी आएगा। पवित्र आनन्द और प्रार्थना एक दूसरे पर क्रिया और प्रतिक्रिया करते रहते हैं।
परन्तु यह भी देखो कि पाठ के ठीक बाद क्या आता है: “हर बात में धन्यवाद करो।” जब आनन्द और प्रार्थना का विवाह होता है, तो उनकी पहलौठी सन्तान कृतज्ञता होती है। जब हम उन वस्तुओं के लिये जो हमारे पास हैं परमेश्वर में आनन्द करते हैं, और विश्वास के साथ और अधिक के लिये उससे प्रार्थना करते हैं, तब हमारे प्राण उसका धन्यवाद करते हैं, जो कुछ हमारे पास है उसके आनन्द में भी, और जो अभी आनेवाला है उसकी आशा में भी। ये तीनों पाठ तीन साथी चित्र हैं, जो एक सच्चे मसीही के जीवन को दर्शाते हैं; बीच का चित्र दोनों ओर के चित्रों को जोड़नेवाली कड़ी है। ये तीन उपदेश हर एक विश्वासी के गले के लिये अनुग्रह का आभूषण हैं; तुम में से हर एक इन्हें वैभव और शोभा के निमित्त पहने रहे: “सदा आनन्दित रहो;” “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो;” “हर बात में धन्यवाद करो।”
परन्तु हम प्रसंग पर विचार करने के लिये कुछ भी समय नहीं निकाल सकते, वरन् हमें सामने रखे उपदेश की ओर बढ़ना होगा। हमारा पाठ यद्यपि अत्यन्त छोटा है, तो भी अद्भुत रीति से भरपूर है, और हम इस पर इन शीर्षकों के अन्तर्गत विचार करेंगे। हम चार प्रश्न पूछेंगे और उनका उत्तर देंगे। पहला, ये शब्द किस बात की ओर संकेत करते हैं? दूसरा, इनका वास्तविक अर्थ क्या है? तीसरा, हम इनका पालन कैसे करें? और चौथा, विशेष करके हमें ही इनका पालन क्यों करना चाहिए?
I. ये शब्द किस बात की ओर संकेत करते हैं? “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” क्या ये इस बात की ओर संकेत नहीं करते कि प्रार्थना में वाणी का प्रयोग कोई अनिवार्य तत्व नहीं है? यदि यह सम्भव भी होता, तो भी हमारा निरन्तर ऊँचे स्वर से प्रार्थना करते रहना अत्यन्त अनुचित होता। तब निःसन्देह न प्रचार करने और सुनने का अवसर रहता, न मित्रता की बातचीत का, न कारोबार का, न जीवन के किसी और कर्तव्य का; और इतने सारे स्वरों का कोलाहल हमारे पड़ोसियों को सिय्योन की आराधना की अपेक्षा बाल की उपासना का अधिक स्मरण दिलाता। प्रभु यीशु की यह मनसा कभी नहीं थी कि हमारे गले, फेफड़े और जीभें सदा काम में लगी रहें। जब हमें निरन्तर प्रार्थना करनी है, और फिर भी हम वाणी से निरन्तर प्रार्थना नहीं कर सकते, तो स्पष्ट है कि सुनाई देनेवाली भाषा प्रार्थना के लिये अनिवार्य नहीं है। हम हज़ार ऐसे शब्द बोल सकते हैं जो प्रार्थना जान पड़ें, और फिर भी कभी प्रार्थना न करें; दूसरी ओर, हम परमेश्वर के कान में अत्यन्त प्रभावशाली रीति से पुकार सकते हैं, और फिर भी एक शब्द न कहें। निर्गमन की पुस्तक में परमेश्वर को मूसा से यह कहते हुए दिखाया गया है, “तू क्यों मेरी दुहाई दे रहा है?” और फिर भी यह कहीं नहीं लिखा कि मूसा ने उस समय एक अक्षर भी मुँह से निकाला था। यह सच है कि वाणी का प्रयोग प्रायः प्रार्थना में सहायता करता है। व्यक्तिगत रूप से मैं पाता हूँ कि जब मैं अकेला होता हूँ, तब यदि मैं अपना ही स्वर सुन सकूँ तो सबसे अच्छी प्रार्थना कर पाता हूँ; तो भी यह अनिवार्य नहीं है; प्रार्थना के ग्रहणयोग्य होने में, उसकी सच्चाई में, या उसकी प्रबलता में इसका कोई भाग नहीं। मौन भक्ति के लिये उतना ही उपयुक्त वस्त्र है जितना कोई भी वस्त्र जिसे भाषा गढ़ सके।
यह भी उतना ही स्पष्ट है कि प्रार्थना की मुद्रा का कोई बड़ा महत्व नहीं, क्योंकि यदि घुटनों के बल ही प्रार्थना करना आवश्यक होता, तो हम निरन्तर प्रार्थना नहीं कर सकते; वह मुद्रा कष्टदायक और हानिकारक हो जाती। हमारे सृजनहार ने हमें पाँव किस लिये दिए हैं, यदि वह चाहता है कि हम उन पर कभी खड़े ही न हों? यदि उसकी मनसा यह होती कि हम निरन्तर घुटनों के बल रहें, तो वह देह को दूसरे ढंग से गढ़ता, और हमें अंगों की ऐसी अनावश्यक लम्बाई न देता। घुटनों के बल प्रार्थना करना अच्छा है; यह अत्यन्त उपयुक्त मुद्रा है; यह ऐसी मुद्रा है जो दीनता प्रकट करती है, और जब दीनता सचमुच अनुभव की जाती है, तब घुटने टेकना उसका स्वाभाविक और सुन्दर चिह्न होता है; परन्तु साथ ही, भले मनुष्यों ने मुँह के बल लेटकर प्रार्थना की है, बैठकर प्रार्थना की है, खड़े होकर प्रार्थना की है, किसी भी मुद्रा में प्रार्थना की है; और मुद्रा प्रार्थना के सार में सम्मिलित नहीं है। उन लोगों के द्वारा बन्धन में डाले जाने को स्वीकार न करो जिनकी दृष्टि में झुका हुआ घुटना टूटे और पिसे हुए मन से अधिक महत्व रखता है।
पाठ से यह भी स्पष्ट है कि प्रार्थना के लिये स्थान अनिवार्य नहीं है, क्योंकि यदि केवल कुछ ही पवित्र स्थान होते जहाँ प्रार्थना ग्रहणयोग्य होती, और हमें निरन्तर प्रार्थना करनी होती, तो हमारे गिरजाघर अत्यन्त विशाल होने चाहिए थे, ताकि हम सदा उन्हीं में रह सकें, और उनमें मनुष्य के निवास के लिये आवश्यक सारी व्यवस्थाएँ होनी पड़तीं। यदि यह सच है कि ईंट की दीवार के इस ओर उस ओर की अपेक्षा कुछ अधिक पवित्रता है, यदि यह सच है कि खुली हवा अनुग्रह को उड़ा ले जाती है, और सबसे ऊँची ग्रहणयोग्यता के लिये हमें मेहराबदार छतें, खम्भे, गलियारा, वेदी-कक्ष और आड़ा-भवन चाहिए, तो विदा, हे हरी-भरी गलियो, और सुन्दर बगीचो, और मनोहर वनो, क्योंकि अब से हमें निरन्तर वहीं बसना होगा जहाँ तुम्हारी सुगन्ध और ताज़गी हम तक कभी न पहुँच सके। परन्तु यह तो हास्यास्पद है; इसलिए मैं यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि किसी एक विशेष स्थान पर बार-बार जाने का प्रार्थना से बहुत थोड़ा या कुछ भी सम्बन्ध नहीं; और ऐसा निष्कर्ष अरियुपगुस पर पौलुस के इस कथन से मेल खाता है, “जिस परमेश्वर ने पृथ्वी और उसकी सब वस्तुओं को बनाया, वह स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी होकर हाथ के बनाए हुए मन्दिरों में नहीं रहता।”
“निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” यह उपदेश एक ही वार में विशेष समयों के उस विचार को उलट देता है जिनमें प्रार्थना औरों की अपेक्षा अधिक ग्रहणयोग्य या अधिक उचित समझी जाती है। यदि मुझे निरन्तर प्रार्थना करनी है, तो हर एक क्षण प्रार्थना के लिये उपयुक्त होना चाहिए; और घण्टे में एक भी अपवित्र क्षण नहीं, न दिन में एक भी अग्रहणयोग्य घण्टा, न वर्ष में एक भी अपवित्र दिन। प्रभु ने प्रार्थना के लिये कोई विशेष सप्ताह नहीं ठहराया, वरन् सब सप्ताह प्रार्थना के सप्ताह होने चाहिए; और न उसने यह कहा है कि दिन का एक घण्टा दूसरे से अधिक ग्रहणयोग्य है। सारा समय विनती के लिये समान रूप से उचित है, समान रूप से पवित्र, परमेश्वर के सामने समान रूप से ग्रहणयोग्य; नहीं तो हमसे निरन्तर प्रार्थना करने को न कहा जाता। प्रार्थना के अपने समय रखना अच्छा है; विशेष विनती के लिये समय अलग रखना अच्छा है—इसमें हमें कोई सन्देह नहीं; परन्तु हमें इससे यह अन्धविश्वास कभी उत्पन्न न होने देना चाहिए कि भोर को प्रार्थना के लिये कोई विशेष पवित्र घड़ी है, साँझ को प्रार्थना के लिये कोई विशेष ग्रहणयोग्य घड़ी है, और वर्ष की कुछ ऋतुओं में प्रार्थना के लिये कोई पवित्र समय है। जहाँ कहीं हम सच्चे मन से प्रभु को ढूँढ़ते हैं, वह हमें मिलता है; जब कभी हम उसकी दुहाई देते हैं, वह हमारी सुनता है। पवित्र किए हुए हृदय के लिये हर स्थान पवित्र भूमि है, और पवित्र मनुष्य के लिये हर दिन पवित्र दिन है। जनवरी से दिसम्बर तक पंचांग में एक भी ऐसी तिथि नहीं जिसमें प्रार्थना वर्जित हो। सब दिन पर्व के दिन हैं; चाहे सब्त हों या सप्ताह के साधारण दिन, वे सब प्रार्थना के लिये ग्रहणयोग्य समय हैं। तो पाठ से यह स्पष्ट है कि वाणी, मुद्रा, स्थान, समय—इनमें से कोई भी प्रार्थना के सार में सम्मिलित नहीं; नहीं तो, इस विषय में, हमें एक असम्भव काम करने की आज्ञा दी जाती, और हम भली भाँति निश्चित हैं कि यह प्रभु हमारे परमेश्वर की रीति नहीं है।
पाठ में एक और बात की ओर संकेत है, अर्थात् यह कि किसी मसीही को ऐसे किसी स्थान में जाने का अधिकार नहीं जहाँ वह प्रार्थना करता न रह सके। निरन्तर प्रार्थना करो? तो मुझे कभी ऐसे स्थान में नहीं होना चाहिए जहाँ मैं निरन्तर प्रार्थना न कर सकूँ। इस कारण संसार के बहुत से मनोरंजन, उनका नाम लिए बिना ही, तुरन्त परखे और दोषी ठहराए जा सकते हैं। कुछ लोग बनी-बनाई प्रार्थनाओं में विश्वास करते हैं, जो हर अवसर के लिये पहले से काट-छाँटकर तैयार रखी गई हैं; और साथ ही वे यह भी मानते हैं कि लोग बपतिस्मे में नया जन्म पा लेते हैं, चाहे उनका जीवन मसीही होने के सिवा और कुछ भी हो; तो क्या उन्हें उन सब परिस्थितियों के लिये भी प्रार्थनाएँ तैयार नहीं करनी चाहिए जिनमें उनकी कलीसिया के ये प्रिय, नया जन्म पाए हुए परन्तु अनुग्रहहीन बेटे-बेटियाँ पाए जाते हैं? जैसे, किसी युवा राजकुमार या सामन्त के लिये, जो निशानेबाज़ी की प्रतियोगिता में जाने को है, एक भक्तिपूर्ण संक्षिप्त प्रार्थना, कि उसे उन बेचारे कबूतरों के प्रति उसकी क्रूरता के लिये क्षमा मिले जो केवल बुरी तरह घायल होकर तड़पते रह जाते हैं; वैसे ही घुड़दौड़ में जानेवाले किसी धार्मिक और नया जन्म पाए हुए सज्जन के लिये एक प्रार्थना; और उन युवाओं के लिये एक संक्षिप्त प्रार्थना जिन्होंने दृढ़ीकरण का अनुग्रह पाया है, जब वे किसी अत्यन्त सन्दिग्ध नाटक को देखने नाट्यशाला जाते हैं। क्या ऐसी विशेष प्रार्थनाएँ माँग के अनुसार नहीं बनवाई जा सकतीं? तुम्हें इस विचार से ही घृणा होती है। तो फिर, जिस बात पर तुम परमेश्वर की आशीष नहीं माँग सकते, उससे कोई सम्बन्ध न रखो; उससे कोई सम्बन्ध न रखो, क्योंकि यदि परमेश्वर उसे आशीष नहीं दे सकता, तो तुम निश्चय जानो कि शैतान ने उसे शाप दिया है। जो कुछ तुम्हारे लिये करना उचित है, उसे तुम प्रार्थना के द्वारा पवित्र कर सकते हो; और यही तुम्हारे लिये पक्की कसौटी और परख हो: यदि तुम्हें लगे कि जो कुछ तुम्हारे सामने रखा गया है उस पर प्रभु की आशीष माँगना स्वर्ग के प्रताप का अपमान होगा, तो उस अपवित्र वस्तु से दूर रहो। यदि परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता, तो तुम्हें भी उससे कोई संगति नहीं रखनी चाहिए।
ये बातें इस उपदेश में स्पष्ट रूप से निहित हैं, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।”
II. परन्तु अब, इसका वास्तविक अर्थ क्या है? यदि इसका अर्थ यह नहीं कि हम सदा घुटनों के बल रहें, न सदा प्रार्थनाएँ दोहराते रहें, न सदा गिरजाघर या सभा में रहें, और न यह कि हम किसी दिन को प्रार्थना के लिये अनुपयुक्त समझें, तो फिर क्या? इन शब्दों का अर्थ है, पहला, एक विशेषाधिकार; दूसरा, एक उपदेश—“निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” हमारा प्रभु यीशु मसीह इन शब्दों में तुम्हें निश्चय दिलाता है कि तुम निरन्तर प्रार्थना कर सकते हो। ऐसा कोई समय नहीं जब हम प्रार्थना न कर सकें। यहाँ तुम्हें अनुमति दी गई है कि जब चाहो दया के सिंहासन के पास आओ, क्योंकि परमपवित्र स्थान का परदा ऊपर से नीचे तक फटकर दो टुकड़े हो गया है, और दया के सिंहासन तक हमारी पहुँच निर्विवाद है, और उस पर कोई विवाद उठ भी नहीं सकता। राजा कुछ ठहराए हुए दिनों पर दरबार लगाते हैं, और तब उनके दरबारियों को भीतर आने दिया जाता है; परन्तु राजाओं का राजा निरन्तर दरबार लगाए रहता है। जिस सम्राट का राजभवन शूशन में था, वह किसी को अपने पास आने न देता था जब तक वह स्वयं उसे न बुलवाए; परन्तु राजाओं के राजा ने अपने सब लोगों को बुला लिया है, और वे हर समय आ सकते हैं। जो लोग क्षयर्ष राजा के पास भीतर जाते थे, वे मार डाले जाते थे, जब तक कि वह उनकी ओर अपना राजदण्ड न बढ़ाए; परन्तु हमारा राजा अपना राजदण्ड कभी पीछे नहीं खींचता; वह सदा बढ़ा हुआ रहता है, और जो कोई उसके पास आना चाहे, वह अभी आ सकता है, और किसी भी समय आ सकता है। फारसियों में कुछ थोड़े से सामन्त ऐसे थे जिन्हें यह निराला और विशेष अधिकार था कि वे जब चाहें राजा से भेंट करें। अब जो बहुत थोड़े और बहुत बड़े लोगों का निराला अधिकार था, वही परमेश्वर की हर एक सन्तान का विशेषाधिकार है। वह हर समय राजा के पास भीतर आ सकता है। आधी रात का अन्धकार परमेश्वर के लिये बहुत देर नहीं; भोर का फूटना, जब पहली धूसर ज्योति दिखाई देती है, परमप्रधान के लिये बहुत सवेरा नहीं; दोपहर को वह बहुत व्यस्त नहीं; और जब साँझ घिर आती है, तब वह अपनी सन्तानों की प्रार्थनाओं से थका हुआ नहीं होता। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” यदि मैं इसे ठीक पढ़ता हूँ, तो विश्वासी के लिये यह अत्यन्त मधुर और बहुमूल्य अनुमति-पत्र है कि वह हर समय प्रभु के सामने अपना मन उण्डेले। मैं इसका दबा हुआ धीमा शब्द यह कहते सुनता हूँ, “हे मेरी सन्तान, जब चाहे दया के सिंहासन के पास आ; जब तेरी इच्छा हो, अनुग्रह के भण्डार के पास आ”
“सुसमाचार के अनुग्रह के आनन्दमय फाटक
रात और दिन खुले रहते हैं।”
ईश्वरीय प्रेम के मन्दिर के द्वार बन्द न किए जाएँगे। प्रार्थना करनेवाले प्राण और उसके परमेश्वर के बीच कोई भी वस्तु बाधा खड़ी नहीं कर सकती। स्वर्गदूतों और प्रार्थनाओं का मार्ग सदा खुला है। हम केवल प्रार्थना की कबूतरी को बाहर भेजें, तो निश्चय जानें कि वह शान्ति की जैतून-डाली अपनी चोंच में लिये हमारे पास लौट आएगी। प्रभु सदा अपने दासों की विनतियों की ओर ध्यान देता है, और उन पर अनुग्रह करने की बाट जोहता रहता है।
तो भी यह एक उपदेश भी है, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” और इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ एक बड़ा सत्य है, जिसे मैं थोड़े शब्दों में तुम तक भली भाँति नहीं पहुँचा सकता, और इसलिए मुझे इसे चार या पाँच बातों में खोलकर रखने का यत्न करना होगा।
इसका पहला अर्थ है, प्रार्थना को कभी न छोड़ो। किसी भी कारण या तर्क से प्रार्थना करना कभी बन्द न करो। यह मत सोचो कि तुम्हें केवल तब तक प्रार्थना करनी है जब तक तुम्हारा उद्धार न हो जाए, और फिर तुम उसे छोड़ सकते हो। जिनके पाप क्षमा हो चुके हैं, उनके लिये प्रार्थना उतनी ही आवश्यक है जितनी उनके लिये जो पाप के बोध के नीचे विलाप कर रहे हैं। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” क्योंकि अनुग्रह में स्थिर बने रहने के लिये तुम्हें प्रार्थना में स्थिर बने रहना होगा। यदि तुम अनुग्रह में अनुभवी हो जाओ और बहुत आत्मिक ज्ञान से धनी हो जाओ, तो भी अपने वरदानों और अनुग्रहों के कारण प्रार्थना को रोक रखने का स्वप्न भी न देखो। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” नहीं तो तुम्हारा फूल मुरझा जाएगा और तुम्हारा आत्मिक फल कभी न पकेगा। अपने जीवन के अन्तिम क्षण तक प्रार्थना में लगे रहो।
“जब तक जीते हैं, मसीही प्रार्थना करते रहें,
क्योंकि जब तक वे प्रार्थना करते हैं, तभी तक जीते हैं।”
जैसे हम निरन्तर साँस लेते हैं, वैसे ही हमें निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिए। जैसे जीवन में स्वास्थ्य की, या बल की, या मांसपेशियों की शक्ति की कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जो मनुष्य को साँस लेने की आवश्यकता से परे कर दे, वैसे ही आत्मिक बढ़ती की या अनुग्रह में उन्नति की कोई भी दशा मनुष्य को प्रार्थना के बिना काम चलाने की छूट न देगी।
“आओ, प्रार्थना करें! हमारा जीवन प्रार्थना ही है;
प्रार्थना तो केवल समय के साथ थम सकती है:
तब स्वर्ग में, परमेश्वर की इच्छा मानते हुए,
जीवन स्तुति और सिद्ध शान्ति होगा।”
प्रार्थना करना कभी न छोड़ो, चाहे शैतान तुम्हारे मन में यह भी डाले कि परमेश्वर की दुहाई देना तुम्हारे लिये व्यर्थ है। उसके मुँह पर ही प्रार्थना करो; “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” यदि कुछ समय तक आकाश पीतल का सा हो जाए और तुम्हारी प्रार्थना केवल तुम्हारे सिर के ऊपर गर्जन बनकर गूँजती रहे, तो भी प्रार्थना करते रहो; यदि महीने पर महीने तुम्हारी प्रार्थना निष्फल होती दिखाई दे, और तुम्हें कोई उत्तर न दिया गया हो, तो भी प्रभु के निकट आते रहो। किसी भी कारण से दया के सिंहासन को न छोड़ो। यदि वह कोई अच्छी वस्तु है जिसे तुम माँगते आए हो, और तुम्हें निश्चय है कि वह ईश्वरीय इच्छा के अनुसार है, तो यदि दर्शन में विलम्ब भी हो, तो भी उसकी बाट जोहते रहना; प्रार्थना करो, रोओ, विनती करो, मल्लयुद्ध करो, वेदना के साथ जूझो, जब तक तुम वह न पा लो जिसके लिये तुम प्रार्थना कर रहे हो। यदि प्रार्थना में तुम्हारा हृदय ठण्डा हो, तो जब तक तुम्हारा हृदय गरम न हो जाए तब तक प्रार्थना को न रोको, वरन् उस सदा धन्य आत्मा के सहारे, जो हमारी दुर्बलता में सहायता करता है, प्रार्थना करते-करते अपने प्राण को गरम कर लो। यदि लोहा गरम हो तो उस पर हथौड़ा चलाओ, और यदि वह ठण्डा हो तो उस पर तब तक हथौड़ा चलाओ जब तक वह गरम न हो जाए। किसी भी प्रकार के कारण या तर्क से प्रार्थना बन्द न करो। यदि कोई दार्शनिक तुमसे कहे कि हर घटना पहले से ठहराई हुई है, और इसलिए प्रार्थना किसी भी बात को बदल नहीं सकती, और फलस्वरूप वह मूर्खता ही होगी; तो भी, यदि तुम उसे उत्तर नहीं दे सकते और कुछ उलझन में हो, तो इन सब के होते हुए भी अपनी विनतियाँ करते रहो। पाचन के विषय में कोई भी कठिन प्रश्न तुम्हें खाने से न रोकेगा, क्योंकि परिणाम उस अभ्यास को उचित ठहराता है; वैसे ही कोई भी कुतर्क हमसे प्रार्थना बन्द न करवाए, क्योंकि उसकी निश्चित सफलता उसे हमारे लिये सराहनीय बनाती है। तुम जानते हो कि तुम्हारे परमेश्वर ने तुमसे क्या कहा है; और यदि तुम हर उस कठिनाई का उत्तर नहीं दे सकते जो मनुष्य उठा सकता है, तो ईश्वरीय इच्छा के आज्ञाकारी बने रहने का निश्चय करो, और तब भी “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” प्रार्थना की आदत को, या उसकी सामर्थ्य पर अपने भरोसे को कभी, कभी, कभी मत त्यागो।
दूसरा अर्थ यह है। प्रार्थना की नियमित भेंट को कभी स्थगित न करो। यदि तुम जागरूक मसीही हो, तो तुम्हारे प्रतिदिन की भक्ति के समय होंगे, जो अन्धविश्वास से नहीं, वरन् तुम्हारी सुविधा और स्मरण के लिये ठहराए गए हों; ठीक वैसे ही जैसे दाऊद दिन में तीन बार, और एक और पवित्र जन दिन में सात बार, प्रभु को खोजता था: अब इस प्रतिदिन की प्रार्थना को बिना अन्तर के बनाए रखने का ध्यान रखो। यह परामर्श पाठ के पूरे विस्तार को नहीं समेटता; मैं यह दावा नहीं करता कि समेटता है; मैं इसे अभी केवल दूसरे विचारों के पूरक के रूप में बता रहा हूँ। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो;” अर्थात् भोर की प्रार्थना को, या साँझ की प्रार्थना को, या दोपहर की प्रार्थना को, यदि वह तुम्हारी आदत बन गई है, कभी न छोड़ो। यदि तुम घण्टे और समय बदलो, जैसा तुम बदल सकते हो, तो भी नियमित रूप से लौट-लौटकर आनेवाले एकान्त, मनन और प्रार्थना के अभ्यास को बनाए रखो। यदि तुम्हारी अभ्यस्त भक्ति बनी रहे, तो कहा जा सकता है कि तुम प्रार्थना में लगे रहते हो। मेरा यह कहना बिलकुल ठीक होगा कि मैं एक ऐसे मनुष्य को जानता हूँ जो जब से मैं लन्दन में हूँ, तब से सदा भीख माँगता रहा है। मुझे नहीं लगता कि मैं कभी उस स्थान से गुज़रा हूँ जहाँ वह खड़ा रहता है और उसे वहाँ न देखा हो। वह एक अन्धा मनुष्य है, और एक गिरजाघर के पास खड़ा रहता है। जहाँ तक मुझे स्मरण है, वह निरन्तर भीख माँगता रहा है; निःसन्देह जब वह सोता रहा है तब उसने भीख नहीं माँगी, जब वह भोजन करने घर गया है तब उसने भीख नहीं माँगी; और जब मैंने कहा कि वह वर्षों से निरन्तर भीख माँगता रहा है, तो तुमने यह नहीं समझा कि मैंने कोई ऐसी बेतुकी बात कही है। और इसी प्रकार, यदि उन समयों में जब तुम्हारे लिये अपने साधारण परिश्रम से अलग होना उचित है, तुम दया के सिंहासन पर लगन से भीख माँगते रहो, तो तुम्हारे विषय में अपेक्षाकृत ठीक ही कहा जा सकता है कि तुम निरन्तर प्रार्थना करते हो। यद्यपि मेरे लिये सब घण्टे एक समान हैं, तो भी मैं ठहराए हुए समयों पर परमेश्वर से मिलना लाभदायक पाता हूँ, क्योंकि ये मुझे घड़ी में चाबी भरने के समान लगते हैं। घड़ी को दिन भर चलना है, परन्तु उसमें चाबी भरने का एक समय होता है; और वह छोटा सा विशेष समय जिसे हम अपने परमेश्वर के साथ संगति के लिये अलग करते और चारों ओर से घेरकर सुरक्षित रखते हैं, मानो दिन के बाकी समय के लिये हममें चाबी भर देता है। इसलिए, यदि तुम निरन्तर प्रार्थना करना चाहते हो, तो भोर और साँझ का बलिदान चढ़ाते रहो, और इसे अपने लिये सदा की विधि बना लो कि तुम्हारी प्रार्थना के समयों में कोई विघ्न न पड़े।
परन्तु यह तो केवल एक सहायता है, क्योंकि मुझे तीसरी बात जोड़नी होगी: भक्ति के इन समयों के बीच में, हृदय से अचानक उठनेवाली छोटी-छोटी प्रार्थनाओं में बहुत लगे रहने का यत्न करो। जब तुम्हारे हाथ संसार के कामों में व्यस्त हों, तब भी तुम्हारे हृदय परमेश्वर से बातें करते रहें; एक बार में बीस वाक्यों में नहीं, क्योंकि इतना लम्बा अन्तराल तुम्हारे व्यवसाय से मेल न खाए, वरन् टूटे-फूटे वाक्यों और विस्मय के शब्दों में। परमेश्वर के सामने एक कर्तव्य को दूसरे कर्तव्य के लहू से सना हुआ चढ़ाना सदा अनुचित है; और यदि हम हर घड़ी प्रार्थना करने भाग जाने के द्वारा अपने अध्ययन या परिश्रम को बिगाड़ें, तो हम यही करेंगे; परन्तु ऐसा किए बिना भी हम छोटे-छोटे वाक्य स्वर्ग की ओर भेज सकते हैं; हाँ, और हम पुकारें और अकेले शब्द तीर की नाईं ऊपर छोड़ सकते हैं, जैसे “आह,” “ओह,” “काश;” या बिना शब्दों के भी हम आँख की ऊपर उठती दृष्टि में या हृदय की आह में प्रार्थना कर सकते हैं। जो निरन्तर प्रार्थना करता है, वह भक्तिपूर्ण अभिलाषा के बहुत से छोटे बाण और हथगोले काम में लाता है, जिन्हें वह हर उपलब्ध अवसर पर फेंकता है। कभी-कभी वह नियमित प्रार्थना में अपनी अभिलाषाओं की भट्ठी को फूँककर बड़ी आँच तक पहुँचाता है, और इसके परिणामस्वरूप दूसरे समयों में चिंगारियाँ छोटे-छोटे शब्दों, दृष्टियों और अभिलाषाओं के रूप में स्वर्ग की ओर उठती रहती हैं।
चौथा, यदि हम निरन्तर प्रार्थना करना चाहते हैं, तो हमें सदा प्रार्थना के भाव में रहना होगा। पवित्र आत्मा के द्वारा नया किया गया हमारा हृदय चुम्बकीय सुई के समान होना चाहिए, जिसका झुकाव सदा ध्रुव की ओर रहता है। वह सदा उसी ध्रुव की ओर संकेत नहीं करती; यदि तुम चाहो तो उसे एक ओर मोड़ सकते हो; लोहे के जहाज़ में वह बहुत भटकती है; सब परिस्थितियों में वह ठीक-ठीक सही नहीं रहती; परन्तु यदि तुम उस सुई पर अपनी उँगली रखकर उसे बलपूर्वक पूर्व की ओर घुमा दो, तो तुम्हें केवल दबाव हटाना है, और वह तुरन्त फिर अपने प्रिय ध्रुव की ओर लौट आती है। इसी प्रकार अपने हृदय को प्रार्थना से चुम्बकित होने दो, ताकि यदि कर्तव्य की उँगली उसे प्रार्थना के प्रत्यक्ष कार्य से हटा भी दे, तो भी तुम्हारे प्राण में प्रार्थना की तीव्र लालसा बनी रहे, और जिस क्षण तुम ऐसा कर सको, तुम्हारा हृदय अपने प्रिय काम की ओर लौट आए। जैसे सुगन्ध फूलों में बसी रहती है, तब भी जब वे अपनी सुगन्ध हवा पर नहीं बिखेरते, वैसे ही प्रार्थना तुम्हारे हृदयों में बसी रहे।
परन्तु, कदाचित्, जो अन्तिम अर्थ मैं दूँगा, उसमें पाठ का सबसे अधिक सत्य है, अर्थात् यह: तुम्हारे सब काम तुम्हारी प्रार्थनाओं से मेल खाएँ, और वास्तव में तुम्हारी प्रार्थनाओं का ही आगे बढ़ता हुआ रूप हों। यदि मुझे निरन्तर प्रार्थना करनी है, तो इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि मैं सदा प्रत्यक्ष भक्ति के कार्य में ही लगा रहूँ; क्योंकि मनुष्य का मन, जैसा वह अभी रचा गया है, कामों की विविधता चाहता है, और वह पागलपन या बुद्धिहीनता उत्पन्न किए बिना सदा एक ही क्रिया में लगा नहीं रह सकता। इसलिए, यदि हमें निरन्तर प्रार्थना में लगे रहना है, तो हमें मोडस को, अर्थात् काम करने की रीति को, बदलना होगा। हमें अपनी प्रार्थनाओं का पीछा करते रहना है, परन्तु दूसरी रीति से। एक उदाहरण लो। आज भोर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह अपने लोगों को प्रार्थनाशील होने के लिये जगाए; बहुत अच्छा; जब मैं इस भवन में आ रहा था, तब भी मेरा प्राण यह पुकारता रहा, “हे प्रभु, अपनी सन्तानों को प्रार्थनाशीलता के लिये जगा दे।” अब, जब मैं तुम्हें उपदेश दे रहा हूँ और उसी बात पर ज़ोर दे रहा हूँ, तो क्या मैं प्रार्थना नहीं कर रहा? क्या मेरा उपदेश मेरी प्रार्थना का ही आगे बढ़ता हुआ रूप नहीं, क्योंकि मैं उसी बात की अभिलाषा करता और उसी को लक्ष्य बनाता हूँ? जब हम उस वस्तु को पाने के लिये, जिसके लिये हम प्रार्थना करते हैं, सर्वोत्तम साधनों का प्रयोग करते हैं, तो क्या यह प्रार्थना करते रहना नहीं है? क्या तुम मेरी बात नहीं समझते? जो अपने संगी मनुष्यों के लिये प्रार्थना करता है, और फिर उनकी भलाई का यत्न करता है, वह अब भी प्रार्थना कर रहा है। इस अर्थ में उस पुराने दोहे में सच्चाई है।
“सबसे उत्तम प्रार्थना वही करता, जो सबसे अधिक प्रेम करता
मनुष्य से, और पक्षी से, और पशु से।”
प्रेम करना प्रार्थना करना है। यदि मैं प्रार्थना में अपने संगी मनुष्य की भलाई चाहता हूँ, और फिर जाकर उसे बढ़ाने का यत्न करता हूँ, तो मैं अपने कामों में व्यावहारिक रूप से उसकी भलाई के लिये प्रार्थना कर रहा हूँ। यदि मैं, जैसा मुझे करना चाहिए, सब बातों से बढ़कर परमेश्वर की महिमा चाहता हूँ, तो यदि मेरे सब काम परमेश्वर की महिमा की ओर ले जाने के लिये हैं, तो मैं प्रार्थना करता ही रहता हूँ, चाहे मैं अपने विचारों से या अपने होंठों से प्रार्थना न भी कर रहा हूँ। आह, काश हमारा सारा जीवन एक प्रार्थना हो। ऐसा हो सकता है। प्रभु के सामने निरन्तर प्रार्थना हो सकती है, चाहे उसमें, जिसे अधिकतर लोग प्रार्थना कहते हैं, बहुत से ठहराव क्यों न हों। तो, हे मेरे भाई, निरन्तर प्रार्थना कर। तेरा सारा जीवन प्रार्थना हो। यदि तू रीति बदले, तो भी लक्ष्य न बदल; वरन् आराधना करता रह, स्तुति-वन्दना करता रह। मैं समझता हूँ कि हमारे पाठ का अर्थ यही है—प्रार्थना को पूरी तरह कभी न छोड़ो; प्रार्थना की नियमित भेंट को स्थगित न करो; सच्चे मन से उठनेवाली छोटी-छोटी पुकारों में बहुत लगे रहो; सदा प्रार्थना के भाव में रहो; और अपने सारे जीवन को अपनी प्रार्थना से मेल खानेवाला बनाओ, और उसे उसी का एक भाग बन जाने दो।
III. हम इन शब्दों का पालन कैसे कर सकते हैं? पहला, हम जहाँ तक हो सके सब पापमय विघ्नों को रोकने का परिश्रम करें। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” तो यदि सदा प्रार्थना के कार्य में लगे रहना असम्भव है, तो कम से कम हम जहाँ तक हो सके उस कार्य में लगे रहें; और उन विघ्नों को रोकें जिनका मैंने अपने प्रवचन के आरम्भ में उल्लेख किया, अर्थात् वे विघ्न जो हमारे अपने पाप के कारण उत्पन्न होते हैं। हम अपने भीतर या अपने चारों ओर की हर उस बात से, जहाँ तक हो सके, दूर रहने का यत्न करें जो हमें विनती में बढ़ते जाने से रोके। और हम दूसरों के पापों से होनेवाले विघ्नों से भी दूर रहें। क्या दूसरे हमें प्रार्थना करने से रोकते हैं? हम उनके क्रोध से न डरें। दानिय्येल को स्मरण करो, जिसने, यद्यपि उस पर सिंहों की माँद में डाले जाने का दण्ड लटक रहा था, तो भी यरूशलेम की ओर अपनी खिड़की खोली, और जैसा वह पहले करता आया था, वैसे ही दिन में सात बार प्रार्थना की। न किसी धमकी के आगे, और न किसी घूस के लोभ में, हम कभी प्रार्थना करना छोड़ें। एकान्त में हम सदा प्रार्थना करें; और यदि कर्तव्य हमें ऐसी जगह प्रार्थना करने को बुलाए जहाँ दूसरे हमें देखते हों, तो हम परमेश्वर की आँख से इतना डरें कि मनुष्य की आँख से डरने का साहस ही न करें।
इसके बाद हम अपनी प्रार्थना में हर प्रकार के अनावश्यक विघ्नों से बचें। यदि हम जानते हैं कि कोई बात, जिससे हम बच सकते हैं, हमारे भीतर प्रार्थना के भाव को भंग करने की प्रवृत्ति रखती है, तो हम यत्नपूर्वक उससे बचें। हम जहाँ तक हो सके यत्न करें कि प्रार्थना में हमारा ध्यान भटकने न पाए। शैतान का उद्देश्य यही होगा कि मन को विचलित करे, उसे पटरी से उतार दे, उसके लक्ष्य को मोड़ दे; परन्तु हम परमेश्वर के सामने निश्चय करें कि हम उसके पीछे-पीछे लगे चलने से नहीं हटेंगे। सर थॉमस एबनी बहुत वर्षों से नियमित रूप से पारिवारिक प्रार्थना करते आए थे; वे लन्दन के लॉर्ड मेयर चुने गए, और अपने चुनाव की रात उन्हें एक भोज में उपस्थित रहना था; परन्तु जब अपने परिवार को प्रार्थना के लिये इकट्ठा करने का समय आया, तो न तो वे फरीसी बनना चाहते थे और न अपना अभ्यास छोड़ना, इसलिए उन्होंने अतिथियों से इस प्रकार क्षमा माँगी—उन्होंने कहा कि एक बहुत प्रिय मित्र से उनकी एक आवश्यक भेंट तय है, और वे कुछ मिनटों के लिये उन्हें क्षमा करें। यह बिलकुल सच था; उनका सबसे प्रिय मित्र प्रभु यीशु था, और पारिवारिक प्रार्थना सचमुच एक आवश्यक भेंट थी; और इसलिए वे कुछ समय के लिये पारिवारिक वेदी के पास चले गए, और इस अर्थ में उन्होंने निरन्तर प्रार्थना की। हम कभी-कभी अच्छी बातों को अपनी प्रार्थना में विघ्न डालने देते हैं, और इस प्रकार उन्हें बुरा बना देते हैं। श्रीमती रो अपने एक पत्र में कहती हैं कि यदि बारहों प्रेरित उस नगर में प्रचार कर रहे होते जहाँ वे रहती थीं, और वे उन्हें फिर कभी न सुन पातीं, तो भी यदि वह उनकी एकान्त भक्ति का समय होता, तो वे उन्हें सुनने की आशा के लोभ में अपनी कोठरी से बाहर न निकलतीं। मैं निश्चित नहीं कि वे अपनी एकान्त भक्ति के लिये कोई और समय न ले सकती थीं, और इस प्रकार दोनों विशेषाधिकारों का आनन्द न उठा सकती थीं; परन्तु साथ ही, यदि मान लें कि उन्हें प्रार्थना खोनी ही पड़ती और बदले में केवल प्रचार मिलता, तो मैं उनसे सहमत हूँ, यह सोने को चाँदी से बदलना होता। उन्हें सुनने की अपेक्षा प्रार्थना करने में अधिक लाभ होता, क्योंकि प्रार्थना ही प्रचार का लक्ष्य है। प्रचार तो गेहूँ का डण्ठल मात्र है, परन्तु प्रार्थना स्वयं सुनहरा दाना है, और जो उसे पाता है उसी के पास सबसे उत्तम है।
कभी-कभी हम सोचते हैं कि हम प्रार्थना करने के लिये बहुत व्यस्त हैं। यह भी एक बड़ी भूल है, क्योंकि प्रार्थना करना समय की बचत है। तुम्हें लूथर की यह बात स्मरण है, “आज मुझे इतना कुछ करना है कि तीन घण्टे की प्रार्थना से कम में मैं उसे कभी पूरा न कर पाऊँगा।” साधारण दिनों में उसे प्रार्थना के लिये इतना समय लेने की आदत नहीं थी; परन्तु क्योंकि वह व्यस्त दिन था, इसलिए उसे अपने परमेश्वर के साथ अधिक संगति करनी ही थी। परन्तु, कदाचित्, हमारे काम सवेरे ही आरम्भ हो जाते हैं, और इसलिए हम कहते हैं, “मैं प्रार्थना में परमेश्वर के साथ अकेले रहने का समय कैसे पाऊँ?” सर हेनरी हैवलॉक के विषय में कहा जाता है कि जब कूच हर भोर छः बजे आरम्भ होता था, तब वे सदा चार बजे उठ जाते थे, ताकि पवित्रशास्त्र पढ़ने और अपने परमेश्वर के साथ संगति करने का अपना समय न चूकें। यदि हमारे पास समय नहीं है, तो हमें समय निकालना होगा; क्योंकि यदि परमेश्वर ने हमें गौण कर्तव्यों के लिये समय दिया है, तो उसने हमें प्रधान कर्तव्यों के लिये भी अवश्य समय दिया होगा; और उसके निकट आना एक प्रधान कर्तव्य है, और हमें किसी भी बात को उसे एक ओर हटाने नहीं देना चाहिए। किसी भी कर्तव्य का बलिदान करने की कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं; यदि हम आलसी न हों, तो हमारे पास सब के लिये पर्याप्त समय है; और वास्तव में, एक दूसरे से टकराने के बदले उसकी सहायता करेगा। जब एडवर्ड पेसन कॉलेज में विद्यार्थी थे, तब उन्होंने पाया कि कक्षाओं में जाने और परीक्षाओं की तैयारी करने में उन्हें इतना कुछ करना पड़ता था कि वे एकान्त प्रार्थना में उतना समय नहीं बिता पाते थे जितना उन्हें बिताना चाहिए था; परन्तु अन्त में, जब उन्हें यह बोध हुआ कि अपनी इन आदतों के कारण वे ईश्वरीय बातों में पीछे हटते जा रहे हैं, तब उन्होंने भक्ति के लिये उचित समय लिया; और वे अपनी दैनन्दिनी में दृढ़ता से लिखते हैं कि प्रार्थना में परमेश्वर के साथ समय बिताने के बाद उन्होंने एक ही सप्ताह में अपनी पढ़ाई में उससे अधिक किया, जितना वे पहले बारह महीनों में कर पाए थे। परमेश्वर समय का उपयोग करने की हमारी योग्यता को कई गुना बढ़ा सकता है। यदि हम प्रभु को उसका भाग दें, तो हमारे पास सब आवश्यक कामों के लिये पर्याप्त होगा। इस विषय में पहले तुम परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ तुम्हें मिल जाएँगी। यदि तुम परमेश्वर के साथ अपनी भेंट को न भूलो, तो तुम्हारे दूसरे काम भी सहजता से चलते रहेंगे।
प्रिय मित्रो, निरन्तर प्रार्थना करने के लिये हमें प्रार्थना में आलस्य के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। मेरा विश्वास है कि कोई भी मनुष्य प्रार्थना से तब तक प्रेम नहीं करता जब तक पवित्र आत्मा ने उसे उसकी मिठास और उसका मूल्य न सिखाया हो। यदि तुमने कभी निरन्तर प्रार्थना की है, तो तुम निरन्तर प्रार्थना करोगे। जो मनुष्य प्रार्थना करना पसन्द नहीं करते, वे अवश्य उसके गुप्त आनन्द से अनजान होंगे। जब प्रार्थना एक यान्त्रिक क्रिया होती है, और उसमें कोई प्राण नहीं होता, तब वह दासत्व और थकावट होती है; परन्तु जब वह सचमुच जीवित प्रार्थना होती है, और जब मनुष्य इसलिए प्रार्थना करता है कि वह मसीही है और प्रार्थना किए बिना रह नहीं सकता, जब वह सड़क पर चलते हुए प्रार्थना करता है, अपने कारोबार में प्रार्थना करता है, घर में प्रार्थना करता है, खेत में प्रार्थना करता है, जब उसका सारा प्राण प्रार्थना से भरा होता है, तब उसके लिये प्रार्थना कभी बहुत अधिक नहीं हो सकती। जो उसमें यीशु से मिलता है, वह प्रार्थना में पीछे नहीं रहेगा; परन्तु जो उस परमप्रिय को नहीं जानता, वह उसे बेगार समझेगा।
सबसे बढ़कर, हम प्रार्थना में सुस्ती और उदासीनता से बचें। आह, यह कितनी भयानक बात है कि हम कभी ऐसे शब्दों के द्वारा स्वर्ग के प्रताप का अपमान करें जिनमें से हमारा हृदय निकल चुका हो। हे मेरी आत्मा, मुझे, हाँ मुझे तुझे यह सिखाना ही होगा कि तुझे परमेश्वर के साथ संगति करनी ही है; और यदि तू अपनी प्रार्थना में परमेश्वर से बातें नहीं करती, तो जब तक ऐसा न करे, तब तक तू प्रार्थना करती ही रहेगी। जब तक तू सचमुच प्रार्थना न कर ले, दया के सिंहासन से उठकर न आ।
हे प्रिय भाई, अपने प्राण से इस प्रकार कह—“मैं यहाँ अनुग्रह के सिंहासन के पास परमेश्वर की आराधना करने और उसकी आशीष खोजने आया हूँ, और जब तक मैं यह न कर लूँ, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा; मैं केवल इसलिए अपने घुटनों से नहीं उठूँगा कि मैंने अपने सामान्य मिनट बिता दिए हैं, वरन् जब तक मुझे आशीष न मिल जाए, मैं यहीं प्रार्थना करता रहूँगा।” जब शैतान तुम्हें प्रार्थना में ऐसा दृढ़ पाता है, तो वह प्रायः परीक्षा करना छोड़ देता है। हे भाइयो, हमें जगाए जाने की आवश्यकता है। नित्य की लीक हम पर हावी होती जाती है। हम कोल्हू के बैल की चाल में पड़ जाते हैं—गोल, और गोल, और गोल, कोल्हू के चारों ओर। परमेश्वर हमें इससे बचाए। यह प्राणघातक है। एक मनुष्य बीस वर्ष तक, जहाँ तक समय और रूप का प्रश्न है, नियमितता से प्रार्थना कर सकता है, और फिर भी उस सारी अवधि में सच्ची प्रार्थना का एक दाना भी न चढ़ाया हो। हृदय से निकली एक सच्ची कराह दस लाख रटी हुई विनतियों के बराबर है; अनुग्रह पाए हुए प्राण की एक जीवित साँस दस हज़ार संक्षिप्त प्रार्थनाओं के बराबर है। परमेश्वर का अनुग्रह हमें जगाए रखे, कि हम निरन्तर प्रार्थना करते रहें।
और, हे प्रिय भाइयो, यदि हम इस कर्तव्य को पूरा करना चाहते हैं, तो फिर हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि हम सुने जाने के विषय में किसी भी प्रकार की निराशा से लड़ें। यदि छः बार के बाद भी हमारी नहीं सुनी गई, तो हमें एलिय्याह के समान फिर सात बार जाना होगा; यदि हमारा पतरस बन्दीगृह में है, और कलीसिया ने परमेश्वर से उसे छुड़ाने की प्रार्थना की है, और वह अब भी भीतरी बन्दीगृह में बेड़ियों से जकड़ा हुआ है, तो हम प्रार्थना करते रहें, क्योंकि किसी न किसी दिन पतरस फाटक खटखटाएगा। लगातार माँगते रहो; स्वर्ग का फाटक हर उस दस्तक पर नहीं खुलता जो खटखटाकर भाग जाती है। खटखटाओ, और खटखटाओ, और फिर खटखटाओ; और अपने खटखटाने और माँगने के साथ ढूँढ़ना भी जोड़ दे, और जब तक तुझे सच्चा उत्तर न मिल जाए, सन्तुष्ट न हो।
ढिठाई के कारण प्रार्थना करना कभी बन्द न करो; इससे चौकस रहो। हे मसीही, यह अनुभव कर कि तुझे सदा प्रार्थना करने की आवश्यकता है। यह न कह, “मैं धनी हूँ, और धनवान हो गया हूँ, और मुझे किसी वस्तु की घटी नहीं।” तू स्वभाव से अब भी नंगा, और कंगाल, और तुच्छ है; इसलिए प्रार्थना में लगा रह, और प्रभु से उत्तम सोना और शुद्ध वस्त्र मोल ले, कि तू धनी हो जाए और उचित रीति से वस्त्र पहने।
इस प्रकार, हे प्रियो, मैंने तुम्हारे सामने यह रखने का यत्न किया है कि ढिठाई और निराशा, आलस्य और सुस्ती का सामना करते हुए, और सब पापमय तथा दूसरे विघ्नों को एक ओर हटाने का यत्न करते हुए, हम किस प्रकार निरन्तर प्रार्थना कर सकते हैं।
IV. अब, बहुत संक्षेप में, अन्त में, हमें इस उपदेश का पालन क्यों करना चाहिए? निःसन्देह हमें इसका पालन इसलिए करना चाहिए कि यह ईश्वरीय अधिकार से है; परन्तु इसके अतिरिक्त हमें इस पर इसलिए भी ध्यान देना चाहिए कि प्रभु सदा आराधना के योग्य है। प्रार्थना आराधना की एक रीति है; इसलिए अपने सृजनहार, अपने रक्षक, अपने छुड़ानेवाले, अपने पिता को अपनी प्रार्थनाओं की श्रद्धांजलि सदा देते रहो। ऐसे राजा को श्रद्धा अर्पित करने में हम ढीले न पड़ें। हम उसे स्तुति का कर निरन्तर चुकाते रहें। हम सदा उसके नाम की बड़ाई करें और उसे धन्य कहें। उसके शत्रु उसे शाप देते हैं; हम निरन्तर उसे धन्य कहें। इसके अतिरिक्त, हे भाइयो, हमारे भीतर प्रेम की भावना निश्चय ही हमें निरन्तर परमेश्वर के निकट आने को उभारती है। मसीह हमारा पति है। क्या वह दुल्हन अपने विवाह की प्रतिज्ञाओं के प्रति सच्ची है जिसे अपने प्रियतम की संगति की चिन्ता नहीं? परमेश्वर हमारा पिता है। वह कैसी सन्तान है जो अपने पिता के घुटनों पर चढ़ने और अपने पिता के मुख से मुस्कान पाने की लालसा नहीं रखती? यदि तुम और मैं दिन पर दिन और सप्ताह पर सप्ताह परमेश्वर के साथ किसी भी प्रकार की संगति के बिना जी सकते हैं, तो हम में परमेश्वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है? “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” क्योंकि प्रभु तुमसे प्रेम करना कभी नहीं छोड़ता, तुम्हें आशीष देना कभी नहीं छोड़ता, और तुम्हें अपनी सन्तान मानना कभी नहीं छोड़ता।
“निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” क्योंकि जो भी काम तुम कर रहे हो, उस सब पर तुम्हें आशीष की आवश्यकता है। क्या वह साधारण काम है? “यदि घर को यहोवा न बनाए, तो उसके बनानेवालों का परिश्रम व्यर्थ होगा।” क्या वह कारोबार है? सवेरे उठना और देर करके विश्राम करना और कठोर परिश्रम की रोटी खाना व्यर्थ है, क्योंकि परमेश्वर के बिना तुम फल-फूल नहीं सकते। तुम्हें यह कहना सिखाया गया है, “हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे,”—सांसारिक वस्तुओं के लिये एक ईश्वरप्रेरित प्रार्थना। आह, अपने सांसारिक कामों को प्रार्थना के द्वारा पवित्र करो। और यदि तुम परमेश्वर की सेवा में लगे हो, तो ऐसा कौन सा काम है जिसमें तुम उसकी आशीष के बिना सफलता की आशा कर सको? बच्चों को सिखाना, सुसमाचार का प्रचार करना, पर्चे बाँटना, अज्ञानियों को शिक्षा देना, क्या इन सब को उसकी आशीष की आवश्यकता नहीं? यदि वह कृपा न मिले, तो ये क्या हैं? इसलिए, जब तक तुम काम करते हो, तब तक प्रार्थना करो।
तुम सदा परीक्षा में पड़ने के संकट में हो; जीवन में ऐसी कोई स्थिति नहीं जिसमें शत्रु तुम पर आक्रमण न कर सके। इसलिए, “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।” जो मनुष्य किसी अन्धेरे मार्ग पर जा रहा हो, जहाँ वह जानता है कि शत्रु घात में हैं, यदि उसे अकेले ही जाना पड़े और उसके पास तलवार हो, तो वह उसे खींचकर हाथ में लिये चलता है, ताकि डाकू जान लें कि वह उनके लिये तैयार है। इसी प्रकार, हे मसीही, निरन्तर प्रार्थना करो; अपनी तलवार अपने हाथ में लिये रहो; सर्व-प्रार्थना के उस सामर्थी हथियार को लहराते रहो जिसके विषय में बनियन बताता है। उसे कभी म्यान में न रखो; वह झिलम के कवचों को भी काट डालेगा। यदि तुम केवल प्रार्थना कर सको, तो तुम्हें किसी शत्रु से डरने की आवश्यकता नहीं। जैसे तुम्हारी परीक्षा निरन्तर होती है, वैसे ही निरन्तर प्रार्थना करो।
तुम्हें सदा प्रार्थना करने की आवश्यकता है, क्योंकि तुम्हें सदा किसी न किसी वस्तु की घटी रहती है। किसी भी दशा में तुम इतने धनी नहीं कि तुम्हें अपने परमेश्वर से किसी वस्तु की आवश्यकता न रहे। तुम्हारे लिये यह कहना सम्भव नहीं, “मेरे पास सब कुछ है,” और यदि तुम कह भी सको, तो वे सब तुम्हारे पास केवल मसीह में हैं, और मसीह ही से तुम्हें उन्हें माँगते रहना होगा। जैसे तुम सदा घटी में हो, वैसे ही दया के फाटक पर सदा भीख माँगो। इसके अतिरिक्त, आशीषें सदा तुम्हारी बाट जोह रही हैं। स्वर्गदूत ऐसी कृपाएँ लिये तैयार खड़े हैं जिन्हें तुम नहीं जानते, और तुम्हें केवल माँगना है और पाना है। आह, यदि तुम देख पाते कि केवल माँगने से क्या कुछ मिल सकता है, तो तुम इतने ढीले न होते। स्वर्ग की वे अनमोल आशीषें जो अभी तक एक ओर रखी पड़ी हैं, आह, यदि तुम केवल यह समझ पाते कि वे बस तुम्हारी प्रार्थना की बाट जोह रही हैं, तो तुम एक क्षण भी न हिचकिचाते। जो मनुष्य जानता है कि उसकी खेती लाभदायक है, और उसकी भूमि बहुतायत से उपजती है, वह अगले वर्ष भूमि के और भी चौड़े भाग में बोने में आनन्दित होगा; और जो जानता है कि परमेश्वर प्रार्थना का उत्तर देता है, और अब भी उत्तर देने को तैयार है, वह अपना मुँह और भी अधिक पसारेगा कि परमेश्वर उसे भर दे।
हे भाइयो, प्रार्थना करते रहो, क्योंकि यदि तुम्हें स्वयं प्रार्थना की आवश्यकता न भी हो, तो भी औरों को है—मरनेवाले हैं, रोगी हैं, कंगाल हैं, अज्ञानी हैं, भटके हुए हैं, निन्दा करनेवाले हैं, देश के भीतर के अन्यजाति हैं, और परदेश के अन्यजाति हैं। “निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,” क्योंकि शत्रु निरन्तर काम करता है, और अब तक सिय्योन में राज्य नहीं आया है। तुम कभी यह न कह सकोगे, “मैंने प्रार्थना करना छोड़ दिया, क्योंकि मेरे पास प्रार्थना करने को कुछ न था।” स्वर्ग के इस पार प्रार्थना के विषय आकाश के तारों के समान अनगिनत हैं।
और अब, मैंने कहा था कि मैं इस विषय में एक बात कहूँगा कि विशेष करके हमें क्यों प्रार्थना करनी चाहिए, और उसी से यह उपदेश समाप्त होगा। प्रिय मित्रो, इस कलीसिया को निरन्तर प्रार्थना करनी चाहिए। बीते वर्षों में हम प्रार्थना के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। यदि कभी किसी कलीसिया ने प्रार्थना की है, तो वह यही कलीसिया है। मैं कुछ लोगों में, जो प्रार्थना में बाधा डालते हैं, बहुत से दोष निकाल सकता हूँ, परन्तु तो भी मुझे परमेश्वर की दृष्टि में यह कहना होगा कि मैं जानता और अनुभव करता हूँ कि इस कलीसिया में बहुत वर्षों से जीवित प्रार्थना होती रही है; और इसी कारण हमें बहुत वर्षों तक शान्ति और उन्नति मिली है। हमें किसी वस्तु की घटी नहीं हुई, क्योंकि हमें प्रार्थना की घटी नहीं हुई। मुझे सन्देह नहीं कि यदि हमने और अधिक प्रार्थना की होती, तो हमें और भी बहुत कुछ मिल सकता था; तो भी यहाँ प्रार्थना बहुत सामर्थी रही है। अब, हे भाइयो, मान लो तुम्हारा कोई पास्टर न होता, मान लो प्रचारक तुम्हारे बीच से चला गया होता, और इस प्रचार-मंच पर पड़ा काला कपड़ा कलीसिया के किसी मृत प्राचीन के लिये नहीं, वरन् स्वयं प्रचारक के लिये होता, तो तुम प्रार्थना करते, है न? तो क्या तुम मेरे जीते जी मेरे लिये प्रार्थना नहीं करोगे? यदि तुम किसी और के आने के लिये प्रार्थना करते, तो क्या तुम मेरे यहाँ रहते हुए मेरे लिये प्रार्थना नहीं करोगे? मैं परमेश्वर की दृष्टि में तुम्हारे सामने पूरी लगन से अपनी सेवा निभाना चाहता हूँ, परन्तु तुम्हारी प्रार्थनाओं के बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता; और जैसे मेरे तुम्हारे बीच से चले जाने पर तुम बहुत आहें भरते, और प्रार्थनाओं के साथ किसी उत्तराधिकारी को माँगते, वैसे ही जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, मेरे लिये प्रार्थना करो। हे प्रियो, जब पास्टर बीमार था, तब तुमने उसके लिये बड़ी लगन से प्रार्थना की; तुम्हारी प्रार्थनाएँ उसकी सान्त्वना और उसके फिर से स्वस्थ होने का कारण रहीं; तो क्या अब, जब वह सुसमाचार का प्रचार करने के योग्य है, तुम उसके लिये प्रार्थना नहीं करोगे, कि उसका स्वास्थ्य परमेश्वर की सेवा के लिये पवित्र किया जाए, और सत्य की सेवकाई प्राणों को जीतने में सामर्थी हो? मैं यह तुमसे माँगता हूँ; मैं समझता हूँ कि मैं इसे अपना अधिकार मानकर तुमसे माँग सकता हूँ। मैं तुमसे विनती करता हूँ, हे भाइयों, हमारे लिये प्रार्थना करो।
हे प्रिय भाइयो, फिर मान लो कि हमारे बीच कोई मन-फिराव न होता, तो क्या तुम प्रार्थना न करते? और अब, जब बहुत से मन-फिराव हो रहे हैं, तो क्या यह प्रार्थना छोड़ देने का कारण होना चाहिए? क्या हम परमेश्वर की आराधना इसलिए कम करें कि वह हमें और अधिक देता है? मन-फिराव न होने पर जो एक प्रार्थना ऊपर जाती, उसके बदले अब, जब वह हमारे बीच उद्धार का काम करता जा रहा है, दस प्रार्थनाएँ जानी चाहिए।
मान लो हम बँटे हुए होते, और हममें बहुत सी फूट, और डाह, और झगड़े होते, तो क्या विश्वासयोग्य लोग मन की कड़वाहट में प्रार्थना न करते? तो क्या तुम इसलिए प्रार्थना न करोगे कि कोई फूट नहीं है, और बहुत सा मसीही प्रेम है? निश्चय ही, मैं फिर कहता हूँ, तुम परमेश्वर से इसलिए बुरा व्यवहार न करोगे कि वह तुमसे और भी भला व्यवहार करता है। यह तो सचमुच मूर्खता होगी।
मान लो आज हम सतानेवालों की सेनाओं से घिरे होते, और भ्रान्ति हर जगह से रेंगकर हमारे बीच घुस आती और हमें हानि पहुँचाती, तो क्या तुम, जो प्रभु से प्रेम करते हो, प्रार्थना न करते? और अब, जब हम शान्ति के दिनों में जी रहे हैं, और भ्रान्ति, यद्यपि चारों ओर घात लगाए घूमती है, तो भी हमारे बाड़े से बाहर रखी गई है, तो क्या तुम प्रभु के साथ और भी अधिक संगति न करोगे? मैं तीसरी बार भी कहूँगा, क्या हम इसलिए कम प्रार्थना करें कि परमेश्वर अधिक देता है? आह, नहीं; वरन् वह हमारे प्रति जितना भला है, हम उतनी ही अधिक उसकी आराधना करें और उसके नाम की बड़ाई करें।
अभी हमें प्रार्थना करने की आवश्यकता है, क्योंकि कुछ लोग ठण्डे पड़ते जा रहे हैं, और अपने पुराने पापों की ओर लौट रहे हैं। हमें प्रार्थना करने की आवश्यकता है, क्योंकि हम मसीह के लिये बहुत कुछ कर रहे हैं। हर एक सेवा-कार्य पूरे ज़ोर से चल रहा है। हमें बड़े प्रयत्नों पर बड़ी आशीष चाहिए। हमें प्रार्थना से ऐसे परिणाम मिले हैं कि जो मनुष्य पहली बार उनके विषय में सुने, उसके कान झनझना उठें: एक कलीसिया के रूप में हमारा इतिहास स्वयं प्रेरितों के इतिहास से भी पीछे नहीं रहा: हमने सब लोगों के सामने परमेश्वर की भुजा प्रगट होते देखी है, और इस प्रचार-मंच की गवाही पृथ्वी की छोर तक पहुँची है, और हज़ारों ने उद्धारकर्ता को पाया है—यह सब बहुत सी प्रार्थनाओं के उत्तर में। तो, निरन्तर प्रार्थना करो। हे टैबरनेकल की कलीसिया, जो कुछ तेरे पास है उसे थामे रह, कि कोई तेरा मुकुट छीन न ले। आह, प्रार्थना करनेवाली कलीसिया बनी रहो, ताकि जब हम मसीह के न्याय आसन के सामने खड़े होंगे, तब हम, पास्टर और लोग, एक साथ न तो प्रार्थनाहीन होने का दोष पाएँ, न प्रभु के काम में ढीले होने का। मैं हृदय से आशा करता हूँ कि यह सब कल के प्रार्थना-दिवस को और अधिक सच्चा और गहरा बनाने में सहायक होगा; परन्तु उससे भी बढ़कर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि हम सब हर समय प्रार्थना में उत्साही, बारम्बार, तत्पर और स्थिर रहें; पवित्र आत्मा में प्रार्थना करते हुए, यीशु के नाम में।
उपदेश से पहले पढ़ा गया पवित्रशास्त्र का भाग—1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18 और 5।
अध्याय 8 पूरा हुआ
निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो